Atharva Veda Anuvaka 1
Kanda 125 Suktas304 Mantras

Anuvaka 1

मुख्य विषय: पृथ्वी पर आधारित यज्ञीय‑सामाजिक व्यवस्था—शुद्धि, पितरों का प्रतिष्ठापन, गृह‑रक्षा और पवित्र विधि। उपविषय: (1) पृथ्वी (पृथिवी) को विश्व‑आधार और धर्म की साक्षिणी के रूप में—भूमि‑सूक्त। (2) अग्नि के द्वारा क्षेम‑शान्ति की शुद्धि, रिप्र (कलंक/दूषण) का निवारण। (3) पितृयज्ञ/श्राद्ध: पितरों को आसन देना और यम के साथ सौहार्द/सम्मति सुनिश्चित करना। (4) गृहस्थ जीवन में अनिष्ट, रोग और टोना‑टोटका/अभिचार का अपसारण करने वाले अपोत्प्रैतिक (रक्षात्मक) कर्म। (5) राजधर्म/विधि‑रक्षा: ब्रह्मगवी (ब्राह्मण की गाय) तथा संपत्ति की पवित्रता का संरक्षण।

Suktas in Anuvaka 1

Sukta 1

भू्मि-सूक्त अथर्ववेद का पृथिवी के प्रति महान स्तोत्र है, जिसमें धरती को सघन, स्थिर और चिरस्थायी आधार के रूप में सराहा गया है, जो मनुष्यों, वनस्पतियों और समस्त प्राणियों को धारण करती है। उसे “स्वर्ण-वक्ष” तथा औषधियों की धारिणी मानकर वंदना करने से अस्थिर करने वाली शक्तियाँ शांत होती हैं, निवास-स्थापन को वैधता मिलती है, और जो उसके ऊपर बसते हैं उनके लिए श्री (समृद्धि) तथा भूतिः (उन्नति/फलना-फूलना) का आह्वान किया जाता है।

Rishi: Traditionally attributed within the Bhūmi-sūkta complex (often treated as Atharvanic/Angirasic tradition rather than a single named ṛṣi). | Devata: Pṛthivī (Earth) | 63 Mantras

Sukta 2

यह सूक्त क्षेम–शान्ति की शुद्धिकरण-क्रमिका है, जिसमें अग्नि—विशेषतः उनके कार्य-नाम ‘सङ्कसुक’ के रूप में—यज्ञकर्म और आचरण के ‘दाग’ (रिप्र) को घिसकर दूर करते हैं और यजमान को पुनः यज्ञ-योग्य (यज्ञिय) बनाते हैं। इसमें मृत्यु-संबद्ध, भक्षक अग्नि (क्रव्याद् अग्नि) को पितरों के पथ की ओर मोड़कर वहाँ नियोजित किया जाता है, ताकि श्मशान/अन्त्येष्टि की अशौच-छाया जीवितों के यज्ञ-क्षेत्र में लौटकर न आए। सूक्त का उपसंहार आयु-वृद्धि और विमोचन में होता है: शत्रु शक्तियाँ उलटकर/निकाल दी जाती हैं और अभिप्रेत जन दीर्घायु से युक्त होकर ‘प्रेषित’ किए जाते हैं।

Rishi: Atharvanic tradition (often transmitted under Atharvan/Angiras lineages for this kṣema–śānti material) | Devata: Agni (as purifier; Saṅkasuka as named form/function of Agni) | 55 Mantras

Sukta 3

अथर्ववेद 12.3 श्राद्ध–पितृयज्ञ का एक स्तोत्र-समुच्चय है, जो पितरों को उनके नियत दिक्-भाग में विधिवत् आसन देता है, आहुति-स्थल की स्थापना करता है, और यम के साथ सौहार्द (सामंजस्य) की याचना करता है, ताकि पका हुआ हवि भय का कारण न बनकर रक्षण (शर्मन्) का माध्यम बने। यह दिशाओं, पात्रों, कुश-आसन और रक्षकों का विन्यास करके यज्ञ को एक सुरक्षात्मक परिधि में बाँधता है, और शोक तथा मर्त्यता को सुव्यवस्थित परंपरा में रूपांतरित करता है—जीवितों के लिए दीर्घायु और पितरों के लिए तृप्ति।

Rishi: Traditionally connected with Pitṛ/Śrāddha liturgy in AV 12.3 (Ancestral complex; specific r̥ṣi attributions vary by anukramaṇī tradition). | Devata: Yama with the Pitṛs (ancestral collective). | 60 Mantras

Sukta 4

अथर्ववेद 12.4 एक गृह-अपोत्प्राय (अपशकुन-निवारक) सूक्त है, जो घर के विनाश के छिपे कारणों—अग्नि-उपद्रव, धन-हानि, रोग तथा शत्रु-प्रेरित अभिचार—को नाम लेकर प्रकट करता और उन्हें बाहर निकालता है। ये विपत्तियाँ प्रायः अमंगलकारी स्त्री-रूप एजेंटों और अशुभ लक्षणों के रूप में व्यक्त की गई हैं। इसकी शक्ति ‘निदानात्मक नामकरण’ में है—दुर्भाग्य को उसके चिह्नों सहित पुकारना—और फिर कठोर निष्कासन तथा गृह-व्यवस्था के शुद्ध क्रम की पुनर्स्थापना में, विशेषतः गौ-धन, दान और आचार-पालन के संदर्भ में। यह सूक्त घर, पशुधन और बच्चों के चारों ओर रक्षात्मक जाल बुनता है और अपशकुनों को कर्मकाण्डीय प्रतिकार के लिए क्रियाशील उपायों में बदल देता है।

Rishi: Atharvanic/anonymous (as typical for many AV domestic-apotropaic verses; hymn-level attribution varies by anukramaṇī tradition) | Devata: Apotropaic address to misfortune/hostile agents (alakṣmī-type personifications rather than a single deva) | 53 Mantras

Sukta 5

अथर्ववेद 12.5 एक विधि-रक्षात्मक (राजधर्म) सूक्त है, जो ब्राह्मण की गाय (ब्रह्मगवी) को अतिक्रमण-अयोग्य, पवित्र संपत्ति के रूप में प्रतिष्ठित करता है और उसके अपहरण/हड़पने को धर्म-तत्त्वतः दण्डनीय अपराध बनाता है। इसमें गाय को ब्रह्मन् का जीवित विस्तार—“ब्रह्म की धनुष-डोरी”—कहा गया है; अतः उसे लेने का प्रयास शाप-तर्क को सक्रिय करता है, जो अपराधी के बहिष्कार, दग्ध होने और अंततः मृत्यु की ओर हाँके जाने पर समाप्त होता है।

Rishi: Traditionally Atharvanic/Angirasa attribution for this legal-protective material (hymn-level attribution varies by anukramaṇī tradition). | Devata: Go (Cow) as sacral power; Mṛtyu as punitive horizon; Brahman as weaponized sacred authority. | 73 Mantras

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