Bala KandaPrakarana 2721 Verses

Prakarana 27

This Sopāna is the awakening of bhakti through ‘darśana’ and ‘parīkṣā’: the soul witnesses the Lord’s effortless supremacy (bow-breaking) and learns that egoic strength collapses before grace. Bālakāṇḍa functions as the entry-stair where śraddhā becomes lived experience—devotion is born not from argument but from a heart pierced by beauty (rūpa-mādhurya) and moral clarity (dharma).

En este segmento del Bālakāṇḍa (Sītā-svayaṃvara y el quiebre del arco de Śiva), el rasa dominante es adbhuta, matizado por śṛṅgāra y vīra, y pronto vira hacia hāsya/raudra cuando los reyezuelos arden en orgullo herido. Tulasīdāsa coreografía la emoción como pedagogía espiritual: el asombro abre el corazón (“लोक सब चित्र लिखे से”), el amor se vuelve palpable en la agitación interior de Sītā, y la līlā del Señor resuelve tensión cósmica y social en un solo sonido: la कठोर धुनि que llena los mundos. Teológicamente, la escena es un Mānas en miniatura: el arco de Śiva es “océano/nave” y el brazo de Rāma es el poder que hace cruzar a la otra orilla; el cruce sólo es posible por entrega, no por el ‘kड़हारū’ (barquero) mundano. El episodio prepara también el siguiente peldaño: la llegada de Paraśurāma prueba si el vīrya nace del ahaṅkāra o del dharma-bhakti. Así, aquí el Bālakāṇḍa establece la afirmación central del Mānas: la belleza y el juego del Señor saguṇa son, en sí mismos, conocimiento liberador.

Verses

Verse 541 (चौपाई)

दिसकुंजरहु कमठ अहि कोला। धरहु धरनि धरि धीर न डोला।। रामु चहहिं संकर धनु तोरा। होहु सजग सुनि आयसु मोरा।। चाप सपीप रामु जब आए। नर नारिन्ह सुर सुकृत मनाए।। सब कर संसउ अरु अग्यानू। मंद महीपन्ह कर अभिमानू।। भृगुपति केरि गरब गरुआई। सुर मुनिबरन्ह केरि कदराई।। सिय कर सोचु जनक पछितावा। रानिन्ह कर दारुन दुख दावा।। संभुचाप बड बोहितु पाई। चढे जाइ सब संगु बनाई।। राम बाहुबल सिंधु अपारू। चहत पारु नहि कोउ कड़हारू।।

Verse 542 (दोहा/सोरठा)

राम बिलोके लोग सब चित्र लिखे से देखि। चितई सीय कृपायतन जानी बिकल बिसेषि।।260।।

Verse 543 (चौपाई)

देखी बिपुल बिकल बैदेही। निमिष बिहात कलप सम तेही।। तृषित बारि बिनु जो तनु त्यागा। मुएँ करइ का सुधा तड़ागा।। का बरषा सब कृषी सुखानें। समय चुकें पुनि का पछितानें।। अस जियँ जानि जानकी देखी। प्रभु पुलके लखि प्रीति बिसेषी।। गुरहि प्रनामु मनहि मन कीन्हा। अति लाघवँ उठाइ धनु लीन्हा।। दमकेउ दामिनि जिमि जब लयऊ। पुनि नभ धनु मंडल सम भयऊ।। लेत चढ़ावत खैंचत गाढ़ें। काहुँ न लखा देख सबु ठाढ़ें।। तेहि छन राम मध्य धनु तोरा। भरे भुवन धुनि घोर कठोरा।।

Verse 544 (छंद)

भरे भुवन घोर कठोर रव रबि बाजि तजि मारगु चले। चिक्करहिं दिग्गज डोल महि अहि कोल कूरुम कलमले।। सुर असुर मुनि कर कान दीन्हें सकल बिकल बिचारहीं। कोदंड खंडेउ राम तुलसी जयति बचन उचारही।।

Verse 545 (दोहा/सोरठा)

संकर चापु जहाजु सागरु रघुबर बाहुबलु। बूड़ सो सकल समाजु चढ़ा जो प्रथमहिं मोह बस।।261।।

Verse 546 (चौपाई)

प्रभु दोउ चापखंड महि डारे। देखि लोग सब भए सुखारे।। कोसिकरुप पयोनिधि पावन। प्रेम बारि अवगाहु सुहावन।। रामरूप राकेसु निहारी। बढ़त बीचि पुलकावलि भारी।। बाजे नभ गहगहे निसाना। देवबधू नाचहिं करि गाना।। ब्रह्मादिक सुर सिद्ध मुनीसा। प्रभुहि प्रसंसहि देहिं असीसा।। बरिसहिं सुमन रंग बहु माला। गावहिं किंनर गीत रसाला।। रही भुवन भरि जय जय बानी। धनुषभंग धुनि जात न जानी।। मुदित कहहिं जहँ तहँ नर नारी। भंजेउ राम संभुधनु भारी।।

Verse 547 (दोहा/सोरठा)

बंदी मागध सूतगन बिरुद बदहिं मतिधीर। करहिं निछावरि लोग सब हय गय धन मनि चीर।।262।।

Verse 548 (चौपाई)

झाँझि मृदंग संख सहनाई। भेरि ढोल दुंदुभी सुहाई।। बाजहिं बहु बाजने सुहाए। जहँ तहँ जुबतिन्ह मंगल गाए।। सखिन्ह सहित हरषी अति रानी। सूखत धान परा जनु पानी।। जनक लहेउ सुखु सोचु बिहाई। पैरत थकें थाह जनु पाई।। श्रीहत भए भूप धनु टूटे। जैसें दिवस दीप छबि छूटे।। सीय सुखहि बरनिअ केहि भाँती। जनु चातकी पाइ जलु स्वाती।। रामहि लखनु बिलोकत कैसें। ससिहि चकोर किसोरकु जैसें।। सतानंद तब आयसु दीन्हा। सीताँ गमनु राम पहिं कीन्हा।।

Verse 549 (दोहा/सोरठा)

संग सखीं सुदंर चतुर गावहिं मंगलचार। गवनी बाल मराल गति सुषमा अंग अपार।।263।।

Verse 550 (चौपाई)

सखिन्ह मध्य सिय सोहति कैसे। छबिगन मध्य महाछबि जैसें।। कर सरोज जयमाल सुहाई। बिस्व बिजय सोभा जेहिं छाई।। तन सकोचु मन परम उछाहू। गूढ़ प्रेमु लखि परइ न काहू।। जाइ समीप राम छबि देखी। रहि जनु कुँअरि चित्र अवरेखी।। चतुर सखीं लखि कहा बुझाई। पहिरावहु जयमाल सुहाई।। सुनत जुगल कर माल उठाई। प्रेम बिबस पहिराइ न जाई।। सोहत जनु जुग जलज सनाला। ससिहि सभीत देत जयमाला।। गावहिं छबि अवलोकि सहेली। सियँ जयमाल राम उर मेली।।

Verse 551 (दोहा/सोरठा)

रघुबर उर जयमाल देखि देव बरिसहिं सुमन। सकुचे सकल भुआल जनु बिलोकि रबि कुमुदगन।।264।।

Verse 552 (चौपाई)

पुर अरु ब्योम बाजने बाजे। खल भए मलिन साधु सब राजे।। सुर किंनर नर नाग मुनीसा। जय जय जय कहि देहिं असीसा।। नाचहिं गावहिं बिबुध बधूटीं। बार बार कुसुमांजलि छूटीं।। जहँ तहँ बिप्र बेदधुनि करहीं। बंदी बिरदावलि उच्चरहीं।। महि पाताल नाक जसु ब्यापा। राम बरी सिय भंजेउ चापा।। करहिं आरती पुर नर नारी। देहिं निछावरि बित्त बिसारी।। सोहति सीय राम कै जौरी। छबि सिंगारु मनहुँ एक ठोरी।। सखीं कहहिं प्रभुपद गहु सीता। करति न चरन परस अति भीता।।

Verse 553 (दोहा/सोरठा)

गौतम तिय गति सुरति करि नहिं परसति पग पानि। मन बिहसे रघुबंसमनि प्रीति अलौकिक जानि।।265।।

Verse 554 (चौपाई)

तब सिय देखि भूप अभिलाषे। कूर कपूत मूढ़ मन माखे।। उठि उठि पहिरि सनाह अभागे। जहँ तहँ गाल बजावन लागे।। लेहु छड़ाइ सीय कह कोऊ। धरि बाँधहु नृप बालक दोऊ।। तोरें धनुषु चाड़ नहिं सरई। जीवत हमहि कुअँरि को बरई।। जौं बिदेहु कछु करै सहाई। जीतहु समर सहित दोउ भाई।। साधु भूप बोले सुनि बानी। राजसमाजहि लाज लजानी।। बलु प्रतापु बीरता बड़ाई। नाक पिनाकहि संग सिधाई।। सोइ सूरता कि अब कहुँ पाई। असि बुधि तौ बिधि मुहँ मसि लाई।।

Verse 555 (दोहा/सोरठा)

देखहु रामहि नयन भरि तजि इरिषा मदु कोहु। लखन रोषु पावकु प्रबल जानि सलभ जनि होहु।।266।।

Verse 556 (चौपाई)

बैनतेय बलि जिमि चह कागू। जिमि ससु चहै नाग अरि भागू।। जिमि चह कुसल अकारन कोही। सब संपदा चहै सिवद्रोही।। लोभी लोलुप कल कीरति चहई। अकलंकता कि कामी लहई।। हरि पद बिमुख परम गति चाहा। तस तुम्हार लालचु नरनाहा।। कोलाहलु सुनि सीय सकानी। सखीं लवाइ गईं जहँ रानी।। रामु सुभायँ चले गुरु पाहीं। सिय सनेहु बरनत मन माहीं।। रानिन्ह सहित सोचबस सीया। अब धौं बिधिहि काह करनीया।। भूप बचन सुनि इत उत तकहीं। लखनु राम डर बोलि न सकहीं।।

Verse 557 (दोहा/सोरठा)

अरुन नयन भृकुटी कुटिल चितवत नृपन्ह सकोप। मनहुँ मत्त गजगन निरखि सिंघकिसोरहि चोप।।267।।

Verse 558 (चौपाई)

खरभरु देखि बिकल पुर नारीं। सब मिलि देहिं महीपन्ह गारीं।। तेहिं अवसर सुनि सिव धनु भंगा। आयसु भृगुकुल कमल पतंगा।। देखि महीप सकल सकुचाने। बाज झपट जनु लवा लुकाने।। गौरि सरीर भूति भल भ्राजा। भाल बिसाल त्रिपुंड बिराजा।। सीस जटा ससिबदनु सुहावा। रिसबस कछुक अरुन होइ आवा।। भृकुटी कुटिल नयन रिस राते। सहजहुँ चितवत मनहुँ रिसाते।। बृषभ कंध उर बाहु बिसाला। चारु जनेउ माल मृगछाला।। कटि मुनि बसन तून दुइ बाँधें। धनु सर कर कुठारु कल काँधें।।

Verse 559 (दोहा/सोरठा)

सांत बेषु करनी कठिन बरनि न जाइ सरुप। धरि मुनितनु जनु बीर रसु आयउ जहँ सब भूप।।268।।

Verse 560 (चौपाई)

देखत भृगुपति बेषु कराला। उठे सकल भय बिकल भुआला।। पितु समेत कहि कहि निज नामा। लगे करन सब दंड प्रनामा।। जेहि सुभायँ चितवहिं हितु जानी। सो जानइ जनु आइ खुटानी।। जनक बहोरि आइ सिरु नावा। सीय बोलाइ प्रनामु करावा।। आसिष दीन्हि सखीं हरषानीं। निज समाज लै गई सयानीं।। बिस्वामित्रु मिले पुनि आई। पद सरोज मेले दोउ भाई।। रामु लखनु दसरथ के ढोटा। दीन्हि असीस देखि भल जोटा।। रामहि चितइ रहे थकि लोचन। रूप अपार मार मद मोचन।।

Verse 561 (दोहा/सोरठा)

बहुरि बिलोकि बिदेह सन कहहु काह अति भीर।। पूछत जानि अजान जिमि ब्यापेउ कोपु सरीर।।269।।

Inside Prakarana 27

Compositional abstract

In this Bālakāṇḍa segment (Sītā-svayaṃvara and Śiva-dhanuṣ-bhaṅga), the dominant rasa is adbhuta shaded by śṛṅgāra and vīra, quickly turning to hāsya/raudra as petty kings flare in wounded pride. Tulasīdāsa choreographs emotion as a spiritual pedagogy: wonder opens the heart (लोक सब चित्र लिखे से), प्रेम becomes palpable in Sītā’s inner turmoil, and the Lord’s līlā resolves cosmic and social tension in one sound—the कठोर धुनि that fills the worlds. Theologically, the scene is a miniature Manas: Śiva’s bow is ‘the ocean/ship’ and Rāma’s arm is the pāra-gāmī power; crossing is possible only by surrender, not by worldly ‘kड़हारू’ (ferryman). The episode also prepares the next stair: Paraśurāma’s arrival tests whether vīrya is rooted in अहंकार or in dharma-bhakti. Thus Bālakāṇḍa here establishes the Manas’s core claim: the Saguna Lord’s beauty and play are themselves liberating knowledge.

The dialogue

  • Yajñavalkya (via Tulasīdāsa’s framing of the Manas-kathā)Bhāradvāja · Prayāga-ghāṭ: the ‘jñāna-to-bhakti’ bank where inquiry ripens into devotion; the bow episode is narrated as a revelatory proof (pramāṇa) of Rāma-tattva.

Frequently Asked Questions

Paramparā holds that Śiva-dhanuṣ-bhaṅga and Sītā-Rāma jaymāl pāṭha grants saubhāgya, dṛḍha-bhakti, and ahaṅkāra-kṣaya: the listener’s ‘inner bow’ (pride/saṃśaya) breaks, making the heart fit for Rāma-nāma and for vivāha-maṅgal/gaurī-pūjā contexts.

A common samput used in many Manas-kathā lineages for auspicious stabilization is: “सीता राम चरन रति मोरे। अनुदिन बढ़उ अनुग्रह तोरे॥” (inserted after each doha in the run), especially during vivaah-maṅgal recitations.

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