Adhyaya 35
Adi ParvaAdhyaya 3521 Verses

Adhyaya 35

अध्याय ३५ — वासुकिचिन्ता-शमनम् (Vāsuki’s Anxiety and Brahmā’s Confirmation)

Upa-parva: Āstīka Upākhyāna (Serpent-lineage episode: Vāsuki–Jaratkāru context)

Sauti reports that the Nāgas, hearing Elāpatra’s words, respond with collective approval. From that point Vāsuki carefully protects the maiden—his sister destined for Jaratkāru—while taking great satisfaction in the prospect of securing Nāga welfare. Soon thereafter the gods and Asuras churn the ocean (Varuṇa’s abode), with Vāsuki serving as a principal instrument in the undertaking; after completing the task they approach Pitāmaha (Brahmā). The gods, together with Vāsuki, petition Brahmā to remove Vāsuki’s mental anguish arising from his mother’s curse, emphasizing his consistent helpfulness and goodwill. Brahmā replies that the instruction formerly delivered through Elāpatra was already granted by him and should now be executed at the proper time: the sinful will perish, not those who practice dharma. He confirms that the ascetic brāhmaṇa Jaratkāru has arisen and that Vāsuki should offer his sister to Jaratkāru when the occasion arrives, as this is for the welfare of the serpents. Hearing Brahmā’s words, the Nāga-king organizes vigilant watch so that when Jaratkāru seeks a bride, he can be promptly informed, ensuring the intended protective outcome for the Nāga community.

Chapter Arc: शौनक ऋषि सूत से आग्रह करते हैं—कद्रू-विनता के वरदान, शाप और गरुड़-वृत्तांत तो सुनाया, पर नागों के नाम अभी तक नहीं बताए; वे ‘प्राधान्येन’ प्रमुख नागों के नाम सुनना चाहते हैं। → सूत, ऋषि-सभा की जिज्ञासा को तृप्त करने हेतु नागवंश की विशालता का संकेत देते हुए नाम-गणना आरम्भ करते हैं—शेष, वासुकि, ऐरावत, तक्षक, कर्कोटक आदि से लेकर अनेकानेक पन्नगों की सूची बहने लगती है, मानो अनन्त फणों की माला। → नामों की धारा चरम पर पहुँचती है और सूत स्पष्ट करते हैं कि पन्नगों की संख्या ‘सहस्राणि, प्रयुतानि, अर्बुदानि’—अगणनीय है; पूर्ण गणना असंभव, केवल प्रमुख नाम ही कहे जा सकते हैं। → सूत प्रमुख नागों के नामों का कथन कर सभा की मांग पूरी करते हैं और नागकुल की अपरिमितता का बोध कराते हुए अध्याय को समापन देते हैं।

Shlokas

Verse 1

ऑपन--माजल छा जि पज्चत्रिशो< ध्याय: मुख्य-मुख्य नागोंके नाम शौनक उवाच भुजजड़मानां शापस्य मात्रा चैव सुतेन च । विनतायास्त्वया प्रोक्ते कारणं सूतनन्दन,शौनकजीने कहा--सूतनन्दन! सर्पोको उनकी मातासे और विनता देवीको उनके पुत्रसे जो शाप प्राप्त हुआ था, उसका कारण आपने बता दिया

Śaunaka said: “O son of the Sūta, you have explained the cause of the curse the Nāgas received from their mother, and the cause of the curse the goddess Vinatā received from her son.”

Verse 2

वरप्रदानं भर्त्रां च कद्रूविनतयोस्तथा । नामनी चैव ते प्रोक्ते पक्षिणोर्वैनतेययो:,कद्ू और विनताको उनके पति कश्यपजीसे जो वर मिले थे, वह कथा भी कह सुनायी तथा विनताके जो दोनों पुत्र पक्षीरूपमें प्रकट हुए थे, उनके नाम भी आपने बताये हैं

“You have also recounted how their husband Kaśyapa granted boons to Kadrū and Vinatā, and you have stated the names of Vinatā’s two sons who were born in the form of birds. Now, please continue the account in its proper sequence.”

Verse 3

पन्नगानां तु नामानि न कीर्तयसि सूतज । प्राधान्येनापि नामानि श्रोतुमिच्छामहे वयम्‌,किंतु सूतपुत्र! आप सर्पोके नाम नहीं बता रहे हैं। यदि सबका नाम बताना सम्भव न हो, तो उनमें जो मुख्य-मुख्य सर्प हैं, उन्हींके नाम हम सुनना चाहते हैं

Śaunaka said: “O son of the Sūta, you are not recounting the names of the serpents. Even if not all can be listed, we wish to hear at least the principal names among them.”

Verse 4

सौतिर्वाच बहुत्वान्नामधेयानि पन्नगानां तपोधन । न कीर्तयिष्ये सर्वेषां प्राधान्येन तु मे शृूणु,उग्रश्रवाजीने कहा--तपोधन! सर्पोंकी संख्या बहुत है; अतः उन सबके नाम तो नहीं कहूँगा, किंतु उनमें जो मुख्य-मुख्य सर्प हैं, उनके नाम मुझसे सुनिये

Ugraśravas, the son of Sūta, said: “O ascetic rich in austerity, the serpents are exceedingly numerous; therefore I shall not recite all their names. Rather, listen from me to those who are foremost among them.”

Verse 5

शेष: प्रथमतो जातो वासुकिस्तदनन्तरम्‌ । ऐरावतस्तक्षकक्ष कर्कोटकधनंजयौ,नागोंमें सबसे पहले शेषजी प्रकट हुए हैं। तदनन्तर वासुकि, ऐरावत, तक्षक, कर्कोटक, धनंजय, कालिय, मणिनाग, आपूरण, पिंजरक, एलापत्र, वामन, नील, अनील, कल्माष, शबल, आर्यक, उग्रक, कलशपोतक, सुमनाख्य, दधिमुख, विमलपिण्डक, आप्त, कर्कोटक (द्वितीय), शंख, वालिशिख, निष्टानक, हेमगुह, नहुष, पिंगल, बाह्कर्ण, हस्तिपद, मुद्गरपिण्डक, कम्बल, अश्वतर, कालीयक, वृत्त, संवर्तक, पद्म (प्रथम), पद्म (द्वितीय), शंखमुख, कूष्माण्डक, क्षेमक, पिण्डारक, करवीर, पुष्पदंष्ट, बिल्वक, बिल्वपाण्डुर, मूषकाद, शंखशिरा, पूर्णभद्र, हरिद्रक, अपराजित, ज्योतिक, श्रीवह, कौरव्य, धृतराष्ट्र, पराक्रमी शंखपिण्ड, विरजा, सुबाहु, वीर्यवान्‌ शालिपिण्ड, हस्तिपिण्ड, पिठरक, सुमुख, कौणपाशन, कुठर, कुंजर, प्रभाकर, कुमुद, कुमुदाक्ष, तित्तिरे, हलिक, महानाग कर्दम, बहुमूलक, कर्कर, अकर्कर, कुण्डोदर और महोदर--ये नाग उत्पन्न हुए

“Among the nāgas, Śeṣa was born first; after him came Vāsuki. Then were born Airāvata, Takṣaka, Karkoṭaka, and Dhanañjaya.”

Verse 6

कालियो मणिनागश्न नागश्चापूरणस्तथा । नागस्तथा पिज्जरक एलापत्रो5थ वामन:,नागोंमें सबसे पहले शेषजी प्रकट हुए हैं। तदनन्तर वासुकि, ऐरावत, तक्षक, कर्कोटक, धनंजय, कालिय, मणिनाग, आपूरण, पिंजरक, एलापत्र, वामन, नील, अनील, कल्माष, शबल, आर्यक, उग्रक, कलशपोतक, सुमनाख्य, दधिमुख, विमलपिण्डक, आप्त, कर्कोटक (द्वितीय), शंख, वालिशिख, निष्टानक, हेमगुह, नहुष, पिंगल, बाह्कर्ण, हस्तिपद, मुद्गरपिण्डक, कम्बल, अश्वतर, कालीयक, वृत्त, संवर्तक, पद्म (प्रथम), पद्म (द्वितीय), शंखमुख, कूष्माण्डक, क्षेमक, पिण्डारक, करवीर, पुष्पदंष्ट, बिल्वक, बिल्वपाण्डुर, मूषकाद, शंखशिरा, पूर्णभद्र, हरिद्रक, अपराजित, ज्योतिक, श्रीवह, कौरव्य, धृतराष्ट्र, पराक्रमी शंखपिण्ड, विरजा, सुबाहु, वीर्यवान्‌ शालिपिण्ड, हस्तिपिण्ड, पिठरक, सुमुख, कौणपाशन, कुठर, कुंजर, प्रभाकर, कुमुद, कुमुदाक्ष, तित्तिरे, हलिक, महानाग कर्दम, बहुमूलक, कर्कर, अकर्कर, कुण्डोदर और महोदर--ये नाग उत्पन्न हुए

“(Among the serpents were) Kāliya, Maṇināga, and also the serpent named Āpūraṇa; likewise (there were) Piñjaraka, Elāpatra, and then Vāmana.”

Verse 7

नीलानीलौ तथा नागौ कल्माषशबलौ तथा । आर्यकश्षोग्रकश्नैव नागः कलशपोतक:,नागोंमें सबसे पहले शेषजी प्रकट हुए हैं। तदनन्तर वासुकि, ऐरावत, तक्षक, कर्कोटक, धनंजय, कालिय, मणिनाग, आपूरण, पिंजरक, एलापत्र, वामन, नील, अनील, कल्माष, शबल, आर्यक, उग्रक, कलशपोतक, सुमनाख्य, दधिमुख, विमलपिण्डक, आप्त, कर्कोटक (द्वितीय), शंख, वालिशिख, निष्टानक, हेमगुह, नहुष, पिंगल, बाह्कर्ण, हस्तिपद, मुद्गरपिण्डक, कम्बल, अश्वतर, कालीयक, वृत्त, संवर्तक, पद्म (प्रथम), पद्म (द्वितीय), शंखमुख, कूष्माण्डक, क्षेमक, पिण्डारक, करवीर, पुष्पदंष्ट, बिल्वक, बिल्वपाण्डुर, मूषकाद, शंखशिरा, पूर्णभद्र, हरिद्रक, अपराजित, ज्योतिक, श्रीवह, कौरव्य, धृतराष्ट्र, पराक्रमी शंखपिण्ड, विरजा, सुबाहु, वीर्यवान्‌ शालिपिण्ड, हस्तिपिण्ड, पिठरक, सुमुख, कौणपाशन, कुठर, कुंजर, प्रभाकर, कुमुद, कुमुदाक्ष, तित्तिरे, हलिक, महानाग कर्दम, बहुमूलक, कर्कर, अकर्कर, कुण्डोदर और महोदर--ये नाग उत्पन्न हुए

“Among the serpents (Nāgas) were Nīla and Anīla; likewise Kalmāṣa and Śabala; and also Āryaka and Ugraka—together with the Nāga named Kalaśapotaka.”

Verse 8

सुमनाख्यो दघधिमुखस्तथा विमलपिण्डक: । आप्त: कर्कोटकश्नैव शड्खो वालिशिखस्तथा,नागोंमें सबसे पहले शेषजी प्रकट हुए हैं। तदनन्तर वासुकि, ऐरावत, तक्षक, कर्कोटक, धनंजय, कालिय, मणिनाग, आपूरण, पिंजरक, एलापत्र, वामन, नील, अनील, कल्माष, शबल, आर्यक, उग्रक, कलशपोतक, सुमनाख्य, दधिमुख, विमलपिण्डक, आप्त, कर्कोटक (द्वितीय), शंख, वालिशिख, निष्टानक, हेमगुह, नहुष, पिंगल, बाह्कर्ण, हस्तिपद, मुद्गरपिण्डक, कम्बल, अश्वतर, कालीयक, वृत्त, संवर्तक, पद्म (प्रथम), पद्म (द्वितीय), शंखमुख, कूष्माण्डक, क्षेमक, पिण्डारक, करवीर, पुष्पदंष्ट, बिल्वक, बिल्वपाण्डुर, मूषकाद, शंखशिरा, पूर्णभद्र, हरिद्रक, अपराजित, ज्योतिक, श्रीवह, कौरव्य, धृतराष्ट्र, पराक्रमी शंखपिण्ड, विरजा, सुबाहु, वीर्यवान्‌ शालिपिण्ड, हस्तिपिण्ड, पिठरक, सुमुख, कौणपाशन, कुठर, कुंजर, प्रभाकर, कुमुद, कुमुदाक्ष, तित्तिरे, हलिक, महानाग कर्दम, बहुमूलक, कर्कर, अकर्कर, कुण्डोदर और महोदर--ये नाग उत्पन्न हुए

Śaunaka said: “Among the nāgas there were also those named Sumanā, Dadhimukha, Vimalapiṇḍaka, Āpta, Karkoṭaka, Śaṅkha, and Vāliśikha.”

Verse 9

निष्टानको हेमगुहो नहुषः पिड्जलस्तथा । बाहुकर्णो हस्तिपदस्तथा मुद्गरपिण्डक:,नागोंमें सबसे पहले शेषजी प्रकट हुए हैं। तदनन्तर वासुकि, ऐरावत, तक्षक, कर्कोटक, धनंजय, कालिय, मणिनाग, आपूरण, पिंजरक, एलापत्र, वामन, नील, अनील, कल्माष, शबल, आर्यक, उग्रक, कलशपोतक, सुमनाख्य, दधिमुख, विमलपिण्डक, आप्त, कर्कोटक (द्वितीय), शंख, वालिशिख, निष्टानक, हेमगुह, नहुष, पिंगल, बाह्कर्ण, हस्तिपद, मुद्गरपिण्डक, कम्बल, अश्वतर, कालीयक, वृत्त, संवर्तक, पद्म (प्रथम), पद्म (द्वितीय), शंखमुख, कूष्माण्डक, क्षेमक, पिण्डारक, करवीर, पुष्पदंष्ट, बिल्वक, बिल्वपाण्डुर, मूषकाद, शंखशिरा, पूर्णभद्र, हरिद्रक, अपराजित, ज्योतिक, श्रीवह, कौरव्य, धृतराष्ट्र, पराक्रमी शंखपिण्ड, विरजा, सुबाहु, वीर्यवान्‌ शालिपिण्ड, हस्तिपिण्ड, पिठरक, सुमुख, कौणपाशन, कुठर, कुंजर, प्रभाकर, कुमुद, कुमुदाक्ष, तित्तिरे, हलिक, महानाग कर्दम, बहुमूलक, कर्कर, अकर्कर, कुण्डोदर और महोदर--ये नाग उत्पन्न हुए

Śaunaka said: “(Among the nāgas were) Niṣṭānaka, Hemaguha, Nahuṣa, and likewise Piṅgala; also Bāhukarṇa, Hastipada, and Mudgarapiṇḍaka.”

Verse 10

कम्बलाश्वतरौ चापि नाग: कालीयकस्तथा । वृत्तसंवर्तकौ नागौ द्वौ च पद्माविति श्रुती,नागोंमें सबसे पहले शेषजी प्रकट हुए हैं। तदनन्तर वासुकि, ऐरावत, तक्षक, कर्कोटक, धनंजय, कालिय, मणिनाग, आपूरण, पिंजरक, एलापत्र, वामन, नील, अनील, कल्माष, शबल, आर्यक, उग्रक, कलशपोतक, सुमनाख्य, दधिमुख, विमलपिण्डक, आप्त, कर्कोटक (द्वितीय), शंख, वालिशिख, निष्टानक, हेमगुह, नहुष, पिंगल, बाह्कर्ण, हस्तिपद, मुद्गरपिण्डक, कम्बल, अश्वतर, कालीयक, वृत्त, संवर्तक, पद्म (प्रथम), पद्म (द्वितीय), शंखमुख, कूष्माण्डक, क्षेमक, पिण्डारक, करवीर, पुष्पदंष्ट, बिल्वक, बिल्वपाण्डुर, मूषकाद, शंखशिरा, पूर्णभद्र, हरिद्रक, अपराजित, ज्योतिक, श्रीवह, कौरव्य, धृतराष्ट्र, पराक्रमी शंखपिण्ड, विरजा, सुबाहु, वीर्यवान्‌ शालिपिण्ड, हस्तिपिण्ड, पिठरक, सुमुख, कौणपाशन, कुठर, कुंजर, प्रभाकर, कुमुद, कुमुदाक्ष, तित्तिरे, हलिक, महानाग कर्दम, बहुमूलक, कर्कर, अकर्कर, कुण्डोदर और महोदर--ये नाग उत्पन्न हुए

Śaunaka said: “Kambala and Aśvatara, and also the serpent Kālīyaka; Vṛtta and Saṃvartaka—two nāgas; and likewise two named Padma—so it is heard in tradition.”

Verse 11

नागोंमें सबसे पहले शेषजी प्रकट हुए हैं। तदनन्तर वासुकि, ऐरावत, तक्षक, कर्कोटक, धनंजय, कालिय, मणिनाग, आपूरण, पिंजरक, एलापत्र, वामन, नील, अनील, कल्माष, शबल, आर्यक, उग्रक, कलशपोतक, सुमनाख्य, दधिमुख, विमलपिण्डक, आप्त, कर्कोटक (द्वितीय), शंख, वालिशिख, निष्टानक, हेमगुह, नहुष, पिंगल, बाह्कर्ण, हस्तिपद, मुद्गरपिण्डक, कम्बल, अश्वतर, कालीयक, वृत्त, संवर्तक, पद्म (प्रथम), पद्म (द्वितीय), शंखमुख, कूष्माण्डक, क्षेमक, पिण्डारक, करवीर, पुष्पदंष्ट, बिल्वक, बिल्वपाण्डुर, मूषकाद, शंखशिरा, पूर्णभद्र, हरिद्रक, अपराजित, ज्योतिक, श्रीवह, कौरव्य, धृतराष्ट्र, पराक्रमी शंखपिण्ड, विरजा, सुबाहु, वीर्यवान्‌ शालिपिण्ड, हस्तिपिण्ड, पिठरक, सुमुख, कौणपाशन, कुठर, कुंजर, प्रभाकर, कुमुद, कुमुदाक्ष, तित्तिरे, हलिक, महानाग कर्दम, बहुमूलक, कर्कर, अकर्कर, कुण्डोदर और महोदर--ये नाग उत्पन्न हुए

Śaunaka said: Among the serpents, Śeṣa appeared first. After him were born Vāsuki, Airāvata, Takṣaka, Karkoṭaka, Dhanaṃjaya, Kāliya, Maṇināga, Āpūraṇa, Piñjaraka, Elāpatra, Vāmana, Nīla, Anīla, Kalmāṣa, Śabala, Āryaka, Ugraka, Kalaśapotaka, Sumanākhya, Dadhimukha, Vimalapiṇḍaka, Āpta, a second Karkoṭaka, Śaṅkha, Vāliśikha, Niṣṭānaka, Hemaguhā, Nahuṣa, Piṅgala, Bāhkarṇa, Hastipada, Mudgarapiṇḍaka, Kambala, Aśvatara, Kālīyaka, Vṛtta, Saṃvartaka, Padma (the first), Padma (the second), Śaṅkhamukha, Kūṣmāṇḍaka, Kṣemaka, Piṇḍāraka, Karavīra, Puṣpadaṃṣṭra, Bilvaka, Bilvapāṇḍura, Mūṣakāda, Śaṅkhaśirā, Pūrṇabhadra, Haridraka, Aparājita, Jyotika, Śrīvaha, Kauravya, Dhṛtarāṣṭra, the mighty Śaṅkhapiṇḍa, Virajā, Subāhu, the valiant Śālīpiṇḍa, Hastipiṇḍa, Piṭharaka, Sumukha, Kauṇapāśana, Kuṭhara, Kuñjara, Prabhākara, Kumuda, Kumudākṣa, Tittire, Halika, the great serpent Kardama, Bahumūlaka, Karkara, Akarkara, Kuṇḍodara, and Mahodara—these serpents were born.

Verse 12

करवीर: पुष्पदंष्टो बिल्वको बिल्वपाण्डुर: । मूषकाद: शड्खशिरा: पूर्णभद्रो हरिद्रक:,नागोंमें सबसे पहले शेषजी प्रकट हुए हैं। तदनन्तर वासुकि, ऐरावत, तक्षक, कर्कोटक, धनंजय, कालिय, मणिनाग, आपूरण, पिंजरक, एलापत्र, वामन, नील, अनील, कल्माष, शबल, आर्यक, उग्रक, कलशपोतक, सुमनाख्य, दधिमुख, विमलपिण्डक, आप्त, कर्कोटक (द्वितीय), शंख, वालिशिख, निष्टानक, हेमगुह, नहुष, पिंगल, बाह्कर्ण, हस्तिपद, मुद्गरपिण्डक, कम्बल, अश्वतर, कालीयक, वृत्त, संवर्तक, पद्म (प्रथम), पद्म (द्वितीय), शंखमुख, कूष्माण्डक, क्षेमक, पिण्डारक, करवीर, पुष्पदंष्ट, बिल्वक, बिल्वपाण्डुर, मूषकाद, शंखशिरा, पूर्णभद्र, हरिद्रक, अपराजित, ज्योतिक, श्रीवह, कौरव्य, धृतराष्ट्र, पराक्रमी शंखपिण्ड, विरजा, सुबाहु, वीर्यवान्‌ शालिपिण्ड, हस्तिपिण्ड, पिठरक, सुमुख, कौणपाशन, कुठर, कुंजर, प्रभाकर, कुमुद, कुमुदाक्ष, तित्तिरे, हलिक, महानाग कर्दम, बहुमूलक, कर्कर, अकर्कर, कुण्डोदर और महोदर--ये नाग उत्पन्न हुए

Śaunaka said: “(Among the serpents born were) Karavīra, Puṣpadaṃṣṭa, Bilvaka, Bilvapāṇḍura, Mūṣakāda, Śaṅkhaśiras, Pūrṇabhadra, and Haridraka.”

Verse 13

नाग: शड्खमुखश्नैव तथा कूष्माण्डको5पर: । क्षेमकश्न तथा नागो नाग: पिण्डारकस्तथा,अपराजितो ज्योतिकश्न पन्नग: श्रीवहस्तथा । कौरव्यो धृतराष्ट्रश्न शड्खपिण्डश्न वीर्यवान्‌ नागोंमें सबसे पहले शेषजी प्रकट हुए हैं। तदनन्तर वासुकि, ऐरावत, तक्षक, कर्कोटक, धनंजय, कालिय, मणिनाग, आपूरण, पिंजरक, एलापत्र, वामन, नील, अनील, कल्माष, शबल, आर्यक, उग्रक, कलशपोतक, सुमनाख्य, दधिमुख, विमलपिण्डक, आप्त, कर्कोटक (द्वितीय), शंख, वालिशिख, निष्टानक, हेमगुह, नहुष, पिंगल, बाह्कर्ण, हस्तिपद, मुद्गरपिण्डक, कम्बल, अश्वतर, कालीयक, वृत्त, संवर्तक, पद्म (प्रथम), पद्म (द्वितीय), शंखमुख, कूष्माण्डक, क्षेमक, पिण्डारक, करवीर, पुष्पदंष्ट, बिल्वक, बिल्वपाण्डुर, मूषकाद, शंखशिरा, पूर्णभद्र, हरिद्रक, अपराजित, ज्योतिक, श्रीवह, कौरव्य, धृतराष्ट्र, पराक्रमी शंखपिण्ड, विरजा, सुबाहु, वीर्यवान्‌ शालिपिण्ड, हस्तिपिण्ड, पिठरक, सुमुख, कौणपाशन, कुठर, कुंजर, प्रभाकर, कुमुद, कुमुदाक्ष, तित्तिरे, हलिक, महानाग कर्दम, बहुमूलक, कर्कर, अकर्कर, कुण्डोदर और महोदर--ये नाग उत्पन्न हुए

Śaunaka said: “Among the Nāgas there were also Śaṅkhamukha, and another named Kūṣmāṇḍaka; likewise Kṣemaka and Piṇḍāraka; also Aparājita and Jyotika; the serpent Śrīvaha; and Kauravya and Dhṛtarāṣṭra; and the mighty Śaṅkhapiṇḍa.”

Verse 14

विरजाश्व सुबाहुश्चन शालिपिण्डश्व वीर्यवान्‌ । हस्तिपिण्ड: पिठरक: सुमुख: कौणपाशन:,नागोंमें सबसे पहले शेषजी प्रकट हुए हैं। तदनन्तर वासुकि, ऐरावत, तक्षक, कर्कोटक, धनंजय, कालिय, मणिनाग, आपूरण, पिंजरक, एलापत्र, वामन, नील, अनील, कल्माष, शबल, आर्यक, उग्रक, कलशपोतक, सुमनाख्य, दधिमुख, विमलपिण्डक, आप्त, कर्कोटक (द्वितीय), शंख, वालिशिख, निष्टानक, हेमगुह, नहुष, पिंगल, बाह्कर्ण, हस्तिपद, मुद्गरपिण्डक, कम्बल, अश्वतर, कालीयक, वृत्त, संवर्तक, पद्म (प्रथम), पद्म (द्वितीय), शंखमुख, कूष्माण्डक, क्षेमक, पिण्डारक, करवीर, पुष्पदंष्ट, बिल्वक, बिल्वपाण्डुर, मूषकाद, शंखशिरा, पूर्णभद्र, हरिद्रक, अपराजित, ज्योतिक, श्रीवह, कौरव्य, धृतराष्ट्र, पराक्रमी शंखपिण्ड, विरजा, सुबाहु, वीर्यवान्‌ शालिपिण्ड, हस्तिपिण्ड, पिठरक, सुमुख, कौणपाशन, कुठर, कुंजर, प्रभाकर, कुमुद, कुमुदाक्ष, तित्तिरे, हलिक, महानाग कर्दम, बहुमूलक, कर्कर, अकर्कर, कुण्डोदर और महोदर--ये नाग उत्पन्न हुए

Śaunaka said: “Virajāśva and Subāhu, and the valiant Śālipiṇḍa; Hastipiṇḍa, Piṭharaka, Sumukha, and Kauṇapāśana—these too were among the nāgas that came into being.”

Verse 15

कुठर: कुज्जरश्नैव तथा नाग: प्रभाकर: । कुमुद: कुमुदाक्षश्न तित्तिरिहलिकस्तथा,नागोंमें सबसे पहले शेषजी प्रकट हुए हैं। तदनन्तर वासुकि, ऐरावत, तक्षक, कर्कोटक, धनंजय, कालिय, मणिनाग, आपूरण, पिंजरक, एलापत्र, वामन, नील, अनील, कल्माष, शबल, आर्यक, उग्रक, कलशपोतक, सुमनाख्य, दधिमुख, विमलपिण्डक, आप्त, कर्कोटक (द्वितीय), शंख, वालिशिख, निष्टानक, हेमगुह, नहुष, पिंगल, बाह्कर्ण, हस्तिपद, मुद्गरपिण्डक, कम्बल, अश्वतर, कालीयक, वृत्त, संवर्तक, पद्म (प्रथम), पद्म (द्वितीय), शंखमुख, कूष्माण्डक, क्षेमक, पिण्डारक, करवीर, पुष्पदंष्ट, बिल्वक, बिल्वपाण्डुर, मूषकाद, शंखशिरा, पूर्णभद्र, हरिद्रक, अपराजित, ज्योतिक, श्रीवह, कौरव्य, धृतराष्ट्र, पराक्रमी शंखपिण्ड, विरजा, सुबाहु, वीर्यवान्‌ शालिपिण्ड, हस्तिपिण्ड, पिठरक, सुमुख, कौणपाशन, कुठर, कुंजर, प्रभाकर, कुमुद, कुमुदाक्ष, तित्तिरे, हलिक, महानाग कर्दम, बहुमूलक, कर्कर, अकर्कर, कुण्डोदर और महोदर--ये नाग उत्पन्न हुए

Śaunaka continues listing the Nāgas born in the ancient lineage: “Kuṭhara, Kuñjara, the Nāga named Prabhākara, Kumuda, Kumudākṣa, and also Tittiri and Halika.”

Verse 16

कर्दमश्व महानागो नागश्न बहुमूलक: । कर्कराकर्करौ नागौ कुण्डोदरमहोदरौ,नागोंमें सबसे पहले शेषजी प्रकट हुए हैं। तदनन्तर वासुकि, ऐरावत, तक्षक, कर्कोटक, धनंजय, कालिय, मणिनाग, आपूरण, पिंजरक, एलापत्र, वामन, नील, अनील, कल्माष, शबल, आर्यक, उग्रक, कलशपोतक, सुमनाख्य, दधिमुख, विमलपिण्डक, आप्त, कर्कोटक (द्वितीय), शंख, वालिशिख, निष्टानक, हेमगुह, नहुष, पिंगल, बाह्कर्ण, हस्तिपद, मुद्गरपिण्डक, कम्बल, अश्वतर, कालीयक, वृत्त, संवर्तक, पद्म (प्रथम), पद्म (द्वितीय), शंखमुख, कूष्माण्डक, क्षेमक, पिण्डारक, करवीर, पुष्पदंष्ट, बिल्वक, बिल्वपाण्डुर, मूषकाद, शंखशिरा, पूर्णभद्र, हरिद्रक, अपराजित, ज्योतिक, श्रीवह, कौरव्य, धृतराष्ट्र, पराक्रमी शंखपिण्ड, विरजा, सुबाहु, वीर्यवान्‌ शालिपिण्ड, हस्तिपिण्ड, पिठरक, सुमुख, कौणपाशन, कुठर, कुंजर, प्रभाकर, कुमुद, कुमुदाक्ष, तित्तिरे, हलिक, महानाग कर्दम, बहुमूलक, कर्कर, अकर्कर, कुण्डोदर और महोदर--ये नाग उत्पन्न हुए

Śaunaka said: “(Among the serpents) the great nāga Kardamaśva was born, along with Nāgaśna and Bahumūlaka; and also the two serpents Karkara and Akarkara, as well as Kuṇḍodara and Mahodara.”

Verse 17

एते प्राधान्यतो नागा: कीर्तिता द्विजसत्तम । बहुत्वान्नामधेयानामितरे नानुकीर्तिता:,द्विजश्रेष्ठ! ये मुख्य-मुख्य नाग यहाँ बताये गये हैं। सर्पोंकी संख्या अधिक होनेसे उनके नाम भी बहुत हैं। अत: अन्य अप्रधान नागोंके नाम यहाँ नहीं कहे गये हैं

Śaunaka said: “O best of twice-born sages, these Nāgas have been mentioned chiefly because of their prominence. Since the serpent clans are exceedingly numerous and their names are many, the remaining, less principal Nāgas have not been recounted here.”

Verse 18

एतेषां प्रसवो यश्न प्रसवस्य च संतति: । असंख्येयेति मत्वा तान्‌ न ब्रवीमि तपोधन,तपोधन! इन नागोंकी संतान तथा उन संतानोंकी भी संतति असंख्य हैं। ऐसा समझकर उनके नाम मैं नहीं कहता हूँ

Śaunaka said: “Their progeny—and the further descendants born from that progeny—are beyond counting. Knowing them to be innumerable, O treasure of austerity, I do not recite their names.”

Verse 19

बहूनीह सहस्राणि प्रयुतान्यर्बुदानि च । अशक्यान्येव संख्यातुं पन्नगानां तपोधन,तपस्वी शौनकजी! नागोंकी संख्या यहाँ कई हजारोंसे लेकर लाखों-अरबोंतक पहुँच जाती है। अत: उनकी गणना नहीं की जा सकती है

Śaunaka said: “Here there are many thousands—tens of thousands and even crores—of serpents. Their number, O treasure of austerity, is truly impossible to count.”

Verse 34

इस प्रकार श्रीमह्या भारत आदिपव॑के अन्तर्गत आस्तीकपवर्में गरुडचरित्रविषयक चौतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

Thus, in the revered Mahābhārata, within the Ādi Parva—specifically in the Āstīka Parva—the thirty-fourth chapter, dealing with the narrative of Garuḍa, is concluded. This closing colophon signals a transition in the larger moral frame of the epic, where accounts of divine beings and vows underscore the power of resolve, the consequences of enmity, and the safeguarding of dharma through remembered tradition.

Verse 35

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि सर्पनामकथने पज्चत्रिंशो5ध्याय: ।। ३५ || इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपव॑के अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें सर्पनामकथनविषयक पैतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

Thus, in the Śrī Mahābhārata, within the Ādi Parva, in the Āstīka Parva, the thirty-fifth chapter—concerning the narration of the names of the serpents—comes to an end. (Gītā Press colophon: ‘In this manner, the thirty-fifth chapter in the Āstīka Parva, under the Ādi Parva, dealing with the account of serpent-names, is completed.’)

Frequently Asked Questions

The dilemma is how a leader (Vāsuki) should respond to inherited curse-based peril: whether to act from fear and uncertainty or to follow a sanctioned dharmic remedy that requires patience, timing, and protection of kin.

Authoritative counsel reframes fear into actionable duty: one should execute the right course at the right time (kāla) and trust that adharmic conduct is self-defeating, while dharma-oriented agents are not the intended targets of destructive outcomes.

No explicit phalaśruti is stated; the meta-level function is causal clarification—Brahmā’s confirmation legitimizes the narrative mechanism by which dharmic planning (the Jaratkāru marriage) becomes an instrument for communal protection within the larger snake-sacrifice frame.