
आदि पर्व — द्रौपदी-स्वयंवरानन्तरवृत्तम् (Aftermath of Draupadī’s Svayaṃvara)
Upa-parva: Svayaṃvara Parva (Draupadī-Svayaṃvara Episode)
Vaiśaṃpāyana narrates how Dhṛṣṭadyumna, pleased, reports to Drupada the manner in which Draupadī was won: a youthful archer with red eyes, clad in black antelope skin, strings the superior bow and strikes the target, moving with composure amid honored brahmins. As rival kings surge in anger, a second formidable figure disrupts their advance, and the two eminent men depart with Draupadī to the exterior of the city, to Bhārgava’s workshop area. There, they sit with a woman inferred to be their mother, and Draupadī is instructed to offer respectful greetings. The men go to seek alms; Draupadī receives the collected food, performs customary offerings, serves the elder woman and the men, and eats afterward. The group rests on the ground with darbha and hides; Draupadī is described as positioned at their feet. Observers infer from the men’s speech and war-focused discourse that they are kṣatriyas operating in concealment, and hope arises that the Pāṇḍavas have survived the fire. Drupada, delighted, sends his purohita to identify them; the priest conveys Drupada’s long-held wish—rooted in friendship with Pāṇḍu—that Draupadī be joined to a Pāṇḍava, specifically Arjuna as the rightful winner. Yudhiṣṭhira replies in measured terms about the svayaṃvara conditions: the bride was offered for the feat, not by varṇa, craft, lineage, or gotra; the extraordinary bow could not be strung nor the target struck by an untrained or weak person. The chapter closes as another messenger arrives to announce prepared food, marking the transition from inquiry to formal hospitality and negotiation.
Chapter Arc: स्वयंवर-मण्डप में द्रौपदी के समीप धृष्टद्युम्न खड़ा होकर बहिन से कहता है—“देखो, ये-ये राजा और महारथी तुम्हारे हेतु आये हैं,” और नामों की धारा आरम्भ होती है। → कौरवों (दुर्योधन आदि), गान्धार-सम्बन्धी राजकुमारों, तथा दूर-दूर के जनपदाधीशों की गणना बढ़ती जाती है; प्रत्येक नाम के साथ सभा का भार, प्रतिस्पर्धा का ताप और ‘लक्ष्य-वेध’ की कठिन परीक्षा का भय गाढ़ा होता है। → धृष्टद्युम्न स्पष्ट करता है कि ये सभी विख्यात क्षत्रिय ‘त्वदर्थम्’—द्रौपदी के लिए—आये हैं और जो उत्तम लक्ष्य को भेदेगा वही वर चुना जायेगा; इस घोषणा से स्वयंवर का दाँव निर्णायक रूप ले लेता है। → अध्याय का अंत राजाओं की उपस्थिति और उनकी आकांक्षा को स्थापित कर देता है—मण्डप पूर्ण है, कीर्ति-प्रतिष्ठा दाँव पर है, और चयन का नियम सबके सामने है। → लक्ष्य-वेध के क्षण में कौन सफल होगा—यह प्रश्न अगले अध्यायों के लिए तीव्र उत्कंठा बनकर रह जाता है।
Verse 1
अत-४-#कात पज्चाशीर्त्याधिकशततमो< ध्याय: धृष्टद्युम्नका द्रौपदीको स्वयंवरमें आये हुए राजाओंका परिचय देना धृष्टह्युम्न उवाच दुर्योधनो दुर्विषहो दुर्मुखो दुष्प्रधर्षण: । विविंशतिर्विकर्णश्र सहो दुःशासनस्तथा,धृष्ट्युम्नने कहा--बहिन! यह देखो--दुर्योधन, दुर्विषह, दुर्मुख, दुष्प्रधर्षण, विविंशति, विकर्ण, सह, दुःशासन, युयुत्सु, वायुवेग, भीमवेगरव, उग्रायुध, बलाकी, करकायु, विरोचन, कुण्डक, चित्रसेन, सुवर्चा, कनकध्वज, ननन््दक, बाहुशाली, तुहुण्ड तथा विकट--ये और दूसरे भी बहुत-से महाबली धूृतराष्ट्रपुत्र जो सब-के-सब वीर हैं, तुम्हें प्राप्त करनेके लिये कर्णके साथ यहाँ पधारे हैं इस प्रकार श्रीमहाभारत, आदिपव॑के अन्तर्गत स्वयंवरपर्वमें रजाओके नामका परिचयविषयक एक सौ पचासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ १८५ ॥ ऑपन-माज बछ। अऑसि--छऋाय षडशीर्त्याधेकशततमो< ध्याय: राजाओंका लक्ष्यवेधके लिये उद्योग और असफल होना वैशम्पायन उवाच तेडलंकृता: कुण्डलिनो युवान: परस्परं स्पर्धमाना नरेन्द्रा: । अस्त्रं बल॑ चात्मनि मन्यमाना: सर्वे समुत्पेतुरुदायुधास्ते
Dhṛṣṭadyumna said: “Sister, look—here are Duryodhana, Durviṣaha, Durmukha, Duṣpradharṣaṇa, Viviṁśati, Vikarṇa, Saha, and Duḥśāsana.”
Verse 2
युयुत्सुर्वायुवेगश्चन भीमवेगरवस्तथा । उग्रायुधो बलाकी च करकायुर्विरोचन:,धृष्ट्युम्नने कहा--बहिन! यह देखो--दुर्योधन, दुर्विषह, दुर्मुख, दुष्प्रधर्षण, विविंशति, विकर्ण, सह, दुःशासन, युयुत्सु, वायुवेग, भीमवेगरव, उग्रायुध, बलाकी, करकायु, विरोचन, कुण्डक, चित्रसेन, सुवर्चा, कनकध्वज, ननन््दक, बाहुशाली, तुहुण्ड तथा विकट--ये और दूसरे भी बहुत-से महाबली धूृतराष्ट्रपुत्र जो सब-के-सब वीर हैं, तुम्हें प्राप्त करनेके लिये कर्णके साथ यहाँ पधारे हैं
Dhṛṣṭadyumna said: “Here are Yuyutsu, Vāyuvega, Bhīmavegarava, Ugrāyudha, Balākī, Karakāyu, and Virocana—mighty warriors who have come here with Karṇa, intent on reaching you.”
Verse 3
कुण्डकक्षित्रसेनश्व॒ सुवर्चा: कनकध्वज: । नन्दको बाहुशाली च तुहुण्डो विकटस्तथा,धृष्ट्युम्नने कहा--बहिन! यह देखो--दुर्योधन, दुर्विषह, दुर्मुख, दुष्प्रधर्षण, विविंशति, विकर्ण, सह, दुःशासन, युयुत्सु, वायुवेग, भीमवेगरव, उग्रायुध, बलाकी, करकायु, विरोचन, कुण्डक, चित्रसेन, सुवर्चा, कनकध्वज, ननन््दक, बाहुशाली, तुहुण्ड तथा विकट--ये और दूसरे भी बहुत-से महाबली धूृतराष्ट्रपुत्र जो सब-के-सब वीर हैं, तुम्हें प्राप्त करनेके लिये कर्णके साथ यहाँ पधारे हैं
Dhṛṣṭadyumna said: “Here are Kuṇḍaka, Citrasena, Suvarcā, Kanakadhvaja, Nandaka, the mighty-armed Bāhuśālī, Tuhuṇḍa, and likewise Vikaṭa.”
Verse 4
एते चान्ये च बहवो धार्तराष्ट्रा महाबला: । कर्णेन सहिता वीरास्त्वदर्थ समुपागता:,धृष्ट्युम्नने कहा--बहिन! यह देखो--दुर्योधन, दुर्विषह, दुर्मुख, दुष्प्रधर्षण, विविंशति, विकर्ण, सह, दुःशासन, युयुत्सु, वायुवेग, भीमवेगरव, उग्रायुध, बलाकी, करकायु, विरोचन, कुण्डक, चित्रसेन, सुवर्चा, कनकध्वज, ननन््दक, बाहुशाली, तुहुण्ड तथा विकट--ये और दूसरे भी बहुत-से महाबली धूृतराष्ट्रपुत्र जो सब-के-सब वीर हैं, तुम्हें प्राप्त करनेके लिये कर्णके साथ यहाँ पधारे हैं
Dhṛṣṭadyumna said: “Here are many other mighty sons of Dhṛtarāṣṭra as well—heroes who have arrived here together with Karṇa, coming for your sake.”
Verse 5
असंख्याता महात्मान: पार्थिवा: क्षत्रियर्षभा: । शकुनि: सौबलश्वैव वृषको5थ बृहद्धल:,इनके सिवा और भी असंख्य महामना क्षत्रियशिरोमणि भूमिपाल यहाँ आये हैं। उधर देखो, गान्धारराज सुबलके पुत्र शकुनि, वृषक और बृहद्वल बैठे हैं। गान्धारराजके ये सभी पुत्र यहाँ पधारे हैं। अश्वत्थामा और भोज--ये दोनों महान् तेजस्वी और सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ हैं और तुम्हारे लिये गहने-कपड़ोंसे सज-धजकर यहाँ आये हैं। राजा बृहन्त, मणिमान्, दण्डधार, सहदेव, जयत्सेन, राजा मेघसंधि, अपने दोनों पुत्रों शंख और उत्तरके साथ राजा विराट, वृद्धक्षेमके पुत्र सुशर्मा, राजा सेनाबिन्दु, सुकेतु और उनके पुत्र सुवर्चा, सुचित्र, सुकुमार, वृक, सत्यधृति, सूर्यध्वज, रोचमान, नील, चित्रायुध, अंशुमान्, चेकितान, महाबली श्रेणिमान्ू, समुद्रसेनके प्रतापी पुत्र चन्द्रसेन, जलसंध, विदण्ड और उनके पुत्र दण्ड, पौण्ड्रक वासुदेव, पराक्रमी भगदत्त, कलिंगनरेश ताम्रलिप्तनरेश, पाटनके राजा, अपने दो पुत्रों वीर रुक््मांगद तथा रुक्मरथके साथ महारथी मद्रराज शल्य, कुरुवंशी सोमदत्त तथा उनके तीन महारथी शूरवीर पुत्र भूरि, भूरिश्रवा और शल, काम्बोजदेशीय सुदक्षिण, पूरुवंशी दृढ़धन्वा
Dhṛṣṭadyumna said: “Countless high-souled kings—bulls among the Kṣatriyas—have assembled here. And there, seated as well, are Śakuni, son of Subala of Gāndhāra, along with Vṛṣaka and Bṛhaddhala.”
Verse 6
एते गान्धारराजस्य सुता: सर्वे समागता: । अश्वत्थामा च भोजश्च सर्वशस्त्रभूृतां वरो,इनके सिवा और भी असंख्य महामना क्षत्रियशिरोमणि भूमिपाल यहाँ आये हैं। उधर देखो, गान्धारराज सुबलके पुत्र शकुनि, वृषक और बृहद्वल बैठे हैं। गान्धारराजके ये सभी पुत्र यहाँ पधारे हैं। अश्वत्थामा और भोज--ये दोनों महान् तेजस्वी और सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ हैं और तुम्हारे लिये गहने-कपड़ोंसे सज-धजकर यहाँ आये हैं। राजा बृहन्त, मणिमान्, दण्डधार, सहदेव, जयत्सेन, राजा मेघसंधि, अपने दोनों पुत्रों शंख और उत्तरके साथ राजा विराट, वृद्धक्षेमके पुत्र सुशर्मा, राजा सेनाबिन्दु, सुकेतु और उनके पुत्र सुवर्चा, सुचित्र, सुकुमार, वृक, सत्यधृति, सूर्यध्वज, रोचमान, नील, चित्रायुध, अंशुमान्, चेकितान, महाबली श्रेणिमान्ू, समुद्रसेनके प्रतापी पुत्र चन्द्रसेन, जलसंध, विदण्ड और उनके पुत्र दण्ड, पौण्ड्रक वासुदेव, पराक्रमी भगदत्त, कलिंगनरेश ताम्रलिप्तनरेश, पाटनके राजा, अपने दो पुत्रों वीर रुक््मांगद तथा रुक्मरथके साथ महारथी मद्रराज शल्य, कुरुवंशी सोमदत्त तथा उनके तीन महारथी शूरवीर पुत्र भूरि, भूरिश्रवा और शल, काम्बोजदेशीय सुदक्षिण, पूरुवंशी दृढ़धन्वा
Dhṛṣṭadyumna said: “Here have assembled all the sons of the king of Gāndhāra. And Aśvatthāmā and Bhoja as well—foremost among all who bear arms—have come here.”
Verse 7
समवेतौ महात्मानौ त्वदर्थे समलंकृतौ । बृहन्तो मणिमांश्वैव दण्डधारकश्न पार्थिव:,इनके सिवा और भी असंख्य महामना क्षत्रियशिरोमणि भूमिपाल यहाँ आये हैं। उधर देखो, गान्धारराज सुबलके पुत्र शकुनि, वृषक और बृहद्वल बैठे हैं। गान्धारराजके ये सभी पुत्र यहाँ पधारे हैं। अश्वत्थामा और भोज--ये दोनों महान् तेजस्वी और सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ हैं और तुम्हारे लिये गहने-कपड़ोंसे सज-धजकर यहाँ आये हैं। राजा बृहन्त, मणिमान्, दण्डधार, सहदेव, जयत्सेन, राजा मेघसंधि, अपने दोनों पुत्रों शंख और उत्तरके साथ राजा विराट, वृद्धक्षेमके पुत्र सुशर्मा, राजा सेनाबिन्दु, सुकेतु और उनके पुत्र सुवर्चा, सुचित्र, सुकुमार, वृक, सत्यधृति, सूर्यध्वज, रोचमान, नील, चित्रायुध, अंशुमान्, चेकितान, महाबली श्रेणिमान्ू, समुद्रसेनके प्रतापी पुत्र चन्द्रसेन, जलसंध, विदण्ड और उनके पुत्र दण्ड, पौण्ड्रक वासुदेव, पराक्रमी भगदत्त, कलिंगनरेश ताम्रलिप्तनरेश, पाटनके राजा, अपने दो पुत्रों वीर रुक््मांगद तथा रुक्मरथके साथ महारथी मद्रराज शल्य, कुरुवंशी सोमदत्त तथा उनके तीन महारथी शूरवीर पुत्र भूरि, भूरिश्रवा और शल, काम्बोजदेशीय सुदक्षिण, पूरुवंशी दृढ़धन्वा
“For your sake, these two great-souled kings have assembled here, fully adorned and prepared. King Bṛhanta and King Maṇimān are present, and so too is the ruler Daṇḍadhāraka.”
Verse 8
सहदेवजयत्सेनौ मेघसंधिक्न पार्थिव: । विराट: सह पुत्राभ्यां शड़्खेनैवोत्तरेण च,इनके सिवा और भी असंख्य महामना क्षत्रियशिरोमणि भूमिपाल यहाँ आये हैं। उधर देखो, गान्धारराज सुबलके पुत्र शकुनि, वृषक और बृहद्वल बैठे हैं। गान्धारराजके ये सभी पुत्र यहाँ पधारे हैं। अश्वत्थामा और भोज--ये दोनों महान् तेजस्वी और सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ हैं और तुम्हारे लिये गहने-कपड़ोंसे सज-धजकर यहाँ आये हैं। राजा बृहन्त, मणिमान्, दण्डधार, सहदेव, जयत्सेन, राजा मेघसंधि, अपने दोनों पुत्रों शंख और उत्तरके साथ राजा विराट, वृद्धक्षेमके पुत्र सुशर्मा, राजा सेनाबिन्दु, सुकेतु और उनके पुत्र सुवर्चा, सुचित्र, सुकुमार, वृक, सत्यधृति, सूर्यध्वज, रोचमान, नील, चित्रायुध, अंशुमान्, चेकितान, महाबली श्रेणिमान्ू, समुद्रसेनके प्रतापी पुत्र चन्द्रसेन, जलसंध, विदण्ड और उनके पुत्र दण्ड, पौण्ड्रक वासुदेव, पराक्रमी भगदत्त, कलिंगनरेश ताम्रलिप्तनरेश, पाटनके राजा, अपने दो पुत्रों वीर रुक््मांगद तथा रुक्मरथके साथ महारथी मद्रराज शल्य, कुरुवंशी सोमदत्त तथा उनके तीन महारथी शूरवीर पुत्र भूरि, भूरिश्रवा और शल, काम्बोजदेशीय सुदक्षिण, पूरुवंशी दृढ़धन्वा
Dhṛṣṭadyumna said: “Here are King Meghasandhi, and also the kings Sahadeva and Jayatsena. King Virāṭa too has arrived, accompanied by his two sons, Śaṅkha and Uttara.”
Verse 9
वार्द्धक्षेमि: सुशर्मा च सेनाबिन्दुश्न पार्थिव: । सुकेतु: सह पुत्रेण सुनाम्ना च सुवर्चसा,इनके सिवा और भी असंख्य महामना क्षत्रियशिरोमणि भूमिपाल यहाँ आये हैं। उधर देखो, गान्धारराज सुबलके पुत्र शकुनि, वृषक और बृहद्वल बैठे हैं। गान्धारराजके ये सभी पुत्र यहाँ पधारे हैं। अश्वत्थामा और भोज--ये दोनों महान् तेजस्वी और सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ हैं और तुम्हारे लिये गहने-कपड़ोंसे सज-धजकर यहाँ आये हैं। राजा बृहन्त, मणिमान्, दण्डधार, सहदेव, जयत्सेन, राजा मेघसंधि, अपने दोनों पुत्रों शंख और उत्तरके साथ राजा विराट, वृद्धक्षेमके पुत्र सुशर्मा, राजा सेनाबिन्दु, सुकेतु और उनके पुत्र सुवर्चा, सुचित्र, सुकुमार, वृक, सत्यधृति, सूर्यध्वज, रोचमान, नील, चित्रायुध, अंशुमान्, चेकितान, महाबली श्रेणिमान्ू, समुद्रसेनके प्रतापी पुत्र चन्द्रसेन, जलसंध, विदण्ड और उनके पुत्र दण्ड, पौण्ड्रक वासुदेव, पराक्रमी भगदत्त, कलिंगनरेश ताम्रलिप्तनरेश, पाटनके राजा, अपने दो पुत्रों वीर रुक््मांगद तथा रुक्मरथके साथ महारथी मद्रराज शल्य, कुरुवंशी सोमदत्त तथा उनके तीन महारथी शूरवीर पुत्र भूरि, भूरिश्रवा और शल, काम्बोजदेशीय सुदक्षिण, पूरुवंशी दृढ़धन्वा
Dhṛṣṭadyumna said: “Here are Vārddhakṣemi, Suśarmā, and the king Senābindu; and Suketu as well, accompanied by his son Suvarcas. Besides these, countless high-minded Kṣatriya-lords, the foremost among rulers, have assembled. Look there also: Śakuni—son of Subala, king of Gāndhāra—together with Vṛṣaka and Bṛhadbala, are seated; all those sons of the Gāndhāra king have come. And Aśvatthāmā and Bhoja—both exceedingly radiant and foremost among fully armed warriors—have arrived for your sake, adorned in ornaments and fine garments.”
Verse 10
सुचित्र: सुकुमारश्च वृकः सत्यधृतिस्तथा । सूर्यध्वजो रोचमानो नीलक्षित्रायुधस्तथा,इनके सिवा और भी असंख्य महामना क्षत्रियशिरोमणि भूमिपाल यहाँ आये हैं। उधर देखो, गान्धारराज सुबलके पुत्र शकुनि, वृषक और बृहद्वल बैठे हैं। गान्धारराजके ये सभी पुत्र यहाँ पधारे हैं। अश्वत्थामा और भोज--ये दोनों महान् तेजस्वी और सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ हैं और तुम्हारे लिये गहने-कपड़ोंसे सज-धजकर यहाँ आये हैं। राजा बृहन्त, मणिमान्, दण्डधार, सहदेव, जयत्सेन, राजा मेघसंधि, अपने दोनों पुत्रों शंख और उत्तरके साथ राजा विराट, वृद्धक्षेमके पुत्र सुशर्मा, राजा सेनाबिन्दु, सुकेतु और उनके पुत्र सुवर्चा, सुचित्र, सुकुमार, वृक, सत्यधृति, सूर्यध्वज, रोचमान, नील, चित्रायुध, अंशुमान्, चेकितान, महाबली श्रेणिमान्ू, समुद्रसेनके प्रतापी पुत्र चन्द्रसेन, जलसंध, विदण्ड और उनके पुत्र दण्ड, पौण्ड्रक वासुदेव, पराक्रमी भगदत्त, कलिंगनरेश ताम्रलिप्तनरेश, पाटनके राजा, अपने दो पुत्रों वीर रुक््मांगद तथा रुक्मरथके साथ महारथी मद्रराज शल्य, कुरुवंशी सोमदत्त तथा उनके तीन महारथी शूरवीर पुत्र भूरि, भूरिश्रवा और शल, काम्बोजदेशीय सुदक्षिण, पूरुवंशी दृढ़धन्वा
Dhṛṣṭadyumna said: “Here too are Sucitra and Sukumāra; Vṛka and Satyadhṛti; Sūryadhvaja and the radiant Rocamāna; and Nīla as well as Citrāyudha. Besides these, countless high-minded kṣatriya-lords—foremost among rulers—have assembled here.”
Verse 11
अंशुमांश्वेकितानश्न श्रेणिमांश्न महाबल: । समुद्रसेनपुत्रश्न चन्द्रसेन: प्रतापवान्,इनके सिवा और भी असंख्य महामना क्षत्रियशिरोमणि भूमिपाल यहाँ आये हैं। उधर देखो, गान्धारराज सुबलके पुत्र शकुनि, वृषक और बृहद्वल बैठे हैं। गान्धारराजके ये सभी पुत्र यहाँ पधारे हैं। अश्वत्थामा और भोज--ये दोनों महान् तेजस्वी और सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ हैं और तुम्हारे लिये गहने-कपड़ोंसे सज-धजकर यहाँ आये हैं। राजा बृहन्त, मणिमान्, दण्डधार, सहदेव, जयत्सेन, राजा मेघसंधि, अपने दोनों पुत्रों शंख और उत्तरके साथ राजा विराट, वृद्धक्षेमके पुत्र सुशर्मा, राजा सेनाबिन्दु, सुकेतु और उनके पुत्र सुवर्चा, सुचित्र, सुकुमार, वृक, सत्यधृति, सूर्यध्वज, रोचमान, नील, चित्रायुध, अंशुमान्, चेकितान, महाबली श्रेणिमान्ू, समुद्रसेनके प्रतापी पुत्र चन्द्रसेन, जलसंध, विदण्ड और उनके पुत्र दण्ड, पौण्ड्रक वासुदेव, पराक्रमी भगदत्त, कलिंगनरेश ताम्रलिप्तनरेश, पाटनके राजा, अपने दो पुत्रों वीर रुक््मांगद तथा रुक्मरथके साथ महारथी मद्रराज शल्य, कुरुवंशी सोमदत्त तथा उनके तीन महारथी शूरवीर पुत्र भूरि, भूरिश्रवा और शल, काम्बोजदेशीय सुदक्षिण, पूरुवंशी दृढ़धन्वा
Dhṛṣṭadyumna said: “Here too have arrived many eminent Kṣatriya lords—Aṁśumān, Ekitāna, the mighty Śreṇimān, and Candrasena, the valiant son of Samudrasena. Besides these, countless other high-minded rulers, foremost among warriors, have assembled.”
Verse 12
जलसंध: पितापुत्रौ विदण्डो दण्ड एव च । पौण्ड्को वासुदेवश्च भगदत्तश्न वीर्यवान्,इनके सिवा और भी असंख्य महामना क्षत्रियशिरोमणि भूमिपाल यहाँ आये हैं। उधर देखो, गान्धारराज सुबलके पुत्र शकुनि, वृषक और बृहद्वल बैठे हैं। गान्धारराजके ये सभी पुत्र यहाँ पधारे हैं। अश्वत्थामा और भोज--ये दोनों महान् तेजस्वी और सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ हैं और तुम्हारे लिये गहने-कपड़ोंसे सज-धजकर यहाँ आये हैं। राजा बृहन्त, मणिमान्, दण्डधार, सहदेव, जयत्सेन, राजा मेघसंधि, अपने दोनों पुत्रों शंख और उत्तरके साथ राजा विराट, वृद्धक्षेमके पुत्र सुशर्मा, राजा सेनाबिन्दु, सुकेतु और उनके पुत्र सुवर्चा, सुचित्र, सुकुमार, वृक, सत्यधृति, सूर्यध्वज, रोचमान, नील, चित्रायुध, अंशुमान्, चेकितान, महाबली श्रेणिमान्ू, समुद्रसेनके प्रतापी पुत्र चन्द्रसेन, जलसंध, विदण्ड और उनके पुत्र दण्ड, पौण्ड्रक वासुदेव, पराक्रमी भगदत्त, कलिंगनरेश ताम्रलिप्तनरेश, पाटनके राजा, अपने दो पुत्रों वीर रुक््मांगद तथा रुक्मरथके साथ महारथी मद्रराज शल्य, कुरुवंशी सोमदत्त तथा उनके तीन महारथी शूरवीर पुत्र भूरि, भूरिश्रवा और शल, काम्बोजदेशीय सुदक्षिण, पूरुवंशी दृढ़धन्वा
Dhṛṣṭadyumna said: “Here are Jalasaṃdha; the father and son Vidaṇḍa and Daṇḍa; Pauṇḍraka Vāsudeva; and the mighty Bhagadatta. Besides these, countless great-souled kṣatriya-lords, the foremost among rulers, have assembled here.”
Verse 13
कालिड्लस्ताम्रलिप्तश्ष पत्तनाधिपतिस्तथा । मद्रराजस्तथा शल्य: सहपुत्रो महारथ:,इनके सिवा और भी असंख्य महामना क्षत्रियशिरोमणि भूमिपाल यहाँ आये हैं। उधर देखो, गान्धारराज सुबलके पुत्र शकुनि, वृषक और बृहद्वल बैठे हैं। गान्धारराजके ये सभी पुत्र यहाँ पधारे हैं। अश्वत्थामा और भोज--ये दोनों महान् तेजस्वी और सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ हैं और तुम्हारे लिये गहने-कपड़ोंसे सज-धजकर यहाँ आये हैं। राजा बृहन्त, मणिमान्, दण्डधार, सहदेव, जयत्सेन, राजा मेघसंधि, अपने दोनों पुत्रों शंख और उत्तरके साथ राजा विराट, वृद्धक्षेमके पुत्र सुशर्मा, राजा सेनाबिन्दु, सुकेतु और उनके पुत्र सुवर्चा, सुचित्र, सुकुमार, वृक, सत्यधृति, सूर्यध्वज, रोचमान, नील, चित्रायुध, अंशुमान्, चेकितान, महाबली श्रेणिमान्ू, समुद्रसेनके प्रतापी पुत्र चन्द्रसेन, जलसंध, विदण्ड और उनके पुत्र दण्ड, पौण्ड्रक वासुदेव, पराक्रमी भगदत्त, कलिंगनरेश ताम्रलिप्तनरेश, पाटनके राजा, अपने दो पुत्रों वीर रुक््मांगद तथा रुक्मरथके साथ महारथी मद्रराज शल्य, कुरुवंशी सोमदत्त तथा उनके तीन महारथी शूरवीर पुत्र भूरि, भूरिश्रवा और शल, काम्बोजदेशीय सुदक्षिण, पूरुवंशी दृढ़धन्वा
Dhṛṣṭadyumna said: “Here are assembled many eminent kṣatriya lords—among them the ruler of Tāmralipta, the lord of Pattana, and the Madra king Śalya, a great chariot-warrior, accompanied by his sons. Besides these, countless high-minded princes and foremost protectors of the earth have come. Look there as well: Śakuni, son of Subala of Gandhāra, together with Vṛṣaka and Bṛhadbala, is seated—indeed, all the sons of the Gandhāra king have arrived. Aśvatthāmā and Bhoja too—both radiant and foremost among fully armed warriors—have come, adorned in fine garments and ornaments for your sake.”
Verse 14
रुक्माज्देन वीरेण तथा रुक्मरथेन च । कौरव्य: सोमदत्तश्न पुत्राश्नास्य महारथा:,इनके सिवा और भी असंख्य महामना क्षत्रियशिरोमणि भूमिपाल यहाँ आये हैं। उधर देखो, गान्धारराज सुबलके पुत्र शकुनि, वृषक और बृहद्वल बैठे हैं। गान्धारराजके ये सभी पुत्र यहाँ पधारे हैं। अश्वत्थामा और भोज--ये दोनों महान् तेजस्वी और सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ हैं और तुम्हारे लिये गहने-कपड़ोंसे सज-धजकर यहाँ आये हैं। राजा बृहन्त, मणिमान्, दण्डधार, सहदेव, जयत्सेन, राजा मेघसंधि, अपने दोनों पुत्रों शंख और उत्तरके साथ राजा विराट, वृद्धक्षेमके पुत्र सुशर्मा, राजा सेनाबिन्दु, सुकेतु और उनके पुत्र सुवर्चा, सुचित्र, सुकुमार, वृक, सत्यधृति, सूर्यध्वज, रोचमान, नील, चित्रायुध, अंशुमान्, चेकितान, महाबली श्रेणिमान्ू, समुद्रसेनके प्रतापी पुत्र चन्द्रसेन, जलसंध, विदण्ड और उनके पुत्र दण्ड, पौण्ड्रक वासुदेव, पराक्रमी भगदत्त, कलिंगनरेश ताम्रलिप्तनरेश, पाटनके राजा, अपने दो पुत्रों वीर रुक््मांगद तथा रुक्मरथके साथ महारथी मद्रराज शल्य, कुरुवंशी सोमदत्त तथा उनके तीन महारथी शूरवीर पुत्र भूरि, भूरिश्रवा और शल, काम्बोजदेशीय सुदक्षिण, पूरुवंशी दृढ़धन्वा
Dhṛṣṭadyumna said: “Along with the heroic Rukmāṅgada and also Rukmaratha, and the Kuru-born Somadatta’s sons—these too are great chariot-warriors.”
Verse 15
समवेतास्त्रय: शूरा भूरिर्भूरिश्रवा: शल: । सुदक्षिणश्न॒ काम्बोजो दृढ्धन्वा च पौरव:,इनके सिवा और भी असंख्य महामना क्षत्रियशिरोमणि भूमिपाल यहाँ आये हैं। उधर देखो, गान्धारराज सुबलके पुत्र शकुनि, वृषक और बृहद्वल बैठे हैं। गान्धारराजके ये सभी पुत्र यहाँ पधारे हैं। अश्वत्थामा और भोज--ये दोनों महान् तेजस्वी और सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ हैं और तुम्हारे लिये गहने-कपड़ोंसे सज-धजकर यहाँ आये हैं। राजा बृहन्त, मणिमान्, दण्डधार, सहदेव, जयत्सेन, राजा मेघसंधि, अपने दोनों पुत्रों शंख और उत्तरके साथ राजा विराट, वृद्धक्षेमके पुत्र सुशर्मा, राजा सेनाबिन्दु, सुकेतु और उनके पुत्र सुवर्चा, सुचित्र, सुकुमार, वृक, सत्यधृति, सूर्यध्वज, रोचमान, नील, चित्रायुध, अंशुमान्, चेकितान, महाबली श्रेणिमान्ू, समुद्रसेनके प्रतापी पुत्र चन्द्रसेन, जलसंध, विदण्ड और उनके पुत्र दण्ड, पौण्ड्रक वासुदेव, पराक्रमी भगदत्त, कलिंगनरेश ताम्रलिप्तनरेश, पाटनके राजा, अपने दो पुत्रों वीर रुक््मांगद तथा रुक्मरथके साथ महारथी मद्रराज शल्य, कुरुवंशी सोमदत्त तथा उनके तीन महारथी शूरवीर पुत्र भूरि, भूरिश्रवा और शल, काम्बोजदेशीय सुदक्षिण, पूरुवंशी दृढ़धन्वा
Dhṛṣṭadyumna said: “Here have assembled three renowned heroes—Bhūri, Bhūriśravas, and Śala; and also Sudakṣiṇa of Kāmboja, along with Dṛḍhadhanvā of the Paurava line.” In context, the verse serves as a roll-call of eminent kṣatriya leaders, underscoring the gravity of the coming conflict and the moral weight borne by those who choose to stand with one side or the other.
Verse 16
बृहद्धल: सुषेणश्च शिबिरौशीनरस्तथा । पटच्चरनिहन्ता च कारूषाधिपतिस्तथा,महाबली सुषेण, उशीनरदेशीय शिबि तथा चोर-डाकुओंको मार डालनेवाले कारूषाधिपति भी यहाँ आये हैं। इधर संकर्षण, वासुदेव, (भगवान् श्रीकृष्ण) रुक्मिणीनन्दन पराक्रमी प्रद्युम्न, साम्ब, चारुदेष्ण, प्रद्युम्मकुमार अनिरुद्ध, श्रीकृष्णके बड़े भाई गद, अक्रूर, सात्यकि, परम बुद्धिमान् उद्धव, हृदिकपुत्र कृतकर्मा, पृथु, विपृथु, विदूरथ, कंक, शंकु, गवेषण, आशावह, अनिरुद्ध, शमीक, सारिमेजय, वीर, वातपति, झिल्लीपिण्डारक तथा पराक्रमी उशीनर--ये सब वृष्णिवंशी कहे गये हैं
Dhṛṣṭadyumna said: “Bṛhaddhala and Suṣeṇa have arrived, and so too Śibi of the Uśīnara country. The ruler of Kāruṣa—renowned as a slayer of bandits and marauders—has also come.” The verse functions as a roll-call of notable allies, emphasizing the gathering of capable leaders and protectors of social order in preparation for the larger conflict.
Verse 17
संकर्षणो वासुदेवो रौक्मिणेयश्व वीर्यवान् । साम्बश्ध चारुदेष्णश्ष प्राद्युम्नि: सगदस्तथा,महाबली सुषेण, उशीनरदेशीय शिबि तथा चोर-डाकुओंको मार डालनेवाले कारूषाधिपति भी यहाँ आये हैं। इधर संकर्षण, वासुदेव, (भगवान् श्रीकृष्ण) रुक्मिणीनन्दन पराक्रमी प्रद्युम्न, साम्ब, चारुदेष्ण, प्रद्युम्मकुमार अनिरुद्ध, श्रीकृष्णके बड़े भाई गद, अक्रूर, सात्यकि, परम बुद्धिमान् उद्धव, हृदिकपुत्र कृतकर्मा, पृथु, विपृथु, विदूरथ, कंक, शंकु, गवेषण, आशावह, अनिरुद्ध, शमीक, सारिमेजय, वीर, वातपति, झिल्लीपिण्डारक तथा पराक्रमी उशीनर--ये सब वृष्णिवंशी कहे गये हैं
Dhṛṣṭadyumna said: “Here have come Saṅkarṣaṇa and Vāsudeva (Kṛṣṇa), and also the valiant son of Rukmiṇī, Pradyumna; likewise Sāmba and Cārudeṣṇa, and Gada; and the mighty Suṣeṇa; and Śibi of the Uśīnara country as well.” The verse functions as a roll-call of eminent allies, underscoring the ethical weight of solidarity: righteous leadership is strengthened when capable kinsmen and renowned protectors assemble in support of a just cause.
Verse 18
अक्र्ूरः सात्यकिश्वैव उद्धवश्च महामति: । कृतकर्मा च हार्दिक्य: पृथुर्विपृथुरेव च,महाबली सुषेण, उशीनरदेशीय शिबि तथा चोर-डाकुओंको मार डालनेवाले कारूषाधिपति भी यहाँ आये हैं। इधर संकर्षण, वासुदेव, (भगवान् श्रीकृष्ण) रुक्मिणीनन्दन पराक्रमी प्रद्युम्न, साम्ब, चारुदेष्ण, प्रद्युम्मकुमार अनिरुद्ध, श्रीकृष्णके बड़े भाई गद, अक्रूर, सात्यकि, परम बुद्धिमान् उद्धव, हृदिकपुत्र कृतकर्मा, पृथु, विपृथु, विदूरथ, कंक, शंकु, गवेषण, आशावह, अनिरुद्ध, शमीक, सारिमेजय, वीर, वातपति, झिल्लीपिण्डारक तथा पराक्रमी उशीनर--ये सब वृष्णिवंशी कहे गये हैं
Dhṛṣṭadyumna said: “Akrūra and Sātyaki, and the very wise Uddhava; and Kṛtakarmā, the son of Hṛdīka; and also Pṛthu and Vipṛthu—these eminent Vṛṣṇi heroes have arrived as well.” The verse functions as part of a formal muster-list, emphasizing the gathering of capable allies and the ethical weight of kinship-based duty and solidarity in a time of impending conflict.
Verse 19
विदूरथश्व कड्कश्न शड्कुश्न सगवेषण: । आशावहोडनिरुद्धक्ष शभीक: सारिमेजय:,महाबली सुषेण, उशीनरदेशीय शिबि तथा चोर-डाकुओंको मार डालनेवाले कारूषाधिपति भी यहाँ आये हैं। इधर संकर्षण, वासुदेव, (भगवान् श्रीकृष्ण) रुक्मिणीनन्दन पराक्रमी प्रद्युम्न, साम्ब, चारुदेष्ण, प्रद्युम्मकुमार अनिरुद्ध, श्रीकृष्णके बड़े भाई गद, अक्रूर, सात्यकि, परम बुद्धिमान् उद्धव, हृदिकपुत्र कृतकर्मा, पृथु, विपृथु, विदूरथ, कंक, शंकु, गवेषण, आशावह, अनिरुद्ध, शमीक, सारिमेजय, वीर, वातपति, झिल्लीपिण्डारक तथा पराक्रमी उशीनर--ये सब वृष्णिवंशी कहे गये हैं
Dhṛṣṭadyumna said: “Vidūratha, Kaṅka, Śaṅku, and Gaveṣaṇa; Āśāvaha; Aniruddha; Śamīka; Sārimejaya; the mighty Suṣeṇa; and Śibi of the Uśīnara country—these too are present.” In this passage, the speaker continues a formal enumeration of allied heroes, emphasizing the breadth of support gathered for the coming conflict and the public, accountable nature of political and martial commitments.
Verse 20
वीरो वातपतिकश्लैव झिल्लीपिण्डारकस्तथा । उशीनरश्न विक्रान्तो वृष्णयस्ते प्रकीर्तिता:,महाबली सुषेण, उशीनरदेशीय शिबि तथा चोर-डाकुओंको मार डालनेवाले कारूषाधिपति भी यहाँ आये हैं। इधर संकर्षण, वासुदेव, (भगवान् श्रीकृष्ण) रुक्मिणीनन्दन पराक्रमी प्रद्युम्न, साम्ब, चारुदेष्ण, प्रद्युम्मकुमार अनिरुद्ध, श्रीकृष्णके बड़े भाई गद, अक्रूर, सात्यकि, परम बुद्धिमान् उद्धव, हृदिकपुत्र कृतकर्मा, पृथु, विपृथु, विदूरथ, कंक, शंकु, गवेषण, आशावह, अनिरुद्ध, शमीक, सारिमेजय, वीर, वातपति, झिल्लीपिण्डारक तथा पराक्रमी उशीनर--ये सब वृष्णिवंशी कहे गये हैं
Dhṛṣṭadyumna said: “Vīra, Vātapatika, Jhillīpiṇḍāraka, and the valiant Uśīnara—these are all celebrated as members of the Vṛṣṇi line.” In context, the verse serves as a formal roll-call of allied heroes, stressing lineage, renown, and the righteous duty of kinsmen and confederates to stand together.
Verse 21
भागीरथो बृहत्क्षत्र: सैन्धवश्न जयद्रथ: । बृहद्रथो बाह्लिकश्न श्रुतायुश्न महारथ:,भगीरथवंशी बृहत्क्षत्र, सिन्धुराज जयद्रथ, बृहद्रथ, बाह्नलीक, महारथी श्रुतायु, उलूक, राजा कैतव, चित्रांगद, शुभांगद, बुद्धिमान् वत्सराज, कोसलनरेश, पराक्रमी शिशुपाल तथा जरासंध--ये तथा और भी अनेक जनपदोंके शासक भूमण्डलमें विख्यात बहुत-से क्षत्रिय वीर तुम्हारे लिये यहाँ पधारे हैं। भद्रे! ये पराक्रमी नरेश तुम्हें पानेके उद्देश्यसे इस उत्तम लक्ष्यका भेदन करेंगे। शुभे! जो इस निशानेको वेध डाले, उसीका आज तुम वरण करना
Dhṛṣṭadyumna said: “For your sake many renowned kṣatriya heroes, famed across the earth, have come here—Bhāgīratha, Bṛhatkṣatra, Jayadratha the king of Sindhu, Bṛhadratha, Bāhlika, and the great chariot-warrior Śrutāyu, along with others. O auspicious lady, these powerful kings, intent on winning you, will now attempt to pierce this excellent target. Whichever man strikes the mark, him you should choose today as your husband.”
Verse 22
उलूक: कैतवो राजा चित्राड्भदशुभाड़दौ । वत्सराजश्न मतिमान् कोसलाधिपतिस्तथा,भगीरथवंशी बृहत्क्षत्र, सिन्धुराज जयद्रथ, बृहद्रथ, बाह्नलीक, महारथी श्रुतायु, उलूक, राजा कैतव, चित्रांगद, शुभांगद, बुद्धिमान् वत्सराज, कोसलनरेश, पराक्रमी शिशुपाल तथा जरासंध--ये तथा और भी अनेक जनपदोंके शासक भूमण्डलमें विख्यात बहुत-से क्षत्रिय वीर तुम्हारे लिये यहाँ पधारे हैं। भद्रे! ये पराक्रमी नरेश तुम्हें पानेके उद्देश्यसे इस उत्तम लक्ष्यका भेदन करेंगे। शुभे! जो इस निशानेको वेध डाले, उसीका आज तुम वरण करना
Dhṛṣṭadyumna said: “Ulūka, King Kaitava, Citrāṅgada and Śubhāṅgada; the wise king of Vatsa; the lord of Kosala; Bhāgīratha’s descendant Bṛhatkṣatra; Jayadratha, king of Sindhu; Bṛhadratha; Bāhlīka; the great chariot-warrior Śrutāyu; and also the mighty Śiśupāla and Jarāsandha—these and many other rulers of provinces, renowned across the whole earth, have come here for your sake, O auspicious lady. Noble one, these valiant kings, intent on winning you, will now attempt to pierce this excellent target. O fair one, whoever strikes and pierces this mark—him you should choose today as your husband.”
Verse 23
शिशुपालश्च विक्रान्तो जरासंधस्तथैव च । एते चान्ये च बहवो नानाजनपदेश्वरा:,भगीरथवंशी बृहत्क्षत्र, सिन्धुराज जयद्रथ, बृहद्रथ, बाह्नलीक, महारथी श्रुतायु, उलूक, राजा कैतव, चित्रांगद, शुभांगद, बुद्धिमान् वत्सराज, कोसलनरेश, पराक्रमी शिशुपाल तथा जरासंध--ये तथा और भी अनेक जनपदोंके शासक भूमण्डलमें विख्यात बहुत-से क्षत्रिय वीर तुम्हारे लिये यहाँ पधारे हैं। भद्रे! ये पराक्रमी नरेश तुम्हें पानेके उद्देश्यसे इस उत्तम लक्ष्यका भेदन करेंगे। शुभे! जो इस निशानेको वेध डाले, उसीका आज तुम वरण करना
Dhṛṣṭadyumna said: “Here have come the valiant Śiśupāla and Jarāsandha, and many other rulers from diverse realms. Renowned kṣatriya heroes of the earth have assembled here for your sake. These powerful kings, intent on winning you, will now attempt to pierce this excellent target; and, O auspicious one, you are to choose today as your husband the man who succeeds in striking the mark.”
Verse 24
त्वदर्थमागता भगद्रे क्षत्रिया: प्रथिता भुवि | एते भेत्स्यन्ति विक्रान्तास्त्वदर्थे लक्ष्यमुत्तमम् विध्येत य इदं लक्ष्यं वरयेथा: शुभेडद्य तम्,भगीरथवंशी बृहत्क्षत्र, सिन्धुराज जयद्रथ, बृहद्रथ, बाह्नलीक, महारथी श्रुतायु, उलूक, राजा कैतव, चित्रांगद, शुभांगद, बुद्धिमान् वत्सराज, कोसलनरेश, पराक्रमी शिशुपाल तथा जरासंध--ये तथा और भी अनेक जनपदोंके शासक भूमण्डलमें विख्यात बहुत-से क्षत्रिय वीर तुम्हारे लिये यहाँ पधारे हैं। भद्रे! ये पराक्रमी नरेश तुम्हें पानेके उद्देश्यसे इस उत्तम लक्ष्यका भेदन करेंगे। शुभे! जो इस निशानेको वेध डाले, उसीका आज तुम वरण करना
Dhṛṣṭadyumna said: “For your sake, O noble lady, renowned kṣatriyas celebrated across the earth have come here. These valiant men, seeking you, will now attempt to pierce this excellent target. O auspicious one, choose today as your husband the man who succeeds in striking this mark.”
Verse 185
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि स्वयंवरपर्वणि राजनामकीर्तने पज्चाशीत्यधिकशततमो< ध्याय:
Thus ends the one-hundred-and-eighty-fifth chapter of the Ādi Parva of the Śrī Mahābhārata, within the section on the svayaṃvara, in the subsection that records and proclaims the names of kings. This is a colophon marking the close of the chapter and situating it within the larger narrative structure.
The chapter stages a tension between public entitlement and ethical restraint: disappointed rulers move toward retaliatory action, while the narrative validates merit-based outcome and emphasizes orderly inquiry over coercive reversal.
Legitimacy is shown to arise from demonstrated competence aligned with agreed conditions, and social stability is preserved when power is exercised through protocol—honoring guests, verifying identities, and restraining immediate anger.
No explicit phalaśruti is stated here; the meta-function is architectural—linking the svayaṃvara feat to ethical validation, and transitioning the episode into recognition and alliance-making that shapes subsequent narrative developments.