
Adhyāya 6: Śibira-dvāra-sthita Bhūta-varṇana and Aśvatthāmā’s Śaraṇāgati to Mahādeva
Upa-parva: Sauptika Parva — Śibira-dvāra Bhūta-darśana (Gate-Guardian Encounter Episode)
Dhṛtarāṣṭra questions Saṃjaya about Kṛtavarmā and Kṛpa as Aśvatthāmā stands at the camp gate. Saṃjaya narrates Aśvatthāmā’s approach and his sighting of a colossal, radiant, terrifying guardian being blocking entry. The being’s appearance is elaborately described—animal-skin attire, serpentine ornaments, multiple eyes, and blazing emanations—suggesting a numinous protector rather than a human sentinel. Aśvatthāmā deploys successive weapons (arrows, ratha-śakti, sword, mace), but each is neutralized or consumed, emphasizing the insufficiency of ordinary martial means against a divinely configured obstacle. Observing the inexplicable transformation of space and power, Aśvatthāmā turns inward, recalling Kṛpa’s counsel about prohibited targets and the danger of deviating from śāstra-guided conduct. He interprets his predicament as a karmic “pratighāta” (reversal/obstruction) arising from adharmic intent and acknowledges the superiority of daiva over human effort. The chapter closes with his explicit act of seeking refuge in Mahādeva (Śiva)—Kapardin, Girīśa, Śūlapāṇi—invoking divine protection to remove the fearsome impediment.
Chapter Arc: रात्रि के अंधकार में, क्रोध से उन्मत्त द्रौणि (अश्वत्थामा) कृतवर्मा और कृपाचार्य को साथ लेकर शत्रु-शिविर के द्वार पर पहुँचता है—जहाँ विजय का मार्ग नहीं, एक अलौकिक पहरेदार खड़ा है। → शिविर-द्वार पर चन्द्र-सूर्य-सम तेजस्वी, महाकाय, लोमहर्षक ‘भूत’/अद्भुत पुरुष को देखकर अश्वत्थामा उसे बाधा मानकर अस्त्र-शस्त्र चलाता है—रथ-शक्ति, खड्ग, गदा आदि; पर हर प्रहार निष्फल होकर लौटता है, और उसके भीतर ‘उपाय-शून्यता’ का भय बढ़ता जाता है। → अस्त्रों के टूटने/निष्फल होने और मार्ग रुक जाने पर अश्वत्थामा के भीतर निर्णायक मोड़ आता है—वह समझता है कि वह शास्त्रोक्त सनातन मार्ग से हटकर ‘अमार्ग’ में पड़ गया है; अब दैव-दण्ड की घोर छाया उसे घेर रही है और केवल दैव-अनुकूलता/देव-शरण ही शेष उपाय है। → वह गुरुजनों की शिक्षा का स्मरण कर कर्म-दैव के संबंध पर विचार करता है—पुरुषार्थ आवश्यक है, पर दैव-विपरीत होने पर सिद्धि नहीं; धर्म-पथ से च्युत होकर विपत्ति आती है। इस आत्मस्वीकृति के साथ वह आगे की रणनीति को ‘दैव-आश्रय’ की ओर मोड़ने लगता है। → दैव-दण्ड के भय और देव-शरण की आवश्यकता को स्वीकार कर अश्वत्थामा अगला कदम उठाने को तत्पर होता है—क्या वह शिव/दैवी शक्ति की शरण लेकर शिविर-प्रवेश का मार्ग पाएगा?
Verse 1
/ ऑपन-माज बक। डे षष्ठो5 ध्याय: अश्वत्थामाका शिविर-द्वारपर एक अद्भुत पुरुषको देखकर उसपर अस्त्रोंका प्रहार करना और अस्त्रोके अभावमें चिन्तित हो भगवान् शिवकी शरणमें जाना धृतराष्ट्र रवाच द्वारदेशे ततो द्रोणिमवस्थितमवेक्ष्य तौ । अकुर्वातां भोजकृपौ कि संजय वदस्व मे,धृतराष्ट्रने पूछा--संजय! अश्वत्थामाको शिविरके द्वारपर खड़ा देख कृतवर्मा और कृपाचार्यने क्या किया? यह मुझे बताओ
Dhṛtarāṣṭra sprach: „Sañjaya, als Kṛtavarmā und Kṛpācārya Aśvatthāmā, den Sohn Droṇas, am Bereich des Lagertores postiert sahen — was taten die beiden? Sage es mir.“
Verse 2
संजय उवाच कृतवर्माणमामन्त्रय कृपं च स महारथ: । द्रौणि्मन्युपरीतात्मा शिबिरद्वारमागमत्,संजयने कहा--राजन्! कृतवर्मा और कृपाचार्यको आमन्त्रित करके महारथी अश्वत्थामा क्रोधपूर्ण हृदयसे शिविरके द्वारपर आया
Sañjaya sprach: „O König, nachdem er Kṛtavarmā und Kṛpa herbeigerufen hatte, kam Aśvatthāmā, Droṇas Sohn, der große Wagenkämpfer, dessen Geist von Zorn überwältigt war, zum Lagertor.“
Verse 3
तत्र भूतं महाकायं चन्द्रार्कसदृशद्युतिम् सो<पश्यद् द्वारमाश्रित्य तिष्ठन्तं लोमहर्षणम्,वहाँ उसने चन्द्रमा और सूर्यके समान तेजस्वी एक विशालकाय अद्धुत प्राणीको देखा, जो द्वार रोककर खड़ा था, उसे देखते ही रोंगटे खड़े हो जाते थे। उस महापुरुषने व्याप्रका ऐसा चर्म धारण कर रखा था, जिससे बहुत अधिक रक्त चू रहा था, वह काले मृगचर्मकी चादर ओढ़े और सर्पोंका यज्ञोपवीत पहने हुए था। उसकी विशाल और मोटी भुजाएँ नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लिये प्रहार करनेको उद्यत जान पड़ती थीं। उनमें बाजूबंदोंके स्थानमें बड़े-बड़े सर्प बँधे हुए थे तथा उसका मुख आगकी लपटोंसे व्याप्त दिखायी देता था। उसने मुँह फैला रखा था, जो दाढ़ोंके कारण विकराल जान पड़ता था। वह भयानक पुरुष सहस्रों विचित्र नेत्रोंसे सुशोभित था
Dort erblickte er ein unheimliches Wesen von riesenhafter Gestalt, strahlend wie Mond und Sonne, am Tor stehend, als versperre es den Durchgang—so furchtbar, dass beim Anblick das Haar zu Berge stand.
Verse 4
वसानं चर्म वैयाप्र॑ महारुधिरविस्रवम् । कृष्णाजिनोत्तरासड्ूं नागयज्ञोपवीतिनम्,वहाँ उसने चन्द्रमा और सूर्यके समान तेजस्वी एक विशालकाय अद्धुत प्राणीको देखा, जो द्वार रोककर खड़ा था, उसे देखते ही रोंगटे खड़े हो जाते थे। उस महापुरुषने व्याप्रका ऐसा चर्म धारण कर रखा था, जिससे बहुत अधिक रक्त चू रहा था, वह काले मृगचर्मकी चादर ओढ़े और सर्पोंका यज्ञोपवीत पहने हुए था। उसकी विशाल और मोटी भुजाएँ नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लिये प्रहार करनेको उद्यत जान पड़ती थीं। उनमें बाजूबंदोंके स्थानमें बड़े-बड़े सर्प बँधे हुए थे तथा उसका मुख आगकी लपटोंसे व्याप्त दिखायी देता था। उसने मुँह फैला रखा था, जो दाढ़ोंके कारण विकराल जान पड़ता था। वह भयानक पुरुष सहस्रों विचित्र नेत्रोंसे सुशोभित था
Sañjaya sprach: Er trug ein Tigerfell, aus dem reichlich Blut strömte; als Obergewand war er in das Fell einer schwarzen Antilope gehüllt, und Schlangen trug er als heiligen Faden (yajñopavīta).
Verse 5
इस प्रकार श्रीमह्ाभारत सौप्तिकपर्वमें अश्वत्थामाका प्रयाणविषयक पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ,बाहुभि: स्वायतै: पीनैर्नानाप्रहरणोद्यतै: । बद्धाज्दमहासर्प ज्वालामालाकुलाननम् वहाँ उसने चन्द्रमा और सूर्यके समान तेजस्वी एक विशालकाय अद्धुत प्राणीको देखा, जो द्वार रोककर खड़ा था, उसे देखते ही रोंगटे खड़े हो जाते थे। उस महापुरुषने व्याप्रका ऐसा चर्म धारण कर रखा था, जिससे बहुत अधिक रक्त चू रहा था, वह काले मृगचर्मकी चादर ओढ़े और सर्पोंका यज्ञोपवीत पहने हुए था। उसकी विशाल और मोटी भुजाएँ नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लिये प्रहार करनेको उद्यत जान पड़ती थीं। उनमें बाजूबंदोंके स्थानमें बड़े-बड़े सर्प बँधे हुए थे तथा उसका मुख आगकी लपटोंसे व्याप्त दिखायी देता था। उसने मुँह फैला रखा था, जो दाढ़ोंके कारण विकराल जान पड़ता था। वह भयानक पुरुष सहस्रों विचित्र नेत्रोंसे सुशोभित था
Sañjaya sprach: Dort erblickte er ein gewaltiges, wunderbares Wesen, strahlend wie Sonne und Mond, das als Hüter am Eingang stand und den Weg versperrte. Schon sein Anblick ließ das Haar zu Berge stehen. Jener große Mann trug ein vom Blut durchnässtes Fell, war in schwarzes Antilopenleder gehüllt und hatte Schlangen als heiligen Faden (yajñopavīta) umgelegt. Seine riesigen, dicken Arme waren erhoben, als stünden sie zum Schlag bereit, und hielten Waffen vieler Art; anstelle von Armreifen waren große Schlangen daran gebunden. Sein weit aufgerissener Mund schien von Flammengirlanden erfüllt; hervorstehende Fangzähne machten das Antlitz noch schrecklicher. Mit unzähligen seltsamen Augen geschmückt, versperrte diese furchtbare Gestalt den Zugang—als Verkörperung des moralischen Schreckens und der kosmischen Folge, die Taten nächtlicher Gewalt und Rache überschattet.
Verse 6
दंष्टाकरालवदनं व्यादितास्यं भयानकम् | नयनानां सहसैश्न विचित्रैरभिभूषितम्,वहाँ उसने चन्द्रमा और सूर्यके समान तेजस्वी एक विशालकाय अद्धुत प्राणीको देखा, जो द्वार रोककर खड़ा था, उसे देखते ही रोंगटे खड़े हो जाते थे। उस महापुरुषने व्याप्रका ऐसा चर्म धारण कर रखा था, जिससे बहुत अधिक रक्त चू रहा था, वह काले मृगचर्मकी चादर ओढ़े और सर्पोंका यज्ञोपवीत पहने हुए था। उसकी विशाल और मोटी भुजाएँ नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लिये प्रहार करनेको उद्यत जान पड़ती थीं। उनमें बाजूबंदोंके स्थानमें बड़े-बड़े सर्प बँधे हुए थे तथा उसका मुख आगकी लपटोंसे व्याप्त दिखायी देता था। उसने मुँह फैला रखा था, जो दाढ़ोंके कारण विकराल जान पड़ता था। वह भयानक पुरुष सहस्रों विचित्र नेत्रोंसे सुशोभित था इति श्रीमहाभारते सौप्तिकपर्वणि द्रौणिचिन्तायां षष्ठोडध्याय:
Sañjaya sprach: „Er erblickte ein schreckliches Wesen: ein Antlitz, durch hervorstehende Fangzähne grauenvoll, ein weit aufgerissener, furchterregender Rachen. Es war mit Tausenden wunderbarer Augen geschmückt. Schon der Anblick selbst jagte Schrecken ein, als sei ein Hüter der Schwelle aufgestanden, um den Weg zu versperren, und verkörpere die unheilvolle moralische Stimmung der nächtlichen Gewalt.“
Verse 7
नैव तस्य वपु: शक््यं प्रवक्तुं वेष एव च । सर्वथा तु तदालक्ष्य स्फुटेयुरपि पर्वता:,उसके शरीर और वेषका वर्णन नहीं किया जा सकता। सर्वथा उसे देख लेनेपर पर्वत भी भयके मारे विदीर्ण हो सकते थे
Sañjaya sprach: Seine Gestalt—ja selbst sein äußeres Gepräge—ließ sich nicht wirklich beschreiben. Wahrlich, schon beim bloßen Anblick hätten selbst Berge vor Schrecken bersten können.
Verse 8
तस्यास्यान्नासिका भ्यां च श्रवणाभ्यां च सर्वश:ः । तेभ्यश्वाक्षिसहस्रेभ्य: प्रादुरासन् महार्चिष:,उसके मुखसे, दोनों नासिकाओंसे, कानोंसे और हजारों नेत्रोंस भी सब ओर आगकी बड़ी-बड़ी लपटें निकल रही थीं
Sañjaya sprach: Aus seinem Mund, aus beiden Nüstern und aus beiden Ohren—nach allen Seiten hin—und aus jenen tausend Augen brachen große, lodernde Flammen hervor.
Verse 9
तथा तेजोमरीचिभ्य: शड्खचक्रगदाधरा: । प्रादुरासन् हषीकेशा: शतशो5थ सहस्रशः,उसके तेजकी किरणोंसे शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले सैकड़ों, हजारों विष्णु प्रकट हो रहे थे
Sañjaya sprach: Aus jenen Strahlen glühender Herrlichkeit traten Hunderte—ja, Tausende—von Erscheinungsformen Hṛṣīkeśas (Viṣṇus) hervor, jede mit Muschel, Diskus und Keule bewaffnet. Die Vision verkündete, dass hinter der Gewalt des nächtlichen Krieges eine überwältigende göttliche Souveränität steht, vor der menschlicher Hochmut und Grausamkeit nichtig werden.
Verse 10
तदत्यद्भुतमालोक्य भूत॑ं लोकभयंकरम् । द्रौणिरव्यथितो दिव्यैरस्त्रवर्षरवाकिरत्,सम्पूर्ण जगत्को भयभीत करनेवाले उस अद्भुत प्राणीको देखकर द्रोणकुमार अश्वत्थामा भयभीत नहीं हुआ, अपितु उसके ऊपर दिव्य अस्त्रोंकी वर्षा करने लगा
Sañjaya sprach: Als er jenes über alle Maßen wunderbare Wesen sah—schreckenerregend für die ganze Welt—verlor Droṇas Sohn (Aśvatthāmā) nicht die Fassung. Vielmehr überschüttete er es mit Salven göttlicher Waffen.
Verse 11
द्रौणिमुक्तान् शरांस्तांस्तु तद् भूतं॑ महदग्रसत् । उदधेरिव वार्योघान् पावको वडवामुख:,परंतु जैसे बडवानल समुद्रकी जलराशिको पी जाता है, उसी प्रकार उस महाभूतने अश्व॒ृत्थामाके छोड़े हुए सारे बाणोंको अपना ग्रास बना लिया
Sañjaya sprach: Jene mächtige Urgewalt verschlang alle Pfeile, die Droṇas Sohn abgeschossen hatte. Wie das unterseeische Feuer (vaḍavānala) die tosenden Wassermassen des Ozeans in sich hineintrinkt, so verzehrte jene große Macht Aśvatthāmās Geschosse.
Verse 12
अग्रसत् तांस्तथाभूतं द्रौणिना प्रहितान् शरान् । अश्वत्थामा तु सम्प्रेक्ष्य शरौघांस्तान् निरर्थकान्
Sañjaya sprach: So verschlang er jene Pfeile, obgleich sie in dieser Weise von Droṇas Sohn abgeschossen worden waren. Aśvatthāmā aber, als er sah, dass seine Pfeilsalven vergeblich waren, erkannte ihre Wirkungslosigkeit und überdachte seinen weiteren Weg.
Verse 13
सा तमाहत्य दीप्ताग्रा रथशक्तिरदीर्यत
Sañjaya sprach: Nachdem sie ihn getroffen hatte, wurde jener Wagen-Speer—dessen Spitze loderte—noch weiter nach vorn geschleudert.
Verse 14
युगान्ते सूर्यमाहत्य महोल्केव दिवद्च्युता । उसका अग्रभाग तेजसे प्रकाशित हो रहा था। वह रथ-शक्ति उस महापुरुषसे टकराकर उसी प्रकार विदीर्ण हो गयी, जैसे प्रलयकालमें आकाशसे गिरी हुई बड़ी भारी उल्का सूर्यसे टकराकर नष्ट हो जाती है ।। अथ हेमत्सरुं दिव्यं खडगमाकाशवर्चसम्
Sañjaya sprach: Wie am Ende eines Zeitalters ein gewaltiger Meteorit vom Himmel fällt, die Sonne trifft und vergeht, so prallte auch das Wagen-Geschoss—an der Spitze lodernd—gegen jenen großen Krieger und zerschellte. Danach erschien/wurde ergriffen ein göttliches Schwert mit goldenem Griff, strahlend wie der Himmel.
Verse 15
तत:ः खड्गवरं धीमान् भूताय प्राहिणोत् तदा
Daraufhin schleuderte der Weise in jenem Augenblick ein erlesenes Schwert gegen jenes Wesen. In der unheilvollen Szenerie des nächtlichen Überfalls richtet sich die Gewalt nicht nur gegen menschliche Feinde, sondern auch gegen eine furchterregende Gegenwart—und macht so die moralische Finsternis und die zunehmende Brutalität der Sauptika-Episode sichtbar.
Verse 16
ततः स कुपितो द्रौणिरिन्द्रकेतुनिभां गदाम्
Dann ergriff Droṇas Sohn, vom Zorn entflammt, eine Keule, die wie Indras Banner leuchtete. Dieses Bild steigert die kriegerische Wucht der Szene und kündet von der sittlichen Gefahr, wenn Zorn das Handeln nach dem Krieg antreibt.
Verse 17
ततः सर्वायुधाभावे वीक्षमाणस्ततस्तत:
Dann, als er sich gänzlich ohne Waffen sah, blickte er unablässig umher—hierhin und dorthin—und suchte nach irgendeinem Mittel zu handeln inmitten der Gefahr und Verwirrung jenes Augenblicks.
Verse 18
अपश्यत् कृतमाकाशमनाकाशं जनार्दनै: । इस प्रकार जब उसके सारे अस्त्र-शस्त्र समाप्त हो गये, तब वह इधर-उधर देखने लगा। उस समय उसे सारा आकाश असंख्य विष्णुओंसे भरा दिखायी दिया ।। व 5 99 द्रोणपुत्रो निरायुध:
Sañjaya sprach: Als Droṇas Sohn sich waffenlos sah, blickte er nach allen Seiten. Da erblickte er den ganzen Himmel—nicht länger als leeren Raum—sondern erfüllt von unzähligen Erscheinungsformen Janārdanas (Viṣṇus). Diese Vision zeigt: Wenn menschliche Kraft erschöpft ist, treten die Ordnung des Dharma und die göttliche Gegenwart hervor, zügeln unbedachte Gewalt und erinnern den Krieger daran, dass Macht nicht absolut ist.
Verse 19
ब्रुवतामप्रियं पथ्यं सुहदां न शूणोति यः
Sañjaya sagte: „Wer nicht auf den heilsamen Rat wohlmeinender Freunde hört, selbst wenn er unerquicklich zu hören ist…“
Verse 20
स शोचत्यापदं प्राप्प यथाहमतिवर्त्य तौ । 'जो पुरुष अप्रिय किंतु हितकर वचन बोलनेवाले अपने सुहृदोंकी सीख नहीं सुनता है, वह विपत्तिमें पड़कर उसी तरह शोक करता है, जैसे मैं अपने उन दोनों सुहृदोंकी आज्ञाका उल्लंघन करके वष्ट पा रहा हूँ ।। शास्त्रदृष्टानविद्वान् यः समतीत्य जिघांसति
Sañjaya sprach: „Wenn ein Mensch ins Unheil gerät, klagt er—so wie ich jetzt klage—weil ich den Rat jener beiden wohlmeinenden Freunde überschritten habe. Wer nicht hören will auf Mahnung, die unerquicklich, doch heilsam ist und von den eigenen Wohlgesinnten kommt, der gerät ins Verderben und beklagt es hernach. Und der Unwissende, der missachtet, was in den Śāstras festgelegt ist, überschreitet es und trachtet danach, Schaden zuzufügen.“
Verse 21
गोब्राह्मणनृपस्त्रीषु सख्युर्मातुर्गुरोस्तथा,'गौ, ब्राह्मण, राजा, स्त्री, मित्र, माता, गुरु, दुर्बल, जड, अन्धे, सोये हुए, डरे हुए, मतवाले, उन्मत्त और असावधान पुरुषोंपर मनुष्य शस्त्र न चलाये
Sañjaya sprach: Ein Mann soll nicht mit Waffen schlagen gegen Kühe, Brāhmaṇas, Könige oder Frauen; ebenso wenig gegen Freund, Mutter oder Lehrer. Ebenso soll er nicht angreifen die Schwachen, die Beschränkten, die Blinden, die Schlafenden oder von Furcht Ergriffenen, die Trunkenen, die Rasenden oder die Unachtsamen. Dies gilt als Zügel des Dharma selbst in der Gewalt des Krieges: es bezeichnet, wer zu schützen ist und wessen Wehrlosigkeit nicht ausgenutzt werden darf.
Verse 22
हीनप्राणजडान्धेषु सुप्तभीतोत्थितेषु च । मत्तोन्मत्तप्रमत्तेषु न शस्त्राणि च पातयेत्,'गौ, ब्राह्मण, राजा, स्त्री, मित्र, माता, गुरु, दुर्बल, जड, अन्धे, सोये हुए, डरे हुए, मतवाले, उन्मत्त और असावधान पुरुषोंपर मनुष्य शस्त्र न चलाये
Sañjaya sprach: Man soll die Waffen nicht niederfahren lassen auf jene, deren Lebenskräfte gering sind, auf die Beschränkten oder die Blinden; auch nicht auf Schlafende, von Furcht Ergriffene oder eben Erwachte; ebenso wenig auf Trunkene, Rasende oder Unachtsame. Dieser Vers setzt eine Schranke im Krieg: selbst inmitten der Gewalt verbietet der Dharma, die Wehrlosen oder zur fairen Gegenwehr Unfähigen anzugreifen.
Verse 23
इत्येवं गुरुभि: पूर्वमुपदिष्टं नृणां सदा । सो>हमुत्क्रम्य पन्थानं शास्त्रदिष्टं सनातनम्
Sañjaya sprach: „So ist es den Menschen seit alters von ihren Lehrern stets eingeschärft worden. Doch ich habe jenen Pfad überschritten—den ewigen Weg, den die Śāstras weisen.“
Verse 24
तां चापदं घोरतरां प्रवदन्ति मनीषिण:,“मनीषी पुरुष उसीको अत्यन्त भयंकर आपत्ति बताते हैं, जब कि मनुष्य किसी महान् कार्यका आरम्भ करके भयके कारण भी उससे पीछे हट जाता है और शक्ति-बलसे यहाँ उस कर्मको करनेमें असमर्थ हो जाता है
Sañjaya sprach: „Die Weisen nennen dies ein noch schrecklicheres Unheil: wenn ein Mann, nachdem er ein großes Werk begonnen hat, aus Furcht zurückweicht und, an Kraft und Entschlossenheit mangelnd, unfähig ist, die Tat zu Ende zu führen. In einem solchen Scheitern geht nicht nur das Werk verloren, sondern auch Mut und sittliche Standhaftigkeit.“
Verse 25
यदुद्यम्य महत् कृत्यं भयादपि निवर्तते । अशक्तिश्चैव तत् कर्तु कर्म शक्तिबलादिह,“मनीषी पुरुष उसीको अत्यन्त भयंकर आपत्ति बताते हैं, जब कि मनुष्य किसी महान् कार्यका आरम्भ करके भयके कारण भी उससे पीछे हट जाता है और शक्ति-बलसे यहाँ उस कर्मको करनेमें असमर्थ हो जाता है
Wenn ein Mensch ein großes Werk beginnt, dann aus Furcht zurückweicht und hier selbst außerstande ist, es mit eigener Kraft und Fähigkeit zu vollbringen, so nennen die Weisen dies das schrecklichste Unheil.
Verse 26
न हि दैवाद गरीयो वै मानुषं कर्म कथ्यते । मानुष्यं कुर्वतः कर्म यदि दैवान्न सिध्यति
Sañjaya sprach: „Menschliches Bemühen gilt nicht als höher als das Geschick. Selbst wenn einer mit menschlichen Mitteln handelt, gelingt es nicht, wenn das Schicksal es nicht trägt.“
Verse 27
प्रतिज्ञानं हुविज्ञानं प्रवदन्ति मनीषिण:
Sañjaya sagte: „Die Weisen erklären, ein Gelübde (pratijñā) sei nicht bloßes Wort, sondern eine bewusst gefasste, wohlbedachte Verpflichtung—die man in ihrer wahren Absicht und in ihren Folgen verstehen muss.“
Verse 28
यदारभ्य क्रियां काज्चिद् भयादिह निवर्तते । “यदि मनुष्य किसी कार्यको आरम्भ करके यहाँ भयके कारण उससे निवृत्त हो जाता है तो ज्ञानी पुरुष उसकी उस कार्यको करनेकी प्रतिज्ञाको अज्ञान या मूर्खता बताते हैं || २७३ || तदिदं दुष्प्रणीतेन भयं मां समुपस्थितम्,“इस समय अपने ही दुष्कर्मके कारण मुझपर यह भय आ पहुँचा है। द्रोणाचार्यका पुत्र किसी प्रकार भी युद्धसे पीछे नहीं हट सकता; परंतु क्या करूँ, यह महाभूत मेरे मार्ममें विघ्न डालनेके लिये दैवदण्डके समान उठ खड़ा हुआ है
Sañjaya sagte: „Wenn ein Mensch irgendein Werk beginnt und dann hier aus Furcht davon ablässt, so erklären die Weisen eben diesen Vorsatz zu handeln für Unwissenheit — ja, für Torheit. Und doch hat mich in diesem Augenblick die Angst ergriffen, geboren aus meinem eigenen fehlgeleiteten Tun. Der Sohn Droṇas kann auf keine Weise vom Kampf zurückweichen; aber was soll ich tun? Dieses gewaltige, unheilvolle Zeichen hat sich erhoben wie ein Stab göttlicher Züchtigung, als wolle es meinen Lebenspunkt treffen und meinen Plan vereiteln.“
Verse 29
न हि द्रोणसुत: संख्ये निवर्तेत कथंचन । इदं च सुमहद् भूतं दैवदण्डमिवोद्यतम्,“इस समय अपने ही दुष्कर्मके कारण मुझपर यह भय आ पहुँचा है। द्रोणाचार्यका पुत्र किसी प्रकार भी युद्धसे पीछे नहीं हट सकता; परंतु क्या करूँ, यह महाभूत मेरे मार्ममें विघ्न डालनेके लिये दैवदण्डके समान उठ खड़ा हुआ है
Sañjaya sagte: „Wahrlich, Droṇas Sohn würde in der Schlacht unter keinen Umständen zurückweichen. Und nun steht dieses ungeheure, unheilvolle Wesen erhoben wie ein Stab göttlicher Strafe, bereit, mich an meinem Lebenspunkt zu hemmen.“
Verse 30
न चैतदभिजानामि चिन्तयन्नपि सर्वथा । ध्रुवं येयमधर्मे मे प्रवृत्ता कलुषा मति:,“मैं सब प्रकारसे सोचने-विचारनेपर भी नहीं समझ पाता कि यह कौन है? निश्चय ही जो मेरी यह कलुषित बुद्धि अधर्ममें प्रवृत्त हुई है, उसीका विधात करनेके लिये यह भयंकर परिणाम सामने आया है, अतः आज युद्धसे मेरा पीछे हटना दैवके विधानसे ही सम्भव हुआ है
Sañjaya sprach: „So sehr ich auch auf jede erdenkliche Weise nachsinne, ich vermag nicht zu erkennen, wer dies ist. Gewiss hat mein befleckter Geist, der sich dem Adharma zuwandte, diese schreckliche Folge als verordnetes Ergebnis herbeigeführt.“
Verse 31
तस्या: फलमिदं घोर प्रतिघाताय कल्पते । तदिदं दैवविहितं मम संख्ये निवर्तनम्,“मैं सब प्रकारसे सोचने-विचारनेपर भी नहीं समझ पाता कि यह कौन है? निश्चय ही जो मेरी यह कलुषित बुद्धि अधर्ममें प्रवृत्त हुई है, उसीका विधात करनेके लिये यह भयंकर परिणाम सामने आया है, अतः आज युद्धसे मेरा पीछे हटना दैवके विधानसे ही सम्भव हुआ है
Sañjaya sprach: „Dies ist die schreckliche Frucht jenes Irrwegs; sie ist zurückgekehrt, um in furchtbarer Vergeltung zu treffen. So ist mein Rückzug aus der Schlacht vom Schicksal selbst verordnet.“
Verse 32
नान्यत्र दैवादुद्यन्तुमिह शक््यं कथंचन । सो5हमद्य महादेवं प्रपद्ये शरणं विभुम्
Sañjaya sprach: „Hier kann kein Bemühen auf irgendeine Weise wahrhaft gelingen, außer durch den Willen des Schicksals. Darum nehme ich heute Zuflucht bei dem mächtigen Mahādeva, dem allgegenwärtigen Herrn, und suche seinen Schutz.“
Verse 33
कपर्दिनं देवदेवमुमापतिमनामयम्,“भगवान् शंकर तपस्या और पराक्रममें सब देवताओंसे बढ़कर हैं; अतः मैं उन्हीं रोग- शोकसे रहित, जटाजूटधारी, देवताओंके भी देवता, भगवती उमाके प्राणवल्लभ, कपाल- मालाधारी, भगनेत्र-विनाशक, पापहारी, त्रिशूलधारी एवं पर्वतपर शयन करनेवाले रुद्रदेवकी शरणमें जाता हूँ
Sañjaya sprach: „Ich nehme Zuflucht bei Kapardin — Śiva, dem Gott der Götter, dem makellosen Herrn, dem Geliebten Umās. Denn Śaṅkara überragt alle Gottheiten an Askese und heldischer Kraft. Darum suche ich Schutz bei jenem Rudra, frei von Krankheit und Kummer, mit verfilzten Locken, mit einem Kranz aus Schädeln, der Bhagas Auge zerstörte, der Sünde tilgt, der den Dreizack trägt und auf dem Berge ruht.“
Verse 34
कपालमालिन रुद्रं भगनेत्रहरं हरम् । स हि देवो>त्यगाद् देवांस्तपसा विक्रमेण च । तस्माच्छरणमभ्येमि गिरिशं शूलपघाणिनम्,“भगवान् शंकर तपस्या और पराक्रममें सब देवताओंसे बढ़कर हैं; अतः मैं उन्हीं रोग- शोकसे रहित, जटाजूटधारी, देवताओंके भी देवता, भगवती उमाके प्राणवल्लभ, कपाल- मालाधारी, भगनेत्र-विनाशक, पापहारी, त्रिशूलधारी एवं पर्वतपर शयन करनेवाले रुद्रदेवकी शरणमें जाता हूँ
Sañjaya sprach: „Ich suche Zuflucht bei Rudra — Hara —, der einen Schädelkranz trägt und Bhagas Auge zerstörte. Denn dieser Gott überragt die anderen Götter durch Askese und heldische Kraft. Darum gehe ich, um Schutz zu finden, zu Giriśa, dem Träger des Dreizacks.“
Verse 126
रथशक्तिं मुमोचासौ दीप्तामग्निशिखामिव । अश्वत्थामाने जो-जो बाण छोड़े, उन सबको वह महाभूत निगल गया। अपने बाण- समूहोंको व्यर्थ हुआ देख अभश्रवत्थामाने प्रज्वलित अग्निशिखाके समान देदीप्यमान रथशक्ति छोड़ी
Sañjaya sprach: Als er sah, dass seine Pfeilsalven wirkungslos geworden waren, schleuderte Aśvatthāmā eine lodernde ratha-śakti, strahlend wie eine Feuerzunge. Die Szene macht deutlich, wie im Rausch des Krieges die Frustration über vereitelte Mühe die Kämpfenden zu immer zerstörerischeren Waffen treibt und die Gewalt über jedes Maß hinaus steigert.
Verse 143
कोशात् समुद्वरर्हाशु बिलाद् दीप्तमिवोरगम् । तब अभश्व॒त्थामाने सोनेकी मूठसे सुशोभित तथा आकाशके समान निर्मल कान्तिवाली अपनी दिव्य तलवार तुरंत ही म्यानसे बाहर निकाली, मानो प्रज्वलित सर्पको बिलसे बाहर निकाला गया हो
Sañjaya sprach: Dann zog Aśvatthāmā rasch sein göttliches Schwert aus der Scheide — hell, makellos und wie der Himmel glänzend, der Griff geschmückt für festen Halt —, als zöge man eine brennende Schlange aus ihrem Loch. Das Bild betont das plötzliche, gefährliche Entfesseln der Gewalt im Nachhall der Nacht, wenn Zorn und Entschlossenheit jede Selbstzucht überdecken.
Verse 153
स तदासाद्य भूतं वै बिलं नकुलवद् ययौ । फिर बुद्धिमान् द्रोणपुत्रने वह अच्छी-सी तलवार तत्काल ही उस महाभूतपर चला दी; परंतु वह उसके शरीरमें लगकर उसी तरह विलीन हो गयी, जैसे कोई नेवला बिलमें घुस गया हो
Sañjaya sprach: Als er jenes Wesen erreicht hatte, glitt es in eine Höhle davon, wie ein Mungo, der in seinen Bau schießt. Die Szene betont die Vergeblichkeit roher Gewalt gegenüber einer geheimnisvollen, übermenschlichen Gegenwart und deutet die moralische Zerrüttung des nächtlichen Überfalls an — wo Gewalt auf Kräfte trifft, die sich der gewöhnlichen Kontrolle entziehen.
Verse 166
ज्वलन्तीं प्राहिणोत् तस्मै भूतं तामपि चाग्रसत् । तदनन्तर कुपित हुए अश्वत्थामाने उसके ऊपर अपनी इन्द्रध्वजके समान प्रकाशित होनेवाली गदा चलायी; परंतु वह भूत उसे भी लील गया
Sañjaya sprach: Er schleuderte eine lodernde Waffe nach ihm, doch jenes Wesen verschlang auch sie. Dann, von Zorn entbrannt, warf Aśvatthāmā eine Keule, die wie Indras Banner leuchtete; aber der Geist verschlang selbst die Keule mühelos. Die Szene betont die moralische Verkehrung des nächtlichen Überfalls: Wenn Gewalt von Dharma losgelöst ist, verlieren menschliche Kraft und Waffen ihre rechtmäßige Wirksamkeit vor dunklen, unheimlichen Mächten.
Verse 183
तप्त: कृपवाक्यमनुस्मरन् । अस्त्रहीन अश्वत्थामा यह अत्यन्त अद्भुत दृश्य देखकर कृपाचार्यके वचनोंको बारंबार स्मरण करता हुआ अत्यन्त संतप्त हो उठा और मन-ही-मन इस प्रकार कहने लगा --
Sañjaya sprach: Waffenlos und vor Schmerz brennend, Aśvatthāmā — nachdem er ein überaus erstaunliches Schauspiel gesehen hatte — rief sich immer wieder die Worte des Ācārya Kṛpa ins Gedächtnis. Von Reue und innerer Qual überwältigt, begann er zu sich selbst zu sprechen, als wöge er die moralische Folge dessen ab, was er zu tun im Begriff war.
Verse 206
स पथ: प्रच्युतो धर्मात् कुपथे प्रतिहन्यते । 'जो मूर्ख शास्त्रदर्शी पुरुषोंकी आज्ञाका उल्लंघन करके दूसरोंकी हिंसा करना चाहता है, वह धर्ममार्गसे भ्रष्ट हो कुमार्गमें पड़कर स्वयं ही मारा जाता है
Sañjaya sprach: Wer vom Dharma abfällt, gerät vom rechten Pfad ab; betritt er den falschen Weg, so wird er dort niedergeschlagen—vernichtet durch die Gewalt und Gesetzlosigkeit, die er selbst erwählt. Der Tor, der die Weisung der schriftkundigen Weisen missachtet und anderen Schaden zufügen will, weicht vom Dharmaweg ab, fällt in den Unweg und wird zuletzt durch sein eigenes Tun zugrunde gerichtet.
Verse 236
अमार्गेणैवमार भ्य घोरामापदमागत: । “इस प्रकार गुरुजनोंने पहले-से ही सब लोगोंको सदाके लिये यह शिक्षा दे रखी है। परंतु मैं उस शास्त्रोक्त सनातन मार्गका उल्लंघन करके बिना रास्तेके ही चलकर इस प्रकार अनुचित कर्मका आरम्भ करके भयंकर आपत्तिमें पड़ गया हूँ
Sañjaya sprach: „Indem ich auf einem pfadlosen Kurs aufbrach—ein Vorhaben außerhalb des gebilligten Weges begann—bin ich in ein schreckliches Unheil geraten. Obwohl die Ältesten seit langem allen den ewigen, in den Schriften verankerten Pfad gelehrt haben, habe ich diese unvergängliche Ordnung verletzt; ohne rechten Weg ging ich voran, begann eine unziemliche Tat und trat so in furchtbare Bedrängnis ein.“
Verse 263
स पथ: प्रच्युतो धर्माद् विपदं प्रतिपद्यते । “मानव-कर्म (पुरुषार्थ)-को दैवसे बढ़कर नहीं बताया गया है। पुरुषार्थ करते समय यदि दैववश सिद्धि नहीं प्राप्त हुई तो मनुष्य धर्ममार्गसे भ्रष्ट होकर विपत्तिमें फँस जाता है
Sañjaya sprach: Wenn ein Mensch vom Pfad des Dharma abgleitet, gerät er ins Unheil. Zwar wird menschliches Bemühen (puruṣārtha) gerühmt; doch wenn der Erfolg aus Schicksalsgründen ausbleibt, kann der Mensch—seiner Standhaftigkeit im rechten Handeln beraubt—vom sittlichen Weg abirren und im Unglück gefangen sein.
Verse 323
दैवदण्डमिमं घोरं स हि मे नाशयिष्यति । 'दैवकी अनुकूलताके सिवा दूसरा कोई उपाय नहीं है, जिससे किसी प्रकार फिर यहाँ युद्धविषयक उद्योग किया जा सके; इसलिये आज मैं सर्वव्यापी भगवान् महादेवजीकी शरण लेता हूँ। वे ही मेरे सामने आये हुए इस भयानक दैवदण्डका नाश करेंगे
Sañjaya sprach: „Dieser schreckliche Stab des Schicksals—diese göttliche Strafe—wird mich gewiss vernichten.“
Aśvatthāmā confronts the tension between retaliatory intent and śāstra-defined restraints—especially the impropriety of targeting protected or vulnerable categories—while recognizing that transgressive motivation can invite immediate obstruction (pratighāta).
The narrative teaches that force is not universally efficacious: when action departs from dharmic alignment, agency encounters limits; discernment, accountability, and recourse to higher order (daiva/īśvara) become the corrective frame.
No formal phalaśruti is stated here; the meta-commentary functions implicitly through Aśvatthāmā’s self-diagnosis—linking adharmic resolve to karmic reversal—and through the theological pivot toward Mahādeva as the narrative’s interpretive key.