सोपान-प्रवेश: ‘भक्ति का बीज’—मन का प्रथम संस्कार। बालकाण्ड में कथा-रस के साथ साधक की दृष्टि निर्मल होती है: जगत-लीला (माया) का सूक्ष्म ज्ञान, गुरु/संत-वाणी का आश्रय, और राम-नाम की ओर अंतर्मुखता। इस खंड में नारद-प्रसंग दिखाता है कि अहं-आकांक्षा (रूप-लालसा) भी देव-लीला में साधन बनकर अंततः वैराग्य/शरणागति की सीढ़ी बनती है।
এই খণ্ড-খণ্ডিকা (দোহা ১৩০–১৩৯) বালকাণ্ডের মধ্যে ‘মায়া-বিনোদ’ ও ‘অনুগ্রহ-প্রবোধ’-এর তীব্র রস-পরিবর্তন রচনা করে। শুরুতে শৃঙ্গার/অদ্ভুত-রস: নগর-বৈভব, রাজকুমারীর রূপ, স্বয়ংবরের চাঞ্চল্য। তারপর হাস্যরস ও ব্যঙ্গ: নারদের রূপ-আকাঙ্ক্ষায় হরির ‘কূট-করুণা’—কুরূপতা দিয়ে অহং ভেদ। এরপর রৌদ্র-রস: নারদের ক্রোধ, রুদ্রগণকে শাপ; এবং শেষে শান্ত/করুণ-রস: হরির দ্বারা মায়া-নিবৃত্তি, শিব-নাম-জপের উপদেশ, ও রুদ্রগণকে মুক্তির আশ্বাস। ধর্মতত্ত্বের দৃষ্টিতে এ প্রসঙ্গ ভক্তিমার্গের ‘অন্তঃশুদ্ধি’কে কেন্দ্রে রাখে: দেবতা-সন্তও মায়ায় বিচলিত হতে পারেন, কিন্তু প্রভুর লীলা শেষে সাধককে নাম, বিনয় এবং শিব-রাম-ঐক্যের দিকে স্থির করে।
চৌপাই 130.1-4
बसहिं नगर सुंदर नर नारी।जनु बहु मनसिज रति तनुधारी।।
तेहिं पुर बसइ सीलनिधि राजा।अगनित हय गय सेन समाजा।।
सत सुरेस सम बिभव बिलासा।रूप तेज बल नीति निवासा।।
बिस्वमोहनी तासु कुमारी।श्री बिमोह जिसु रूपु निहारी।।
सोइ हरिमाया सब गुन खानी।सोभा तासु कि जाइ बखानी।।
करइ स्वयंबर सो नृपबाला।आए तहँ अगनित महिपाला।।
मुनि कौतुकी नगर तेहिं गयऊ।पुरबासिन्ह सब पूछत भयऊ।।
सुनि सब चरित भूपगृहँ आए।करि पूजा नृप मुनि बैठाए।।
basahiṁ nagara sundara nara nārī |janu bahu manasija rati tanu-dhārī ||
tēhiṁ pura basai sīla-nidhi rājā |aganita haya gaya sēna samājā ||
sata surēsa sama bibhava bilāsā |rūpa tēja bala nīti nivāsā ||
biswa-mōhinī tāsu kumārī |śrī bimōha jisu rūpu nihārī ||
soi hari-māyā saba guna khānī |sōbhā tāsu ki jāi bakhānī ||
karai svayaṁbara sō nṛpa-bālā |āē tahaṁ aganita mahi-pālā ||
muni kautukī nagara tēhiṁ gayau |pura-bāsinha saba pūchata bhayau ||
suni saba carita bhūpa-gṛhaṁ āē |kari pūjā nṛpa muni baiṭhāē ||
সেই নগরীতে বাস করত সুন্দর নর-নারী, যেন অসংখ্য মন্মথ ও রতি দেহধারণ করেছেন। সেই নগরীতে বাস করতেন শীলনিধি নামে এক রাজা, যাঁর অগণিত অশ্ব, গজ ও সেনাসমূহ ছিল। তাঁর ঐশ্বর্য ও বিলাস শত ইন্দ্রের সমান; রূপ, তেজ, বল ও নীতিতে তিনি বাসস্থান। তাঁর কন্যা ছিল বিশ্বমোহিনী, যার রূপ দেখে শ্রী অর্থাৎ লক্ষ্মীও মুগ্ধ হয়ে যান। সেই ছিল হরির মায়া, সর্বগুণের খনি; তার সৌন্দর্য কীভাবে বর্ণনা করা যায়? সেই রাজকন্যার স্বয়ম্বর অনুষ্ঠিত হচ্ছিল, এবং সেখানে অগণিত ভূপতি উপস্থিত হলেন। কৌতূহলী মুনি সেই নগরীতে গেলেন, এবং নগরবাসীদের সবাইকে জিজ্ঞাসা করলেন কী হচ্ছে। সব বৃত্তান্ত শুনে তিনি রাজপ্রাসাদে গেলেন, এবং রাজা মুনিকে পূজা করে বসালেন।
দোহা 130
आनि देखाई नारदहि भूपति राजकुमारि।कहहु नाथ गुन दोष सब एहि के हृदयँ बिचारि।।130।।
āni dekhāī nāradahi bhūpati rājakumāri |kahahu nātha guna doṣa saba ehi ke hṛdayã bicāri ||130||
রাজা রাজকন্যাকে এনে নারদকে দেখালেন, এবং বললেন: নাথ, আপনার হৃদয়ে বিচার করে তার সমস্ত গুণ ও দোষ আমাকে বলুন।
চৌপাই 131.1-4
देखि रूप मुनि बिरति बिसारी।बड़ी बार लगि रहे निहारी।।
लच्छन तासु बिलोकि भुलाने।हृदयँ हरष नहिं प्रगट बखाने।।
जो एहि बरइ अमर सोइ होई।समरभूमि तेहि जीत न कोई।।
सेवहिं सकल चराचर ताही।बरइ सीलनिधि कन्या जाही।।
लच्छन सब बिचारि उर राखे।कछुक बनाइ भूप सन भाषे।।
सुता सुलच्छन कहि नृप पाहीं।नारद चले सोच मन माहीं।।
करौं जाइ सोइ जतन बिचारी।जेहि प्रकार मोहि बरै कुमारी।।
जप तप कछु न होइ तेहि काला।हे बिधि मिलइ कवन बिधि बाला।।
dekhi rūpa muni birati bisārī |baṛī bāra lagi rahe nihārī ||
lacchana tāsu biloki bhulāne |hṛdayaṁ haraṣa nahiṁ pragaṭa bakhāne ||
jo ehi barai amara soi hoī |samarabhūmi tehi jīta na koī ||
sevahiṁ sakala carācara tāhī |barai sīlanidhi kanyā jāhī ||
lacchana saba bicāri ura rākhe |kacchuka banāi bhūpa sana bhāṣe ||
sutā sulacchana kahi nṛpa pāhīṁ |nārada cale soca mana māhīṁ ||
karauṁ jāi soi jatana bicārī |jehi prakāra mohi barai kumārī ||
japa tapa kacchu na hoi tehi kālā |he bidhi milai kavan bidhi bālā ||
তার রূপ দেখে মুনি বৈরাগ্য ভুলে গেলেন, এবং বহুক্ষণ ধরে তাকে দেখছেন রইলেন। তার লক্ষণগুলি দেখে তিনি বিভ্রান্ত হলেন; হৃদয়ে আনন্দ ভরল, কিন্তু তিনি তা প্রকাশ্যে ব্যক্ত করলেন না। যে এই কন্যাকে বিবাহ করবে সেই অমর হবে, এবং যুদ্ধভূমিতে কেউ তাকে জয় করতে পারবে না। সমস্ত চর ও অচর সেই ব্যক্তিকে সেবা করবে, যাকে শীলনিধির কন্যা স্বামী রূপে বরণ করবে। তিনি সমস্ত লক্ষণ হৃদয়ে গোপন রাখলেন, এবং রাজার সঙ্গে কিঞ্চিৎ সুসজ্জিত করে কথা বললেন। রাজাকে বললেন যে তার কন্যার শুভ লক্ষণ আছে, নারদ চলে গেলেন, মনে চিন্তা নিয়ে। যাই এবং এমন উপায় ভাবি, যেন এই কুমারী আমাকে স্বামী রূপে বরণ করে। এই সময়ে কোনো জপ বা তপ কাজে আসবে না। হে বিধাতা, কী উপায়ে আমি এই বালিকাকে পাব?
দোহা 131
एहि अवसर चाहिअ परम सोभा रूप बिसाल।जो बिलोकि रीझै कुअँरि तब मेलै जयमाल।।131।।
ehi avasara cāhi'a parama sobhā rūpa bisāla |jo biloki rījhai kuaṁri taba melai jayāmāla ||131||
এই সময়ে আমার পরম সৌন্দর্য ও বিশাল রূপ প্রয়োজন, যাতে রাজকন্যা আমাকে দেখে মুগ্ধ হয়ে তখন বিজয়মাল্য আমার গলে পরায়।
চৌপাই 132.1-4
हरि सन मागौं सुंदरताई।होइहि जात गहरु अति भाई।।
मोरें हित हरि सम नहिं कोऊ।एहि अवसर सहाय सोइ होऊ।।
बहुबिधि बिनय कीन्हि तेहि काला।प्रगटेउ प्रभु कौतुकी कृपाला।।
प्रभु बिलोकि मुनि नयन जुड़ाने।होइहि काजु हिएँ हरषाने।।
अति आरति कहि कथा सुनाई।करहु कृपा करि होहु सहाई।।
आपन रूप देहु प्रभु मोही।आन भाँति नहिं पावौं ओही।।
जेहि बिधि नाथ होइ हित मोरा।करहु सो बेगि दास मैं तोरा।।
निज माया बल देखि बिसाला।हियँ हँसि बोले दीनदयाला।।
hari sana māgaũ̃ sundaratāī.hoihi jāta gaharu ati bhāī..
moreṁ hita hari sama nahiṁ koū.ehi avasara sahāya soi hoū..
bahubidhi binaya kīnhi tehi kālā.pragaṭeu prabhu kautūkī kṛpālā..
prabhu biloki muni nayana juṛāne.hoihi kāju hiē̃ haraṣāne..
ati ārati kahi kathā sunāī.karahu kṛpā kari hohu sahāī..
āpana rūpa dehu prabhu mohī.āna bhā̃ti nahiṁ pāvaũ̃ ohī..
jehi bidhi nātha hoi hita morā.karahu so begi dāsa maiṁ torā..
nija māyā bala dekhi bisālā.hiyã hãsi bole dīnadayālā..
হরির কাছে সৌন্দর্য চাইব। কিন্তু সেখানে গেলে ভাই, অত্যন্ত বিলম্ব হবে। আমার কল্যাণে হরির সমান আর কেউ নেই। এই সময়ে তিনিই যেন আমার সাহায্যকারী হন। সেই সময় তিনি নানাভাবে বিনতি করলেন, এবং কৌতুকী কৃপালু প্রভু প্রকটিত হলেন। প্রভুকে দেখে মুনির নয়ন শীতল হল, এবং কাজ হবে ভেবে হৃদয়ে আনন্দিত হলেন। অত্যন্ত আরতি নিয়ে কথা শুনিয়ে বললেন, কৃপা করুন এবং সাহায্যকারী হোন। আপন রূপ আমাকে দিন হে প্রভু, অন্যভাবে আমি তাকে পাব না। যেভাবে হে নাথ আমার হিত হবে, তাই শীঘ্র করুন, আমি আপনার দাস। নিজ মায়ার বিশাল বল দেখে দীনদয়ালু প্রভু হৃদয়ে হেসে বললেন।
দোহা 132
जेहि बिधि होइहि परम हित नारद सुनहु तुम्हार।सोइ हम करब न आन कछु बचन न मृषा हमार।।132।।
jehi bidhi hoihi param hita nārada sunahu tumhāra |soi hama karaba na āna kachu bacana na mṛṣā hamāra ||132||
শোনো নারদ, যেভাবে তোমার পরম হিত সম্পন্ন হবে, একমাত্র সেটাই আমি করব, অন্য কিছু নয়; আমার কথা মিথ্যা নয়।
চৌপাই 133.1-4
कुपथ माग रुज ब्याकुल रोगी।बैद न देइ सुनहु मुनि जोगी।।
एहि बिधि हित तुम्हार मैं ठयऊ।कहि अस अंतरहित प्रभु भयऊ।।
माया बिबस भए मुनि मूढ़ा।समुझी नहिं हरि गिरा निगूढ़ा।।
गवने तुरत तहाँ रिषिराई।जहाँ स्वयंबर भूमि बनाई।।
निज निज आसन बैठे राजा।बहु बनाव करि सहित समाजा।।
मुनि मन हरष रूप अति मोरें।मोहि तजि आनहि बारिहि न भोरें।।
मुनि हित कारन कृपानिधाना।दीन्ह कुरूप न जाइ बखाना।।
सो चरित्र लखि काहुँ न पावा।नारद जानि सबहिं सिर नावा।।
kupatha māga ruja byākula rogī |baida na dei sunahu muni jogī ||
ehi bidhi hita tumhār maiṁ ṭhayaū̃ |kahi asa antara-hita prabhu bhayaū ||
māyā bibasa bhae muni mūṛhā |samujhī nahiṁ hari girā nigūṛhā ||
gavane turata tahā̃ riṣirāī |jahā̃ svayambara bhūmi banāī ||
nija nija āsana baiṭhe rājā |bahu banāva kari sahita samājā ||
muni mana haraṣa rūpa ati moreṁ |mohi taji ānahi bārihi na bhoreṁ ||
muni hita kārana kṛpā-nidhānā |dīnh kurūpa na jāi bakhānā ||
so caritra lakhi kāhũ na pāvā |nārada jāni sabahiṁ sira nāvā ||
শোনো, হে মুনি ও যোগী: যখন কোনো রোগী ব্যাধিতে ক্লান্ত হয়ে ক্ষতিকর খাদ্য চায়, তখন বৈদ্য তা দেন না। এইভাবেই আমি তোমার কল্যাণের জন্য স্থির করেছি। এই বলে প্রভু অন্তর্হিত হলেন। মুনি মায়ার বশীভূত হয়ে মূঢ় হলেন, এবং হরির গভীর ও গোপন বাক্যের অর্থ বুঝতে পারলেন না। সেই ঋষিশ্রেষ্ঠ তৎক্ষণাৎ সেই স্থানে গেলেন, যেখানে স্বয়ম্বরের মণ্ডপ নির্মিত হয়েছিল। রাজারা নিজ নিজ আসনে বসলেন, বহু আভরণ ধারণ করে, সমাজসহ। মুনি মনে আনন্দিত হলেন: আমার রূপ এত অতুলনীয় যে সে আমাকে ত্যাগ করে অন্যকে বরণ করবে না। মুনির হিতের জন্য কৃপানিধান প্রভু তাঁকে এমন কুরূপ দিলেন যা বর্ণনা করা যায় না। প্রভুর এই চরিত্র কেউ বুঝতে পারল না। নারদ জেনে সকলে তাঁর প্রতি মস্তক নত করলেন।
দোহা 133
रहे तहाँ दुइ रुद्र गन ते जानहिं सब भेउ।बिप्रबेष देखत फिरहिं परम कौतुकी तेउ।।133।।
rahe tahā̃ dui rudra gana te jānahĩ saba bheu |biprabēṣa dēkhata firahĩ parama kautukī teu ||133||
রুদ্রের দুই গণ সেখানে উপস্থিত ছিল, তারা সব রহস্য জানত। ব্রাহ্মণের ছদ্মবেশে তারা ঘুরে বেড়াত দেখতে, কারণ তারা সেই দৃশ্যে অত্যন্ত আনন্দিত ছিল।
চৌপাই 134.1-4
जेंहि समाज बैंठे मुनि जाई।हृदयँ रूप अहमिति अधिकाई।।
तहँ बैठ महेस गन दोऊ।बिप्रबेष गति लखइ न कोऊ।।
करहिं कूटि नारदहि सुनाई।नीकि दीन्हि हरि सुंदरताई।।
रीझहि राजकुअँरि छबि देखी।इन्हहि बरिहि हरि जानि बिसेषी।।
मुनिहि मोह मन हाथ पराएँ।हँसहिं संभु गन अति सचु पाएँ।।
जदपि सुनहिं मुनि अटपटि बानी।समुझि न परइ बुद्धि भ्रम सानी।।
काहुँ न लखा सो चरित बिसेषा।सो सरूप नृपकन्याँ देखा।।
मर्कट बदन भयंकर देही।देखत हृदयँ क्रोध भा तेही।।
jeṁhi samāja baiṁṭhe muni jāī |hṛdayaṁ rūpa ahamiti adhikāī ||
tahaṁ baiṭha mahesa gana doū |bipra-beṣa gati lakhai na koū ||
karahiṁ kūṭi nāradahi sunāī |nīkī dīnhi hari suṁdaratāī ||
rījhahi rājakuãri chabi dekhī |inhahi barihi hari jāni biseṣī ||
munihi moha mana hātha parāẽ |haṁsahiṁ saṁbhu gana ati sacu pāẽ ||
jadapi sunahiṁ muni aṭapaṭi bānī |samujhi na parai buddhi bhrama sānī ||
kāhuṁ na lakhā so carita biseṣā |so sarūpa nṛpakanyā̃ dekhā ||
markaṭa badana bhayaṁkara dehī |dekhata hṛdayaṁ krodha bhā tehī ||
যে সভায় মুনি গিয়ে বসলেন, সেখানে তাঁর হৃদয়ে নিজের রূপের অহংকার অত্যন্ত বৃদ্ধি পেল। সেখানে মহেশের দুই গণও ব্রাহ্মণের ছদ্মবেশে বসে ছিলেন, এবং কেউ তাঁদের গতি বুঝতে পারল না। তাঁরা কৌশলে নারদকে শোনাবার জন্য বললেন, হরি তাঁকে অপূর্ব সুন্দরতা দিয়েছেন। রাজকন্যা তাঁর ছবি দেখে মুগ্ধ হবেন, এবং তাঁকে বিশেষভাবে হরি জেনে তাঁকেই বর মনোনীত করবেন। মুনির মন মোহগ্রস্ত হয়ে অন্যের হাতে চলে গেল, শম্ভুর গণেরা অত্যন্ত আনন্দ পেয়ে হাসলেন। যদিও মুনি তাঁদের অদ্ভুত বাক্য শুনলেন, তবু বুঝতে পারলেন না, কারণ তাঁর বুদ্ধি ভ্রমে আচ্ছন্ন ছিল। অন্য কেউ সেই বিশেষ ঘটনা দেখতে পারল না, সেই রূপ কেবল রাজকন্যা দেখলেন। বানরের মুখ ও ভয়ঙ্কর দেহ নিয়ে, তাঁকে দেখে তাঁর হৃদয়ে ক্রোধ জন্মাল।
দোহা 134
सखीं संग लै कुअँरि तब चलि जनु राजमराल।देखत फिरइ महीप सब कर सरोज जयमाल।।134।।
sakhīṁ saṅga lai kuãri taba cali janu rāja-marāla |dekhata phirai mahīpa saba kara saroja jayamāla ||134||
তখন রাজকন্যা সখীদের সঙ্গে নিয়ে রাজহংসের ন্যায় চলতে লাগলেন, পদ্মহস্তে জয়মালা ধারণ করে সমস্ত রাজাদের দেখতে দেখতে ফিরতে লাগলেন।
চৌপাই 135.1-4
जेहि दिसि बैठे नारद फूली।सो दिसि देहि न बिलोकी भूली।।
पुनि पुनि मुनि उकसहिं अकुलाहीं।देखि दसा हर गन मुसकाहीं।।
धरि नृपतनु तहँ गयउ कृपाला।कुअँरि हरषि मेलेउ जयमाला।।
दुलहिनि लै गे लच्छिनिवासा।नृपसमाज सब भयउ निरासा।।
मुनि अति बिकल मोंहँ मति नाठी।मनि गिरि गई छूटि जनु गाँठी।।
तब हर गन बोले मुसुकाई।निज मुख मुकुर बिलोकहु जाई।।
अस कहि दोउ भागे भयँ भारी।बदन दीख मुनि बारि निहारी।।
बेषु बिलोकि क्रोध अति बाढ़ा।तिन्हहि सराप दीन्ह अति गाढ़ा।।
jehi disi baiṭhe nārada phūlī.so disi dehi na bilokī bhūlī..
puni puni muni ukasahiṁ akulāhīṁ.dekhi dasā hara-gaṇa musakāhīṁ..
dhari nṛpa-tanu tahaṁ gayau kṛpālā.kuaṁri haraṣi meleu jaya-mālā..
dulahini lai ge lacchini-vāsa.nṛpa-samāja saba bhayau nirāsā..
muni ati bikala moṁhaṁ mati nāṭhī.mani giri gaī chūṭi janu gāṁṭhī..
taba hara gana bole musukāī.nija mukha mukura bilokahu jāī..
asa kahi dou bhāge bhayaṁ bhārī.badana dīkha muni bāri nihārī..
beṣu biloki krodha ati bāṛhā.tinhahi sarāpa dīnha ati gāṛhā..
যে দিকে নারদ গর্বে ফুলে বসেছিলেন, রাজকন্যা ভুলেও সেদিকে দৃষ্টি দিতেন না। বারবার মুনি অস্থির হয়ে আসন থেকে উঠতেন; তাঁর অবস্থা দেখে শিবের অনুচরেরা হাসিতেন। কৃপালু রাজার রূপ ধরে সেখানে গেলেন; রাজকন্যা আনন্দে তাঁকে জয়মালা পরালেন। লক্ষ্মীপতি বধূকে নিয়ে নিজ ধামে গেলেন; রাজাদের সমাবেশ সব নিরাশ হল। মুনি অতিশয় বিকল হলেন, তাঁর বুদ্ধি নষ্ট হল, যেন থলির গাঁথুনি খুলে মণি গিয়ে পড়ল। তখন শিবের অনুচরেরা হেসে বললেন, যাও নিজের মুখ আয়নায় দেখো। এই বলে তারা দুজন ভয়ে ভয়ে পালাল। মুনি জলে মুখ দেখে নিরীক্ষণ করলেন। নিজের বেশ দেখে তাঁর ক্রোধ অত্যন্ত বৃদ্ধি পেল, এবং তাদের দুজনকে তিনি কঠিন অভিশাপ দিলেন।
দোহা 135
होहु निसाचर जाइ तुम्ह कपटी पापी दोउ।हँसेहु हमहि सो लेहु फल बहुरि हँसेहु मुनि कोउ।।135।।
hohu nisācara jāi tumha kapaṭī pāpī dou |hãsehu hamahi so lehu phala bahuri hãsehu muni kou ||135||
যাও, তোমরা দুই কপটী পাপী, দৈত্য হও। তোমরা আমাকে হাসিয়েছিলে, সেই ফল এখন গ্রহণ করো। আর কখনও কোনো মুনিকে হাসিও না।
চৌপাই 136.1-4
पुनि जल दीख रूप निज पावा।तदपि हृदयँ संतोष न आवा।।
फरकत अधर कोप मन माहीं।सपदी चले कमलापति पाहीं।।
देहउँ श्राप कि मरिहउँ जाई।जगत मोर उपहास कराई।।
बीचहिं पंथ मिले दनुजारी।संग रमा सोइ राजकुमारी।।
बोले मधुर बचन सुरसाईं।मुनि कहँ चले बिकल की नाईं।।
सुनत बचन उपजा अति क्रोधा।माया बस न रहा मन बोधा।।
पर संपदा सकहु नहिं देखी।तुम्हरें इरिषा कपट बिसेषी।।
मथत सिंधु रुद्रहि बौरायहु।सुरन्ह प्रेरी बिष पान करायहु।।
puni jalu dīkha rūpa nija pāvā |tadapi hṛdayã santoṣa na āvā ||
pharakat adhara kopa mana māhī̃ |sapadī cale kamalāpati pāhī̃ ||
dehaũ śrāpa ki marihaũ jāī |jagata mora upahāsa karāī ||
bīcahĩ pantha mile danujārī |saṅga ramā soi rāja-kumārī ||
bole madhura bacana surasāī̃ |muni kahã cale bikala kī nāī̃ ||
sunata bacana upajā ati krodhā |māyā basa na rahā mana bodhā ||
para saṃpadā sakahu nahĩ dekhī |tumharẽ iriṣā kapaṭa biseṣī ||
mathata siṃdhu rudrahi baurāyahu |suranha prerī biṣa pāna karāyahu ||
তিনি পুনরায় জলে দেখে নিজের রূপ ফিরে পেলেন; তথাপি হৃদয়ে কোনো সন্তোষ এল না। তাঁর অধর কম্পিত হল, মনে ক্রোধ জাগল; তিনি তড়িঘড়ি করে কমলাপতির কাছে চললেন। যাই অভিশাপ দেব, নয়তো গিয়ে মরব, কারণ সে সারা জগতে আমার উপহাস করিয়েছে। মাঝপথে দানব-সংহারীর সঙ্গে তাঁর দেখা হল, যাঁর সঙ্গে ছিলেন রমা এবং সেই রাজকুমারী। দেবতাদের অধিপতি মধুর বচনে বললেন: মুনি কোথায় যাচ্ছেন, বিহ্বলের ন্যায়? এই বচন শুনে তাঁহার অত্যন্ত ক্রোধ উপজিল; মায়ার বশে মনের বোধ রইল না। অন্যের সম্পদ তুমি সহ্য করে দেখতে পারো না; তোমার ঈর্ষা ও কপটতা বিশেষভাবে প্রবল। সমুদ্র মন্থনের সময় তুমি রুদ্রকে উন্মত্ত করেছিলে, এবং দেবতাদের প্ররোচ দিয়ে বিষ পান করিয়েছিলে।
দোহা 136
असुर सुरा बिष संकरहि आपु रमा मनि चारु।स्वारथ साधक कुटिल तुम्ह सदा कपट ब्यवहारु।।136।।
asura surā biṣa saṅkarahi āpu ramā mani cāru |swāratha sādhaka kuṭila tumha sadā kapaṭa byavahāru ||136||
অসুরদের মদ্য দিলে, শঙ্করকে বিষ দিলে, আর নিজের জন্য রেখে দিলে রামা সুন্দর মণি। তুমি স্বার্থসাধক, কুটিল, সদা কপট ব্যবহারী।
চৌপাই 137.1-4
परम स्वतंत्र न सिर पर कोई।भावइ मनहि करहु तुम्ह सोई।।
भलेहि मंद मंदेहि भल करहू।बिसमय हरष न हियँ कछु धरहू।।
डहकि डहकि परिचेहु सब काहू।अति असंक मन सदा उछाहू।।
करम सुभासुभ तुम्हहि न बाधा।अब लगि तुम्हहि न काहूँ साधा।।
भले भवन अब बायन दीन्हा।पावहुगे फल आपन कीन्हा।।
बंचेहु मोहि जवनि धरि देहा।सोइ तनु धरहु श्राप मम एहा।।
कपि आकृति तुम्ह कीन्हि हमारी।करिहहिं कीस सहाय तुम्हारी।।
मम अपकार कीन्ही तुम्ह भारी।नारी बिरहँ तुम्ह होब दुखारी।।
parama svatantra na sira para koī |bhāvai manahi karahu tumha soī ||
bhalehi manda mandehi bhala karahū |bisamaya haraṣa na hiyã kacha chu dharahū ||
dahaki-dahaki paricehu saba kāhū |ati asaṅka mana sadā uchāhū ||
karama subhāsubha tumhahi na bādhā |aba lagi tumhahi na kāhū̃ sādhā ||
bhale bhavana aba bāyana dīnhā |pāvahuge phala āpana kīnhā ||
bãcehu mohi javani dhari dehā |soī tanu dharahu śrāpa mama ehā ||
kapi ākṛti tumha kīnhi hamārī |karihahĩ kīsa sahāya tumhārī ||
mama apakāra kīnhī tumha bhārī |nārī birahã tumha hoba dukhārī ||
তুমি পরম স্বতন্ত্র, তোমার মাথার ওপর কেউ নেই, তোমার মনে যা ভালো লাগে তাই তুমি করো। তুমি ভালোকে মন্দ এবং মন্দকে ভালো করে দাও, আর তোমার হৃদয়ে কোনো বিস্ময় বা আনন্দ ধারণ করো না। তুমি বারবার সবাইকে ঠকিয়েছ, তুমি অত্যন্ত নির্ভীক, আর তোমার মন সদা আনন্দে ভরা। শুভ ও অশুভ কর্ম তোমাকে বাঁধে না, আর এ পর্যন্ত কেউ তোমাকে শায়েস্তা করেনি। তুমি নিজ গৃহে আমাকে উত্তম আপ্যায়ন দিয়েছ, আর তুমি যা করেছ তার ফল পাবে। তুমি দেহ ধারণ করে আমাকে ঠকিয়েছ, সেই দেহই ধারণ করো। এটাই আমার অভিশাপ। তুমি আমাকে বানরের আকৃতি দিয়েছ, সুতরাং বানরেরা তোমার সাহায্যকারী হবে। তুমি আমার অপকার ভারী করেছ, সুতরাং স্ত্রীর বিরহে তুমি দুঃখী হবে।
দোহা 137
श्राप सीस धरी हरषि हियँ प्रभु बहु बिनती कीन्हि।निज माया कै प्रबलता करषि कृपानिधि लीन्हि।।137।।
śrāpa sīsa dharī haraṣi hiyã prabhu bahu binatī kīnhi.nija māyā kai prabalatā karaṣi kṛpānidhi līnhi..137..
প্রভু আনন্দিত হৃদয়ে শ্রাপ মস্তকে ধারণ করে মুনিকে অনেক বিনতী করলেন। তারপর করুণার ভাণ্ডার নিজ মায়ার প্রবল শক্তি প্রত্যাহার করে নিলেন।
চৌপাই 138.1-4
जब हरि माया दूरि निवारी।नहिं तहँ रमा न राजकुमारी।।
तब मुनि अति सभीत हरि चरना।गहे पाहि प्रनतारति हरना।।
मृषा होउ मम श्राप कृपाला।मम इच्छा कह दीनदयाला।।
मैं दुर्बचन कहे बहुतेरे।कह मुनि पाप मिटिहिं किमि मेरे।।
जपहु जाइ संकर सत नामा।होइहि हृदयँ तुरंत बिश्रामा।।
कोउ नहिं सिव समान प्रिय मोरें।असि परतीति तजहु जनि भोरें।।
जेहि पर कृपा न करहिं पुरारी।सो न पाव मुनि भगति हमारी।।
अस उर धरि महि बिचरहु जाई।अब न तुम्हहि माया निअराई।।
jaba hari māyā dūri nivārī |nahiṁ tahaṁ ramā na rājakumārī ||
taba muni ati sabhīta hari caranā |gahe pāhi pranatārati haranā ||
mṛṣā hou mama śrāpa kṛpālā |mama icchā kaha dīnadayālā ||
maiṁ durbacana kahe bahutere |kaha muni pāpa miṭihiṁ kimi mere ||
japahu jāi śaṅkara sata nāmā |hoihi hṛdayaṁ turaṁta biśrāmā ||
kou nahiṁ siva samāna priya moreṁ |asi paratīti tajahu jani bhoreṁ ||
jehi para kṛpā na karahiṁ purārī |so na pāva muni bhagati hamārī ||
asa ura dhari mahi bicarahu jāī |aba na tumhahi māyā niarāī ||
যখন হরি মায়া দূরে সরিয়ে দিলেন, তখন সেখানে রমা বা রাজকুমারী কেউ দেখা গেল না। তখন মুনি অতিশয় ভীত হয়ে হরির চরণ ধরলেন, বললেন, প্রণতের ক্লেশ হরণকারী, আমাকে রক্ষা করুন। মুনি বললেন, হে কৃপালু, আমার অভিশাপ মিথ্যা হোক। দীনদয়ালু ভগবান বললেন, আমার ইচ্ছা। মুনি বললেন, আমি অনেক কঠোর কথা বলেছি। বলুন, আমার পাপ কীভাবে মিটবে? ভগবান বললেন, গিয়ে শঙ্করের শতনাম জপ করো, তোমার হৃদয়ে তৎক্ষণাৎ শান্তি হবে। আমার কাছে শিবের সমান প্রিয় আর কেউ নেই। এই বিশ্বাস কখনো ভুলেও ত্যাগ করো না। যাঁর প্রতি পুরারী কৃপা করেন না, হে মুনি, সে আমার ভক্তি লাভ করতে পারে না। এই কথা হৃদয়ে ধরে তুমি পৃথিবীতে বিচরণ করতে যাও। এখন মায়া তোমার কাছে আসবে না।
দোহা 138
बहुबिधि मुनिहि प्रबोधि प्रभु तब भए अंतरधान।सत्यलोक नारद चले करत राम गुन गान।।138।।
bahubidhi munihi prabodhi prabhu taba bhae antardhāna.satyaloka nārada cale karata rāma guna gāna ||138||
বহুবিধে মুনিকে সান্ত্বনা দিয়ে প্রভু তখন অন্তর্ধান হলেন। সত্যলোকে নারদ চললেন, রামের গুণ গান করতে করতে।
চৌপাই 139.1-4
हर गन मुनिहि जात पथ देखी।बिगतमोह मन हरष बिसेषी।।
अति सभीत नारद पहिं आए।गहि पद आरत बचन सुनाए।।
हर गन हम न बिप्र मुनिराया।बड़ अपराध कीन्ह फल पाया।।
श्राप अनुग्रह करहु कृपाला।बोले नारद दीनदयाला।।
निसिचर जाइ होहु तुम्ह दोऊ।बैभव बिपुल तेज बल होऊ।भुजबल बिस्व जितब तुम्ह जहिआ।धरिहहिं बिष्नु मनुज तनु तहिआ।।
समर मरन हरि हाथ तुम्हारा।होइहहु मुकुत न पुनि संसारा।।
चले जुगल मुनि पद सिर नाई।भए निसाचर कालहि पाई।।
hara gana munihi jāta patha dekhī |bigata-moha mana haraṣa biseṣī ||
ati sabhīta nārada pahiṃ āe |gahi pada ārata bacana sunāe ||
hara gana hama na bipra munirāyā |baṛa aparādha kīnha phala pāyā ||
śrāpa anugraha karahu kṛpālā |bole nārada dīnadayālā ||
nisicara jāi hohu tumha doū |baibhava bipula teja bala hoū ||
bhuja-bala bisva jitaba tumha jahiā |dharihahiṃ biṣṇu manuja tanu tahiā ||
samara marana hari hātha tumhārā |hoiha hu mukuta na puni saṃsārā ||
cale jugala muni pada sira nāī |bhae nisācara kālahi pāī ||
শিবের গণরা দেখলেন মুনিকে পথে যাচ্ছেন, মোহমুক্ত হয়ে বিশেষ আনন্দে ভরে আছেন। অত্যন্ত ভীত হয়ে তারা নারদের কাছে এলেন, তাঁর চরণ ধরে বিষণ্ণ বাক্যে বললেন। "হে মুনিশ্রেষ্ঠ, আমরা শিবের গণ, ব্রাহ্মণ নই। বড় অপরাধ করে তার ফল পেয়েছি।" "হে কৃপালু, অভিশাপকে অনুগ্রহে পরিণত করুন।" দীনদয়ালু নারদ বললেন: "তোমরা দুজনে যাও, রাক্ষস হও। তোমাদের বিপুল ঐশ্বর্য, তেজ ও বল হোক।" "যখন তোমরা বাহুবলে বিশ্ব জয় করবে, তখন সেখানে বিষ্ণু মনুষ্য শরীর ধারণ করবেন।" "যুদ্ধে হরির হাতে তোমাদের মৃত্যু হবে। মুক্তি লাভ করবে, আর সংসারে ফিরে আসবে না।" দুজনে মুনির চরণে মাথা নত করে চলে গেলেন। কাল এলে রাক্ষস হয়ে জন্ম নিলেন।
দোহা 139
एक कलप एहि हेतु प्रभु लीन्ह मनुज अवतार।सुर रंजन सज्जन सुखद हरि भंजन भुबि भार।।139।।
eku kalapa ehi hetu prabhu līnha manuja avatāra |sura rañjana sajjana sukhada hari bhañjana bhuvi bhāra ||139||
এক কল্পে এই হেতুতে প্রভু মনুষ্য অবতার গ্রহণ করেছিলেন - হরি, যিনি দেবতাদের আনন্দিত করেন, সজ্জনদের সুখ দান করেন, এবং পৃথিবীর ভার হরণ করেন।
परंपरागत मान्यता में यह प्रसंग ‘माया-निवारण’ और ‘अहं-शमन’ का पाठ माना जाता है: काम्य-इच्छा, ईर्ष्या, और क्रोध से उत्पन्न विक्षेप शांत होते हैं तथा शिव-नाम/राम-नाम में श्रद्धा दृढ़ होती है। विशेष फल: ‘विवेक’ (भेद-बुद्धि) और ‘शरणागति’ की वृत्ति का जागरण।
लोक-परंपरा में माया-शमन और शरणागति हेतु ‘श्रीराम’ नाम-संपुट या ‘राम राम’ जप-सम्पुट जोड़ा जाता है; और इसी अंश के उपदेशानुसार ‘शिव-पंचाक्षरी’/‘शंकर के सत नाम’ का जप-सम्पुट भी संगत माना जाता है (स्थानीय संप्रदायानुसार भेद संभव)।
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
A free sign-in with Google or Apple keeps your chat saved across web and the app.