Opening the text
भक्ति-उद्गम की पहली सीढ़ी: ‘श्रद्धा’ से ‘श्रवण’ और ‘संशय-निवृत्ति’ तक। बालकाण्ड में रामकथा का प्रवेश-द्वार शिव–उमा संवाद है—जहाँ जिज्ञासा (उमा) गुरु-वाणी (शिव) से शुद्ध होकर ‘सगुण’ में ‘निर्गुण’ की पहचान सीखती है। यह सोपान साधक को बताता है कि मुक्ति का आरम्भ जन्म-कथा से नहीं, सही श्रोता-भाव और सही प्रश्न से होता है।
এই অংশটি বালকাণ্ডের সেই সন্ধিক্ষণে, যেখানে ‘শিব-বিবাহ’-এর মঙ্গলরস (উৎসব, পুষ্পবৃষ্টি, বাদ্যধ্বনি, দান-দেহেজ) ধীরে ধীরে ‘জিজ্ঞাসা-রস’-এ রূপান্তরিত হয়। প্রথম ভাগে দেবসমাজ, নারীগান, সিংহাসনের বৈভব, এবং উমার অনুপম মর্যাদা—এসবই ‘শৃঙ্গার/মঙ্গল’-কে ‘ধর্ম-সংস্কার’-এর বন্ধনে বেঁধে দেয়: এখানে বিবাহ কেবল লোকাচার নয়, শিব-শক্তির যোগে জগত-রক্ষার বিধান। তারপর ভরদ্বাজের হৃদয়ে প্রেম-লক্ষণ (রোমাঞ্চ, অশ্রু, বাক্যরোধ) জেগে ওঠে—এ ‘শ্রবণ-সিদ্ধি’র ইঙ্গিত। উমার প্রশ্ন (রাম: নৃপতিনন্দন না ব্রহ্ম?) মানববুদ্ধির চিরন্তন সংশয়। তুলসীর ধর্মতত্ত্ব এখানে এই—সগুণ লীলা (অযোধ্যার নৃপসুত) ও নির্গুণ তত্ত্ব (অজ, অগুণ, অলখ) পরস্পরবিরোধী নয়, একই সত্যের দুই মাত্রা; আর এই একত্বে প্রবেশ ঘটে গুরু-সংবাদে।
Verse 214 (चौपाई)
जसि बिबाह कै बिधि श्रुति गाई। महामुनिन्ह सो सब करवाई।। गहि गिरीस कुस कन्या पानी। भवहि समरपीं जानि भवानी।। पानिग्रहन जब कीन्ह महेसा। हिंयँ हरषे तब सकल सुरेसा।। बेद मंत्र मुनिबर उच्चरहीं। जय जय जय संकर सुर करहीं।। बाजहिं बाजन बिबिध बिधाना। सुमनबृष्टि नभ भै बिधि नाना।। हर गिरिजा कर भयउ बिबाहू। सकल भुवन भरि रहा उछाहू।। दासीं दास तुरग रथ नागा। धेनु बसन मनि बस्तु बिभागा।। अन्न कनकभाजन भरि जाना। दाइज दीन्ह न जाइ बखाना।।
jasi bibāha kai bidhi śruti gāī | mahāmuninh so saba karavāī || gahi girīsa kusa kanyā pānī | bhavahi samarapīṁ jāni bhavānī || pāni-grahana jaba kīnha mahesā | hiyã harṣe taba sakala sureśā || beda maṁtra munibara uccarahīṁ | jaya jaya jaya śaṅkara sura karahīṁ || bājahim bājana bibidha bidhānā | sumana-bṛṣṭi nabha bhai bidhi nānā || hara girijā kara bhayau bibāhū | sakala bhuvana bhari rahā ucchāhū || dāsīṁ dāsa turaga ratha nāgā | dhenu basana mani bastu bibhāgā || anna kanaka-bhājana bhari jānā | dāija dīnha na jāi bakhānā ||
যেমনভাবে শ্রুতিতে বিবাহের বিধি গাওয়া হয়েছে, মহামুনিগণ সেই সমস্ত বিধি সম্পাদন করালেন। কুশ হাতে নিয়ে গিরিশ কন্যার হাত গ্রহণ করলেন, ভবানীর মন জেনে তাঁকে ভবের কাছে সমর্পণ করলেন। যখন মহেশ পাণিগ্রহণ সম্পন্ন করলেন, তখন সকল দেবতারা হৃদয়ে আনন্দিত হলেন। শ্রেষ্ঠ মুনিগণ বেদমন্ত্র উচ্চারণ করলেন এবং দেবতারা জয় জয় জয় শঙ্কর বলে উচ্চারণ করলেন। বিভিন্ন বাদ্যযন্ত্র বেজে উঠল এবং আকাশ থেকে বিভিন্ন প্রকারে পুষ্পবৃষ্টি হল। এইভাবে হর ও গিরিজার বিবাহ সম্পন্ন হল, সমগ্র বিশ্ব উৎসবের আনন্দে পরিপূর্ণ হয়ে গেল। দাসী ও দাস, অশ্ব, রথ, হস্তী, গাভী, বস্ত্র, মণি এবং বিভিন্ন বস্তু, অন্ন ও স্বর্ণপাত্র পরিপূর্ণ, এই সমস্ত বিবাহের উপহার দেওয়া হল যা বর্ণনা করা সম্ভব নয়।
Verse 215 (छंद)
दाइज दियो बहु भाँति पुनि कर जोरि हिमभूधर कह्यो। का देउँ पूरनकाम संकर चरन पंकज गहि रह्यो।। सिवँ कृपासागर ससुर कर संतोषु सब भाँतिहिं कियो। पुनि गहे पद पाथोज मयनाँ प्रेम परिपूरन हियो।।
dāija diyo bahu bhā̃ti puni kara jori himabhūdhara kahyo | kā deū̃ pūranakāma saṅkara carana paṅkaja gahi rahyo || śivaṁ kṛpāsāgara sasura kara santoṣu saba bhā̃tihiṁ kiyo | puni gahe pada pāthoja mayanā̃ prema paripūrana hiyo ||
বহু প্রকারে বিবাহের উপহার দেওয়ার পর হিমালয় পুনরায় হাত জোড় করে বললেন, আমি কী দেব? শঙ্কর নিজেই পূর্ণকাম, আমি তাঁর পদ্মপদ ধরে রইলাম। শিব করুণার সাগর তাঁর শ্বশুরকে সর্বপ্রকারে সন্তুষ্ট করলেন এবং পুনরায় হিমালয় সেই পদ্মপদ ধরলেন, তাঁর মন ও হৃদয় প্রেমে পরিপূর্ণ হয়ে গেল।
Verse 216 (दोहा/सोरठा)
नाथ उमा मन प्रान सम गृहकिंकरी करेहु। छमेहु सकल अपराध अब होइ प्रसन्न बरु देहु।।101।।
nātha! umā mana prāna sama gṛha-kiṅkarī karehu | chamehu sakala aparādha aba hoi prasanna baru dehu ||101||
হে প্রভু! যে উমা আপনার মন ও প্রাণবায়ুর ন্যায় প্রিয়, তাঁকে আপনার গৃহের দাসী করে দিন। আমার সকল অপরাধ ক্ষমা করুন; এখন প্রসন্ন হয়ে কৃপা করে আমার বর দান করুন।
Verse 217 (चौपाई)
बहु बिधि संभु सास समुझाई। गवनी भवन चरन सिरु नाई।। जननीं उमा बोलि तब लीन्ही। लै उछंग सुंदर सिख दीन्ही।। करेहु सदा संकर पद पूजा। नारिधरमु पति देउ न दूजा।। बचन कहत भरे लोचन बारी। बहुरि लाइ उर लीन्हि कुमारी।। कत बिधि सृजीं नारि जग माहीं। पराधीन सपनेहुँ सुखु नाहीं।। भै अति प्रेम बिकल महतारी। धीरजु कीन्ह कुसमय बिचारी।। पुनि पुनि मिलति परति गहि चरना। परम प्रेम कछु जाइ न बरना।। सब नारिन्ह मिलि भेटि भवानी। जाइ जननि उर पुनि लपटानी।।
bahu bidhi sambhu sās samujhāī | gavanī bhavana carana siru nāī || jananīṁ umā boli taba līnhī | lai uchaṅga sundara sikha dīnhī || karehu sadā saṅkara pada pūjā | nāri dharamu pati deu na dūjā || bacana kahata bhare locana bārī | bahuri lāi ura līnhi kumārī || kata bidhi sṛjīṁ nāri jaga māhīṁ | parādhīna sapanehuṁ sukhu nāhīṁ || bhai ati prema bikala mahatārī | dhīraju kīnha kusamaya bicārī || puni puni milati parati gahi caranā | parama prema kachu jāi na baranā || saba nārinha mili bheṭi bhavānī | jāi janani ura puni lapaṭānī ||
বহু প্রকারে শম্ভুর শাশুড়ি তাঁকে উপদেশ দিলেন, তারপর তাঁর চরণে মাথা নত করে নিজ গৃহে ফিরে গেলেন। উমাকে ডেকে মাতা তাঁকে কোলে নিলেন এবং সুন্দর উপদেশ দিলেন, সর্বদা শঙ্করের পদ পূজা করবে, নারীর ধর্ম এই যে পতিই তার একমাত্র দেবতা। কথা বলার সময় তাঁর চোখে জল এল এবং পুনরায় কুমারীকে বুকে টেনে নিলেন। এই জগতে নারীকে কীভাবে সৃষ্টি করা হল, পরাধীন হয়ে স্বপ্নেও সুখ নেই। মাতা অত্যন্ত প্রেমে বিকল হয়ে গেলেন, তবু ধৈর্য ধরলেন কুসময় ভেবে। বারবার মিললেন এবং চরণ ধরলেন, এই পরম প্রেম বর্ণনা করা যায় না। সকল নারী মিলে ভবানীকে দেখতে গেলেন এবং তিনি পুনরায় মাতার হৃদয়ে আশ্রয় নিলেন।
Verse 218 (छंद)
जननिहि बहुरि मिलि चली उचित असीस सब काहूँ दईं। फिरि फिरि बिलोकति मातु तन तब सखीं लै सिव पहिं गई।। जाचक सकल संतोषि संकरु उमा सहित भवन चले। सब अमर हरषे सुमन बरषि निसान नभ बाजे भले।।
jananihi bahuri mili calī ucita asīsa saba kāhū̃ daī̃ | phiri-phiri bilokati mātu tana taba sakhī̃ lai siva paĩ gaī || jācaka sakala santoṣi saṅkaru umā sahita bhavana cale | saba amara haraṣe sumana baraṣi nisāna nabha bāje bhale ||
মাতাকে পুনরায় মিলে সকলকে যথোচিত আশীর্বাদ দিয়ে চললেন, বারবার মাতার দেহের দিকে তাকালেন, তারপর সখীদের সাথে নিয়ে শিবের কাছে গেলেন। শঙ্কর সকল প্রার্থীকে সন্তুষ্ট করে উমাকে নিয়ে নিজ ভবনে চললেন এবং সকল অমরগণ আনন্দিত হলেন, পুষ্পবৃষ্টি করলেন এবং আকাশে শুভ নিশান বেজে উঠল।
Verse 219 (दोहा/सोरठा)
चले संग हिमवंतु तब पहुँचावन अति हेतु। बिबिध भाँति परितोषु करि बिदा कीन्ह बृषकेतु।।102।।
cale saṅga himavantu taba pahũcāvana ati hetu | bibidha bhā̃ti paritoṣu kari bidā kīnha bṛṣaketu ||102||
তখন হিমবান তাঁদের বিদায় দিতে, তাঁদের দর্শনে অত্যন্ত আগ্রহী হয়ে, সঙ্গে চলিলেন। আর বৃ্ষকেতু নানাভাবে তাঁকে সম্মান করে সম্পূর্ণ তৃপ্ত করিয়া, বিদায় গ্রহণের অনুমতি দিলেন।
Verse 220 (चौपाई)
तुरत भवन आए गिरिराई। सकल सैल सर लिए बोलाई।। आदर दान बिनय बहुमाना। सब कर बिदा कीन्ह हिमवाना।। जबहिं संभु कैलासहिं आए। सुर सब निज निज लोक सिधाए।। जगत मातु पितु संभु भवानी। तेही सिंगारु न कहउँ बखानी।। करहिं बिबिध बिधि भोग बिलासा। गनन्ह समेत बसहिं कैलासा।। हर गिरिजा बिहार नित नयऊ। एहि बिधि बिपुल काल चलि गयऊ।। तब जनमेउ षटबदन कुमारा। तारकु असुर समर जेहिं मारा।। आगम निगम प्रसिद्ध पुराना। षन्मुख जन्मु सकल जग जाना।।
turata bhavana āe girirāī | sakala saila sara liē bolāī || ādara dāna binaya bahu-mānā | saba kara bidā kīnha himavānā || jabahiṁ sambhu kailāsahiṁ āe | sura saba nija nija loka sidhāe || jagata mātu pitu sambhu bhavānī | tēhī siṅgāru na kahuṁ bakhānī || karahiṁ bibidha bidhi bhoga bilāsā | ganaṅha samēta basahiṁ kailāsā || hara girijā bihāra nita nayū | ēhi bidhi bipula kāla cali gayū || taba janameu ṣaṭ-badana kumārā | tāraku asura samara jēhiṁ mārā || āgama nigama prasiddha purānā | ṣan-mukha janmu sakala jaga jānā ||
তৎক্ষণাৎ গিরিরাজ নিজ ভবনে এলেন এবং সকল পর্বতপতিদের ডেকে পাঠালেন। সম্মান, দান, বিনয় এবং বহুমানের সাথে হিমবান সকলকে বিদায় দিলেন। যখন শম্ভু কৈলাসে এলেন, তখন সকল দেবতা নিজ নিজ লোকে চলে গেলেন। শম্ভু ও ভবানী জগতের মাতা পিতা, তাঁদের শৃঙ্গার আমি বর্ণনা করতে সাহস পাই না। বিভিন্ন প্রকারে তাঁরা ভোগ বিলাস করতেন, গণদের সাথে কৈলাসে বাস করতেন। হর ও গিরিজার নিত্য নতুন বিহার, এইভাবে দীর্ঘকাল অতিবাহিত হল। তখন ষড়ানন কুমার জন্মালেন যিনি তারকাসুরকে যুদ্ধে বধ করলেন। আগম, নিগম এবং প্রসিদ্ধ পুরাণে ষণ্মুখের জন্মের কথা আছে, সমগ্র জগৎ এটি জানে।
Verse 221 (छंद)
जगु जान षन्मुख जन्मु कर्मु प्रतापु पुरुषारथु महा। तेहि हेतु मैं बृषकेतु सुत कर चरित संछेपहिं कहा।। यह उमा संगु बिबाहु जे नर नारि कहहिं जे गावहीं। कल्यान काज बिबाह मंगल सर्बदा सुखु पावहीं।।
jagu jāna ṣaṇmukha janmu karmu pratāpu puruṣārathu mahā. tēhi hētu maiṁ bṛṣakētu suta kara carita saṁchēpahiṁ kahā.. yaha umā saṅgu bibāhu jē nara nāri kahahiṁ jē gāvahīṁ. kalyāna kāja bibāha maṅgala sarbadā sukhu pāvahīṁ..
জগৎ যেন ষণ্মুখের জন্ম, কর্ম, প্রতাপ এবং মহান পুরুষার্থ জানে, সেই কারণে আমি বৃষকেতু পুত্রের চরিত্র সংক্ষেপে বর্ণনা করলাম। যে নর বা নারী এই উমাসহ বিবাহের কথা বলে বা গায়, তারা সর্বদা বিবাহের মঙ্গলে সুখ লাভ করে।
Verse 222 (दोहा/सोरठा)
चरित सिंधु गिरिजा रमन बेद न पावहिं पारु। बरनै तुलसीदासु किमि अति मतिमंद गवाँरु।।103।।
carita sindhu girijā ramana beda na pāvahiṃ pāru | baranai tulasīdāsu kimi ati mati-manda gavā̃ru ||103||
প্রভুর লীলা এক অগাধ সাগর—বেদও যার পরপার খুঁজে পায় না। তবে তুলসীদাস, বুদ্ধিতে অতিশয় মন্দ, গ্রাম্য এক জন, সে কী করে তার বর্ণনা করবে?
Verse 223 (चौपाई)
संभु चरित सुनि सरस सुहावा। भरद्वाज मुनि अति सुख पावा।। बहु लालसा कथा पर बाढ़ी। नयनन्हि नीरु रोमावलि ठाढ़ी।। प्रेम बिबस मुख आव न बानी। दसा देखि हरषे मुनि ग्यानी।। अहो धन्य तव जन्मु मुनीसा। तुम्हहि प्रान सम प्रिय गौरीसा।। सिव पद कमल जिन्हहि रति नाहीं। रामहि ते सपनेहुँ न सोहाहीं।। बिनु छल बिस्वनाथ पद नेहू। राम भगत कर लच्छन एहू।। सिव सम को रघुपति ब्रतधारी। बिनु अघ तजी सती असि नारी।। पनु करि रघुपति भगति देखाई। को सिव सम रामहि प्रिय भाई।।
śambhu carita suni sarasa suhāvā | bharadvāja muni ati sukha pāvā || bahu lālasā kathā para bāṛhī | nayananhi nīru romāvali ṭhāṛhī || prema bibasa mukha āva na bānī | dasā dekhi haraṣe muni gyānī || aho dhanya tava janmu munīsā | tumhahi prāna-sama priya gaurīsā || śiva pada-kamala jinhahi rati nāhīṃ | rāmahi te sapanehuṃ na sohāhīṃ || binu chala bisvanātha pada nehū | rāma bhagata kara lacchana ehū || śiva-sama ko raghupati brata-dhārī | binu agha tajī satī asi nārī || panu kari raghupati bhagati dekhāī | ko śiva-sama rāmahi priya bhāī ||
শম্ভুর মধুর ও সুন্দর চরিত্র শুনে ভরদ্বাজ মুনি অত্যন্ত সুখ পেলেন। কথার প্রতি বহু লালসা বাড়ল, চোখে জল এল এবং রোমাঞ্চ হল। প্রেমে বিভোর হয়ে মুখে বাণী এল না, এই অবস্থা দেখে জ্ঞানী মুনি আনন্দিত হলেন। হে মুনিশ্রেষ্ঠ, তোমার জন্ম ধন্য, তোমার কাছে গৌরীশ প্রাণের মতো প্রিয়। যাঁদের শিবের পদ্মপদে রতি নেই, তাঁদের কাছে রাম স্বপ্নেও শোভা পান না। ছলনাহীন বিশ্বনাথের পদে নেহার, এটাই রামভক্তের লক্ষণ। শিবের মতো কে রঘুপতির ব্রতধারী? এবং পাপ ত্যাগ করে সতীর মতো কোন নারী? এইভাবে রঘুপতির ভক্তি দেখিয়ে শিবের মতো কে রামের প্রিয় ভ্রাতা?
Verse 224 (दोहा/सोरठा)
प्रथमहिं मै कहि सिव चरित बूझा मरमु तुम्हार। सुचि सेवक तुम्ह राम के रहित समस्त बिकार।।104।।
prathamahĩ mai kahi siva carita būjhā maramu tumhārā | suci sevaka tumha rāma ke rahita samasta bikārā ||104||
আরম্ভেই, যখন আমি শিবের কীর্তি বলেছিলাম, তখনই তোমার হৃদয়ের অন্তর্গত রহস্য বুঝেছিলাম—তুমি রামের নির্মল দাস, পাপকলুষের লেশমাত্রও নেই।
Verse 225 (चौपाई)
मैं जाना तुम्हार गुन सीला। कहउँ सुनहु अब रघुपति लीला।। सुनु मुनि आजु समागम तोरें। कहि न जाइ जस सुखु मन मोरें।। राम चरित अति अमित मुनिसा। कहि न सकहिं सत कोटि अहीसा।। तदपि जथाश्रुत कहउँ बखानी। सुमिरि गिरापति प्रभु धनुपानी।। सारद दारुनारि सम स्वामी। रामु सूत्रधर अंतरजामी।। जेहि पर कृपा करहिं जनु जानी। कबि उर अजिर नचावहिं बानी।। प्रनवउँ सोइ कृपाल रघुनाथा। बरनउँ बिसद तासु गुन गाथा।। परम रम्य गिरिबरु कैलासू। सदा जहाँ सिव उमा निवासू।।
maiṁ jānā tumhār guna sīlā | kahuṁ sunahu aba raghupati līlā || sunu muni āju samāgama toreṁ | kahi na jāi jasa sukhu mana moreṁ || rāma carita ati amita munisā | kahi na sakahiṁ sata koṭi ahīsā || tadapi jathā-śruta kahuṁ bakhānī | sumiri girāpati prabhu dhanupānī || sārada dāru-nāri sama svāmī | rāmu sūtradhara antarajāmī || jehi para kṛpā karahiṁ janu jānī | kabi ura ajira nacāvahiṁ bānī || pranavuṁ soi kṛpāla raghunāthā | baranauṁ bisada tāsu guna gāthā || parama ramya giribaru kailāsū | sadā jahāṁ siva umā nivāsū ||
আমি তোমার গুণ ও শীল জানলাম, এখন রঘুপতির লীলা শোনো। হে মুনি, শোনো আজ তোমার সমাগমে আমার মনে যে সুখ হয়েছে তা বলা যায় না। রামচরিত অত্যন্ত অমিত হে মুনিশ্রেষ্ঠ, শেষনাগ কোটি কোটি মুখেও তা বলতে পারেন না। তবু যা শ্রুত হয়েছে তাই বলব, গিরাপতি এবং ধনুপাণি প্রভুকে স্মরণ করে। সারদা দারুণনারীর মতো স্বামী, রাম সূত্রধার অন্তর্যামী। যার প্রতি কৃপা করেন তাকে নিজের মতো জেনে কবির হৃদয়ে বাণী নাচান। সেই কৃপাল রঘুনাথকে প্রণাম করি, তাঁর গুণগাথা স্পষ্টভাবে বর্ণনা করি। পরম রম্য শ্রেষ্ঠ পর্বত কৈলাস, যেখানে শিব ও উমা সর্বদা বাস করেন।
Verse 226 (दोहा/सोरठा)
सिद्ध तपोधन जोगिजन सूर किंनर मुनिबृंद। बसहिं तहाँ सुकृती सकल सेवहिं सिब सुखकंद।।105।।
siddha tapodhana jogijana sūra kiṁnara munibṛnda | basahiṁ tahāṁ sukṛtī sakala sevahiṁ siba sukhakanda ||105||
সেখানে সিদ্ধগণ বাস করেন, তপস্যাধন ঋষি-তপস্বীগণ, যোগীদের দল, দেবগণ, কিন্নরগণ এবং মুনিদের সমূহ। সত্যসুকৃতী সকলেই সেখানে অধিষ্ঠান করে, আনন্দের উৎস শিবের সেবা করে।
Verse 227 (चौपाई)
हरि हर बिमुख धर्म रति नाहीं। ते नर तहँ सपनेहुँ नहिं जाहीं।। तेहि गिरि पर बट बिटप बिसाला। नित नूतन सुंदर सब काला।। त्रिबिध समीर सुसीतलि छाया। सिव बिश्राम बिटप श्रुति गाया।। एक बार तेहि तर प्रभु गयऊ। तरु बिलोकि उर अति सुखु भयऊ।। निज कर डासि नागरिपु छाला। बैठै सहजहिं संभु कृपाला।। कुंद इंदु दर गौर सरीरा। भुज प्रलंब परिधन मुनिचीरा।। तरुन अरुन अंबुज सम चरना। नख दुति भगत हृदय तम हरना।। भुजग भूति भूषन त्रिपुरारी। आननु सरद चंद छबि हारी।।
hari-hara bimukha dharma rati nāhīṁ | te nara tahã sapanehũ nahĩ jāhīṁ || tēhi giri para baṭa biṭapa bisālā | nita nūtana sundara saba kālā || tribidha samīra susītali chāyā | siva bisrāma biṭapa śruti gāyā || ekabāra tēhi tara prabhu gayau | taru biloki ura ati sukhu bhayau || nija kara ḍāsi nāgari-pu chālā | baiṭhai sahajahĩ sambhu kṛpālā || kunda indu dara gaura sarīrā | bhuja pralaṁba paridhana municīrā || taruna aruna aṁbuja sama caranā | nakha duti bhagata hṛdaya tama haranā || bhujaga bhūti bhūṣana tripurārī | ānanu sarada canda chabi hārī ||
হরি ও হর থেকে বিমুখ যাদের ধর্মে রতি নেই, তারা স্বপ্নেও সেখানে যেতে পারে না। সেই পর্বতে বিশাল বটবৃক্ষ ছিল, সর্বদা নূতন ও সুন্দর, সর্বকাল। ত্রিবিধ সমীর প্রবাহিত হত এবং ছায়া শীতল, শিবের বিশ্রামবৃক্ষ বলে শ্রুতিতে গাওয়া হয়েছে। একবার প্রভু সেই বৃক্ষের নিচে গেলেন, বৃক্ষ দেখে হৃদয়ে অত্যন্ত সুখ হল। নিজ হাতে ব্যাঘ্রচর্ম বিছিয়ে করুণাময় শম্ভু সহজে বসলেন। কুন্দ ও ইন্দুর চন্দ্রের চেয়ে গৌর শরীর, ভুজ প্রলম্ব, মুনিচীর পরিধান। তরুণ অরুণ পদ্মের মতো চরণ, নখের দ্যুতি ভক্তের হৃদয়ের অন্ধকার দূর করে। ভুজঙ্গ ও ভস্ম ভূষণ, হে ত্রিপুরারি, মুখ শরৎচন্দ্রের ছবি হরণ করে।
Verse 228 (दोहा/सोरठा)
जटा मुकुट सुरसरित सिर लोचन नलिन बिसाल। नीलकंठ लावन्यनिधि सोह बालबिधु भाल।।106।।
jaṭā mukuṭa surasarita sira locana nalina bisāla | nīlakaṇṭha lāvaṇyanidhi soha bālabidhu bhāla ||106||
তাঁর জটা রাজমুকুটের মতো ঊর্ধ্বে উঠেছে; দিব্য গঙ্গা তাঁর শিরে বিরাজমান; তাঁর নয়ন পদ্মসম প্রসারিত। নীলকণ্ঠ প্রভু—সৌন্দর্যের ভাণ্ডার—কপালে নবচন্দ্রের অলংকারে দীপ্তিমান। (১০৬)
Verse 229 (चौपाई)
बैठे सोह कामरिपु कैसें। धरें सरीरु सांतरसु जैसें।। पारबती भल अवसरु जानी। गई संभु पहिं मातु भवानी।। जानि प्रिया आदरु अति कीन्हा। बाम भाग आसनु हर दीन्हा।। बैठीं सिव समीप हरषाई। पूरुब जन्म कथा चित आई।। पति हियँ हेतु अधिक अनुमानी। बिहसि उमा बोलीं प्रिय बानी।। कथा जो सकल लोक हितकारी। सोइ पूछन चह सैलकुमारी।। बिस्वनाथ मम नाथ पुरारी। त्रिभुवन महिमा बिदित तुम्हारी।। चर अरु अचर नाग नर देवा। सकल करहिं पद पंकज सेवा।।
baiṭhe soh kāmaripu kaisẽ | dharẽ sarīru sāṁtarasu jaisẽ || pārabatī bhal avasaru jānī | gaī saṁbhu pahiṁ mātu bhavānī || jāni priyā ādaru ati kīnhā | bām bhāg āsanu har dīnhā || baiṭhīṁ siva samīpa haraṣāī | pūrub janma kathā cita āī || pati hiyaṁ hetu adhik anumānī | bihasi umā bolīṁ priya bānī || kathā jo sakal loka hitakārī | soi pūchan cah sailakumārī || bisvanātha mama nātha purārī | tribhuvan mahimā bidit tumhārī || cara aru acara nāga nara devā | sakal karahiṁ pad paṁkaja sevā ||
কামারি কৈসে বসে আছেন, শান্তরসের মতো শরীর ধারণ করেছেন। পার্বতী শুভ অবসর জেনে মাতা ভবানী শম্ভুর কাছে গেলেন। প্রিয়াকে জেনে অত্যন্ত আদর করলেন, বাম ভাগে আসন দিলেন। শিবের সমীপে বসে হরষিত হলেন, পূর্বজন্মের কথা চিত্তে এল। পতির হৃদয়ে অধিক হেতু অনুমান করে উমা হেসে প্রিয় বাণী বললেন। সেই কথা যা সকল লোকের হিতকারী, সেই পূর্ণ জানতে চান শৈলকুমারী। বিশ্বনাথ আমার নাথ পুরারি, ত্রিভুবনে তোমার মহিমা বিদিত। চর ও অচর, নাগ, নর ও দেব সকলে পদ্মপদ সেবা করে।
Verse 230 (दोहा/सोरठा)
प्रभु समरथ सर्बग्य सिव सकल कला गुन धाम। जोग ग्यान बैराग्य निधि प्रनत कलपतरु नाम।।107।।
prabhu samartha sarbagya siva sakala kalā guna dhāma | joga gyāna bairāgya nidhi pranata kalpa-taru nāma ||107||
প্রভু সর্বসমর্থ, সর্বজ্ঞ, মঙ্গলময়—সমস্ত কলা ও গুণের ধাম। তাঁর নাম যোগ, জ্ঞান ও বৈরাগ্যের অমূল্য নিধি; যে নত হয়ে শরণ নেয়, তার কাছে তা কামধেনু-তুল্য কল্পতরু হয়ে দাঁড়ায়।
Verse 231 (चौपाई)
जौं मो पर प्रसन्न सुखरासी। जानिअ सत्य मोहि निज दासी।। तौं प्रभु हरहु मोर अग्याना। कहि रघुनाथ कथा बिधि नाना।। जासु भवनु सुरतरु तर होई। सहि कि दरिद्र जनित दुखु सोई।। ससिभूषन अस हृदयँ बिचारी। हरहु नाथ मम मति भ्रम भारी।। प्रभु जे मुनि परमारथबादी। कहहिं राम कहुँ ब्रह्म अनादी।। सेस सारदा बेद पुराना। सकल करहिं रघुपति गुन गाना।। तुम्ह पुनि राम राम दिन राती। सादर जपहु अनँग आराती।। रामु सो अवध नृपति सुत सोई। की अज अगुन अलखगति कोई।।
jauṃ mo para prasanna sukharāsī | jāni-a satya mohi nija dāsī || tauṃ prabhu harahu mora agyānā | kahi raghunātha kathā bidhi nānā || jāsu bhavanu surataru tara hoī | sahi ki daridra-janita dukhu soī || sasibhūṣana asa hṛdayaṁ bicārī | harahu nātha mama mati-bhrama bhārī || prabhu je muni paramāratha-bādī | kahahiṃ rāma kahuँ brahma anādī || sesa sārada beda purānā | sakala karahiṃ raghupati guna gānā || tumha puni rāma rāma dina rātī | sādara japahu anaṅga ārātī || rāmu so avadha nṛpati-suta soī | kī aja aguna alakhagati koī ||
হে সুখের ভাণ্ডার, যদি আপনি আমার প্রতি প্রসন্ন হন, তবে আমাকে আপনার নিজের দাসী বলে জানবেন। তখন হে প্রভু, আমার অজ্ঞান দূর করুন এবং রঘুনাথের কাহিনী বিভিন্ন প্রকারে বর্ণনা করুন। যার গৃহে কল্পবৃক্ষ আছে, সেই দারিদ্র্যজনিত দুঃখ কীভাবে সহ্য করবে? এইভাবে চন্দ্রশেখর হৃদয়ে বিচার করলেন: হে নাথ, আমার বুদ্ধির ভারী ভ্রম দূর করুন। যে মুনিগণ পরম সত্য কথা বলেন, তাঁরা রামকে অনাদি ব্রহ্ম বলে ঘোষণা করেন। শেষ, সারদা, বেদ ও পুরাণ সকলেই রঘুপতির গুণ গান করেন। আর আপনিও দিনরাত রাম রাম জপ করেন, অনঙ্গ আরতীতে শ্রদ্ধার সাথে। রাম কি সেই অযোধ্যার রাজপুত্র, রাজার পুত্র, নাকি তিনি অজন্মা, গুণাতীত, অলক্ষ্য গতিধারী?
Verse 232 (दोहा/सोरठा)
जौं नृप तनय त ब्रह्म किमि नारि बिरहँ मति भोरि। देख चरित महिमा सुनत भ्रमति बुद्धि अति मोरि।।108।।
jaũ nṛpa-tanaya ta brahma kimi nāri birahaṁ mati bhori | dekha carita mahimā sunata bhramati buddhi ati mori ||108||
যদি তিনি কেবল রাজার পুত্র হন, তবে তিনি ব্রহ্ম কীভাবে? আর বিরহ-বেদনায় নারীর হৃদয়ই বা কীভাবে এমন ব্যাকুল হয়? তাঁর কীর্তি দেখে, কর্মের মহিমা শুনে—আমার বুদ্ধি ঘুরে যায়, সম্পূর্ণ বিভ্রান্ত হয়ে পড়ে।
Verse 233 (चौपाई)
जौं अनीह ब्यापक बिभु कोऊ। कबहु बुझाइ नाथ मोहि सोऊ।। अग्य जानि रिस उर जनि धरहू। जेहि बिधि मोह मिटै सोइ करहू।। मै बन दीखि राम प्रभुताई। अति भय बिकल न तुम्हहि सुनाई।। तदपि मलिन मन बोधु न आवा। सो फलु भली भाँति हम पावा।। अजहूँ कछु संसउ मन मोरे। करहु कृपा बिनवउँ कर जोरें।। प्रभु तब मोहि बहु भाँति प्रबोधा। नाथ सो समुझि करहु जनि क्रोधा।। तब कर अस बिमोह अब नाहीं। रामकथा पर रुचि मन माहीं।। कहहु पुनीत राम गुन गाथा। भुजगराज भूषन सुरनाथा।।
jaũ anīha byāpaka bibhu koū. kabahũ bujhāi nātha mohi soū. agya jāni risa ura jani dharahū. jehi bidhi moha miṭai soi karahū. maĩ bana dīkhi rāma prabhutāī. ati bhaya bikala na tumhahi sunāī. tadapi malina mana bodhu na āvā. so phalu bhalī bhā̃ti hama pāvā. ajahū̃ kachu sãsau mana more. karahu kṛpā binavaũ kara jorẽ. prabhu taba mohi bahu bhā̃ti prabodhā. nātha so samujhi karahu jani krodhā. taba kara asa bimoha aba nāhī̃. rāmakathā para ruci mana māhī̃. kahahu punīta rāma guna gāthā. bhujagarāja bhūṣana suranāthā.
যদি কোনো প্রভু থাকেন যিনি নিষ্ক্রিয়, সর্বব্যাপী, সার্বভৌম, হে নাথ, সেই সত্য আমাকে বুঝিয়ে দিন। আমাকে অজ্ঞ জেনে মনে ক্রোধ করবেন না; যেভাবে আমার মোহ দূর হবে, সেইভাবে করুন। বনে আমি রামের মহিমা দেখেছি; মহাভয় ও বিকলতায় আমি আপনাকে পুরোপুরি বলিনি। তবু আমার মলিন মন জাগ্রত হয়নি; এইভাবে আমি যথাযথ ফল পেয়েছি। এখনও আমার মনে কিছু সন্দেহ আছে; করুণা করুন, হাত জোড় করে প্রার্থনা করছি। তখন প্রভু আমাকে অনেক প্রকারে উপদেশ দিলেন; হে নাথ, এটা বুঝে ক্রোধ করবেন না। এখন সেই পূর্বের বিমোহ আর নেই; আমার হৃদয়ে রামকথার প্রতি রুচি জেগেছে। তবে বলুন রামের পবিত্র গুণগাথা, হে সর্পশ্রেষ্ঠ ভূষণ, হে দেবনাথ।
Verse 234 (दोहा/सोरठा)
बंदउ पद धरि धरनि सिरु बिनय करउँ कर जोरि। बरनहु रघुबर बिसद जसु श्रुति सिद्धांत निचोरि।।109।।
bandau pada dhari dharani siru binaya karauṁ kara jori | baranahu raghubara bisada jasu śruti siddhānta nicori ||109||
মস্তক ভূমিতে রেখে আমি চরণে প্রণাম করি, আর করজোড়ে বিনীত প্রার্থনা জানাই। এখন আমি রঘুবরের নির্মল মহিমা বর্ণনা করব—বেদের স্থির সিদ্ধান্তের সার-সারাংশ নিংড়ে তুলে।
Verse 235 (चौपाई)
जदपि जोषिता नहिं अधिकारी। दासी मन क्रम बचन तुम्हारी।। गूढ़उ तत्व न साधु दुरावहिं। आरत अधिकारी जहँ पावहिं।। अति आरति पूछउँ सुरराया। रघुपति कथा कहहु करि दाया।। प्रथम सो कारन कहहु बिचारी। निर्गुन ब्रह्म सगुन बपु धारी।। पुनि प्रभु कहहु राम अवतारा। बालचरित पुनि कहहु उदारा।। कहहु जथा जानकी बिबाहीं। राज तजा सो दूषन काहीं।। बन बसि कीन्हे चरित अपारा। कहहु नाथ जिमि रावन मारा।। राज बैठि कीन्हीं बहु लीला। सकल कहहु संकर सुखलीला।।
jadapi joṣitā nahiṁ adhikārī | dāsī mana krama bacana tumhārī || gūṛhaü tatva na sādhu durāvahiṁ | ārata adhikārī jahaṁ pāvahiṁ || ati ārati pūchüṁ surarāyā | raghupati kathā kahahu kari dāyā || prathama so kārana kahahu bicārī | nirguṇa brahma saguṇa bapu dhārī || puni prabhu kahahu rāma avatārā | bālacarita puni kahahu udārā || kahahu jathā jānakī bibāhīṁ | rāja tajā so dūṣana kāhīṁ || bana basi kīnhē carita apārā | kahahu nātha jimi rāvana mārā || rāja baiṭhi kīnhīṁ bahu līlā | sakala kahahu saṅkara sukhalīlā ||
যদিও নারী সাধারণত অধিকারী বলে বিবেচিত হন না, আমি মন, কর্ম ও বাক্যে আপনার দাসী। সাধুগণ গূঢ় তত্ত্ব গোপন করেন না; যেখানেই তাঁরা আর্তকে পান, তাকে জিজ্ঞাসা করার অধিকার দেন। মহাআর্তিতে আমি জিজ্ঞাসা করছি, হে দেবরাজ: দয়া করে রঘুপতির কাহিনী বলুন। প্রথমে বিচার করে সেই কারণ বলুন, কীভাবে নির্গুণ ব্রহ্ম সগুণ রূপ ধারণ করলেন। তারপর হে প্রভু, রামের অবতারের কথা বলুন; তারপর তাঁর উদার বাল্যচরিত বর্ণনা করুন। জানকীর বিবাহ কীভাবে হল তা বলুন; কোন দোষে তিনি রাজ্য ত্যাগ করলেন? বনে বাস করে তিনি অপার চরিত করলেন, হে নাথ, কীভাবে রাবণকে বধ করলেন তা বলুন। রাজ্যে বসে তিনি অনেক লীলা করলেন; হে শঙ্কর, এই সুখদায়ক সব লীলা বলুন।
Verse 236 (दोहा/सोरठा)
बहुरि कहहु करुनायतन कीन्ह जो अचरज राम। प्रजा सहित रघुबंसमनि किमि गवने निज धाम।।110।।
bahuri kahahu karuṇāyatana kīnha jo acaraja rāma | prajā sahita raghubaṁsamani kimi gavane nija dhāma ||110||
করুণাধামেরূপ রামের কৃত সেই আশ্চর্য আবার বলো: রঘুকুল-রত্ন কীভাবে স্বজনসমেত আপন চিরধামে গমন করলেন?
Verse 237 (चौपाई)
पुनि प्रभु कहहु सो तत्व बखानी। जेहिं बिग्यान मगन मुनि ग्यानी।। भगति ग्यान बिग्यान बिरागा। पुनि सब बरनहु सहित बिभागा।। औरउ राम रहस्य अनेका। कहहु नाथ अति बिमल बिबेका।। जो प्रभु मैं पूछा नहि होई। सोउ दयाल राखहु जनि गोई।। तुम्ह त्रिभुवन गुर बेद बखाना। आन जीव पाँवर का जाना।। प्रस्न उमा कै सहज सुहाई। छल बिहीन सुनि सिव मन भाई।। हर हियँ रामचरित सब आए। प्रेम पुलक लोचन जल छाए।। श्रीरघुनाथ रूप उर आवा। परमानंद अमित सुख पावा।।
puni prabhu kahahu so tatva bakhānī | jehiṁ bigyāna magana muni gyānī || bhagati gyāna bigyāna birāgā | puni saba baranahu sahita bibhāgā || auru rāma rahasya anekā | kahahu nātha ati bimala bibekā || jo prabhu maiṁ pūchā nahi hoī | sou dayāla rākhahu jani goī || tumha tribhuvana gur beda bakhānā | āna jīva pā̃vara kā jānā || prasn umā kai sahaja suhāī | chala bihīna suni siva mana bhāī || hara hiyaṁ rāmacarita saba āe | prema pulaka locana jala chāe || śrīraghunātha rūpa ura āvā | paramānanda amita sukha pāvā ||
আবার হে প্রভু, সেই মূল সত্য ব্যাখ্যা করুন যাতে মুনি ও জ্ঞানীগণ বিজ্ঞানে মগ্ন থাকেন। ভক্তি, জ্ঞান, বিজ্ঞান ও বৈরাগ্য বর্ণনা করুন; আর সেগুলি তাদের যথাযথ ভেদসহ পুনরায় বর্ণনা করুন। রামের অনেক রহস্য আছে; হে নাথ, অত্যন্ত বিশুদ্ধ বিবেকে সেগুলি বলুন। আর হে প্রভু, আমি যা জিজ্ঞাসাও করিনি, সেটিও দয়ালু হয়ে গোপন রাখবেন না। আপনি ত্রিভুবনের গুরু, বেদে ঘোষিত; অন্য জীবেরা দুর্বল, তারা কী জানবে? উমার প্রশ্ন স্বাভাবিকভাবে সুন্দর ও মনোরম; ছলনাহীন শুনে শিবের মন প্রীত হল। হরের হৃদয়ে রামচরিত সব উদিত হল; প্রেমে পুলক হল, চোখে জল ছায়া করল। শ্রীরঘুনাথের রূপ হৃদয়ে আবির্ভূত হল; তিনি পরমানন্দ, অপরিমেয় সুখ লাভ করলেন।
छंद में स्पष्ट फलश्रुति दी है: ‘यह उमा संगु बिबाहु जे नर नारि कहहिं जे गावहीं। कल्यान काज बिबाह मंगल सर्बदा सुखु पावहीं॥’—अर्थात शिव–उमा विवाह का गान/पाठ मंगल-कार्यों में कल्याण और गृहस्थ-सुख का हेतु माना गया है; साथ ही उमा के प्रश्न-खंड का श्रवण ‘संशय-नाश’ और रामकथा-रुचि की वृद्धि का साधन कहा जाता है।
परंपरागत मानस-पाठ में यहाँ ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ (राम-नाम समपुट) या ‘जय जय रघुवीर समर्थ’ जैसे नाम-समपुट प्रचलित हैं; विशेषतः उमा के ‘राम-तत्त्व’ प्रश्न के समय ‘राम नाम’ जप-समपुट को ‘भ्रम-निवृत्ति’ हेतु उपयुक्त माना जाता है।
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
A free sign-in with Google or Apple keeps your chat saved across web and the app.
Read Ramcharitmanas in the Vedapath app
Scan the QR code to open this directly in the app, with word-by-word meanings, Sanskrit recitation where available, and more.