यह सोपान ‘त्याग-धर्म’ और ‘भक्ति की परख’ का द्वार है: राजसुख का विसर्जन, भ्रातृ-प्रेम की अग्निपरीक्षा, और समाज-धर्म के भीतर रहकर राम-नाम के आश्रय में वैराग्य। इस काण्ड में साधक सीखता है कि मुक्ति-मार्ग केवल वनगमन नहीं, बल्कि अहं-त्याग, शरणागति, और निष्काम सेवाभाव है—भरत का ‘राज्य’ के प्रति वैराग्य तथा गुह (निषाद) की निष्कपट सख्यता इसी सीढ़ी की रीलिंग है।
অযোধ্যাকাণ্ডের প্রধান রস করুণা, কিন্তু এ করুণা শোক-প্রধান না থেকে ভক্তি-পরিণতি হয়ে ওঠে। রামের বনগমন সামাজিক-ধর্ম (রাজধর্ম/পিতৃবচন)-এর মর্যাদা, আর ভরত-এর আগমন সেই মর্যাদার অন্তঃশুদ্ধি—অহং-ত্যাগ ও নিষ্কাম সেবার রূপ। এই খণ্ডে (দোহা ১৯০–১৯৯) গুহের যুদ্ধোন্মাদ, শকুন-বিচারে শান্তি, তারপর ভরত-গুহের আলিঙ্গন ও গঙ্গাস্নান—সবই ‘বৈর’ থেকে ‘প্রেম’-এ রূপান্তরের যাত্রা। তুলসী এখানে নির্গুণ-সগুণ সেতুও বাঁধেন: নাম-মহিমা (রাম-নামের পবিত্রতা, বাল্মীকি-উদাহরণ) নিরাকার তত্ত্বের ইঙ্গিত; আর রামঘাট, চরণ-রেখা, সাঁথরি, ভরত-এর দণ্ডবৎ—সগুণ-লীলার মূর্ত সাধনা। এই সোপানে সাধক শেখে—ভক্তির প্রমাণ বাহ্য জাতি/লোকমান্যতা নয়, প্রেম-লক্ষণ।
চৌপাই 190.1-4
होहु सँजोइल रोकहु घाटा।ठाटहु सकल मरै के ठाटा।।
सनमुख लोह भरत सन लेऊँ।जिअत न सुरसरि उतरन देऊँ।।
समर मरनु पुनि सुरसरि तीरा।राम काजु छनभंगु सरीरा।।
भरत भाइ नृपु मै जन नीचू।बड़ें भाग असि पाइअ मीचू।।
स्वामि काज करिहउँ रन रारी।जस धवलिहउँ भुवन दस चारी।।
तजउँ प्रान रघुनाथ निहोरें।दुहूँ हाथ मुद मोदक मोरें।।
साधु समाज न जाकर लेखा।राम भगत महुँ जासु न रेखा।।
जायँ जिअत जग सो महि भारू।जननी जौबन बिटप कुठारू।।
hohu sãjoila rokahu ghāṭā |ṭhāṭahu sakala marai ke ṭhāṭā ||
sanamukha loha bharata sana leū̃ |jiata na surasari utarana deū̃ ||
samara maranu puni surasari tīrā |rāma kāju chanabhaṁgu sarīrā ||
bharata bhāi nṛpu mai jana nīcū |baṛeṁ bhāga asi pāia mīcū ||
svāmi kāja karihaũ rana rārī |jasa dhavalihaũ bhuvana dasa cārī ||
tajaũ prāna raghunātha nihoreṁ |duhū̃ hātha muda modaka moreṁ ||
sādhu samāja na jākara lekhā |rāma bhagata mahũ jāsu na rekhā ||
jāyã jiata jaga so mahi bhārū |jananī jaubana biṭapa kuṭhārū ||
অস্ত্রসজ্জিত হও এবং ঘাটগুলো রক্ষা করো; মৃত্যুর জন্য সব প্রস্তুতি সম্পন্ন করো। আমি যুদ্ধে ভরতের মুখোমুখি হব, এবং জীবিত অবস্থায় তাকে গঙ্গা পার হতে দেব না। যুদ্ধে মৃত্যু, তাও আবার গঙ্গার তীরে, রামের কাজে, এই ক্ষণস্থায়ী দেহ নিয়ে, বড়ই লাভের বিষয়। ভরত রামের ভাই এবং রাজা, আর আমি এক নীচ দাস; বড় ভাগ্যে এমন মৃত্যু লাভ হয়। আমি প্রভুর কাজে যুদ্ধ করব, এবং চৌদ্দ ভুবনে আমার যশ শুভ্র করে দেব। রঘুনাথের নিমিত্তে প্রাণ ত্যাগ করলে আমার উভয় হাত আনন্দের মোদকে পরিপূর্ণ হবে। যে সাধু সমাজে গণ্য নয়, এবং রামের ভক্তদের মধ্যে যার কোনো চিহ্ন নেই, সে এই জগতে কেবল পৃথিবীর বোঝা হয়ে বেঁচে থাকে, এবং মাতৃযৌবন বৃক্ষের কুঠার।
দোহা 190
बिगत बिषाद निषादपति सबहि बढ़ाइ उछाहु।सुमिरि राम मागेउ तुरत तरकस धनुष सनाहु।।190।।
bigata biṣāda niṣādapati sabahi baṛhāi uchāhu |sumiri rāma māgeu turata tarakasa dhanuṣa sanāhu ||190||
সমস্ত বিষাদ ত্যাগ করে নিষাদদের অধিপতি সকলকে উৎসাহে উদ্বুদ্ধ করলেন; রামকে স্মরণ করে তিনি তৎক্ষণাৎ তরকশ, ধনুক ও কবচ চাইলেন।
চৌপাই 191.1-4
बेगहु भाइहु सजहु सँजोऊ।सुनि रजाइ कदराइ न कोऊ।।
भलेहिं नाथ सब कहहिं सहरषा।एकहिं एक बढ़ावइ करषा।।
चले निषाद जोहारि जोहारी।सूर सकल रन रूचइ रारी।।
सुमिरि राम पद पंकज पनहीं।भाथीं बाँधि चढ़ाइन्हि धनहीं।।
अँगरी पहिरि कूँड़ि सिर धरहीं।फरसा बाँस सेल सम करहीं।।
एक कुसल अति ओड़न खाँड़े।कूदहि गगन मनहुँ छिति छाँड़े।।
निज निज साजु समाजु बनाई।गुह राउतहि जोहारे जाई।।
देखि सुभट सब लायक जाने।लै लै नाम सकल सनमाने।।
begahu bhāihu sajahu sãjoū |suni rajāi kadarāi na koū ||
bhalehiṁ nātha saba kahahiṁ saharaṣā |ekahiṁ eka baṛhāvai karaṣā ||
cale niṣāda johāri johārī |sūra sakala rana rūcai rārī ||
sumiri rāma pada paṁkaja panahīṁ |bhāthīṁ bā̃dhi caṛhāinhi dhanahīṁ ||
ãgarī pahiri kū̃ṛi sira dharahīṁ |pharasā bā̃sa sela sama karahīṁ ||
eka kusala ati oṛana khā̃ṛe |kūdahi gagana manahũ chiti chā̃ṛe ||
nija nija sāju samāju banāī |guha rāutahi johāre jāī ||
dekhi subhaṭa saba lāyaka jāne |lai lai nāma sakala sanamāne ||
শীঘ্রই, ভাইগণ, নিজ নিজ অস্ত্রশস্ত্র প্রস্তুত করো; আদেশ শুনে কেউ যেন পিছিয়ে না পড়ো। "ভাল, প্রভু," সকলে আনন্দে বলল, এবং একে অপরের উৎসাহ বাড়িয়ে তুলল। নিষাদগণ বারবার প্রণাম করে রওনা হল; সকলেই বীর, যুদ্ধ ও সংগ্রামে আনন্দ পায়। রামের চরণকমলের পাদুকা স্মরণ করে, তারা তূণীর বেঁধে ধনুক সজ্জিত করল। কবচ পরে মাথায় শিরস্ত্রাণ ধারণ করে, কুঠার, বাঁশের বর্শা ও পাথর প্রস্তুত করল। কেউ কেউ ঢাল ও তরবারিতে অত্যন্ত দক্ষ, আকাশে লাফায় মনে হয় পৃথিবী ছেড়ে গেছে। নিজ নিজ অস্ত্র ও দল সাজিয়ে, তাদের নায়ক গুহকে প্রণাম করতে গেল। সাহসী যোদ্ধাদের দেখে, সকলকে কার্যের উপযুক্ত বুঝল, নাম ধরে ডেকে সকলকে সম্মান করল।
দোহা 191
भाइहु लावहु धोख जनि आजु काज बड़ मोहि।सुनि सरोष बोले सुभट बीर अधीर न होहि।।191।।
bhāihu lāvahu dhokha jani āju kāja baṛa mohi |suni saroṣa bole subhaṭa bīra adhīra na hohi ||191||
"ভাইগণ, আমাকে বঞ্চিত করো না; আজকের কাজটি আমার জন্য অত্যন্ত গুরুত্বপূর্ণ।" এই কথা শুনে যোদ্ধারা ক্রোধে বললেন: "হে বীর, অস্থির হইও না।"
চৌপাই 192.1-4
राम प्रताप नाथ बल तोरे।करहिं कटकु बिनु भट बिनु घोरे।।
जीवत पाउ न पाछें धरहीं।रुंड मुंडमय मेदिनि करहीं।।
दीख निषादनाथ भल टोलू।कहेउ बजाउ जुझाऊ ढोलू।।
एतना कहत छींक भइ बाँए।कहेउ सगुनिअन्ह खेत सुहाए।।
बूढ़ु एकु कह सगुन बिचारी।भरतहि मिलिअ न होइहि रारी।।
रामहि भरतु मनावन जाहीं।सगुन कहइ अस बिग्रहु नाहीं।।
सुनि गुह कहइ नीक कह बूढ़ा।सहसा करि पछिताहिं बिमूढ़ा।।
भरत सुभाउ सीलु बिनु बूझें।बड़ि हित हानि जानि बिनु जूझें।।
rāma pratāpa nātha bala tore |karahiṁ kaṭaku binu bhaṭa binu ghore ||
jīvata pāu na pācheṁ dharahīṁ |ruṁḍa muṁḍamaya medini karahīṁ ||
dīkha niṣādanātha bhala ṭolū |kaheu bajāu jujhāū ḍholū ||
etanā kahata chīṁka bhai bā̃e |kaheu sagunianha kheta suhāe ||
būṛhu eku kaha saguna bicārī |bharatahi milia na hoihi rārī ||
rāmahi bharatu manāvana jāhīṁ |saguna kahai asa bigrahu nāhīṁ ||
suni guha kahai nīka kaha būṛhā |sahasā kari pachitāhiṁ bimūṛhā ||
bharata subhāu sīlu binu būjheṁ |baṛi hita hāni jāni binu jūjheṁ ||
রামের প্রতাপে এবং তোমার বলে, প্রভু, তারা শত্রুর সৈন্যদলকে বিনা যোদ্ধা বিনা অশ্ব করে দেবে। জীবিত থাকা অবধি তারা পিছনে পা রাখবে না, এবং পৃথিবীকে ছিন্নমস্তক ও কর্তিত মস্তকে পরিপূর্ণ করবে। নিষাদনাথ তাঁর উত্তম দল দেখে বললেন, যুদ্ধের ঢোল বাজাও। এত কথা বলতে বাঁ দিকে হাঁচি এল। শকুনবিদেরা বললেন যে রণক্ষেত্র শুভ দেখাচ্ছে। এক বৃদ্ধ শকুন বিচার করে বললেন: ভরতের সঙ্গে মিলিত হও, কোনো বিবাদ হবে না। ভরত রামকে মানাতে যাচ্ছেন। শকুন বলছে যে কোনো যুদ্ধ হবে না। এই কথা শুনে গুহ বললেন, বৃদ্ধ ভাল কথা বলেছেন। বোকারা তড়িঘড়ি কাজ করে পরে অনুশোচনা করে। ভরতের স্বভাব ও শীল না বুঝে, না জেনে যুদ্ধ করলে আমাদের নিজের হিতের বিশাল ক্ষতি হবে।
দোহা 192
गहहु घाट भट समिटि सब लेउँ मरम मिलि जाइ।बूझि मित्र अरि मध्य गति तस तब करिहउँ आइ।।192।।
gahahu ghāṭa bhaṭa samiṭi saba leũ marama mili jāi |būjhi mitra ari madhya gati tasa taba karihaũ āi ||192||
যোদ্ধাগণ, সকলে একত্রিত হও এবং ঘাট অধিকার করো; আমি গিয়ে তার সঙ্গে মিলি তার গোপন রহস্য জানব। সে মিত্র, শত্রু অথবা মধ্যবর্তী অবস্থায় আছে তা বুঝে তারপর আমি ফিরে এসে তদনুসারে কাজ করব।
চৌপাই 193.1-4
लखन सनेहु सुभायँ सुहाएँ।बैरु प्रीति नहिं दुरइँ दुराएँ।।
अस कहि भेंट सँजोवन लागे।कंद मूल फल खग मृग मागे।।
मीन पीन पाठीन पुराने।भरि भरि भार कहारन्ह आने।।
मिलन साजु सजि मिलन सिधाए।मंगल मूल सगुन सुभ पाए।।
देखि दूरि तें कहि निज नामू।कीन्ह मुनीसहि दंड प्रनामू।।
जानि रामप्रिय दीन्हि असीसा।भरतहि कहेउ बुझाइ मुनीसा।।
राम सखा सुनि संदनु त्यागा।चले उतरि उमगत अनुरागा।।
गाउँ जाति गुहँ नाउँ सुनाई।कीन्ह जोहारु माथ महि लाई।।
lakhana sanehu subhāyã suhāẽ |bairu prīti nahiṁ duraĩ durāẽ ||
asa kahi bheṁṭa sãjovana lāge |kaṁda mūla phala khaga mṛga māge ||
mīna pīna pāṭhīna purāne |bhari bhari bhāra kahāranha āne ||
milana sāju saji milana sidhāe |maṁgala mūla saguna subha pāe ||
dekhi dūri teṁ kahi nija nāmū |kīnha munīsahi daṁḍa pranāmū ||
jāni rāmapriya dīnhi asīsā |bharatahi kaheu bujhāi munīsā ||
rāma sakhā suni saṁdanu tyāgā |cale utari umagata anurāgā ||
gāũ jāti guhã nāũ sunāī |kīnha johāru mātha mahi lāī ||
লক্ষ্মণের প্রেম স্বাভাবিক সরলতায় সুন্দর; বৈরিতা ও স্নেহ যতই গোপন করা হোক, গোপন থাকে না। এই বলে গুহ মিলনের উপহার সংগ্রহ করতে লাগলেন; তিনি কন্দ, মূল, ফল, পাখি ও হরিণ চাইলেন। মোটা পূর্ণবয়স্ক পাঠিন মাছও, বহনকারীরা ভরি ভরি বোঝা নিয়ে আনল। মিলনের সাজসরঞ্জাম সাজিয়ে তিনি মিলনের উদ্দেশ্যে বের হলেন, এবং মঙ্গলময় শুভ শকুন পেলেন, যা সকল আশীর্বাদের মূল। দূর থেকে মুনিশ্রেষ্ঠকে দেখে নিজের নাম বললেন এবং তাঁকে প্রণাম করলেন। তাঁকে রামের প্রিয় জেনে মুনি আশীর্বাদ দিলেন, এবং মুনিশ্রেষ্ঠ ভরতকে বুঝিয়ে বললেন সে কে। রামের সখা শুনে ভরত রথ ত্যাগ করে অনুরাগে উচ্ছ্বসিত হয়ে পায়ে হেঁটে চললেন। গুহ নিজের গ্রাম, জাতি ও নাম জানালেন, এবং কপাল মাটিতে ঠেকিয়ে প্রণাম করলেন।
দোহা 193
करत दंडवत देखि तेहि भरत लीन्ह उर लाइ।मनहुँ लखन सन भेंट भइ प्रेम न हृदयँ समाइ।।193।।
karata daṁḍavata dekhi tehi bharata līnha ura lāi |manahũ lakhana sana bheṁṭa bhai prema na hṛdayã samāi ||193||
তাঁকে দণ্ডবত করতে দেখে ভরত তাঁকে বক্ষে টেনে নিলেন, যেন লক্ষ্মণের সঙ্গে সাক্ষাৎ হলো, আর হৃদয়ে প্রেম ধরে রাখা গেল না।
চৌপাই 194.1-4
भेंटत भरतु ताहि अति प्रीती।लोग सिहाहिं प्रेम कै रीती।।
धन्य धन्य धुनि मंगल मूला।सुर सराहि तेहि बरिसहिं फूला।।
लोक बेद सब भाँतिहिं नीचा।जासु छाँह छुइ लेइअ सींचा।।
तेहि भरि अंक राम लघु भ्राता।मिलत पुलक परिपूरित गाता।।
राम राम कहि जे जमुहाहीं।तिन्हहि न पाप पुंज समुहाहीं।।
यह तौ राम लाइ उर लीन्हा।कुल समेत जगु पावन कीन्हा।।
करमनास जलु सुरसरि परई।तेहि को कहहु सीस नहिं धरई।।
उलटा नामु जपत जगु जाना।बालमीकि भए ब्रह्म समाना।।
bheṁṭata bharatu tāhi ati prītī |loga sihāhiṁ prema kai rītī ||
dhanya dhanya dhuni maṁgala mūlā |sura sarāhi tehi barisahiṁ phūlā ||
loka beda saba bhā̃tihiṁ nīcā |jāsu chā̃ha chui leia sīṁcā ||
tehi bhari aṁka rāma laghu bhrātā |milata pulaka paripūrita gātā ||
rāma rāma kahi je jamuhāhīṁ |tinhahi na pāpa puṁja samuhāhīṁ ||
yaha tau rāma lāi ura līnhā |kula sameta jagu pāvana kīnhā ||
karamanāsa jalu surasari paraī |tehi ko kahahu sīsa nahiṁ dharaī ||
ulaṭā nāmu japata jagu jānā |bālamīki bhae brahma samānā ||
ভরত অতি প্রেমে তাঁকে আলিঙ্গন করলেন, এবং লোকেরা সেই প্রেমের রীতি দেখে তাঁকে ঈর্ষা করতে লাগল। "ধন্য, ধন্য" ধ্বনি, যা মঙ্গলের মূল, উঠল; দেবতারা তাঁর প্রশংসা করে ফুল বর্ষণ করতে লাগলেন। লোক ও বেদ সব রীতিতে সে নীচ ছিল, যার ছায়া স্পর্শ করলে জল ছিটিয়ে শুদ্ধ হতে হত। তবু রাম তাঁকে অঙ্কে ভরে নিলেন, তাঁর অনুজ ভ্রাতা; মিলিত হতেই তাঁর সর্বাঙ্গ পুলকে পরিপূর্ণ হল। যারা হাই তুলতে তুলতেও "রাম, রাম" বলে, তাদের পাপের স্তূপ সম্মুখে উঠে দাঁড়ায় না। আর এই রাম তাঁকে বক্ষে ধারণ করেছেন, এবং তাঁর সমস্ত কুল সহ জগৎকে পবিত্র করেছেন। কর্মনাশার জল যখন দেবতাদের নদী গঙ্গায় পড়ে, বল, কে তার প্রতি মস্তক অবনত করে না? জগৎ জানে, নাম উল্টো করে জপ করে বাল্মীকি ব্রহ্মার সমান হয়েছিলেন।
দোহা 194
स्वपच सबर खस जमन जड़ पावँर कोल किरात।रामु कहत पावन परम होत भुवन बिख्यात।।194।।
svapaca sabara khasa jamana jaṛa pāvãra kola kirāta |rāmu kahata pāvana parama hota bhuvana bikhyāta ||194||
কুকুর-ভোজী, শবর, খস, যবন, বোকা, হতভাগ্য, কোল ও কিরাত জাতির মানুষও কেবল রাম নাম জপ করলেই পরম পবিত্র হয়ে যায় এবং সমস্ত ভুবনে খ্যাতি লাভ করে।
চৌপাই 195.1-4
नहिं अचिरजु जुग जुग चलि आई।केहि न दीन्हि रघुबीर बड़ाई।।
राम नाम महिमा सुर कहहीं।सुनि सुनि अवधलोग सुखु लहहीं।।
रामसखहि मिलि भरत सप्रेमा।पूँछी कुसल सुमंगल खेमा।।
देखि भरत कर सील सनेहू।भा निषाद तेहि समय बिदेहू।।
सकुच सनेहु मोदु मन बाढ़ा।भरतहि चितवत एकटक ठाढ़ा।।
धरि धीरजु पद बंदि बहोरी।बिनय सप्रेम करत कर जोरी।।
कुसल मूल पद पंकज पेखी।मैं तिहुँ काल कुसल निज लेखी।।
अब प्रभु परम अनुग्रह तोरें।सहित कोटि कुल मंगल मोरें।।
nahiṁ aciraju juga juga cali āī |kehi na dīnhi raghubīra baṛāī ||
rāma nāma mahimā sura kahahīṁ |suni suni avadhaloga sukhu lahahīṁ ||
rāmasakhahi mili bharata sapremā |pū̃chī kusala sumaṁgala khemā ||
dekhi bharata kara sīla sanehū |bhā niṣāda tehi samaya bidehū ||
sakuca sanehu modu mana bāṛhā |bharatahi citavata ekaṭaka ṭhāṛhā ||
dhari dhīraju pada baṁdi bahorī |binaya saprema karata kara jorī ||
kusala mūla pada paṁkaja pekhī |maiṁ tihũ kāla kusala nija lekhī ||
aba prabhu parama anugraha toreṁ |sahita koṭi kula maṁgala moreṁ ||
এটা কোনো আশ্চর্য নয়; যুগে যুগে এটা চলে আসছে। রঘুবীর কাকে বড়ত্ব দেননি? দেবতারা রামনামের মহিমা বর্ণনা করেন। বারবার শুনে অযোধ্যার লোকেরা আনন্দ পান। ভরত প্রেমসহ রামের সখার সঙ্গে মিলিত হলেন এবং কুশল, শুভ ও কল্যাণ সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলেন। ভরতের কোমল স্বভাব ও স্নেহ দেখে সেই সময় নিষাদ মোহাবিষ্ট হয়ে গেল। লজ্জা, স্নেহ ও আনন্দে তার মন ভরে উঠল এবং সে ভরতের দিকে একদৃষ্টে তাকিয়ে দাঁড়িয়ে রইল। ধৈর্য ধরে সে আবার ভরতের চরণে প্রণাম করল এবং প্রেমসহ হাত জোড় করে বিনয় নিবেদন করল। কুশলের মূল চরণকমল দেখে আমি তিন কালেই নিজেকে কুশলী মনে করি। এখন প্রভু, আপনার পরম অনুগ্রহে আমার এবং কোটি কুলের মঙ্গল হোক।
দোহা 195
समुझि मोरि करतूति कुलु प्रभु महिमा जियँ जोइ।जो न भजइ रघुबीर पद जग बिधि बंचित सोइ।।195।।
samujhi mori karatūti kulu prabhu mahimā jiyã joi |jo na bhajai raghubīra pada jaga bidhi baṁcita soi ||195||
আমার কর্ম ও কুল বিবেচনা করে, হৃদয়ে প্রভুর মহিমা চিন্তা করে, যে জগতে রঘুবীরের চরণ ভজন করে না, সে বিধির দ্বারা বঞ্চিত।
চৌপাই 196.1-4
कपटी कायर कुमति कुजाती।लोक बेद बाहेर सब भाँती।।
राम कीन्ह आपन जबही तें।भयउँ भुवन भूषन तबही तें।।
देखि प्रीति सुनि बिनय सुहाई।मिलेउ बहोरि भरत लघु भाई।।
कहि निषाद निज नाम सुबानीं।सादर सकल जोहारीं रानीं।।
जानि लखन सम देहिं असीसा।जिअहु सुखी सय लाख बरीसा।।
निरखि निषादु नगर नर नारी।भए सुखी जनु लखनु निहारी।।
कहहिं लहेउ एहिं जीवन लाहू।भेंटेउ रामभद्र भरि बाहू।।
सुनि निषादु निज भाग बड़ाई।प्रमुदित मन लइ चलेउ लेवाई।।
kapaṭī kāyara kumati kujātī |loka beda bāhera saba bhā̃tī ||
rāma kīnha āpana jabahī teṁ |bhayaũ bhuvana bhūṣana tabahī teṁ ||
dekhi prīti suni binaya suhāī |mileu bahori bharata laghu bhāī ||
kahi niṣāda nija nāma subānīṁ |sādara sakala johārīṁ rānīṁ ||
jāni lakhana sama dehiṁ asīsā |jiahu sukhī saya lākha barīsā ||
nirakhi niṣādu nagara nara nārī |bhae sukhī janu lakhanu nihārī ||
kahahiṁ laheu ehiṁ jīvana lāhū |bheṁṭeu rāmabhadra bhari bāhū ||
suni niṣādu nija bhāga baṛāī |pramudita mana lai caleu levāī ||
আমি ছলাকারী, কাপুরুষ, দুষ্টমনা ও নীচজাত, লোক ও বেদ থেকে সর্বপ্রকারে বহির্ভূত। রাম যখন আমাকে আপন করলেন, সেই থেকেই আমি ভুবনের ভূষণ হয়েছি। তাঁর প্রেম দেখে ও তাঁর সুন্দর বিনয় শুনে, ভরতের অনুজ শত্রুঘ্ন তাঁকে আলিঙ্গন করলেন। নিষাদ নিজ নাম সুন্দর ভাষায় উচ্চারণ করে সকল রানিকে শ্রদ্ধাভরে প্রণাম করলেন। তাঁকে লক্ষ্মণের সমান জেনে তাঁরা আশীর্বাদ দিলেন, তুমি এক লক্ষ বছর সুখে জীবিত থাক। নিষাদকে দেখে নগরের নর-নারীরা যেন লক্ষ্মণকে দেখছেন এমন আনন্দিত হলেন। তাঁরা বললেন, এ জীবনের সার্থক লাভ হয়েছে, কারণ রামভদ্র তাঁকে দুই বাহুতে আলিঙ্গন করেছেন। নিজ ভাগ্যের বড়াই শুনে নিষাদ মনে আনন্দিত হয়ে তাঁদের পথ দেখাতে অগ্রে চললেন।
দোহা 196
सनकारे सेवक सकल चले स्वामि रुख पाइ।घर तरु तर सर बाग बन बास बनाएन्हि जाइ।।196।।
sanakāre sevaka sakala cale svāmi rukha pāi |ghara taru tara sara bāga bana bāsa banāenhi jāi ||196||
ইশারা পেয়ে সমস্ত সেবক স্বামীর মনোবাঞ্ছা বুঝে এগিয়ে গেলেন এবং বিশ্রামের জন্য বাসস্থান তৈরি করলেন: ঘরে, গাছের নিচে, পুকুরের ধারে, বাগানে এবং কুঞ্জবনে।
চৌপাই 197.1-4
सृंगबेरपुर भरत दीख जब।भे सनेहँ सब अंग सिथिल तब।।
सोहत दिएँ निषादहि लागू।जनु तनु धरें बिनय अनुरागू।।
एहि बिधि भरत सेनु सबु संगा।दीखि जाइ जग पावनि गंगा।।
रामघाट कहँ कीन्ह प्रनामू।भा मनु मगनु मिले जनु रामू।।
करहिं प्रनाम नगर नर नारी।मुदित ब्रह्ममय बारि निहारी।।
करि मज्जनु मागहिं कर जोरी।रामचंद्र पद प्रीति न थोरी।।
भरत कहेउ सुरसरि तव रेनू।सकल सुखद सेवक सुरधेनू।।
जोरि पानि बर मागउँ एहू।सीय राम पद सहज सनेहू।।
sṛṁgaberapura bharata dīkha jaba |bhe sanehã saba aṁga sithila taba ||
sohata diẽ niṣādahi lāgū |janu tanu dhareṁ binaya anurāgū ||
ehi bidhi bharata senu sabu saṁgā |dīkhi jāi jaga pāvani gaṁgā ||
rāmaghāṭa kahã kīnha pranāmū |bhā manu maganu mile janu rāmū ||
karahiṁ pranāma nagara nara nārī |mudita brahmamaya bāri nihārī ||
kari majjanu māgahiṁ kara jorī |rāmacaṁdra pada prīti na thorī ||
bharata kaheu surasari tava renū |sakala sukhada sevaka suradhenū ||
jori pāni bara māgaũ ehū |sīya rāma pada sahaja sanehū ||
যখন ভরত শৃঙ্গবেরপুর দেখলেন, তখন প্রেমে তাঁর সমস্ত অঙ্গ শিথিল হয়ে গেল। নিষাদের ওপর ভর দিয়ে দাঁড়াতে তাঁর এমন মনে হল যেন বিনয় ও অনুরাগ দেহ ধারণ করেছে। এইভাবে ভরত সমস্ত সেনা সঙ্গে নিয়ে গিয়ে দেখলেন জগতের পবিত্রকারিণী গঙ্গাকে। রামঘাটে প্রণাম করলেন, তাঁর মন এত মগ্ন হল যে মনে হল যেন স্বয়ং রামকে পেয়েছেন। নগরের নরনারী প্রণাম করলেন, আনন্দে ব্রহ্মময় জল নিরীক্ষণ করলেন। স্নান করে হাত জোড় করে প্রার্থনা করলেন যে রামচন্দ্রের চরণে প্রীতি যেন স্বল্প না হয়। ভরত বললেন, হে দেবনদী, তোমার বালুকা সকল সুখ দান করে, সেবকের কাছে সুরধেনু সমান। হাত জোড় করে এই বর চাই, সীতা রামের চরণে সহজ প্রেম হোক।
দোহা 197
एहि बिधि मज्जनु भरतु करि गुर अनुसासन पाइ।मातु नहानीं जानि सब डेरा चले लवाइ।।197।।
ehi bidhi majjanu bharatu kari gura anusāsana pāi |mātu nahānīṁ jāni saba ḍerā cale lavāi ||197||
এইভাবে ভরত স্নান করলেন এবং গুরুর আদেশ পেয়ে, সমস্ত মাতাগণ স্নান সম্পন্ন করেছেন জেনে, তাঁদের নিয়ে শিবিরে ফিরে চললেন।
চৌপাই 198.1-4
जहँ तहँ लोगन्ह डेरा कीन्हा।भरत सोधु सबही कर लीन्हा।।
सुर सेवा करि आयसु पाई।राम मातु पहिं गे दोउ भाई।।
चरन चाँपि कहि कहि मृदु बानी।जननीं सकल भरत सनमानी।।
भाइहि सौंपि मातु सेवकाई।आपु निषादहि लीन्ह बोलाई।।
चले सखा कर सों कर जोरें।सिथिल सरीर सनेह न थोरें।।
पूँछत सखहि सो ठाउँ देखाऊ।नेकु नयन मन जरनि जुड़ाऊ।।
जहँ सिय रामु लखनु निसि सोए।कहत भरे जल लोचन कोए।।
भरत बचन सुनि भयउ बिषादू।तुरत तहाँ लइ गयउ निषादू।।
jahã tahã loganha ḍerā kīnhā |bharata sodhu sabahī kara līnhā ||
sura sevā kari āyasu pāī |rāma mātu pahiṁ ge dou bhāī ||
carana cā̃pi kahi kahi mṛdu bānī |jananīṁ sakala bharata sanamānī ||
bhāihi sauṁpi mātu sevakāī |āpu niṣādahi līnha bolāī ||
cale sakhā kara soṁ kara joreṁ |sithila sarīra saneha na thoreṁ ||
pū̃chata sakhahi so ṭhāũ dekhāū |neku nayana mana jarani juṛāū ||
jahã siya rāmu lakhanu nisi soe |kahata bhare jala locana koe ||
bharata bacana suni bhayau biṣādū |turata tahā̃ lai gayau niṣādū ||
লোকেরা এদিক-ওদিক শিবির স্থাপন করল, ভরত সকলের যত্ন নিলেন। দেবতাদের সেবা করে অনুমতি পেয়ে, দুই ভাই রামের মাতার কাছে গেলেন। চরণ চেপে বারবার কোমল বাণী বলে, ভরত সকল মাতাকে সম্মান করলেন। মাতার সেবা ভাইকে সঁপে দিয়ে, তিনি নিজে নিষাদকে ডেকে নিলেন। সখার হাতে হাত রেখে চললেন, শরীর শিথিল, প্রেম অল্প নয়। সখাকে বললেন, সেই স্থান দেখাও, যেন চোখ ও মনের দাহ কিছুটা শান্ত হয়। যেখানে সীতা, রাম, লক্ষ্মণ সেই রাতে ঘুমিয়েছিলেন, কথা বলতে বলতে তাঁর চোখে জল ভরে গেল। ভরতের কথা শুনে নিষাদ শোকে ভরে গেলেন, এবং তক্ষুণ সেখানে তাঁকে নিয়ে গেলেন।
দোহা 198
जहँ सिंसुपा पुनीत तर रघुबर किय बिश्रामु।अति सनेहँ सादर भरत कीन्हेउ दंड प्रनामु।।198।।
jahã siṁsupā punīta tara raghubara kiya biśrāmu |ati sanehã sādara bharata kīnheu daṁḍa pranāmu ||198||
যেখানে পবিত্র শিসম বৃক্ষের নিচে রঘুবর বিশ্রাম করেছিলেন, সেখানে ভরত অত্যন্ত স্নেহ ও শ্রদ্ধার সঙ্গে দণ্ডবৎ প্রণাম করলেন।
চৌপাই 199.1-4
कुस साँथरीनिहारि सुहाई।कीन्ह प्रनामु प्रदच्छिन जाई।।
चरन रेख रज आँखिन्ह लाई।बनइ न कहत प्रीति अधिकाई।।
कनक बिंदु दुइ चारिक देखे।राखे सीस सीय सम लेखे।।
सजल बिलोचन हृदयँ गलानी।कहत सखा सन बचन सुबानी।।
श्रीहत सीय बिरहँ दुतिहीना।जथा अवध नर नारि बिलीना।।
पिता जनक देउँ पटतर केही।करतल भोगु जोगु जग जेही।।
ससुर भानुकुल भानु भुआलू।जेहि सिहात अमरावतिपालू।।
प्राननाथु रघुनाथ गोसाई।जो बड़ होत सो राम बड़ाई।।
kusa sā̃tharīnihāri suhāī |kīnha pranāmu pradacchina jāī ||
carana rekha raja ā̃khinha lāī |banai na kahata prīti adhikāī ||
kanaka biṁdu dui cārika dekhe |rākhe sīsa sīya sama lekhe ||
sajala bilocana hṛdayã galānī |kahata sakhā sana bacana subānī ||
śrīhata sīya birahã dutihīnā |jathā avadha nara nāri bilīnā ||
pitā janaka deũ paṭatara kehī |karatala bhogu jogu jaga jehī ||
sasura bhānukula bhānu bhuālū |jehi sihāta amarāvatipālū ||
prānanāthu raghunātha gosāī |jo baṛa hota so rāma baṛāī ||
কুশ ঘাসের সুন্দর শয্যা দেখে ভরত প্রদক্ষিণ করে প্রণাম করলেন। পায়ের চিহ্নযুক্ত ধূলি চোখে লাগালেন; তাঁর প্রেমের আধিক্য বলা যায় না। দুই-চারটি স্বর্ণ বিন্দু দেখে মস্তকে ধারণ করলেন, সীতার সমান গণনা করে। সজল নয়নে হৃদয়ে বিষাদ নিয়ে সখার কাছে মধুর বাক্য বললেন। সীতা বিহনে এই বিন্দুগুলি কান্তিহীন ও ম্লান, যেমন অযোধ্যার নর-নারীরা বিষণ্ণ ও নিমগ্ন। তাঁর পিতা জনক: তাঁর সঙ্গে কাহার তুলনা করব, যাঁহার জন্য জগতের ভোগ ও যোগ একসঙ্গে হাতের তালুতে। শ্বশুর সূর্যবংশীয় রাজা, যাঁকে অমরাবতীর অধিপতি ইন্দ্রও ঈর্ষা করেন। প্রাণের প্রিয় স্বামী রাম, রঘুকুলের স্বামী, যাঁর মহিমায় যে বড় সে বড় হয়।
দোহা 199
पति देवता सुतीय मनि सीय साँथरी देखि।बिहरत हृदउ न हहरि हर पबि तें कठिन बिसेषि।।199।।
pati devatā sutīya mani sīya sā̃tharī dekhi |biharata hṛdau na hahari hara pabi teṁ kaṭhina biseṣi ||199||
স্বামীকে দেবতা মনে করে এমন পতিব্রতা, সতীনারীর মণি সীতার তৃণশয্যা দেখে শোকে আমার হৃদয় ফেটে ভাঙে না, তবে তা নিশ্চয়ই ইন্দ্রের বজ্র অপেক্ষাও কঠিন।
परंपरा में इस खंड का फल ‘भ्रातृ-प्रेम, वैर-शमन, और नाम-विश्वास की दृढ़ता’ कहा जाता है। विशेषतः ‘राम नाम महिमा’ (दोहा 194 के भाव) के पाठ से पाप-संस्कार क्षीण होते हैं और साधक में निष्कपट भक्ति (अहं-रहित स्नेह) जाग्रत होती है।
लोक-परंपरा में ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ (नाम-संकीर्तन-सम्पुट) या ‘राम राम’ का जप-सम्पुट इस प्रसंग में जोड़ा जाता है, क्योंकि यहाँ नाम-महिमा और गंगा-तट-स्मरण प्रधान है। (क्षेत्र/सम्प्रदाय के अनुसार सम्पुट-रूप बदल सकता है।)
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