
Draupadī’s Instruction on Marital Conduct and Household Discipline (चित्तग्रहण-उपदेश)
Upa-parva: Strī-dharma and Gṛha-nīti Discourse (Draupadī’s Counsel Episode)
This adhyāya records Draupadī’s structured counsel describing an “apeta-doṣa” (fault-avoiding) path for sustaining the husband’s goodwill and reducing conflict with co-wives. She frames the husband as a decisive locus of prosperity and harm, asserting that favor yields desired outcomes while anger brings severe consequences. The instruction emphasizes that comfort is not obtained through comfort alone; disciplined effort and forbearance are presented as means to secure well-being. Practical directives follow: affectionate service, pleasing food and adornment, prompt and respectful reception at the doorway, and personal initiative even when attendants are tasked. Draupadī advises guarding private speech shared by the husband to prevent alienation through misreporting. She recommends cultivating the husband’s allies and benefactors while distancing from his adversaries, avoiding arrogance and heedlessness, and maintaining restraint and silence when appropriate. The chapter ends with guidance on suitable female companionship—associating with reputable, virtuous women and avoiding disruptive or criminal company—presented as conducive to reputation, religious merit, and social stability.
Chapter Arc: राजन्! वंश-परम्परा के ज्ञाता द्विजाति बताते हैं कि जो अग्नि सबको परिचित है, वही अनेक नाम-रूपों में प्रकट होकर असंख्य ‘धिष्ण्य’ और अग्नि-वंशों का मूल बनता है। → कथन विस्तार पाता है—पूर्वोक्त चालीस पुत्रों के अतिरिक्त भी पाँच पुत्रों का उल्लेख, फिर ‘पावक’ को भूतों का पति, भुवन-भर्ता और महातेजस्वी कहकर उसकी सर्वव्यापकता स्थापित की जाती है। अग्नि विविध देशों में विचरता है; समुद्र के भीतर नाना स्थानों में भ्रमण करता हुआ अनेक धिष्ण्यों/देव-आश्रयों की उत्पत्ति का कारण बनता है। → नदियों को धिष्ण्यों की ‘माताएँ’ घोषित कर (सिन्धु, पंचनद, देविका, सरस्वती, गंगा, शतकुम्भा, सरयू, गण्डकी, चर्मण्वती, मही आदि) अग्नि-तत्त्व का भूगोल और वंश एक साथ बाँध दिया जाता है—और फिर निर्णायक वाक्य आता है: सब अग्नियों में एक ही हुताशन है; जैसे ज्योतिष्टोम यज्ञ एक होकर भी अनेक विधियों में प्रकट होता है, वैसे ही ‘एक’ अग्नि बहुधा निःसृत है। → वक्ता क्रमबद्ध रूप से इन ‘अप्रमेय, तिमिरापह, श्रीमन्त’ अग्नियों की उत्पत्ति-परम्परा समेटता है और श्रोता को निष्कर्ष देता है—अद्भुत-अग्नि का माहात्म्य जैसा वेदों में है, वैसा ही सब अग्नियों का समझो; भेद नाम-रूप का है, तत्त्व एक है।
Verse 1
हि ० आय न | हि 7 आम ३. तप अर्थात् पांचजन्यके जो पूर्वोक्त चालीस पुत्र बताये गये हैं, उनके सिवा, पाँच पुत्र और भी उन्होंने उत्पन्न किये थे। उनके नाम क्रमश: इस प्रकार हैं--पुरंदर, ऊष्मा, मनु, शम्भु और आवसथ्य। उनका तीसरेसे छठे श्लोकतक वर्णन है। २. श्रुति भी कहती है--“आदित्यो वा अस्तं यन्नग्निमनुप्रविशति ।” ३. बलद, मन्युमान् तथा विष्णु नामक अग्नि भानुकी भार्या सुप्रजासे उत्पन्न हैं। इसी प्रकार “आग्रयण' “अग्रह” और 'स्तुभ'--ये तीन अग्नि बृहद्भधासाकी संतान हैं। - मिट्टीके प्याले या पुरवेका नाम कपाल है। द्वाविशर्त्याधिकॉद्विशततमो< ध्याय: सह नामक अग्निका जलनमें प्रवेश और अथर्वा अंगिराद्धारा पुन:उनका प्राकट्य मार्कण्डेय उवाच आपस्य मुदिता भार्या सहस्य परमा प्रिया । भूपतिर्भुवभर्ता च जनयत् पावकं परम्,मार्कण्डेयजी कहते हैं--राजन्! जलमें निवासके कारण प्रसिद्ध हुए 'सह” नामक अग्निके एक परम प्रिय पत्नी थी जिसका नाम था मुदिता। उसके गर्भसे भूलोक और भुवर्लोकके स्वामी सहने “अद्भुत'- नामक उत्कृष्ट अग्निको उत्पन्न किया
মার্কণ্ডেয় বললেন—হে রাজন! জলে নিবাসের সঙ্গে সম্পর্কের কারণে ‘সহ’ নামে প্রসিদ্ধ অগ্নির মুদিতা নামে এক পরমপ্রিয়া পত্নী ছিল। সেই ভূ-পতি ও ভুবন-ভর্তা সহ, তার গর্ভে ‘অদ্ভুত’ নামে পরম শ্রেষ্ঠ পাৱককে উৎপন্ন করলেন।
Verse 2
भूतानां चापि सर्वेषां य॑ प्राहु: पावकं पतिम् | आत्मा भुवनभर्तेति सान्वयेषु द्विजातिषु,ब्राह्मणलोगोंमें वंशपरम्पराके क्रमसे सभी यह मानते और कहते हैं कि “अद्भुत” नामक अग्नि सम्पूर्ण भूतोंके अधिपति हैं। वे ही सबके आत्मा और भुवनभर्ता हैं
বংশ-পরম্পরা রক্ষাকারী দ্বিজদের মধ্যে এই কথাই প্রচলিত—‘পাৱক’ই সকল ভূতের অধিপতি; তিনিই সকলের অন্তরাত্মা এবং ভুবন-ভর্তা।
Verse 3
महतां चैव भूतानां सर्वेषामिह यः पति: । भगवान् स महातेजा नित्यं चरति पावक:,“वे ही इस जगतके सम्पूर्ण महाभूतोंके पति हैं। उनमें सम्पूर्ण ऐश्वर्य सुशोभित हैं। वे महातेजस्वी अग्निदेव सदा सर्वत्र विचरण करते हैं
যিনি এই জগতে সকল মহাভূত—এবং সকল সত্তার—অধিপতি, তিনিই ভগবান। সেই মহাতেজস্বী পাৱক সর্বদা সর্বত্র বিচরণ করেন।
Verse 4
अन्निर्गुहपतिर्नाम नित्य यज्ञेषु पूज्यते । हुतं वहति यो हव्यमस्य लोकस्य पावक:,“जो अग्नि गृहपति नामसे सदा यज्ञमें पूजित होते हैं तथा हवन किये गये हविष्यको देवताओंके पास पहुँचाते हैं, वे अद्भुत अग्नि ही इस जगत्को पवित्र करनेवाले हैं
মার্কণ্ডেয় বললেন—যে অগ্নি ‘গৃহপতি’ নামে সর্বদা যজ্ঞে পূজিত হন, তিনিই অর্পিত হব্য দেবতাদের নিকট বহন করেন; সেই আশ্চর্য পাৱকই এই জগতকে পবিত্র করেন।
Verse 5
अपां गर्भो महाभागः सच्त्वभुग् यो महाद्धुत: । भूपतिर्भुवभर्ता च महत: पतिरुच्यते,“जो “आप' नामवाले सहके पुत्र हैं, जो महाभाग, सत्त्वभोक्ता, भूलोकके पालक और भुवर्लोकके स्वामी हैं, वे अद्भुत नामक महान् अग्नि बुद्धितत््वके अधिपति बताये जाते हैं!
মার্কণ্ডেয় বললেন—তিনি ‘অপাং গর্ভ’ নামে খ্যাত—মহাভাগ্যবান এবং সকল সত্ত্বের ভোক্তা; তিনিই মহান ‘অদ্ভুত’, পৃথিবীর অধিপতি ও লোকসমূহের ধারক; এবং তাঁকেই ‘মহৎ’ তত্ত্বের অধিপতি বলা হয়।
Verse 6
दहन् मृतानि भूतानि तस्याग्निर्भरतो5भवत् | अग्निष्टोमे च नियत: क्रतुश्रेष्ठो भरस्य तु,“उन्हीं “अद्भुत” या गृहपतिके एक अग्निस्वरूप पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसका नाम “भरत' है। ये मरे हुए प्राणियोंके शवका दाह करते हैं। भरतका अग्निष्टोम यज्ञमें नित्य निवास है, इसलिये उन्हें “नियत” भी कहते हैं। नियतका संकल्प उत्तम है
মার্কণ্ডেয় বললেন—সেই গৃহপতি-অগ্নিরই অগ্নিরূপ পুত্র জন্মাল, যার নাম ‘ভরত’ প্রসিদ্ধ। সে মৃত প্রাণীদের দেহ দহন করে। আর ভরত যেহেতু অগ্নিষ্টোম—যজ্ঞশ্রেষ্ঠ—এ সর্বদা স্থিত, তাই সে ‘নিয়ত’ নামেও পরিচিত; যার সংকল্প উৎকৃষ্ট।
Verse 7
स वद्िः प्रथमो नित्य देवैरन्विष्यते प्रभु: । आयान्तं नियतं दृष्टवा प्रविवेशार्णवं भयात्,“प्रथम अग्नि 'सह' बड़े प्रभावशाली हैं। एक समय देवतालोग उनको हढूँढ़ रहे थे। उनके साथ अपने पौत्र नियतको भी आता देख (उससे छू जानेके) भयसे वे समुद्रके भीतर घुस गये
মার্কণ্ডেয় বললেন—‘সহ’ নামে সেই প্রথম, নিত্য ও প্রভু অগ্নিকে এক সময় দেবতারা খুঁজছিলেন। নিজের পৌত্র নিয়তকে আসতে দেখে, তার স্পর্শের ভয়ে, সে আতঙ্কে সমুদ্রে প্রবেশ করল।
Verse 8
देवास्तत्रापि गच्छन्ति मार्गमाणा यथादिशम् | दृष्टवा त्वग्निरथर्वाणं ततो वचनमत्रवीत्,तब देवतालोग सब दिशाओंमें उनकी खोज करते हुए वहाँ भी पहुँचने लगे। एक दिन अथर्वा (अंगिरा)-को देखकर अग्निने उनसे कहा--
মার্কণ্ডেয় বললেন—নির্দেশমতো খুঁজতে খুঁজতে দেবতারা সেখানেও পৌঁছালেন। তখন অগ্নি অথর্বাকে দেখে তার সঙ্গে কথা বলল।
Verse 9
देवानां वह हव्यं त्वमहं वीर सुदुर्बल: । अथ त्वं गच्छ मध्वक्ष॑ प्रियमेतत् कुरुष्व मे,वीर! तुम देवताओंके पास उनका हविष्य पहुँचाओ। मैं अत्यन्त दुर्बल हो गया हूँ। अब केवल तुम्हीं अग्निपदपर प्रतिष्ठित हो जाओ और मेरा यह प्रिय कार्य सम्पन्न करो”
মার্কণ্ডেয় বললেন—“হে বীর, দেবতাদের উদ্দেশ্যে নির্দিষ্ট হব্য তুমি বহন করো। আমি অতিশয় দুর্বল হয়ে পড়েছি। অতএব, হে মধুনয়ন, তুমি এখন যাও এবং আমার প্রিয় এই কাজ—এই অভীষ্ট কর্তব্য—সম্পন্ন করো, হে শূর!”
Verse 10
प्रेष्य चाग्निरथर्वाणमन्यं देशं ततो5गमत् । मत्स्यास्तस्य समाचख्यु: क्रुद्धस्तानग्निरब्रवीत् भक्ष्या वै विविधैभविर्भविष्यथ शरीरिणाम्
অথর্বাকে পাঠিয়ে অগ্নি তারপর অন্য দেশে চলে গেলেন। মাছেরা সেই সংবাদ তাঁকে জানাল; এতে ক্রুদ্ধ হয়ে অগ্নি বললেন—“তোমরা নিশ্চয়ই নানাভাবে দেহধারীদের খাদ্য হবে, এবং যজ্ঞে নানা রূপে নিবেদিত হবে।”
Verse 11
इस प्रकार अथर्वाको भेजकर अग्निदेव दूसरे स्थानमें चले गये। किंतु मत्स्योंने अथर्वासे उनकी स्थिति कहाँ है, यह बता दिया। इससे कुपित होकर अग्निने उन्हें शाप देते हुए कहा --“तुम लोग नाना प्रकारसे जीवोंके भक्ष्य बनोगे” ।। अथर्वाणं तथा चापि हव्यवाहो<ब्रवीद् वच:,तदनन्तर अग्निने अथर्वासे फिर वही बात कही। उस समय देवताओंके कहनेसे अथर्वा मुनिने सह नामक अग्निदेवसे अत्यन्त अनुनय-विनय की; परन्तु उन्होंने न तो हविष्य ढोनेका भार लेनेकी इच्छा की और न वे अपने उस जीर्ण शरीरका ही भार सह सके। अन्ततोगत्वा उन्होंने शरीर त्याग दिया
মার্কণ্ডেয় বললেন—অথর্বাকে পাঠিয়ে হব্যবাহক অগ্নি অন্য স্থানে চলে গেলেন। কিন্তু মাছেরা অথর্বাকে জানিয়ে দিল অগ্নি কোথায় আছেন। এতে ক্রুদ্ধ হয়ে অগ্নি তাদের অভিশাপ দিয়ে বললেন—“তোমরা নানাভাবে দেহধারীদের খাদ্য হবে।” তারপর অগ্নি আবারও অথর্বাকে সেই কথাই বললেন। তখন দেবতাদের অনুরোধে মুনি অথর্বা ‘সহ’ নামে খ্যাত অগ্নিদেবকে অত্যন্ত বিনীতভাবে প্রার্থনা করলেন; কিন্তু অগ্নি না হব্য বহনের ভার নিতে চাইলেন, না নিজের জীর্ণ দেহের ভারই সহ্য করতে পারলেন। শেষে তিনি দেহ ত্যাগ করলেন।
Verse 12
अनुनीयमानो हि भृशं देववाक्याद्धि तेन सः । नैच्छद् वोढुं हवि: सोढुं शरीरं चापि सो5त्यजत्,तदनन्तर अग्निने अथर्वासे फिर वही बात कही। उस समय देवताओंके कहनेसे अथर्वा मुनिने सह नामक अग्निदेवसे अत्यन्त अनुनय-विनय की; परन्तु उन्होंने न तो हविष्य ढोनेका भार लेनेकी इच्छा की और न वे अपने उस जीर्ण शरीरका ही भार सह सके। अन्ततोगत्वा उन्होंने शरीर त्याग दिया
দেবতাদের কথায় বারবার অত্যন্ত অনুনয় করা হলেও তিনি সম্মতি দিলেন না। তিনি না হব্য বহনের ভার নিতে চাইলেন, না নিজের জীর্ণ দেহের ভারই সহ্য করতে পারলেন। শেষে তিনি দেহ ত্যাগ করলেন।
Verse 13
स तच्छरीरं संत्यज्य प्रविवेश धरां तदा । भूमिं स्पृष्टासजद् धातून् पृथक् पृथगतीव हि,उस समय अपने उस शरीरको त्यागकर वे धरतीमें समा गये। भूमिका स्पर्श करके उन्होंने पृथक्ू-पृथक् बहुत-से धातुओंकी सृष्टि की
তখন তিনি সেই দেহ ত্যাগ করে পৃথিবীতে প্রবেশ করলেন। ভূমি স্পর্শ করে তিনি অতি প্রাচুর্যে নানা ধাতুর সৃষ্টি করলেন—প্রত্যেককে পৃথক পৃথকভাবে।
Verse 14
पूयात् स गन्ध॑ तेजश्न अस्थिभ्यो देवदारु च । श्लेष्मण: स्फाटिकं तस्य पित्तान्मारकतं तथा,“सह” नामक अग्निने अपने पीब तथा रक्तसे गन्धक एवं तैजस धातुओंको उत्पन्न किया। उनकी हडियोंसे देवदारुके वृक्ष प्रकट हुए। कफसे स्फटिक तथा पित्तसे मरकतमणिका प्रादुर्भाव हुआ
মার্কণ্ডেয় বললেন— তার পুঁজ থেকে গন্ধক ও তেজোময় পদার্থ উৎপন্ন হল; তার অস্থি থেকে দেবদারু বৃক্ষ প্রকাশ পেল। তার শ্লেষ্মা থেকে স্ফটিক, আর পিত্ত থেকে তদ্রূপ মরকত মণির উদ্ভব হল।
Verse 15
यकृत् कृष्णायसं तस्य त्रिभिरेव बभु: प्रजा: । नखास्तस्याभ्रपटलं शिराजालानि विद्रुमम्,और उनका यकृत् (जिगर) ही काले रंगका लोहा बनकर प्रकट हुआ। काष्ठ, पाषाण और लोहा--इन तीनोंसे ही प्रजाजनोंकी शोभा होती है। उनके नख मेघसमूहका रूप धारण करते हैं। नाडियाँ मूँगा बनकर प्रकट हुई हैं
মার্কণ্ডেয় বললেন— তার যকৃত কালো লোহারূপে প্রকাশ পেল। কেবল তিন পদার্থ—কাঠ, পাথর ও লোহা—দ্বারাই প্রজারা তাদের স্বরূপ ও শোভা লাভ করল। তার নখ মেঘপুঞ্জের ন্যায় হল, আর শিরাজালের জাল প্রবালরূপে প্রকাশ পেল।
Verse 16
शरीराद् विविधाश्रान्ये धातवोडस्थाभवन् नृप । एवं त्यक्त्वा शरीरं च परमे तपसि स्थित:,राजन्! सह अग्निके शरीरसे अन्य नाना प्रकारके धातु उत्पन्न हुए। इस प्रकार शरीर त्यागकर वे बड़ी भारी तपस्यामें लग गये
মার্কণ্ডেয় বললেন— হে রাজন, তার দেহ থেকে আরও নানা প্রকার ধাতু উৎপন্ন হল; অস্থিও প্রকাশ পেল। এভাবে দেহ ত্যাগ করে তিনি পরম তপস্যায় প্রতিষ্ঠিত রইলেন।
Verse 17
भग्व्धिरादिभिर्भूयस्तपसोत्थापितस्तदा । भृशं जज्वाल तेजस्वी तपसा55प्यायित: शिखी,जब भृगु और अंगिरा आदि ऋषियोंने पुनः: उनको तपस्यासे उपरत कर दिया, तब वे तपस्यासे पुष्ट हुए तेजस्वी अग्निदेव अत्यन्त प्रज्वलित हो उठे
মার্কণ্ডেয় বললেন— তখন ভৃগু, অঙ্গিরা প্রভৃতি ঋষিগণ পুনরায় তাদের তপস্যাবলে তাঁকে উদ্দীপ্ত করলেন। তপস্যায় পুষ্ট তেজসম্পন্ন সেই অগ্নিদেব প্রবলভাবে জ্বলে উঠলেন।
Verse 18
दृष्टवा ऋषिं भयाच्चापि प्रविवेश महार्णवम् | तस्मिन् नष्टे जगद् भीतमथर्वाणमथाश्रितम् | अर्चयामासुरेवैनमथर्वाणं सुरादय:,महर्षि अंगिराको सामने देख वे अग्नि भयके मारे पुनः महासागरके भीतर प्रविष्ट हो गये। इस प्रकार अग्निके अदृश्य हो जानेपर सारा संसार भयभीत हो अथर्वा--अंगिराकी शरणमें आया तथा देवताओंने इन अथर्वाकी पूजा की
মার্কণ্ডেয় বললেন— ঋষিকে দেখে এবং ভয়ে সে (অগ্নি) পুনরায় মহাসমুদ্রে প্রবেশ করল। সে অদৃশ্য হলে সমগ্র জগৎ ভীত হয়ে অথর্বার শরণ নিল; আর দেবতাগণ প্রভৃতিও সেই অথর্বার পূজা করল।
Verse 19
अथर्वा त्वसृजललोकानात्मना55लोक्य पावकम् । मिषतां सर्वभूतानामुन्ममाथ महार्णवम्,अथरवनि सब प्राणियोंके देखते-देखते समुद्रकों मथ डाला और अग्निदेवका दर्शन करके स्वयं ही सम्पूर्ण लोकोंकी सृष्टि की
মার্কণ্ডেয় বললেন—অথর্বা নিজের তেজে লোকসমূহ সৃষ্টি করলেন। অগ্নিদেবকে দর্শন করে, সকল প্রাণীর দৃষ্টির সামনেই তিনি মহাসমুদ্র মন্থন করলেন।
Verse 20
एवमग्निर्भगवता नष्ट: पूर्वमथर्वणा । आहूत: सर्वभूतानां हव्यं वहति सर्वदा,इस प्रकार पूर्वकालमें अदृश्य हुए अग्निको भगवान् अंगिराने फिर बुलाया। जिससे प्रकट होकर वे सदा सम्पूर्ण प्राणियोंका हविष्य वहन करते हैं
এইভাবে পূর্বকালে অন্তর্হিত অগ্নিকে ভগবান্ অথর্বা পুনরায় আহ্বান করলেন। প্রকাশিত হয়ে তিনি সর্বদা সকল প্রাণীর হব্য বহন করেন।
Verse 21
एवं त्वजनयद् धिष्ण्यान् वेदोक्तान् विबुधान् बहून् । विचरन् विविधान् देशान् भ्रममाणस्तु तत्र वै,उस समुद्रके भीतर नाना स्थानोंमें विचरण एवं भ्रमण करते हुए सह अग्निने इसी प्रकार विविध भाँतिके बहुत-से वेदोक्त अग्निदेवों तथा उनके स्थानोंको उत्पन्न किया
এইভাবে সেখানে নানা দেশে বিচরণ ও ভ্রমণ করতে করতে তিনি বেদে উক্ত বহু ধিষ্ণ্য (অগ্নিস্থান) এবং বহু দেবতাকে উৎপন্ন করলেন।
Verse 22
सिन्धुनदं पञजचनदं देविकाथ सरस्वती । गड़ा च शतकुम्भा च सरयूर्गण्डसाह्दया,एता नद्यस्तु धिष्ण्यानां मातरो या: प्रकीर्तिता: । सिन्धुनद, पंचनद, देविका, सरस्वती, गंगा, शतकुम्भा, सरयू, गण्डकी, चर्मण्वती, मही, मेध्या, मेधातिथि, ताम्रवती, वेत्रवती, कौशिकी, तमसा, नर्मदा, गोदावरी, वेणा, उपवेणा, भीमा, वडवा, भारती, सुप्रयोगा, कावेरी, मुर्मुरा, तुंगवेणा, कृष्णवेणा, कपिला तथा शोणभद्र “-ये सब नदियाँ और नद हैं, जो अग्नियोंके उत्पत्ति-स्थान कहे गये हैं
মার্কণ্ডেয় বললেন—সিন্ধু, পঞ্চনদ, দেবিকা ও সরস্বতী; গঙ্গা ও শতকুম্ভা; সরযূ ও গণ্ডকী—এই নদীগুলিই ধিষ্ণ্যগুলির ‘মাতা’ বলে খ্যাত।
Verse 23
चर्मण्वती मही चैव मेध्या मेधातिथिस्तदा । ताम्रवती वेत्रवती नद्यस्तिस्रो5<थ कौशिकी
আরও আছে চর্মণ্বতী ও মহী; তারপর মেধ্যা ও মেধাতিথি; তদ্রূপ তাম্রবতী ও বেত্রবতী—এই তিন নদী—এবং পরে কৌশিকীও।
Verse 24
तमसा नर्मदा चैव नदी गोदावरी तथा । वेणोपवेणा भीमा च वडवा चैव भारत
মার্কণ্ডেয় বললেন—হে ভারত! তমসা, নর্মদা ও গোদাবরী; তদ্রূপ বেণা, উপবেণা, ভীমা এবং বডবা—এই সকল নদীও পবিত্র।
Verse 25
भारती सुप्रयोगा च कावेरी मुर्मुरा तथा । तुड़्वेणा कृष्णवेणा कपिला शोण एव च
মার্কণ্ডেয় বললেন—(সেখানে) ভারতী ও সুপ্রয়োগা, এবং কাবেরী ও মুর্মুরা; তদ্রূপ তুড্বেণা, কৃষ্ণবেণা, কপিলা এবং শোণ নদীও আছে।
Verse 26
अद्भुतस्य प्रिया भार्या तस्य पुत्रो विभूरसि:,अद्भुतकी जो प्रियतमा पत्नी है, उसके गर्भसे उनके “विभूरसि” नामक पुत्र हुआ। अग्नियोंकी जितनी संख्या बतायी गयी है, सोमयागोंकी भी उतनी ही है। वे सब अग्नि ब्रद्माजीके मानसिक संकल्पसे अत्रिके वंशमें उनकी संतानरूपसे उत्पन्न हुए हैं
মার্কণ্ডেয় বললেন—অদ্ভুতের এক প্রিয় পত্নী ছিল; তার গর্ভ থেকে ‘বিভূরসি’ নামে এক পুত্র জন্ম নিল। যতগুলি পাৱক (অগ্নি) বলা হয়েছে, ততগুলিই সোমযাগ। সেই সকল পবিত্র অগ্নি ব্রহ্মার মানস সংকল্পে অত্রির বংশে সন্তানরূপে প্রকাশিত হয়েছিল।
Verse 27
यावन्तः पावकाः: प्रोक्ता: सोमास्तावन्त एव तु । अन्रेश्नाप्यन्वये जाता ब्रह्मणो मानसा: प्रजा:,अद्भुतकी जो प्रियतमा पत्नी है, उसके गर्भसे उनके “विभूरसि” नामक पुत्र हुआ। अग्नियोंकी जितनी संख्या बतायी गयी है, सोमयागोंकी भी उतनी ही है। वे सब अग्नि ब्रद्माजीके मानसिक संकल्पसे अत्रिके वंशमें उनकी संतानरूपसे उत्पन्न हुए हैं
মার্কণ্ডেয় বললেন—যতগুলি পাৱক (অগ্নি) ঘোষিত হয়েছে, ততগুলিই সোমযাগ। সেই অগ্নিগুলি সাধারণ দেহজ জন্মে নয়; ব্রহ্মার মানস-সন্তানরূপে বংশপরম্পরায় প্রকাশিত হয়েছিল।
Verse 28
अत्रि: पुत्रान् स्रष्टकामस्तानेवात्मन्यधारयत्
মার্কণ্ডেয় বললেন—পুত্রসৃষ্টি করতে ইচ্ছুক হয়ে অত্রি প্রথমে তাদের নিজের অন্তরেই ধারণ করলেন।
Verse 29
तस्य तद्ब्रह्मणः कार्यन्निर्हरन्ति हुताशना: । अत्रिको जब प्रजाकी सृष्टि करनेकी इच्छा हुई, तब उन्होंने उन अग्नियोंको ही अपने हृदयमें धारण किया। फिर उन ब्रह्मर्षिके शरीरसे विभिन्न अग्नियोंका प्रादुर्भाव हुआ ।। २८ ई || एवमेते महात्मान: कीर्तितास्ते5ग्नयो मया
সেই হুতাশনগণ সেই ব্রহ্মকার্যের ভার বহন করেন। যখন অত্রির প্রজাসৃষ্টি করার ইচ্ছা জাগল, তখন তিনি সেই অগ্নিগুলিকেই হৃদয়ে ধারণ করলেন। পরে সেই ব্রহ্মর্ষির দেহ থেকে নানা অগ্নির আবির্ভাব হল। এইরূপে সেই মহাত্মা অগ্নিগণকে আমি তোমাদের নিকট কীর্তন করলাম।
Verse 30
अद्भुतस्य तु माहात्म्यं यथा वेदेषु कीर्तितम्
এখন আমি সেই অদ্ভুত সত্তার মাহাত্ম্য বলব, যেমনটি বেদে কীর্তিত হয়েছে।
Verse 32
इत्येष वंश: सुमहानग्नीनां कीर्तितो मया । योडर्चितो विविधैर्मन्त्रैहव्यं वहति देहिनाम्,इस प्रकार मेरेद्वारा अग्निदेवके महान् वंशका प्रतिपादन किया गया। वे भगवान् अग्नि विविध वेदमन्त्रोंद्वार पूजित होकर देहधारियोंके दिये हुए हविष्यको देवताओंके पास पहुँचाते हैं
এইভাবে অগ্নিদেবদের অতি মহান বংশ আমি কীর্তন করলাম। নানাবিধ মন্ত্রে পূজিত হয়ে সেই দেব অগ্নি দেহধারীদের অর্পিত হব্য বহন করে দেবতাদের নিকট পৌঁছে দেন।
Verse 222
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि आज्ञिरसोपाख्यानेडग्निसमुद्धवे द्वाविंशत्यधिकद्विशततमो5ध्याय:
এইভাবে শ্রীমহাভারতের বনপর্বে, মার্কণ্ডেয়-সমাস্যাপর্বের অন্তর্গত আজ্ঞিরসোপাখ্যানে—অগ্নির উদ্ভব প্রসঙ্গে—দ্বিশতদ্বাবিংশ অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Verse 253
एता नद्यस्तु धिष्ण्यानां मातरो या: प्रकीर्तिता: । सिन्धुनद, पंचनद, देविका, सरस्वती, गंगा, शतकुम्भा, सरयू, गण्डकी, चर्मण्वती, मही, मेध्या, मेधातिथि, ताम्रवती, वेत्रवती, कौशिकी, तमसा, नर्मदा, गोदावरी, वेणा, उपवेणा, भीमा, वडवा, भारती, सुप्रयोगा, कावेरी, मुर्मुरा, तुंगवेणा, कृष्णवेणा, कपिला तथा शोणभद्र “-ये सब नदियाँ और नद हैं, जो अग्नियोंके उत्पत्ति-स्थान कहे गये हैं
এই নদীগুলিই ধিষ্ণ্য (যজ্ঞাগ্নি-স্থাপনাস্থল)-এর ‘মাতা’ বলে কীর্তিত—যেখান থেকে যজ্ঞাগ্নি প্রতিষ্ঠিত ও পুষ্ট হয়: সিন্ধু, পঞ্চনদ, দেবিকা, সরস্বতী, গঙ্গা, শতকুম্ভা, সরযূ, গণ্ডকী, চর্মণ্বতী, মহী, মেধ্যা, মেধাতিথি, তাম্রবতী, বেত্রবতী, কৌশিকী, তমসা, নর্মদা, গোদাবরী, বেণা, উপবেণা, ভীমা, বডবা, ভারতী, সুপ্রয়োগা, কাবেরী, মুর্মুরা, তুঙ্গবেণা, কৃষ্ণবেণা, কপিলা এবং শোণভদ্র। এ সকল নদীই অগ্নির উৎপত্তিস্থানরূপে স্মৃত।
Verse 293
अप्रमेया यथोत्पन्ना: श्रीमन्तस्तिमिरापहा: । राजन्! इस प्रकार मैंने इन अप्रमेय, अन्धकारनिवारक तथा दीप्तिमान् महामना अग्नियोंकी जिस क्रमसे उत्पत्ति हुई है, उसका तुमसे वर्णन किया
মার্কণ্ডেয় বললেন—হে রাজন, এইভাবে আমি ক্রমানুসারে তোমাকে বর্ণনা করলাম কীভাবে সেই অপরিমেয়, অন্ধকার-নিবারক, দীপ্তিমান ও মহাত্মা অগ্নিসমূহের উৎপত্তি হয়েছিল।
Verse 306
तादृशं विद्धि सर्वेषामेको होषु हुताशन: । वेदोंमें "अद्भुत! नामक अग्निके माहात्म्यका जैसा वर्णन है, वैसा ही सब अग्नियोंका समझना चाहिये; क्योंकि इन सबमें एक ही अग्नितत्त्व विद्यमान है
মার্কণ্ডেয় বললেন—সমস্ত অগ্নিকেই একই স্বরূপের জেনে রাখো; কারণ সকলের মধ্যে একটিই অগ্নিতত্ত্ব বিরাজমান। অতএব বেদে যে ‘অদ্ভুত’ অগ্নির মাহাত্ম্য বর্ণিত, তা সর্বত্র অগ্নিরই মাহাত্ম্য বলে গ্রহণ করা উচিত।
Verse 316
एक एवैष भगवान् विज्ञेय: प्रथमो5जड्लिरा: ३१ ।। बहुधा निःसृतः कायाज्ज्योतिष्टोम: क्रतुर्यथा । ये प्रथम भगवान् अग्नि, जिन्हें अंगिरा भी कहते हैं, एक ही हैं, ऐसा जानना चाहिये। जैसे ज्योतिष्टोम यज्ञ उद्धिद् आदि अनेक रूपोंमें प्रकट हुआ है, उसी प्रकार एक ही अग्नितत्त्व प्रजापतिके शरीरसे विविध रूपोंमें उत्पन्न हुआ है
মার্কণ্ডেয় বললেন—এই প্রথম ভগবান অগ্নি, যাঁকে ‘অঙ্গিরা’ বলেও ডাকা হয়, তিনি প্রকৃতপক্ষে এক—এমনই জেনো। যেমন একটিই জ্যোতিষ্টোম যজ্ঞ নানা রূপে ও প্রয়োগে প্রকাশ পায়, তেমনি প্রজাপতির দেহ থেকে একটিই অগ্নিতত্ত্ব নির্গত হয়ে বহুবিধ প্রকাশে উদ্ভাসিত হয়েছে।
How to preserve marital stability and avert rivalry-driven discord through disciplined conduct—especially reception etiquette, controlled speech, and prudent social alignment within a household marked by multiple relationships and external pressures.
Affection and stability are maintained through intentional service, restraint, and situational awareness: respect in daily rituals, confidentiality, avoidance of heedlessness, and association with ethically reputable companions.
It does not present a formal phalaśruti formula; however, it implies outcomes—reputation, prosperity, social harmony, and merit—by describing the benefits of the husband’s favor and the social consequences of disciplined versus careless conduct.