Adhyaya 222
Vana ParvaAdhyaya 22234 Verses

Adhyaya 222

द्रौपदी–सत्यभामा संवादः (Draupadī and Satyabhāmā on ethical household conduct)

Upa-parva: Draupadī–Satyabhāmā Saṃvāda (Discourse on conjugal ethics and household governance)

Vaiśaṃpāyana narrates a meeting where Draupadī and Satyabhāmā sit together in a cordial setting. Satyabhāmā privately asks Draupadī how she maintains the Pandavas’ affection and compliance, explicitly inquiring about vows, austerities, ritual baths, mantras, medicines, and other techniques. Draupadī rebukes the premise, refusing to endorse ‘asat-strī’ practices, and argues that a husband who suspects mantra-based control becomes distressed rather than peaceful. She warns of the dangers of clandestine powders and poisons and of the social harms attributed to such conduct. Draupadī then enumerates her method: abandoning ego, desire, and anger; practicing careful speech and demeanor; prioritizing service and attentiveness; observing domestic discipline (timely food, cleanliness, hospitality); honoring elders (especially Kuntī); and maintaining detailed oversight of resources, guests, and staff. She portrays household stability as achieved through tireless, transparent duty and respectful comportment. Satyabhāmā, hearing the dharma-consistent explanation, apologizes for her teasing inquiry and affirms Draupadī’s conduct.

Chapter Arc: मार्कण्डेय के वचन से कथा एक अनोखे ‘यज्ञ-विश्व’ में प्रवेश करती है—जहाँ अग्नि केवल ज्वाला नहीं, देव-स्वरूप नामों और विधानों का जीवित जाल है; भूर्-भुवः-स्वः आदि महाव्याहृतियों से ध्यान-मन्त्र का आरम्भ होता है। → अग्नियों के अनेक नाम, वंश-परम्परा और यज्ञ-प्रयोग क्रमशः खुलते हैं—‘शिव’ नामक अग्नि शक्तिपूजा में रत, ‘शम्भु’ और ‘आवसथ्य’ जैसे गृह्य-अग्नि-स्वरूप, दर्श-पौर्णमास, आग्रयण आदि कर्मों में किस अग्नि को हवि मिले—यह सूक्ष्म विधान कथा को गहन बनाता है; साथ ही चेतावनी आती है कि गृहस्थ अग्नियों का दावानल से संसर्ग हो जाए तो प्रायश्चित्त-इष्टि आवश्यक है। → विधि का शिखर उस क्षण पर आता है जब प्रायश्चित्त और ‘स्विष्टकृत्’ की परम भूमिका प्रतिपादित होती है—यज्ञ की त्रुटि को ‘स्विष्ट’ बनाकर पूर्ण करने वाला अग्नि-तत्त्व ही रक्षक है; ‘विश्वपति’ नामक अग्नि को वेदों में ‘सम्पूर्ण जगत् का पति’ कहे जाने का उल्लेख इस अध्याय का दार्शनिक उत्कर्ष बनता है। → अग्नि-नामों, उनके कर्म-क्षेत्र और शुद्धि-विधानों का संहिताबद्ध निष्कर्ष देकर मार्कण्डेय आंगिरसोपाख्यान के इस खण्ड को पूर्ण करते हैं—यज्ञ की शुद्धि, नाम-स्मरण और नियत हवि-समर्पण से लोक-व्यवस्था टिकती है। → आंगिरसोपाख्यान की अगली कड़ी में अग्नि-परम्परा/विधान का विस्तार आगे बढ़ने का संकेत रहता है।

Shlokas

Verse 1

हि >> मय न [हुक आज अप > भू:, भुवः, स्वः, महः, जनः--ये पाँच महाव्याहतियाँ हैं। ध्यानके लिये मन्त्रप्रयोग इस प्रकार है--'* भूरजन्नमग्नये पृथिव्यै स्वाहा इत्यादि। एकविशर्त्याधिकद्विशततमो< ध्याय: अग्निस्वरूप तप और भानु (मनु)-की संततिका वर्णन मार्कण्डेय उवाच गुरुभिरनियमैर्युक्तो भरतो नाम पावक: । अग्नि: पुष्टिमतिर्नाम तुष्ट: पुष्टिं प्रयच्छति । भरत्येष प्रजा: सर्वास्ततो भरत उच्यते,मार्कण्डेयजी कहते हैं--युथिष्ठिर! पूर्वोक्त भरत नामक अग्नि (जो शंयुके पौत्र और ऊर्जके पुत्र हैं) गुरुतर नियमोंसे युक्त हैं। वे संतुष्ट होनेपर पुष्टि प्रदान करते हैं, इसलिये उनका एक नाम 'पुष्टिमति” भी है। समस्त प्रजाका भरण-पोषण करते हैं, इसलिये उन्हें भरत कहते हैं

মার্কণ্ডেয় বললেন— যুধিষ্ঠির! ‘ভরত’ নামে এক পবক অগ্নি আছেন, যিনি গুরুতর নিয়ম ও কঠোর আচারে সংযত। তিনি সন্তুষ্ট হলে পুষ্টি ও সমৃদ্ধি দান করেন; তাই তাঁর আর এক নাম ‘পুষ্টিমতী’। তিনি সকল প্রজাকে ধারণ ও পালন করেন; সেইজন্যই তাঁকে ‘ভরত’ বলা হয়।

Verse 2

अग्निर्यश्न शिवो नाम शक्तिपूजापरश्न सः | दुःखार्तानां च सर्वेषां शिवकृत्‌ सततं शिव:,'शिव” नामसे प्रसिद्ध जो अग्नि हैं, वे शक्तिकी आराधनामें लगे रहते हैं। समस्त दुःखातुर मनुष्योंका सदा ही शिव (कल्याण) करते हैं, इसलिये उन्हें 'शिव” कहते हैं

মার্কণ্ডেয় বললেন— যে অগ্নি ‘শিব’ নামে প্রসিদ্ধ, তিনি সদা শক্তি-আরাধনায় পরায়ণ। তিনি দুঃখে কাতর সকলেরই নিরন্তর মঙ্গল সাধন করেন; তাই তাঁকে ‘শিব’—কল্যাণকারী—বলা হয়।

Verse 3

तपसस्तु फल दृष्टवा सम्प्रवृद्धं तपो महत्‌ | उद्धर्तुकामो मतिमान्‌ पुत्रो जज्ञे पुरंदर:,तप (पाञ्चजन्य)-का तपस्याजनित फल (ऐश्वर्य) बढ़कर महान्‌ हो गया है, यह देख उसे प्राप्त करनेकी इच्छासे मानो बुद्धिमान्‌ इन्द्र ही पुरंदर नामसे उनके पुत्र होकर प्रकट हुए

মার্কণ্ডেয় বললেন— তপস্যার ফল অত্যন্ত বৃদ্ধি পেয়ে মহৎ হয়েছে দেখে, তা হরণ করার বাসনায় বুদ্ধিমান পুরন্দর (ইন্দ্র) তাঁদের পুত্ররূপে জন্ম নিলেন এবং ‘পুরন্দর’ নামেই প্রকাশ পেলেন।

Verse 4

* ऊष्मा चैवोष्मणो जज्ञे सोडग्निधूतस्य लक्ष्यते अग्निश्चापि मनुर्नाम प्राजापत्यमकारयत्‌,उन्हीं पांचजन्यसे “ऊष्मा” नामक अग्निका प्रादुर्भाव हुआ। जो समस्त प्राणियोंके शरीरमें ऊष्मा (गर्मी)-के द्वारा परिलक्षित होते हैं तथा तपके जो “मनु” नामक अग्निस्वरूप पुत्र हैं, उन्होंने 'प्राजापत्य” यज्ञ सम्पन्न कराया था

মার্কণ্ডেয় বললেন— সেই উষ্ম থেকেই ‘উষ্মা’ নামের অগ্নির উদ্ভব হল, যা সকল প্রাণীর দেহে উষ্ণতা রূপে উপলব্ধ। আর ‘মনু’ নামে আরেক অগ্নিও ছিল—তপোময়, অগ্নিস্বরূপ পুত্র—যিনি ‘প্রাজাপত্য’ যজ্ঞ সম্পন্ন করেছিলেন।

Verse 5

शम्भुमग्निमथ प्राहुब्राह्मिणा वेदपारगा: । आवसथशथ्यं द्विजा: प्राहुर्दीप्तमरग्निं महाप्रभम्‌,वेदोंके पारंगत दिद्वान्‌ ब्राह्मण “शम्भु' तथा “आवसथ्य” नामक अग्निको देदीप्यमान तथा महान्‌ तेज: पुछ्जसे सम्पन्न बताते हैं

মার্কণ্ডেয় বললেন— বেদে পারদর্শী ব্রাহ্মণেরা ‘শম্ভু’ নামের পবিত্র অগ্নির কথা বলেন। আর দ্বিজগণ ‘আবাসথ্য’ নামে আরেক অগ্নির কথাও বলেন—যা দীপ্তিমান এবং মহাপ্রভায় সমুজ্জ্বল।

Verse 6

ऊर्जस्करान्‌ हव्यवाहान्‌ सुवर्णसदृशप्रभान्‌ । ततस्तपो हाजनयत्‌ पज्च यज्ञसुतानिह,इस प्रकार जिन्हें यज्ञमें सोमकी आहुति दी जाती है, ऐसे पाँच पुत्रोंको तपने पैदा किया। वे सब-के-सब सुवर्ण-सदृश कान्तिमान, बल और तेजकी प्राप्ति करानेवाले तथा देवताओंके लिये हविष्य पहुँचानेवाले हैं

মার্কণ্ডেয় বললেন— তারপর সেই তপস্যা এখানে যজ্ঞের পাঁচ পুত্রকে জন্ম দিল—যারা বল ও তেজ দানকারী, দেবতাদের কাছে হব্য বহনকারী, এবং সোনার মতো দীপ্তিমান।

Verse 7

प्रशान्तेअग्निर्महाभाग परिश्रान्तो गवां पति: । असुरान्‌ जनयन्‌ घोरानू्‌ मर्त्याश्चवैव पृथग्विधान्‌,महाभाग! अस्तकालमें परिश्रमसे थके-माँदे सूर्यदेव (अग्निमें प्रविष्ट होनेके कारण) अग्निस्वरूप हो जाते हैं।* भयंकर असुरों तथा नाना प्रकारके मरणधर्मा मनुष्योंको उत्पन्न करते हैं। (उन्हें भी तपकी ही संततिके अन्तर्गत माना गया है)

মার্কণ্ডেয় বললেন— মহাভাগ! গবাং পতি (সূর্য) পরিশ্রমে ক্লান্ত হয়ে শান্ত হলে সে অগ্নিরূপ হয়। তারপর সেখান থেকে সে ভয়ংকর অসুরদের এবং নানা প্রকার মর্ত্য মানবদেরও জন্ম দেয়।

Verse 8

तपसश्च मनु पुत्र भानुं चाप्यड्रिरा: सृजत्‌ । बृहद्धानु तु त॑ प्राहुब्राह्मिणा वेदपारगा:,तपके मनु (प्रजापति) स्वरूप पुत्र भानु नामक अग्निको अंगिराने भी (अपना प्रभाव अर्पित करके) नूतन जीवन प्रदान किया है। वेदोंके पारगामी विद्वान ब्राह्मण भानुको ही “बृहद्धानु' कहते हैं

মার্কণ্ডেয় বললেন—হে মনুপুত্র! তপস্যার শক্তিতে অঙ্গিরা ভানু নামক অগ্নিকে সৃষ্টি করে তাকে নবতেজে সমৃদ্ধ করেছিলেন। বেদপারগ ব্রাহ্মণগণ সেই ভানুকেই ‘বৃহদ্ধানু’ নামে অভিহিত করেন।

Verse 9

भानोर्भार्या सुप्रजा तु बृहद्धासा तु सूर्यजा । असूजेतां तु षट्‌ पुत्रान्‌ शृणू तासां प्रजाविधिम्‌,भानुकी दो पत्नियाँ हुईं--सुप्रजा और बृहद्धासा। इनमें बृहद्धासा सूर्यकी कन्या थी। इन दोनोंने छः पुत्रोंको जन्म दिया। इनके द्वारा जो संतानोंकी सृष्टि हुई, उसका वर्णन सुनो

মার্কণ্ডেয় বললেন—ভানুর দুই পত্নী ছিল—সুপ্রজা ও বৃহদ্ধাসা; আর বৃহদ্ধাসা ছিল সূর্যদেবের কন্যা। তাঁদের দুজনের গর্ভে ছয় পুত্র জন্মাল। এখন তাদের বংশবৃদ্ধির বিধান শোনো।

Verse 10

दुर्बलानां तु भूतानामसून्‌ यः सम्प्रयच्छति । तमनग्निं बलदं प्राहुः प्रथमं भानुतः सुतम्‌,जो दुर्बल प्राणियोंको प्राण एवं बल प्रदान करते हैं, उन्हें 'बलद' नामक अग्नि बताया जाता है। ये भानुके प्रथम पुत्र हैं

যে অগ্নি দুর্বল প্রাণীদের প্রাণশ্বাস ও বল প্রদান করেন, তাঁকে ‘বলদ’ বলা হয়। তিনি ভানুর জ্যেষ্ঠপুত্র।

Verse 11

यः प्रशान्तेषु भूतेषु मन्युर्भवति दारुण: । अग्नि: स मन्युमान्नाम द्वितीयो भानुत: सुत:,जो शान्त प्राणियोंमें भयंकर “क्रोध” बनकर प्रकट होते हैं, वे 'मन्युमान्‌” नामक अग्नि भानुके द्वितीय पुत्र हैं

যে অগ্নি শান্ত প্রাণীদের মধ্যেও ভয়ংকর ক্রোধরূপে উদিত হয়, তিনি ‘মন্যুমান্’ নামে পরিচিত। তিনি ভানুর দ্বিতীয় পুত্র।

Verse 12

दर्शे च पौर्णमासे च यस्येह हविरुच्यते । विष्णु्नामेह यो<ग्निस्तु धृतिमान्नाम सोडज्लिरा:,यहाँ जिनके लिये दर्श तथा पौर्णमास यागोंमें हविष्य-समर्पणका विधान पाया जाता है, उन अग्निका नाम “विष्णु” है। वे “अंगिरा” गोत्रीय माने गये हैं। उन्हींका दूसरा नाम “धृतिमान' अग्नि है (ये भानुके तीसरे पुत्र हैं)

যে অগ্নির উদ্দেশ্যে এই জগতে দর্শ ও পৌর্ণমাস যজ্ঞে হবি অর্পণের বিধান আছে, তিনি এখানে ‘বিষ্ণু’ নামে প্রসিদ্ধ। তিনি অঙ্গিরা-গোত্রীয় বলে গণ্য এবং ‘ধৃতিমান্’ নামেও অভিহিত।

Verse 13

३ इन्द्रेण सहितं यस्य हविराग्रयणं स्मृतम्‌ । अग्निराग्रयणो नाम भानोरेवान्वयस्तु सः

মার্কণ্ডেয় বললেন—যাঁর প্রথম হবি-আগ্রয়ণ ইন্দ্রের সহিত সম্পন্ন হয়েছিল বলে স্মরণ করা হয়, তিনি ‘অগ্নি-আগ্রয়ণ’ নামে পরিচিত; এবং তাঁর বংশধারা নিঃসন্দেহে ভানু (সূর্য) হতেই প্রবাহিত।

Verse 14

इन्द्रसहित जिनके लिये आग्रयण (नूतन अद्नद्वारा सम्पन्न होनेवाले यज्ञ) कर्ममें हविष्य- अर्पणका विधान है, वे “आग्रयण' नामक अग्नि भानुके ही (चौथे) पुत्र हैं ।। चातुर्मास्येषु नित्यानां हविषां योनिरग्रह: । चतुर्भि: सहित: पुत्रैर्भानोरेवान्वय: स्तुभ:,चातुर्मास्य यज्ञोंमें नित्य विहित आग्नेय आदि आठ हविष्योंके जो उद्धवस्थान हैं, उनका नाम “अग्रह' है। (वे ही वैश्वदेव पर्वमें प्रधान विश्वदेव नामक अग्नि हैं--से भानुके पाँचवें पुत्र हैं) 'स्तुभ” नामक अग्नि भी भानुके ही पुत्र हैं। पहले कहे हुए चार पुत्रोंके साथ जो ये अग्रह (वैश्वदेव) और स्तुभ हैं, इन्हें मिलाकर भानुके छ: पुत्र हैं

মার্কণ্ডেয় বললেন—চাতুর্মাস্য যজ্ঞে নিত্যবিধেয় হবিশ্যসমূহের যে উৎস, তাকে ‘অগ্রহ’ বলা হয়। আর ‘স্তুভ’ও ভানুরই বংশধারাভুক্ত; ভানুর পূর্বোক্ত চার পুত্রের সঙ্গে অগ্রহ ও স্তুভকেও তাঁর সন্তানরূপে গণ্য করা হয়।

Verse 15

निशा त्वजनयत्‌ कन्यामग्नीषोमाबुभौ तथा । मनोरेवाभवद्‌ भार्या सुषुवे पडच पावकान्‌,मनु (भानु)-की ही एक तीसरी पत्नी थी, जिसका नाम था निशा। उसने एक कन्या और दो पुत्रों-को जन्म दिया। (कन्याका नाम “रोहिणी” तथा) पुत्रोंके नाम थे--अग्नि और सोम, इनके सिवा, निशाने पाँच अग्निस्वरूप पुत्र और भी उत्पन्न किये। (जिनके नाम क्रमश: इस प्रकार हैं--वैश्वानर, विश्वपति, सब्निहित, कपिल और अग्रणी)

মার্কণ্ডেয় বললেন—নিশা এক কন্যা প্রসব করলেন, এবং তদ্রূপ দুই পুত্রও—অগ্নি ও সোম। তিনি মনুর পত্নী হলেন এবং অগ্নিস্বরূপ পাঁচ পুত্রের জন্ম দিলেন।

Verse 16

पूज्यते हविषाग्रयेण चातुर्मास्येषु पावक: । पर्जन्यसहित: श्रीमाननिनेर्वेश्वानरस्तु सः,चातुर्मास्य यज्ञोंमें प्रधान हविष्यद्वारा पर्जन्यसहित जिनकी पूजा की जाती है, वे कान्तिमान्‌ वैश्वानर नामक अग्नि (मनुके प्रथम पुत्र) हैं

মার্কণ্ডেয় বললেন—চাতুর্মাস্য যজ্ঞে শ্রেষ্ঠ হবিশ্য দ্বারা পাৱককে পূজা করা হয়। পর্জন্যের সহিত পূজিত সেই দীপ্তিমান বৈশ্বানরই অনিনির পুত্র।

Verse 17

अस्य लोकस्य सर्वस्य य: प्रभु: परिपठ्यते । सोअन्निर्विश्वपतिर्नाम द्वितीयो वै मनो: सुत:

মার্কণ্ডেয় বললেন—যিনি এই সমগ্র লোকের প্রভু বলে পাঠে উচ্চারিত ও স্মৃত, তিনি ‘অনির্বিশ্বপতি’ নামে পরিচিত; এবং তিনি মনুর দ্বিতীয় পুত্র।

Verse 18

कन्या सा रोहिणी नाम हिरण्यकशिपो: सुता

মার্কণ্ডেয় বললেন—সেই কন্যার নাম ছিল রোহিণী; সে ছিল হিরণ্যকশিপুর কন্যা।

Verse 19

कर्मणासौ बभौ भार्या स वह्नि: स प्रजापति: । मनुकी कन्या भी *स्विष्टकृत” ही मानी गयी है। उसका नाम रोहिणी है; वह मनुकी कुमारी पुत्री किसी अशुभ कर्मके कारण हिरण्यकशिपुकी पत्नी हुई थी। वास्तवमें “मनु” ही वह्नि है और वे ही 'प्रजापति' कहे गये हैं ।। १८ $ ।। प्राणानाश्रित्य यो देहं प्रवर्तयति देहिनाम्‌ । तस्य संनिहितो नाम शब्दरूपस्य साधन:,जो देहधारियोंके प्राणोंका आश्रय लेकर उनके शरीरको कार्यमें प्रवृत्त करते हैं, उनका नाम है, 'संनिहित” अग्नि। ये मनुके तीसरे पुत्र हैं। इनके द्वारा शब्द तथा रूपको ग्रहण करनेमें सहायता मिलती है

মার্কণ্ডেয় বললেন—যে দিব্য তত্ত্ব প্রাণের আশ্রয়ে দেহধারীদের দেহকে কর্মে প্রবৃত্ত করে, তার নাম ‘সংনিহিত’ (অন্তর্বর্তী) অগ্নি। শব্দ ও রূপের উপলব্ধি ও কার্যকারিতার সে-ই উপায়।

Verse 20

शुक्लकृष्णगतिर्देवो यो बिभर्ति हुताशनम्‌ । अकल्मष: कल्मषाणां कर्ता क्रोधाश्रितस्तु सः,जो दीप्तिमान्‌ महापुरुष, शुक्ल और कृष्ण गतिके आधार हैं, जो अग्निका धारण- पोषण करते हैं, जिनमें किसी प्रकारका कल्मष अर्थात्‌ विकार नहीं है तथापि जो समस्त विकारस्वरूप जगतके कर्ता हैं, यति लोग जिनको सदा महर्षि कपिलके नामसे कहा करते हैं, जो सांख्ययोगके प्रवर्तक हैं वे क्रोधस्वरूप अग्निके आश्रय कपिल नामक अनिन हैं। (ये मनुके चौथे पुत्र हैं)

মার্কণ্ডেয় বললেন—যে দেব উজ্জ্বল ও অন্ধকার—উভয় গতির আশ্রয়, যে হুতাশন অগ্নিকে ধারণ ও পোষণ করে, যে নিজে নির্মল হয়েও কলুষময় জগতের কর্তা হয়ে ওঠে—সে ক্রোধে আশ্রিত অগ্নিরূপ; তপস্বীদের মধ্যে সে ‘কপিল’ নামে প্রসিদ্ধ, সাংখ্য ও যোগের প্রবর্তক।

Verse 21

कपिलं परमर्षि च यं प्राहुर्यतय: सदा । अग्नि: स कपिलो नाम सांख्ययोगप्रवर्तक:,जो दीप्तिमान्‌ महापुरुष, शुक्ल और कृष्ण गतिके आधार हैं, जो अग्निका धारण- पोषण करते हैं, जिनमें किसी प्रकारका कल्मष अर्थात्‌ विकार नहीं है तथापि जो समस्त विकारस्वरूप जगतके कर्ता हैं, यति लोग जिनको सदा महर्षि कपिलके नामसे कहा करते हैं, जो सांख्ययोगके प्रवर्तक हैं वे क्रोधस्वरूप अग्निके आश्रय कपिल नामक अनिन हैं। (ये मनुके चौथे पुत्र हैं)

মার্কণ্ডেয় বললেন—যাঁকে যতিরা সর্বদা পরমর্ষি ‘কপিল’ বলে অভিহিত করেন, তিনি কপিল নামে স্বয়ং অগ্নি—সাংখ্য ও যোগের প্রবর্তক। তিনি নির্মল হয়েও বহুরূপ পরিবর্তনময় জগতের প্রকাশের কারণ হন; তাই মুনিগণ তাঁকে তপস্যাজাত জ্ঞান ও সংযমের অগ্নিমূল ভিত্তি বলে মানেন।

Verse 22

अग्र॑ यच्छन्ति भूतानां येन भूतानि नित्यदा । कर्मस्विह विचित्रेषु सो5ग्रणीर्वद्विरुच्यते,मनुष्य आदि समस्त भूत-प्राणी सर्वदा भाँति-भाँतिके कर्मोमें जिनके द्वारा सब भूतोंके लिये अन्नका अग्रभाग अर्पण करते हैं वे अग्रणी नामक अग्नि (मनुके पाँचवें पुत्र) कहलाते हैं

মার্কণ্ডেয় বললেন—যাঁর দ্বারা এখানে বিচিত্র কর্মে সর্বভূতের কল্যাণার্থে নিত্যই অন্নের অগ্রভাগ অর্পিত হয়, যাতে প্রাণীরা পুষ্ট থাকে—তিনি ‘অগ্রণী’ (নেতা) নামে খ্যাত।

Verse 23

इमानन्यान्‌ समसृजत्‌ पावकान्‌ प्रथितान्‌ भुवि । अन्निहोत्रस्य दुष्टस्य प्रायश्षित्तार्थमुल्वणान्‌,मनुने अग्निहोत्र कर्ममें की हुई त्रुटिके प्रायश्चित्त [समाधान)-के लिये इन लोकविख्यात तेजस्वी अग्नियोंकी सृष्टि की, जो पूर्वोक्त अग्नियोंसे भिन्न हैं

মনু অগ্নিহোত্র-কর্মে সংঘটিত ত্রুটির প্রায়শ্চিত্তসাধনের জন্য, পূর্বোক্ত অগ্নিগুলির থেকে ভিন্ন, ভূলোকে প্রসিদ্ধ তেজস্বী পাৱকসমূহ সৃষ্টি করলেন।

Verse 24

संस्पृशेयुर्यदान्योन्यं कथज्चिद्‌ वायुनाग्नय: । इष्टिरष्टाकपालेन कार्या वै शुचये5ग्नये,यदि किसी प्रकार हवाके चलनेसे अग्नियोंका परस्पर स्पर्श हो जाय तो अष्टाकपाल (आठ कपालोंमें- संस्कारपूर्वक तैयार किये हुए) पुरोडाशके द्वारा शुचि नामक अग्निके लिये इष्टि करनी (आहुति देनी) चाहिये

যদি কোনোভাবে বায়ুর গতিতে অগ্নিগুলি পরস্পর স্পর্শ করে ফেলে, তবে অষ্টাকপাল পুরোডাশ দ্বারা ‘শুচি’ নামক অগ্নির উদ্দেশে ইষ্টি (আহুতি) করা উচিত।

Verse 25

दक्षिणानिनिर्यदा द्वाभ्यां संसजेत तदा किल | इष्टिरष्टाकपालेन कार्या वै वीतयेडग्नये,जब दक्षिणाग्निका गार्हपत्य तथा हवनीय नामक दो अग्नियोंसे संसर्ग हो जाय, तब मिट्टीके आठ पुरवोंमें संस्कारपूर्वक तैयार किये हुए पुरोडाशद्वारा “वीति” नामक अग्निके लिये आहुति देनी चाहिये

যখন দক্ষিণাগ্নি গার্হপত্য ও আহবনীয়—এই দুই অগ্নির সঙ্গে সংস্পর্শে আসে, তখন অষ্টাকপাল পুরোডাশ দ্বারা ‘বীতি’ নামক অগ্নির উদ্দেশে ইষ্টি (আহুতি) করা উচিত।

Verse 26

यद्यग्नयो हि स्पृश्येयुर्निवेशस्था दवाग्निना । इष्टिरष्टाकपालेन कार्या तु शुचयेडग्नये,यदि गृहस्थित अग्नियोंका दावानलसे संसर्ग हो जाय तो मिट्टीके आठ पुरवोंमें संस्कृत चरुद्वारा शुचि नामक अग्निको आहुति देनी चाहिये

যদি নিজ নিজ স্থানে প্রতিষ্ঠিত গৃহাগ্নিগুলি দবাগ্নির সঙ্গে সংস্পর্শে আসে, তবে অষ্টাকপাল পাত্রে সংস্কৃত চরু দ্বারা ‘শুচি’ নামক অগ্নির উদ্দেশে ইষ্টি (আহুতি) করা উচিত।

Verse 27

अग्निं रजस्वला वै स्त्री संस्पृशेदग्निहोत्रिकम्‌ । इष्टिरष्टाकपालेन कार्या वसुमते5ग्नये,यदि अनि्निहोत्र सम्बन्धी अग्निको कोई रजस्वला स्त्री छू दे तो वसुमान्‌ अग्निके लिये मिट्टीके आठ पुरवोंमें संस्कृत चरुद्वारा आहुति देनी चाहिये

যদি কোনো ঋতুমতী (রজস্বলা) নারী অগ্নিহোত্র-সম্পর্কিত অগ্নিকে স্পর্শ করে, তবে অষ্টাকপাল পাত্রে সংস্কৃত চরু দ্বারা ‘বসুমৎ’ অগ্নির উদ্দেশে ইষ্টি (আহুতি) করা উচিত।

Verse 28

मृत: श्रूयेत यो जीव: परेयु: पशवो यदा । इष्टिरशकपालेन कार्या सुरभिमतेडग्नये,यदि किसी प्राणीका मृत्युसूचक विलाप आदि सुनायी दे अथवा कुक्कुर आदि पशु उस अग्निका स्पर्श कर लें, उस दशामें मिट्टीके आठ पुरवोंमें संस्कृत पुरोडाशद्वारा सुरभिमान्‌ नामक अग्निकी प्रसन्नताके लिये होम करना चाहिये

মার্কণ্ডেয় বললেন—যদি কোনো জীবের মৃত্যুসূচক বিলাপাদি ধ্বনি শোনা যায়, অথবা কুকুর প্রভৃতি পশু সেই পবিত্র অগ্নিকে স্পর্শ করে, তবে সেই অবস্থায় প্রায়শ্চিত্তার্থে মাটির আট কপালে সংস্কৃত পুরোডাশ প্রস্তুত করে ‘সুরভিমান্’ নামক অগ্নিকে তুষ্ট করতে ইষ্টি-হোম করা উচিত।

Verse 29

आर्तों न जुहुयादनिंे त्रिरात्र॑ यस्तु ब्राह्मण: । इष्टिरष्टाकपालेन कार्या स्वादुत्तराग्नये,जो ब्राह्मण किसी पीड़ासे आतुर होकर तीन राततक अनिनिहोत्र न करे, उसे मिट्टीके आठ पुरवोंमें संस्कृत चरुके द्वारा “उत्तरर नामक अग्निको आहुति देनी चाहिये

মার্কণ্ডেয় বললেন—যে ব্রাহ্মণ দুঃখে কাতর হয়ে তিন রাত্রি পর্যন্ত অগ্নিতে আহুতি দেয় না, সে প্রায়শ্চিত্তার্থে মাটির আট কপালে সংস্কৃত চরু প্রস্তুত করে ‘উত্তর’ নামক অগ্নিকে ইষ্টি-আহুতি দেবে।

Verse 30

दर्श च पौर्णमासं च यस्य तिछेत्‌ प्रतिष्ठितम्‌ । इष्टिरष्टाकपालेन कार्या पथिकृतेडग्नये

মার্কণ্ডেয় বললেন—যার দর্শ ও পৌর্ণমাস যজ্ঞবিধি যথাবিধি প্রতিষ্ঠিত, সে মাটির আট কপালে সংস্কৃত হবি প্রস্তুত করে ‘পথিকৃত্’ নামক অগ্নির উদ্দেশে ইষ্টি করবে।

Verse 31

जिसका चालू किया हुआ दर्श और पौर्णमास याग बीचमें ही बंद हो जाय अथवा बिना आहुति किये ही रह जाय, उसे “पथिकृत” नामक अग्निके लिये मिट्टीके आठ पुरवोंमें संस्कृत चरुके द्वारा होम करना चाहिए ।। सूतिकाग्निर्यदा चाग्निं संस्पृशेदग्निहोत्रिकम्‌ । इष्टिरष्टाकपालेन कार्या चाग्निमतेडग्नये,जब सूतिकागृहकी अग्नि, अग्निहोत्रकी अग्निका स्पर्श कर ले, तब मिट्टीके आठ पुरवोंमें संस्कृत पुरोडाशद्वारा 'अग्निमान” नामक अग्निको आहुति देनी चाहिये

যার শুরু করা দর্শ ও পৌর্ণমাস যজ্ঞ মাঝপথে বিচ্ছিন্ন হয়ে যায় অথবা আহুতি না দিয়েই অসম্পূর্ণ থাকে, সে ‘পথিকৃত্’ নামক অগ্নির উদ্দেশে মাটির আট কপালে সংস্কৃত চরু দ্বারা হোম করবে। আর যখন সুতিকাগৃহের অগ্নি গৃহস্থের অগ্নিহোত্র অগ্নিকে স্পর্শ করে, তখন মাটির আট কপালে সংস্কৃত পুরোডাশ দ্বারা ‘অগ্নিমান্’ নামক অগ্নির উদ্দেশে ইষ্টি-হোম করা উচিত।

Verse 173

ततः स्विष्ट॑ भवेदाज्यं स्विष्टकृत्‌ परमस्तु सः । जो वेदोंमें सम्पूर्ण जगत॒के पति” कहे गये हैं, वे विश्वपति नामक अग्नि मनुके द्वितीय पुत्र हैं। उन्हींके प्रभावसे हविष्यकी सुन्दरभावसे आहुति-क्रिया सम्पन्न होती है; अतः वे परम स्विष्टकृत्‌ (उत्तम अभीष्टकी पूर्ति करनेवाले) कहे जाते हैं

মার্কণ্ডেয় বললেন—তদনন্তর ঘৃত সত্যই ‘স্বিষ্ট’ হয়ে ওঠে; কারণ তিনিই পরম স্বিষ্টকৃত্—যাঁর প্রভাবে হবি-আহুতি শোভন ও বিধিসম্মতভাবে সম্পন্ন হয়। অতএব তিনি কাম্য যজ্ঞ ও তার ফলের সর্বোচ্চ সিদ্ধিদাতা বলে প্রশংসিত।

Verse 220

इस प्रकार श्रीमह्या भारत वनपवकि अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें आंगिरसोपाख्मानविषयक दो सौ बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

এইভাবে শ্রীমহাভারতের বনপর্বের অন্তর্গত মার্কণ্ডেয়-সমাস্যপর্বে আঙ্গিরসোপাখ্যান-বিষয়ক দুই শত বিশতম অধ্যায় সমাপ্ত হল। এই সমাপ্তি-উক্তি উপদেশ ও কাহিনির এক পর্বের পরিসমাপ্তি নির্দেশ করে এবং সদ্য বর্ণিত ঘটনার নৈতিক ও আধ্যাত্মিক তাৎপর্য নিয়ে চিন্তার জন্য বিরতি দেয়।

Verse 221

इति श्रीमहा भारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि आंगिरसोपाख्याने एकविंशत्यधिकद्वधिशततमो<5 ध्याय:,इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेययमास्यापर्वमें आंगिरसोपाख्यानविषयक दो सौ इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

মার্কণ্ডেয় বললেন—“এইভাবে শ্রীমহাভারতের বনপর্বের অন্তর্গত মার্কণ্ডেয়-সমাস্যপর্বে ‘আঙ্গিরস উপাখ্যান’—দুই শত একুশতম অধ্যায়—সমাপ্ত হল।” অর্থাৎ এই সমাপ্তি-উক্তি অধ্যায়ের আনুষ্ঠানিক পরিসমাপ্তি ঘোষণা করে এবং শ্রোতাকে এই কাহিনির নৈতিক তাৎপর্য হৃদয়ে ধারণ করতে আহ্বান জানায়।

Frequently Asked Questions

The dilemma concerns whether relational influence should be sought through covert techniques (mantras, medicines, coercive stratagems) or through ethically transparent conduct; Draupadī treats the former as corrosive to trust and peace within intimate life.

Sustainable concord arises from self-governance and service: controlling anger and desire, speaking carefully, honoring elders, maintaining hospitality and cleanliness, and managing resources responsibly—thereby making trust, not fear, the basis of stability.

No formal phalaśruti is stated; the closure functions as ethical validation through Satyabhāmā’s acknowledgment and apology, marking the discourse as dharma-consistent and socially commendable rather than ritually reward-framed.