
Udyoga-parva Adhyāya 50 — Dhṛtarāṣṭra’s Appraisal of Bhīmasena (भीमसेनभयवर्णनम्)
Upa-parva: Sañjaya–Dhṛtarāṣṭra Saṃvāda (War-Anxiety and Strategic Appraisal Unit)
Dhṛtarāṣṭra addresses Sañjaya with a concentrated assessment of Bhīma as the principal destabilizing force against the Kuru side. He frames Bhīma as uniquely formidable in physical power, speed, and relentless temperament, repeatedly employing animal and cosmic metaphors (lion among herds, fire in dry season, Indra-like force, Brahma-daṇḍa imagery) to convey inevitability and scale. The king reports insomnia, fear, and anticipatory grief, noting that no warrior in his host seems capable of withstanding Bhīma in open engagement. He recalls earlier episodes that demonstrate Bhīma’s capacity (including the Jarāsandha episode with Vāsudeva’s assistance) as evidence of strategic precedent. The chapter then pivots from descriptive threat analysis to ethical lament: attachment to sons, wealth, and lineage intensifies suffering; knowledge does not necessarily mitigate grief; and the Kuru calamity is traced to the gambling-origin injustice and the momentum of time (kāla) that is difficult to escape. The discourse closes with a bleak forecast of large-scale loss and the ruler’s helpless anticipation of familial collapse.
Chapter Arc: धृतराष्ट्र संजय से कहता है कि जिन वीरों के नाम उसने सुने, वे सब उत्साही हैं—पर उन सबके बीच उसका मन एक ही नाम पर अटक जाता है: भीमसेन। → राजा स्वीकार करता है कि उसे अपने पुत्रों की सेना से अधिक भय क्रुद्ध, अमर्षशील वृकोदर से है। वह बताता है कि रात-रात भर जागता है, लंबी गरम साँसें छोड़ता है—सिंह से डरे पशु की तरह। उसे अपनी सेना में कोई ऐसा नहीं दिखता जो युद्ध में भीम का वेग सह सके। → धृतराष्ट्र भीम के पूर्व पराक्रमों को गिनाकर अपने भय को प्रमाणित करता है—वासुदेव की सहायता से जरासंध-वध, यक्ष-राक्षसों का संहार, और गदा-हस्त भीम का वह रूप जो प्रचंड अग्नि की तरह (वायु से प्रेरित ज्वाला-सा) अर्जुन के साथ मिलकर उसकी संतानों की सेना को भस्म कर देगा। → भय का निष्कर्ष स्पष्ट हो जाता है: धृतराष्ट्र के लिए सबसे बड़ा ‘लाभ’ यही है कि वह भीम के विषय में समाचार सुनता रहे—क्योंकि उसी में उसे अपने पुत्रों के विनाश का निश्चित संकेत दिखता है। → धृतराष्ट्र संजय से आग्रह करता है कि अमर्षी भीमसेन का समाचार सुनाए—मानो अगला क्षण ही यह बताने वाला हो कि यह भय केवल कल्पना है या निकट आती अनिवार्य नियति।
Verse 1
धृतराष्ट्र बोले--संजय! तुमने जिन लोगोंके नाम बताये हैं, ये सभी बड़े उत्साही वीर हैं। इनमें भी जितने लोग वहाँ एकत्र हुए हैं, वे सब एक ओर और भीमसेन एक ओर
ধৃতরাষ্ট্র বললেন—সঞ্জয়! তুমি যাদের নাম বলেছ, তারা সকলেই মহোৎসাহী মহাবীর। তবু সেখানে যতজন একত্র হয়েছে, তারা সবাই এক পাশে থাকুক, আর ভীমসেন একাই অন্য পাশে।
Verse 2
भीमसेनाद्धि मे भूयो भयं संजायते महत् | क्रुद्धादमर्षणात् तात व्याप्रादिव महारुरो:,तात! मुझे क्रोधमें भरे हुए अमर्षशील भीमसेनसे बड़ा डर लगता है; ठीक उसी तरह, जैसे महान् मृगको किसी व्याप्रसे सदा भय बना रहता है
হে তাত! ক্রোধে দগ্ধ, অপমান-অসহিষ্ণু ভীমসেন থেকেই আমার সর্বাধিক ভয় জন্মায়; যেমন কোনো মহাবল পশুর মনে বাঘের প্রতি সদা ভয় থাকে।
Verse 3
जागर्मि रात्रयः सर्वा दीर्घमुष्णं च नि:श्वसन् । भीतो वृकोदरात् तात सिंहात् पशुरिवापर:,वत्स! सिंहसे डरे हुए दूसरे पशुकी भाँति मैं भीमसेनसे भयभीत हो रातभर गर्म-गर्म लंबी साँसें खींचता हुआ जागता रहता हूँ
বৎস! বৃকোদরের ভয়ে আমি সারারাত জেগে থাকি, দীর্ঘ দীর্ঘ উষ্ণ নিশ্বাস ফেলি; যেন সিংহভীত কোনো অন্য পশু।
Verse 4
न हि तस्य महाबाहो: शक्रप्रतिमतेजस: । सैन्येडस्मिन् प्रतिपश्यामि य एन॑ विषहेद् युधि,महाबाहु भीम इन्द्रके समान तेजस्वी है। मैं अपनी सेनामें किसीको भी ऐसा नहीं देखता, जो भीमका सामना कर सके--युद्धमें इसके वेगको सह सके
মহাবাহু ভীম ইন্দ্রসম তেজস্বী। আমার এই সেনায় আমি এমন কাউকে দেখি না, যে যুদ্ধে তার মোকাবিলা করতে পারে—তার আক্রমণের বেগ সহ্য করতে পারে।
Verse 5
अमर्षणश्न कौन्तेयो दृढ्वैरश्न॒ पाण्डव: । अनर्महासी सोन्मादस्तिर्यक्प्रेक्षी महास्वन:,कुन्तीकुमार पाण्डुपुत्र भीम असहनशील तथा वैरको दृढ़तापूर्वक पकड़े रखनेवाला है। उसकी की हुई हँसी भी हँसीके लिये नहीं होती, वह उसे सत्य कर दिखाता है। उसका स्वभाव उद्धत है। वह टेढ़ी निगाहसे देखता और बड़े जोरसे गर्जना करता है
কুন্তীপুত্র পাণ্ডব ভীম অপমান-অসহিষ্ণু এবং দৃঢ় বৈর ধারণকারী। তার হাসি নিছক হাসি নয়—সে তা সত্য করে দেখায়। স্বভাবে সে উন্মত্তপ্রায়, তির্যক দৃষ্টিতে চায়, আর মহাগর্জনে গর্জে ওঠে।
Verse 6
महावेगो महोत्साहो महाबाहुर्महाबल: । मन्दानां मम पुत्राणां युद्धेनानतं करिष्यति,वह महान् वेगशाली, अत्यन्त उत्साही, विशाल-बाहु और महाबली है। वह युद्ध करके मेरे मन्दबुद्धि पुत्रोंकोी अवश्य मार डालेगा
ধৃতরাষ্ট্র বললেন—সে মহাবেগী, মহোৎসাহী, প্রশস্ত বাহুযুক্ত ও মহাবলবান। যুদ্ধে প্রবৃত্ত হয়ে সে আমার মন্দবুদ্ধি পুত্রদের নিশ্চিতই অন্তে পৌঁছে দেবে।
Verse 7
ऊरुग्राहगृहीतानां गदां बिभ्रद् वृकोदर: । कुरूणामृषभो युद्धे दण्डपाणिरिवान्तक:,मेरे पुत्र भी बड़े दुराग्रही हैं, अतः हाथमें गदा लिये कुरुश्रेष्ठ वृकोदर भीम दण्डपाणि यमराजकी भाँति युद्धमें इनका निश्चय ही वध कर डालेगा
ধৃতরাষ্ট্র বললেন—আমার পুত্রেরা বড়ই দুঃসাহসী ও একগুঁয়ে; তাই হাতে গদা ধারণ করে কুরুদের শ্রেষ্ঠ বৃকোদর ভীম, দণ্ডধারী যমের ন্যায়, যুদ্ধে—উরুগ্রাহে আবদ্ধ করে—তাদের নিশ্চিতই বধ করবে।
Verse 8
अष्टास््रिमायसीं घोरां गदां काउ्चनभूषणाम् । मनसाहहं प्रपश्यामि ब्रह्मुदण्डमिवोद्यतम्,मैं मनकी आँखोंसे देख रहा हूँ, भीमसेनकी स्वर्णभूषित भयंकर गदा, जो लोहेकी बनी हुई और आठ कोनोंसे युक्त है, ब्रह्मदण्डके समान उठी हुई है
ধৃতরাষ্ট্র বললেন—আমি মনের চোখে দেখছি: ভীমসেনের ভয়ংকর গদা—লোহার নির্মিত, অষ্টকোণ এবং স্বর্ণভূষিত—ব্রহ্মদণ্ডের ন্যায় উঁচু করে তোলা।
Verse 9
यथा मृगाणां यूथेषु सिंहो जातबलभ्चरेत् मामकेषु तथा भीमो बलेषु विचरिष्यति,जैसे बलवान सिंह मृगोंके यूथोंमें निःशंक विचरण करता है, उसी प्रकार भीमसेन मेरी विशाल वाहिनियोंमें बेखटके विचरेगा
ধৃতরাষ্ট্র বললেন—যেমন বলবান সিংহ হরিণের পালগুলির মধ্যে নির্ভয়ে বিচরণ করে, তেমনই ভীম আমারই বৃহৎ সেনাবাহিনীর মধ্যে অবাধে ঘুরে বেড়াবে।
Verse 10
सर्वेषां मम पुत्राणां स एक: क्रूरविक्रम: । बह्नाशी विप्रतीपश्च बाल्येडपि रभस: सदा,बाल्यकालमें भी मेरे सब पुत्रोंमें एकमात्र वह भीमसेन ही क्रूर पराक्रमी, बहुत अधिक खानेवाला, सबके प्रतिकूल चलनेवाला तथा सदा अत्यन्त वेगशाली था
ধৃতরাষ্ট্র বললেন—আমার সকল পুত্রের মধ্যে একমাত্র সেই ভীমসেনই ছিল ক্রূর পরাক্রমী; অতিভোজী, সবার বিরুদ্ধাচরণকারী, এবং শৈশব থেকেই সর্বদা প্রবল উদ্দাম।
Verse 11
उद्वेपते मे हृदयं ये मे दुर्योधनादय: । बाल्ये5पि तेन युध्यन्तो वारणेनेव मर्दिता:,उसकी याद आते ही मेरा हृदय काँपने लगता है। मेरे दुर्योधन आदि पुत्र बचपनमें भी जब उसके साथ खेल-कूदमें लड़ते थे, तब वह गजराजकी भाँति इन सबको मसल देता था
ধৃতরাষ্ট্র বললেন— তাকে স্মরণ করলেই আমার হৃদয় কেঁপে ওঠে। শৈশবেও যখন আমার পুত্ররা—দুর্যোধন প্রভৃতি—খেলার ছলে তার সঙ্গে ঝগড়া ও কুস্তি করত, তখন সে মহাগজের মতো তাদের সকলকে পিষে পরাভূত করত।
Verse 12
तस्य वीर्येण संक्लिष्टा नित्यमेव सुता मम । स एव हेतुर्भेदस्य भीमो भीमपराक्रम:,मेरे पुत्र उसके बल-पराक्रमसे सदा ही कष्टमें पड़े रहते थे। भयंकर पराक्रमी भीमसेन ही इस फ़ूटकी जड़ है
ধৃতরাষ্ট্র বললেন— তার বীর্য ও পরাক্রমে আমার পুত্ররা সর্বদাই ক্লিষ্ট ছিল। সেই ভীম—ভয়ংকর পরাক্রমশালী—এই বিভেদের কারণ ও মূল।
Verse 13
ग्रसमानमनीकानि नरवारणवाजिनाम् । पश्यामीवाग्रतो भीम॑ क्रोधमूर्च्छितमाहवे,मुझे अपने सामने दीख-सा रहा है कि भीमसेन युद्धमें क्रोधसे मूर्च्छित हो मनुष्य, हाथी और घोड़ोंकी (समस्त) सेनाओंको कालका ग्रास बनाता जा रहा है
ধৃতরাষ্ট্র বললেন— যেন আমি চোখের সামনে ভীমকে দেখছি: রণমধ্যে ক্রোধে উন্মত্ত হয়ে সে মানুষ, হাতি ও অশ্বসেনার ব্যূহসমূহ গ্রাস করে চলেছে, আর সমগ্র বাহিনীকে মৃত্যুর গ্রাসে ঠেলে দিচ্ছে।
Verse 14
अस्त्रे द्रोणार्जुनसमं वायुवेगसमं जवे । महेश्वरसमं क्रोधे को हन्याद् भीममाहवे,वह अस्त्रविद्यामें द्रोणाचार्य तथा अर्जुनके समान है, वेगमें वायुकी समानता करता है एवं क्रोधमें महेश्वरके तुल्य है। ऐसे भीमको युद्धमें कौन मार सकता है?
ধৃতরাষ্ট্র বললেন— অস্ত্রবিদ্যায় সে দ্রোণ ও অর্জুনের সমান, গতিতে বায়ুর তুল্য, আর ক্রোধে মহেশ্বরের সদৃশ। এমন ভীমকে রণমধ্যে কে বধ করতে পারে?
Verse 15
संजयाचक्ष्व मे शूरं भीमसेनममर्षणम् । अतिलाभं तु मन्ये5हं यत् तेन रिपुधातिना
ধৃতরাষ্ট্র বললেন— সঞ্জয়, সেই অসহিষ্ণু ও অদম্য বীর ভীমসেনের কথা আমাকে বর্ণনা করো। আমি একে পরম লাভ মনে করি যে সে শত্রুনাশকের হাতে নিহত হয়েছে।
Verse 16
येन भीमबला यक्षा राक्षसाश्न पुरा हता:
ধৃতরাষ্ট্র বললেন—যাঁর ভীমবলেই পূর্বকালে যক্ষ ও রাক্ষসেরা নিহত হয়েছিল।
Verse 17
न स जातु वशे तस्थौ मम बाल्येडपि संजय
ধৃতরাষ্ট্র বললেন—সঞ্জয়, শৈশবেও সে কখনোই আমার বশে ছিল না।
Verse 18
कि पुनर्मम दुष्पुत्रै: क्लिष्ट: सम्प्रति पाण्डव: । संजय! पाण्डुकुमार भीमसेन बचपनमें भी कभी मेरे वशमें नहीं रहा; फिर जब मेरे दुष्ट पुत्रोंने उसे बार-बार कष्ट दिया है, तब वह इस समय मेरे वशमें कैसे हो सकता है? ।। १७ ६ || निष्ठरो रोषणो>त्यर्थ भज्येतापि न संनमेत् । तिर्यक्प्रेक्षी संहतभ्रू: कथथं शाम्येद् वृकोदर:,वह क्रूर और क्रोधी है। टूट भले ही जाय, पर झुक नहीं सकेगा। सदा टेढ़ी निगाहसे ही देखता है। उसकी भौंहें क्रोधके कारण परस्पर गुँथी रहती हैं। ऐसा भीमसेन कैसे शान्त हो सकेगा?
ধৃতরাষ্ট্র বললেন—আমার দুষ্ট পুত্রদের দ্বারা বারবার ক্লিষ্ট এই পাণ্ডব এখন কীভাবে আমার বশে থাকবে? সঞ্জয়, পাণ্ডুপুত্র ভীমসেন তো শৈশবেও আমার অধীন ছিল না; আর আমার পুত্রদের দ্বারা পুনঃপুনঃ নির্যাতিত হয়ে সে এখন কীভাবে নত হবে? সে নিষ্ঠুর ও অতিশয় ক্রোধী—ভেঙে যাবে, তবু নত হবে না। তির্যক, বিদ্ধকারী দৃষ্টি আর ক্রোধে গাঁথা ভ্রূযুগলধারী সেই বৃকোদর কীভাবে শান্ত হবে?
Verse 19
शूरस्तथाप्रतिबलो गौरस्ताल इवोन्नतः । प्रमाणतो भीमसेन: प्रादेशेनाधिको<र्जुनात्,गोरे रंगका वह शूरवीर भीमसेन ताड़के समान ऊँचा है। ऊँचाईमें वह अर्जुनसे एक बित्ता अधिक है, बलमें उसकी समता करनेवाला दूसरा कोई नहीं है
ধৃতরাষ্ট্র বললেন—ভীমসেন বীর, তার শক্তির তুলনা নেই; গৌরবর্ণ, তালবৃক্ষের মতো ঊর্ধ্বে উন্নত। উচ্চতায় সে অর্জুনের চেয়ে এক প্রাদেশ (এক বিঘত) বেশি।
Verse 20
जवेन वाजिनोडत्येति बलेनात्येति कुज्जरान् | अव्यक्तजल्पी मध्वक्षो मध्यम: पाण्डवो बली,वह स्पष्ट नहीं बोलता। उसकी आँखें सदा मधुके समान पिंगलवर्णकी दिखायी देती हैं। वह महाबली मध्यम पाण्डव अपने वेगसे घोड़ोंको भी लाँच सकता है और बलसे हाथियोंको भी पराजित कर सकता है
ধৃতরাষ্ট্র বললেন—বেগে সে ঘোড়াদেরও ছাড়িয়ে যায়, আর বলে হাতিদেরও পরাভূত করে। সেই মধ্যম পাণ্ডব মহাবলী; তার বাক্য অস্পষ্ট, আর তার চোখ মধুর মতো পিঙ্গলবর্ণ বলে মনে হয়।
Verse 21
मैंने बाल्यकालमें ही व्यासजीके मुखसे पहले इस पाण्डुपुत्रके अद्भुत रूप और पराक्रमका यथार्थ वर्णन सुना था
ধৃতরাষ্ট্র বললেন—শৈশবেই আমি ব্যাসের মুখ থেকে এই পাণ্ডুপুত্রের আশ্চর্য রূপ ও বীর্য-পরাক্রমের সত্য বিবরণ পূর্বেই শুনেছিলাম।
Verse 22
आयसेन स दण्डेन रथान् नागान् नरान् हयान् | हनिष्यति रणे क्रुद्धो रौद्र: क्रूरपराक्रम:,निष्ठर पराक्रम प्रकट करनेवाला यह भयंकर भीमसेन समरभूमिमें कुपित होकर लौहदंडसे मेरे रथों, हाथियों, पैदल मनुष्यों और घोड़ोंका भी संहार कर डालेगा
ধৃতরাষ্ট্র বললেন—যুদ্ধে ক্রুদ্ধ হলে সেই ভয়ংকর ভীমসেন, নির্মম বীর্যসম্পন্ন, লৌহদণ্ড দিয়ে আমার রথ, হাতি, পদাতিক ও ঘোড়াদের নিধন করবে।
Verse 23
इति बाल्ये श्रुतः पूर्व मया व्यासमुखात् पुरा । रूपतो वीर्यतश्चैव याथातथ्येन पाण्डव:,अमर्षी नित्यसंरब्धो भीम: प्रहरतां वर: । मया तात प्रतीपानि कुर्वन् पूर्व विमानित: तात संजय! सदा क्रोधमें भरा रहनेवाला अमर्षशील भीमसेन प्रहार करनेवाले योद्धाओंमें सबसे श्रेष्ठ है। मेरे पुत्रोंक प्रतिकूल आचरण करते समय मैंने पहले कई बार उसका अपमान किया है
ধৃতরাষ্ট্র বললেন—এইভাবে শৈশবে আমি ব্যাসের মুখ থেকে পাণ্ডবের রূপ ও শক্তির সত্য বিবরণ শুনেছিলাম। অপমান-অসহিষ্ণু, সদা ক্রুদ্ধ ভীম আঘাতকারীদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ। হে সঞ্জয়, আমার পুত্রদের বিরুদ্ধ আচরণ করলে আমি পূর্বে বহুবার তাকে অপমান করেছি।
Verse 24
निष्कर्णामायसी स्थूलां सुपार्श्वा काउ्चनीं गदाम् | शतघ्नीं शतनिर्हादां कथं शक्ष्यन्ति मे सुता:,उसकी लोहेकी गदा सीधी, मोटी, सुन्दर पार्श्चभागवाली और सुवर्णसे विभूषित है, वह शत-शत वज्रपातके समान बड़े जोरसे आवाज करती और एक ही चोटमें सैकड़ोंको मार डालती है। मेरे बेटे उसका आघात कैसे सह सकेंगे?
ধৃতরাষ্ট্র বললেন—তার লৌহগদা সোজা, স্থূল, সুপাশ্বযুক্ত এবং স্বর্ণভূষিত; তার আঘাত শত শত বজ্রপাতের মতো গর্জে ওঠে, আর এক প্রহারে শতজনকে নিপাত করে। আমার পুত্রেরা কীভাবে তার আঘাত সহ্য করবে?
Verse 25
अपारमप्लवागाध॑ समुद्र शरवेगिनम् । भीमसेनमयं दुर्ग तात मन्दास्तितीर्षव:,तात! भीमसेन एक दुर्गम अपार समुद्र है, इसे पार करनेके लिये न तो कोई नौका है और न इसकी कहीं थाह ही है; बाण ही इसका वेग है, तो भी मेरे मूर्ख पुत्र इस भीमसेनमय दुर्गम समुद्रको पार करना चाहते हैं
ধৃতরাষ্ট্র বললেন—হে তাত, ভীমসেন এক অপরিসীম, দুরতিক্রম্য সমুদ্র; তাকে পার করার মতো না আছে কোনো নৌকা, না আছে কোথাও তার তলদেশ—তীরই তার বেগ। তবু আমার মন্দবুদ্ধি পুত্রেরা এই ভীমসেনময় দুর্গম সমুদ্র পার হতে চায়।
Verse 26
क्रोशतो मे न शृण्वन्ति बाला: पण्डितमानिन: । विषम न हि मन्यन्ते प्रपातं मधुदर्शिन:,मैं चीखता-चिल्लाता रह जाता हूँ, परंतु अपनेको पण्डित समझनेवाले ये मूर्ख पुत्र मेरी बात नहीं सुनते हैं। ये केवल वृक्षकी ऊँची शाखामें लगे हुए शहदको देखते हैं, वहाँसे गिरनेका जो भयानक खटका है, उसकी ओर इनका ध्यान नहीं है
আমি চিৎকার করে উঠলেও আমার পুত্রেরা—যারা বালক, অথচ নিজেকে পণ্ডিত মনে করে—আমার কথা শোনে না। তারা গাছের উঁচু ডালে থাকা মধুই দেখে; কিন্তু সেই মধুর লোভে যে ভয়ংকর পতনের আশঙ্কা, তা তারা গণ্য করে না।
Verse 27
संयुगं ये गमिष्यन्ति नररूपेण मृत्युना । नियतं चोदिता धात्रा सिंहेनेव महामृगा:,जैसे महान् मृग सिंहसे भिड़ जाय, उसी प्रकार जो लोग उस मनुष्यरूपी यमराजके साथ लड़नेके लिये युद्धभूमिमें उतरेंगे, उन्हें विधाताने ही मृत्युके लिये प्रेरित करके भेजा है, ऐसा मानना चाहिये
যারা মনুষ্যরূপে প্রকাশিত মৃত্যুর সঙ্গে যুদ্ধ করতে রণক্ষেত্রে যাবে—তারা যেন সিংহের সঙ্গে লড়তে ধেয়ে যাওয়া মহামৃগ। বুঝতে হবে, বিধাতাই তাদের এক নির্দিষ্ট পরিণতি—মৃত্যুর দিকে—প্রেরণা দিয়েছেন।
Verse 28
शैक्यां तात चतुष्किष्कुं पडस्रिममितौजसम् । प्रहितां दुःखसंस्पर्शा कथं शक्ष्यन्ति मे सुता:,तात संजय! भीमसेनकी गदा छींकेपर रखनेयोग्य, चार हाथ लंबी और छ: कोणोंसे विभूषित है। उस अत्यन्त तेजस्विनी गदाका स्पर्श भी दुःखदायक है। जब भीम उसे मेरे पुत्रोंपर चलायेगा, तब वे उसका आघात कैसे सह सकेंगे?
হে তাত সংজয়! ভীমসেনের লৌহগদা চার হাত লম্বা, ছয় ধার/কোণযুক্ত, এবং অপরিমেয় শক্তিসম্পন্ন। তার স্পর্শমাত্রই বেদনাদায়ক। ভীম যখন তা আমার পুত্রদের উপর নিক্ষেপ করবে, তারা কীভাবে সেই আঘাত সহ্য করবে?
Verse 29
गदां भ्रामयतस्तस्य भिन्दतो हस्तिमस्तकान् । सृक्किणी लेलिहानस्य बाष्पमुत्सूजतो मुहुः,भीमसेन जब क्रोधजनित आँसू बहाता और बारंबार अपने ओएष्ठप्रान्तको चाटता हुआ गदा घुमा-घुमाकर हाथियोंके मस्तक विदीर्ण करने लगेगा, सामने भयंकर गर्जना करनेवाले गजराजोंको लक्ष्य करके उनकी ओर दौड़ेगा, प्रतिकूल दिशाकी ओर भागनेवाले मदोन्मत्त हाथियोंकी गर्जनाके उत्तरमें स्वयं भी सिंहनाद करेगा और मेरे रथियोंकी सेनाओंमें घुसकर श्रेष्ठ वीरोंको चुन-चुनकर मारने लगेगा, उस समय अग्निके समान प्रज्वलित होनेवाले भीमके हाथसे मेरे पुत्र कैसे जीवित बचेंगे?
যখন সে গদা ঘুরিয়ে হাতিদের মস্তক বিদীর্ণ করতে থাকবে; যখন ক্রোধজাত অশ্রু বারবার ঝরিয়ে এবং ঠোঁটের কোণ চেটে সে জ্বলন্ত অগ্নির মতো দীপ্ত হবে—তখন আমার পুত্রেরা তার হাত থেকে কীভাবে রক্ষা পাবে?
Verse 30
उद्दिश्य नागान् पतत: कुर्वतो भैरवान् रवान् । प्रतीपं पततो मत्तान् कुज्जरान् प्रतिगर्जतः,भीमसेन जब क्रोधजनित आँसू बहाता और बारंबार अपने ओएष्ठप्रान्तको चाटता हुआ गदा घुमा-घुमाकर हाथियोंके मस्तक विदीर्ण करने लगेगा, सामने भयंकर गर्जना करनेवाले गजराजोंको लक्ष्य करके उनकी ओर दौड़ेगा, प्रतिकूल दिशाकी ओर भागनेवाले मदोन्मत्त हाथियोंकी गर्जनाके उत्तरमें स्वयं भी सिंहनाद करेगा और मेरे रथियोंकी सेनाओंमें घुसकर श्रेष्ठ वीरोंको चुन-चुनकर मारने लगेगा, उस समय अग्निके समान प्रज्वलित होनेवाले भीमके हाथसे मेरे पुत्र कैसे जीवित बचेंगे?
যখন সে হাতিদের লক্ষ্য করে ভয়ংকর গর্জন করতে করতে তাদের উপর ঝাঁপিয়ে পড়বে; যখন বিপরীত দিকে পালাতে থাকা মত্ত কুঞ্জরদের ধাওয়া করে তাদের চিৎকারের জবাবে নিজেও সিংহনাদ করবে—তখন অগ্নির মতো জ্বলে উঠে সে আমার রথীসেনার মধ্যে ঢুকে বেছে বেছে বীরদের নিধন করবে; সে অবস্থায় আমার পুত্রেরা তার হাতে কীভাবে জীবিত থাকবে?
Verse 31
विगाहा रथमार्गेषु वरानुद्दिश्य निघ्नतः । अग्ने: प्रज्वलितस्येव अपि मुच्येत मे प्रजा,भीमसेन जब क्रोधजनित आँसू बहाता और बारंबार अपने ओएष्ठप्रान्तको चाटता हुआ गदा घुमा-घुमाकर हाथियोंके मस्तक विदीर्ण करने लगेगा, सामने भयंकर गर्जना करनेवाले गजराजोंको लक्ष्य करके उनकी ओर दौड़ेगा, प्रतिकूल दिशाकी ओर भागनेवाले मदोन्मत्त हाथियोंकी गर्जनाके उत्तरमें स्वयं भी सिंहनाद करेगा और मेरे रथियोंकी सेनाओंमें घुसकर श्रेष्ठ वीरोंको चुन-चुनकर मारने लगेगा, उस समय अग्निके समान प्रज्वलित होनेवाले भीमके हाथसे मेरे पुत्र कैसे जीवित बचेंगे?
ধৃতরাষ্ট্র বললেন—যখন অগ্নির মতো প্রজ্বলিত ভীম রথপথের সারিতে ঝাঁপিয়ে পড়ে শ্রেষ্ঠ যোদ্ধাদের বেছে বেছে নিধন করবে, তখন আমার পুত্রেরা—আমার প্রজারা—তার হাত থেকে কীভাবে রক্ষা পাবে?
Verse 32
वीथीं कुर्वन् महाबाहुद्रावयन् मम वाहिनीम् । नृत्यन्निव गदापाणियगान्तं दर्शयिष्यति,महाबाहु भीम मेरी सेनामें घुसकर अपने रथके लिये रास्ता बनाता, मेरी विशाल वाहिनीको खदेड़ता और हाथमें गदा लिये नृत्य-सा करता हुआ जब आगे बढ़ेगा, तब प्रलयकालका दृश्य उपस्थित कर देगा
ধৃতরাষ্ট্র বললেন—সেই মহাবাহু আমার সেনার মধ্যে পথ কেটে, আমার বাহিনীকে তাড়িয়ে, গদা হাতে নৃত্যের মতো ঘুরে ঘুরে অগ্রসর হবে; তখন যুদ্ধক্ষেত্রকে সে যুগান্তের দৃশ্য করে তুলবে।
Verse 33
प्रभिन्न इव मातड्: प्रभञ्जन् पुष्पितान् द्रुमान् प्रवेक्ष्यति रणे सेनां पुत्राणां मे वृकोदर:,जैसे मदकी धारा बहानेवाला मतवाला हाथी फूले हुए वृक्षोंको तोड़ता हुआ आगे बढ़ता है, उसी प्रकार भीमसेन समरभ्ूमिमें मेरे पुत्रोंकी सेनाके भीतर प्रवेश करेगा
যেমন মত্ত হস্তী ফুলে-ফলে ভরা বৃক্ষ ভেঙে এগিয়ে যায়, তেমনই বৃকোদর ভীম রণে আমার পুত্রদের সেনার মধ্যে প্রবেশ করবে।
Verse 34
कुर्वन् रथान् विपुरुषान् विसारथिहयध्वजान् । आरुज न् पुरुषव्याप्रो रथिन: सादिनस्तथा,संजय! वह पुरुषसिंह भीम रथोंको रथी, सारथि, अश्व तथा ध्वजाओंसे शून्य कर देगा एवं रथियों और घुड़सवारोंके अंग-भंग कर डालेगा। जैसे गंगाजीका बढ़ता हुआ वेग जलमय प्रदेशमें स्थित हुए नाना प्रकारके तटवर्ती वृक्षोंको गिराकर नष्ट कर देता है, उसी प्रकार भीम युद्धभूमिमें आकर मेरे पुत्रोंकी सेनाका संहार कर डालेगा
ধৃতরাষ্ট্র বললেন—হে সঞ্জয়! সেই পুরুষব্যাঘ্র ভীম যুদ্ধে পরিশ্রম করে রথগুলোকে যোদ্ধাশূন্য করে দেবে—সারথি, অশ্ব ও ধ্বজহীন; আর রথী ও অশ্বারোহীদের অঙ্গভঙ্গ করে তাদের শক্তি নিঃশেষ করবে। যেমন জলমগ্ন প্রদেশে গঙ্গার স্ফীত স্রোত তীরবর্তী নানা বৃক্ষ উপড়ে ধ্বংস করে, তেমনই ভীম রণভূমিতে প্রবেশ করে আমার পুত্রদের সেনাকে বিনাশ করবে।
Verse 35
गड्जावेग इवानूपांस्तीरजान् विविधान् टद्रुमान् | प्रभड्क्ष्यति रणे सेनां पुत्राणां मम संजय,संजय! वह पुरुषसिंह भीम रथोंको रथी, सारथि, अश्व तथा ध्वजाओंसे शून्य कर देगा एवं रथियों और घुड़सवारोंके अंग-भंग कर डालेगा। जैसे गंगाजीका बढ़ता हुआ वेग जलमय प्रदेशमें स्थित हुए नाना प्रकारके तटवर्ती वृक्षोंको गिराकर नष्ट कर देता है, उसी प्रकार भीम युद्धभूमिमें आकर मेरे पुत्रोंकी सेनाका संहार कर डालेगा
ধৃতরাষ্ট্র বললেন—সঞ্জয়, সঞ্জয়! সেই নরসিংহ ভীম রণে আমার পুত্রদের সেনাকে চূর্ণ করবে। সে রথগুলোকে সারথি, অশ্ব ও ধ্বজহীন করে দেবে, আর রথী ও অশ্বারোহীদের অঙ্গভঙ্গ করে তাদের শক্তি নিঃশেষ করবে। যেমন জলমগ্ন নিম্নভূমিতে গঙ্গার উন্মত্ত স্রোত তীরবর্তী নানা বৃক্ষ উপড়ে ধ্বংস করে, তেমনই ভীম যুদ্ধক্ষেত্রে এসে আমার পুত্রদের বাহিনীকে বিনষ্ট করবে।
Verse 36
दिशो नूनं गमिष्यन्ति भीमसेनभयार्दिता: । मम पुत्राश्न भृत्याश्न राजानश्वैव संजय,संजय! निश्चय ही भीमसेनके भयसे पीड़ित हो मेरे पुत्र, सेवक तथा सहायक नरेश विभिन्न दिशाओंमें भाग जायँगे
সঞ্জয়! নিশ্চিতই ভীমসেনের ভয়ে পীড়িত আমার পুত্রেরা—তাদের অনুচর ও মিত্ররাজাদের সঙ্গে—দিকবিদিকে ছত্রভঙ্গ হয়ে পালাবে; ভীমের আতঙ্কে তারা স্থির থাকতে পারবে না।
Verse 37
येन राजा महावीर्य: प्रविश्यान्त:पुरं पुरा । वासुदेवसहायेन जरासंधो निपातितः,परम बुद्धिमान् और बलवान् महाबली मगधराज जरासंधने यह सारी पृथिवी अपने वशमें करके इसे पीड़ा देना प्रारम्भ किया था, परंतु भीमसेनने भगवान् श्रीकृष्णके साथ उसके अन्तः:पुरमें जाकर उस महापराक्रमी नरेशको मार गिराया
যে মহাবীর (ভীম) একদা বাসুদেবের সহায়তায় জরাসন্ধের অন্তঃপুরে প্রবেশ করে তাকে নিপাত করেছিল—সে কীর্তি স্মরণ হলেই আমার অন্তর কেঁপে ওঠে।
Verse 38
कृत्स्नेयं पृथिवी देवी जरासंधेन धीमता । मागधेन्द्रेण बलिना वशे कृत्वा प्रतापिता,परम बुद्धिमान् और बलवान् महाबली मगधराज जरासंधने यह सारी पृथिवी अपने वशमें करके इसे पीड़ा देना प्रारम्भ किया था, परंतु भीमसेनने भगवान् श्रीकृष्णके साथ उसके अन्तः:पुरमें जाकर उस महापराक्रमी नरेशको मार गिराया
বুদ্ধিমান ও বলবান মগধাধিপতি জরাসন্ধ সমগ্র পৃথিবী-দেবীকে বশ করে নিজের প্রতাপে তাকে পীড়িত করেছিল; কিন্তু ভগবান শ্রীকৃষ্ণকে সঙ্গে নিয়ে ভীমসেন তার অন্তঃপুরে প্রবেশ করে সেই মহাপরাক্রমী রাজাকে নিপাত করল।
Verse 39
भीष्मप्रतापात् कुरवो नयेनान्धकवृष्णय: । यज्ञ तस्य वशे जग्मु: केवलं दैवमेव तत्,भीष्मजीके प्रतापसे कुरुवंशी और नीतिबलसे अंधक-वृष्णिवंशके लोग जो जरासंधके वशमें नहीं पड़े, वह केवल दैवयोग था
ভীষ্মের প্রতাপ ও কুরুদের নীতিবলে অন্ধক-বৃষ্ণিরা তার বশে যায়নি; সঞ্জয়, তা ছিল কেবলই দৈবযোগ।
Verse 40
स गत्वा पाण्डुपुत्रेण तरसा बाहुशालिना । अनायुधेन वीरेण निहत: कि ततो5धिकम्,परंतु अपनी भुजाओंसे सुशोभित होनेवाले वीर पाण्डुपुत्र भीमने वेगपूर्वक वहाँ जाकर बिना किसी अस्त्र-शस्त्रके ही उस जरासंधको यमलोक पहुँचा दिया, इससे बढ़कर पराक्रम और क्या होगा?
সে (জরাসন্ধ) বাহুবলেই ভূষিত বীর পাণ্ডুপুত্র ভীমের দ্বারা দ্রুত সেখানে গিয়ে, কোনো অস্ত্রশস্ত্র ছাড়াই নিহত হয়েছিল; তাকে যমলোকে পাঠানো হয়েছিল—এর চেয়ে বড় বীরত্ব আর কী হতে পারে?
Verse 41
दीर्घकालसमासक्तं विषमाशीविषो यथा । स मोक्ष्यति रणे तेज: पुत्रेषु मम संजय,संजय! जैसे विषधर सर्प बहुत दिनोंसे संचित किये हुए विषको किसीपर उगलता है, उसी प्रकार भीमसेन भी दीर्घकालसे संचित अपने तेजको रणभूमिमें मेरे पुत्रोंपर छोड़ेगा
ধৃতরাষ্ট্র বললেন— সঞ্জয়! যেমন বিষধর সাপ বহুদিন সঞ্চিত বিষ একবারে উগরে দেয়, তেমনই ভীমসেনও রণক্ষেত্রে দীর্ঘকাল সঞ্চিত নিজের তেজ আমার পুত্রদের উপর নিক্ষেপ করবে।
Verse 42
महेन्द्र इव वज्ेण दानवान् देवसत्तम: । भीमसेनो गदापाणि: सूदयिष्यति मे सुतान्,जैसे देवश्रेष्ठ इन्द्र वज़से दानवोंका संहार करते हैं, उसी प्रकार हाथमें गदा लिये भीमसेन मेरे पुत्रोंका संहार कर डालेगा
ধৃতরাষ্ট্র বললেন— যেমন দেবশ্রেষ্ঠ মহেন্দ্র (ইন্দ্র) বজ্র দ্বারা দানবদের বিনাশ করেন, তেমনই গদা-ধারী ভীমসেন আমার পুত্রদের সংহার করবে।
Verse 43
अविषदह्ा[मनावार्य तीव्रवेगपराक्रमम् । पश्यामीवातिताम्राक्षमापतन्तं वृकोदरम्,उसका आक्रमण दुःसह है। उसकी गतिको कोई रोक नहीं सकता। उसका वेग और पराक्रम तीव्र है। मैं प्रत्यक्ष देख-सा रहा हूँ कि वह भीम क्रोधसे अत्यन्त लाल आँखें किये इधर ही दौड़ा आ रहा है
তার আক্রমণ অসহ্য, তাকে কেউ রোধ করতে পারে না; তার বেগ ও পরাক্রম প্রবল। আমি যেন চোখের সামনে দেখছি—ক্রোধে অতি লালচে চোখে বৃকোদর (ভীম) এই দিকেই ধেয়ে আসছে।
Verse 44
अगदस्याप्यधनुषो विरथस्य विवर्मण: । बाहुभ्यां युद्धयमानस्य कस्तिष्ठेदग्रत: पुमान्,यदि वह गदा, धनुष, रथ और कवचको छोड़कर केवल दोनों भुजाओंसे युद्ध करे तो भी उसके सामने कौन पुरुष ठहर सकता है?
ধৃতরাষ্ট্র বললেন—যদি সে গদা, ধনুক, রথ ও বর্ম ছাড়াও কেবল দুই বাহু দিয়ে যুদ্ধ করে, তবে তার সামনে কোন পুরুষ দাঁড়াতে পারে?
Verse 45
भीष्मो द्रोणश्न विप्रोडयं कृप: शारद्वतस्तथा । जानन्त्येते यथैवाहं वीर्यज्ञस्तस्य धीमत:,उस बुद्धिमान् भीमके बल और पराक्रमको जैसे मैं जानता हूँ, उसी प्रकार ये भीष्म, विप्रवर द्रोणाचार्य तथा शरद्वानके पुत्र कृप भी जानते हैं
ধৃতরাষ্ট্র বললেন—সেই বুদ্ধিমান ভীমের বল ও পরাক্রম যেমন আমি জানি, তেমনই ভীষ্ম, ব্রাহ্মণশ্রেষ্ঠ দ্রোণাচার্য এবং শরদ্বানের পুত্র কৃপও জানেন।
Verse 46
आर्यव्रतं तु जानन्त: संगरान्तं विधित्सव: । सेनामुखेषु स्थास्यन्ति मामकानां नरर्षभा:,तथापि ये नरश्रेष्ठ शिष्ट पुरुषोंके व्रतको जानते हैं, इसलिये युद्धमें प्राणत्याग करनेकी इच्छासे मेरे पुत्रोंकी सेनाके अग्रभागमें डटे रहेंगे
যাঁরা আর্য-ধর্মের শিষ্টাচার জানেন এবং যুদ্ধে প্রাণান্ত করতে উদ্যত, সেই বৃষভসম বীরেরা আমার পুত্রদের সেনার অগ্রভাগে অচল হয়ে দাঁড়িয়ে থাকবে।
Verse 47
बलीय: सर्वतो दिष्टं पुरुषस्थ विशेषत: । पश्यन्नपि जयं तेषां न नियच्छामि यत् सुतान्,पुरुषका भाग्य ही सबसे विशेष प्रबल है, क्योंकि मैं पाण्डवोंकी विजय समझकर भी अपने पुत्रोंको रोक नहीं पाता हूँ
ভাগ্যই সর্বাপেক্ষা প্রবল—বিশেষত যখন তা মানুষের নিজের স্বভাব ও সংকল্পে নিবদ্ধ থাকে। তাদের জয় আমি দেখেও আমার পুত্রদের নিবৃত্ত করতে পারি না।
Verse 48
ते पुराणं महेष्वासा मार्गमैन्द्रं समास्थिता: । त्यक्ष्यन्ति तुमुले प्राणान् रक्षन्त: पार्थिवं यश:,धृतराष्ट्रकी सभामें संजय पाण्डवोंका सन्देश सुना रहे हैं है जलन हू "60 >ट्र । भीमसेनका बल बखानते हुए धृतराष्ट्रका विलाप वे महाधनुर्धर भीष्म आदि पुरातन स्वर्गीय मार्गका आश्रय ले पार्थिव यशकी रक्षा करते हुए घमासान युद्धमें अपने प्राण त्याग देंगे
সেই প্রাচীন মহাধনুর্ধর বীরেরা ইন্দ্রলোকগামী সনাতন পথ অবলম্বন করে, রাজকীয় যশ রক্ষা করতে করতে, ভয়ংকর যুদ্ধে প্রাণ ত্যাগ করবে।
Verse 49
यथैषां मामकास्तात तथैषां पाण्डवा अपि | पौत्रा भीष्मस्य शिष्याश्च द्रोणस्प च कृपस्थ च,तात! इनके लिये जैसे मेरे पुत्र हैं, वैसे ही पाण्डव भी हैं। दोनों ही भीष्मके पौत्र तथा द्रोण और कृपके शिष्य हैं
হে তাত! এদের কাছে যেমন আমার পুত্রেরা আপন, তেমনি পাণ্ডবরাও আপন। উভয় পক্ষই ভীষ্মের পৌত্র এবং দ্রোণ ও কৃপের শিষ্য।
Verse 50
यदस्मदाश्रयं किंचिद् दत्तमिष्टं च संजय । तस्यापचितिमार्यत्वात् कर्तार: स्थविरास्त्रय:,संजय! भीष्म, द्रोण और कृपाचार्य--ये तीनों वृद्ध श्रेष्ठ पुरुष हैं; अतः हमारे आश्रयमें रहकर इन्होंने जो कुछ भी दान-यज्ञ आदि किया है, ये उसका बदला चुकायेंगे (युद्धमें दुर्योधनका ही साथ देंगे)
হে সংজয়! ভীষ্ম, দ্রোণ ও কৃপ—এই তিনজন স্থবির শ্রেষ্ঠ পুরুষ; আমাদের আশ্রয়ে থেকে তারা যা দান ও যজ্ঞাদি করেছে, আর্য-ধর্মবশত তার প্রতিদান তারা দেবে।
Verse 51
आददानस्य शत्त्र हि क्षत्रधर्म परीप्सत: | निधन क्षत्रियस्थाजौ वरमेवाहुरुत्तमम्,जो अस्त्र-शस्त्र धारण करके क्षात्रधर्मकी रक्षा करना चाहता है, उस क्षत्रियके लिये संग्राममें होनेवाली मृत्युको ही श्रेष्ठ एवं उत्तम माना गया है इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि यानसंधिपर्वणि धृतराष्ट्रवाक्ये एकपज्चाशत्तमो5ध्याय:
ধৃতরাষ্ট্র বললেন—যে ক্ষত্রিয় অস্ত্র-শস্ত্র ধারণ করে ক্ষাত্রধর্ম রক্ষা করতে চায়, তার জন্য রণক্ষেত্রে মৃত্যু লাভই শ্রেষ্ঠ ও উত্তম বলে ঘোষিত।
Verse 52
स वै शोचामि सर्वान् वै ये युयुत्सन्ति पाण्डवै: । विक्रुष्टं विदुरेणादौ तदेतद् भयमागतम्,जो लोग पाण्डवोंसे युद्ध करना चाहते हैं, उन सबके लिये मुझे बड़ा शोक हो रहा है। विदुरने पहले ही उच्चस्वरसे जिसकी घोषणा की थी, वही यह भय आज आ पहुँचा है
ধৃতরাষ্ট্র বললেন—যারা পাণ্ডবদের সঙ্গে যুদ্ধ করতে উদ্গ্রীব, তাদের সকলের জন্য আমি গভীর শোক করছি। বিদুর যে ভয়কে আগে উচ্চস্বরে ঘোষণা করেছিলেন, সেই ভয়ই আজ এসে উপস্থিত হয়েছে।
Verse 53
न तु मन्ये विघाताय ज्ञानं दुःखस्य संजय । भवत्यतिबलं होतज्ज्ञानस्थाप्युपघातकम्,संजय! मुझे तो ऐसा मालूम होता है कि ज्ञान दुःखका नाश नहीं कर सकता, अपितु प्रबल दुःख ही ज्ञानका भी नाश करनेवाला बन जाता है
ধৃতরাষ্ট্র বললেন—সঞ্জয়! আমি মনে করি না যে জ্ঞান দুঃখকে বিনাশ করতে পারে; বরং দুঃখ যখন অতিশয় প্রবল হয়, তখন তা স্থিত জ্ঞানকেও আঘাত করে পরাভূত করে।
Verse 54
ऋषयो हापि निर्मुक्ता: पश्यन्तो लोकसंग्रहान् सुखैर्भवन्ति सुखिनस्तथा दुःखेन दु:खिता:,जीवन्मुक्त महर्षि भी लोकव्यवहारकी ओर दृष्टि रखकर सुखके साधनोंसे सुखी और दुःखसे दुःखी होते हैं
ধৃতরাষ্ট্র বললেন—লোকসংগ্রহের জন্য জগতের আচরণ পর্যবেক্ষণ করতে করতে, মুক্ত ঋষিরাও সুখের কারণে সুখী এবং দুঃখের দ্বারা দুঃখিত হন বলে প্রতীয়মান হয়।
Verse 55
कि पुनर्मोहमासक्तस्तत्र तत्र सहस्रधा । पुत्रेषु राज्यदारेषु पौत्रेष्वपि च बन्धुषु,फिर जो पुत्र, राज्य, पत्नी, पौत्र तथा बन्धु-बान्धवोंमें जहाँ-तहाँ सहस्रों प्रकारसे मोहवश आसक्त हो रहा है, उसकी तो बात ही क्या है?
তবে যে ব্যক্তি মোহবশত এখানে-সেখানে সহস্র প্রকারে পুত্র, রাজ্য, স্ত্রী, পৌত্র এবং আত্মীয়স্বজনের প্রতি আসক্ত হয়ে পড়ে—তার কথা আর কী বলা যায়?
Verse 56
संशये तु महत्यस्मिन् कि नु मे क्षममुत्तरम् । विनाशं होव पश्यामि कुरूणामनुचिन्तयन्,इस महान् संकटके विषयमें मैं क्या उचित प्रतीकार कर सकता हूँ? मुझे तो बार-बार विचार करनेपर कौरवोंका विनाश ही दिखायी पड़ता है
এই মহা সংশয়ে আমি কী উপযুক্ত উত্তর দিতে পারি? বারবার চিন্তা করলে আমার চোখে কেবল কুরুদের বিনাশই ভাসে।
Verse 57
द्यूतप्रमुखमा भाति कुरूणां व्यसनं महत् । मन्देनैश्वर्यकामेन लोभात् पापमिदं कृतम्,द्यूतक्रीड़ा आदिकी घटनाएँ ही कौरवोंपर भारी विपत्ति लानेका कारण प्रतीत होती हैं। ऐश्वर्यकी इच्छा रखनेवाले मूर्ख दुर्योधनने लोभवश यह पाप किया है
কুরুদের এই মহাবিপদ যেন পাশাখেলা থেকেই শুরু হয়েছে। ঐশ্বর্য ও রাজ্যলালসায় অন্ধ মূঢ় দুর্যোধন লোভবশত এই পাপ করেছে।
Verse 58
मन्ये पर्यायधर्मो5यं कालस्यात्यन्तगामिन: । चक्रे प्रधिरिवासक्तो नास्थ शक््यं पलायितुम्,मैं समझता हूँ कि अत्यन्त तीव्र गतिसे चलनेवाले कालका ही यह क्रमशः प्राप्त होनेवाला नियम है। इस कालचक्रमें उसकी नेमिके समान मैं जुड़ा हुआ हूँ, अतः मेरे लिये इससे दूर भागना सम्भव नहीं है
আমি মনে করি, অতি দ্রুতগামী কালের এটাই অনিবার্য, পুনরাবর্তিত নিয়ম। ঘূর্ণায়মান চাকার ধারে যেমন নেমি আঁটসাঁট থাকে, তেমনি আমি এই চক্রে আবদ্ধ; তাই এর থেকে পালানো সম্ভব নয়।
Verse 59
किंनु कुर्या कथं कुर्या क्व नु गच्छामि संजय । एते नश्यन्ति कुरवो मन्दा: कालवशं गता:,संजय! क्या करूँ, कैसे करूँ और कहाँ चला जाऊँ? ये मूर्ख कौरव कालके वशीभूत होकर नष्ट होना चाहते हैं
সঞ্জয়! আমি কী করব, কীভাবে করব, আর কোথায় যাব? এই মূঢ় কুরুগণ কালের বশে পড়ে বিনাশের দিকে ধাবিত হচ্ছে।
Verse 60
अवशोऊहं तदा तात पुत्राणां निहते शते । श्रोष्यामि निनदं स्त्रीणां कथं मां मरणं स्पृशेत्,तात! मेरे सौ पुत्र यदि युद्धमें मारे गये, तब विवश होकर मैं इनकी अनाथ स्त्रियोंका करुण क्रन्दन सुनूँगा। हाय! मेरी मृत्यु किस प्रकार हो सकती है?
হে তাত! যদি যুদ্ধে আমার শত পুত্র নিহত হয়, তবে অসহায় হয়ে আমি তাদের বিধবা নারীদের করুণ বিলাপ শুনব। এমন অবস্থায় মৃত্যু কীভাবে আমাকে স্পর্শ করবে?
Verse 61
यथा निदाघे ज्वलन: समिद्धो दहेत् कक्ष वायुना चोद्यमान: | गदाहस्त: पाण्डवो वै तथैव हन्ता मदीयान् सहितोअर्जुनेन,जैसे गर्मीमें प्रजजलित हुई अग्नि हवाका सहारा पाकर घास-फूस एवं जंगलको भी जलाकर भस्म कर देती है, उसी प्रकार अर्जुनसहित पाण्डुनन्दन भीम गदा हाथमें लेकर मेरे सब पुत्रोंको मार डालेगा
ধৃতরাষ্ট্র বললেন—যেমন গ্রীষ্মের দাহে প্রজ্বলিত অগ্নি বায়ুর তাড়নায় শুকনো ঝোপঝাড় ও বনভূমি দগ্ধ করে ভস্ম করে দেয়, তেমনই গদাধারী পাণ্ডব ভীম, অর্জুনসহ, আমার পুত্রদের সংহারক হবে।
Verse 156
तदैव न हता: सर्वे पुत्रा मम मनस्विना । संजय! मुझे अमर्षमें भरे हुए शूरवीर भीमसेनका समाचार सुनाओ। मैं तो यही सबसे बड़ा लाभ मानता हूँ कि उस शत्रुधाती मनस्वी वीरने (जब द्यूतक्रीड़ा हो रही थी) उसी समय मेरे सब पुत्रोंको नहीं मार डाला
ধৃতরাষ্ট্র বললেন—সেই সময়েই সেই মনস্বী বীর আমার সকল পুত্রকে বধ করেনি। সঞ্জয়, ক্রোধে পূর্ণ সেই শূর ভীমসেনের সংবাদ আমাকে বলো। আমি এটিকেই সর্বোচ্চ লাভ মনে করি যে শত্রুনাশক সেই দৃঢ়চিত্ত বীর, পাশাখেলা চলাকালেও, তখনই আমার পুত্রদের হত্যা করেনি।
Verse 166
कथं तस्य रणे वेग॑ मानुष: प्रसहिष्यति । जिसने पूर्वकालमें भयंकर बलशाली यक्षों तथा राक्षसोंका वध किया है, युद्धमें उसका वेग कोई मनुष्य कैसे सह सकेगा?
ধৃতরাষ্ট্র বললেন—যুদ্ধে তার সেই প্রবল বেগ কে সহ্য করতে পারে, একজন মানুষ কীভাবে তা সহ্য করবে? যে পূর্বকালে ভয়ংকর বলবান যক্ষ ও রাক্ষসদের বধ করেছে, তার রণবেগ ও পরাক্রম মানবদের মধ্যে কে ধারণ করতে পারবে?
The dilemma is the ruler’s responsibility to prevent foreseeable harm versus his attachment-driven inability to restrain his faction; he recognizes the likely devastation yet cannot effectively redirect policy.
Foreknowledge alone does not dissolve suffering; when coupled with attachment and inaction, it can intensify distress. Ethical governance requires timely restraint, not merely accurate perception.
No formal phalaśruti appears; the chapter’s meta-level function is diagnostic—linking present fear to prior injustice (dyūta-origin wrongdoing) and to kāla’s momentum, situating the discourse as reflective causality within the epic.