Adhyaya 191
Udyoga ParvaAdhyaya 19174 Verses

Adhyaya 191

Drupada’s Alarm and Inquiry Regarding Śikhaṇḍinī (द्रुपदस्य भय-विमर्शः)

Upa-parva: Śikhaṇḍinī–Hiraṇyavarmā Conflict Episode (Udyoga Parva, contextual sub-episode)

Bhīṣma narrates that after Drupada’s messenger speaks, Drupada’s speech falters “like a thief caught,” indicating immediate reputational shock. Hiraṇyavarmā attempts intense reassurance through relations and sweet-speaking envoys while simultaneously denying the allegation, but then verifies the matter more concretely and hastens forward. Acting on reports from the nurses, he informs powerful allies, assembles forces, and deliberates an expedition against Drupada. The allied kings decide: if Śikhaṇḍinī is truly a girl, they will seize Drupada and bring him home; they also contemplate installing another ruler in Pāñcāla and killing Drupada along with Śikhaṇḍinī. A messenger is again dispatched with a threat. Drupada—described as fearful and burdened by fault—dismisses the envoy and, grief-stricken, speaks privately with his wife, the mother of Śikhaṇḍinī. He anticipates Hiraṇyavarmā’s armed approach, confesses confusion about whether he has acted wrongly regarding the “daughter/son” status, and asks for a factual account so he can plan a remedy that secures release from peril and protects Śikhaṇḍinī from fear. The queen, prompted to speak openly for disclosure, begins her reply.

Chapter Arc: अम्बोपाख्यान की धारा में शिखण्डी के जीवन का निर्णायक मोड़ आता है—जिस देह-परिवर्तन की कथा भविष्य के भीष्म-वध की छाया बनकर खड़ी है, वही यहाँ ‘भवितव्य’ के रूप में उद्घोषित होती है। → शिखण्डी अपने दुःख और अपमान को ‘भवितव्य’ मानकर भी उपाय खोजता है। यक्ष/स्थूणाकर्ण के साथ समय-बंध (समय-प्रतिज्ञा) बनता है—पुंस्त्व का आदान-प्रदान, और निश्चित काल पर लौटाने की शर्त। उधर द्रुपद के दरबार में यथावृत्त निवेदन होता है; द्रुपद हर्षित होता है, पर राजनीतिक-सामाजिक संकट की आहट भी साथ चलती है। दशार्ण-नरेश हिरण्यवर्मा की ओर से पुरोहित के माध्यम से कटु उपालम्भयुक्त संदेश आता है, जो पंचाल की प्रतिष्ठा और संबंधों को चुनौती देता है। → यक्ष/स्थूणाकर्ण का निर्णायक वचन—‘स्वं ते पुंस्त्वं प्रदास्यामि… किंचित् कालान्तरे दास्ये’—शिखण्डी के भाग्य का ताला खोल देता है। इसी के साथ कुबेर का प्रसंग उभरता है: स्थूणाकर्ण पर कुबेर का शाप/नियम-बंधन स्थापित होता है, जिससे यह परिवर्तन स्थायी दिशा लेता है। समानांतर रूप से दशार्ण की ओर से आया अपमानजनक संदेश पंचाल के लिए तीव्र राजनीतिक दबाव बनकर चरम पर पहुँचता है। → शिखण्डी को पुरुषत्व की प्राप्ति सुनिश्चित होती है; द्रुपद को यथावृत्त सुनकर परम हर्ष मिलता है और वह स्थिति को स्वीकार कर आगे की नीति के लिए तैयार होता है। कुबेर-शाप का विधान कथा को ‘टाला नहीं जा सकता’ वाली अनिवार्यता देता है—घटना अब केवल व्यक्तिगत नहीं, दैवी-नियति से बँधी हुई है। → दशार्णपति हिरण्यवर्मा का उपालम्भयुक्त संदेश पंचाल-दरबार में गूँजता है—अब द्रुपद क्या उत्तर देगा, और यह अपमान शिखण्डी के नव-परिचय को किस प्रकार सार्वजनिक संघर्ष में बदल देगा?

Shlokas

Verse 1

अप ह< बक। है २ 2 द्विनवत्याधिकशततमो< ध्याय: शिखण्डीको पुरुषत्वकी प्राप्ति, द्रपद और हिरण्यवर्माकी प्रसन्नता, स्थूणाकर्णको कुबेरका शाप तथा भीष्मका शिखण्डीको न मारनेका निश्चय भीष्म उवाच शिखण्डिवाक्यं श्रुत्वाथ स यक्षो भरतर्षभ | प्रोवाच मनसा चिन्त्य दैवेनोपनिपीडित:

শিখণ্ডীর বাক্য শুনে সেই যক্ষ—হে ভরতশ্রেষ্ঠ—মনে মনে চিন্তা করে, দৈবের চাপে পীড়িত হয়ে বলল।

Verse 2

भवितव्यं तथा तद्धि मम दुःखाय कौरव । भद्रे काम॑ करिष्यामि समयं तु निबोध मे

হে কৌরব! আমার দুঃখের জন্য তেমনই হওয়া অবশ্যম্ভাবী। হে ভদ্রে! আমি তোমার ইচ্ছা পূর্ণ করব; তবে আমার শর্তটি জেনে নাও।

Verse 3

(स्वं ते पुंस्त्व॑ प्रदास्यामि स्त्रीत्वं धारयितास्मि ते ।) किंचित्‌ कालान्तरे दास्ये पुँल्लिड्गं स्वमिदं तव । आगन्तव्यं त्वया काले सत्यं चैव वदस्व मे

ভীষ্ম বললেন—কিছু কাল অতিবাহিত হলে আমি তোমাকে তোমার নিজ পুরুষত্ব ফিরিয়ে দেব। নির্ধারিত সময়ে তোমাকে অবশ্যই ফিরে আসতে হবে; এবং আমাকে সত্য কথাই বলতে হবে।

Verse 4

भीष्म कहते हैं--भरतश्रेष्ठ कौरव! शिखण्डिनीकी यह बात सुनकर दैवपीड़ित यक्षने मन-ही-मन कुछ सोचकर कहा--'भद्रे! तुम जैसा कहती हो वैसा हो तो जायगा; परंतु वह मेरे दु:खका कारण होगा, तथापि मैं तुम्हारी इच्छा पूर्ण करूँगा। इस विषयमें जो मेरी शर्त है, उसे सुनो। मैं तुम्हें अपना पुरुषत्व दूँगा और तुम्हारा स्त्रीत्व स्वयं धारण करूँगा; किंतु कुछ ही कालके लिये अपना यह पुरुषत्व तुम्हें दूँगा। उस निश्चित समयके भीतर ही तुम्हें मेरा पुरुषत्व लौटानेके लिये यहाँ आ जाना चाहिये। इसके लिये मुझे सच्चा वचन दो ।। १ रे ।। प्रभु: संकल्पसिद्धो 5स्मि कामचारी विहड्भम: । मत्प्रसादात्‌ पुरं चैव त्राहि बन्धूंश्व केवलम्‌,“मैं सिद्धसंकल्प, सामर्थ्यशाली, इच्छानुसार सर्वत्र विचरनेवाला तथा आकाशमें भी चलनेकी शक्ति रखनेवाला हूँ। तुम मेरी कृपासे केवल अपने नगर और बन्धु-बान्धवोंकी रक्षा करो

ভীষ্ম বললেন—হে ভরতশ্রেষ্ঠ কৌরব! শিখণ্ডিনীর কথা শুনে ভাগ্যপীড়িত যক্ষ মনে মনে ভেবে বলল—“ভদ্রে! তুমি যেমন বলছ তেমনই হবে; কিন্তু তা আমার দুঃখের কারণ হবে। তবু আমি তোমার ইচ্ছা পূর্ণ করব। আমার শর্ত শোনো—আমি তোমাকে আমার পুরুষত্ব দেব এবং তোমার স্ত্রীত্ব নিজে ধারণ করব; তবে তা অল্প কালের জন্যই। নির্দিষ্ট সময়ের মধ্যে তোমাকে এখানে ফিরে এসে আমার পুরুষত্ব আমাকে ফিরিয়ে দিতে হবে। এর জন্য আমাকে সত্য প্রতিজ্ঞা দাও।” পরে সে আরও বলল—“আমি সিদ্ধসঙ্কল্প, শক্তিমান, ইচ্ছামতো বিচরণকারী এবং আকাশপথে গমনক্ষম। আমার অনুগ্রহে তুমি কেবল তোমার নগর ও স্বজনদের রক্ষা করো।”

Verse 5

स्त्रीलिड्रं धारयिष्यामि तदेवं पार्थिवात्मजे । सत्यं मे प्रतिजानीहि करिष्यामि प्रियं तव,“राजकुमारी! इस प्रकार मैं तुम्हारा स्त्रीत्व धारण करूँगा, कार्य पूर्ण हो जानेपर तुम मेरा पुरुषत्व लौटा देनेकी मुझसे सच्ची प्रतिज्ञा करो; तब मैं तुम्हारा प्रिय कार्य करूँगा”

হে রাজকন্যা! এইভাবে আমি তোমার স্ত্রীত্ব ধারণ করব। কিন্তু সত্য করে প্রতিজ্ঞা করো—কার্য সম্পন্ন হলে তুমি আমার পুরুষত্ব আমাকে ফিরিয়ে দেবে; তবেই আমি তোমার প্রিয় কাজ সম্পাদন করব।

Verse 6

शिखण्डिन्युवाच प्रतिदास्यामि भगवन्‌ पुल्लिज्7ं तव सुब्रत । किज्वचित्कालान्तरं स्त्रीत्वं धारयस्व निशाचर,शिखण्डिनी बोली--भगवन्‌! तुम्हारा यह पुरुषत्व मैं समयपर लौटा दूँगी। निशाचर! तुम कुछ ही समयके लिये मेरा स्त्रीत्व धारण कर लो

শিখণ্ডিনী বলল—হে ভগবান, হে সুব্রত! যথাসময়ে আমি তোমার পুরুষত্ব ফিরিয়ে দেব। হে নিশাচর! তুমি অল্প সময়ের জন্য আমার স্ত্রীত্ব ধারণ করো।

Verse 7

प्रतियाते दशार्णे तु पार्थिवे हेमवर्मणि । कन्यैव हि भविष्यामि पुरुषस्त्वं भविष्यसि,दशार्णदेशके स्वामी राजा हिरण्यवर्मके लौट जानेपर मैं फिर कन्या ही हो जाऊँगी और तुम पूर्ववत्‌ पुरुष हो जाओगे

দশার্ণে রাজা হেমবর্মা ফিরে গেলে আমি আবার কন্যাই হয়ে যাব, আর তুমি পুনরায় পুরুষ হয়ে উঠবে।

Verse 8

भीष्म उवाच इत्युक्त्वा समयं तत्र चक्राते तावुभौ नृप । अन्यो<न्यस्याभिसंदेहे तौ संक्रामयतां ततः,भीष्मजी कहते हैं--नरेश्वर! इस प्रकार बात करके उन्होंने परस्पर प्रतिज्ञा कर ली तथा उन दोनोंने एक-दूसरेके शरीरमें अपने-अपने पुरुषत्व और स्त्रीत्वका संक्रमण करा दिया। भारत! स्थूणाकर्ण यक्षने उस शिखण्डिनीके स्त्रीत्वको धारण कर लिया और शिखण्डिनीने यक्षका प्रकाशमान पुरुषत्व प्राप्त कर लिया

ভীষ্ম বললেন—হে নৃপ! এ কথা বলে তারা দু’জন সেখানে পরস্পরের সঙ্গে এক চুক্তি করল। তারপর একে অন্যের সঙ্গে বিনিময়ের অভিপ্রায়ে তারা নিজেদের স্ত্রীত্ব ও পুরুষত্ব পরস্পরের দেহে সঞ্চারিত করাল।

Verse 9

स्त्रीलिडूं धारयामास स्थूणायक्षो5थ भारत । यक्षरूपं च तद्‌ दीप्तं शिखण्डी प्रत्यपद्यत,भीष्मजी कहते हैं--नरेश्वर! इस प्रकार बात करके उन्होंने परस्पर प्रतिज्ञा कर ली तथा उन दोनोंने एक-दूसरेके शरीरमें अपने-अपने पुरुषत्व और स्त्रीत्वका संक्रमण करा दिया। भारत! स्थूणाकर्ण यक्षने उस शिखण्डिनीके स्त्रीत्वको धारण कर लिया और शिखण्डिनीने यक्षका प्रकाशमान पुरुषत्व प्राप्त कर लिया

ভীষ্ম বললেন—হে ভারত! তখন স্থূণ নামক যক্ষ স্ত্রীলিঙ্গ ধারণ করল, আর শিখণ্ডী সেই যক্ষের দীপ্ত রূপ—অর্থাৎ পুরুষভাব—লাভ করল।

Verse 10

ततः शिखण्डी पाज्चाल्य: पुंस्त्वमासाद्य पार्थिव । विवेश नगरं हृष्ट: पितरं च समासदत्‌,राजन! इस प्रकार पुरुषत्व पाकर पांचालराजकुमार शिखण्डी बड़े हर्षके साथ नगरमें आया और अपने पितासे मिला

হে রাজন! তখন পাঞ্চালপুত্র শিখণ্ডী পুরুষত্ব লাভ করে আনন্দিত হয়ে নগরে প্রবেশ করল এবং পিতার সঙ্গে মিলিত হল।

Verse 11

यथावृत्तं तु तत्‌ सर्वमाचख्यौ द्रुपदस्य तत्‌ । द्रुपदस्तस्य तच्छुत्वा हर्षमाहारयत्‌ परम्‌,उसने जैसे जो वृत्तान्त हुआ था, वह सब राजा ट्रपदसे कह सुनाया। उसकी यह बात सुनकर राजा द्रुपदको अपार हर्ष हुआ

তারপর যা কিছু যেমন ঘটেছিল, সে সবই সে রাজা দ্রুপদকে যথাযথভাবে জানাল। তার কথা শুনে দ্রুপদ পরম আনন্দে পূর্ণ হলেন।

Verse 12

सभार्यस्तच्च सस्मार महेश्व॒रवचस्तदा । ततः सम्प्रेषयामास दशार्णाधिपतेरनप:

তখন তিনি স্ত্রীসহ মহেশ্বর (শিব)-এর বচন স্মরণ করলেন। এরপর বিলম্ব না করে দশার্ণাধিপতির কাছে এক দূত পাঠালেন।

Verse 13

अथ दाशार्णको राजा सहसाभ्यागमत्‌ तदा

তখনই সেই মুহূর্তে দাশার্ণের রাজা হঠাৎ সেখানে এসে উপস্থিত হলেন।

Verse 14

पज्चालराजं ट्रपर्दं द:ःखशोकसमन्वित: । इधर दुःख और शोकमें डूबे हुए दशार्णराजने सहसा पांचालराज द्रुपदपर आक्रमण किया ।। १३ ह || ततः काम्पिल्यमासाद्य दशार्णाधिपतिस्तत:

দুঃখ ও শোকে আচ্ছন্ন দাশার্ণরাজ হঠাৎ পাঞ্চালরাজ দ্রুপদের উপর আক্রমণ করলেন; তারপর তিনি কাম্পিল্যের দিকে অগ্রসর হলেন।

Verse 15

प्रेषयामास सत्कृत्य दूत॑ ब्रह्म॒विदां वरम्‌ । काम्पिल्य नगरके निकट पहुँचकर दशार्णराजने वेद-वेत्ताओंमें श्रेष्ठ एक ब्राह्मणको सत्कारपूर्वक दूत बनाकर भेजा || १४ इ || ब्रूहि मद्गबचनाद्‌ दूत पाञ्चाल्यं तं नृपाधमम्‌,और कहा--'दूत! मेरे कथनानुसार राजाओंमें अधम उस पांचालनरेशसे कहिये। दुर्मते! तुमने जो अपनी कन्याके लिये मेरी कनन्‍्याका वरण किया था, उस घमंडका फल तुम्हें आज देखना पड़ेगा, इसमें संशय नहीं है”

তিনি বেদজ্ঞদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ এক ব্রাহ্মণকে সম্মান করে দূতরূপে পাঠালেন এবং বললেন—“দূত! আমার বচনে সেই পাঞ্চালরাজ, রাজাদের মধ্যে অধম, তাকে বলো।”

Verse 16

यन्मे कन्यां स्वकन्यार्थे वृतवानसि दुर्मते । फलं तस्यावलेपस्य द्रक्ष्यस्यद्य न संशय:,और कहा--'दूत! मेरे कथनानुसार राजाओंमें अधम उस पांचालनरेशसे कहिये। दुर्मते! तुमने जो अपनी कन्याके लिये मेरी कनन्‍्याका वरण किया था, उस घमंडका फल तुम्हें आज देखना पड़ेगा, इसमें संशय नहीं है”

“দুর্মতি! তুমি তোমার কন্যার জন্য আমার কন্যাকে বেছে নিয়েছিলে; সেই অহংকারের ফল আজ তুমি নিশ্চয়ই দেখবে—এতে সন্দেহ নেই।”

Verse 17

एवमुक्तश्न तेनासौ ब्राह्मणो राजसत्तम | दूत: प्रयातो नगरं दाशार्णनृूपचोदित:,नृपश्रेष्ठट दशार्णागजजका यह संदेश पाकर और उन्हींकी प्रेरणासे दूत बनकर वे ब्राह्मणदेवता काम्पिल्य नगरमें आये

এভাবে আদিষ্ট হয়ে সেই শ্রেষ্ঠ ব্রাহ্মণ দাশার্ণ-নৃপতির প্রেরণায় দূত হয়ে নগরের দিকে রওনা হলেন।

Verse 18

तत आसादयामास पुरोधा द्रुपदं पुरे तस्मै पाउचालको राजा गामर्घ्य च सुसत्कृतम्‌,नगरमें आकर वे पुरोहित ब्राह्मण महाराज ट्रुपदसे मिले। पांचालराजने सत्कारपूर्वक उन्हें अर्घ्य तथा गौ अर्पण की। उनके साथ राजकुमार शिखण्डी भी थे। राजेन्द्र! पुरोहितने वह पूजा ग्रहण नहीं की और इस प्रकार कहा--

তখন রাজপুরোহিত নগরে এসে মহারাজ দ্রুপদের সঙ্গে সাক্ষাৎ করলেন। পাঞ্চালরাজ যথোচিত সম্মান করে তাঁকে অর্ঘ্য ও একটি গাভী নিবেদন করলেন। তাঁর সঙ্গে রাজপুত্র শিখণ্ডীও উপস্থিত ছিল। রাজেন্দ্র! পুরোহিত সেই পূজা-সম্মান গ্রহণ করলেন না এবং এইভাবে বললেন—

Verse 19

प्रापयामास राजेन्द्र सह तेन शिखण्डिना । तां पूजां नाभ्यनन्दत्‌ स वाक्‍्यं चेदमुवाच ह,नगरमें आकर वे पुरोहित ब्राह्मण महाराज ट्रुपदसे मिले। पांचालराजने सत्कारपूर्वक उन्हें अर्घ्य तथा गौ अर्पण की। उनके साथ राजकुमार शिखण्डी भी थे। राजेन्द्र! पुरोहितने वह पूजा ग्रहण नहीं की और इस प्रकार कहा--

রাজেন্দ্র! শিখণ্ডীর সঙ্গে তাঁকে সেখানে আনা হয়েছিল। কিন্তু পুরোহিত সেই পূজা-সম্মানে সন্তুষ্ট হলেন না; তারপর তিনি এই কথা বললেন—

Verse 20

यदुक्त तेन वीरेण राज्ञा काउ्चनवर्मणा । यत्‌ तेडहमधमाचार दुह्ित्रास्म्यभिवज्चित:,उद्धरिष्यामि ते सद्यः: सामात्यसुतबान्धवम्‌ | “राजन! वीरवर राजा हिरण्यवर्माने जो संदेश दिया है, उसे सुनिये। पापाचारी दुर्बृद्धि नरेश! तुम्हारी पुत्रीके द्वारा मैं ठगा गया हूँ। वह पाप तुमने ही किया है; अतः उसका फल भोगो। नरेश्वर! युद्धके मैदानमें आकर मुझे युद्धका अवसर दो। मैं मन्त्री, पुत्र और बान्धवोंसहित तुम्हारे समस्त कुलको उखाड़ फेंकूँगा'

সেই বীর রাজা কাঞ্চনবর্মা যা বলেছিলেন— “হে রাজা, অধম আচরণের! তোমার কন্যার দ্বারা আমি প্রতারিত হয়েছি। সেই পাপের কর্তা তুমিই; অতএব তার ফল ভোগ করো। হে নৃপতি, আমাকে যুদ্ধ দাও—আজই রণাঙ্গনের অগ্রভাগে। আমি আজই তোমার মন্ত্রী, পুত্র ও স্বজনসহ সমগ্র বংশ উপড়ে ফেলব।”

Verse 21

तस्य पापस्य करणात्‌ फल प्राप्रुहि दुर्मते । देहि युद्ध नरपते ममाद्य रणमूर्धनि

সেই পাপকর্মের ফলে যা প্রাপ্য, তা ভোগ করো, হে দুর্মতি! হে নরপতি, আমাকে যুদ্ধ দাও—আজ রণাঙ্গনের অগ্রভাগে।

Verse 22

तदुपालम्भसंयुक्त श्रावितः किल पार्थिव:

কথিত আছে, সেই নৃপতিকে তিরস্কার-যুক্ত কঠোর বাক্য শোনানো হয়েছিল।

Verse 23

अभवद्‌ू भरतश्रेष्ठ द्रपद: प्रणयानतः,भरतश्रेष्ठ! तब राजा ट्रुपद प्रेमसे विनीत हो गये और इस प्रकार बोले--'ब्रह्मन्‌! आपने मेरे सम्बन्धीके कथनानुसार जो बात मुझे सुनायी है, इसका उत्तर मेरा दूत स्वयं जाकर राजाको देगा”

ভীষ্ম বললেন—হে ভারতশ্রেষ্ঠ! স্নেহের বশে দ্রুপদ কোমলচিত্ত ও বিনীত হলেন। তারপর সসম্মানে বললেন—‘হে ব্রাহ্মণ! আমার আত্মীয়ের বার্তা অনুসারে আপনি যা আমাকে শুনিয়েছেন, তার উত্তর আমার দূত নিজে গিয়ে রাজাকে জানাবে।’

Verse 24

यदाह मां भवान्‌ ब्रह्मन्‌ सम्बन्धिवचनाद्‌ वच: । अस्योत्तरं प्रतिवचो दूतो राज्ञे वदिष्यति,भरतश्रेष्ठ! तब राजा ट्रुपद प्रेमसे विनीत हो गये और इस प्रकार बोले--'ब्रह्मन्‌! आपने मेरे सम्बन्धीके कथनानुसार जो बात मुझे सुनायी है, इसका उत्तर मेरा दूत स्वयं जाकर राजाको देगा”

‘হে ব্রাহ্মণ! আমার আত্মীয়ের কথামতে আপনি যে কথা আমাকে বলেছেন, তার উত্তর-প্রতিউত্তর আমার দূত রাজাকে জানাবে।’

Verse 25

ततः सम्प्रेषयामास टद्रुपदो5पि महात्मने । हिरण्यवर्मणे दूत॑ ब्राह्मणं वेदपारगम्‌,तदनन्तर द्रपदने भी महामना हिरण्यवर्माके पास वेदोंके पारंगत विद्वान्‌ ब्राह्मणको दूत बनाकर भेजा

তারপর দ্রুপদও মহাত্মা হিরণ্যবর্মণের কাছে দূতরূপে বেদে পারদর্শী এক ব্রাহ্মণকে প্রেরণ করলেন।

Verse 26

तमागम्य तु राजानं दशार्णाधिपतिं तदा । तद्‌ वाक्यमाददे राजन यदुक्तं द्रुपदेन ह,राजन! उन्होंने दशार्णनरेशके पास आकर द्रुपदने जो कुछ कहा था, वह सब दुहरा दिया

তারপর তিনি দশার্ণাধিপতি রাজার কাছে গিয়ে দ্রুপদ যা বলেছিলেন, হে রাজন, সেই কথাই অবিকৃতভাবে পুনরুক্ত করলেন।

Verse 27

आगम: क्रियतां व्यक्त: कुमारोडयं सुतो मम । मिथ्यैतदुक्तं केनापि तदश्रद्धेयमित्युत,“राजन! आप आकर स्पष्टरूपसे परीक्षा कर लें। मेरा यह कुमार पुत्र है (कन्या नहीं)। आपसे किसीने झूठे ही उसके कन्या होनेकी बात कह दी है, जो विश्वास करनेके योग्य नहीं है!

‘হে রাজন! আপনি নিজে এসে স্পষ্টভাবে যাচাই করুন। এ আমার পুত্র—এক যুবক; কন্যা নয়। কেউ মিথ্যা বলে তাকে কন্যা বলেছে; সে কথা বিশ্বাসযোগ্য নয়।’

Verse 28

ततः स राजा द्रुपदस्य श्रुत्वा विमर्षयुक्तो युवतीर्वरिष्ठा: । सम्प्रेषयामास सुचारुरूपा: शिखण्डिनं स्त्री पुमान्‌ वेति वेत्तुम्‌,राजा द्रुपदका यह उत्तर सुनकर हिरण्यवर्माने कुछ विचार किया और अत्यन्त मनोहर रूपवाली कुछ श्रेष्ठ युवतियोंको यह जाननेके लिये भेजा कि शिखण्डी स्त्री है या पुरुष

তখন সেই রাজা দ্রুপদের কথা শুনে এবং গভীরভাবে বিবেচনা করে, অতিশয় রূপসী শ্রেষ্ঠ কিশোরীদের পাঠালেন—শিখণ্ডী সত্যিই নারী না পুরুষ, তা নির্ণয় করতে।

Verse 29

ताः प्रेषितास्तत्त्वभावं विदित्वा प्रीत्या राज्ञे तच्छशंसुर्हि सर्वम्‌ । शिखण्डिनं पुरुष कौरवेन्द्र दाशार्णराजाय महानुभावम्‌,कौरवराज! उन भेजी हुई युवतियोंने वास्तविक बात जानकर राजा हिरण्यवर्माको बड़ी प्रसन्नताके साथ सब कुछ बता दिया। उन्होंने दशार्णगजको यह विश्वास दिला दिया कि शिखण्डी महान्‌ प्रभावशाली पुरुष है

প্রেরিত সেই কিশোরীরা সত্য অবস্থা জেনে আনন্দসহকারে রাজাকে সব কথা জানাল। তারা দাশার্ণরাজকে নিশ্চিত করল যে শিখণ্ডী সত্যই মহাপ্রভাবশালী পুরুষ।

Verse 30

ततः कृत्वा तु राजा स आगमं प्रीतिमानथ । सम्बन्धिना समागम्य हृष्टो वासमुवास ह,इस प्रकार परीक्षा करके राजा हिरण्यवर्मा बड़े प्रसन्न हुए। फिर उन्होंने सम्बन्धीसे मिलकर बड़े हर्ष और उलल्‍लासके साथ वहाँ निवास किया

এভাবে পরীক্ষা-নিরীক্ষা সম্পন্ন করে রাজা সন্তুষ্ট হলেন। তারপর আত্মীয়ের সঙ্গে মিলিত হয়ে তিনি আনন্দসহকারে সেখানে বাস করলেন।

Verse 31

शिखण्डिने च मुदित: प्रादाद्‌ वित्तं जनेश्वर: । हस्तिनो<श्चांश्व गाश्वैव दास्यो5थ बहुलास्तथा,राजाने अत्यन्त प्रसन्न होकर अपने जामाता शिखण्डीको भी बहुत धन, हाथी, घोड़े, गाय, बैल और दासियाँ दीं

রাজা অত্যন্ত প্রসন্ন হয়ে জামাতা শিখণ্ডীকেও প্রচুর ধন দিলেন; সঙ্গে দিলেন হাতি, ঘোড়া, গবাদি পশু এবং বহু দাসী।

Verse 32

पूजितश्च प्रतिययौ निर्भ्त्स्य तनयां किल | विनीतकिल्विषे प्रीते हेमवर्मणि पार्थिवे । प्रतियाते दशार्णे तु हृष्टरूपा शिखण्डिनी,इतना ही नहीं, उन्होंने झूठी खबर भेजनेके कारण अपनी पुत्रीको भी झिड़कियाँ दीं। फिर वे राजा द्रुपदसे सम्मानित होकर लौट गये। मनोमालिन्य दूर करके दशार्णराज हिरण्यवर्माके प्रसन्नतापूर्वक लौट जानेपर शिखण्डिनीको भी बड़ा हर्ष हुआ

সম্মানিত হয়ে তিনি প্রত্যাবর্তন করলেন; কথিত আছে, মিথ্যা সংবাদ পাঠানোর জন্য তিনি নিজের কন্যাকেও তিরস্কার করেছিলেন। দোষমুক্ত ও প্রসন্ন দাশার্ণরাজ হেমবর্মা ফিরে গেলে শিখণ্ডিনীও আনন্দে উল্লসিত হল।

Verse 33

कस्यचित्‌ त्वथ कालस्य कुबेरो नरवाहनः । लोकयात्रां प्रकुर्वाण: स्थूणस्यागान्निवेशनम्‌

কিছু কাল অতিবাহিত হলে নরবাহন কুবের লোকযাত্রা করতে করতে স্থূণের নিবাসে এসে উপস্থিত হলেন।

Verse 34

उधर कुछ कालके पश्चात्‌ नरवाहन कुबेर लोकमें भ्रमण करते हुए स्थूणाकर्णके घरपर आये |। स तदगृहस्योपरि वर्तमान आलोकयामास धनाधिगोप्ता | स्थूणस्य यक्षस्य विवेश वेश्म स्वलंकृतं माल्यगुणैर्विचित्रै:,उसके घरके ऊपर आकाशमें स्थित हो धनाध्यक्ष कुबेरने उसका अच्छी तरह अवलोकन किया। स्थूणाकर्ण यक्षका वह भवन विचित्र हारोंसे सजाया गया था। खशकी और अन्य पदार्थोकी सुगन्धसे भी अर्चित तथा चँदोवोंसे सुशोभित था। उसमें सब ओर धूपकी सुगन्ध फैली हुई थी। अनेकानेक ध्वज और पताकाएँ उसकी शोभा बढ़ा रही थीं। वहाँ भक्ष्य, भोज्य, पेय आदि सभी वस्तुएँ, जिनका दन्‍त और जिद्लाद्वारा उदराग्निमें हवन किया जाता है, प्रस्तुत थीं। तत्पश्चात्‌ कुबेरने उस भवनमें प्रवेश किया

কিছু কাল পরে নরবাহন কুবের লোকসমূহে ভ্রমণ করতে করতে স্থূণাকর্ণের গৃহে এলেন। ধনরক্ষক কুবের সেই গৃহের উপর আকাশে অবস্থান করে তা সুসম্যক পর্যবেক্ষণ করলেন; তারপর স্থূণ যক্ষের সেই প্রাসাদে প্রবেশ করলেন, যা বিচিত্র মালা ও নানা অলংকারে সুশোভিত ছিল।

Verse 35

लाज्यैश्न गन्धैश्व तथा वितानै- रभ्यर्चितं धूपनधूपितं च । ध्वजै: पताकाभिरलंकृतं च भक्ष्यान्नपेयामिषदन्तहोमम्‌,उसके घरके ऊपर आकाशमें स्थित हो धनाध्यक्ष कुबेरने उसका अच्छी तरह अवलोकन किया। स्थूणाकर्ण यक्षका वह भवन विचित्र हारोंसे सजाया गया था। खशकी और अन्य पदार्थोकी सुगन्धसे भी अर्चित तथा चँदोवोंसे सुशोभित था। उसमें सब ओर धूपकी सुगन्ध फैली हुई थी। अनेकानेक ध्वज और पताकाएँ उसकी शोभा बढ़ा रही थीं। वहाँ भक्ष्य, भोज्य, पेय आदि सभी वस्तुएँ, जिनका दन्‍त और जिद्लाद्वारा उदराग्निमें हवन किया जाता है, प्रस्तुत थीं। तत्पश्चात्‌ कुबेरने उस भवनमें प्रवेश किया

সেই গৃহ লাজ, সুগন্ধি দ্রব্য ও বিতানে যথাযথভাবে পূজিত ছিল; ধূপে সুগন্ধিত এবং ধ্বজ-পতাকায় অলংকৃত ছিল। সেখানে ভক্ষ্য, ভোজ্য, পানীয় ও মাংসাদি সবই প্রস্তুত ছিল—যেন দাঁত ও জিহ্বা দ্বারা উদরাগ্নিতে হোম দেওয়া হয়।

Verse 36

तत्‌ स्थान तस्य दृष्टवा तु सर्वतः समलंकृतम्‌ । मणिरत्नसुवर्णानां मालाभि: परिपूरितम्‌

তখন সেই স্থান দেখে তিনি দেখলেন—তা সর্বদিকে অলংকৃত এবং মণি, রত্ন ও স্বর্ণের মালায় পরিপূর্ণ।

Verse 37

नानाकुसुमगन्धाढ्यं सिक्तसम्मृष्टशोभितम्‌ | अथाब्रवीद्‌ यक्षपतिस्तान्‌ यक्षाननुगांस्तदा

তা নানাবিধ ফুলের সুগন্ধে পরিপূর্ণ ছিল এবং জল ছিটিয়ে ও ভালোভাবে পরিষ্কার করে দীপ্তিময় করা হয়েছিল। তখন যক্ষপতি তাঁর অনুগামী যক্ষদের উদ্দেশে বললেন।

Verse 38

स्वलंकृतमिदं वेश्म स्थूणस्यामितविक्रमा: । नोपसर्पति मां चैव कस्मादद्य स मन्दधी:

ভীষ্ম বললেন— “স্থূণার এই প্রাসাদ সুসজ্জিত, আর অমিতপরাক্রম বীরেরা এখানে স্তম্ভের মতো দাঁড়িয়ে আছে। তবু সেই মন্দবুদ্ধি লোকটি আজও কেন আমার কাছে আসে না?”

Verse 39

कुबेरने उसके निवासस्थानको सब ओरसे सुसज्जित, मणि, रत्न तथा सुवर्णकी मालाओंसे परिपूर्ण, भाँति-भाँतिके पुष्पोंकी सुगन्धसे व्याप्त तथा झाड़-बुहार और धो-पोंछ देनेके कारण शोभासम्पन्न देखकर यक्षराजने स्थूणाकर्णके सेवकोंसे पूछा--“अमित पराक्रमी यक्षो! स्थूणाकर्णका यह भवन तो सब प्रकारसे सजाया हुआ दिखायी देता है (इससे सिद्ध है कि वह घरमें ही है), तथापि वह मूर्ख मेरे पास आता क्‍यों नहीं है? ।। यस्माज्जानन्‌ स मन्दात्मा मामसौ नोपसर्पति । तस्मात्‌ तस्मै महादण्डो धार्य: स्यादिति मे मति:,“वह मन्दबुद्धि यक्ष मुझे आया हुआ जानकर भी मेरे निकट नहीं आ रहा है; इसलिये उसे महान्‌ दण्ड देना चाहिये, ऐसा मेरा विचार है”

ভীষ্ম বললেন— “আমি উপস্থিত হয়েছি জেনেও সেই মন্দবুদ্ধি আমার কাছে আসে না; অতএব আমার বিচার মতে তার উপর কঠোর দণ্ড আরোপ করা উচিত।”

Verse 40

यक्षा ऊचु. ट्रुपदस्य सुता राजन्‌ राज्ञो जाता शिखण्डिनी । तस्या निमित्ते कर््मिंश्चित्‌ प्रादात्‌ पुरुषलक्षणम्‌

যক্ষরা বলল— “হে রাজন, দ্রুপদের কন্যা শিখণ্ডিনী নামে জন্মেছিল। তার কারণেই কেউ এমন এক কর্ম করেছিল, যাতে পুরুষের লক্ষণ ও চিহ্ন প্রদান করা হয়।”

Verse 41

अग्रहील्लक्षणं स्त्रीणां स्त्रीभूतो तिछ्ठते गृहे । नोपसर्पति तेनासौ सव्रीड: स्त्रीसरूपवान्‌

ভীষ্ম বললেন— “সে নারীদের লক্ষণ গ্রহণ করেছে; নারীরূপে গৃহেই থাকে। তাই লজ্জিত হয়ে, নারীর মতো রূপ ধারণ করে, সে কাছে আসে না।”

Verse 42

यक्षोंने कहा--राजन्‌! राजा ट्रुपदके यहाँ एक शिखण्डिनी नामकी कन्या उत्पन्न हुई है। उसीको किसी विशेष कारणवश इन्होंने अपना पुरुषत्व दे दिया है और उसका स्त्रीत्व स्वयं ग्रहण कर लिया है। तबसे वे स्त्रीरूप होकर घरमें ही रहते हैं। स्त्रीरूपमें होनेके कारण ही वे लज्जावश आपके पास नहीं आ रहे हैं ।। एतस्मात्‌ कारणाद्‌ राजन्‌ स्थूणो न त्वाद्य सर्पति । श्रुत्वा कुरु यथान्यायं विमानमिह तिष्ठताम्‌

যক্ষরা বলল— “হে রাজন! দ্রুপদের গৃহে শিখণ্ডিনী নামে এক কন্যা জন্মেছিল। বিশেষ এক কারণে এই স্থূণ তার নিজের পুরুষত্ব তাকে দান করে নিজে তার নারীত্ব গ্রহণ করেছে। তারপর থেকে সে নারীরূপে গৃহেই থাকে। নারীরূপ হওয়াতেই লজ্জাবশত সে আপনার সামনে আসে না। এই কারণেই, হে রাজন, স্থূণ আজ আপনার কাছে আসে না। এ কথা শুনে ন্যায় অনুসারে সিদ্ধান্ত করুন; এই বিমান এখানেই থাকুক।”

Verse 43

महाराज! इसी कारणसे स्थूणाकर्ण आज आपके सामने नहीं उपस्थित हो रहे हैं। यह सुनकर आप जैसा उचित समझें, करें। आज आपका विमान यहीं रहना चाहिये ।। आनीयतां स्थूण इति ततो यक्षाधिपोडब्रवीत्‌ । कर्तास्मि निग्रहं तस्य प्रत्युवाच पुन: पुन:,तब यक्षराजने कहा--'स्थूणाकर्णको यहाँ बुला ले आओ। मैं उसे दण्ड दूँगा'। यह बात उन्होंने बार-बार दुहरायी

তখন যক্ষাধিপতি বললেন— “স্থূণাকর্ণকে এখানে এনে দাও।” তিনি বারবার বললেন— “আমি তাকে সংযত করব এবং দণ্ড দেব।”

Verse 44

सो<भ्यगच्छत यक्षेन्द्रमाहृत: पृथिवीपते । स्त्रीसरूपो महाराज तस्थौ व्रीडासमन्वित:,राजन! इस प्रकार बुलानेपर वह यक्ष कुबेरकी सेवामें गया। महाराज! वह स्त्रीस्वरूप धारण करनेके कारण लज्जामें डूबा हुआ उनके सामने खड़ा हो गया

রাজন, আহ্বান পেয়ে সে যক্ষ যক্ষেন্দ্র কুবেরের কাছে গেল। মহারাজ, নারীরূপ ধারণ করে সে লজ্জায় আচ্ছন্ন হয়ে তাঁর সামনে দাঁড়াল।

Verse 45

त॑ शशापाथ संक्रुद्धो धनद: कुरुनन्दन । एवमेव भवत्वद्य स्त्रीत्वं पापस्य गुह्ुका:

ভীষ্ম বললেন— কুরুনন্দন, ক্রুদ্ধ ধনদ (কুবের) তাকে শাপ দিলেন— “তাই হোক; আজ থেকেই, হে গুহূক, পাপের ফলে তুমি নারী হও।”

Verse 46

कुरुनन्दन! उसे इस रूपमें देखकर कुबेर अत्यन्त कुपित हो उठे और शाप देते हुए बोले--'गुह्मको! इस पापी स्थूणाकर्णका यह स्त्रीत्व अब ऐसा ही बना रहे' ।। ततोडब्रवीद्‌ यक्षपतिर्महात्मा यस्माददास्त्ववमन्येह यक्षान्‌ शिखण्डिने लक्षण पापबुद्धे स्त्रीलक्षणं चाग्रही: पापकर्मन्‌,तदनन्तर महात्मा यक्षराजने उस यक्षसे कहा--'पापबुद्धि और पापाचारी यक्ष! तूने यक्षोंका तिरस्कार करके यहाँ शिखण्डीको अपना पुरुषत्व दे दिया और उसका स्त्रीत्व ग्रहण कर लिया है। दुर्बुद्धे! तूने जो यह अव्यावहारिक कार्य कर डाला है, इसके कारण आजसे तू स्त्री ही बना रहे और शिखण्डी पुरुषरूपमें ही रह जाय”

তারপর মহাত্মা যক্ষপতি বললেন— “পাপকর্মা! যক্ষদের অবমাননা করে তুমি এখানে শিখণ্ডীকে তোমার পুরুষত্ব দিয়েছ এবং নারীলক্ষণ গ্রহণ করেছ। এই অনুচিত কর্মের ফলে আজ থেকে তুমি নারীই থাকবে, আর শিখণ্ডী পুরুষরূপেই থাকবে।”

Verse 47

अप्रवृत्तं सुदुर्बुद्धे यस्मादेतत्‌ त्वया कृतम्‌ तस्मादद्य प्रभृत्येव स्त्री त्वं सा पुरुषस्तथा,तदनन्तर महात्मा यक्षराजने उस यक्षसे कहा--'पापबुद्धि और पापाचारी यक्ष! तूने यक्षोंका तिरस्कार करके यहाँ शिखण्डीको अपना पुरुषत्व दे दिया और उसका स्त्रीत्व ग्रहण कर लिया है। दुर्बुद्धे! तूने जो यह अव्यावहारिक कार्य कर डाला है, इसके कारण आजसे तू स्त्री ही बना रहे और शिखण्डी पुरुषरूपमें ही रह जाय”

হে দুর্বুদ্ধি! তুমি এই অনুচিত কাজ করেছ; তাই আজ থেকে তুমি নারীই থাকবে, আর সে পুরুষই থাকবে।

Verse 48

ततः प्रसादयामासुर्यक्षा वैश्रवणं किल । स्थूणस्यार्थ कुरुष्वान्तं शापस्येति पुन: पुन:,तब यक्षोंने अनुनय-विनय करके स्थूणाकर्णके लिये कुबेरको प्रसन्न किया और बारंबार आग्रहपूर्वक कहा--“भगवन्‌! इस शापका अन्त कर दीजिये'

তখন যক্ষেরা বৈশ্রবণ (কুবের)-কে প্রসন্ন করতে বারবার বিনীত প্রার্থনা জানাল। স্থূণাকর্ণের কল্যাণার্থে তারা বলল—“ভগবান্‌, এই শাপের অবসান করুন।”

Verse 49

ततो महात्मा यक्षेन्द्र: प्रत्युवाचानुगामिन: । सर्वान्‌ यक्षगणांस्तात शापस्यान्तचिकीर्षया,तात! तब महात्मा यक्षराजने स्थूणाकर्णका अनुगमन करनेवाले उन समस्त यक्षोंसे उस शापका अन्त कर देनेकी इच्छासे इस प्रकार कहा--

তখন মহাত্মা যক্ষরাজ, স্থূণাকর্ণের অনুগামী সেই সকল যক্ষগণকে ‘বৎস’ বলে সম্বোধন করে, শাপের অবসান ঘটাতে ইচ্ছুক হয়ে এইরূপ উত্তর দিলেন।

Verse 50

शिखण्डिनि हते यक्षा: स्वं रूप॑ प्रतिपत्स्यते । स्थूणो यक्षो निरुद्वेगो भवत्विति महामना:,'यक्षो! शिखण्डीके मारे जानेपर यह स्थूणाकर्ण यक्ष अपना पूर्वरूप फिर प्राप्त कर लेगा। अतः अब इसे निर्भय हो जाना चाहिये।” ऐसा कहकर महामना भगवान्‌ यक्षराज कुबेर उन यक्षोंद्वारा अत्यन्त पूजित हो निमेषमात्रमें ही अभीष्ट स्थानपर पहुँच जानेवाले अपने समस्त सेवकोंके साथ वहाँसे चले गये

মহামনা যক্ষরাজ বললেন—“শিখণ্ডী নিহত হলে এই যক্ষ স্থূণাকর্ণ নিজের পূর্বরূপ পুনরায় লাভ করবে; অতএব স্থূণ যক্ষ নিরুদ্বিগ্ন ও নির্ভয় হোক।”

Verse 51

इत्युक्त्वा भगवान्‌ देवो यक्षराज: सुपूजित: । प्रययौं सहित: सर्वर्निमेषान्तरचारिभि:,'यक्षो! शिखण्डीके मारे जानेपर यह स्थूणाकर्ण यक्ष अपना पूर्वरूप फिर प्राप्त कर लेगा। अतः अब इसे निर्भय हो जाना चाहिये।” ऐसा कहकर महामना भगवान्‌ यक्षराज कुबेर उन यक्षोंद्वारा अत्यन्त पूजित हो निमेषमात्रमें ही अभीष्ट स्थानपर पहुँच जानेवाले अपने समस्त सेवकोंके साथ वहाँसे चले गये

এমন কথা বলে, অত্যন্ত পূজিত দেবতুল্য যক্ষরাজ (কুবের) পলকমাত্রে গমনক্ষম সকল অনুচরসহ সেখান থেকে প্রস্থান করলেন।

Verse 52

स्थूणस्तु शापं सम्प्राप्य तत्रैव न्‍्यवसत्‌ तदा । समये चागमत्‌ तूर्ण शिखण्डी तं क्षपाचरम्‌,उस समय कुबेरका शाप पाकर स्थूणाकर्ण वहीं रहने लगा। शिखण्डी पूर्वनिश्चित समयपर उस निशाचर स्थूणाकर्णके पास तुरंत आ गया

সেই সময় কুবেরের শাপ প্রাপ্ত হয়ে স্থূণাকর্ণ সেখানেই অবস্থান করল। আর নির্ধারিত সময়ে শিখণ্ডী দ্রুত সেই নিশাচরের কাছে এসে উপস্থিত হল।

Verse 53

सो5भिगम्याब्रवीद्‌ वाक्यं प्राप्तोडस्मि भगवन्निति । तमब्रवीत्‌ ततः स्थूण: प्रीतो5स्मीति पुनः पुन:

তার কাছে গিয়ে সে বলল—“ভগবান, আমি উপস্থিত হয়েছি।” তখন স্থূণ আনন্দিতচিত্তে তাকে বারবার বলল—“আমি তোমার প্রতি সন্তুষ্ট, সন্তুষ্ট।”

Verse 54

उसके निकट जाकर शिखण्डीने कहा--“भगवन्‌! मैं आपकी सेवामें उपस्थित हूँ।” तब स्थूणाकर्णने उससे बारंबार कहा--'मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ, बहुत प्रसन्न हूँ ।। आर्जवेनागतं दृष्टवा राजपुत्रं शिखण्डिनम्‌ । सर्वमेव यथावृत्तमाचचक्षे शिखण्डिने,राजकुमार शिखण्डीको सरलतापूर्वक आया हुआ देख उससे यक्षने अपना सारा वृत्तान्त ठीक-ठीक कह सुनाया

তার কাছে গিয়ে শিখণ্ডী বলল—“ভগবান, আমি আপনার সেবায় উপস্থিত।” তখন স্থূণাকর্ণ তাকে বারবার বলল—“আমি তোমার প্রতি অত্যন্ত প্রসন্ন, অত্যন্ত প্রসন্ন।” রাজপুত্র শিখণ্ডীকে সরল ও নিষ্কপটভাবে আগত দেখে যক্ষটি যা যেমন ঘটেছিল, সেই সমগ্র বৃত্তান্ত যথাযথভাবে শিখণ্ডীকে বলে শোনাল।

Verse 55

यक्ष उवाच शप्तो वैश्रवणेनाहं त्वत्कृते पार्थिवात्मज । गच्छेदानीं यथाकामं चर लोकान्‌ यथासुखम्‌,यक्षने कहा--राजकुमार! तुम्हारे लिये ही यक्षराजने मुझे शाप दे दिया है; अत: अब जाओ, इच्छानुसार सारे जगतमें सुखपूर्वक विचरो

যক্ষ বলল—“রাজপুত্র! তোমার কারণেই বৈশ্রবণ (কুবের) আমাকে শাপ দিয়েছেন। অতএব এখন তুমি যাও; ইচ্ছামতো লোকলোকান্তরে সুখে বিচরণ করো।”

Verse 56

दिष्टमेतत्‌ पुरा मन्‍्ये न शक्‍्यमतिवर्तितुम्‌ । गमनं तव चेतो हि पौलस्त्यस्य च दर्शनम्‌

“আমি মনে করি, এ সবই পূর্বেই বিধাতার দ্বারা নির্ধারিত; একে অতিক্রম করা যায় না। কারণ তোমার গমন এবং তোমার মন—উভয়ই পৌলস্ত্য (কুবের)-দর্শনের দিকেই প্রবৃত্ত।”

Verse 57

मैं इसे अपना पुरातन प्रारब्ध ही मानता हूँ, जो कि तुम्हारा यहाँसे जाना और उसी समय यक्षराज कुबेरका यहाँ आकर दर्शन देना हुआ। अब इसे टाला नहीं जा सकता ।। भीष्म उवाच एवमुक्त: शिखण्डी तु स्थृूणयक्षेण भारत | प्रत्याजगाम नगरं हर्षेण महता वृत:,भीष्म कहते हैं--भरतनन्दन! स्थूणाकर्ण यक्षके ऐसा कहनेपर शिखण्डी बड़े हर्षके साथ अपने नगरको लौट आया

ভীষ্ম বললেন—“হে ভারতবংশধর! স্থূণ যক্ষ এ কথা বললে শিখণ্ডী মহা আনন্দে আপ্লুত হয়ে নিজের নগরে ফিরে গেল।”

Verse 58

पूजयामास विविधैर्गन्धमाल्यैर्महा धनै: । द्विजातीन्‌ देवताश्वैव चैत्यानथ चतुष्पथान्‌

তিনি নানাবিধ সুগন্ধি ও মালা এবং বিপুল ধন-দান দ্বারা পূজা ও সম্মান করলেন—দ্বিজদের, দেবতাদের, চৈত্যস্থানসমূহকে এবং চতুষ্পথ (চৌরাস্তা)কেও।

Verse 59

द्रुपद: सह पुत्रेण सिद्धार्थन शिखण्डिना । मुर्दे च परमां लेभे पाज्चाल्य: सह बान्धवै:

দ্রুপদ তাঁর সিদ্ধার্থ পুত্র শিখণ্ডীর সঙ্গে পরম গতি লাভ করলেন; আর পাঞ্চালরাজও স্বজনবর্গসহ সেই সর্বোচ্চ অবস্থায় উপনীত হলেন।

Verse 60

पूर्ण मनोरथ होकर लौटे हुए अपने पुत्र शिखण्डीके साथ पांचालराज ट्रुपदने गन्ध- माल्य आदि नाना प्रकारके बहुमूल्य उपचारोंद्वारा देवताओं, ब्राह्मणों, चैत्य (पीपल आदि धार्मिक)-वृक्षों तथा चौराहोंका पूजन किया तथा बन्धु-बान्धवोंसहित उन्हें महान्‌ हर्ष प्राप्त हुआ ।। शिष्यार्थ प्रददौ चाथ द्रोणाय कुरुपुड्भगव । शिखण्डिनं महाराज पुत्र स्त्रीपूर्विणं तथा,महाराज! कुरुश्रेष्ठ! ट्रपदने अपने पुत्र शिखण्डीको जो पहले कन्यारूपमें उत्पन्न हुआ था, द्रोणाचार्यकी सेवामें धनुर्वेदकी शिक्षाके लिये सौंप दिया

মনোরথ পূর্ণ করে পুত্র শিখণ্ডীকে সঙ্গে নিয়ে ফিরে এসে পাঞ্চালরাজ দ্রুপদ গন্ধ-মাল্য প্রভৃতি নানাবিধ বহুমূল্য উপচারে দেবতা, ব্রাহ্মণ, চৈত্যবৃক্ষ এবং চৌরাস্তা পূজা করলেন; স্বজন-বন্ধু পরিবেষ্টিত হয়ে তিনি মহা আনন্দ লাভ করলেন। তারপর, হে কুরুশ্রেষ্ঠ, দ্রুপদ তাঁর পুত্র শিখণ্ডীকে—যে পূর্বে নারীরূপে জন্মেছিল—ধনুর্বেদের শিক্ষার জন্য শিষ্যরূপে দ্রোণাচার্যের কাছে সমর্পণ করলেন।

Verse 61

प्रतिपेदे चतुष्पादं धनुर्वेद॑ नृपात्मज: । शिखण्डी सह युष्माभिर्धष्द्युम्नश्व॒ पार्षत:,इस प्रकार द्रुपदपुत्र शिखण्डी तथा धृष्टद्युम्नने तुम सब भाइयोंके साथ ही ग्रहण, धारण, प्रयोग और प्रतीकार--इन चार पादोंसे युक्त धनुर्वेदका अध्ययन किया

রাজপুত্র ধনুর্বেদের চতুষ্পাদ—গ্রহণ, ধারণ, প্রয়োগ ও প্রতিকার—আয়ত্ত করল। এভাবে শিখণ্ডী ও পার্ষত ধৃষ্টদ্যুম্ন তোমাদের ভাইদের সঙ্গে ধনুর্বেদ অধ্যয়ন করল।

Verse 62

मम त्वेतच्चरास्तात यथावत्‌ प्रत्यवेदयन्‌ । जडान्धबधिराकारा ये मुक्ता द्रपदे मया,मैंने द्रपदके नगरमें कुछ गुप्तचर नियुक्त कर दिये थे, जो गूँगे, अंधे और बहरे बनकर वहाँ रहते थे। वे ही यह सब समाचार मुझे ठीक-ठीक बताया करते थे

হে তাত, আমার গুপ্তচররা ঘটনাটি যেমন ঘটেছিল তেমনই আমাকে জানিয়েছিল। আমি তাদের দ্রুপদের নগরে নিয়োগ করেছিলাম; তারা বোবা, অন্ধ ও বধিরের ছদ্মবেশে সেখানে বাস করত।

Verse 63

एवमेष महाराज स्त्रीपुमान्‌ द्रपदात्मज: । स सम्भूत: कुरुश्रेष्ठ शिखण्डी रथसत्तम:,महाराज! कुरुश्रेष्ठ! इस प्रकार यह रथियोंमें उत्तम ट्रपदकुमार शिखण्डी पहले स्त्रीरूपमें उत्पन्न होकर पीछे पुरुष हुआ था

এইভাবে, মহারাজ—কুরুশ্রেষ্ঠ—দ্রুপদের এই সন্তান নারী ও পুরুষ উভয় রূপই লাভ করেছিল। রথীদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ শিখণ্ডী প্রথমে নারীরূপে জন্ম নিয়ে পরে পুরুষ হয়েছিল।

Verse 64

ज्येष्ठा काशिपते: कन्या अम्बानामेति विश्रुता । द्रुपदस्य कुले जाता शिखण्डी भरतर्षभ,भरतश्रेष्ठी काशिराजकी ज्येष्ठ कन्या, जो अम्बा नामसे विख्यात थी, वही द्रुपदके कुलमें शिखण्डीके रूपमें उत्पन्न हुई है

হে ভারতশ্রেষ্ঠ! কাশীরাজের জ্যেষ্ঠ কন্যা, যিনি ‘অম্বা’ নামে প্রসিদ্ধ, তিনিই দ্ৰুপদের বংশে শিখণ্ডী রূপে পুনর্জন্ম লাভ করেছেন।

Verse 65

नाहमेनं धनुष्पा्िं युयुत्सुं समुपस्थितम्‌ । मुहूर्तमपि पश्येय॑ प्रहरेयं न चाप्युत,जब यह हाथमें धनुष लेकर युद्ध करनेकी इच्छासे मेरे सामने उपस्थित होगा, उस समय मुहूर्तभर भी न तो इसकी ओर देखूँगा और न इसपर प्रहार ही करूँगा

যখন সে ধনুক হাতে যুদ্ধের আকাঙ্ক্ষায় আমার সামনে উপস্থিত হবে, তখন আমি এক মুহূর্তও তার দিকে তাকাব না, আর তাকে আঘাতও করব না।

Verse 66

व्रतमेतन्‍्मम सदा पृथिव्यामपि विश्रुतम्‌ । स्त्रियां स्त्रीपूर्वके चैव स्त्रीनाम्नि स्त्रीसरूपिणि,न मुज्चेयमहं बाणमिति कौरवनन्दन । कौरवनन्दन! इस भूमण्डलमें भी मेरा यह व्रत प्रसिद्ध है कि जो स्त्री हो, जो पहले स्त्री रहकर पुरुष हुआ हो, जिसका नाम स्त्रीके समान हो तथा जिसका रूप एवं वेष-भूषा स्त्रियोंके समान हो, इन सबपर मैं बाण नहीं छोड़ सकता

হে কৌরবনন্দন! পৃথিবীতেও আমার এই ব্রত সর্বত্র প্রসিদ্ধ—যে নারী, যে পূর্বে নারী ছিল পরে পুরুষ হয়েছে, যার নাম নারীর মতো, কিংবা যার রূপ ও বেশভূষা নারীর সদৃশ—তার বিরুদ্ধে আমি তীর নিক্ষেপ করব না।

Verse 67

|| न हन्यामहमेतेन कारणेन शिखण्डिनम्‌,तात! इसी कारणसे मैं शिखण्डीको नहीं मार सकता। शिखण्डीके जन्मका वास्तविक वृत्तान्त मैं जानता हूँ। अतः समरभूमिमें वह आततायी होकर आवे तो भी मैं इसे नहीं मारूँगा

হে তাত! এই কারণেই আমি শিখণ্ডীকে বধ করতে পারি না। শিখণ্ডীর জন্মের সত্য বৃত্তান্ত আমি জানি; অতএব সে যদি রণক্ষেত্রে আক্রমণকারী হয়ে আসে, তবুও আমি তাকে হত্যা করব না।

Verse 68

एतत्‌ तत्त्वमहं वेद जन्म तात शिखण्डिन: । ततो नैनं हनिष्यामि समरेष्वाततायिनम्‌,तात! इसी कारणसे मैं शिखण्डीको नहीं मार सकता। शिखण्डीके जन्मका वास्तविक वृत्तान्त मैं जानता हूँ। अतः समरभूमिमें वह आततायी होकर आवे तो भी मैं इसे नहीं मारूँगा

ভীষ্ম বললেন—বৎস! শিখণ্ডীর জন্মের প্রকৃত তত্ত্ব আমি জানি; তাই যুদ্ধক্ষেত্রে আমি তাকে বধ করব না—সে আক্রমণকারী হয়ে এলেও।

Verse 69

यदि भीष्म: स्त्रियं हन्यात्‌ सन्त: कुर्युविगर्हणम्‌ । नैनं तस्माद्धनिष्यामि दृष्टवापि समरे स्थितम्‌,यदि भीष्म स्त्रीका वध करे तो साधु पुरुष इसकी निन्दा करेंगे, अत: शिखण्डीको समरभूमिमें खड़ा देखकर भी मैं इसे नहीं मारूँगा

ভীষ্ম বললেন—যদি আমি, ভীষ্ম, কোনো নারীর বধ করি, তবে সজ্জনেরা নিন্দা করবেন; তাই যুদ্ধক্ষেত্রে তাকে দাঁড়িয়ে দেখলেও আমি শিখণ্ডীকে বধ করব না।

Verse 70

वैशम्पायन उवाच हम त्वा तु कौरव्यो राजा दुर्योधनस्तदा । स ध्यात्वा भीष्मे युक्तममन्यत,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! यह सब सुनकर कुरुवंशी राजा दुर्योधनने दो घड़ीतक कुछ सोच-विचारकर भीष्मके लिये शिखण्डीका वध न करना उचित ही मान लिया

বৈশম্পায়ন বললেন—হে জনমেজয়! এ সব শুনে কৌরব রাজা দুর্যোধন কিছুক্ষণ চিন্তা করে ভীষ্মের ক্ষেত্রে শিখণ্ডীকে না বধ করাই যথাযথ মনে করল।

Verse 126

पुरुषो5यं मम सुतः श्रद्धत्तां मे भवानिति । पत्नीसहित राजाको भगवान्‌ महेश्वरके दिये हुए वरका स्मरण हो आया। तदनन्तर राजा ट्रुपदने दशार्णराजके पास दूत भेजा और यह कहलाया कि मेरा पुत्र पुरुष है। आप मेरी इस बातपर विश्वास करें

“এ আমার পুত্র—পুরুষ; আমার কথায় বিশ্বাস করুন।” এই কথা বলতেই রানি-সহ রাজার মনে ভগবান মহেশ্বরপ্রদত্ত বর স্মরণে এল। তারপর রাজা দ্রুপদ দশার্ণ-রাজের কাছে দূত পাঠিয়ে বলালেন—“আমার সন্তান পুত্র, পুরুষ; আমার এই বাক্যে বিশ্বাস করুন।”

Verse 192

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि अम्बोपाख्यानपर्वणि शिखण्डिपुंस्त्वप्राप्तौ द्विनवत्यधिकशततमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्ाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत अम्बोपाख्यानपर्वरमें शिखण्डीको पुरुषत्व- प्राप्तिविषयक एक सौ बानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ

এইভাবে শ্রীমহাভারতের উদ্যোগপর্বের অন্তর্গত অম্বোপাখ্যানপর্বে শিখণ্ডীর পুরুষত্ব-প্রাপ্তি বিষয়ক একশো বিরানব্বইতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Verse 216

उद्धरिष्यामि ते सद्यः: सामात्यसुतबान्धवम्‌ | “राजन! वीरवर राजा हिरण्यवर्माने जो संदेश दिया है, उसे सुनिये। पापाचारी दुर्बृद्धि नरेश! तुम्हारी पुत्रीके द्वारा मैं ठगा गया हूँ। वह पाप तुमने ही किया है; अतः उसका फल भोगो। नरेश्वर! युद्धके मैदानमें आकर मुझे युद्धका अवसर दो। मैं मन्त्री, पुत्र और बान्धवोंसहित तुम्हारे समस्त कुलको उखाड़ फेंकूँगा'

আমি তোমাকে এখনই—মন্ত্রী, পুত্র ও স্বজনসহ—উৎখাত করব। রাজন! হিরণ্যবর্মা যে বার্তা পাঠিয়েছে, তা শোনো। পাপাচারী দুর্বুদ্ধি নৃপ! তোমার কন্যার দ্বারা আমি প্রতারিত হয়েছি; কিন্তু সে পাপ তোমারই করানো—অতএব তার ফল ভোগ করো। নরেশ্বর! রণক্ষেত্রে এসে আমাকে যুদ্ধের সুযোগ দাও। আমি মন্ত্রী, পুত্র ও বান্ধবসহ তোমার সমগ্র বংশকে শিকড়সমেত উপড়ে ফেলব।

Verse 226

दशार्णपतिना चोक्तो मन्त्रिमध्ये पुरोधसा । इस प्रकार पुरोहितने मन्सत्रियोंके बीचमें बैठे हुए राजा ट्रपदसे दशार्णऱजका कहा हुआ उपालम्भयुक्त संदेश सुनाया

দশার্ণাধিপতি যে উপালম্ভপূর্ণ বার্তা বলেছিল, পুরোহিত মন্ত্রীদের মধ্যস্থলে বসে থাকা রাজা দ্রুপদকে সেই বার্তাই এইভাবে শুনালেন।

Frequently Asked Questions

The dilemma concerns truthful representation in a marriage alliance and the ethical responsibility to clarify contested identity claims when public trust and interstate peace depend upon them.

Political stability depends on disciplined speech and verification: when claims threaten legitimacy, leaders must seek tattva (facts) promptly and choose remedies that reduce harm while respecting relational obligations.

No explicit phalaśruti appears in this passage; its function is causal and instructional, showing how uncertainty and reputational panic can accelerate escalation unless addressed through truthful disclosure and prudent counsel.