
सेनासमागमः — The Convergence of Armies
Upa-parva: Sainyasamudāya (Alliance & Army Mustering Episode)
Vaiśaṃpāyana describes the large-scale convergence of allied forces as the political crisis hardens into organized mobilization. Yuyudhāna (Sātyaki), a leading Sātvata charioteer, arrives to Yudhiṣṭhira with a substantial fourfold army; the troops are portrayed through an inventory-like catalogue of weapons (axes, spears, maces, swords, bows, and varied arrows), emphasizing readiness and standardized martial display. Multiple rulers then join the Pāṇḍava side with akṣauhiṇī contingents—among them Dhṛṣṭaketu of Cedi, Jayatsena of Magadha, the Pāṇḍya with coastal and riverine fighters, Drupada’s forces, and Virāṭa of the Matsyas with mountain kings—culminating in a count of seven akṣauhiṇīs assembling around the Pāṇḍavas. The narrative then mirrors this with the Kaurava coalition: Bhagadatta contributes an akṣauhiṇī with Cīnas and Kirātas; Bhūriśravā and Śalya arrive separately; Kṛtavarmā comes with Bhoja-Andhaka forces; Jayadratha and Sindhu-Sauvīra rulers join; Sudakṣiṇa of Kāmboja arrives with Yavanas and Śakas; Nīla of Māhiṣmatī and the Avanti kings come with southern contingents; and the Kekaya brothers advance—bringing Duryodhana’s total to eleven akṣauhiṇīs. The chapter closes by noting that Hastināpura cannot accommodate the influx, and it enumerates surrounding regions (Pañcanada, Kuru-jāṅgala, Rohitaka forest, desert tracts, and named localities) filled with troops, observed by a Pāñcāla priest sent toward the Kauravas—an administrative witness to the scale of mobilization.
Chapter Arc: जनमेजय के प्रश्नों के बीच वैशम्पायन युद्ध-पूर्व की सबसे निर्णायक हलचल दिखाते हैं—सात्वतों के महारथी युयुधान (सात्यकि) विशाल चतुरंगिणी सेना सहित युधिष्ठिर के पास आ पहुँचते हैं। → एक-एक कर दूर-दूर के नरेश, अपने-अपने ध्वजों और आयुधों से सुसज्जित, दोनों पक्षों की ओर खिंचते चले आते हैं; सेनाओं की गणना ‘अक्षौहिणी’ में होने लगती है और शक्ति-संतुलन का पलड़ा लगातार डोलता रहता है। → कौरव-पक्ष में एक के बाद एक बड़े संयोग घटते हैं—कृतवर्मा (हृदिकपुत्र) भोज-अन्धक-कुकुर वीरों सहित एक अक्षौहिणी लेकर दुर्योधन के पास आता है; केकय के पाँच सगे भाई-राजा भी एक अक्षौहिणी के साथ पहुँचते हैं; फिर भूरिश्रवा और शल्य भी पृथक्-पृथक् एक-एक अक्षौहिणी के साथ दुर्योधन से जा मिलते हैं—और अंततः दुर्योधन के पास ग्यारह अक्षौहिणियाँ एकत्र हो जाती हैं। → अध्याय का निष्कर्ष युद्ध की अनिवार्यता को और ठोस करता है: दोनों ओर की सैन्य-सम्पदा, आयुध-वैभव और राजकीय गठबंधनों का स्पष्ट लेखा सामने आ जाता है, मानो कुरुक्षेत्र की भूमि अभी से सेनाओं के भार से गूँजने लगी हो। → गठबंधन बन चुके हैं, सेनाएँ गिन ली गई हैं—अब प्रश्न केवल यह रह जाता है कि इन एकत्रित शक्तियों का पहला प्रहार किस दिशा में और किस नीति से होगा।
Verse 1
है ० बक। है २ एकोनविशो< ध्याय: युधिष्ठिर और ६ कि यहाँ सहायताके लिये आयी हुई ओंका संक्षिप्त विवरण वैशमग्पायन उवाच युयुधानस्ततो वीर: सात्वतानां महारथ: । महता चतुरड्रेण बलेनागाद् युधिष्ठिरम्
বৈশম্পায়ন বললেন—তখন সাত্বতদের মধ্যে মহারথী বীর যুযুধান, বৃহৎ চতুরঙ্গিনী সেনাসহ যুধিষ্ঠিরের কাছে এলেন।
Verse 2
वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर सात्वतवंशके महारथी वीर युयुधान (सात्यकि) विशाल चतुरंगिणी सेना साथ लेकर युधिष्ठिरके पास आये ।। तस्य योधा महावीर्या नानादेशसमागता: । नानाप्रहरणा वीरा: शोभयाज्चक्रिरे बलम्,उनके सैनिक बड़े पराक्रमी वीर थे। विभिन्न देशोंसे उनका आगमन हुआ था। वे भाँति- भाँतिके अस्त्र-शस्त्र लिये उस सेनाकी शोभा बढ़ा रहे थे
বৈশম্পায়ন বললেন— জনমেজয়! এরপর সাত্বত বংশের মহারথী বীর যুযুধান (সাত্যকি) এক বিশাল চতুরঙ্গিণী সেনা নিয়ে যুধিষ্ঠিরের কাছে এলেন। তাঁর সৈন্যরা ছিল মহাবীর্যবান, নানা দেশ থেকে সমাগত; নানাবিধ অস্ত্রশস্ত্র ধারণ করে সেই বীরেরা বাহিনীর শোভা ও শক্তি বৃদ্ধি করল।
Verse 3
परश्वधैर्भिन्दिपालै: शूलतोमरमुदगरै: । परिघैर्यष्टिभि: पाशै: करवालै क्ष निर्मल:
তারা পরশু, ভিন্দিপাল, শূল, তোমর, মুদ্গর, পরিঘ, যষ্টি, পাশ এবং নির্মল উজ্জ্বল তরবারি দ্বারা সজ্জিত ছিল।
Verse 4
खड्गकार्मुकनिर्व्यूहैः शरैश्व॒ विविधैरपि । तैलधौतै: प्रकाशद्धिस्तदशो भत वै बलम्
খড়্গ ও ধনুকের বিন্যাসে, এবং নানাবিধ বাণে সজ্জিত সেই সেনা অপূর্ব শোভা পেত; তেলে ধোয়া অস্ত্রশস্ত্র ঝলমল করায় সেই বাহিনী দীপ্তিময় হয়ে উঠেছিল।
Verse 5
फरसे, भिन्दिपाल, शूल, तोमर, मुद्गर, परिघ, यष्टि, पाश, निर्मल तलवार, खड््गः, धनुषसमूह तथा भाँति-भाँतिके बाण आदि अस्त्र-शस्त्र तेलमें धुले होनेके कारण चमचमा रहे थे, जिनसे वह सेना सुशोभित हो रही थी ।। तस्य मेघप्रकाशस्य सौवर्ण: शोभितस्य च । बभूव रूप॑ सैन्यस्य मेघस्येव सविद्युत:,सात्यकिकी वह सेना (हाथियोंके समूहके कारण तथा काली वर्दी पहननेसे) मेघोंके समान काली दिखायी देती थी। सैनिकोंके सुनहरे आभूषणोंसे सुशोभित हो वह ऐसी जान पड़ती थी, मानो बिजलियोंसहित मेघोंकी घटा छा रही हो
সেই সেনার রূপ ছিল মেঘের মতো গাঢ়, আর স্বর্ণালঙ্কারে শোভিত হয়ে তা যেন বিদ্যুৎসহ মেঘপুঞ্জের ন্যায় প্রতীয়মান হচ্ছিল।
Verse 6
अक्षौहिणी तु सा सेना तदा यौधिष्ठिरं बलम् । प्रविश्यान्तर्दधे राजन् सागरं कुनदी यथा,राजन्! वह एक अक्षौहिणी सेना युधिष्ठिरकी विशाल वाहिनीमें समाकर उसी प्रकार विलीन हो गयी, जैसे कोई छोटी नदी समुद्रमें मिल गयी हो
হে রাজন! সেই এক অক্ষৌহিণী সেনা যুধিষ্ঠিরের মহাবাহিনীতে প্রবেশ করে তেমনই অন্তর্হিত হয়ে গেল, যেমন ক্ষুদ্র নদী সাগরে মিলিয়ে হারিয়ে যায়।
Verse 7
|! /__ 0:2४! |॥| 68 तथैवाक्षौहिणीं गृह चेदीनामृषभो बली । धृष्टकेतुरुपागच्छत् पाण्डवानमितौजस:,इसी प्रकार महाबली चेदिराज धृष्टकेतु अपनी एक अक्षौहिणी सेना साथ लेकर अमित तेजस्वी पाण्डवोंके पास आये
এইভাবেই চেদিদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ মহাবলী ধৃষ্টকেতু এক অক্ষৌহিণী সেনা সঙ্গে নিয়ে অপরিমেয় পরাক্রমী পাণ্ডবদের কাছে এসে উপস্থিত হলেন।
Verse 8
मागधश्न जयत्सेनो जारासन्धिर्महाबल: । अक्षौहिण्यैव सैन्यस्य धर्मराजमुपागमत्,मागध वीर जयत्सेन और जरासंधका महाबली पुत्र सहदेव--ये दोनों एक अक्षौहिणी सेनाके साथ धर्मराज युधिष्ठिरके पास आये थे
মাগধবীর জয়ৎসেন এবং জরাসন্ধের মহাবলী পুত্র সহদেব—এই দুইজনই এক অক্ষৌহিণী সেনা নিয়ে ধর্মরাজ যুধিষ্ঠিরের কাছে এসে উপস্থিত হলেন।
Verse 9
तथैव पाण्ड्यो राजेन्द्र सागरानूपवासिभि: । वृतो बहुविधैर्योधैर्युधिष्ठिरमुपागमत्,राजेन्द्र! इसी प्रकार समुद्रतटवर्ती जलप्राय देशके निवासी अनेक प्रकारके सैनिकोंसे घिरे हुए पाण्ड्यनरेश युधिष्ठिरके पक्षमें पधारे थे
হে রাজেন্দ্র! তদ্রূপ সমুদ্রতটবর্তী অঞ্চলের অধিবাসীদের নানা প্রকার যোদ্ধায় পরিবেষ্টিত পাণ্ড্যরাজও যুধিষ্ঠিরের কাছে এসে উপস্থিত হলেন।
Verse 10
तस्य सैन्यमतीवासीत् तस्मिन् बलसमागमे । प्रेक्षणीयतरं राजन् सुवेषं बलवत् तदा,राजन! उस सैन्य-समागमके समय युधिष्ठिरकी सुन्दर वेश-भूषासे विभूषित तथा प्रबल सेना, जिसकी संख्या बहुत अधिक थी, देखने ही योग्य जान पड़ती थी
হে রাজন! সেই সেনাসমাবেশে তাঁর বাহিনী ছিল অতিশয় বিপুল; তখন তা সুসজ্জিত বেশভূষায় ও শক্তিতে প্রবল হয়ে অতিশয় দর্শনীয় মনে হচ্ছিল।
Verse 11
द्रुपदस्याप्य भूत् सेना नानादेशसमागतै: । शोभिता पुरुषै: शूरै: पुत्रैश्चास्य महारथै:,द्रपदकी सेना तो वहाँ पहलेसे ही उपस्थित थी, जो विभिन्न देशोंसे आये हुए शूरवीर पुरुषों तथा द्रुपदके महारथी पुत्रोंसे सुशोभित थी
দ্রুপদের সেনাও সেখানে পূর্বেই উপস্থিত ছিল—বহু দেশের আগত বীরপুরুষ এবং তাঁর নিজের মহারথী পুত্রদের দ্বারা তা শোভিত হচ্ছিল।
Verse 12
तथैव राजा मत्स्यानां विराटो वाहिनीपति: । पर्वतीयैर्महीपालै: सहित: पाण्डवानियात्,इसी प्रकार मत्स्यनरेश सेनापति विराट भी पर्वतीय राजाओंके साथ पाण्डवोंकी सहायताके लिये प्रस्तुत थे
তদ্রূপ মৎস্যরাজ ও সেনাপতি বিরাটও পর্বতবাসী রাজাদের সঙ্গে পাণ্ডবদের সহায়তায় যাত্রার জন্য প্রস্তুত ছিলেন।
Verse 13
इतश्रेतश्न पाण्डूनां समाजम्मुर्महात्मनाम् । अक्षौहिण्यस्तु सप्तैता विविधध्वजसंकुला:
বৈশম্পায়ন বললেন—তারপর মহাত্মা পাণ্ডবদের সমাবেশে সাত অক্ষৌহিণী সেনা ছিল, নানা প্রকার ধ্বজে ঘন সঙ্কুল।
Verse 14
युयुत्समाना: कुरुभि: पाण्डवान् समहर्षयन् । महात्मा पाण्डवोंके पास इधर-उधरसे सात अक्षौहिणी सेनाएँ एकत्र हुई थीं, जो नाना प्रकारकी ध्वजा-पताकाओंसे व्याप्त दिखायी देती थीं। ये सब सेनाएँ कौरवोंसे युद्ध करनेकी इच्छा रखकर पाण्डवोंका हर्ष बढ़ाती थीं ।। १३ है ।। तथैव धार्तराष्ट्रस्य हर्ष समभिवर्धयन्,बभौ बलमनाधृष्यं कर्णिकारवनं यथा । इसी प्रकार राजा भगदत्तने दुर्योधनका हर्ष बढ़ाते हुए उसे एक अक्षौहिणी सेना प्रदान की। सुनहरे शरीरवाले चीन और किरात देशके योद्धाओंसे भरी हुई भगदत्तकी दुर्धर्ष सेना (खिले हुए) कनेरके जंगल-सी जान पड़ती थी
কুরুবংশের সঙ্গে যুদ্ধের আকাঙ্ক্ষায় সেই সেনাদল পাণ্ডবদের অত্যন্ত আনন্দিত করল। তদ্রূপ ধৃতরাষ্ট্রপুত্রের (দুর্যোধনের) হর্ষ বৃদ্ধি করে এক অজেয় বাহিনী কণিকারের প্রস্ফুটিত অরণ্যের ন্যায় দীপ্তিমান হল।
Verse 15
भगदत्तो महीपाल: सेनामक्षौहिणीं ददौ । तस्य चीनै: किरातैश्व काज्चनैरिव संवृतम्
রাজা ভগদত্ত এক অক্ষৌহিণী সেনা দিলেন; তাঁর বাহিনী চীন ও কিরাত দেশের যোদ্ধাদের দ্বারা পরিবেষ্টিত ছিল, যেন স্বর্ণে আচ্ছাদিত।
Verse 16
तथा भूरिश्रवा: शूर: शल्यश्न कुरुनन्दन
তদ্রূপ, হে কুরুনন্দন, বীর ভূরিশ্রবা এবং শল্যও।
Verse 17
कृतवर्मा च हार्दिक्यो भोजान्धकुकुरै: सह
বৈশম্পায়ন বললেন—হৃদীকপুত্র কৃতবর্মাও ভোজ, অন্ধক ও কুকুরদের সঙ্গে সেখানে উপস্থিত হলেন; যাদব-সম্পর্কিত কুলগুলির এই সমাবেশ আসন্ন সংঘাতে আনুগত্য ও ধর্মবোধের গুরুতর তাৎপর্য বহন করল।
Verse 18
तस्य तैः पुरुषव्याप्रैवनमाला धरैर्बलम्
বৈশম্পায়ন বললেন—বনমালা ধারণকারী সেই পুরুষ-ব্যাঘ্রদের দ্বারা তার সেনাবল দৃঢ় ও প্রবল হয়ে উঠল; তাদের তেজ ও শৃঙ্খলা বাহিনীর সাহস এবং ধর্মনিশ্চয় বৃদ্ধি করল।
Verse 19
अशोभत यथा मन्तैर्वन॑ प्रक्रीडितैर्गजै: । उन वनमालाधारी पुरुषसिंहोंसे कृतवर्माकी सेना उसी प्रकार सुशोभित हुई, जैसे क्रीड़ापपयण मतवाले हाथियोंसे कोई (विशाल) वन शोभा पा रहा हो ।। १८ हू || जयद्रथमुखाश्षान्ये सिन्धुसौवीरवासिन:,इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि सेनोद्योगपर्वणि पुरोहितसैन्यदर्शने एकोनविंशो5 ध्याय: इस प्रकार श्रीमह्ाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत सेनोट्रोगपर्वमें पुरोहितके द्वारा सैन्यदर्शनविषयक उत्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
বৈশম্পায়ন বললেন—বনমালা-ধারী সেই পুরুষসিংহদের দ্বারা সুসজ্জিত কৃতবর্মার সেনা তেমনই দীপ্তিময় হল, যেমন ক্রীড়ারত মদোন্মত্ত হাতিদের দ্বারা কোনো বিশাল বন শোভা পায়।
Verse 20
तेषामक्षौहिणी सेना बहुला विबभौ तदा
তখন তাদের অক্ষৌহিণী-পরিমিত সেনা বিপুল ও ভয়ংকর রূপে প্রকাশ পেল—যুদ্ধের দিকে ধাবমান স্রোত এবং তার গুরুতর ধর্মভারকে ইঙ্গিত করে।
Verse 21
विधूयमानो वातेन बहुरूप इवाम्बुद: । उनकी वह एक अक्षौहिणी विशाल सेना उस समय हवासे उड़ाये जाते हुए अनेक रूपवाले मेघके समान प्रतीत होती थी ।| २० डे ।। सुदक्षिणश्न काम्बोजो यवनैश्न शकैस्तथा,स च सम्प्राप्य कौरव्यं तत्रैवान्तर्दधे तदा । राजन! कम्बोजनरेश सुदक्षिण भी यवनों और शकोंके साथ एक अक्षौहिणी सेना लिये दुर्योधनके पास आया। उसका सैन्य-समूह टिड्डियोंके दल-सा जान पड़ता था। वह सारा सैन्य-समुदाय कौरव-सेनामें आकर विलीन हो गया
বৈশম্পায়ন বললেন—বায়ুতে বিধূত হয়ে নানা রূপ ধারণকারী মেঘের মতো সেই মহাসেনাও তখন বহুরূপা বলে প্রতীয়মান হল।
Verse 22
उपाजगाम कौरव्यमक्षौहिण्या विशाम्पते । तस्य सेनासमावाय: शलभानामिवाबभौ
বৈশম্পায়ন বললেন—হে প্রজাপতি! এক অক্ষৌহিণী সেনা কৌরবদের দিকে অগ্রসর হল। তার সৈন্যসমাবেশ পঙ্গপালের ঝাঁকের মতোই দেখা দিল—ঘন, বিপুল ও অশুভ।
Verse 23
तथा माहिष्मतीवासी नीलो नीलायुथै: सह
বৈশম্পায়ন বললেন—তদ্রূপ মাহিষ্মতীর অধিবাসী নীলও তার নীলবর্ণ সৈন্যদলসহ উপস্থিত হল।
Verse 24
महीपालो महावीर्यर्दक्षिणापथवासिभि: । इसी प्रकार माहिष्मती पुरीके निवासी राजा नील भी दक्षिण देशके रहनेवाले श्यामवर्णके शस्त्रधारी महापराक्रमी सैनिकोंके साथ दुर्योधनके पक्षमें आये ।। आवलन्त्यौ च महीपालौ महाबलसुसंवृतौ
বৈশম্পায়ন বললেন—মহাবীর্যবান রাজা মহীপাল দক্ষিণাপথের যোদ্ধাদের সঙ্গে এলেন। তদ্রূপ মাহিষ্মতীনিবাসী রাজা নীলও দক্ষিণ দেশের শ্যামবর্ণ, অস্ত্রধারী, মহাবলী সৈন্যসহ দুর্যোধনের পক্ষে উপস্থিত হলেন। আর অবন্তির দুই রাজাও মহাবলবেষ্টিত হয়ে এলেন।
Verse 25
केकयाश्ष नरव्याप्रा: सोदर्या: पठ्च पार्थिवा:
বৈশম্পায়ন বললেন—কেকয় দেশের সেই পাঁচ পার্থিব, এক মাতৃজাত, নরব্যাঘ্র ও কর্মোদ্যমী, সেখানেও সমবেত হলেন।
Verse 26
ततस्ततस्तु सर्वेषां भूमिपानां महात्मनाम्
তারপর সেই সকল মহাত্মা ভূমিকর্তাদের মধ্যে ক্রমে ক্রমে পরবর্তী ঘটনাবলি অগ্রসর হতে লাগল।
Verse 27
तिस्रोडन्या: समवर्तन्त वाहिन्यो भरतर्षभ । भरतश्रेष्ठ) तदनन्तर इधर-उधरसे समस्त महामना नरेशोंकी तीन अक्षौहिणी सेनाएँ और आ पहुँचीं ।। एवमेकादशावृत्ता: सेना दुर्योधनस्य ता:
বৈশম্পায়ন বললেন—হে ভরতশ্রেষ্ঠ! তারপর আরও তিনটি বাহিনী সমবেত হল। এরপর নানা দিক থেকে মহামনা রাজাদের তিন অক্ষৌহিণী সেনাও এসে উপস্থিত হল। এইভাবে দুর্যোধনের সেনা সর্বমোট এগারো অক্ষৌহিণীতে সম্পূর্ণ হল।
Verse 28
न हास्तिनपुरे राजन्नवकाशो5भवत् तदा
বৈশম্পায়ন বললেন—হে রাজন! তখন হস্তিনাপুরে আর কোনো অবকাশ—কোনো স্থান—অবশিষ্ট ছিল না।
Verse 29
राज्ञां स्वबलमुख्यानां प्राधान्येनापि भारत । राजन! दुर्योधनकी अपनी सेनाके जो प्रधान-प्रधान राजा थे, उनके भी ठहरनेके लिये हस्तिनापुरमें स्थान नहीं रह गया था ।। २८ है ।। तत: पज्चनदं चैव कृत्स्नं च कुरुजाड्लम्,इसलिये भारत! पंचनद प्रदेश, सम्पूर्ण कुरुजांगल देश, रोहितकवन (रोहतक), समस्त मरुभूमि, अहिच्छत्र, कालकूट, गंगातट, वारण, वाटधान तथा यामुनपर्वत--यह प्रचुर धन- धान्यसे सम्पन्न सुविस्तृत प्रदेश कौरवोंकी सेनासे भलीभाँति घिर गया
বৈশম্পায়ন বললেন—হে ভারত! দুর্যোধনের প্রধান মিত্র, যারা নিজ নিজ বাহিনীর অধিপতি ও অগ্রগণ্য রাজা, তাদেরও থাকার জন্য হস্তিনাপুরে আর স্থান রইল না। অতএব পঞ্চনদ-প্রদেশ, সমগ্র কুরুজাঙ্গল, রোহিতক অরণ্য, চারিদিকের মরুভূমি, অহিচ্ছত্র, কালকূট, গঙ্গাতট, বারণ, বাটধান এবং যমুনা-পর্বত—ধন-ধান্যে সমৃদ্ধ এই বিস্তীর্ণ দেশ—কৌরবসেনায় চারদিক থেকে পরিবেষ্টিত ও পরিপূর্ণ হয়ে উঠল।
Verse 30
तथा रोहितकारण्यं मरुभूमिश्न केवला । अहिच्छत्रं कालकूटं गज़ाकूलं च भारत,इसलिये भारत! पंचनद प्रदेश, सम्पूर्ण कुरुजांगल देश, रोहितकवन (रोहतक), समस्त मरुभूमि, अहिच्छत्र, कालकूट, गंगातट, वारण, वाटधान तथा यामुनपर्वत--यह प्रचुर धन- धान्यसे सम्पन्न सुविस्तृत प्रदेश कौरवोंकी सेनासे भलीभाँति घिर गया
বৈশম্পায়ন বললেন—হে ভারত! তদ্রূপ রোহিতক অরণ্য, সমগ্র মরুভূমি, অহিচ্ছত্র, কালকূট এবং গঙ্গাতট—এই সমৃদ্ধ দেশসমূহ কৌরবসেনায় চারদিক থেকে পরিবেষ্টিত হল।
Verse 31
वारणं वाटधानं च यामुनश्चैव पर्वत: । एष देश: सुविस्तीर्ण: प्रभूतधनधान्यवान्,इसलिये भारत! पंचनद प्रदेश, सम्पूर्ण कुरुजांगल देश, रोहितकवन (रोहतक), समस्त मरुभूमि, अहिच्छत्र, कालकूट, गंगातट, वारण, वाटधान तथा यामुनपर्वत--यह प्रचुर धन- धान्यसे सम्पन्न सुविस्तृत प्रदेश कौरवोंकी सेनासे भलीभाँति घिर गया
বৈশম্পায়ন বললেন—বারণ, বাটধান এবং যমুনা নামে পর্বত—এই সমগ্র দেশ সুদূর বিস্তৃত, ধন ও ধান্যে পরিপূর্ণ।
Verse 32
बभूव कौरवेयाणां बलेनातीव संवृत: । तत्र सैन्यं तथा युक्त ददर्श स पुरोहित:,पांचालराज ट्रुपदने अपने जिन पुरोहित ब्राह्मणको कौरवोंके पास भेजा था, उन्होंने वहाँ पहुँचकर उस विशाल सेनाके जमावको देखा
কৌরবদের সামরিক শক্তিতে সেই অঞ্চল সম্পূর্ণ আচ্ছন্ন হয়ে গিয়েছিল। সেখানে পৌঁছে দ্রুপদ-প্রেরিত পুরোহিত সেই সুবিন্যস্ত, বিপুল সেনাসমাবেশ প্রত্যক্ষ করলেন।
Verse 33
य: स पाज्चालराजेन प्रेषित: कौरवान् प्रति,पांचालराज ट्रुपदने अपने जिन पुरोहित ब्राह्मणको कौरवोंके पास भेजा था, उन्होंने वहाँ पहुँचकर उस विशाल सेनाके जमावको देखा
বৈশম্পায়ন বললেন— পাঞ্চালরাজ দ্রুপদ যে ব্রাহ্মণ পুরোহিতকে কৌরবদের কাছে দূত করে পাঠিয়েছিলেন, তিনি সেখানে পৌঁছে তাদের সুবিন্যস্ত বিপুল সেনাসমাবেশ দেখলেন।
Verse 153
बभौ बलमनाधृष्यं कर्णिकारवनं यथा । इसी प्रकार राजा भगदत्तने दुर्योधनका हर्ष बढ़ाते हुए उसे एक अक्षौहिणी सेना प्रदान की। सुनहरे शरीरवाले चीन और किरात देशके योद्धाओंसे भरी हुई भगदत्तकी दुर्धर्ष सेना (खिले हुए) कनेरके जंगल-सी जान पड़ती थी
বৈশম্পায়ন বললেন— সেই সেনা অজেয় শক্তিতে এমনই দীপ্ত ছিল, যেন পুষ্পিত কর্ণিকার-বন। দুর্যোধনের হর্ষ বাড়াতে ভগদত্ত এক পূর্ণ অক্ষৌহিণী দিলেন; চীন ও কিরাত দেশের যোদ্ধায় পরিপূর্ণ, স্বর্ণদীপ্ত সেই দুর্ধর্ষ বাহিনী কর্ণিকার-অরণ্যের মতোই মনে হল।
Verse 176
अक्षौहिण्यैव सेनाया दुर्योधनमुपागमत् । हृदिकपुत्र कृतवर्मा भी भोज, अन्धक तथा कुकुरवंशी वीरोंके साथ एक अक्षौहिणी सेना लेकर दुर्योधनके पास आया
বৈশম্পায়ন বললেন— হৃদিকে-পুত্র কৃতবর্মা ভোজ, অন্ধক ও কুকুরবংশীয় বীরদের সঙ্গে এক পূর্ণ অক্ষৌহিণী সেনা নিয়ে দুর্যোধনের কাছে এলেন।
Verse 196
आज म्मु: पृथिवीपाला: कम्पयन्त इवाचलान् । जयद्रथ आदि अन्य राजा, जो सिन्धु और सौवीरदेशके निवासी थे, पर्वतोंको कँपाते हुए-से दुर्योधनके पास आये
বৈশম্পায়ন বললেন— পৃথিবীর পালক সেই রাজারা এমনভাবে এলেন যেন পর্বতও কেঁপে উঠছে। সিন্ধু ও সৌবীর দেশের অধিবাসী জয়দ্রথ প্রমুখ সেই প্রবল আড়ম্বর ও শক্তি নিয়ে দুর্যোধনের কাছে উপস্থিত হলেন।
Verse 226
स च सम्प्राप्य कौरव्यं तत्रैवान्तर्दधे तदा । राजन! कम्बोजनरेश सुदक्षिण भी यवनों और शकोंके साथ एक अक्षौहिणी सेना लिये दुर्योधनके पास आया। उसका सैन्य-समूह टिड्डियोंके दल-सा जान पड़ता था। वह सारा सैन्य-समुदाय कौरव-सेनामें आकर विलीन हो गया
তিনি কৌরবকুমারের কাছে পৌঁছে সেখানেই অন্তর্ধান করলেন। রাজন, কম্বোজরাজ সুদক্ষিণ যবন ও শকসহ এক পূর্ণ অক্ষৌহিণী সেনা নিয়ে দুর্যোধনের কাছে এলেন। তাঁর সৈন্যসমূহ পঙ্গপালের ঝাঁকের মতো দেখাচ্ছিল। সেই সমগ্র সৈন্যসমুদ্র এসে কৌরবসেনায় মিশে গেল।
Verse 246
अक्षौहिण्या च कौरव्यं दुर्योधनमुपागतौ । अवन्तीदेशके दोनों राजा विन्द और अनुविन्द भी पृथक्-पृथक् एक अक्षौहिणी सेनासे घिरे हुए दुर्योधनके पास आये
এক অক্ষৌহিণী সেনাসহ কৌরববংশীয় দুর্যোধনের কাছে তারা উপস্থিত হল। অবন্তী দেশের দুই রাজা—বিন্দ ও অনুবিন্দ—তাঁরাও পৃথক পৃথকভাবে, নিজ নিজ পূর্ণ অক্ষৌহিণী সেনায় পরিবেষ্টিত হয়ে, দুর্যোধনের কাছে এলেন।
Verse 256
संहर्षयन्त: कौरव्यमक्षौहिण्या समाद्रवन् । केकयदेशके पुरुषसिंह पाँच नरेश, जो परस्पर सगे भाई थे, दुर्योधनका हर्ष बढ़ाते हुए एक अक्षौहिणी सेनाके साथ आ पहुँचे
কৌরবকুমার দুর্যোধনের উল্লাস বাড়িয়ে তারা এক অক্ষৌহিণী সেনাসহ দ্রুত এসে উপস্থিত হল। কেকয় দেশের পুরুষসিংহ সেই পাঁচ রাজা—যাঁরা পরস্পর সহোদর—দুর্যোধনের কাছে এলেন।
Verse 276
युयुत्सममाना: कौन्तेयान् नानाध्वजसमाकुला: । इस प्रकार दुर्योधनके पास सब मिलाकर ग्यारह अक्षौहिणी सेनाएँ एकत्र हो गयीं, जो भाँति-भाँतिकी ध्वजा-पताकाओंसे सुशोभित थीं और कुन्तीकुमारोंसे युद्ध करनेका उत्साह रखती थीं
কুন্তীপুত্রদের সঙ্গে যুদ্ধ করতে উদ্গ্রীব এবং নানাবিধ ধ্বজা-পতাকায় ভরা বাহিনী এভাবে দুর্যোধনের চারদিকে সমবেত হল। সব মিলিয়ে এগারো অক্ষৌহিণী সেনা জমা পড়ল—বহুবর্ণ পতাকায় শোভিত, পাণ্ডবদের বিরুদ্ধে যুদ্ধসংকল্পে দৃঢ়।
Verse 1636
दुर्योधनमुपायातावक्षौहिण्या पृथक् पृथक् । कुरुनन्दन! इसी प्रकार शूरवीर भूरिश्रवा तथा राजा शल्य पृथक्-पृथक् एक-एक अक्षौहिणी सेना साथ लेकर दुर्योधनके पास आये
হে কুরুনন্দন, এইভাবেই বীর ভূরিশ্রবা এবং রাজা শল্যও পৃথক পৃথকভাবে এক-এক অক্ষৌহিণী সেনা সঙ্গে নিয়ে দুর্যোধনের কাছে এলেন। দুর্যোধনের কাছে অক্ষৌহিণী বাহিনী একের পর এক, আলাদা আলাদাভাবে এসে যোগ দিল।
The tension lies in converting political grievance into irreversible collective action: once allies commit akṣauhiṇīs and occupy regions, the ethical space for negotiated settlement narrows, raising questions about responsibility for escalation.
It illustrates how power in epic polity is operational: legitimacy is performed through coalition visibility, standardized organization, and control of space—showing that strategic capacity and moral claims develop together, not separately.
No explicit phalaśruti appears in this passage; its meta-function is archival and logistical, documenting force composition and geography to contextualize later strategic choices within the broader narrative.