
भीष्मस्य भीमसेन-निरोधः (Bhīṣma checks Bhīmasena; matched engagements intensify)
Upa-parva: Bhīṣma-vadha-prastāva (Engagements under Bhīṣma’s command)
Saṃjaya reports to Dhṛtarāṣṭra the coordinated onset of engagements as key Pandava and allied fighters advance toward designated Kaurava opponents. Śikhaṇḍī with Matsya-Virāṭa closes upon Bhīṣma; Dhanaṃjaya (Arjuna) presses multiple senior bowmen; Bhīmasena moves against Duryodhana and Duḥśāsana; Sahadeva advances on Śakuni and Ulūka; Nakula engages the Trigartas; allied commanders (Sātyaki, Cekitāna, Saubhadra) confront Śālvas and Kekayas; Dhṛṣṭaketu and Ghaṭotkaca oppose the Kaurava chariot divisions; and Dhṛṣṭadyumna meets Droṇa. The chapter then shifts from pairing to atmosphere: midday dust and volleys obscure sky and directions; the field gleams with armor and weapons; chariots appear like celestial bodies. A tactical inflection follows: Bhīṣma, observing the army, blocks Bhīmasena, showers him with sharpened arrows, cuts down Bhīma’s thrown spear, and then severs Bhīma’s bow. Sātyaki rapidly counters by attacking Bhīṣma, but Bhīṣma strikes down Sātyaki’s charioteer, causing the horses to bolt and generating alarm and regrouping cries among the Pandava side. Bhīṣma then renews pressure on the Pandava host, prompting Panchalas and Somakas to concentrate their effort against him; both armies surge forward, and the engagement expands into a general clash.
Chapter Arc: धृतराष्ट्र, संजय से युद्ध-समाचार सुनकर पुत्रों की पराजय का बोध पाते ही भीतर-भीतर जल उठता है—उसे लगता है कि विदुर की पुरानी चेतावनियाँ अब हृदय को दग्ध करने आई हैं। → धृतराष्ट्र की चिन्ता क्रमशः निश्चित भय में बदलती है: वह किसी ऐसे वीर को नहीं देखता जो रणभूमि में उसके पुत्रों की रक्षा कर सके। वह पराजय के कारण पूछता है; संजय उत्तर देने को उठता है और पाण्डवों की ‘अवध्यता’ का हेतु धर्म में स्थापित करता है—जबकि कौरव-पक्ष अधर्म और पाप-प्रवृत्ति से क्षीण हो रहा है। → संजय का निर्णायक कथन कि पाण्डव धर्म-बल से युद्ध में अवध्य और विजयी हैं, और धृतराष्ट्र का यह भय-घोष कि ‘भीम निश्चय ही मेरे पुत्रों का संहार करेगा’—यहीं अध्याय का शिखर बनता है। → संजय धृतराष्ट्र को कारण-व्याख्या देकर स्थिर करता है: विजय-पराजय का मूल दैव-योग नहीं, धर्म-अधर्म का संचय है। धृतराष्ट्र फिर भी महासागर-तुल्य शोक के पार न जा पाने की असहायता स्वीकार करता है। → भीम के हाथों कौरव-पुत्रों के विनाश की आशंका एक अनिवार्य भविष्य की तरह लटकती रहती है—अगले समाचार उसी भय को ठोस रूप देने वाले हैं।
Verse 1
/ [दाक्षिणात्य अधिक पाठका इं श्लोक मिलाकर कुल ८७६ “लोक हैं।] नीफजशार (0) आज असन- पञज्चषष्टितमो< ध्याय: धृतराष्ट्र-संजय-संवादके प्रसंगमें दुर्योधनके द्वारा पाण्डवोंकी विजयका कारण पूछनेपर भीष्मका ब्रह्माजीके द्वारा की हुई भगवत्-स्तुतिका कथन धृतराष्ट उवाच भयं मे सुमहज्जातं विस्मयश्वैव संजय । श्रुत्वा पाण्डुकुमाराणां कर्म देवै: सुदुष्करम्
ধৃতরাষ্ট্র বললেন—সঞ্জয়, পাণ্ডুপুত্রদের এমন কর্ম শুনে—যা দেবতাদের পক্ষেও দুষ্কর—আমার মধ্যে মহাভয় এবং বিস্ময় একসঙ্গে জেগে উঠেছে।
Verse 2
पुत्राणां च पराभावं श्रुत्वा संजय सर्वश: । चिन्ता मे महती सूत भविष्यति कथं त्विति,सूत संजय! अपने पुत्रोंकी सब प्रकारसे पराजयका हाल सुनकर मेरी चिन्ता बढ़ती ही जा रही है। सोचता हूँ कैसे उनकी विजय होगी
সঞ্জয়, সর্বদিক থেকে আমার পুত্রদের পরাজয়ের সংবাদ শুনে, হে সূত, আমার চিন্তা অত্যন্ত বেড়ে গেছে; আমি ভাবি—তাদের জয় কীভাবে হবে?
Verse 3
ध्रुवं विदुरवाक्यानि धक्ष्यन्ति हृदयं मम । यथा हि दृश्यते सर्व दैवयोगेन संजय
সঞ্জয়, নিশ্চয়ই বিদুরের বাক্য আমার হৃদয়কে দগ্ধ করে ভস্ম করে দেবে; কারণ তিনি যেমন বলেছিলেন, ভাগ্যের যোগে তেমনই সবকিছু ঘটতে দেখা যাচ্ছে।
Verse 4
यत्र भीष्ममुखान् सर्वान् शस्त्रज्ञान् योधसत्तमान् । पाण्डवानामनीकेषु योधयन्ति प्रहारिण:
ধৃতরাষ্ট্র বললেন—যেখানে ভীষ্মের নেতৃত্বে আমাদের সেই সকল অগ্রগণ্য যোদ্ধা—অস্ত্রবিদ্যায় পারদর্শী ও রণশ্রেষ্ঠ—পাণ্ডবদের ব্যূহবদ্ধ সেনাদলে প্রবেশ করে প্রহার-প্রতিপ্রহারে যুদ্ধ করছে।
Verse 5
पाण्डवोंकी सेनाओंमें ऐसे-ऐसे प्रहारकुशल योद्धा हैं, जो शस्त्रविद्याके ज्ञाता एवं योद्धाओंमें श्रेष्ठ भीष्म आदि समस्त महारथियोंके साथ भी युद्ध कर लेते हैं ।।
ধৃতরাষ্ট্র বললেন—হে পুত্র! সেই মহাবলী, মহাত্মা পাণ্ডুপুত্রেরা কোন কারণে অবধ্য? কে তাদের বর দান করেছে, অথবা তারা কোন বিশেষ জ্ঞান ধারণ করে?
Verse 6
येन क्षयं न गच्छन्ति दिवि तारागणा इव । पुनः पुनर्न मृष्यामि हतं सैन्यं तु पाण्डवै:
ধৃতরাষ্ট্র বললেন—কোন উপায়ে তারা আকাশের তারাগণের মতো বিনষ্ট হয় না? আর পাণ্ডবদের দ্বারা বারবার আমার সেনা নিহত হচ্ছে—এই সংবাদ শুনে আমি সহ্য করতে পারি না।
Verse 7
मय्येव दण्ड: पतति दैवात् परमदारुण: । यथावध्या: पाण्डुसुता यथा वध्याश्व मे सुता:
ধৃতরাষ্ট্র বললেন—দৈববশে অতি ভয়ংকর দণ্ড যেন আমার ওপরেই পতিত হয়েছে; যেন পাণ্ডুপুত্রেরা অবধ্য, আর আমার পুত্রেরা বধ্য।
Verse 8
एतन्मे सर्वमाचक्ष्व याथातथ्येन संजय । दैववश मेरे ही ऊपर अत्यन्त भयंकर दण्ड पड़ रहा है। संजय! क्यों पाण्डव अवध्य हैं और क्यों मेरे पुत्र मारे जा रहे हैं? यह सब यथार्थरूपसे मुझे बताओ ।।
ধৃতরাষ্ট্র বললেন—সঞ্জয়! এ সব আমাকে যথাযথ সত্যরূপে বলো। দৈববশে অতি দারুণ দণ্ড আমার ওপরেই পতিত হয়েছে। সঞ্জয়! পাণ্ডবেরা কেন অবধ্য, আর আমার পুত্রেরা কেন নিহত হচ্ছে—সবই সত্যভাবে বলো; কারণ এ দুঃখের কোনো পার আমি কোনোভাবেই দেখতে পাচ্ছি না।
Verse 9
पुत्राणां व्यसन मन्ये ध्रुवं प्राप्त सुदारुणम्
আমার মনে হয়, আমার পুত্রদের উপর নিশ্চিতই এক ভয়ংকর দুর্যোগ নেমে এসেছে।
Verse 10
न हि पश्यामि त॑ वीरं यो मे रक्षेत् सुतान् रणे
যুদ্ধে আমার পুত্রদের রক্ষা করতে পারে—এমন কোনো বীরকে আমি দেখি না।
Verse 11
ध्रुवं विनाश: सम्प्राप्त: पुत्राणां मम संजय । मैं ऐसे किसी वीरको नहीं देखता, जो रणक्षेत्रमें मेरे पुत्रोंकी रक्षा कर सके। संजय! अवश्य ही मेरे पुत्रोंक विनाशकी घड़ी आ पहुँची है || १० इ ।।
সঞ্জয়, আমার পুত্রদের বিনাশ নিশ্চিতই এসে পৌঁছেছে। যুদ্ধে তাদের রক্ষা করতে পারে—এমন কোনো বীরকে আমি দেখি না। অতএব, হে সূত, এর কারণ এবং বিশেষ করে এর অন্তর্নিহিত শক্তি আমাকে বলো।
Verse 12
पृच्छतो वै यथातत्त्वं सर्वमाख्यातुमरहसि । अतः सूत! मैं तुमसे शक्तिः और कारणकेः विषयमें जो विशेष प्रश्न कर रहा हूँ, वह सब यथार्थरूपसे बताओ ।।
আমি যা জিজ্ঞাসা করছি, তা যথাযথ সত্যসহ সবই তোমার বলা উচিত। অতএব, হে সূত, শক্তি ও কারণ সম্বন্ধে আমি যা জানতে চাই, তা সত্যরূপে বলো। যুদ্ধে দुर্যোধন যখন নিজের লোকদের বিমুখ হতে দেখল, তখন সে কী করল? আর ভীষ্ম, দ্রোণ, কৃপ, শকুনি, জয়দ্রথ, মহাধনুর্ধর অশ্বত্থামা এবং মহাবলী বিকর্ণ—তারা কী করল? মহাপ্রাজ্ঞ সঞ্জয়, আমার পুত্রেরা বিমুখ হলে সেই মহামনা মহারথীরা তখন কী সংকল্প করেছিল?
Verse 13
भीष्मद्रोणौ कृपश्चैव सौबलश्न जयद्रथ: । द्रौणिवापि महेष्वासो विकर्णो वा महाबल:
ভীষ্ম, দ্রোণ, কৃপ, সৌবল (শকুনি), জয়দ্রথ, দ্রোণপুত্র মহাধনুর্ধর অশ্বত্থামা এবং মহাবলী বিকর্ণ—(তারা কী করল?)
Verse 14
निश्चयो वापि कस्तेषां तदा ह्वासीन्महात्मनाम् | विमुखेषु महाप्राज्ञ मम पुत्रेषु संजय
ধৃতরাষ্ট্র বললেন—হে মহাপ্রাজ্ঞ সঞ্জয়! যুদ্ধে আমার পুত্রেরা বিমুখ হয়ে সাহস হারালে, তখন সেই মহাত্মা নেতারা কী স্থির সিদ্ধান্ত নিলেন? সেনা টলমল করতে দেখে দুর্যোধন কী করল? আর ভীষ্ম, দ্রোণ, কৃপ, শকুনি, জয়দ্রথ, মহাধনুর্ধর অশ্বত্থামা ও মহাবলী বিকর্ণ কোন পথ অবলম্বন করলেন?
Verse 15
संजय उवाच शृणु राजन्नवहित: श्रुत्वा चैवावधारय । नैव मन्त्रकृतं किंचिन्नैव मायां तथाविधाम्
সঞ্জয় বললেন—হে রাজন, মনোযোগ দিয়ে শোন; শুনে নিজেই বিচার করে স্থির করো। পাণ্ডবদের মধ্যে না কোনো মন্ত্রবলে অর্জিত শক্তি আছে, না তারা তেমন কোনো মায়া-ছলনা করে।
Verse 16
न वै विभीषिकां कांचिदू राजन् कुर्वन्ति पाण्डवा: । युध्यन्ति ते यथान्यायं शक्तिमन्तश्न संयुगे
হে রাজন! পাণ্ডবরা কোনো ভয়াবহ বিভীষিকা সৃষ্টি করে না; তারা ভীতও হয় না। তারা ন্যায়ানুসারে যুদ্ধ করে, আর সমরে তারা সত্যই শক্তিমান।
Verse 17
धर्मेण सर्वकार्याणि जीवितादीनि भारत । आरभमन्ते सदा पार्था: प्रार्थथाना महद् यश:
হে ভারত! পৃথাপুত্রেরা জীবিকা-নির্বাহ প্রভৃতি সকল কাজই সর্বদা ধর্ম অনুসারে আরম্ভ করে; কারণ তারা ধর্মাচরণের দ্বারা জগতে মহৎ যশ অর্জন করতে চায়।
Verse 18
नते युद्धान्निवर्तन्ते धर्मोपेता महाबला: । श्रिया परमया युक्ता यतो धर्मस्ततो जय:
ধর্মে প্রতিষ্ঠিত সেই মহাবলীরা যুদ্ধ থেকে কখনও সরে আসে না। ধর্মবলের দ্বারা তারা পরম শ্রীতে ভূষিত; যেখানে ধর্ম, সেখানেই জয়।
Verse 19
तेनावध्या रणे पार्था जययुक्ताश्च पार्थिव । तव पुत्रा दुरात्मान: पापेष्वभिरता: सदा
সঞ্জয় বললেন— অতএব, হে রাজন, যুদ্ধে পৃথাপুত্র পাণ্ডবেরা অবধ্য এবং সর্বদা বিজয়ের সঙ্গে যুক্ত; কিন্তু আপনার পুত্রেরা দুরাত্মা, নিত্য পাপে আসক্ত।
Verse 20
सुबहूनि नृशंसानि पुत्रैस्तव जनेश्वर
সঞ্জয় বললেন— হে জনেশ্বর, হে রাজন! আপনার পুত্রেরা নীচ লোকের মতো পাণ্ডবদের প্রতি বহু নিষ্ঠুরতা ও ছলনা করেছে; কিন্তু পাণ্ডবেরা সেই সব অপরাধ যেন ভুলে গিয়ে দীর্ঘকাল ধরে তাদের দোষ ঢেকে রেখেছে। তবু, হে পাণ্ডুর অগ্রজ মহারাজ, আপনার পুত্রেরা এই পাণ্ডবদের যথোচিত সম্মান করে না।
Verse 21
निकृतानीह पाण्डूनां नीचैरिव यथा नरै: । सर्व च तदनादृत्य पुत्राणां तव किल्बिषम्
সঞ্জয় বললেন— হে জনেশ্বর! এখানে আপনার পুত্রেরা নীচ লোকের মতো পাণ্ডবদের প্রতি বহু নিষ্ঠুরতা ও প্রতারণা করেছে; কিন্তু পাণ্ডবেরা আপনার পুত্রদের সেই অপরাধসমূহ উপেক্ষা করে দীর্ঘকাল ধরে দোষ ঢেকে রেখেছে। তবু, হে জনেশ্বর, আপনার পুত্রেরা পাণ্ডবদের যথোচিত মর্যাদা দেয় না।
Verse 22
सापद्नवा: सदैवासन् पाण्डवा: पाण्डुपूर्वज । न चैतान् बहु मन्यन्ते पुत्रास्तव विशाम्पते
সঞ্জয় বললেন— হে পাণ্ডুর অগ্রজ! পাণ্ডবেরা সর্বদা ক্ষমাশীল ও অমৎসর; কিন্তু, হে প্রজাপতি, আপনার পুত্রেরা তাদের যথোচিত মর্যাদা দেয় না।
Verse 23
तस्य पापस्य सततं क्रियमाणस्य कर्मण: । साम्प्रतं सुमहद् घोरं फल प्राप्तं जनेश्वर,जनेश्वर! निरन्तर किये जानेवाले उसी पाप-कर्मका इस समय यह अत्यन्त भयंकर फल प्राप्त हुआ है
সঞ্জয় বললেন— হে জনেশ্বর! বারবার ও নিরন্তর করা সেই পাপকর্মের এখন অত্যন্ত মহান ও ভয়ংকর ফল প্রাপ্ত হয়েছে।
Verse 24
स त्वं भुड़क्ष्य महाराज सपुत्र: ससुहृज्जन: । नावबुध्यसि यद् राजन् वार्यमाण: सुहृज्जनै:
অতএব, মহারাজ, পুত্র ও সুহৃদ-পরিজনসহ তোমাকেই কর্মফল ভোগ করতে হবে; হে রাজন, প্রকৃত হিতৈষীরা বারবার নিবৃত্ত করলেও তুমি তা বুঝতে পারো না।
Verse 25
विदुरेणाथ भीष्मेण द्रोणेन च महात्मना | तथा मया चाप्यसकृद् वार्यमाणो न बुध्यसे,विदुर, भीष्म तथा महात्मा द्रोणने और मैंने भी बारंबार आपको मना किया है; किंतु आप कभी समझ नहीं पाते थे
বিদুর, ভীষ্ম, মহাত্মা দ্রোণ এবং আমিও—আমরা বারবার তোমাকে নিবৃত্ত করেছি; তবু এত সতর্কবাণী সত্ত্বেও তুমি বোধে আসোনি।
Verse 26
वाक्यं हित॑ च पथ्यं च मर्त्या: पथ्यमिवौषधम् । पुत्राणां मतमाज्ञाय जितान् मन्यसि पाण्डवान्
যেমন মৃত্যুর নিকটে থাকা মানুষ উপকারী ঔষধও ফেলে দেয়, তেমনি তুমি আমাদের কল্যাণকর ও হিতকর বাক্য প্রত্যাখ্যান করেছ; আর এখন পুত্রদের মত গ্রহণ করে মনে করছ যে পাণ্ডবরা পরাজিত হয়েছে।
Verse 27
शृणु भूयो यथातत्त्वं यन्मां त्वं परिपृच्छसि । कारणं भरतमश्रेष्ठ पाण्डवानां जयं प्रति
হে ভরতশ্রেষ্ঠ! তুমি যা আমাকে জিজ্ঞাসা করছ, তা আবার যথাযথ সত্যরূপে শোনো; পাণ্ডবদের বিজয়ের বিষয়ে যে কারণ, তা আমি বলব।
Verse 28
तत् ते5हं कथयिष्यामि यथाश्रुतमरिंदम । भरतश्रेष्ठी आप पाण्डवोंकी विजय और अपनी पराजयका जो कारण पूछते हैं, उसके विषयमें यथार्थ बातें सुनिये। शत्रुदमन! मैंने जैसा सुन रखा है, वह आपको बताऊँगा ।।
হে শত্রুদমন! আমি যেমন শুনেছি, তেমনই তোমাকে বলব। হে ভরতশ্রেষ্ঠ! পাণ্ডবদের বিজয় ও তোমাদের পরাজয়ের যে কারণ তুমি জানতে চাও, তার সত্য বৃত্তান্ত শোনো। এই কথাই দুর্যোধন পিতামহ ভীষ্মকে জিজ্ঞাসা করেছিল—যুদ্ধক্ষেত্রে নিজের প্রধান মহারথী ও ভ্রাতৃগণকে পরাজিত হতে দেখে সে শোকে আচ্ছন্ন হয়ে রাত্রিতে বিনীতভাবে মহাজ্ঞানী পিতামহ ভীষ্মের কাছে গিয়ে প্রশ্ন করেছিল; সেই কথাই আমি এখন বর্ণনা করছি—আমার মুখে শোনো।
Verse 29
दृष्टवा भ्रातृन् रणे सर्वान् निर्जितांस्तु महारथान् । शोकसम्मूढहदयो निशाकाले सम कौरव:
সঞ্জয় বললেন— রণক্ষেত্রে নিজের সকল মহারথী ভ্রাতাদের পরাজিত দেখে কুরুপুত্র দুর্যোধনের হৃদয় শোকে আচ্ছন্ন হয়ে গেল। রাত্রিকালে, বিষাদে ম্লানচিত্ত হয়ে, সে বিনয়ের সঙ্গে পরমপ্রাজ্ঞ পিতামহ ভীষ্মের নিকট গিয়ে প্রশ্ন করল। হে মহারাজ, সে যা জিজ্ঞাসা করেছিল, তাই আমি বলছি—শুনুন।
Verse 30
पितामहं महाप्राज्ञं विनयेनोपगम्य ह । यदब्रवीत् सुतस्ते5सौ तन्मे शृणु जनेश्वर
সঞ্জয় বললেন— মহাপ্রাজ্ঞ পিতামহ ভীষ্মের নিকট বিনয়ের সঙ্গে গিয়ে আপনার সেই পুত্র যা বলেছিল, হে জনেশ্বর, তা আমার মুখে শুনুন।
Verse 31
दुर्योधन उवाच द्रोणश्न त्वं च शल्यश्न कृपो द्रोणिस्तथैव च | कृतवर्मा च हार्दिक्य: काम्बोजश्न सुदक्षिण:
দুর্যোধন বলল— পিতামহ! দ্রোণ, আপনি, শল্য; কৃপ, এবং দ্রোণিপুত্র অশ্বত্থামা; হৃদীকের পুত্র কৃতবর্মা; আর কাম্বোজদের সुदক্ষিণ—এরা সকলেই আমাদের পক্ষের অগ্রগণ্য যোদ্ধা।
Verse 32
भूरिश्रवा विकर्णश्र भगदत्तश्न वीर्यवान् । महारथा: समाख्याता: कुलपुत्रास्तनुत्यज:
দুর্যোধন বলল— ভূরিশ্রবা, বিকর্ণ এবং বীর্যবান ভগদত্ত—এদেরও মহারথী বলে ঘোষণা করা হয়। এরা সকলেই উচ্চকুলজাত, এবং আমার জন্য যুদ্ধে দেহ ত্যাগ করতেও প্রস্তুত।
Verse 33
त्रयाणामपि लोकानां पर्याप्ता इति मे मति: । पाण्डवानां समस्ताश्न नातिष्ठन्त पराक्रमे
আমার তো এই বিশ্বাস—আপনারা সকলে একত্র হলে তিন লোকও জয় করতে সক্ষম; তবু পাণ্ডবদের পরাক্রমের সামনে আপনারা স্থির থাকতে পারেন না। এর কারণ কী? দয়া করে বলুন।
Verse 34
तत्र मे संशयो जातस्तन्ममाचक्ष्व पृच्छत: । यं समाश्रित्य कौन्तेया जयन्त्यस्मान् क्षणे क्षणे
এ বিষয়ে আমার মনে গভীর সংশয় জেগেছে; তাই আমি যেমন জিজ্ঞাসা করছি, তেমনই উত্তর দাও। কার আশ্রয়ে কুন্তীপুত্রেরা ক্ষণে ক্ষণে আমাদের পরাজিত করছে?
Verse 35
भीष्म उवाच शृणु राजन् वचो महां यथा वक्ष्यामि कौरव । बहुशश्न मयोक्तोडसि न च मे तत् त्वया कृतम्
ভীষ্ম বললেন—হে রাজন, হে কৌরব! আমার কথা শোনো; আমি যেমন বলব তেমনই গ্রহণ করো। এ কথা আমি তোমাকে বহুবার বলেছি, কিন্তু তুমি তা মানোনি।
Verse 36
क्रियतां पाण्डवै: सार्थ शमो भरतसत्तम । एतत् क्षेममहं मन्ये पृथिव्यास्तव वा विभो,भरतश्रेष्ठ। तुम पाण्डवोंके साथ संधि कर लो। प्रभो! इसीमें मैं तुम्हारा और भूमण्डलका कल्याण समझता हूँ
হে ভরতশ্রেষ্ঠ! পাণ্ডবদের সঙ্গে সন্ধি করো। হে প্রভু! আমি এটিকেই তোমার এবং পৃথিবীর মঙ্গল বলে মনে করি।
Verse 37
भुड्क्ष्वेमां पृथिवीं राजन् भ्रातृभि: सहित: सुखी । दुर्हदस्तापयन् सर्वान् नन्दयंश्वापि बान्धवान्
হে রাজন! ভ্রাতৃগণের সঙ্গে একত্রে সুখে থেকো, এই পৃথিবীর রাজ্য ভোগ করো—দুর্জন শত্রুদের দুঃখ দাও, আর আত্মীয়স্বজনকে আনন্দিত করো।
Verse 38
न च मे क्रोशतस्तात श्रुतवानसि वै पुरा । तदिदं समनुप्राप्तं यत् पाण्डूनवमन्यसे
হে বৎস! আমি আগে সতর্ক করে উচ্চস্বরে বহুবার বলেছিলাম, কিন্তু তুমি শোনোনি। পাণ্ডুপুত্রদের যে তুমি অবমাননা করেছ, আজ তারই ফল তোমার ওপর এসে পড়েছে।
Verse 39
यश्च हेतुरवध्यत्वे तेषामक्लिष्टकर्मणाम् । तं शृुणुष्व महाबाहो मम कीर्तयतः प्रभो,महाबाहो! प्रभो! अनायास ही महान् कर्म करनेवाले पाण्डवोंके अवध्य होनेमें जो हेतु है, उसे बताता हूँ, सुनो
হে মহাবাহু প্রভু! যাঁদের কর্ম ক্লেশহীন ও কলুষরহিত—সেই পাণ্ডবদের অবধ্যতার যে কারণ, তা আমি বলছি; শোনো।
Verse 40
नास्ति लोकेषु तद् भूतं भविता नो भविष्यति । यो जयेत् पाण्डवान् सर्वान् पालिताउ्छार्ड्र्धन्वना
লোকসমূহে এমন কোনো সত্তা কখনও ছিল না, এখন নেই, ভবিষ্যতেও হবে না—যে শার্ঙ্গধনু-ধারী শ্রীকৃষ্ণের দ্বারা রক্ষিত এই সকল পাণ্ডবকে জয় করতে পারে। আর দেব, অসুর ও মানুষের মধ্যেও এমন কেউ নেই, যে হরিকে তত্ত্বতঃ যথার্থরূপে জানতে পারে।
Verse 41
यत् तु मे कथितं तात मुनिभिर्भावितात्मभि: । पुराणगीतं धर्मज्ञ तच्छुणुष्व यथातथम्,तात धर्मज्ञ! पवित्र अन्तःकरणवाले मुनियोंने मुझसे जो पुराणप्रतिपादित यथार्थ बातें कही हैं, उन्हें बताता हूँ, सुनो
হে তাত, ধর্মজ্ঞ! নির্মলচিত্ত মুনিগণ আমাকে যে পুরাণগীত সত্য কথা বলেছেন, তা যেমন তেমনই শোনো।
Verse 42
पुरा किल सुरा: सर्वे ऋषयश्न समागता: । पितामहमुपासेदु: पर्वते गन्धमादने,पहलेकी बात है, समस्त देवता और महर्षि गन्धमादन पर्वतपर आकर पितामह ब्रह्माजीके पास बैठे
প্রাচীন কালে—সমস্ত দেবতা ও ঋষিগণ একত্রিত হয়ে গন্ধমাদন পর্বতে পিতামহ ব্রহ্মার সেবা-উপাসনায় উপস্থিত হলেন।
Verse 43
तेषां मध्ये समासीन: प्रजापतिरपश्यत । विमान प्रज्वलद् भासा स्थितं प्रवरमम्बरे,उस समय उनके बीचमें बैठे हुए प्रजापति ब्रह्माने आकाशमें खड़ा हुआ एक श्रेष्ठ विमान देखा, जो अपने तेजसे प्रज्वलित हो रहा था
তাদের মধ্যেই আসীন প্রজাপতি ব্রহ্মা আকাশে স্থিত এক শ্রেষ্ঠ বিমান দেখলেন, যা নিজ জ্যোতিতে প্রজ্বলিত হচ্ছিল।
Verse 44
ध्यानेनावेद्य तद् ब्रह्मा कृत्वा च नियतो55जलिम् । नमश्नकार हद्ृष्टात्मा पुरुषं परमेश्वरम्
ধ্যানের দ্বারা সেই সত্য উপলব্ধি করে, সংযতচিত্ত ব্রহ্মা করজোড়ে প্রণাম করলেন; আনন্দে পরিপূর্ণ হৃদয়ে তিনি পরম পুরুষ পরমেশ্বরকে নমস্কার জানালেন।
Verse 45
ऋषयस्त्वथ देवाश्न दृष्टवा ब्रह्माणमुत्थितम् स्थिता: प्राउजलय: सर्वे पश्यन्तो महदद््भुतम्
তখন ঋষি ও দেবগণ ব্রহ্মাকে উঠতে ও করজোড়ে দাঁড়িয়ে থাকতে দেখে, সেই মহৎ ও অদ্ভুত তেজের দর্শন করতে করতে—সকলেই করজোড়ে দাঁড়িয়ে রইলেন।
Verse 46
यथावच्च तम भ्यर्च्य ब्रह्मा ब्रह्मविदां वर: । जगाद जगत: स्त्रष्टा परं परमधर्मवित्
ব্রহ্মবিদ্যাজ্ঞদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ, পরম ধর্মজ্ঞ, জগতের স্রষ্টা ব্রহ্মা যথাবিধি সেই তেজোময় পরম পুরুষের পূজা করে, স্তব করতে করতে বললেন।
Verse 47
विश्वावसुर्विश्वमूर्ति वि श्लेशो विष्वक्सेनो विश्वकर्मा वशी च । विश्वेश्वरो वासुदेवो$सि तस्माद् योगात्मान दैवतं त्वामुपैमि
প্রভো! আপনি সর্বব্যাপী, বিশ্বস্বরূপ এবং বিশ্বের অধীশ্বর। সর্বত্র আপনারই সেনা; এই বিশ্ব আপনারই কর্ম; আপনি সকলকে বশে রাখেন। তাই আপনাকে বিশ্বেশ্বর ও বাসুদেব বলা হয়। হে যোগাত্মন দেবতা, আমি আপনার শরণাগত।
Verse 48
जय विश्व महादेव जय लोकहिते रत । जय योगीश्वर विभो जय योगपरावर
জয় হোক বিশ্বরূপ মহাদেবের! জয় হোক লোকহিতে রত পরমেশ্বরের! জয় হোক সর্বব্যাপী যোগীশ্বর বিভোর! জয় হোক যোগের আদিও অন্ত, সেই মহাদেবের!
Verse 49
पद्मगर्भ विशालाक्ष जय लोकेश्ररेश्वर । भूतभव्यभवन्नाथ जय सौम्यात्मजात्मज
পদ্মগর্ভ, বিশালনয়ন! লোকেশ্বরদেরও ঈশ্বর—জয় হোক তোমার। ভূত, ভবিষ্যৎ ও বর্তমানের অধিপতি—জয় হোক তোমার। তোমার রূপ সৌম্য ও মঙ্গলময়; আমি স্বয়ম্ভূ ব্রহ্মা তোমার পুত্র। অসংখ্য গুণের আধার, সকলের আশ্রয়দাতা—জয় হোক তোমার। শার্ঙ্গধনু ধারণকারী নারায়ণ! তোমার মহিমার পার পাওয়া অতি দুরূহ—জয় হোক তোমার।
Verse 50
असंख्येयगुणाधार जय सर्वपरायण । नारायण सुदुष्पार जय शार्ज्ुधनुर्धर
অসংখ্য গুণের আধার, সকলের পরম আশ্রয়—জয় হোক তোমার। নারায়ণ, যাঁর মহিমা অতিক্রম করা দুরূহ; শার্ঙ্গধনু-ধারী—জয় হোক তোমার। যাঁর নাভি থেকে আদ্য পদ্মের উদ্ভব, যাঁর নয়ন বিশাল, যিনি লোকেশ্বরদেরও ঈশ্বর—জয় হোক তোমার। ভূত-ভবিষ্যৎ-বর্তমানের অধিপতি, সৌম্য স্বরূপ—জয় হোক তোমার; স্বয়ম্ভূ ব্রহ্মাও তোমাকে জনক জেনে পুত্র বলে পরিচিত।
Verse 51
जय सर्वगुणोपेत विश्वमूर्ते निरामय । विश्वेश्वर महाबाहो जय लोकार्थतत्पर
সমস্ত মঙ্গলময় গুণে সমন্বিত, বিশ্বরূপ, নিরাময়—জয় হোক তোমার। হে মহাবাহু বিশ্বেশ্বর! যিনি লোকসমূহের সত্য কল্যাণ ও ধর্মসম্মত উদ্দেশ্য সাধনে সদা তৎপর—জয় হোক তোমার।
Verse 52
महोरग वराहाद्य हरिकेश विभो जय । हरिवास दिशामीश विश्ववासामिताव्यय
মহান শेषনাগ ও মহাবরাহ প্রভৃতি রূপ ধারণকারী, হরিকেশ, বিভো—জয় হোক তোমার। পীতাম্বরধারী, দিকসমূহের অধীশ, বিশ্বাধার, অপরিমেয় ও অবিনশ্বর—জয় হোক তোমার।
Verse 53
व्यक्ताव्यक्तामितस्थान नियतेन्द्रिय सत्क्रिय । असंख्येयात्मभावज्ञ जय गम्भीर कामद
ব্যক্ত ও অব্যক্ত—উভয়ই তোমারই স্বরূপ; তোমার অধিষ্ঠান অসীম-অনন্ত; তুমি ইন্দ্রিয়সমূহের নিয়ন্তা। তোমার সকল কর্মই সৎ ও মঙ্গলময়; তুমি অগণন ও অপরিমেয়; তুমি আত্মভাবের তত্ত্বজ্ঞ। স্বভাবতই তুমি গভীর, আর ভক্তদের কামনা পূর্ণ কর—জয় হোক তোমার।
Verse 54
अनन्तविदित ब्रह्मन् नित्य भूतविभावन । कृतकार्य कृतप्रज्ञ धर्मज्ञ विजयावह
হে ব্রহ্মন্! আপনি অনন্ত-জ্ঞানস্বরূপ, নিত্য এবং সকল ভূতের উৎপত্তিকারক। আপনার আর কিছু করণীয় অবশিষ্ট নেই; আপনার প্রজ্ঞা পবিত্র। আপনি ধর্মতত্ত্বজ্ঞ এবং বিজয়দাতা।
Verse 55
गुह्मात्मन् सर्वयोगात्मन् स्फुटं सम्भूतसम्भव । भूताद्य लोकतत्त्वेश जय भूतविभावन
হে গূঢ়াত্মন্, সর্বযোগস্বরূপ! সূক্ষ্ম হয়েও আপনি স্পষ্ট; যা ঘটেছে এবং যা ঘটছে—সবই আপনারই রূপ। আপনি সকল ভূতের আদিকারণ এবং লোকতত্ত্বের অধীশ্বর। হে ভূতভাবন! আপনার জয় হোক।
Verse 56
आत्मयोने महाभाग कल्पसंक्षेप तत्पर । उद्भावनमनोभाव जय ब्रह्म जनप्रिय
হে আত্মযোনে! আপনি স্বয়ম্ভূ ও মহাভাগ। আপনি এই কল্পের সংহার সাধনে তৎপর, বিশুদ্ধ পরব্রহ্ম। ধ্যান করলে অন্তঃকরণে আপনার আবির্ভাব ঘটে। হে জনপ্রিয় পরব্রহ্ম! আপনার জয় হোক।
Verse 57
निसर्गसर्गनिरत कामेश परमेश्वर । अमृतोद्धव सद्भाव मुक्तात्मन् विजयप्रद
আপনি স্বভাবতই জগতের স্বতঃস্ফূর্ত উদ্ভব ও বিধিবদ্ধ সৃষ্টিতে সদা নিয়োজিত। আপনি সকল কামনার অধীশ্বর, পরমেশ্বর। অমৃতের উৎস, সত্যস্বরূপ, মুক্তাত্মা এবং বিজয়দাতা—আপনিই।
Verse 58
प्रजापतिपते देव पद्मनाभ महाबल । आत्मभूत महाभूत सत्त्वात्मन् जय सर्वदा,देव! आप ही प्रजापतियोंके भी पति, पद्मनाभ और महाबली हैं। आत्मा और महाभूत भी आप ही हैं। सत्त्वस्वरूप परमेश्वर! सदा आपकी जय हो
হে দেব! আপনি প্রজাপতিদেরও অধিপতি, পদ্মনাভ, মহাবলী। আপনি অন্তর্যামী আত্মা এবং আপনিই মহাভূতসমূহ। হে সত্ত্বস্বরূপ পরমেশ্বর! সদা আপনার জয় হোক।
Verse 59
पादौ तव धरा देवी दिशो बाहू दिवं शिर: । मूर्तिस्ते5हं सुरा: कायश्नन्द्रादित्यौ च चक्षुषी
ভীষ্ম বললেন— হে প্রভু! পৃথিবীদেবী আপনার চরণ; দিকসমূহ আপনার বাহু; আর দ্যুলোক আপনার মস্তক। আমি আপনার মূর্তি; দেবগণ আপনার অঙ্গ-প্রত্যঙ্গ; এবং চন্দ্র ও সূর্য আপনার দুই নয়ন।
Verse 60
बल॑ तपश्न सत्यं च कर्म धर्मात्मकं तव । तेजोडग्नि: पवन: श्वास आपस्ते स्वेदसम्भवा:,तप और सत्य आपका बल है तथा धर्म और कर्म आपका स्वरूप है। अग्नि आपका तेज, वायु साँस और जल पसीना है
ভীষ্ম বললেন— তপস্যা ও সত্যই আপনার বল; আর ধর্ম ও সৎকর্ম আপনার স্বভাব-স্বরূপ। আপনার তেজ অগ্নি; আপনার শ্বাস বায়ু; এবং আপনার স্বেদ থেকে জলসমূহ উৎপন্ন।
Verse 61
अश्रिनौ श्रवणाौ नित्यं देवी जिह्नला सरस्वती । वेदा: संस्कारनिष्ठा हि त्वयीदं जगदाश्रितम्
ভীষ্ম বললেন— অশ্বিনীকুমারদ্বয় সদা আপনার কর্ণ; আর দেবী সরস্বতী আপনার জিহ্বা। বেদসমূহ আপনার সংস্কার-নিষ্ঠা; এই সমগ্র জগৎ নিরন্তর আপনারই আশ্রয়ে স্থিত।
Verse 62
न संख्यानं परीमाणं न तेजो न पराक्रमम् । न बल॑ योगयोगीश जानीमस्ते न सम्भवम्
ভীষ্ম বললেন— হে যোগযোগীশ! আমরা না আপনার সংখ্যা জানি, না পরিমাপ। আপনার তেজ, পরাক্রম ও বলও আমাদের অগম্য; আর আপনার আবির্ভাব কীভাবে হয় তাও আমরা জানি না।
Verse 63
त्वद्धक्तिनिरता देव नियमैस्त्वां समाश्रिता: । अर्चयाम: सदा विष्णो परमेशं महेश्वरम्
ভীষ্ম বললেন— হে দেব! আপনার ভক্তিতে নিবিষ্ট হয়ে এবং নিয়ম-আচারে সংযত থেকে আমরা আপনারই আশ্রয় গ্রহণ করি। হে বিষ্ণো! আমরা সদা আপনাকেই—পরমেশ্বর, মহেশ্বর—অর্চনা করি।
Verse 64
इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें चौथे दिनका युद्धविरामविषयक चौसठवाँ अध्याय पूरा हुआ,ऋषयो देवगन्धर्वा यक्षराक्षसपन्नगा: । पिशाचा मानुषाश्वैव मृगपक्षिसरीसूपा:
ঋষি, দেব-গন্ধর্ব, যক্ষ-রাক্ষস ও পন্নগ; পিশাচ, মানুষ, এবং মৃগ, পক্ষী ও সরীসৃপ—সকলেই সেখানে উপস্থিত ছিল।
Verse 65
एवमादि मया सृष्टं पृथिव्यां त्वत्प्रसादजम् | देव! हम तो आपकी उपासनामें लगे रहते हैं। आपके नियमोंका पालन करते हुए आपके ही शरण हैं। विष्णो! हम सदा आप परमेश्वर एवं महेश्वरका पूजन ही करते हैं। आपकी ही कृपासे हमने पृथ्वीपर ऋषि
ভীষ্ম বললেন—“দেব! পৃথিবীতে যে এই সমগ্র সৃষ্টি প্রকাশিত হয়েছে, তা আপনারই প্রসাদে। আমরা সদা আপনার উপাসনায় নিবিষ্ট; আপনার বিধান পালন করে কেবল আপনারই শরণ গ্রহণ করি। হে বিষ্ণো! আপনাকেই পরমেশ্বর ও মহেশ্বর জেনে নিরন্তর পূজা করি। আপনার কৃপায়ই পৃথিবীতে ঋষি, দেবতা, গন্ধর্ব, যক্ষ, রাক্ষস, সর্প, পিশাচ, মানুষ, মৃগ, পক্ষী এবং ক্ষুদ্র কীট-পতঙ্গেরও সৃষ্টি হয়েছে।”
Verse 66
त्वं गति: सर्वभूतानां त्वं नेता त्वं जगदगुरु: । त्वत्प्रसादेन देवेश सुखिनो विबुधा: सदा
আপনিই সকল প্রাণীর গতি, আপনিই নেতা, আপনিই জগতের গুরু। হে দেবেশ্বর! আপনার প্রসাদেই দেবগণ সদা সুখী থাকেন।
Verse 67
पृथिवी निर्भया देव त्वत्प्रसादात्ू सदाभवत् । तस्माद् भव विशालाक्ष यदुवंशविवर्धन:
দেব! আপনার প্রসাদে পৃথিবী সদা নির্ভয় থেকেছে। অতএব, হে বিশালনয়ন! আবার পৃথিবীতে যদুবংশবর্ধক রূপে অবতীর্ণ হয়ে তার কীর্তি বৃদ্ধি করুন।
Verse 68
धर्मसंस्थापनार्थाय दैत्यानां च वधाय च । जगतो धारणार्थाय विज्ञाप्यं कुरु मे विभो
ধর্ম প্রতিষ্ঠার জন্য, দৈত্যদের বিনাশের জন্য, এবং জগতকে ধারণ করার জন্য—হে বিভো! আমার এই নিবেদন গ্রহণ করে আপনার উদ্দেশ্য প্রকাশ করুন।
Verse 69
प्रभो! धर्मकी स्थापना, दैत्योंके वध और जगतकी रक्षाके लिये हमारी प्रार्थना अवश्य स्वीकार कीजिये ।।
ভীষ্ম বললেন— প্রভু! ধর্ম প্রতিষ্ঠা, দৈত্যদের বিনাশ এবং জগতের রক্ষার জন্য আমাদের প্রার্থনা গ্রহণ করুন। হে সর্বব্যাপী, হে বাসুদেব! আপনার কৃপায় আপনার সেই পরম ও পরম-গুপ্ত তত্ত্ব এখানে আমার দ্বারা যথাযথভাবে গীত হয়েছে।
Verse 70
सृष्टवा संकर्षणं देवं स्वयमात्मानमात्मना । कृष्ण त्वमात्मनासाक्षी: प्रद्मुम्नं चात्मसम्भवम्
ভীষ্ম বললেন— হে শ্রীকৃষ্ণ! তুমি তোমারই আত্মস্বরূপ দ্বারা নিজেকেই দেব সংকর্ষণ রূপে প্রকাশ করেছ; এবং আবার তোমারই সত্তা থেকে আত্মসম্ভব প্রদ্যুম্নকে উৎপন্ন করেছ। তুমি অন্তর্যামী সাক্ষী—স্বয়ংসিদ্ধ, স্বয়ম্ভূ, এবং নিজেরই বিকাশগুলির আদিকারণ।
Verse 71
प्रद्युम्नादनिरुद्ध त्वं यं विदुर्विष्णुमव्ययम् । अनिरुद्धो$सृजन्मां वै ब्रह्माणं लोकधारिणम्
ভীষ্ম বললেন— প্রদ্যুম্ন থেকে তুমিই অনিরুদ্ধকে প্রকাশ করেছ, যাঁকে জ্ঞানীরা অবিনাশী বিষ্ণু রূপে জানেন। আর সেই বিষ্ণুরূপ অনিরুদ্ধই লোকধারী আমাকে—ব্রহ্মাকে—সৃষ্টি করেছেন।
Verse 72
वासुदेवमय: सोऊहं त्वयैवास्मि विनिर्मित: । (तस्माद् याचामि लोकेश चतुरात्मानमात्मना ।) विभज्य भागशो&5त्मानं व्रज मानुषतां विभो
ভীষ্ম বললেন— তোমার দ্বারাই আমি নির্মিত; আর তোমার সঙ্গে অভিন্ন বলে আমিও বাসুদেবময়। অতএব, হে লোকেশ! আমি প্রার্থনা করি—তুমি নিজ আত্মাকে চার ভাগে বিভক্ত করে, অংশে অংশে মানবভাব গ্রহণ করো। হে বিভো! বাসুদেব, সংকর্ষণ, প্রদ্যুম্ন ও অনিরুদ্ধ—এই চার রূপে মানবদেহ ধারণ করো।
Verse 73
तत्रासुरवधं कृत्वा सर्वलोकसुखाय वै । धर्म प्राप्प यश: प्राप्य योगं प्राप्स्पसि तत्त्वत:
ভীষ্ম বললেন— সেখানে সকল লোকের মঙ্গলের জন্য অসুরদের বিনাশ করে ধর্মের বৃদ্ধি করো এবং যশ অর্জন করো। তারপর তত্ত্বতঃ যোগকে প্রাপ্ত হয়ে—অর্থাৎ অবতারকার্য সম্পূর্ণ করে—তোমার পরম স্বরূপের সঙ্গে পুনরায় যুক্ত হও।
Verse 74
त्वां हि ब्रह्मर्षयो लोके देवाश्षामितविक्रम । तैस्तैहिं नामभिर्युक्ता गायन्ति परमात्मकम्
ভীষ্ম বললেন— হে অপরিমেয় পরাক্রমশালী পরমেশ্বর! এই জগতে ব্রহ্মর্ষি ও দেবগণ একাগ্রচিত্ত হয়ে আপনার নানা লীলার অনুরূপ বহু নামে আপনাকে পরমাত্মা রূপে নিরন্তর স্তব করেন।
Verse 75
स्थिताश्च सर्वे त्वयि भूतसंघा: कृत्वा55श्रयं त्वां वरदं सुबाहो । अनादिमध्यान्तमपारयोगं लोकस्य सेतु प्रवदन्ति विप्रा:
ভীষ্ম বললেন— হে সুবাহু, বরদাতা প্রভু! সকল জীবসমূহ আপনারই আশ্রয় গ্রহণ করে আপনার মধ্যেই প্রতিষ্ঠিত। বিপ্রগণ আপনাকে আদিমধ্যান্তহীন, সীমা-পরিমাপের অতীত এবং লোকধর্ম-ব্যবস্থা রক্ষার জন্য সেতুরূপ বলে ঘোষণা করেন।
Verse 86
समुद्रस्पेव महतो भुजाभ्यां प्रतरन् नर: । जैसे अपनी भुजाओंसे तैरनेवाला मनुष्य महासागरका पार नहीं पा सकता, उसी प्रकार मैं इस दुःखका अन्त किसी प्रकार नहीं देखता हूँ
ধৃতরাষ্ট্র বললেন— যেমন একজন মানুষ কেবল নিজের বাহুবলে সাঁতরে মহাসমুদ্রের অপর পারে পৌঁছাতে পারে না, তেমনি আমি এই দুঃখের কোনো শেষ দেখতে পাচ্ছি না।
Verse 93
घातयिष्यति मे सर्वान् पुत्रान् भीमो न संशय: । निश्चय ही मेरे पुत्रोंपर अत्यन्त भयंकर संकट प्राप्त हो गया है। मेरा विश्वास है कि भीमसेन मेरे सभी पुत्रोंकोी मार डालेंगे, इसमें संशय नहीं है
ধৃতরাষ্ট্র বললেন— ভীম নিশ্চয়ই আমার সকল পুত্রকে বধ করবে; এতে কোনো সন্দেহ নেই।
Verse 196
निष्ठरा हीनकर्माणस्तेन हीयन्ति संयुगे । महाराज! धर्मके ही कारण दुन्तीके पुत्र युद्धमें अवध्य और विजयी हो रहे हैं। इधर आपके दुरात्मा पुत्र सदा पापोंमें ही तत्पर रहते हैं। निर्दय होनेके साथ ही निकृष्ट कर्ममें लगे रहते हैं। इसीलिये युद्धस्थलमें उन्हें हानि उठानी पड़ती है
সঞ্জয় বললেন— মহারাজ! যারা নিষ্ঠুর এবং নীচ কর্মে লিপ্ত, তারা সেই আচরণের ফলেই যুদ্ধে ক্ষয়প্রাপ্ত হয়। ধর্মের বলেই কুন্তীপুত্রগণ যুদ্ধে অবধ্য ও বিজয়ী হচ্ছে। কিন্তু আপনার পুত্রেরা সদা পাপে রত, ক্রূর ও নীচ কর্মে প্রবৃত্ত; তাই রণক্ষেত্রে তাদের ক্ষতি ভোগ করতে হয়।
The chapter implicitly stages duty versus attachment: warriors execute assigned roles against relatives and allies, where obedience to command and protection of the host compete with personal bonds and individual rivalries.
Operational discipline matters: decisive containment of a high-impact opponent (Bhīmasena) and disruption of enemy mobility (Sātyaki’s chariot) can alter collective morale and local outcomes more than isolated heroics.
No explicit phalaśruti appears in this unit; its significance is contextual—documenting how tactical decisions and battlefield perception (dust, obscured directions) shape consequence within the epic’s dharma-and-karma framework.
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