
पात्रलक्षण-परिक्षा (Pātra-Lakṣaṇa Parīkṣā) — Criteria for a Worthy Recipient
Upa-parva: Dāna-Dharma and Pātra-Parīkṣā (Recipient-Assessment) Discourse
Yudhiṣṭhira asks Bhīṣma to define what makes a person a proper recipient (pātra), including whether novelty (apūrva), long absence (ciroṣita), or distant arrival (dūrād-abhyāgata) confer worthiness. Bhīṣma responds by distinguishing superficial markers from ethical substance: certain practices may appear meritorious (including vows performed quietly), but coercing or burdening one’s dependents undermines the self. He affirms that newcomers, long-absent persons, and those arriving from afar can be considered worthy, yet the decisive criterion is the presence of stable virtues—non-anger, truthfulness, non-harm, self-control, straightforwardness, non-malice, humility, modesty, endurance, austerity, and tranquility—without contrary misconduct. He warns against anti-scriptural postures (disparaging Veda and śāstra), inconsistent behavior, and performative disputation: a self-styled learned critic who indulges in sterile logic, harsh speech, and antagonism toward brāhmaṇas is socially corrosive and should not be treated as a recipient of honor. The chapter concludes by recommending association with genuinely learned, tradition-grounded scholars (versed in śruti, smṛti, itihāsa, purāṇa, and related disciplines) and by outlining the householder’s sequential discharge of obligations—debts to gods, sages, ancestors, learned persons, and guests—through purified action, thereby preserving dharma.
Chapter Arc: शरशय्या पर लेटे भीष्म युधिष्ठिर से कहते हैं—राजधर्म की जड़ ब्राह्मण-सत्कार है; जो समाज ब्राह्मण को निरादर करता है, वह अपने ही पुण्य-स्तम्भ को काट देता है। → भीष्म ब्राह्मणों की अनिवार्य पूज्यता का विधान करते हैं: भोग, अलंकार, और अन्य इच्छित वस्तुओं से उन्हें संतुष्ट करो; उन्हें पिता के समान रक्ष्य मानो। फिर वे यज्ञ-तत्त्व जोड़ते हैं—ब्राह्मण को दिया हुआ हवि देवता ग्रहण करते हैं; ब्राह्मण-तृप्ति से पितर और देवता स्वतः तृप्त होते हैं। पृथ्वी स्वयं वाणी बनकर कहती है कि ब्राह्मण-सेवा से रज (पाप-धूल) नष्ट होती है और कीर्ति-बुद्धि-समृद्धि जन्म लेती है। → निर्णायक प्रतिज्ञा-सा निष्कर्ष उभरता है: 'तथैव देवता राजन्—नात्र कार्या विचारणा'—हे राजन्, इसमें संशय नहीं; ब्राह्मण संतुष्ट हों तो देवता-पितर सदा प्रसन्न। और जो ब्राह्मणों का अनुसरण करते हैं वे न पराभव को प्राप्त होते हैं, न प्रेत्य विनश्यन्ति—मरणोत्तर भी उनकी गति ऊँची होती है। → भीष्म कर्म-फल की सरल कुंजी देते हैं: मनुष्य जिस-जिस हविष्य से ब्राह्मणों को तृप्त करता है, उसी-उसी से देवता और पितर तृप्त होते हैं; अतः राजाओं और गृहस्थों के लिए ब्राह्मण-पूजा, दान, नमस्कार और संरक्षण—ये ही स्थिर कल्याण के साधन हैं। → युधिष्ठिर के मन में यह प्रश्न जागता है कि ब्राह्मण-पूजा का आचरण किन सीमाओं और किन पात्रताओं के साथ किया जाए—अगले उपदेश में उसी का विस्तार संकेतित है।
Verse 1
(दाक्षिणात्य अधिक पाठक $ “लोक मिलाकर २७३ श्लोक हैं) नफमशा+ (0) आज अन+- चतुस्त्रिंशो 5 ध्याय: श्रेष्ठ ब्राह्मणोंकी प्रशंसा भीष्म उवाच ब्राह्मणानेव सततं भृशं सम्परिपूजयेत् । एते हि सोमराजान ईश्वरा: सुखदुःखयो:
ভীষ্ম বললেন— হে যুধিষ্ঠির! ব্রাহ্মণদের সর্বদা আন্তরিকভাবে ও গভীর শ্রদ্ধায় পূজা করা উচিত। তাঁরা যেন সুখ-দুঃখের অধিকারী শক্তি; আর সোম (চন্দ্র) তাঁদের রাজা বলে কথিত।
Verse 2
एते भोगैरलड्कारैरन्यैश्वैव किमिच्छकै: । सदा पूज्या नमस्कारै रक्ष्याश्व॒ पितृवन्नूपै:
ভোগ, অলংকার বা অন্য কোনো কাম্য সম্পদেরই বা তাঁদের কী প্রয়োজন? তাঁরা সর্বদা নমস্কারে পূজ্য, এবং রাজাদের দ্বারা পিতার মতো রক্ষিত হওয়ার যোগ্য।
Verse 3
जायतां ब्रह्मवर्चस्वी राष्ट्रे वै ब्राह्मण: शुचि:
রাজ্যে ব্রহ্মতেজে দীপ্ত, শুচি আচারসম্পন্ন ব্রাহ্মণের জন্ম হোক।
Verse 4
ब्राह्मणं जातिसम्पन्नं धर्मज्ञ संशितव्रतम्
সুকুলজাত, ধর্মজ্ঞ এবং দৃঢ়ব্রতী ব্রাহ্মণ—
Verse 5
ब्राह्मणेभ्यो हविर्दत्तं प्रतिगृह्लन्ति देवता:
ব্রাহ্মণদেরকে দেওয়া হবি (যজ্ঞাহুতি) দেবতারা গ্রহণ করেন।
Verse 6
आदित्यश्रन्द्रमा वायुरापो भूरम्बरं दिश:
ভীষ্ম বললেন—সূর্য, চন্দ্র, বায়ু, জল, পৃথিবী, আকাশ ও দিকসমূহ—এরা সকলেই ধর্মের নিত্য সাক্ষী ও ভিত্তি।
Verse 7
न तस्याश्रन्ति पितरो यस्य विप्रा न भुज्जते
ভীষ্ম বললেন—যার গৃহে ব্রাহ্মণেরা ভোজন করেন না, তার পিতৃগণ তৃপ্ত হন না।
Verse 8
ब्राह्मणेषु तु तुष्टेषु प्रीयन्ते पितर: सदा
ভীষ্ম বললেন—ব্রাহ্মণেরা তুষ্ট হলে পিতৃগণ সর্বদা প্রসন্ন হন।
Verse 9
तथैव ते>पि प्रीयन्ते येषां भवति तद्धवि:
ভীষ্ম বললেন—তেমনি যাদের ভাগে সেই হবি পড়ে, তারাও প্রসন্ন হন।
Verse 10
येन येनैव हविषा ब्राह्म॒णांस्तर्पयेन्नर:
ভীষ্ম বললেন—মানুষ যে যে হবি দ্বারা ব্রাহ্মণদের তৃপ্ত করে, সেই দ্বারাই সে ধর্ম পালন করে।
Verse 11
ब्राह्मणादेव तद् भूतं प्रभवन्ति यत: प्रजा:
ভীষ্ম বললেন—যে তত্ত্ব থেকে সমগ্র প্রজা উৎপন্ন হয়, তা ব্রাহ্মণ থেকেই প্রকাশিত; আর সমাজকে ধারণকারী যজ্ঞাদি ধর্মকর্মও ব্রাহ্মণদের দ্বারাই বিধিপূর্বক সম্পন্ন হয়। জীব যেখানে থেকে জন্মায় এবং মৃত্যুর পরে যেখানে গমন করে, সেই সত্য ব্রাহ্মণ জানেন; তিনি স্বর্গ ও নরকের পথ, এবং অতীত-বর্তমান-ভবিষ্যৎও অবগত। অতএব মানুষের মধ্যে ব্রাহ্মণকে শ্রেষ্ঠ বলা হয়। কিন্তু, হে ভরতশ্রেষ্ঠ, যে ব্যক্তি নিজের ধর্ম যথার্থ জেনে তদনুযায়ী আচরণ করে, সেই-ই প্রকৃত ব্রাহ্মণ।
Verse 12
यतक्षायं प्रभवति प्रेत्य यत्र च गच्छति । वेदैष मार्ग स्वर्गस्य तथैव नरकस्य च
ভীষ্ম বললেন—যে তত্ত্ব থেকে জীবের উদ্ভব হয় এবং মৃত্যুর পরে যেখানে সে গমন করে, আর বেদবিহিত স্বর্গের পথ ও তদ্রূপ নরকের পথ—এসবই বেদের দ্বারা জ্ঞেয়। এই উপদেশে ভীষ্ম দেখান যে প্রকৃত উৎকর্ষ ধর্মকে জানা ও ধর্মানুযায়ী জীবনযাপনেই; কারণ এই জ্ঞানই জীবের উৎপত্তি, আচরণ ও চূড়ান্ত গন্তব্যকে পথ দেখায়।
Verse 13
आगतानागते चोभे ब्राह्मणो द्विपदं वर: । ब्राह्मणो भरतश्रेष्ठ स्वरधर्म चैव वेद यः:
ভীষ্ম বললেন—ব্রাহ্মণ দ্বিপদদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ, কারণ তিনি অতীত ও অনাগত—উভয়ই জানেন। হে ভরতশ্রেষ্ঠ, যে ব্যক্তি নিজের স্বধর্ম যথার্থ জেনে তদনুযায়ী আচরণ করে, সেই-ই প্রকৃত ব্রাহ্মণ।
Verse 14
ये चैनमनुवर्तन्ते ते न यान्ति पराभवम् | नते प्रेत्य विनश्यन्ति गच्छन्ति न पराभवम्
ভীষ্ম বললেন—যারা ব্রাহ্মণদের অনুসরণ করে, তারা পরাভব লাভ করে না। মৃত্যুর পরেও তাদের বিনাশ বা পতন হয় না; তারা অপমান পায় না, বরং অধোগতি ছাড়া অগ্রসর হয়।
Verse 15
यद् ब्राह्मणमुखात् प्राप्तं प्रतिगृह्लन्ति वै वच: । भूतात्मानो महात्मानस्ते न यान्ति पराभवम्
ভীষ্ম বললেন—যে মহাত্মারা সকল প্রাণীর প্রতি সমভাবসম্পন্ন, তারা ব্রাহ্মণের মুখ থেকে উচ্চারিত বাক্যকে প্রমাণ জেনে গ্রহণ করে। এমন পুরুষ পরাভব বা বিনাশ লাভ করে না; কারণ তারা অহংকার বা আবেগ নয়, ধর্মসম্মত পথনির্দেশই বেছে নেয়।
Verse 16
ब्राह्मणके मुखसे जो वाणी निकलती है, उसे जो शिरोधार्य करते हैं, वे सम्पूर्ण भूतोंको आत्मभावसे देखनेवाले महात्मा कभी पराभवको नहीं प्राप्त होते हैं ।।
ব্রাহ্মণের মুখ থেকে যে বাণী নির্গত হয়, যাঁরা তাকে শিরোধার্য জ্ঞান করে হৃদয়ে ধারণ করেন, তাঁরা আত্মদৃষ্টিতে সর্বভূতকে দর্শনকারী মহাত্মা হন এবং কখনও পরাভব লাভ করেন না। কারণ তেজ ও বলের দম্ভে দীপ্ত ক্ষত্রিয়দের তেজ ও বলও ব্রাহ্মণের সন্নিধানে এসে শান্ত হয়; সেখানেই তাদের উগ্র শক্তি সংযত হয়।
Verse 17
अपने तेज और बलसे तपते हुए क्षत्रियोंके तेज और बल ब्राह्मणोंके सामने आनेपर ही शान्त होते हैं ।।
নিজ তেজ ও বলের দাহে দীপ্ত ক্ষত্রিয়দের তেজ-বল ব্রাহ্মণদের সম্মুখে এলেই শান্ত হয়ে যায়। হে ভরতশ্রেষ্ঠ! প্রাচীনকালে ভৃগুবংশীয় ব্রাহ্মণরা তালজঙ্ঘদের দমন করেছিলেন; অঙ্গিরসের বংশধররা নীপবংশীয় রাজাদের পরাস্ত করেছিলেন; আর ভরদ্বাজ হৈহয় ও ইলার পুত্রদের পরাজিত করেছিলেন।
Verse 18
चित्रायुधांश्षाप्पजयन्नेते कृष्णाजिनध्वजा: । प्रक्षिप्पाथ च कुम्भान् वै पारगामिनमारभेत्
ক্ষত্রিয়দের হাতে নানাবিধ বিচিত্র অস্ত্র থাকলেও কৃষ্ণাজিনধারী—কৃষ্ণমৃগচর্মকে ধ্বজা-চিহ্নরূপে ধারণকারী—এই ব্রাহ্মণরা তাদের পরাস্ত করেছিলেন। অতএব ক্ষত্রিয়ের উচিত পরলোকসাধক কর্মের আরম্ভে ব্রাহ্মণদের জলপূর্ণ কুম্ভ দান করা।
Verse 19
यत् किंचित् कथ्यते लोके श्रूयते पठ्यतेडपि वा । सर्व तद् ब्राह्मणेष्वेव गूढो ग्निरिव दारुषु,संसारमें जो कुछ कहा-सुना या पढ़ा जाता है वह सब काठमें छिपी हुई आगकी तरह ब्राह्मणोंमें ही स्थित है
জগতে যা কিছু বলা হয়, যা কিছু শোনা যায় বা পড়াও হয়—সবই ব্রাহ্মণদের মধ্যেই নিহিত, যেমন কাঠের মধ্যে অগ্নি গোপনে থাকে।
Verse 20
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । संवाद वासुदेवस्य पृथ्व्याश्व भरतर्षभ,भरतश्रेष्ठ] इस विषयमें जानकार लोग भगवान् श्रीकृष्ण और पृथ्वीके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं
হে ভরতশ্রেষ্ঠ! এ বিষয়েও জ্ঞানীরা এক প্রাচীন ইতিবৃত্তের দৃষ্টান্ত দেন—বাসুদেব (শ্রীকৃষ্ণ) ও পৃথিবীর সংলাপ।
Verse 21
वायुदेव उवाच मातरं सर्वभूतानां पृच्छे त्वां संशयं शुभे । केनस्वित् कर्मणा पाप॑ व्यपोहति नरो गृही
বায়ুদেব বললেন—শুভে! তুমি সকল জীবের জননী; তাই তোমার কাছে একটি সংশয় জিজ্ঞাসা করি। গৃহস্থ মানুষ কোন কর্মানুষ্ঠানে নিজের পাপ দূর করতে পারে?
Verse 22
पृथिव्युवाच ब्राह्मणानेव सेवेत पवित्र होतदुत्तमम् । ब्राह्मणान् सेवमानस्य रज: सर्व प्रणश्यति । अतो भूतिरत: कीर्तिरितो बुद्धि: प्रजायते
পৃথিবী বললেন—ভগবন! এর জন্য মানুষের উচিত ব্রাহ্মণদেরই সেবা করা; এটাই সর্বাধিক পবিত্র ও শ্রেষ্ঠ কর্ম। ব্রাহ্মণসেবায় রত ব্যক্তির সমস্ত রজোগুণ বিনষ্ট হয়। এর থেকেই ঐশ্বর্য, এর থেকেই কীর্তি, এবং এর থেকেই উত্তম বুদ্ধির জন্ম হয়।
Verse 23
महारथश्न राजन्य एष्टव्य: शत्रुतापन: । इति मां नारद: प्राह सततं सर्वभूतये
বায়ুদেব বললেন—হে রাজন! শত্রুদের দগ্ধকারী এক মহারথী ক্ষত্রিয়ের (জন্মের) কামনা করা উচিত। সর্বভূতের কল্যাণার্থে নারদ আমাকে এ কথা বারংবার বলেছেন।
Verse 24
ब्राह्मणं जातिसम्पन्नं धर्मज्ञं संशितं शुचिम् । अपरेषां परेषां च परेभ्यश्रैव येडपरे
বায়ু বললেন—উত্তম বংশে জন্মানো, ধর্মজ্ঞ, সংযমী ও পবিত্র ব্রাহ্মণের (জন্ম ও উপস্থিতি) কামনা করাও উচিত। ছোট-বড় সকলের মধ্যে, এমনকি যারা উচ্চতর তাদের মধ্যেও, ব্রাহ্মণদেরই শ্রেষ্ঠ গণ্য করা হয়। এমন ব্রাহ্মণ যাকে প্রশংসা করেন সে মানুষ উন্নতি লাভ করে; আর যে ব্রাহ্মণদের নিন্দা করে সে শীঘ্রই পরাভব পায়।
Verse 25
ब्राह्मणा यं प्रशंसन्ति स मनुष्य: प्रवर्धते । अथ यो ब्राह्मणान् क्रुष्ट: पराभवति सो5चिरात्
বায়ু বললেন—যে মানুষকে ব্রাহ্মণরা প্রশংসা করেন সে উন্নতি লাভ করে; কিন্তু যে ব্রাহ্মণদের নিন্দা করে সে অচিরেই পরাভব পায়।
Verse 26
ततो राष्ट्रस्य शान्तिर्हि भूतानामिव वासवात् । राजाओंको चाहिये कि वे उत्तम भोग
তখনই রাজ্যে শান্তি প্রতিষ্ঠিত হয়—যেমন বৃষ্টিদাতা বাসব (ইন্দ্র) বর্ষণ করলে সকল প্রাণী কল্যাণ ও প্রশান্তি লাভ করে। অতএব রাজাদের উচিত সর্বদা প্রণাম-সম্ভাষণসহ ব্রাহ্মণদের পূজা করা—উত্তম ভোগ্যবস্তু, অলংকার এবং জিজ্ঞাসা করে সম্মানের সঙ্গে নিবেদনযোগ্য অন্যান্য মনঃপসন্দ দ্রব্য বিধিপূর্বক দান করা; এবং পিতার ন্যায় তাঁদের ভরণ-পোষণের দায় নেওয়া। এই ব্রাহ্মণদের অনুগ্রহেই রাজ্যে শান্তি স্থায়ী হয়। যেমন মহাসমুদ্রে নিক্ষিপ্ত কাঁচা মাটির ঢেলা তৎক্ষণাৎ গলে যায়, তেমনি ব্রাহ্মণসঙ্গ লাভ করামাত্রই সকল দুষ্কর্ম বিনষ্ট হয়ে নিজেরই পরাভবের কারণ হয়।
Verse 27
पश्य चन्द्रे कृतं लक्ष्म समुद्रो लवणोदकः: । तथा भगसहस््रेण महेन्द्र: परिचिल्वित:
হে মাধব, দেখো—ব্রাহ্মণদের প্রভাব কত প্রবল! তারা চন্দ্রে কলঙ্ক স্থাপন করল, সমুদ্রের জলকে লবণাক্ত করল, আর মহেন্দ্র (ইন্দ্র)-এর দেহে ‘ভগ’চিহ্নের সহস্র দাগ সৃষ্টি করল। পরে সেই একই প্রভাবে সেই দাগগুলি ‘চক্ষু’তে পরিণত হল; তাই শতক্রতু ইন্দ্র ‘সহস্রাক্ষ’ নামে প্রসিদ্ধ হল।
Verse 28
तेषामेव प्रभावेण सहस्ननयनो हासौ । शतक्रतु: समभवत् पश्य माधव यादृशम्
হে মাধব, দেখো—তাদেরই প্রভাবে এই ইন্দ্র সহস্রনয়ন হল এবং শতক্রতু নামে পরিচিত হল; দেখো, তাদের শক্তি কত আশ্চর্য!
Verse 29
इच्छन् कीर्ति च भूतिं च लोकांश्व मधुसूदन । ब्राह्मणानुमते तिछेत् पुरुष: शुचिरात्मवान्
হে মধুসূদন, যে ব্যক্তি খ্যাতি, সমৃদ্ধি এবং উত্তম লোকপ্রাপ্তি কামনা করে, সে শুচি আচরণসম্পন্ন ও আত্মসংযমী হয়ে ব্রাহ্মণদের অনুমতি ও নির্দেশের অধীন থাকবে।
Verse 30
भीष्म उवाच इत्येतद् वचन श्रुत्वा मेदिन्या मधुसूदन: । साधु साध्विति कौरव्य मेदिनीं प्रत्यपूजयत्
ভীষ্ম বললেন—হে কৌরব্য, পৃথিবীর এই বাক্য শুনে ভগবান মধুসূদন বললেন, “সাধু, সাধু!” এবং এ কথা বলে তিনি ভূদেবীকে বারংবার সম্মান ও প্রশংসা করলেন।
Verse 31
एतां श्रुत्वोपमां पार्थ प्रयतो ब्राह्मणर्षभान् । सतत पूजयेथास्त्वं तत: श्रेयोडभिपत्स्यसे
ভীষ্ম বললেন—হে পার্থ, এই উপমা-রূপ শিক্ষাটি শুনে তুমি শুদ্ধ-সংযমী চিত্তে সর্বদা শ্রেষ্ঠ ব্রাহ্মণদের পূজা করো। এভাবে, হে কুন্তীনন্দন, তুমি নিশ্চিতই পরম মঙ্গল লাভ করবে।
Verse 33
इस प्रकार श्रीमह्याभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें ब्राह्मणकी प्रशंसा नामक तैतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
এইভাবে শ্রীমহাভারতের অনুশাসনপর্বের দানধর্মপর্বে ‘ব্রাহ্মণ-প্রশংসা’ নামক তেত্রিশতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Verse 34
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि पृथ्वीवासुदेवसंवादे चतुस्त्रिंशो 5ध्याय:
এইভাবে শ্রীমহাভারতের অনুশাসনপর্বের দানধর্মপর্বে পৃথিবী-বাসুদেব সংলাপের অন্তর্গত চৌত্রিশতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Verse 36
महारथश्न राजन्य एष्टव्य: शत्रुतापन: । सबको यह इच्छा करनी चाहिये कि राष्ट्रमें ब्रह्मतेजसे सम्पन्न पवित्र ब्राह्मण उत्पन्न हो और शत्रुओंको संताप देनेवाले महारथी क्षत्रियकी उत्पत्ति हो
ভীষ্ম বললেন—হে রাজন, শত্রুদের দগ্ধকারী মহারথী ক্ষত্রিয়ের উদ্ভবও কাম্য। সকলেরই এই কামনা হওয়া উচিত যে রাজ্যে ব্রহ্মতেজে সমৃদ্ধ শুদ্ধ ব্রাহ্মণ জন্ম নিক, এবং শত্রুদমনকারী পরাক্রান্ত মহারথী ক্ষত্রিয়ও জন্ম নিক।
Verse 46
वासयेत गृहे राजन् न तस्मात् परमस्ति वै । राजन! विशुद्ध जातिसे युक्त तथा तीक्ष्ण व्रतका पालन करनेवाले धर्मज्ञ ब्राह्मणको अपने घरमें ठहराना चाहिये। इससे बढ़कर दूसरा कोई पुण्यकर्म नहीं है
ভীষ্ম বললেন—হে রাজন, গৃহে অতিথিকে আশ্রয় দেওয়া উচিত; তার চেয়ে বড় পুণ্য নেই। বিশেষত বিশুদ্ধ বংশজাত, কঠোর ব্রতপালনকারী ধর্মজ্ঞ ব্রাহ্মণকে নিজের ঘরে বাস করানো—এর তুল্য আর কোনো পুণ্যকর্ম নেই।
Verse 53
पितर: सर्वभूतानां नैतेभ्यो विद्यते परम् ब्राह्मणोंको जो हविष्य अर्पित किया जाता है उसे देवता ग्रहण करते हैं; क्योंकि ब्राह्मण समस्त प्राणियोंके पिता हैं। इनसे बढ़कर दूसरा कोई प्राणी नहीं है
ভীষ্ম বললেন— ব্রাহ্মণরা সকল জীবের পিতা; তাঁদের ঊর্ধ্বে আর কেউ নেই। ব্রাহ্মণদের উদ্দেশে যে হব্য অর্পিত হয়, দেবতারা তা গ্রহণ করেন; কারণ ব্রাহ্মণরা সমগ্র সৃষ্টির সর্বজনীন পিতারূপে প্রতিষ্ঠিত। তাঁদের চেয়ে শ্রেষ্ঠ আর কোনো প্রাণী নেই।
Verse 66
सर्वे ब्राह्मणमाविश्य सदान्नमुप भुठ्जते । सूर्य, चन्द्रमा, वायु, जल, पृथ्वी, आकाश और दिशा--इन सबके अधिष्ठाता देवता सदा ब्राह्मणके शरीरमें प्रवेश करके अन्न भोजन करते हैं
ভীষ্ম বললেন— সূর্য, চন্দ্র, বায়ু, জল, পৃথিবী, আকাশ ও দিকসমূহের অধিষ্ঠাতা দেবতারা সকলেই সদা ব্রাহ্মণের দেহে প্রবেশ করে অন্ন ভোজন করেন।
Verse 76
देवाक्षाप्यस्य नाश्नन्ति पापस्य ब्राह्मुणद्विष: । ब्राह्मण जिसका अन्न नहीं खाते उसके अन्नको पितर भी नहीं स्वीकार करते। उस ब्राह्मणद्रोही पापात्माका अन्न देवता भी नहीं ग्रहण करते हैं
ভীষ্ম বললেন— যে পাপী ব্রাহ্মণদের প্রতি বিদ্বেষ পোষণ করে, তার প্রায়শ্চিত্তের হব্যও দেবতারা গ্রহণ করেন না। যার অন্ন ব্রাহ্মণরা ভোজন করেন না, তার অন্ন পিতৃগণও গ্রহণ করেন না; সেই ব্রাহ্মণদ্রোহী পাপাত্মার অন্ন দেবতারাও গ্রহণ করেন না।
Verse 86
तथैव देवता राजन् नात्र कार्या विचारणा | राजन! यदि ब्राह्मण संतुष्ट हो जायँ तो पितर तथा देवता भी सदा प्रसन्न रहते हैं। इसमें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये
ভীষ্ম বললেন— হে রাজন, দেবতাদের ক্ষেত্রেও ঠিক তাই; এখানে আর বিচার-সংশয় করবার প্রয়োজন নেই। ব্রাহ্মণরা সন্তুষ্ট হলে পিতৃগণ ও দেবতারা সদা প্রসন্ন থাকেন; এ বিষয়ে বিপরীত ভাবনা করা উচিত নয়।
Verse 96
नच प्रेत्य विनश्यन्ति गच्छन्ति च परां गतिम् इसी प्रकार वे यजमान भी प्रसन्न होते हैं जिनकी दी हुई हवि ब्राह्मणोंके उपयोगमें आती है। वे मरनेके बाद नष्ट नहीं होते हैं, उत्तम गतिको प्राप्त हो जाते हैं
ভীষ্ম বললেন— যাদের প্রদত্ত হবি ব্রাহ্মণদের কাজে লাগে, সেই যজমানরাও তৃপ্ত হন। তারা মৃত্যুর পরে বিনষ্ট হয় না; পরম গতি লাভ করে।
Verse 106
तेन तेनैव प्रीयन्ते पितरो देवतास्तथा । मनुष्य जिस-जिस हविष्यसे ब्राह्मणोंको तृप्त करता है, उसी-उसीसे देवता और पितर भी तृप्त होते हैं
মানুষ যে যে হব্য দ্বারা ব্রাহ্মণদের তৃপ্ত করে, সেই সেই হব্য দ্বারাই দেবতারা ও পিতৃগণও তৃপ্ত হন।
Whether worthiness can be inferred from circumstantial factors (newness, long absence, distant arrival) versus verified moral qualities; the chapter resolves this by prioritizing stable virtues and non-harmful conduct over merely external markers.
Continuously examine character: a worthy recipient is marked by truthfulness, non-violence, self-control, humility, endurance, and tranquility, while inconsistent conduct, cruelty toward dependents, and anti-scriptural posturing negate eligibility for honor.
Not as an explicit phalaśruti formula; instead it provides a normative payoff: right association with genuinely learned persons and the purified, sequential discharge of household obligations ensures one does not fall away from dharma and sustains long-term social and spiritual stability.