Adhyaya 74
Anushasana ParvaAdhyaya 7458 Verses

Adhyaya 74

Phala of Vrata, Niyama, Svādhyāya, Dama, Satya, Brahmacarya, and Service (व्रत-नियम-स्वाध्याय-दम-सत्य-ब्रह्मचर्य-शुश्रूषा-फलप्रश्नः)

Upa-parva: Dharma-Phala Praśna–Uttara (Inquiry into the Fruits of Vows, Discipline, Truth, and Service)

Yudhiṣṭhira opens with a structured inquiry into comparative phala: the outcomes of vows, disciplines, self-study, restraint, Vedic memorization and teaching, giving without receiving, courageous adherence to one’s duty, truthfulness, celibate conduct, and service to parents and teachers. Bhīṣma replies in a sequence that blends pragmatic and soteriological registers. He states that properly undertaken vows yield enduring “worlds” (sanātanāḥ lokāḥ). Niyama bears visible results in the present life, implicitly validated by Yudhiṣṭhira’s own attainments. Svādhyāya yields benefit both here and beyond, culminating in joy in brahmaloka. Dama is elaborated as a superior preservative of merit: the self-controlled are content and effective, obtaining aims without the corrosive effects of anger; anger is said to destroy the value of giving, hence restraint surpasses gift-making when gifts are tainted by hostility. Teaching (adhyāpana) is described as producing imperishable fruit, aligned with correct ritual procedure. The chapter broadens to enumerate multiple modes of “heroism” (śaurya) including sacrifice, truth, discipline, giving, intellect, forgiveness, simplicity, tranquility, study, teaching, and service—each leading to elevated destinations through one’s own karmic fruit. A culminating valuation compares truth with large-scale ritual (aśvamedha), declaring truth superior and cosmically foundational: the sun, fire, wind, and social-religious satisfaction of gods, ancestors, and Brahmins are all grounded in satya. Finally, brahmacarya is praised as a purifier that burns sins, with exemplary ascetic potency; service to parents, guru, and ācārya is affirmed as leading to an excellent station in heaven and avoidance of naraka.

Chapter Arc: भीष्म युधिष्ठिर से कहते हैं—दानधर्म के विषय में एक प्राचीन इतिहास सुनो: उद्दालक ऋषि और उनके पुत्र नाचिकेत के प्रसंग में स्वयं धर्मराज (यम) के वचन हैं। → उद्दालक यज्ञ-दीक्षा लेकर पुत्र को सेवा-नियम, स्वाध्याय और शुद्ध आचरण में लगाते हैं। कथा का दबाव इस ओर बढ़ता है कि दान केवल ‘देना’ नहीं, बल्कि पात्र-देश-काल, शुद्धता और न्यायार्जित धन से जुड़ा कठोर अनुशासन है; अभाव की स्थिति में कौन-सा दान कैसे किया जाए—यह प्रश्न तीखा होता जाता है। → धर्मराज के निर्णायक उपदेश: ‘धर्म को तुच्छ न समझो; पात्र में, देश-काल के अनुरूप, शुद्ध और न्याय से प्राप्त वस्तु का दान करो; विशेषतः गौ-दान नित्य करो—इसमें संशय न रखो।’ साथ ही अभाव में विकल्प-दान (घृत न हो तो तिलधेनु, तिल न हो तो जलधेनु) का फल-श्रुति देकर दान-मार्ग को अडिग बनाते हैं। → उपदेश का निष्कर्ष स्पष्ट होता है—दान का मूल्य वस्तु की मात्रा से नहीं, शुद्धता, न्यायार्जन, नियमनिष्ठा और विवेकपूर्ण पात्र-चयन से है। वक्ता (कथानक का ‘मैं’) धर्मराज को प्रणाम कर उनकी अनुमति से लौटकर गुरु/भगवत्पाद के चरणों में उपस्थित होता है, और भीष्म इस उपाख्यान को युधिष्ठिर के लिए दानधर्म की कसौटी बना देते हैं।

Shlokas

Verse 1

इस प्रकार श्रीमह्याभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें नृगका उपाख्यानविषयक सत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ७० ॥। अपन क्रात छा अर: एकसप्ततितमो<् ध्याय: पिताके शापसे नाचिकेतका यमराजके पास जाना और यमराजका नाचिकेतको गोदानकी महिमा बताना युधिछिर उवाच दत्तानां फलसम्प्राप्तिं गवां प्रब्रूहि मेडनघ । विस्तरेण महाबाहो न हि तृप्पामि कथ्यताम्‌,युधिष्ठिरने पूछा--निष्पाप महाबाहो! गौओंके दानसे जिस फलकी प्राप्ति होती है, वह मुझे विस्तारके साथ बताइये। मुझे आपके वचनामृतोंको सुनते-सुनते तृप्ति नहीं होती है, इसलिये अभी और कहिये

যুধিষ্ঠিৰে ক’লে—হে নিষ্পাপ, হে মহাবাহো! গৰু দান কৰিলে যি ফল লাভ হয়, সেয়া মোক বিস্তাৰে কোৱা। শুনিও মোৰ তৃপ্তি নহয়; সেয়ে আৰু কোৱা।

Verse 2

भीष्म उवाच अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्‌ । ऋषेरुद्दालकेर्वाक्यं नाचिकेतस्य चो भयो:,भीष्मजीने कहा--राजन्‌! इस विषयमें विज्ञ पुरुष उद्दालक ऋषि और नाचिकेत दोनोंके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं

ভীষ্মে ক’লে—ৰাজন! এই বিষয়তো পণ্ডিতসকলে এক প্ৰাচীন ইতিহাস উদাহৰণস্বৰূপে উল্লিখিত কৰে—ঋষি উদ্দালকৰ আৰু নাচিকেতৰ, উভয়ৰ বাক্যসমৃদ্ধ সংলাপ।

Verse 3

ऋषिरुद्दालकिर्दीक्षामुपगम्य तत: सुतम्‌ । त्वं मामुपचरस्वेति नाचिकेतमभाषत,एक समय उद्दालक ऋषिने यज्ञकी दीक्षा लेकर अपने पुत्र नाचिकेतसे कहा--“तुम मेरी सेवामें रहो।”

ভীষ্মে ক’লে—এবাৰ ঋষি উদ্দালকে যজ্ঞদীক্ষা গ্ৰহণ কৰি, তাৰ পাছত নিজৰ পুত্ৰ নাচিকেতক ক’লে—“তুমি মোৰ শুশ্ৰূষা কৰা; মোৰ সেৱাত থাক।”

Verse 4

समाप्ते नियमे तस्मिन्‌ महर्षि: पुत्रमब्रवीत्‌ | उपस्पर्शनसक्तस्य स्वाध्यायाभिरतस्य च,उस यज्ञका नियम पूरा हो जानेपर महर्षिने अपने पुत्रसे कहा--“बेटा! मैंने समिधा, कुशा, फूल, जलका घड़ा और प्रचुर भोजन-सामग्री (फल-फूल आदि)--इन सबका संग्रह करके नदीके किनारे रख दिया और स्नान तथा वेदपाठ करने लगा। फिर उन सब वस्तुओंको भूलकर मैं यहाँ चला आया। अब तुम जाकर नदीतटसे वह सब सामान यहाँ ले आओ'

ভীষ্মে ক’লে—সেই নিয়ম সম্পন্ন হোৱাৰ পাছত মহর্ষিয়ে পুত্ৰক ক’লে—“বৎস! মই স্নান-আচমনতে আসক্ত আৰু স্বাধ্যায়ত নিমগ্ন থাকোঁতে সমিধা, কুশ, ফুল, জলকুম্ভ আৰু প্ৰচুৰ আহাৰ্য নৈৰ তীৰত থৈছিলোঁ; তাৰ পাছত সেই সকলো পাহৰি মই ইয়ালৈ আহি পৰিলোঁ। এতিয়া তুমি তাত গৈ নৈৰ তীৰৰ পৰা সেই সকলো সামগ্ৰী লৈ আহা।”

Verse 5

इध्मा दर्भा: सुमनस: कलशश्लातिभोजनम्‌ | विस्मृतं मे तदादाय नदीतीरादिहाव्रज,उस यज्ञका नियम पूरा हो जानेपर महर्षिने अपने पुत्रसे कहा--“बेटा! मैंने समिधा, कुशा, फूल, जलका घड़ा और प्रचुर भोजन-सामग्री (फल-फूल आदि)--इन सबका संग्रह करके नदीके किनारे रख दिया और स्नान तथा वेदपाठ करने लगा। फिर उन सब वस्तुओंको भूलकर मैं यहाँ चला आया। अब तुम जाकर नदीतटसे वह सब सामान यहाँ ले आओ'

ভীষ্মে ক’লে— “যজ্ঞৰ সমিধা, দৰ্ভা-কুশ, ফুল, জলকলহ আৰু প্ৰচুৰ ভোজনসামগ্ৰী—এই সকলো মই সংগ্ৰহ কৰি নদীৰ পাৰত থৈ স্নান আৰু বেদপাঠ কৰিবলৈ গৈছিলোঁ। সেয়া পাহৰি মই ইয়ালৈ ঘূৰি আহিলোঁ। এতিয়া তুমি নদীৰ কাষলৈ গৈ সেই সকলো বস্তু লৈ ইয়ালৈ আন।”

Verse 6

गत्वानवाप्य तत्‌ सर्व नदीवेगसमाप्लुतम्‌ | न पश्यामि तदित्येवं पितरं सोडब्रवीन्मुनि:,नाचिकेत जब वहाँ गया, तब उसे कुछ न मिला। सारा सामान नदीके वेगमें बह गया था। नाचिकेत मुनि लौट आया और पितासे बोला--'मुझे तो वहाँ वह सब सामान नहीं दिखायी दिया”

সি তাত গৈ একো নাপালে; নদীৰ প্ৰবল সোঁতে সকলো বস্তু ভাঁহি গৈছিল। মুনি ঘূৰি আহি পিতাক ক’লে— “মই তাত সেয়া একো নেদেখোঁ।”

Verse 7

क्षुत्पिपासाश्रमाविष्टो मुनिरुद्दा लकिस्तदा । यम॑ पश्येति त॑ पुत्रमशपत्‌ स महातपा:,महातपस्वी उद्दालक मुनि उस समय भूख-प्याससे कष्ट पा रहे थे, अतः रुष्ट होकर बोले--'अरे वह सब तुम्हें क्यों दिखायी देगा? जाओ यमराजको देखो।” इस प्रकार उन्होंने उसे शाप दे दिया

ভীষ্মে ক’লে— সেই সময় মহাতপস্বী উদ্দালক মুনি ক্ষুধা, তৃষ্ণা আৰু শ্ৰমে আৱিষ্ট আছিল। ক্ৰোধে তেওঁ পুত্ৰক শাপ দি ক’লে— “সেই সকলো তোমাৰ চকুত কিয় পৰিব? যা, যমক দৰ্শন কৰ।”

Verse 8

तथा स पित्राभिहतो वाग्वज्रेण कृताञज्जलि: । प्रसीदेति ब्रुवन्नेव गतसत्त्वोडपतद्‌ भुवि,पिताके वाग्वज़्से पीड़ित हुआ नाचिकेत हाथ जोड़कर बोला--'प्रभो! प्रसन्न होइये।' इतना ही कहते-कहते वह निष्प्राण होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा

পিতাৰ বজ্ৰসম বাক্যত আঘাত পাই সি হাত জোৰ কৰি ক’লে— “প্ৰভু, প্ৰসন্ন হওক।” এই কথাই ক’বলৈ ক’বলৈ তাৰ প্ৰাণশক্তি ক্ষয় হৈ সি ভূমিত লুটি পৰিল।

Verse 9

नाचिकेतं पिता दृष्टवा पतितं दुःखमूर्च्छित: । कि मया कृतमित्युक्त्वा निपषात महीतले,नाचिकेतको गिरा देख उसके पिता भी दु:खसे मूर्च्छित हो गये और “अरे, यह मैंने क्या कर डाला!” ऐसा कहकर पृथ्वीपर गिर पड़े

নাচিকেতক পৰি থকা দেখি তাৰ পিতাও শোকত মূৰ্ছিত হৈ— “হায়! মই কি কৰি পেলালোঁ!” বুলি কৈ ভূমিত পৰি গ’ল।

Verse 10

तस्य दुःखपरीतस्य स्वं पुत्रमनुशोचत: । व्यतीतं तदहःशेषं सा चोग्रा तत्र शर्वरी,दुःखमें डूबे और बारंबार अपने पुत्रके लिये शोक करते हुए ही महर्षिका वह शेष दिन व्यतीत हो गया और भयानक रात्रि भी आकर समाप्त हो गयी

দুখে আচ্ছন্ন হৈ আৰু নিজৰ পুত্ৰৰ বাবে বাৰে বাৰে শোক কৰি থকা সেই মহৰ্ষিৰ সেই দিনৰ অৱশিষ্ট অংশ কাটি গ’ল; আৰু তাতেই সেই ভয়ংকৰ ৰাতিও আহি পাৰ হৈ গ’ল।

Verse 11

पित्र्येणा श्रुप्रषातेन नाचिकेत: कुरूद्गवह । प्रास्पन्दच्छयने कौश्ये वृष्टया सस्यमिवाप्लुतम्‌,कुरुश्रेष्ठ! कुशकी चटाईपर पड़ा हुआ नाचिकेत पिताके आँसुओंकी धारासे भीगकर कुछ हिलने-डुलने लगा, मानो वर्षसे सिंचकर अनाजकी सूखी खेती हरी हो गयी हो

কুৰুশ্ৰেষ্ঠ! কুশৰ চটাইত পৰি থকা নাচিকেত পিতৃৰ অশ্ৰুধাৰাত ভিজি অলপ নড়িবলৈ ধৰিলে—যেন বৰষুণে সিঞ্চিত হৈ শুকান শস্যক্ষেত পুনৰ সেউজীয়া হৈ উঠিল।

Verse 12

स पर्यपृच्छत्‌ त॑ पुत्र क्षीणं पर्यागतं पुन: । दिव्यैर्गन्धै: समादिग्ध॑ क्षीणस्वप्नमिवोत्थितम्‌,महर्षिका वह पुत्र मरकर पुन: लौट आया, मानो नींद टूट जानेसे जाग उठा हो। उसका शरीर दिव्य सुगन्धसे व्याप्त हो रहा था। उस समय उद्दालकने उससे पूछा--

মহৰ্ষিৰ সেই পুত্ৰ মৃত্যু পোৱাৰ পিছত পুনৰ ঘূৰি আহিল—যেন টোপনি ভাঙি জাগি উঠিল। তাৰ দেহত দিব্য সুগন্ধ ব্যাপ্ত আছিল। তেতিয়া উদ্দালকে তাক সুধিলে—

Verse 13

अपि पुत्र जिता लोका: शुभास्ते स्वेन कर्मणा | दिष्ट्या चासि पुन: प्राप्तो न हि ते मानुषं वपु:,बेटा! क्‍या तुमने अपने कर्मसे शुभ लोकोंपर विजय पायी है? मेरे सौभाग्यसे ही तुम पुनः यहाँ चले आये हो। तुम्हारा यह शरीर मनुष्योंका-सा नहीं है--दिव्य भावको प्राप्त हो गया है”

বেটা! তই নিজৰ কৰ্মেৰে শুভ লোকসমূহ জয় কৰিছ নেকি? মোৰ সৌভাগ্যতে তই পুনৰ ইয়ালৈ আহিছ। তোৰ এই দেহ মানৱদেহৰ দৰে নহয়—ই দিৱ্যভাব প্ৰাপ্ত কৰিছে।

Verse 14

प्रत्यक्षदर्शी सर्वस्य पित्रा पृष्टो महात्मना । सतां वार्ता पितुर्मध्ये महर्षीणां न्यवेदयत्‌,अपने महात्मा पिताके इस प्रकार पूछनेपर परलोककी सब बातोंको प्रत्यक्ष देखनेवाला नाचिकेत महर्षियोंके बीचमें पितासे वहाँका सब वृत्तान्त निवेदन करने लगा--

মহাত্মা পিতাই এইদৰে সুধাত, পৰলোকৰ সকলো কথা প্ৰত্যক্ষ দেখা নাচিকেতে মহৰ্ষিসকলৰ মাজতেই পিতাক তাতৰ সমগ্ৰ বৃত্তান্ত নিবেদন কৰিবলৈ ধৰিলে।

Verse 15

कुर्वन्‌ भवच्छासनमाशु यातो हाहं विशालां रुचिरप्रभावाम्‌ | वैवस्वतीं प्राप्प सभामपश्यं सहस्रशो योजनहेमभासम्‌,“पिताजी! मैं आपकी आज्ञाका पालन करनेके लिये यहाँसे तुरन्त प्रस्थित हुआ और मनोहर कान्ति एवं प्रभावसे युक्त विशाल यमपुरीमें पहुँचकर मैंने वहाँकी सभा देखी, जो सुवर्णके समान सुन्दर प्रभासे प्रकाशित हो रही थी। उसका तेज सहस्रों योजन दूरतक फैला हुआ था

ভীষ্মে ক’লে— “আপোনাৰ আজ্ঞা মানি মই তৎক্ষণাৎ যাত্ৰা কৰিলোঁ। দীপ্তি আৰু প্ৰভাৱে মনোহৰ সেই বিশাল যমপুৰীত উপস্থিত হৈ মই বৈবস্বত যমৰ সভামণ্ডপ দেখিলোঁ—সোণালী জ্যোতিত উজ্জ্বল, যাৰ কিৰণ সহস্ৰ যোজন দূৰলৈকে বিস্তৃত আছিল।”

Verse 16

दृष्टवैव मामभिमुखमापततन्तं देहीति स ह्वासनमादिदेश । वैवस्वतोडर्घ्यादिभिरह णैश्ष भवत्कृते पूजयामास मां सः:,“मुझे सामनेसे आते देख विवस्वानके पुत्र यमने अपने सेवकोंको आज्ञा दी कि “इनके लिये आसन दो।” उन्होंने आपके नाते अर्घ्य आदि पूजनसम्बन्धी उपचारोंसे स्वयं ही मेरा पूजन किया

ভীষ্মে ক’লে— “মই সন্মুখে আহি থকা দেখি বিবস্বানৰ পুত্ৰ বৈবস্বত যমে সেবকসকলক আদেশ দিলে—‘এঁক আসন দিয়া।’ তাৰ পিছত আপোনাৰ মানৰ খাতিৰত তেওঁ নিজেই অৰ্ঘ্য আদি আতিথ্য-সংস্কাৰে মোক পূজা কৰিলে।”

Verse 17

ततस्त्वहं तं शनकैरवोचं वृतः सदस्यैरभिपूज्यमान: । प्राप्तो5स्मि ते विषयं धर्मराज लोकानहों यानहं तान्‌ विधत्स्व,“तब सब सदस्योंसे घिरकर उनके द्वारा पूजित होते हुए मैंने वैवस्वत यमसे धीरेसे कहा --'धर्मराज! मैं आपके राज्यमें आया हूँ; मैं जिन लोकोंमें जानेके योग्य होऊँ, उनमें जानेके लिये मुझे आज्ञा दीजिये"

তাৰ পিছত সভাসদসকলৰ মাজত বেষ্টিত হৈ আৰু তেওঁলোকৰ সন্মান লাভ কৰি মই ধীৰে ধীৰে বৈবস্বত যমক ক’লোঁ— “ধৰ্মৰাজ, মই আপোনাৰ অধিকাৰক্ষেত্ৰত আহিছোঁ; যি যি লোকলৈ যোৱাৰ যোগ্য মই, তাত মোক নিয়োজিত কৰক।”

Verse 18

यमोडब्रवीन्मां न मृतोडसि सौम्य यम॑ पश्येत्याह स त्वां तपस्वी । पिता प्रदीप्ताग्निसमानतेजा न तच्छक्यमनृतं विप्र कर्तुम्‌,“तब यमराजने मुझसे कहा--“सौम्य! तुम मरे नहीं हो। तुम्हारे तपस्वी पिताने इतना ही कहा था कि तुम यमराजको देखो। विप्रवर! वे तुम्हारे पिता प्रजजलित अग्निके समान तेजस्वी हैं। उनकी बात झूठी नहीं की जा सकती

ভীষ্মে ক’লে— তেতিয়া যমৰাজে মোক ক’লে— “সৌম্য, তুমি মৃত নহয়। তোমাৰ তপস্বী পিতাই কেৱল ‘যমক দেখা’ বুলি কৈছিল। হে বিপ্ৰ, তোমাৰ পিতা প্ৰজ্বলিত অগ্নিৰ দৰে তেজস্বী; তেওঁৰ বাক্য মিছা কৰিব নোৱাৰি।”

Verse 19

दृष्टस्ते5हं प्रतिगच्छस्व तात शोचत्यसौ तव देहस्य कर्ता । ददानि कि चापि मन:प्रणीत॑ प्रियातिथेस्तव कामान्‌ वृणीष्व,“तात! तुमने मुझे देख लिया। अब तुम लौट जाओ। तुम्हारे शरीरका निर्माण करनेवाले वे तुम्हारे पिताजी शोकमग्न हो रहे हैं। वत्स! तुम मेरे प्रिय अतिथि हो। तुम्हारा कौन-सा मनोरथ मैं पूर्ण करूँ। तुम्हारी जिस-जिस वस्तुके लिये इच्छा हो, उसे माँग लो”

ভীষ্মে ক’লে— “তাত, তুমি মোক দেখি ল’লা; এতিয়া উভতি যোৱা। তোমাৰ দেহৰ নিৰ্মাতা তোমাৰ পিতা শোকে নিমগ্ন। বৎস, তুমি মোৰ প্ৰিয় অতিথি; মনত উদ্ভৱ হোৱা কামনাসকল বাছি লোৱা—যি বিচাৰিবা, মই দিম।”

Verse 20

तेनैवमुक्तस्तमहं प्रत्यवोचं प्राप्तोडस्मि ते विषयं दुर्निवर्त्यम्‌ । इच्छाम्यहं पुण्यकृतां समृद्धान्‌ लोकान द्रष्ठ॑ यदि ते5हं वराह:,“उनके ऐसा कहनेपर मैंने इस प्रकार उत्तर दिया--“भगवन्‌! मैं आपके उस राज्यमें आ गया हूँ, जहाँसे लौटकर जाना अत्यन्त कठिन है। यदि मैं आपकी दृष्टिमें वर पानेके योग्य होऊँ तो पुण्यात्मा पुरुषोंको मिलनेवाले समृद्धिशाली लोकोंका मैं दर्शन करना चाहता हूँ!

তেওঁ এইদৰে ক’লে মই উত্তৰ দিলোঁ—“ভগৱান! মই আপোনাৰ সেই ৰাজ্যত প্ৰৱেশ কৰিছোঁ, য’ৰ পৰা উভতি যোৱা অতি কঠিন। যদি আপোনাৰ দৃষ্টিত মই বৰ লাভৰ যোগ্য হওঁ, তেন্তে পুণ্যকৰ্ম কৰা লোকসকলে লাভ কৰা সমৃদ্ধ লোকসমূহ মই দৰ্শন কৰিব বিচাৰোঁ।”

Verse 21

यान॑ समारोप्य तु मां स देवो वाहैर्युक्त सुप्रभं भानुमत्‌ तत्‌ । संदर्शयामास तदात्मलोकान्‌ सर्वास्तथा पुण्यकृतां द्विजेन्द्र,द्विजेन्द्र! तब यम देवताने वाहनोंसे जुते हुए उत्तम प्रकाशसे युक्त तेजस्वी रथपर मुझे बिठाकर पुण्यात्माओंको प्राप्त होनेवाले अपने यहाँके सभी लोकोंका मुझे दर्शन कराया

ভীষ্মে ক’লে—“হে দ্বিজেন্দ্ৰ! তেতিয়া যমদেৱে অশ্বযুক্ত, উৎকৃষ্ট প্ৰভাৰে দীপ্ত, সূৰ্যসম তেজস্বী ৰথত মোক উঠাই, পুণ্যকৰ্ম কৰা লোকসকলে লাভ কৰা তেওঁৰ সকলো লোক মোক দৰ্শন কৰালে।”

Verse 22

अपश्यं तत्र वेश्मानि तैजसानि महात्मनाम्‌ । नानासंस्थानरूपाणि सर्वरत्नमयानि च,“तब मैंने महामनस्वी पुरुषोंको प्राप्त होनेवाले वहाँके तेजोमय भवनोंका दर्शन किया। उनके रूप-रंग और आकार-प्रकार अनेक तरहके थे। उन भवनोंका सब प्रकारके रत्नोंद्वारा निर्माण किया गया था

তাত মই মহাত্মাসকলৰ প্ৰাপ্য তেজোময় ভৱনসমূহ দেখিলোঁ—সিহঁতৰ আকাৰ-আকৃতি নানাবিধ আছিল, আৰু সকলোবোৰ নানা ৰত্নে নিৰ্মিত আছিল।

Verse 23

चन्द्रमण्डलशु भ्राणि किडुकिणीजालवन्ति च । अनेकशतभौमानि सान्तर्जलवनानि च,“कोई चन्द्रमण्डलके समान उज्ज्वल थे। किन्हींपर क्षुद्रघंटियोंसे युक्त झालरें लगी थीं। उनमें सैकड़ों कक्षाएँ और मंजिलें थीं। उनके भीतर जलाशय और वन-उपवन सुशोभित थे। कितनोंका प्रकाश नीलमणिमय सूर्यके समान था। कितने ही चाँदी और सोनेके बने हुए थे। दिन्हीं-किन्हीं भवनोंके रंग प्रातःकालीन सूर्यके समान लाल थे। उनमेंसे कुछ विमान या भवन तो स्थावर थे और कुछ इच्छानुसार विचरनेवाले थे

কিছুমান ভৱন চন্দ্ৰমণ্ডলৰ দৰে ধৱল-উজ্জ্বল আছিল; কিছুমানত সৰু ঘণ্টাযুক্ত ঝালৰ-জাল শোভা পাইছিল। বহুতোত শত শত কোঠা আৰু তলা আছিল; আৰু ভিতৰত জলাশয় আৰু বন-উপবন সুন্দৰকৈ সজাই থোৱা আছিল।

Verse 24

वैदूर्यार्फप्रकाशानि रूप्यरुक्ममयानि च । तरुणादित्यवर्णानि स्थावराणि चराणि च,“कोई चन्द्रमण्डलके समान उज्ज्वल थे। किन्हींपर क्षुद्रघंटियोंसे युक्त झालरें लगी थीं। उनमें सैकड़ों कक्षाएँ और मंजिलें थीं। उनके भीतर जलाशय और वन-उपवन सुशोभित थे। कितनोंका प्रकाश नीलमणिमय सूर्यके समान था। कितने ही चाँदी और सोनेके बने हुए थे। दिन्हीं-किन्हीं भवनोंके रंग प्रातःकालीन सूर्यके समान लाल थे। उनमेंसे कुछ विमान या भवन तो स्थावर थे और कुछ इच्छानुसार विचरनेवाले थे

কিছুমান বিমান বৈদূৰ্যমণি আৰু সূৰ্যৰ দৰে দীপ্তিমান আছিল; কিছুমান ৰূপা আৰু সোণৰ নিৰ্মিত। কিছুমান প্ৰভাতৰ নবোদিত সূৰ্যৰ দৰে অৰুণ বৰ্ণে জ্বলিছিল। সিহঁতৰ কিছুমান স্থিৰ আছিল, আৰু কিছুমান ইচ্ছানুসাৰে বিচৰণশীল আছিল।

Verse 25

भक्ष्यभोज्यमयान्‌ शैलान्‌ वासांसि शयनानि च । सर्वकामफलांश्वैव वृक्षान्‌ भवनसंस्थितान्‌,“उन भवनोंमें भक्ष्य और भोज्य पदार्थोंके पर्वत खड़े थे। वस्त्रों और शय्याओंके ढेर लगे थे तथा सम्पूर्ण मनोवांछित फलोंको देनेवाले बहुत-से वृक्ष उन गृहोंकी सीमाके भीतर लहलहा रहे थे

সেই প্ৰাসাদসমূহৰ ভিতৰত ভক্ষ্য-ভোজ্য দ্ৰব্যৰ পাহাৰসম ঢিপা থিয় হৈ আছিল; বস্ত্ৰ আৰু শয্যাৰো গাদা গাদা সঞ্চিত আছিল। আৰু সেই গৃহসীমাৰ ভিতৰত মনঃকামিত সকলো ফল দান কৰা বহু বৃক্ষ সমৃদ্ধিতে লহলহ কৰি আছিল।

Verse 26

नद्यो वीथ्य: सभा वाप्यो दीर्घिकाश्वैव सर्वश: । घोषवन्ति च यानानि युक्तान्यथ सहस्रश:,“उन दिव्य लोकोंमें बहुत-सी नदियाँ, गलियाँ, सभाभवन, बावड़ियाँ, तालाब और जोतकर तैयार खड़े हुए घोषयुक्त सहस्रों रथ मैंने सब ओर देखे थे

সেই দীপ্তিমান লোকসমূহত মই চাৰিওফালে নদী, প্ৰশস্ত পথ, সভাগৃহ, কূপ আৰু জলাধাৰ, আৰু দীঘল দীঘি দেখিছিলোঁ। লগতে সহস্ৰ সহস্ৰ যান—জোতা আৰু সাজু—মঙ্গলধ্বনিত গুঞ্জৰি উঠা দেখিছিলোঁ।

Verse 27

क्षीरस्रवा वै सरितो गिरीश्व सर्पिस्तथा विमलं चापि तोयम्‌ । वैवस्वतस्यानुमतांश्न देशा- नदृष्टपूर्वान्‌ सुबहूनपश्यम्‌,“मैंने दूध बहानेवाली नदियाँ, पर्वत, घी और निर्मल जल भी देखे तथा यमराजकी अनुमतिसे और भी बहुत-से पहलेके न देखे हुए प्रदेशोंका दर्शन किया

মই দুধ বোৱা নদী, পৰ্বত, ঘি আৰু নিৰ্মল জলও দেখিছিলোঁ। আৰু বৈবস্বত (যম)-ৰ অনুমতিত মই আগতে কেতিয়াও নেদেখা বহু দেশ-প্ৰদেশ দৰ্শন কৰিলোঁ।

Verse 28

सर्वान्‌ दृष्टवा तदहं धर्मराज- मवोचं वै प्रभविष्णुं पुराणम्‌ क्षीरस्यैता: सर्पिषश्नैव नद्य: शश्वत्सत्रोता: कस्य भोज्या: प्रदिष्टा:,“उन सबको देखकर मैंने प्रभावशाली पुरातन देवता धर्मराजसे कहा--'प्रभो! ये जो घी और दूधकी नदियाँ बहती रहती हैं, जिनका स्रोत कभी सूखता नहीं है, किनके उपभोगमें आती हैं--इन्हें किनका भोजन नियत किया गया है?”

এই সকলো দেখি মই প্ৰভাৱশালী প্ৰাচীন ধৰ্মৰাজক ক’লোঁ—“প্ৰভু! দুধ আৰু ঘিৰ এই নদীবোৰ চিৰপ্ৰবাহ, যাৰ উৎস কেতিয়াও নুশুকায়; এইবোৰ কাৰ ভোগৰ বাবে ভোজ্যৰূপে নিৰ্ধাৰিত?”

Verse 29

यमोअब्रवीद्‌ विद्धि भोज्यास्त्वमेता ये दातार: साधवो गोरसानाम्‌ | अन्ये लोका: शाश्वृता वीतशोकै: समाकीर्णा गोप्रदाने रतानाम्‌,“यमराजने कहा--“ब्रह्मन! तुम इन नदियोंको उन श्रेष्ठ पुरुषोंका भोजन समझो, जो गोरस दान करनेवाले हैं। जो गोदानमें तत्पर हैं, उन पुण्यात्माओंके लिये दूसरे भी सनातन लोक विद्यमान हैं, जिनमें दुःख-शोकसे रहित पुण्यात्मा भरे पड़े हैं

যমে ক’লে—“ব্ৰাহ্মণ, জানি থোৱা—এই নদীবোৰ গোৰস দান কৰা সাধুজনৰেই আহাৰ। যিসকল গোদানত ৰত, তেওঁলোকৰ বাবে আন আন শাশ্বত লোকো আছে—শোক-দুঃখহীন—পুণ্যাত্মাৰে পৰিপূৰ্ণ।”

Verse 30

न त्वेतासां दानमात्र प्रशस्तं पात्र कालो गोविशेषो विधिक्ष । ज्ञात्वा देयं विप्र गवान्तरं हि दुःखं ज्ञातुं पावकादित्यभूतम्‌,“विप्रवर! केवल इनका दानमात्र ही प्रशस्त नहीं है; सुपात्र ब्राह्मण, उत्तम समय, विशिष्ट गौ तथा दानकी सर्वोत्तम विधि--इन सब बातोंको जानकर ही गोदान करना चाहिये। गौओंका आपसमें जो तारतम्य है, उसे जानना बहुत कठिन काम है और अग्नि एवं सूर्यके समान तेजस्वी पात्रको पहचानना भी सरल नहीं है

ভীষ্ম ক’লে—হে ব্ৰাহ্মণশ্ৰেষ্ঠ! কেৱল এই গাভীবোৰ দান কৰাটোৱেই প্ৰশংসনীয় নহয়। সুপাত্ৰ, উপযুক্ত কাল, গাভীৰ বিশেষ উৎকৰ্ষ আৰু দানৰ শ্ৰেষ্ঠ বিধি—এই সকলো জানি তেতিয়াহে গোদান কৰা উচিত। গাভীবোৰৰ মাজৰ তাৰতম্য বুজা সঁচাকৈ কঠিন, আৰু অগ্নি-সূৰ্যৰ দৰে দীপ্তিমান পাত্ৰক চিনাক্ত কৰাও সহজ নহয়।

Verse 31

स्वाध्यायवान्‌ यो5तिमात्र॑ तपस्वी वैतानस्थो ब्राह्मण: पात्रमासाम्‌ | कृच्छोत्सृष्टा: पोषणाभ्यागताश्न द्वारैरेतैगोविशेषा: प्रशस्ता:,जो ब्राह्मण वेदोंके स्वाध्यायसे सम्पन्न, अत्यन्त तपस्वी तथा यज्ञके अनुष्ठानमें लगा हुआ हो, वही इन गौओंके दानका सर्वोत्तम पात्र है। इनके सिवा जो ब्राह्मण कृच्छुव्रतसे मुक्त हुए हों और परिवारकी पुष्टिके लिये गोदानके प्रार्थी होकर आये हों, वे भी दानके उत्तम पात्र हैं। इन सुयोग्य पात्रोंको निमित्त बनाकर दानमें दी गयी श्रेष्ठ गौएँ उत्तम मानी गयी हैं

ভীষ্ম ক’লে—যি ব্ৰাহ্মণ বেদস্বাধ্যায়ত সমৃদ্ধ, অতিশয় তপস্বী আৰু বৈতান (বৈদিক যজ্ঞকৰ্ম) অনুষ্ঠানত নিয়োজিত, তেৱেঁই এই গাভীবোৰ দানৰ সৰ্বোত্তম পাত্ৰ। ইয়াৰ উপৰিও, যিসকল ব্ৰাহ্মণে কঠিন ‘কৃচ্ছ্ৰ’ ব্ৰত সম্পূৰ্ণ কৰি গৃহপোষণৰ বাবে সহায় বিচাৰি আহে, তেওঁলোকো যোগ্য পাত্ৰ। এনে সুযোগ্য পাত্ৰক উপলক্ষ কৰি দানত দিয়া শ্ৰেষ্ঠ গাভীবোৰ সত্যই প্ৰশংসনীয় গণ্য হয়।

Verse 32

तिस्त्रो रात्र्यस्त्वद्धिरुपोष्य भूमौ तृप्ता गावस्तर्पिति भ्य: प्रदेया: । वत्सै: प्रीता: सुप्रजा: सोपचारा- स्त्र्यहं दत्त्वा गोरसैर्वर्तितव्यम्‌,“तीन राततक उपवासपूर्वक केवल जल पीकर धरतीपर शयन करे। तत्पश्चात्‌ खिला- पिलाकर तृप्त की हुई गौओंका भोजन आदिसे संतुष्ट किये हुए ब्राह्मणोंको दान करे। वे गौएँ बछड़ोंके साथ रहकर प्रसन्न हों, सुन्दर बच्चे देनेवाली हों तथा अन्यान्य आवश्यक सामग्रियोंसे युक्त हों। ऐसी गौओंका दान करके तीन दिनोंतक केवल गोरसका आहार करके रहना चाहिये

ভীষ্ম ক’লে—তিনিৰাতি উপবাস কৰি কেৱল জল পান কৰি ভূমিত শয়ন কৰিব লাগে। তাৰপিছত ভালদৰে খুৱাই তৃপ্ত কৰা গাভীবোৰ বাছুৰসহ, ভোজন আদি সৎকাৰৰে সন্তুষ্ট কৰা ব্ৰাহ্মণসকলক দান কৰিব লাগে। গাভীবোৰ বাছুৰসহ প্ৰসন্ন থাকক, উত্তম সন্তানদাত্রী হওক আৰু প্ৰয়োজনীয় পৰিচৰ্যা-সামগ্ৰীৰে যুক্ত হওক। এনেদৰে দান কৰি তাৰপিছত তিনিদিন কেৱল গোৰস (দুগ্ধজাত আহাৰ) গ্ৰহণ কৰি জীৱন নিৰ্বাহ কৰিব লাগে।

Verse 33

दत्त्वा धेनुं सुव्रतां कांस्यदोहां कल्याणवत्सामपलायिनीं च । यावन्ति रोमाणि भवन्ति तस्या- स्तावद्‌ वर्षाण्यश्रुते स्वर्गलोकम्‌,“उत्तम शील-स्वभाववाली, भले बछड़ेवाली और भागकर न जानेवाली दुधारू गायका कांस्यके दुग्धपात्रसहित दान करके उस गौके शरीरमें जितने रोएँ होते हैं, उतने वर्षोतक दाता स्वर्गलोकका सुख भोगता है

ভীষ্ম ক’লে—সুশীল, কাঁসাৰ দোহন-পাত্ৰসহ, উত্তম বাছুৰযুক্ত, পলাই নাযোৱা আৰু দুধাৰু ধেনু দান কৰিলে, সেই গাভীৰ দেহত যিমান ৰোম আছে সিমান বছৰ দাতা স্বৰ্গলোকত আনন্দ ভোগ কৰে।

Verse 34

तथानड्वाहं ब्राह्मुणेभ्य: प्रदाय दान्तं धुर्य बलवन्तं युवानम्‌ । कुलानुजीव्यं वीर्यवन्तं बृहन्तं भुड्क्ते लोकान्‌ सम्मितान्‌ थेनुदस्य,“इसी प्रकार जो शिक्षा देकर काबूमें किये हुए, बोझ ढोनेमें समर्थ, बलवान, जवान, कृषक-समुदायकी जीविका चलानेयोग्य, पराक्रमी और विशाल डील-डौलवाले बैलका ब्राह्मणोंको दान देता है, वह दुधारू गायका दान करनेवालेके तुल्य ही उत्तम लोकोंका उपभोग करता है

ভীষ্ম ক’লে—একেদৰে, শিক্‌ষাৰে বশীভূত, জুৱালত জোঁটাবলৈ যোগ্য, বলৱান আৰু যুবক, কৃষক-গৃহস্থৰ উপজীৱিকা ধাৰণত সক্ষম, পৰাক্ৰমী আৰু বৃহৎ দেহবিশিষ্ট এটা ষাঁড় ব্ৰাহ্মণসকলক দান কৰা ব্যক্তি, দুধাৰু গাভী দানকাৰীৰ সমানেই উত্তম লোকসমূহ ভোগ কৰে।

Verse 35

गोषु क्षान्तं गोशरण्यं कृतज्ञं वृत्तिग्लानं तादृशं पात्रमाहु: । वद्धे ग्लाने सम्भ्रमे वा महार्थे कृष्यर्थ वा होम्यहेतो: प्रसूत्याम्‌

ভীষ্মে ক’লে—যি গৰুৰ প্ৰতি ক্ষমাশীল আৰু কোমল, গোৰ আশ্ৰয় আৰু ৰক্ষা কৰে, কৃতজ্ঞ, আৰু জীৱিকাৰ অভাৱত ক্লান্ত—তাকেই প্ৰকৃত দানপাত্ৰ বুলি কোৱা হয়। সি যদি বন্ধনত থাকে, দুৰ্বল হয়, হঠাৎ বিপদত পৰে, মহৎ প্ৰয়োজন উঠে, কৃষিৰ বাবে সম্পদ লাগে, হোম-যজ্ঞৰ বাবে হৱিষ্য লাগে, অথবা প্ৰসৱৰ সময়ত—তেতিয়া তাক সহায়-সমৰ্থন কৰা উচিত।

Verse 36

गुर्वर्थ वा बालपुष्ट्याभिषंगां गां वै दातुं देशकालो<विशिष्ट: । अन्तर्ज्ाता: सक्रयज्ञानलब्धा: प्राणक्रीता निर्जिता यौतकाश्ष

ভীষ্মে ক’লে—গুৰুৰ কাৰ্যৰ বাবে, অথবা সন্তানৰ পুষ্টি আৰু মঙ্গলৰ প্ৰতি স্নেহবশত, উপযুক্ত দেশ-কাল মানি গৰু দান কৰাটো বিশেষ প্ৰশংসনীয়। এনে গৰু নিজৰ গোহালিত জন্মা, বিধিপূৰ্বক ক্ৰয় কৰি স্বত্ব-জ্ঞানসহ লাভ কৰা, প্ৰাণৰ মূল্য দি (অত্যন্ত কষ্টে) অৰ্জিত, জয়ৰ ফলত প্ৰাপ্ত, অথবা যৌতুক (বিবাহ-উপহাৰ/দহেজ) ৰূপে লাভ কৰা হ’ব পাৰে।

Verse 37

जो गौओंके प्रति क्षमाशील, उनकी रक्षा करनेमें समर्थ, कृतज्ञ और आजीविकासे रहित है, ऐसे ब्राह्मणको गोदानका उत्तम पात्र बताया गया है। जो बूढ़ा हो, रोगी होनेके कारण पथ्य-भोजन चाहता हो, दुर्भिक्ष आदिके कारण घबराया हो, किसी महान्‌ यज्ञका अनुष्ठान करनेवाला हो या जिसके लिये खेतीकी आवश्यकता आ पड़ी हो, होमके लिये हविष्य प्राप्त करनेकी इच्छा हो अथवा घरमें स्त्रीके बच्चा पैदा होनेवाला हो अथवा गुरुके लिये दक्षिणा देनी हो अथवा बालककी पुष्टिके लिये गोदुग्धकी आवश्यकता आ पड़ी हो, ऐसे व्यक्तियोंको ऐसे अवसरोंपर गोदानके लिये सामान्य देश-काल माना गया है (ऐसे समयमें देश-कालका विचार नहीं करना चाहिये)। जिन गौओंका विशेष भेद जाना हुआ हो, जो खरीदकर लायी गयी हों अथवा ज्ञानके पुरस्काररूपसे प्राप्त हुई हों अथवा प्राणियोंके अदला-बदलीसे खरीदी गयी हों या जीतकर लायी गयी हों अथवा दहेजमें मिली हों, ऐसी गौएँ दानके लिये उत्तम मानी गयी हैं” ।। नाचिकेत उवाच श्रुत्वा वैवस्वतवचस्तमहं पुनरब्रुवम्‌ अभावे गोप्रदातृणां कथं लोकान्‌ हि गच्छति

যি গৰুৰ প্ৰতি ক্ষমাশীল, গোৰক্ষা কৰিবলৈ সমৰ্থ, কৃতজ্ঞ আৰু জীৱিকাহীন—এনে ব্ৰাহ্মণক গোদানৰ উত্তম পাত্ৰ বুলি কোৱা হৈছে। যি বৃদ্ধ, যি ৰোগী হৈ পথ্য-ভোজন বিচাৰে, যি দুৰ্ভিক্ষ আদি কাৰণত ব্যাকুল, যি মহাযজ্ঞ অনুষ্ঠান কৰে, বা যাৰ কৃষিৰ বাবে সঁজুলি লাগে; যি হোমৰ বাবে হৱিষ্য পাবলৈ ইচ্ছুক; যাৰ ঘৰত স্ত্ৰী প্ৰসৱসন্ন; যি গুৰুক দক্ষিণা দিব লাগিব; বা শিশুৰ পুষ্টিৰ বাবে গোধূধৰ প্ৰয়োজন—এনে সময়ত গোদানৰ বাবে দেশ-কাল বিচাৰ নকৰাই বিধেয়; এইবোৰকেই সাধাৰণ দেশ-কাল বুলি ধৰা হয়। যি গৰুৰ বিশেষ পৰিচয় জনা, যি কিনি অনা, যি জ্ঞানৰ পুৰস্কাৰ ৰূপে লাভ কৰা, যি প্ৰাণ-বিনিময়ত কিনা, যি জয়ৰ ফলত প্ৰাপ্ত, বা যি যৌতুক/দহেজত পোৱা—এনে গৰু দানৰ বাবে উত্তম বুলি মানা হয়। নচিকেত ক’লে—বৈবস্বত যমৰ বাক্য শুনি মই পুনৰ সুধিলোঁ—“গোদানকাৰী নাথাকিলে মানুহে সেই লোকসমূহ কেনেকৈ লাভ কৰে?”

Verse 38

नाचिकेत कहता है--वैवस्वत यमकी बात सुनकर मैंने पुनः उनसे पूछा--“भगवन्‌! यदि अभाववश गोदान न किया जा सके तो गोदान करनेवालोंको ही मिलनेवाले लोकोंमें मनुष्य कैसे जा सकता है?” ।। ततोडब्रवीद्‌ यमो धीमान्‌ गोप्रदानपरां गतिम्‌ । गोप्रदानानुकल्पं तु गामृते सन्ति गोप्रदा:,तदनन्तर बुद्धिमान्‌ यमराजने गोदानसम्बन्धी गति तथा गोदानके समान फल देनेवाले दानका वर्णन किया, जिसके अनुसार बिना गायके भी लोग गोदान करनेवाले हो सकते हैं?

নচিকেতে ক’লে—বৈবস্বত যমৰ বাক্য শুনি মই পুনৰ সুধিলোঁ—“ভগৱান! অভাৱবশত যদি গোদান কৰিব নোৱাৰি, তেন্তে গোদানকাৰীসকলৰ প্ৰাপ্য লোকসমূহলৈ মানুহ কেনেকৈ যাব?” তেতিয়া বুদ্ধিমান যমে গোদান-সম্পৰ্কীয় পৰম গতি ব্যাখ্যা কৰিলে আৰু গোদানৰ সমফলদায়ী ‘অনুকল্প’ (প্ৰতিস্থান) দানৰ কথাও ক’লে—যাৰ দ্বাৰা গৰু নাথাকিলেও সমফলদায়ী প্ৰতিদান কৰি মানুহ ‘গোপ্ৰদা’ হ’ব পাৰে।

Verse 39

अलाभे यो गवां दद्याद्‌ घृतधेनुं यतव्रत: । तस्यैता घृतवाहिन्यः भरन्ते वत्सला इव,“जो गौओंके अभावमें संयम-नियमसे युक्त हो घृतधेनुका दान करता है, उसके लिये ये घृतवाहिनी नदियाँ वत्सला गौओंकी भाँति घृत बहाती हैं

গৰু নথকাৰ সময়ত যি সংযম-নিয়মযুক্ত, ব্ৰতনিষ্ঠ ব্যক্তি ‘ঘৃতধেনু’ দান কৰে, তাৰ বাবে এই ঘৃতবাহিনী নদীবোৰে বৎসলা গাইৰ দৰে ঘৃত প্ৰবাহিত কৰে।

Verse 40

घृतालाभे तु यो दद्यात्‌ तिलधेनुं यतव्रत: । स दुर्गात्‌ तारितो थेन्वा क्षीरनद्यां प्रमोदते,'घीके अभावमें जो व्रत-नियमसे युक्त हो तिलमयी धेनुका दान करता है, वह उस धेनुके द्वारा संकटसे उद्धार पाकर दूधकी नदीमें आनन्दित होता है

ঘৃত নাপালে যি জনে ব্ৰত-নিয়মত স্থিৰ হৈ তিলময়ী ধেনু দান কৰে, সি সেই ধেনু-দানের পুণ্যবলে বিপদৰ পৰা উদ্ধাৰ পাই ক্ষীৰ-নদীত আনন্দ কৰে।

Verse 41

तिलालाभे तु यो दद्याज्जलधेनुं यतव्रत: । स कामप्रवहां शीतां नदीमेतामुपाश्ुते,“तिलके अभावमें जो व्रतशील एवं नियमनिष्ठ होकर जलमयी धेनुका दान करता है, वह अभीष्ट वस्तुओंको बहानेवाली इस शीतल नदीके निकट रहकर सुख भोगता है!

তিল নাপালে যি জনে ব্ৰতশীল আৰু নিয়মনিষ্ঠ হৈ জলময়ী ধেনু দান কৰে, সি কাম্য বস্তু বোৱাই নিয়া এই শীতল নদীৰ সান্নিধ্যত থাকি সুখ ভোগ কৰে।

Verse 42

एवमेतानि मे तत्र धर्मराजो न्यदर्शयत्‌ | दृष्टवा च परमं हर्षमवापमहमच्युत,धर्मसे कभी च्युत न होनेवाले पूज्य पिताजी! इस प्रकार धर्मराजने मुझे वहाँ ये सब स्थान दिखाये। वह सब देखकर मुझे बड़ा हर्ष प्राप्त हुआ

হে ধৰ্মৰ পৰা কেতিয়াও বিচ্যুত নোহোৱা পূজ্য পিতৃ! এইদৰে ধৰ্মৰাজে তাত মোক এই সকলো স্থান দেখুৱালে। সেয়া দেখি মই পৰম আনন্দ লাভ কৰিলোঁ।

Verse 43

निवेदये चाहमिमं प्रियं ते क्रतुर्महानल्पधनप्रचार: । प्राप्तो मया तात स मत्प्रसूत: प्रपत्स्थते वेदविधिप्रवृत्त:,तात! मैं आपके लिये यह प्रिय वृत्तान्त निवेदन करता हूँ कि मैंने वहाँ थोड़े-से ही धनसे सिद्ध होनेवाला यह गोदानरूप महान्‌ यज्ञ प्राप्त किया है। वह यहाँ वेदविधिके अनुसार मुझसे प्रकट होकर सर्वत्र प्रचलित होगा

তাত! তোমাৰ আগত এই প্ৰিয় সংবাদ নিবেদন কৰোঁ—অল্প ধনে সম্পন্ন কৰিব পৰা সেই মহান ক্ৰতু (গোদান-যজ্ঞ) মই তাত লাভ কৰিলোঁ। সেয়া মোৰ দ্বাৰা প্ৰকাশিত হৈ বেদবিধি অনুসাৰে ইয়াত প্ৰৱৰ্তিত হ’ব আৰু সৰ্বত্ৰ প্ৰচলিত হ’ব।

Verse 44

शापो हायं भवतोअनुग्रहाय प्राप्तो मया यत्र दृष्टो यमो वै | दानव्युष्टिं तत्र दृष्टवा महात्मन्‌ निःसंदिग्धान्‌ दानधर्माश्चिरिष्ये,आपके द्वारा मुझे जो शाप मिला, वह वास्तवमें मुझपर अनुग्रहके लिये ही प्राप्त हुआ था, जिससे मैंने यमलोकमें जाकर वहाँ यमराजको देखा। महात्मन्‌! वहाँ दानके फलको प्रत्यक्ष देखकर मैं संदेहरहित दानधर्मोका अनुष्ठान करूँगा

মহাত্মন! তোমাৰ দিয়া শাপ সঁচাকৈয়ে মোৰ প্ৰতি অনুগ্ৰহ আছিল; তাৰ ফলতেই মই যমলোকত গৈ স্বয়ং যমক দেখিলোঁ। তাত দানৰ ফল প্ৰত্যক্ষ দেখি এতিয়া মই সন্দেহহীনভাৱে দানধৰ্ম পালন কৰিম।

Verse 45

इदं च मामब्रवीद्‌ धर्मराज: पुन: पुन: सम्प्रहृष्टो महर्षे । दानेन यः प्रयतो5भूत्‌ सदैव विशेषतो गोप्रदानं च कुर्यात्‌,महर्षे! धर्मराजने बारंबार प्रसन्न होकर मुझसे यह भी कहा था कि “जो लोग दानसे सदा पवित्र होना चाहें" वे विशेषरूपसे गोदान करें

মহৰ্ষে! ধৰ্মৰাজে আনন্দিতচিত্তে পুনঃ পুনঃ মোক এই কথাও ক’লে—“যি দানৰ দ্বাৰা সদায় নিজকে পবিত্ৰ ৰাখিব খোজে, সি বিশেষকৈ গোদান কৰক।”

Verse 46

शुद्धों हार्थो नावमन्यस्व धर्मान्‌ पात्रे देयं देशकालोपपन्ने । तस्माद्‌ गावस्ते नित्यमेव प्रदेया मा भूच्च ते संशय: कश्चिदत्र,“मुनिकुमार! धर्म निर्दोष विषय है। तुम धर्मकी अवहेलना न करना। उत्तम देश, काल प्राप्त होनेपर सुपात्रको दान देते रहना चाहिये। अतः तुम्हें सदा ही गोदान करना उचित है। इस विषयमें तुम्हारे भीतर कोई संदेह नहीं होना चाहिये

“ধৰ্ম নিৰ্দোষ বিষয়; তাক অৱজ্ঞা নকৰিবা। উপযুক্ত দেশ-কাল উপস্থিত হ’লে সূপাত্ৰক দান দিয়া উচিত। সেয়ে তুমি নিত্য গোদান কৰা উচিত; এই বিষয়ে তোমাৰ মনত কোনো সংশয় নাথাকক।”

Verse 47

एता: पुरा हाददन्नित्यमेव शान्तात्मानो दानपथे निविष्टा: तपांस्युग्राण्यप्रतिशड्कमाना- स्ते वै दान॑ प्रददुश्चैव शक्‍त्या,'पूर्वकालमें शान्तचित्तवाले पुरुषोंने दानके मार्ममें स्थित हो नित्य ही गौओंका दान किया था। वे अपनी उग्र तपस्याके विषयमें संदेह न रखते हुए भी यथाशक्ति दान देते ही रहते थे

পূৰ্বকালত শান্তচিত্ত পুৰুষসকলে দানপথত স্থিত হৈ নিত্যই এই গাভীবোৰ দান কৰিছিল। তেওঁলোকে কঠোৰ তপস্যাত ৰত থাকিলেও তাত কোনো সংশয় নধৰি, নিজৰ সামৰ্থ্য অনুসাৰে দান অব্যাহত ৰাখিছিল।

Verse 48

काले च शक्‍्त्या मत्सरं वर्जयित्वा शुद्धात्मान: श्रद्धिन: पुण्यशीला: । दत्त्वा गा वै लोकममुं प्रपन्ना देदीप्यन्ते पुण्यशीलास्तु नाके,'कितने ही शुद्धचित्त, श्रद्धालु एवं पुण्यात्मा पुरुष ईर्ष्याका त्याग करके समयपर यथाशक्ति गोदान करके परलोकमें पहुँचकर अपने पुण्यमय शील-स्वभावके कारण स्वर्गलोकमें प्रकाशित होते हैं

যিসকল শুদ্ধচিত্ত, শ্রদ্ধাৱান আৰু পুণ্যশীল পুৰুষে ঈৰ্ষা ত্যাগ কৰি উপযুক্ত সময়ত নিজৰ সামৰ্থ্য অনুসাৰে গোদান কৰে, তেওঁলোকে পৰলোক প্ৰাপ্ত হয় আৰু পুণ্যশীল স্বভাৱৰ মহিমাৰে স্বৰ্গত দীপ্তিমান হয়।

Verse 49

एतद्‌ दानं न्यायलब्धं द्विजेभ्य: पात्रे दत्त प्रापणीयं परीक्ष्य । काम्याष्टम्या वर्तितव्यं दशाहं रसैर्गवां शकृता प्रस्नवैर्वा,“न्यायपूर्वक उपार्जित किये हुए इस गोधनका ब्राह्मणोंको दान करना चाहिये तथा पात्रकी परीक्षा करके सुपात्रको दी हुई गाय उसके घर पहुँचा देना चाहिये और किसी भी शुभ अष्टमीसे आरम्भ करके दस दिनोंतक मनुष्यको गोरस, गोबर अथवा गोमूत्रका आहार करके रहना चाहिये

এই দান—ন্যায়সঙ্গতভাবে লাভ কৰা গোধন—দ্বিজসকলক দিয়া উচিত। পাত্ৰৰ যোগ্যতা পৰীক্ষা কৰি সূপাত্ৰক দিয়া গাভীখন তেওঁৰ ঘৰলৈ যথাবিধি পঠিয়াই দিব লাগে। তাৰ পাছত যিকোনো শুভ অষ্টমীৰ পৰা আৰম্ভ কৰি দহ দিন গোৰস (দুধাদি), বা গোময়, বা গোমূত্ৰ আহাৰ কৰি নিয়ম পালন কৰা উচিত।

Verse 50

देवव्रती स्याद्‌ वृषभप्रदानै- वेंदावाप्तिगोयुगस्य प्रदाने । तीर्थावाप्तिगों प्रयुक्तप्रदाने पापोत्सर्ग: कपिलाया: प्रदाने,“एक बैलका दान करनेसे मनुष्य देवताओंका सेवक होता है। दो बैलोंका दान करनेपर उसे वेद-विद्याकी प्राप्ति होती है। उन बैलोंसे जुते हुए छकड़ेका दान करनेसे तीर्थसेवनका फल प्राप्त होता है और कपिला गायके दानसे समस्त पापोंका परित्याग हो जाता है

নচিকেতাই ক’লে— এটা ষাঁড় দান কৰিলে মানুহ দেৱসেৱাত অনুৰক্ত হয়। ষাঁড়ৰ জোৰা দান কৰিলে বেদবিদ্যা লাভ হয়। সেই ষাঁড়দ্বয়ে জোঁতা গাড়ী দান কৰিলে তীৰ্থসেৱনৰ পুণ্যফল পায়। আৰু কপিলা (তাম্ৰবৰ্ণ) গাই দান কৰিলে সকলো পাপ ত্যাগ হয়।

Verse 51

गामप्येकां कपिलां सम्प्रदाय न्यायोपेतां कलुषाद्‌ विप्रमुच्येत्‌ । गवां रसात्‌ परम॑ नास्ति किंचिद्‌ गवां प्रदानं सुमहद्‌ वदन्ति,“मनुष्य न्यायतः प्राप्त हुई एक भी कपिला गायका दान करके सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। गोरससे बढ़कर दूसरी कोई वस्तु नहीं है; इसीलिये विद्वान्‌ पुरुष गोदानको महादान बतलाते हैं

নচিকেতাই ক’লে— ন্যায়ে উপাৰ্জিত এটা কপিলা গাইও দান কৰিলে মানুহ কলুষ (পাপ)ৰ পৰা মুক্ত হয়। গোৰসতকৈ শ্ৰেষ্ঠ একো নাই; সেয়ে জ্ঞানীসকলে গোদানক মহাদান বুলি কয়।

Verse 52

गावो लोकांस्तारयन्ति क्षरन्त्यो गावश्षान्नं संजनयन्ति लोके । यस्तं जानन्न गवां हार्दमेति स वै गन्ता निरयं पापचेता:,गौएँ दूध देकर सम्पूर्ण लोकोंका भूखके कष्टसे उद्धार करती हैं। ये लोकमें सबके लिये अन्न पैदा करती हैं। इस बातको जानकर भी जो गौओंके प्रति सौहार्दका भाव नहीं रखता, वह पापात्मा मनुष्य नरकमें पड़ता है

গাইবোৰে দুধ দি লোকসমূহক ক্ষুধাৰ দুখৰ পৰা উদ্ধাৰ কৰে; আৰু এই লোকতে সকলোৰে বাবে অন্ন-পোষণ উৎপন্ন কৰে। এই কথা জানিও যি গাইৰ প্ৰতি সৌহার্দ্য নাৰাখে, সি পাপচেতা নৰকলৈ যায়।

Verse 53

यैस्तद्‌ दत्तं गोसहस््रं शतं वा दशार्थ वा दश वा साधुवत्सम्‌ | अप्येका वै साधवे ब्राह्म॒णाय सास्यामुष्मिन्‌ पुण्यतीर्था नदी वै,“जो मनुष्य किसी श्रेष्ठ ब्राह्यणको सहस्र, शत, दस अथवा पाँच गौओंका उनके अच्छे बछड़ोंसहित दान करता है अथवा एक ही गाय देता है, उसके लिये वह गौ परलोकमें पवित्र तीर्थोवाली नदी बन जाती है

নচিকেতাই ক’লে— যিয়ে যোগ্য ব্ৰাহ্মণক সামৰ্থ্য অনুসাৰে সহস্ৰ, শত, দশ বা (কিছু) গাই উত্তম বাছুৰসহ দান কৰে, বা এটা গাইও দিয়ে—সেই গাই পৰলোকত তাৰ বাবে পুণ্যতীৰ্থসমৃদ্ধ নদী হৈ পৰে।

Verse 54

प्राप्त्या पुष्टया लोकसंरक्षणेन गावस्तुल्या: सूर्यपादै: पृथिव्याम्‌ शब्दश्नैक: संततिश्नोपभोगा- स्तस्माद्‌ गोद: सूर्य इवावभाति,'प्राप्ति, पुष्टि तथा लोकरक्षा करनेके द्वारा गौएँ इस पृथ्वीपर सूर्यकी किरणोंके समान मानी गयी हैं। एक ही “गो” शब्द धेनु और सूर्य-किरणोंका बोधक है। गौओंसे ही संतति और उपभोग प्राप्त होते हैं; अतः गोदान करनेवाला मनुष्य किरणोंका दान करनेवाले सूर्यके ही समान माना जाता है

প্ৰাপ্তি, পুষ্টি আৰু লোকৰক্ষাৰ দ্বাৰা পৃথিৱীত গাইবোৰ সূৰ্যৰ কিৰণৰ তুল্য বুলি মানা হয়। ‘গো’ শব্দটো একেই—ধেনু আৰু সূৰ্যৰশ্মি দুয়োটাকেই বুজায়। গাইৰ পৰাই সন্ততি আৰু ভোগ-জীৱনোপযোগী উপকৰণ জন্মে; সেয়ে গোদানকাৰী সূৰ্যৰ দৰে দীপ্তিমান, যেন কিৰণেই দান কৰে।

Verse 55

गुरुं शिष्यो वरयेद्‌ गोप्रदाने स वै गन्ता नियतं स्वर्गमेव । विधिज्ञानां सुमहान्‌ धर्म एष विधिं ह्याद्यं विधय: संविशन्ति,“शिष्य जब गोदान करने लगे, तब उसे ग्रहण करनेके लिये गुरुको चुने। यदि गुरुने वह गोदान स्वीकार कर लिया तो शिष्य निश्चय ही स्वर्गलोकमें जाता है। विधिके जाननेवाले पुरुषोंके लिये यह गोदान महान्‌ धर्म है। अन्य सब विधियाँ इस आदि विधिमें ही अन्तर्भूत हो जाती हैं

শিষ্য যেতিয়া গোদান কৰিবলৈ উদ্যত হয়, তেতিয়া তাক গ্ৰহণ কৰিবলৈ যোগ্য গুৰুক বাছি ল’ব লাগে। গুৰুৱে যদি সেই গোদান গ্ৰহণ কৰে, তেন্তে শিষ্য নিশ্চিতভাৱে স্বৰ্গলোক লাভ কৰে। বিধি-ধৰ্ম জানোঁতা লোকৰ বাবে এই গোদান মহাধৰ্ম; প্ৰকৃততে আন সকলো বিধান এই আদ্য বিধিতেই অন্তৰ্ভুক্ত।

Verse 56

इदं दान॑ न्‍्यायलब्धं द्विजेभ्य: पात्रे दत्त्वा प्रापयेथा: परीक्ष्य । त्वय्याशंसन्त्यमरा मानवाश्नर वयं चापि प्रसृते पुण्यशीले,“तुम न्‍्यायके अनुसार गोधन प्राप्त करके पात्रकी परीक्षा करनेके पश्चात्‌ श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको उनका दान कर देना और दी हुई वस्तुको ब्राह्मणके घर पहुँचा देना। तुम पुण्यात्मा और पुण्यकार्यमें प्रवृत्त रहनेवाले हो; अतः देवता, मनुष्य तथा हमलोग तुमसे धर्मकी ही आशा रखते हैं'

এই দান ন্যায়সঙ্গতভাৱে লাভ কৰি, পাত্ৰৰ পৰীক্ষা কৰি, শ্ৰেষ্ঠ দ্বিজসকলক দান কৰা; আৰু দিয়া বস্তুটো ব্ৰাহ্মণৰ গৃহলৈ সঁচাকৈয়ে পৌঁছোৱাটো নিশ্চিত কৰা। তুমি পুণ্যশীল আৰু পুণ্যকৰ্মত সদা প্ৰবৃত্ত; সেয়ে দেৱতা, মানুহ আৰু আমিও তোমাৰ পৰা কেৱল ধৰ্মৰেই আশা ৰাখোঁ।

Verse 57

इत्युक्तोडहं धर्मराजं द्विजर्षे धर्मात्मानं शिरसाभिप्रणम्य । अनुज्ञातस्तेन वैवस्वतेन प्रत्यागमं भगवत्पादमूलम्‌,ब्रह्मर्ष! धर्मराजके ऐसा कहनेपर मैंने उन धर्मात्मा देवताको मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और फिर उनकी आज्ञा लेकर मैं आपके चरणोंके समीप लौट आया

হে দ্বিজর্ষি! ধৰ্মৰাজে এনেদৰে ক’লে মই সেই ধৰ্মাত্মা দেৱতাক মস্তক নত কৰি প্ৰণাম কৰিলোঁ; আৰু বৈবস্বত যমৰ অনুমতি পাই মই আপোনাৰ ভগৱৎ চৰণমূললৈ পুনৰ উভতি আহিলোঁ।

Verse 73

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि यमवाक्‍्यं नाम एकसप्ततितमो<ध्याय:

এইদৰে শ্ৰীমহাভাৰতৰ অনুশাসনপৰ্বৰ দানধৰ্মপৰ্বত ‘যমবাক্য’ নামৰ একাত্তৰতম অধ্যায় সমাপ্ত হ’ল।

Frequently Asked Questions

Yudhiṣṭhira asks for a comparative account of the fruits of multiple disciplines—vows, rules, study, restraint, Vedic practice, giving, truthfulness, celibacy, and service—seeking a ranked understanding of merit and its outcomes.

Bhīṣma frames dama as merit-preserving and often superior to dāna when giving is compromised by anger; anger is described as destroying the value of the act, while self-control stabilizes both conduct and its results.

Yes: it explicitly elevates satya above even large-scale ritual comparison (aśvamedha), presenting truth as cosmically foundational and as a decisive basis for auspicious post-mortem states (svarga/brahmaloka).