
कर्णस्य दानप्रतिज्ञा–शल्योपदेश–वाक्ययुद्धम् (Karna’s Gift-Vows, Shalya’s Counsel, and the Battle of Words)
Upa-parva: Karṇa–Śalya Saṃvāda (Rhetorical Contest and Counsel Episode)
Saṃjaya reports that as Karṇa advances he repeatedly asks, upon seeing each Pāṇḍava, to be shown Arjuna (śvetavāhana). Karṇa publicly offers a graded series of boons—wealth, jeweled carts, golden elephants and cattle, adorned women, large numbers of horses, chariots, and elephants—framing the sighting of Arjuna (and later Kṛṣṇa–Arjuna together) as a prize-worthy disclosure. The Kaurava camp responds with drums, instruments, and collective exhilaration. Śalya then rebukes Karṇa’s overconfidence, warning against imprudent gifting and unrealistic aims, using layered similes to portray Karṇa as mismatched against Arjuna (e.g., jackal vs lion, hare vs elephant), and urging a more guarded approach. Karṇa answers by reaffirming his intent, rejecting intimidation, and asserting his knowledge of both his own and Arjuna’s capacities; he introduces a special arrow reserved for Arjuna or Kṛṣṇa and escalates into harsh invective against Śalya and the Madra people via proverbial gāthās. The chapter ends with Karṇa threatening violence if Śalya repeats such speech, while maintaining his determination to fight.
Chapter Arc: रणभूमि में धर्मराज युधिष्ठिर के सामने दुर्योधन सहसा आ पड़ता है; युधिष्ठिर उसे रोकते हुए ‘तिष्ठ’ कहकर चुनौती देता है और क्षण भर में युद्ध का केंद्र एक ही रथ-द्वंद्व बन जाता है। → दुर्योधन क्रोध से भरकर युधिष्ठिर को तीखे बाणों से बेधता है और सारथि पर भी प्रहार करता है। इसी बीच पंचाल कौरवों से सर्वत्र भिड़ जाते हैं—पैदल, घोड़े, हाथी, रथ—सब स्तरों पर टकराव फैलकर घोर संमिश्र युद्ध बन जाता है; नाराचों से महाबली गज गिरते हैं और पंक्तियाँ टूटती-बिखरती हैं। → युद्ध की पहचान मिट जाती है—बाणों से व्याकुल योद्धा अपने-पराये में भेद नहीं कर पाते; कहीं रथयुद्ध, कहीं हाथियों का संहार, और फिर मुष्टियुद्ध, केशग्रहण तथा बाहुयुद्ध तक उतर आता है। संकट में पड़े ‘नराधिप’ (दुर्योधन) की रक्षा हेतु कर्ण, अश्वत्थामा और कृपाचार्य युधिष्ठिर के सम्मुख सहसा आ खड़े होते हैं—एक क्षण में द्वंद्व बहु-वीर संग्राम में बदल जाता है। → दिन का दृश्य उन्मत्त कोलाहल में डूबता है—दोनों सेनाएँ अव्यवस्था और भ्रम से ग्रस्त होकर एक-दूसरे को ही नहीं, अनजाने में अपने पक्ष को भी क्षति पहुँचाती हैं; राजाओं की ‘जयगृद्धि’ युद्ध को और निर्दय बनाती है। अध्याय का अंत संशप्तकों की पराजय-विषयक संकेत के साथ इस व्यापक संहार-चित्र को स्थिर करता है। → कर्ण–अश्वत्थामा–कृप के हस्तक्षेप के बाद युधिष्ठिर के सामने अब कौन-सा निर्णायक प्रहार होगा, और दुर्योधन की रक्षा किस मूल्य पर टिकेगी—यह अगले अध्याय की देहरी पर छोड़ दिया जाता है।
Verse 1
इस प्रकार श्रीमह्याभारत कर्णपर्वमें संशप्तकोंकी पराजयविषयक सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ २७ ॥। नशा (0) आज अत +> अष्टाविशोश् ध्याय: युधिष्ठिर और दुर्योधनका युद्ध
قال سنجيا: أيها الملك، بينما كان يودهيشثيرا يطلق سيلاً من السهام، خرج الملك دوريوذانا بنفسه للقائه وجهاً لوجه، متلقّياً الهجوم كفارس لا يعرف الخوف. ويُبرز هذا المشهد واجب الملوك وبأس الفرد ضمن أخلاق المواجهة القاسية في ساحة القتال.
Verse 2
तमापतन्तं सहसा तव पुत्र महारथम् | धर्मराजो द्रुतं विद्ध्वा तिष्ठ तिछेति चाब्रवीत्,सहसा आते हुए आपके महारथी पुत्रको धर्मराज युधिष्ठिरने तुरंत ही घायल करके कहा--'अरे! खड़ा रह, खड़ा रह”
قال سنجيا: لما اندفع ابنك—ذلك المقاتل العظيم على العربة—اندفاعاً مباغتاً، عاجله دهرماراجا يودهيشثيرا بسهم فأصابه وجرحه، ثم صاح: «اثبت! اثبت!» فكان ذلك تحدّياً جعل اللقاء امتحاناً مباشراً للبأس وضبط النفس وسط فوضى الحرب.
Verse 3
सतुतंप्रतिविव्याध नवभिर्निशितै: शरै: । सारथिं चास्य भल््लेन भृशं क्रुद्धोभ्यताडयत्
قال سنجيا: وقد استبدّ به الغضب، فانتقم بأن طعنه بتسعة سهام حادّة، وفي فورته ضرب سائقه أيضاً ضربة شديدة بسهمٍ من نوع «بهلّا» (bhalla). وتُظهر هذه الحادثة كيف أن krodha (السخط/الغضب) في لهيب القتال يدفع إلى ردٍّ خاطف، وقد يفيض حتى يصيب من لا شأن له إلا الخدمة، كاشفاً الخطر الأخلاقي للغضب تحت مطالب الحرب.
Verse 4
ततो युधिष्छिरो राजन् स्वर्णपुड्खाजञ्छिलीमुखान् । दुर्योधनाय चिक्षेप त्रयोदश शिलाशितान्,राजन! तब युधिष्ठिरने सानपर चढ़ाकर तेज किये हुए सुवर्णमय पंखवाले तेरह बाण दुर्योधनपर चलाये
قال سانجيا: ثمّ، أيها الملك، رمى يودهيشثيرا على دوريودhana ثلاثةَ عشرَ سهماً—محدَّدةً مصقولةً على الحجر، مركَّبةً بريشٍ من ذهب. ويُظهر هذا الفعل عزماً قاتماً لملوكيةٍ عادلةٍ أُكرهت على القتال: فحتى المتمسّك بالدارما لا بدّ أن يستعمل عنفاً منضبطاً حين تصبح الحرب لا مفرّ منها.
Verse 5
चतुर्भिश्चतुरो वाहांस्तस्य हत्वा महारथ: । पजञ्चमेन शिर: कायात् सारथेश्व समाक्षिपत्
قال سانجيا: إنّ ذلك المحارب العظيم على العربة قتل خيولَ دوريودhana الأربعة بأربعة سهام؛ ثمّ بسهمٍ خامس قطع رأس السائق عن جسده وألقاه إلى الأرض. ويؤكّد المشهد دقّة المهارة القتالية القاسية، حيث تسير الضرورة التكتيكية وتآكلُ ضبط النفس جنباً إلى جنب وسط انهيار نظام الدارما في الحرب.
Verse 6
षष्ठेन तु ध्वजं राज्ञ: सप्तमेन तु कार्मुकम् । अष्टमेन तथा खड्गं पातयामास भूतले,फिर छठे बाणसे राजा दुर्योधनके ध्वजको, सातवेंसे उसके धनुषको और आठवेंसे उसकी तलवारको भी पृथ्वीपर गिरा दिया
قال سانجيا: وبالسهم السادس أسقط رايةَ الملك، وبالسهم السابع أوقع قوسَه، وبالسهم الثامن جعل سيفَه أيضاً يهوي إلى الأرض. وفي النسيج الأخلاقي للمعركة، كان ذلك استعراضاً لمهارةٍ أسمى يرمي إلى تجريد الخصم من علامات السلطة الظاهرة وأدواتها—إذلاله وتقليص قدرته على القتال—لا مجرد السعي إلى قتلٍ سريع.
Verse 7
हताश्चात्तु रथात्तस्मादवप्लुत्य सुतस्तव
قال سانجيا: «إنّ ابنك، وقد ضُرِبَ ووهَنَ قلبُه، قفز من تلك العربة.»
Verse 8
तं तु कृच्छूगतं दृष्टवा कर्णद्रीणिकृपादय:
قال سانجيا: ولمّا رأوه قد سقط في ضيقٍ شديد، توجّه كَرْنَةُ ودْرِنيكَةُ وكِرْپَةُ وسائرُهم إليه، مدفوعين بإلحاح اللحظة في ساحة القتال.
Verse 9
अथ पाण्डुसुता: सर्वे परिवार्य युधिष्ठिरम्
قال سانجيا: ثم إن أبناء باندو جميعًا التفّوا حول يودهيشثيرا، يضيقون الدائرة عليه تضامنًا وحمايةً—صورةٌ لواجب الإخوة وسط وطأة الحرب الأخلاقية.
Verse 10
ततस्तूर्यसहस्राणि प्रावाद्यन्त महामृथे
ثم، في خضم ذلك الاصطدام العظيم، دوّت آلافُ آلات الحرب، فاشتدّ صخبُ المعركة وأُعلنت عزيمةُ المقاتلين الضارية، بينما اندفع الصراع قُدمًا.
Verse 11
यत्रा भ्यगच्छन् समरे पञ्चाला: कौरवै: सह,उस युद्धमें समस्त पांचाल कौरवोंके साथ भिड़ गये। पैदल पैदलोंके, हाथी हाथियोंके, रथी रथियोंके और घुड़सवार घुड़सवारोंके साथ युद्ध करने लगे
قال سانجيا: هناك، في تلك المعركة، دنا البانشالا واشتبكوا مع الكورافا. فقاتل المشاةُ المشاةَ، وتلاقَت الفيلةُ بالفيلة، وتصادم فرسانُ العجلات بفرسان العجلات، وتبارز الفرسانُ بالفرسان—كلُّ صنفٍ يواجه نظيره، حتى انقبضت الحرب إلى قتالٍ مباشرٍ منظّم.
Verse 12
नरा नरै: समाजम्मुर्वारणा वरवारणै: । रथाश्र रथिग्रि: सार्थ हयाश्व हयसादिभि:
قال سانجيا: في تلك المعركة، التحَم المشاةُ بالمشاة، والفيلةُ بفيلةٍ تقابلها، وفرسانُ العجلات بفرسان العجلات، والفرسانُ بالفرسان. وهكذا التقت الجيوش قتالًا ندًّا لندّ—منظّمًا لكنه قاسيًا—إذ يواجه كلُّ صنفٍ نظيرَه في حساب الحرب الصارم.
Verse 13
दन्द्धान्यासन् महाराज प्रेक्षणीयानि संयुगे । विविधान्यप्यचिन्त्यानि शस्त्रवन्त्युत्तमानि च,महाराज! उस रणभूमिमें होनेवाले नाना प्रकारके अचिन्तनीय, शस्त्रयुक्त तथा उत्तम द्न्द्ययुद्ध देखने ही योग्य थे
قال سانجيا: «يا أيها الملك، في ذلك الميدان كانت ضروبٌ كثيرة من المبارزات—مشاهد جديرة بأن تُرى في الحرب—متنوعة بل لا تُتصوَّر، مسلّحةً بأفخر الأسلحة وعلى أرفع مستوى.»
Verse 14
ते शूरा: समरे सर्वे चित्र॑ं लघु च सुष्ठु च अयुध्यन्त महावेगा: परस्परवधैषिण:,वे महान् वेगशाली समस्त शूरवीर समरांगणमें एक-दूसरेके वधकी इच्छासे विचित्र, शीघ्रतापूर्ण तथा सुन्दर रीतिसे युद्ध करने लगे
قال سنجيا: إنّ أولئك الأبطال جميعًا، ذوي السرعة والقوة العاتية، شرعوا يقاتلون في ساحة الوغى—يضربون بضروبٍ شتّى، على عَجَلٍ وبمهارةٍ محكمة—وكلٌّ منهم مدفوعٌ برغبةٍ في قتل الآخر.
Verse 15
अन्योन्यं समरे जष्नुर्योधव्रतमनुछिता: । नहि ते समरं चक्र: पृष्ठठो वै कथठ्चन,वे वीर योद्धाके व्रतका पालन करते हुए युद्धस्थलमें एक-दूसरेको मारते थे। उन्होंने किसी तरह भी युद्धमें पीठ नहीं दिखायी
قال سنجيا: ملتزمين بميثاق المحارب دون انحراف، كانوا يصرعون بعضهم بعضًا في ساحة القتال. ولم يُولّوا الأدبار في المعركة قطّ؛ ولم يلجأ أولئك الأبطال إلى التراجع بأي وجه.
Verse 16
मुहूर्तमेव तद् युद्धमासीन्म धुरदर्शनम् । तत उन्मत्तवद् राजन् निर्मर्यादमवर्तत,राजन! दो ही घड़ीतक वह युद्ध देखनेमें मधुर जान पड़ा। फिर तो वहाँ उन्मत्तके समान मर्यादाशून्य बर्ताव होने लगा
قال سنجيا: «يا مولاي الملك، لم تلبث تلك المعركة إلا هنيهةً حتى بدت للنظر كأنها حسنة المنظر. ثم، يا مولاي الملك، انقلبت كأنها جنونٌ؛ فسادت أفعالٌ بلا كابح ولا حدّ.»
Verse 17
रथी नागं समासाद्य दारयन् निशितै: शरै: । प्रेषयामास कालाय शरै: संनतपर्वभि:,रथी हाथीका सामना करके झुकी हुई गाँठवाले तीखे बाणोंद्वारा उसे विदीर्ण करते हुए कालके गालमें भेजने लगे
قال سنجيا: إنّ فارس العربة دنا من الفيل، ومزّقه بسهامٍ حادّة—سهامٍ معقوفة المفاصل—وكان لا يزال يرسله إلى فكّي الموت.
Verse 18
नागा हयान् समासाद्य विक्षिपन्तो बहून् रणे । दारयामासुरत्युग्रं तत्र तत्र तदा तदा
قال سنجيا: إنّ الأفيال إذ دنت من الخيل، قبضت على كثيرٍ منها في ساحة القتال، وقذفتها في جهاتٍ شتّى، تسحقها وتمزّقها مرارًا وتكرارًا، هنا وهناك. فغدا المشهد في تلك اللحظة بالغَ الفظاعة.
Verse 19
हयारोहाश्व बहव: परिवार्य गजोत्तमान् | तलशब्दरवांश्वक्रु: सम्पतन्तस्ततस्तत:
قال سنجيا: إن فرسانًا كثيرين أحاطوا بخيرة الفيلة، واندفعوا هنا وهناك يصفقون ويثيرون جلبةً مدوّية. فارتاعت الفيلة الضخمة من ذلك الضجيج، فأخذت تعدو وتتفرق؛ عندئذٍ أخذ الفرسان يرمونها بالسهام من الجانبين ومن الخلف—صورةٌ لقسوة الحرب المحسوبة، حيث يُستعمل الضجيج والذعر والمطاردة لكسر حتى أعظم القوى بأسًا.
Verse 20
धावमानांस्ततस्तांस्तु द्रवमाणान् महागजान् । पार्श्वतः पृष्ठतश्चैव निजघ्नु्हयसादिन:
قال سنجيا: ثم إن الفرسان أخذوا يصرعون تلك الفيلة العظام وهي تعدو في اضطراب وتفرّ، يهاجمونها من الجانبين ومن الخلف. ويُبرز المشهد قسوة تكتيكات القتال، إذ يُستغل ذعر دوابّ الحرب لكسر قوة الجيش، مهما كان ما يُنزَل بها من ألم.
Verse 21
विद्राव्य च बहूनश्वान् नागा राजन् मदोत्कटा: । विषाणैश्वापरे जघ्नुर्ममृदुश्चापरे भूशम्
قال سنجيا: أيها الملك، إن كثيرًا من الفيلة المشتعلة بجنون الهيجان (المَسْت) قد طردت أعدادًا عظيمة من الخيل؛ فبعضها قتلها بطعنها وسحقها بالأنياب، وبعضها داسها تحت الأقدام بقوة اندفاعه. ويُبرز المشهد زخم الحرب الوحشي، حيث تغلب القوة والحمّى على الكائنات الحية، ويغدو الميدان موضعًا تُساق فيه المخلوقات إلى عنفٍ يتجاوز كل اختيارٍ أخلاقي.
Verse 22
साशअ्चारोहांश्व तुरगान् विषाणैर्विव्यधू रुषा । अपरे चिक्षिपुर्वेगात् प्रगृह्मातिबलास्तदा
قال سنجيا: إن كثيرًا من الفيلة، وقد امتلأت غضبًا، مزّقت الخيل مع فرسانها بأنيابها؛ وبعض الفيلة الملوكية شديدة البأس قبضت على تلك الخيل ثم قذفت بها بعيدًا بقوةٍ خاطفة.
Verse 23
पादातैराहता नागा विवरेषु समन्ततः । चक्कुरार्तस्वरं घोरें दुद्र॒ुवुश्ष दिशो दश
قال سنجيا: ولما ضُربت الفيلة من المشاة من كل جانب—وخاصةً عند الثغرات الضعيفة—أطلقت صرخاتٍ مروّعة من الألم، ثم ولّت هاربةً إلى الجهات العشر. ويُظهر المشهد كيف ينهار في فوضى الحرب حتى أعظم القوى إذا استُغلت مواطن ضعفها، وكيف ينتشر العذاب في ساحة القتال بلا تمييز.
Verse 24
पदातीनां तु सहसा प्रद्गुतानां महाहवे । उत्सृज्याभरणं तूर्णमवप्लुत्य रणाजिरे
Sañjaya said: In that great battle, the foot-soldiers suddenly broke into flight. Casting off their ornaments, they leapt about and rushed away across the field. Those strange ornaments, abandoned in panic, became a cause of further harm: the elephants, taking them as occasions for striking, would lift the fleeing men with their trunks and then crush and shatter them between their tusks—showing how fear and disorder in war turn even one’s own possessions into instruments of ruin.
Verse 25
निमित्तं मन्यमानास्तु परिणाम्य महागजा: । जग्हुर्बिभिदुश्वैव चित्राण्याभरणानि च
Sañjaya said: Taking it as an ominous sign, the great elephants, turning back, seized and crushed the soldiers’ ornate ornaments as well—snatching them up and breaking them—amid the panic of men fleeing the battlefield. The scene underscores how, in the chaos of war, fear and superstition mingle with brute force, and even objects of pride become tokens of dread and destruction.
Verse 26
तांस्तु तत्र प्रसक्तान् वै परिवार्य पदातय: । हस्त्यारोहान् निजघ्नुस्ते महावेगा बलोत्कटा:
Sañjaya said: There, the foot-soldiers—fierce with strength and moving with great speed—surrounded those who had become entangled and then struck down the elephant-riders. The scene underscores the ruthless momentum of battle, where tactical advantage and confusion can swiftly turn into slaughter, eclipsing any space for restraint.
Verse 27
अपरे हस्तिभिहस्तै: खं विक्षिप्ता महाहवे । निपतन्तो विषाणाग्रैर्भुशं विद्धा: सुशिक्षितै:
Verse 28
अपरे सहसा गृह विषाणैरेव सूदिता: । सेनान्तरं समासाद्य केचित् तत्र महागजै:
Sañjaya said: Others, seized in an instant, were crushed to death by the very tusks. Some, after the great elephants forced their way into the midst of the army, were slain there—trampled, gored, and broken—showing how, in the frenzy of battle, living beings are reduced to helpless victims of brute force, and how war swiftly overwhelms restraint and compassion.
Verse 29
क्षुण्णगात्रा महाराज विक्षिप्य च पुन: पुनः । अपरे व्यजनानीव विकश्राम्य निहता मृथे
قال سنجيا: أيها الملك، إنّ بعض المحاربين سُحِقت أطرافهم، فأُمسكوا وقُذِفوا مرارًا وتكرارًا؛ وآخرين دُوِّروا كالمراوح اليدوية ثم قُتلوا في ساحة القتال. لقد اندفعت فيالق من الفيلة العظام إلى داخل الجيش، فكانت تخطف المشاة بغتةً، وتهوي بأجسادهم وتُرجّها مرة بعد مرة حتى تتحطم، وتُدوِّر آخرين كأنهم مراوح ثم ترديهم قتلى في المعمعة.
Verse 30
पुर:सराक्ष नागानामपरेषां विशाम्पते । शरीराण्यतिविद्धानि तत्र तत्र रणाजिरे,प्रजानाथ! जो हाथियोंके आगे चलनेवाले पैदल थे, वे दूसरे पक्षके हाथियोंके शरीरोंको जहाँ-तहाँ रणभूमिमें अत्यन्त घायल कर देते थे
قال سنجيا: يا سيد الرعية، إنّ المشاة الذين كانوا يسيرون أمام الفيلة أخذوا يضربون أجساد فيلة الخصم مرارًا في ساحة القتال، يطعنونها ويُثخنونها جراحًا في مواضع شتى.
Verse 31
प्रतिमानेषु कुम्भेषु दन्तवेष्टेषु चापरे । निगृहीता भृशं नागा: प्रासतोमरशक्तिभि:
وفي مواضع، كان المشاة يضربون بفِراس (prāsa) وتومارا (tomara) وشَكتي (śakti) الموضع بين النابين، ونتوء الجبهة (الكُمبه)، وفوق الشفة لدى فيلة العدو، فيقهرونها قهرًا شديدًا ويكبحونها.
Verse 32
निगृहा च गजा: केचित् पार्श्रस्थैर्भशदारुणै: । रथाश्व॒सादिभिस्तत्र सम्भिन्ना न्यपतन् भुवि
قال سنجيا: إنّ بعض الفيلة، بعدما كُفَّت وحُوصرت، طعنها واخترقها رماةُ العربات وفرسانٌ بالغو الهول كانوا قائمين على جوانبها. ومزّقتها وابلُ السهام، فسقطت تلك الفيلة هناك على الأرض.
Verse 33
सहसा सादिनस्तत्र तोमरेण महामृधे । भूमावमृदनन् वेगेन सरचर्माणं पदातिनम्,उस महासमरमें कितने ही हाथीसवार सहसा तोमरका प्रहार करके ढालसहित पैदल योद्धाको गिराकर उसे वेगपूर्वक धरतीपर रौंद डालते थे
قال سنجيا: في تلك المعركة العظمى المحتدمة، كان راكبو الفيلة يضربون بغتةً بالتومارا؛ فيُسقطون المشاة مع تُروسهم، ثم يطؤونهم بسرعةٍ وقوة حتى يُدقّوا في التراب.
Verse 34
तथा सावरणान कांक्षित्तत्र तत्र विशाम्पते । रथान् नागा: समासाद्य परिगृह्य॒ च मारिष
قال سنجيا: «يا سيدَ الناس، في تلك المعركة المروِّعة كانت الفيلةُ تدنو مرارًا، فتقبض بخراطيمها على العرباتِ المُغطّاة، ثم تندفع فجأةً فتجرّها وتلقي بها بعيدًا. غير أنّ تلك الفيلةَ الجبّارة نفسها، إذا أصابتها السهامُ الحادّة، كانت تهوي إلى الأرض كقِمّةِ جبلٍ حطّمها الفَجْرَةُ (الفَجْرَة/الفَجْرَة: الفَجْرَة هنا بمعنى صاعقة الفَجْرَة، أي الفَجْرَة/الفَجْرَة) — كأنها قمةٌ شُقّت بصاعقةِ الفَجْرَة (فَجْرَة/فَجْرَة: vajra).»
Verse 35
व्याक्षिपन् सहसा तत्र घोररूपे भयानके । नाराचै्निहताश्लापि गजा:ः पेतुर्महाबला:
قال سنجيا: «في ذلك المشهد الرهيب المفزع اضطربت الصفوف فجأة؛ حتى الفيلةُ العظام، حين أصابتها سهامٌ حديديةٌ حادّة، سقطت إلى الأرض.»
Verse 36
योधा योधान् समासाद्य मुष्टिभिव्यहनन् युधि
قال سنجيا: «كان مقاتلٌ يدنو من المقاتلين الخصوم، وفي خِضَمّ القتال كان يضربهم بقبضتيه العاريتين.»
Verse 37
उद्यम्य च भुजावन्यो निक्षिप्पय च महीतले
قال سنجيا: «ومقاتلٌ آخر رفع ذراعيه، ثم ألقى بنفسه على الأرض.»
Verse 38
पततश्चापरो राजन् विजहारासिना शिर:
قال سنجيا: «أيها الملك، وبينما كان يهوي، عمد المقاتلُ الآخر بسيفه فقطع رأسه قطعًا باتًّا.»
Verse 39
मुष्टियुद्धं महच्चासीद् योधानां तत्र भारत
قال سنجيا: يا بهاراتا، لقد وقع هناك نزالٌ عظيمٌ بالمصارعة والقبضات بين المحاربين.
Verse 40
समासक्तस्य चान्येन अविज्ञातस्तथापर:
قال سنجيا: إذا كان المرء ملتصقًا اشتباكًا شديدًا بغيره لم يتعرّف عليه الآخر؛ وكذلك الآخر أيضًا يبقى غير مُتعرَّف عليه.
Verse 41
जहार समरे प्राणान् नानाशस्त्रैरनेकथा । कोई-कोई योद्धा दूसरेके साथ उलझे हुए सैनिकसे स्वयं अपरिचित रहकर नाना प्रकारके अनेक अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा युद्धमें उसके प्राण हर लेता था || ४० $ ।।
قال سنجيا: في ساحة القتال كانت الأرواح تُزهَق بطرائق شتّى وبشتى أصناف السلاح. وحين اشتبك المحاربون والتحموا، وصارت المعركة هرجًا ومرجًا، كان بعضهم—إذ لا يميّز خصمه في الزحام—يضرب بمقذوفاتٍ وأسلحةٍ متنوعة، فيسلبه الحياة.
Verse 42
शोणितै: सिच्यमानानि शस्त्राणि कवचानि च
قال سنجيا: كانت الأسلحة والدروع تُغمر بالدماء.
Verse 43
एवमेतन्महद् युद्ध दारुणे शस्त्रसंकुलम्
قال سنجيا: هكذا هو الأمر حقًّا—لقد غدت هذه المعركة العظمى مروّعة، مكتظّةً بالسلاح من كل جانب.
Verse 44
उन्मत्तगज्जप्रतिमं शब्देनापूरयज्जगत् । इस प्रकार अस्त्र-शस्त्रोंसे परिपूर्ण यह महाभयानक युद्ध बढ़ी हुई गंगाके समान जगत्को कोलाहलसे परिपूर्ण कर रहा था ।।
قال سنجيا: «كفيلٍ هائجٍ، ملأ العالم بزئيره. أيها الملك، في تلك المعركة المروِّعة—المزدحمة بالمقذوفات والأسلحة، المتلاطمة كالغنغا حين يفيض—غمر الضجيج كلَّ شيء؛ حتى إن المصابين بالسهام لم يعودوا يُعرَفون: أَهُم من “قومنا” أم من “العدو”.»
Verse 45
स्वान् स्वे जघ्नुर्महाराज परांश्वैव समागतान्
قال سنجيا: أيها الملك العظيم، في ذلك الالتحام كان المحاربون يقتلون رجالهم داخل صفوفهم، ويصرعون كذلك مقاتلي العدو الذين اجتمعوا للقتال—إذ غدت المعركة من شدة الاضطراب والوحشية بلا تمييز.
Verse 46
रथैर्भग्नैर्महाराज वारणैश्न निपातितै:,राजेन्द्र! टूटे हुए रथों, धराशायी हुए हाथियों, मरकर गिरे हुए घोड़ों और गिराये गये पैदल सैनिकोंसे क्षणभरमें यह पृथ्वी ऐसी हो गयी कि वहाँ चलना-फिरना असम्भव हो गया
قال سنجيا: «أيها الملك العظيم، إذ تحطمت العربات، وأُسقطت الفيلة، وسقطت الخيول صريعة، وطُرح المشاة على الأرض مبعثرين، غدت هذه الأرض في لحظة واحدة مكتظّة بحطام الحرب حتى استحال التحرك فيها.»
Verse 47
हयैश्न पतितैस्तत्र नरैश्न विनिपातितै: । अगम्यरूपा पृथिवी क्षणेन समपद्यत
قال سنجيا: «أيها الملك، هناك غدت الأرض، وقد تناثرت عليها الخيول الساقطة والرجال المطروحون والمقذوفون إلى التراب، في لحظة واحدة شديدة الانسداد، مروِّعة المنظر، حتى كاد العبور عليها يستحيل.»
Verse 48
क्षणेनासीन्महीपाल क्षतजैधिप्रवर्तिनी । पञ्चालानहनत् कर्णस्त्रिगर्ताश्न धनंजय:,भूपाल! क्षणभरमें वहाँ भूतलपर खूनकी नदी बह चली। कर्णने पंचालोंका और अर्जुनने त्रिगर्तोंका संहार कर डाला
قال سنجيا: أيها الملك، في لحظة واحدة صار وجه الأرض يجري كالنهر بسيولٍ من الدم. فكرْنَةُ حصدَ البَنْجَالَة، بينما ذَنَنْجَيَةُ (أرجونا) أبادَ التِّرِغارتَة—صورةٌ لخراب الحرب السريع الذي لا يميّز بين أحد.
Verse 49
भीमसेन: कुरून् राजन हस्त्यनीकं च सर्वश: । एवमेष क्षयो वृत्त: कुरुपाण्डवसेनयो: । अपराल्लि गते सूर्य काड्क्षतां विपुलं यश:
قال سانجيا: «أيها الملك، لقد دمّر بهيماسينا الكورو وفيلق الفيلة التابع لك تدميرًا تامًّا. وهكذا، إذ كانت الشمس تميل إلى أواخر العصر، تمّت هذه المذبحة العظمى بين جيشي الكورو والباندافا—محاربون من الجانبين تسوقهم رغبةٌ في مجدٍ عريض الصيت».
Verse 66
पज्चभिर्नुपतिं चापि धर्मराजो<र्दयद् भृशम् । तदनन्तर पाँच बाणोंसे धर्मराजने राजा दुर्योधनको भी गहरी चोट पहुँचायी
قال سانجيا: «بخمسة سهامٍ أصابَ دارماراجا (يودهيشثيرا) الملكَ أيضًا، فأنفذه إصابةً شديدة. ثم ما لبث أن أتبع ذلك بخمسة نِبالٍ أخرى فأوقع حتى بالملك دوريودانا جرحًا غائرًا—فعلٌ وُلِد من ضرورة الحرب، لكنه يكشف التوتر القاتم بين واجب المُلك والعنف الذي تفرضه ساحة القتال».
Verse 76
उत्तमं व्यसन प्राप्तो भूमावेवावतिष्ठत । उस अश्वहीन रथसे कूदकर आपका पुत्र भारी संकटमें पड़नेपर भी वहाँ पृथ्वीपर ही खड़ा रहा (युद्ध छोड़कर भागा नहीं)
قال سانجيا: «وقد وقع ابنُك في أفدحِ الكوارث، لكنه ظلّ ثابتًا واقفًا على الأرض. ومع أن عربته غدت بلا خيل، وكان الخطرُ الشديد يضغط عليه، لم يُولِّ الأدبار ولم يفرّ من ساحة القتال—ثباتٌ يتجلّى عند اشتداد المحنة».
Verse 83
अभ्यवर्तन्त सहसा परीप्सन्तो नराधिपम् । उसे संकटमें पड़ा देख कर्ण, अश्वत्थामा तथा कृपाचार्य आदि वीर अपने राजाकी रक्षा चाहते हुए सहसा युधिष्ठिरके सामने आ पहुँचे
قال سانجيا: «ولمّا رأوا الملك واقعًا في الخطر، اندفع كارنا وأشفاتثاما وكريباتشاريا وسائر الأبطال—حرصًا على حماية سيّدهم—مسرعين لمواجهة يودهيشثيرا. وتُبرز هذه اللحظة خُلُقَ ساحة القتال: الوفاء للملك وللرفاق، حتى وسط انهيار الموقف.»
Verse 96
अन्वयु: समरे राजंस्ततो युद्धमवर्तत । राजन! तत्पश्चात् समस्त पाण्डव भी युधिष्ठिरको सब ओरसे घेरकर उनका अनुसरण करने लगे; फिर तो दोनों दलोंमें भारी युद्ध छिड़ गया
قال سانجيا: «أيها الملك، لقد اندفعوا في ساحة القتال، فعاد لهيب الحرب يشتعل من جديد. ثم إن جميع الباندافا أحاطوا بيودهيشثيرا من كل جانب وتبعوه عن كثب؛ وهكذا اندلعت معركةٌ ضارية بين الجيشين. وتُبرز الآية واجب الرفاق في الحرب—أن يكونوا درعًا للقائد العادل—كما تُظهر كيف يمكن للعزم الجماعي أن يضاعف العنف سريعًا ما إن تبدأ المطاردةُ والتطويق.»
Verse 106
ततः किलकिलाशब्दा: प्रादुरासन् महीपते । भूपाल! तदनन्तर उस महासमरमें सहस्रों बाजे बजने लगे और वहाँ किलकिलाहटकी आवाज गूँज उठी
قال سنجيا: «ثم، أيها الملك، ارتفع فجأة صخبٌ عظيم من هتافات الابتهاج. وعقب ذلك مباشرةً، في تلك المعركة الهائلة، دوّت آلاف الآلات، وارتجّ الميدان بأصوات الصياح والضجيج العارم».
Verse 353
पर्वतस्येव शिखरं वज्रुग्णं महीतले | माननीय नरेश! उस घोर एवं भयानक युद्धमें कितने ही हाथी निकट आकर अपनी सूँड्रोंस कुछ आवरणयुक्त रथोंको पकड़ लेते और उन्हें वेगपूर्वक खींचकर सहसा दूर फेंक देते थे। फिर वे महाबली हाथी भी नाराचोंसे मारे जाकर वज्रके तोड़े हुए पर्वत-शिखरकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ते थे
قال سنجيا: «أيها الملك الموقَّر، في تلك الحرب الرهيبة المفزعة كانت أفيال كثيرة تدنو، فتقبض بخراطيمها على العربات المصفَّحة، وتجرّها بعنف ثم تقذفها فجأةً بعيدًا. غير أنّ تلك الأفيال الجبّارة نفسها، إذا صُرِعت بسهامٍ حادّة، سقطت على الأرض كقمم الجبال التي حطّمها الصاعق.»
Verse 366
केशेष्वन्योन्यमाक्षिप्य चिह्षिपुर्बिभिदुश्च ह । बहुत-से पैदल योद्धा दूसरे योद्धाओंको निकट पाकर युद्धस्थलमें उनपर मुक््कोंसे प्रहार करने लगते थे। कितने ही एक-दूसरेकी चुटिया पकड़कर परस्पर झटकते-फेंकते और एक- दूसरेको घायल करते थे
قال سنجيا: في ذلك الاشتباك المتلاحم كان بعض المحاربين يمسكون بعضهم بعضًا من الشعر ويجرّونهم هنا وهناك؛ وكانوا يضربون ويجرحون كذلك. وهكذا، حين تخون الأسلحة والمسافة، تنحدر المعركة إلى عنفٍ جسديٍّ عارٍ—صورةٌ لانحدار الحرب أخلاقيًا، إذ تطغى الغضبة وغريزة البقاء على الكفّ وضوابط القتال الشريف.
Verse 373
पदा चोर: समाक्रम्य स्फुरतो5पाहरच्छिर: । दूसरा योद्धा अपनी दोनों भुजाओंको उठाकर उनके द्वारा शत्रुको पृथ्वीपर पटक देता और एक पैरसे उसकी छातीको दबाकर उसके छटपटाते रहनेपर भी उसका सिर काट लेता था
قال سنجيا: «داس المحاربُ عدوَّه تحت قدميه وضغطه إلى الأرض؛ وحتى وهو يتلوّى، ضرب عنقه فقطع رأسه. ويُبرز هذا المشهد اندفاع المعركة القاسي الذي لا رحمة فيه، حيث تطغى المهارة والضراوة على القيود المألوفة، كاشفًا كيف قد تدفع الحربُ الرجالَ إلى ما وراء حدود الإنسانية.»
Verse 386
जीवतश्न तथैवान्य: शस्त्र काये न्यमज्जयत् । राजन! दूसरा सैनिक किसी गिरते हुए योद्धाका सिर अपनी तलवारसे काट लेता था और कोई जीवित शत्रुके ही शरीरमें अपना शस्त्र घुसेड़ देता था
قال سنجيا: «وكذلك، أيها الملك، غرس محاربٌ آخر سلاحه عميقًا في جسد عدوٍّ كان لا يزال حيًّا.» ويؤكد هذا المشهد ضراوة القتال التي لا تلين، حيث تُحجَب قيود الرحمة المألوفة أمام مقتضيات المواجهة الفورية والبقاء.
Verse 413
कबन्धान्युत्थितानि स्यु: शतशो5थ सहस्रश: । इस प्रकार जब सभी योद्धा युद्धमें लगे थे और तुमुल संग्राम चल रहा था, उस समय सैकड़ों और हजारों कबन्ध (धड़) उठ खड़े हुए थे
قال سنجيا: في ذلك اللَّغَطِ العاصف من ساحة القتال، إذ كان جميع المحاربين منغمسين في الصدام انغماسًا تامًّا، نهضت مئاتٌ—بل آلافٌ—من الجذوع المقطوعة الرؤوس، علامةً كئيبة على عنف الحرب المنفلت، وعلى الثمن المروّع الذي تدفعه الحياة المتجسدة حين يُحجَب الدَّرْمَا بغضبٍ أعمى.
Verse 423
महारागानुरक्तानि वस्त्राणीव चकाशिरे | खूनसे भीगे हुए शस्त्र और कवच गाढ़े रंगमें रँगे हुए वस्त्रोंक॒ समान सुशोभित होते थे
قال سنجيا: إن الأسلحة والدروع، وقد تشرّبت بالدم، كانت تلمع كأنها ثياب صُبغت بقرمزيٍّ غامق. وهذه الصورة تزيد بهاء المعركة الكئيب، وتُبرز كيف تستطيع الحرب أن تُلبس أدوات الأذى جمالًا خادعًا.
Verse 443
योद्धव्यमिति युध्यन्ते राजानो जयगृद्धिनः । राजन! बाणोंकी चोटसे व्याकुल हुए अपने और पराये योद्धा पहचानमें नहीं आते थे। विजयकी अभिलाषा रखनेवाले राजालोग--'युद्ध करना अपना कर्तव्य है” यह समझकर जूझ रहे थे
قال سنجيا: «إن الملوك، وقد استبدّ بهم الطمع في الظفر، ظلّوا يقاتلون وهم على يقينٍ أن “القتال واجبنا”. يا أيها الملك، إذ كانت السهام تصيبهم فتهزّهم، لم يعد المحاربون—من أهلهم أو من عدوّهم—يُعرَفون. ومع ذلك واصل أولئك الحكّام، المتعلّقون بالنصر، المصارعة في ساحة الوغى، معتبرين الحرب نفسها فريضةً قُدِّرت لهم.»
Verse 453
उभयो: सेनयोरवरिव्याकुलं समपद्यत | महाराज! सामने आये हुए अपने और शत्रुपक्षके योद्धाओंको भी अपने ही पक्षके लोग मार डालते थे। दोनों सेनाओंके वीर मर्यादाशून्य युद्धमें प्रवृत्त हो गये थे
قال سنجيا: يا أيها الملك، إن الجيشين كليهما وقعا في اضطرابٍ بالغ وسط زحمة الأعداء وضغطهم. وفي تلك الفوضى كان المحاربون، وإن وقفوا واضحين أمام الأعين—من أهلهم أو من خصومهم—يُصرَعون بأيدي رجالهم. وهكذا اندفع أبطال الفريقين إلى قتالٍ بلا قانون، إذ انهارت القيود وضاعت الحدود المعروفة للسلوك.
Verse 3936
तथा केशग्रहश्चोग्रो बाहुयुद्धं च भैरवम् । भारत! वहाँ योद्धाओंमें बहुत बड़ा मुष्टियुद्ध हो रहा था। साथ ही भयंकर केशग्रहण और भयानक बाहुयुद्ध भी चालू था
قال سنجيا: «يا بهاراتا، هناك كان المحاربون متشابكين في نزالٍ عظيمٍ بالأيدي والقبضات. ومعه اندلع شدٌّ عنيفٌ للشَّعر ومصارعةٌ مروّعةٌ بالأذرع—قتالٌ على هذا القرب حتى جرّد المعركة من المسافة والهيبة، فكشف الوجه الخامّ الوحشيّ للحرب.»
The dilemma is the tension between vow-driven heroism and prudent restraint: whether public confidence and lavish promises (dāna) serve dharma and strategy, or become ethically and tactically hazardous when detached from discernment (including the critique of apātra-dāna).
Speech is portrayed as consequential action: counsel, boasting, and insult can steer collective morale and personal decision-making. The chapter underscores the need for discernment in generosity and in responding to criticism, especially under high-stakes pressure.
No explicit phalaśruti is stated here; the chapter functions as pragmatic and ethical meta-commentary through dialogue—showing how rhetoric, counsel, and self-conception shape conduct within the broader arc toward decisive confrontation.
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