Adhyaya 6
Bhishma ParvaAdhyaya 659 Verses

Adhyaya 6

Adhyāya 6: Pañca-mahābhūta–guṇa-nirdeśa and Sudarśana-dvīpa (Five Elements, Sensory Qualities, and a Cosmographic Island)

Upa-parva: Bhūmi–Pramāṇa–Varnana (Cosmographic and Geophysical Description Episode)

Dhṛtarāṣṭra requests that Saṃjaya report the names and measures of rivers, mountains, regions, and forests. Saṃjaya responds by establishing an ontological and epistemological framework: the world rests upon five mahābhūtas—earth, water, wind, fire, and space—each characterized by a descending set of sensory qualities (śabda, sparśa, rūpa, rasa, gandha), with earth presented as principal due to possessing all five. He specifies the reduction of qualities across elements (water lacking smell; fire with three; wind with two; space with sound alone), and notes that embodied differentiation arises when these elements enter imbalance, while processes of arising and dissolution occur in sequence. Saṃjaya then cautions that certain realities are acintya and not to be established by mere reasoning, especially what lies beyond prakṛti. Having framed the limits of measurement and inference, he begins a cosmographic description of Sudarśana-dvīpa: circular and wheel-like, covered with rivers, bounded by cloud-like mountains, adorned with varied cities and pleasing regions, rich in trees, flowers, fruits, wealth, and grain, encircled by a salt ocean, and said to be visible in the lunar orb like a face reflected in a mirror; brief details (pippala and a great hare motif) conclude the summary.

Chapter Arc: धृतराष्ट्र, संजय से पूछते हैं—चन्द्रमण्डल में दिखने वाले ‘शश-चिह्न’ जितना जो भूम्यवकाश दृष्टिगोचर है, उसका प्रमाण क्या है? और फिर पिप्पल, द्वीप-वर्ष-पर्वतों का विस्तार कैसे है? → संजय क्रमशः भूगोल-पुराण का विराट मानचित्र खोलते हैं—पूर्व से पश्चिम तक फैले ‘छः वर्ष-पर्वत’, दोनों ओर समुद्रों की सीमा, और मेरु का ऐसा स्तम्भ-स्वरूप जो ऊर्ध्व, अधः और तिर्यक् दिशाओं में लोकों को आच्छादित करता है; उसके पार्श्वों में चार द्वीपों की स्थापना। फिर दिव्य लोकों के गायक गन्धर्वों का आगमन और स्तुति, तथा पर्वतों द्वारा धारण किए गए समुद्र-सदृश पुण्य-ह्रदों का वर्णन—मानव-कल्पना को साधारण धरती से उठाकर ब्रह्माण्डीय व्यवस्था तक ले जाता है। → मेरु के चारों ओर लोक-आवरण और उसके पार्श्वों में स्थित द्वीपों का निर्णायक उद्घाटन—जहाँ गन्धर्व (तुम्बुरु, नारद, विश्वावसु, हाहा, हुहू) देवश्रेष्ठों के समीप जाकर विविध स्तवों से स्तुति करते हैं, और गंगा-प्राकट्य तथा समुद्र-सम ह्रद की पवित्रता का संकेत (पिनाकधृक्/शिव-संबद्धता) इस भूगोल को तीर्थ-धर्म के शिखर पर पहुँचा देता है। → अध्याय हिमालय, हेमकूट, निषध आदि पर्वतों पर निवास करने वाले राक्षस, गुह्यक, सर्प-नागों का उल्लेख करते हुए, तपोवनों (जैसे गोकर्ण) और दीर्घायु जनसमुदायों (गन्धमादन-प्रदेश में 11,000 वर्ष की आयु) का विधान बताता है; अंततः बिन्दुसरोवर के निकट भागीरथी गंगा का दर्शन करने हेतु भगीरथ के दीर्घ निवास का स्मरण कराकर तीर्थ-परम्परा को स्थिर करता है। → धृतराष्ट्र की जिज्ञासा अभी शेष है—इस विराट भूगोल के बाद संजय आगे किन-किन लोकों, नदियों और दिव्य-नियमों का क्रमबद्ध विस्तार करेंगे?

Shlokas

Verse 1

/ अपन बक। हक २ >> - एक समान। षष्ठो5 ध्याय: सुदर्शनके वर्ष, पर्वत, 8 तथा शशाकृतिका व धृतराष्ट उवाच उक्तो द्वीपस्य संक्षेपो विधिवद्‌ बुद्धिमंस्त्वया । तत्त्वज्ञश्नासि सर्वस्य विस्तरं ब्रूहि संजय,धृतराष्ट्र बोले--बुद्धिमान्‌ संजय! तुमने सुदर्शन-द्वीपका विधिपूर्वक थोड़ेमें ही वर्णन कर दिया, परंतु तुम तो तत्त्वोंके ज्ञाता हो; अतः इस सम्पूर्ण द्वीपका विस्तारके साथ वर्णन करो

قال دِهْرِتَراشْتْرَة: «يا سنجيا الحكيم، لقد أوجزتَ وصف الجزيرة على وجهه. غير أنك عارفٌ بحقائق الأمور كلها؛ فصفْ لي هذه الجزيرة كلَّها وصفًا مفصّلًا.»

Verse 2

यावान्‌ भूम्यवकाशो<यं दृश्यते शशलक्षणे । तस्य प्रमाण प्रब्रूहि ततो वक्ष्यसि पिप्पलम्‌,चन्द्रमाके शश-चिह्ममें भूमिका जितना अवकाश दृष्टिगोचर होता है, उसका प्रमाण बताओ। तत्पश्चात्‌ पिप्पलस्थानका वर्णन करना

قال دِهْرِتَراشْتْرَة: «يا من وُسِمَ بالأرنب (أيها القمر)، أخبرني بمقدار هذا الفضاء فوق الأرض الذي تراه العين. فإذا بيّنتَ سعته، فصِفْ لي بعد ذلك موضع شجرة البيبّالا (التين المقدّس).»

Verse 3

संजय उवाच प्रागायता महाराज षडेते वर्षपर्वता: । अवगाढा हाुभयत: समुद्रौ पूर्वपश्चिमौ,संजय बोले--महाराज! पूर्वदिशासे पश्चिम दिशाकी ओर फैले हुए ये छ: वर्ष पर्वत हैं, जो दोनों ओर पूर्व तथा पश्चिम समुद्रमें घुसे हुए हैं

قال سنجيا: «أيها الملك العظيم، هذه جبالُ الفَرْشَة الست تمتد من الشرق نحو الغرب. وهي من الجانبين تغوص في المحيطين: المحيط الشرقي والمحيط الغربي.»

Verse 4

हिमवान्‌ हेमकूटश्व निषधश्च नगोत्तम: । नीलश्न वैदूर्यमय: श्वेतश्न शशिसंनिभ:,उनके नाम इस प्रकार हैं--हिमवान, हेमकूट, पर्वतश्रेष्ठ निषध, वैदूर्यमणिमय नीलगिरि, चन्द्रमाके समान उज्ज्वल श्वेतगिरि तथा सब धातुओंसे सम्पन्न होकर विचित्र शोभा धारण करनेवाला शुंगवान्‌ पर्वत। राजन! ये छः: पर्वत सिद्धों तथा चारणोंके निवास स्थान हैं

قال سنجيا: «هيمَفان (Himavān)، وهيمكوطا (Hemakūṭa)، ونيصَدَها (Niṣadha)—وهو أرفع الجبال—ومعها نِيلا (Nīla) المصنوع من جوهر الفيدوريا (vaidūrya) الشبيه بالحجر الأزرق، وشْفيتا (Śveta) المتلألئ كالقمر». وفي هذا الوصف تُعرض الجبال كمساكن سامية مضيئة، تليق بمقام الكائنات المتحققة، لتؤكد أن عالم الحرب مؤطَّر بجغرافيا مقدسة واسعة تسكنها مراتب أعلى من الحياة.

Verse 5

इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत जग्बूखण्डविनिर्माणपर्वमें युदर्शनद्वीपवर्णनविषयक पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ,सर्वधातुविचित्रश्न शुद्भधवान्‌ नाम पर्वत: | एते वै पर्वता राजन्‌ सिद्धचारणसेविता: उनके नाम इस प्रकार हैं--हिमवान, हेमकूट, पर्वतश्रेष्ठ निषध, वैदूर्यमणिमय नीलगिरि, चन्द्रमाके समान उज्ज्वल श्वेतगिरि तथा सब धातुओंसे सम्पन्न होकर विचित्र शोभा धारण करनेवाला शुंगवान्‌ पर्वत। राजन! ये छः: पर्वत सिद्धों तथा चारणोंके निवास स्थान हैं

قال سنجيا: «وثمّة جبل آخر يُدعى شُدّهدهافان (Śuddhadhāvān)، يتلألأ ببريقٍ متنوّع من جميع المعادن. أيها الملك، إن هذه الجبال يرتادها السِّدّها (Siddha) والشارَنا (Cāraṇa) ويسكنونها. وأسماؤها: هيمَفان، وهيمكوطا، ونيصَدَها—أشرف الجبال—، ونيلاگِري (Nīlagiri) المصنوع من جواهر الفيدوريا، وشْفيتاگِري (Śvetagiri) المضيء كالقمر، وشُنگَفان (Śuṅgavān) الغني بكل معدن والمزيَّن بجمالٍ متعدد الوجوه.»

Verse 6

एषामन्तरविष्कम्भो योजनानि सहस्रश: । तत्र पुण्या जनपदास्तानि वर्षाणि भारत,भरतनन्दन! इनके बीचका विस्तार सहस्रों योजन है। वहाँ भिन्न-भिन्न वर्ष (खण्ड) हैं और उनमें बहुत-से पवित्र जनपद हैं इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि जम्बूखण्डविनिर्माणपर्वणि भूम्यादिपरिमाणविवरणे षष्ठो5ध्याय:

قال سنجيا: «إن السَّعة الفاصلة بين هذه الأقاليم تمتد لآلاف اليوجَنات (yojana). وفي تلك الفسحة، يا بهاراتا، تقوم varṣa (الأقسام الإقليمية) المتعددة، وفيها أقاليم ومستقرّات كثيرة مقدّسة.»

Verse 7

वसन्ति तेषु सत्त्वानि नानाजातीनि सर्वश: । इदं तु भारतं वर्ष ततो हैमवतं परम्‌,उनमें सब ओर नाना जातियोंके प्राणी निवास करते हैं, उनमेंसे यह भारतवर्ष है। इसके बाद हिमालयसे उत्तर हैमवतवर्ष है

قال سنجيا: «في تلك الأقاليم تسكن كائنات حية من شتى الأنواع في كل جهة. ومن بينها هذه الأرض المسماة بهاراتا-فارشا (Bhārata-varṣa)؛ وبعدها، إلى الشمال من جبال الهيمالايا، تقع المنطقة المعروفة باسم هايمَفَتا (Haimavata).»

Verse 8

हेमकूटात्‌ परं चैव हरिवर्ष प्रचक्षते । दक्षिणेन तु नीलस्य निषधस्योत्तरेण तु,हेमकूट पर्वतसे आगे हरिवर्षकी स्थिति बतायी जाती है। महाभाग! नीलगिरिके दक्षिण और निषधपर्वतके उत्तर पूर्वसे पश्चिमकी ओर फैला हुआ माल्यवान्‌ नामक पर्वत है। माल्यवानसे आगे गन्धमादन पर्वत है

قال سنجيا: «وراء جبل هيمكوطا (Hemakūṭa) يصفون إقليماً يُدعى هَريفَرْشا (Harivarṣa). وهو واقع إلى جنوب نِيلا (Nīla) وإلى شمال نِيصَدَها (Niṣadha)، وبذلك تُرسَم في الجغرافيا المقدسة حدود العالم على نحوٍ منتظم كما تفهمه التقاليد.»

Verse 9

प्रागायतो महाभाग माल्यवान्‌ नाम पर्वत: । ततः परं माल्यवत: पर्वतो गन्धमादन:,हेमकूट पर्वतसे आगे हरिवर्षकी स्थिति बतायी जाती है। महाभाग! नीलगिरिके दक्षिण और निषधपर्वतके उत्तर पूर्वसे पश्चिमकी ओर फैला हुआ माल्यवान्‌ नामक पर्वत है। माल्यवानसे आगे गन्धमादन पर्वत है

أيها السعيد العظيم الحظّ! في جهة المشرق أولًا يقوم جبل يُدعى «مالْيَفان» (Mālyavān)، ممتدًّا من الشرق إلى الغرب، جنوب «نيلَگِري» (Nīlagiri) وشمال «نِشَذَ» (Niṣadha). ثم بعد «مالْيَفان» يأتي جبل «غَنْدَهْمَادَن» (Gandhamādana).

Verse 10

परिमण्डलस्तयोर्मध्ये मेरः कनकपर्वत: । आदित्यतरुणाभासो विधूम इव पावक:,इन दोनोंके बीचमें मण्डलाकार सुवर्णमय मेरुपर्वत है, जो प्रातः:कालके सूर्यके समान प्रकाशमान तथा धूमरहित अग्निके समान कान्तिमान्‌ है

قال سَنْجَيا: «وبين هذين الجبلين قام جبل ميرو (Meru)، جبلٌ ذهبيٌّ مستدير كالدائرة، متلألئ كالشمس الفتية عند الصباح، متوهّج كالنار التي لا دخان لها.»

Verse 11

योजनानां सहस््राणि चतुरशीतिरुच्छित: । अधस्ताच्चतुरशीतिर्योजनानां महीपते,उसकी ऊँचाई चौरासी हजार योजन है। राजन! वह नीचे भी चौरासी हजार योजनतक पृथ्वीके भीतर घुसा हुआ है

قال سَنْجَيا: «أيها الملك، إنّه يرتفع إلى علوّ أربعةٍ وثمانين ألف يوجَنة؛ ويا سيّد الأرض، يمتدّ إلى أسفل أيضًا داخل التربة أربعةً وثمانين ألف يوجَنة.»

Verse 12

ऊर्ध्वमधश्च तिर्यक्‌ च लोकानावृत्य तिष्ठति । तस्य पार्श्चैंष्वमी द्वीपाश्षत्वार: संस्थिता विभो,प्रभो! मेरुपर्वत ऊपर-नीचे तथा अगल-बगल सम्पूर्ण लोकोंको आवृत करके खड़ा है। उसके पार्श्चभागमें ये चार द्वीप बसे हुए हैं

قال سَنْجَيا: «إنّ جبل ميرو قائمٌ ثابت، ساترًا العوالم من فوق ومن تحت وعبر الجهات. وعلى جوانبه، أيها السيد الجليل، أيها المولى، تستقرّ هذه القارات الأربع العظمى (دْوِيپات dvīpas).»

Verse 13

भद्राश्वः केतुमालश्न जम्बूद्वीपश्च भारत । उत्तराश्वैव कुरव: कृतपुण्यप्रतिश्रया:,भारत! उनके नाम ये हैं--भद्राश्व, केतुमाल, जम्बूद्वीप तथा उत्तरकुरु। उत्तरकुरु द्वीपमें पुण्यात्मा पुरुषोंका निवास है

يا بهاراتا! أسماؤها هي: «بهدراشڤا» (Bhadrāśva)، و«كيتومالا» (Ketumāla)، و«جمبودڤيپا» (Jambūdvīpa)، و«أُتَّرَكُرُو» (Uttarakuru). وفي «أُتَّرَكُرُو» يقيم رجالٌ أبرار، مستقرّون في الفضل والبرّ.

Verse 14

विहग: सुमुखो यस्तु सुपर्णस्यथात्मज: किल । स वै विचिन्तयामास सौवर्णान्‌ वीक्ष्य वायसान्‌,एक समय पक्षिराज गरुड़के पुत्र सुमुखने मेरु-पर्वतपर सुनहरे शरीरवाले कौवोंको देखकर सोचा कि यह सुमेरुपर्वत उत्तम, मध्यम तथा अधम पक्षियोंमें कुछ भी अन्तर नहीं रहने देता है। इसलिये मैं इसको त्याग दूँगा। ऐसा विचार करके वे वहाँसे अन्यत्र चले गये

قال سنجيا: «إنَّ سُموخا، وهو طائرٌ وحقًّا ابنُ سُوبرْنا (غارودا)، لمّا رأى غربانًا بأجسادٍ ذهبية أخذ يتفكّر. وقال في نفسه: ‘إنَّ هذا السوميرو لا يميّز بين الطيور الرفيعة والمتوسطة والدنيئة؛ لذلك سأهجره.’ فلمّا عزم على ذلك، غادر ذلك الموضع إلى مكانٍ آخر.»

Verse 15

मेरुरुत्तममध्यानामधमानां च पक्षिणाम्‌ | अविशेषकरो यस्मात्‌ तस्मादेनं त्यजाम्यहम्‌,एक समय पक्षिराज गरुड़के पुत्र सुमुखने मेरु-पर्वतपर सुनहरे शरीरवाले कौवोंको देखकर सोचा कि यह सुमेरुपर्वत उत्तम, मध्यम तथा अधम पक्षियोंमें कुछ भी अन्तर नहीं रहने देता है। इसलिये मैं इसको त्याग दूँगा। ऐसा विचार करके वे वहाँसे अन्यत्र चले गये

قال سنجيا: «لأنَّ جبل ميرو يجعل الطيور الرفيعة والمتوسطة والدنيئة بلا تمييز، فسأهجره.» وبهذه الخاطرة، فإن سُموخا—ابنَ ملك الطير غارودا—لمّا رأى غربانًا بأجسادٍ ذهبية على ميرو، غادر ذلك الموضع إلى مكانٍ آخر، رافضًا مملكةً يبدو فيها أن الفضل والدناءة يُعاملان على السواء.

Verse 16

तमादित्यो<नुपर्येति सततं ज्योतिषां वर: । चन्द्रमाश्न॒ सनक्षत्रो वायुश्नैव प्रदक्षिण:,ज्योतिर्मय ग्रहोंमें सर्वश्रेष्ठ सूर्यदेव, नक्षत्रोंसहित चन्द्रमा तथा वायुदेव भी प्रदक्षिणक्रमसे सदा मेरुगिरिकी परिक्रमा करते रहते हैं

قال سنجيا: إنَّ الشمس—وهي أسمى المنيرات—تمضي في مسارها بلا انقطاع؛ وكذلك القمر مع الكواكب والنجوم، وكذلك إله الريح، يطوفون دائمًا طوافًا يمينيًّا.

Verse 17

स पर्वतो महाराज दिव्यपुष्पफलान्वित: । भवनैरावृत: सर्वैर्जाम्बूनदपरिष्कृतै:,महाराज! वह पर्वत दिव्य पुष्पों और फलोंसे सम्पन्न है। वहाँके सभी भवन जाम्बूनद नामक सुवर्णसे विभूषित हैं। उनसे घिरे हुए उस पर्वतकी बड़ी शोभा होती है

قال سنجيا: «أيها الملك، إنَّ ذلك الجبل موفورٌ بالأزهار والثمار السماوية. وهو مُحاطٌ من كل جانبٍ بقصورٍ مُزدانةٍ بذهب جامبونادا، ولذلك يشرق الجبل ببهاءٍ عجيب.»

Verse 18

तत्र देवगणा राजन्‌ गन्धर्वासुरराक्षसा: | अप्सरोगणसंयुक्ता: शैले क्रीडन्ति सर्वदा,राजन्‌! उस पर्वतपर देवता, गन्धर्व, असुर, राक्षस तथा अप्सराएँ सदा क्रीड़ा करती रहती हैं

قال سنجيا: «أيها الملك، هناك على ذلك الجبل، إنَّ جموع الآلهة—مع الغندرفا والآسورا والراكشسا—وبرفقة جماعات الأبساراس، يلازمون اللهو واللعب على الدوام.»

Verse 19

तत्र ब्रह्मा च रुद्रश्न शक्रश्नापि सुरेश्वर: । समेत्य विविधैर्यज्नैर्यजन्तेडनेकदक्षिणै:,वहाँ ब्रह्मा, रुद्र तथा देवराज इन्द्र एकत्र हो पर्याप्त दक्षिणावाले नाना प्रकारके यज्ञोंका अनुष्ठान करते हैं

هناك اجتمع براهما ورودرا، وكذلك شَكْرا—سيد الآلهة—وأقاموا أنواعًا شتّى من القرابين، مزوَّدة بسخاء بعطايا وصدقاتٍ طقسية وافرة.

Verse 20

तुम्बुरुनरिदश्चैव विश्वावसुर्हहा हुहू: । अभिगम्यामरश्रेष्ठांस्तुष्टवुर्विविधै: स्तवैः,उस समय तुम्बुरु, नारद, विश्वावसु, हाहा और हुह्टू नामक गन्धर्व उन देवेश्वरोंके पास जाकर भाँति-भाँतिके स्तोत्रोंद्वारा उनकी स्तुति करते हैं

قال سنجيا: ثم إن تُمبورو ونارادا وفيشفافاسو، ومعهم الغندرفا هاهَا وهوهُو، دنَوا من أكرم الآلهة وسبّحوا أولئك السادة الإلهيين بأناشيد شتّى.

Verse 21

सप्तर्षयो महात्मान: कश्यपश्च प्रजापति: । तत्र गच्छन्ति भद्रंं ते सदा पर्वणि पर्वणि,राजन्‌! आपका कल्याण हो। वहाँ महात्मा सप्तर्षिगण तथा प्रजापति कश्यप प्रत्येक पर्वपर सदा पधारते हैं

قال سنجيا: «أيها الملك، ليكن لك الخير والهناء. هناك، في كل مناسبةٍ مقدّسة وكل موسم، يحضر الحكماء السبعة العظام، ومعهم براجابتي كاشيابا، حضورًا دائمًا.»

Verse 22

तस्यैव मूर्धन्युशना: काव्यो दैत्यैर्महीपते । इमानि तस्य रत्नानि तस्येमे रत्नपर्वता:,भूपाल! उस मेरुपर्वतके ही शिखरपर दैत्योंके साथ शुक्राचार्य निवास करते हैं। ये सब रत्न तथा ये रत्नमय पर्वत शुक्राचार्यके ही अधिकारमें हैं

قال سنجيا: «أيها الملك، على قمة ميرو نفسها يقيم أُشَنا كافْيَا (شُكْرَاتشاريا) ساكنًا مع الدايتيَة. هذه الجواهر، وهذه الجبال المصنوعة من الجواهر، كلها تحت سلطانه.»

Verse 23

तस्मात्‌ कुबेरो भगवांश्षतुर्थ भागमश्चुते ततः कलांशं वित्तस्य मनुष्येभ्य: प्रयच्छति,भगवान्‌ कुबेर उन्हींसे धनका चतुर्थ भाग प्राप्त करके उसका उपभोग करते हैं और उस धनका सोलहवाँ भाग मनुष्योंको देते हैं

قال سنجيا: لذلك فإن كوبيرا الموقَّر، بعد أن نال من أَچْيُوتا ربعَ النصيب، ينتفع به؛ ومن ذلك المال يمنح البشر جزءًا يسيرًا.

Verse 24

पाश्वें तस्योत्तरे दिव्यं सर्वर्तुकुसुमैश्चितम्‌ । कर्णिकारवनं रम्यं शिलाजालसमुद्गतम्‌,सुमेरुपर्वतके उत्तर भागमें समस्त ऋतुओंके फूलोंसे भरा हुआ दिव्य एवं रमणीय कर्णिकार (कनेर वृक्षोंका) वन है, जहाँ शिलाओंके समूह संचित हैं

قال سنجيا: «وعلى جانبه الشمالي تقوم غابةٌ إلهيةٌ بهيّةٌ من أشجار الكَرْنِيكَارَة، مزدانةٌ بأزهار كلّ الفصول، ناهضةٌ بين كُتَلٍ متراكمةٍ من الصخر.»

Verse 25

तत्र साक्षात्‌ पशुपतिर्दिव्यैर्भूती: समावृत: । उमासहायो भगवान्‌ रमते भूतभावन:,वहाँ दिव्य भूतोंसे घिरे हुए साक्षात्‌ भूतभावन भगवान्‌ पशुपति पैरोंतक लटकनेवाली कनेरके फूलोंकी दिव्य माला धारण किये भगवती उमाके साथ विहार करते हैं। वे अपने तीनों नेत्रोंद्वारा ऐसा प्रकाश फैलाते हैं, मानो तीन सूर्य उदित हुए हों

قال سنجيا: «هناك يقيم الربّ بَشوبَتي نفسه—بُهوتَبهافَنا، أصل الكائنات وحافظها—محاطًا بتجلّياتٍ إلهية. ومع الإلهة أُوما، يلتذّ المبارك بلهوه المقدّس، مشعًّا بهيبةٍ تُلقي الرهبة: علامةَ الحماية والسيادة والقوّة المُطهِّرة التي تعلو على عنف الحرب.»

Verse 26

वैशम्पायन उवाच एवं राज्ञा स पृष्टस्तु संजयो वाक्यमब्रवीत्‌ | वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! राजा धृतराष्ट्रके इस प्रकार पूछनेपर संजयने कहना आरम्भ किया,कर्णिकारमयीं मालां बिश्रत्पादावलम्बिनीम्‌ । त्रिभिनेत्रै: कृतोद्योतस्त्रिभि: सूर्यरिवोदितै: वहाँ दिव्य भूतोंसे घिरे हुए साक्षात्‌ भूतभावन भगवान्‌ पशुपति पैरोंतक लटकनेवाली कनेरके फूलोंकी दिव्य माला धारण किये भगवती उमाके साथ विहार करते हैं। वे अपने तीनों नेत्रोंद्वारा ऐसा प्रकाश फैलाते हैं, मानो तीन सूर्य उदित हुए हों

قال فيشَمبايانا: لما سأله الملك على هذا النحو، شرع سنجيا يتكلم. فوصف الربّ بَشوبَتي—محاطًا بالكائنات الإلهية—وقد تقلّد إكليلًا متلألئًا من أزهار الكَرْنِيكَارَة يتدلّى حتى قدميه. وبعيونه الثلاث أطلق نورًا كأنّ ثلاثة شموس قد أشرقت.

Verse 27

तमुग्रतपस: सिद्धा: सुव्रता: सत्यवादिन: । पश्यन्ति न हि दुर्वत्तै: शक्‍्यो द्रष्टूं महेश्वर:,उग्र तपस्वी एवं उत्तम व्रतोंका पालन करनेवाले सत्यवादी सिद्ध पुरुष ही वहाँ उनका दर्शन करते हैं। दुराचारी लोगोंको भगवान्‌ महेश्वरका दर्शन नहीं हो सकता

لا يراه هناك إلا الكاملون—أهلُ التقشّف الشديد، الثابتون على النذور النبيلة، المخلصون للصدق. أمّا ذووا السلوك الفاسد فلا سبيل لهم إلى رؤية المولى العظيم (ماهيشفارا).

Verse 28

तस्य शैलस्य शिखरात्‌ क्षीरधारा नरेश्वर । विश्वरूपापरिमिता भीमनिर्घातनि:स्वना,नरेश्वर! उस मेरुपर्वतके शिखरसे दुग्धके समान श्वेतधारवाली, विश्वरूपा, अपरिमित शक्तिशालिनी, भयंकर वज्रपातके समान शब्द करनेवाली, परम पुण्यात्मा पुरुषों-द्वारा सेवित, शुभस्वरूपा पुण्यमयी भागीरथी गंगा बड़े प्रबल वेगसे सुन्दर चन्द्रकुण्डमें गिरती हैं

قال سنجيا: «أيها الملك، من قمة ذلك الجبل ينسكب سيلٌ أبيض كالحليب—عظيم الهيئة لا يُحدّ بمقدار—وزئيره كقصفٍ مرعبٍ للرعد.»

Verse 29

पुण्या पुण्यतमैर्जुष्टा गड़ा भागीरथी शुभा । प्लवन्तीव प्रवेगेन हृदे चन्द्रमस: शुभे,नरेश्वर! उस मेरुपर्वतके शिखरसे दुग्धके समान श्वेतधारवाली, विश्वरूपा, अपरिमित शक्तिशालिनी, भयंकर वज्रपातके समान शब्द करनेवाली, परम पुण्यात्मा पुरुषों-द्वारा सेवित, शुभस्वरूपा पुण्यमयी भागीरथी गंगा बड़े प्रबल वेगसे सुन्दर चन्द्रकुण्डमें गिरती हैं

قال سنجيا: أيها الملك، إن بهاجيراثي المباركة—المقدّسة، المحبوبة لدى أبرّ الأبرار—تندفع إلى الأمام كأنما يحملها اندفاع السيل نفسه. ومن ذروة جبل ميرو تنسكب في مجارٍ بيضاء كالحليب، عظيمة الهيئة لا تُقاس قوتها، وزئيرها كصوت صاعقةٍ مهولة. وهي الغانغا الطاهرة ذات الطبيعة المُنْعِمة، يخدمها ويجلّها رجالٌ في غاية الصلاح، فتغوص بعجلةٍ هائلة في البحيرة الجميلة المسماة تشاندراكُندا.

Verse 30

तया ह्युत्पादित: पुण्य: स हद: सागरोपम: । तां धारयामास तदा दुर्धरां पर्वतैरपि

قال سنجيا: وبها نشأت بحيرةٌ مقدّسة، واسعة كالمحيط. ثم إنه عندئذٍ احتمل تلك القوة وكبحها واحتواها، مع أنها من العسر بحيث إن الجبال نفسها لَتَكاد لا تطيق حملها.

Verse 31

मेरोस्तु पश्चिमे पाश्वे केतुमालो महीपते,राजन! मेरुके पश्चिम भागमें केतुमाल द्वीप है, वहीं अत्यन्त विशाल जम्बूखण्ड नामक प्रदेश है, जो नन्दन-वनके समान मनोहर जान पड़ता है। भारत! वहाँके निवासियोंकी आयु दस हजार वर्षोकी होती है

قال سنجيا: يا سيد الأرض، على السفح الغربي لجبل ميرو تقع كيتومالا. ففي الجهة الغربية من ميرو يوجد الإقليم-الجزيرة المسمّى كيتومالا؛ وهناك أيضًا رقعة شاسعة للغاية تُدعى جامبوخَنْدَة، بهيّة كغابة نندانا. يا بهاراتا، يُقال إن سكانها يعيشون عشرة آلاف سنة.

Verse 32

जम्बूखण्डस्तु तत्रैव सुमहान्‌ नन्दनोपम: । आयुर्दश सहस््राणि वर्षाणां तत्र भारत,राजन! मेरुके पश्चिम भागमें केतुमाल द्वीप है, वहीं अत्यन्त विशाल जम्बूखण्ड नामक प्रदेश है, जो नन्दन-वनके समान मनोहर जान पड़ता है। भारत! वहाँके निवासियोंकी आयु दस हजार वर्षोकी होती है

وجامبوخَنْدَة هناك بعينها عظيمة الاتساع، بهيّة كغابة نندانا. يا بهاراتا، إن أعمار سكانها تبلغ عشرة آلاف سنة.

Verse 33

सुवर्णवर्णाश्व नरा: स्त्रियश्चाप्सरसोपमा: । अनामया वीतशोका नित्यं मुदितमानसा:,वहाँके पुरुष सुवर्णके समान कान्तिमान्‌ और स्त्रियाँ अप्सराओंके समान सुन्दरी होती हैं। उन्हें कभी रोग और शोक नहीं होते। उनका चित्त सदा प्रसन्न रहता है

قال سنجيا: هناك يكون الرجال متلألئين كالذهب، والنساء جميلات كالأبسارات. لا يعتريهم مرض ولا يمسّهم حزن؛ وقلوبهم دائمة البِشر والسرور.

Verse 34

जायन्ते मानवास्तत्र निष्टप्तकनकप्रभा: । गन्धमादनशज्ञेषु कुबेर: सह राक्षसै:

قال سنجيا: هناك يُولد الناس بوهجٍ كوهج الذهب المُصفّى المُحمّى بالنار. وعلى قمم جبل غندهمادانا يقيم كُبيرا، ومعه أتباعه من الرّاكشاسا—صورةٌ لمملكةٍ يجتمع فيها البهاء مع حراسةٍ مهيبة، كأنّ الثراء لا يُصان إلا بالقوة والانضباط.

Verse 35

संवृतो5प्सरसां सड्घैमोंदते गुह्यकाधिप: । वहाँ तपाये हुए सुवर्णके समान गौर कान्तिवाले मनुष्य उत्पन्न होते हैं। गन्धमादन पर्वतके शिखरोंपर गुह्मकोंके स्वामी कुबेर राक्षसोंके साथ रहते और अप्सराओं-के समुदायोंके साथ आमोद-प्रमोद करते हैं ।। ३४ ई ।। गन्धमादनपादेषु परेष्वपरगण्डिका:

قال سنجيا: محاطًا بجماعات الأبساراس، يلهو كُبيرا—سيد الغوهيَكَة—في سرورٍ وابتهاج. وعلى السفوح الشاهقة ومرتفعات جبل غندهمادانا تُوجد كذلك كائناتٌ أخرى عجيبة. يستحضر المقطع عالمًا سماويًا من اللذة والوفرة، لكنه يلمّح إلى أن تلك المسرّات ما تزال ضمن السَّمْسارا، وليست الغاية الأخيرة التي يقيمها الدارما.

Verse 36

तत्र हृष्टा नरा राजंस्तेजोयुक्ता महाबला: । स्त्रियश्लोत्पलवर्णा भा: सर्वा: सुप्रियदर्शना:,राजन! वहाँके पुरुष हृष्ट-पुष्ट, तेजस्वी और महाबली होते हैं तथा सभी स्त्रियाँ कमलके समान कान्तिमती और देखनेमें अत्यन्त मनोरम होती हैं

قال سنجيا: «يا أيها الملك، إن الرجال هناك فرحون ممتلئون عافية، موهوبون إشراقًا وقوةً عظيمة؛ وإن النساء جميعًا بلون اللوتس، بالغات الحسن، بهيّات المنظر.» ويؤكد الوصف عالمًا موسومًا بالرخاء والحيوية والجمال المبارك، وهي علامات تُنسب تقليديًا إلى النظام القويم والهناء.

Verse 37

नीलात्‌ परतरं श्रैतं श्वेताद्धैरण्यकं परम्‌ | वर्षमैरावतं राजन्‌ नानाजनपदावृतम्‌,नील पर्वतसे उत्तर श्वेतवर्ष और श्वेतवर्षसे उत्तर हिरण्यकवर्ष है। तत्पश्चात्‌ शृंगवान्‌ पर्ववसे आगे ऐरावत नामक वर्ष है। राजन! वह अनेकानेक जनपदोंसे भरा हुआ है

قال سنجيا: «وراء نِيلا تقع شْوَيْتا؛ ووراء شْوِتا تمتدّ البلاد المسماة هَيْرانيَكَة. ثم، أيها الملك، تأتي أرض تُدعى أَيْراوَتَة، تغشاها أقاليم ومستوطنات كثيرة متنوّعة.» وفي هذا السرد الكوسموغرافي يرسم سنجيا عوالم الشمال متتابعة، مؤكدًا اتساع العالم على نظام، وتعدّد الشعوب في ربوعه.

Verse 38

धनु:संस्थे महाराज द्रे वर्षे दक्षिणोत्तरे । इलावृतं मध्यमं तु पञच वर्षाणि चैव हि,महाराज! दक्षिण और उत्तरके क्रमश: भारत और ऐरावत नामक दो वर्ष धनुषकी दो कोटियोंके समान स्थित हैं और बीचमें पाँच वर्ष (श्वेत, हिरण्यक, इलावृत, हरिवर्ष तथा हैमवत) हैं। इन सबके बीचमें इलावृतवर्ष है

قال سنجيا: «أيها الملك، على “طرفين” كطرفي القوس تقوم منطقتان: الجنوبية والشمالية. وفي الوسط تقع إيلَاوْرِتَة؛ وحقًّا توجد خمس مناطق بينهما.» وفي سياقه يرسم البيت جغرافيا الكون في بنيةٍ واضحةٍ منتظمة، كأنه يلمّح إلى معنى أخلاقي عن الانسجام وحسن الترتيب (الدارما) حتى في رحابة التنوع.

Verse 39

उत्तरोत्तरमेते भ्यो वर्षमुद्रिच्यते गुणै: । आयु:प्रमाणमारोग्यं धर्मतः कामतो<र्थत:,भारतसे आरम्भ करके ये सभी वर्ष आयुके प्रमाण, आरोग्य, धर्म, अर्थ और काम-- इन सभी दृष्टियोंसे गुणोंमें उत्तरोत्तर बढ़ते गये हैं

قال سنجيا: «منذ تلك السنين الأولى فصاعدًا، كانت كل سنة تليها أرفعَ في الفضل—تُقاس بطول العمر، وبتمام العافية، وبما يُنال من الدَّرْمَة والأرثَة والكامَة. وهكذا، يا بهاراتا، مضى مجرى الزمان متقدّمًا بخصالٍ مباركةٍ تزداد.»

Verse 40

समन्वितानि भूतानि तेषु वर्षेषु भारत । एवमेषा महाराज पर्वतैः पृथिवी चिता,भारत! इन सब वर्षोमें निवास करनेवाले प्राणी परस्पर मिल-जुलकर रहते हैं। महाराज! इस प्रकार यह सारी पृथ्वी पर्वतोंद्वारा स्थिर की गयी है

قال سنجيا: «يا بهاراتا، إن الكائنات التي تسكن تلك الأقاليم تعيش في مؤانسةٍ ووئامٍ متبادل. أيها الملك العظيم، وهكذا تبدو هذه الأرض كلها كأنما ثُبِّتت ونُظِّمت تثبيتًا بالجبال.»

Verse 41

हेमकूटस्तु सुमहान्‌ कैलासो नाम पर्वत: । यत्र वैश्रवणो राजन्‌ गुहाकैः सह मोदते,राजन! विशाल पर्वत हेमकूट ही कैलास नामसे प्रसिद्ध है। जहाँ कुबेर गुह्कोंके साथ सानन्द निवास करते हैं

قال سنجيا: «أيها الملك، ثَمَّ جبلٌ عظيم جدًّا يُدعى كَيْلاسا، ويُعرَف أيضًا باسم هِمَكوطَة؛ وفيه يقيم فَيْشْرَفَنَة (كوبيرا) مسرورًا مع الغُهيَكَة.»

Verse 42

अस्त्युत्तरेण कैलासं मैनाकं पर्वत प्रति । हिरण्यशूज्रः सुमहान्‌ दिव्यो मणिमयो गिरि:,कैलाससे उत्तर मैनाक है और उससे भी उत्तर दिव्य तथा महान्‌ मणिमय पर्वत हिरण्यशुंग है

قال سنجيا: «إلى شمال جبل كَيْلاسا يقع جبل مَيْنَاكَة؛ وإلى الشمال أبعد من ذلك ينتصب قِمَّةٌ عظيمةٌ سماويةٌ كأنها من الجواهر، تُدعى هِرَنْيَشْرِنْغَة (Hiraṇyaśṛṅga).»

Verse 43

तस्य पाश्चे महद्‌ दिव्यं शुभ्रं काउ्चनवालुकम्‌ । रम्यं बिन्दुसरो नाम यत्र राजा भगीरथ:

وخلف ذلك الجبل من جهة الغرب بحيرةٌ عظيمةٌ سماويةٌ ناصعةُ البياض، ذاتُ رمالٍ ذهبيةٍ بهيّة، بهيجةُ المنظر، تُدعى بِندوسَرَة (Bindusara)؛ وهناك أقام الملك بَهَگيرَثَة (Bhagīratha).

Verse 44

यूपा मणिमयास्तत्र चैत्याश्वापि हिरण्मया:

قال سنجيا: هناك كانت أعمدة القربان (يوبا) مصوغة من الجواهر، وحتى خيول المراسم (تشيتيا-أشفا) كانت من ذهب—مشهدٌ باهر من بهاءٍ ملكيّ يدلّ على ثراءٍ عظيم وعلى عظمة السلطة الطقسية في ظاهرها.

Verse 45

तत्रेष्टवा तु गतः सिद्धि सहस्राक्षो महायशा: । वहाँ बहुत-से मणिमय यूप तथा सुवर्णमय चैत्य (महल) शोभा पाते हैं। वहीं यज्ञ करके महायशस्वी इन्द्रने सिद्धि प्राप्त की थी ।। ४४ ई ।। स्रष्टा भूतपतिर्यत्र सर्वलोकैः सनातन:,उसी स्थानपर सब ओर सम्पूर्ण जगत्‌के लोग लोकस्रष्टा प्रचण्ड तेजस्वी सनातन भगवान्‌ भूतनाथकी उपासना करते हैं। नर, नारायण, ब्रह्मा, मनु और पाँचवें भगवान्‌ शिव वहाँ सदा स्थित रहते हैं

قال سنجيا: «بعد أن أقام هناك القربان، نال إندرا ذو الألف عين—عظيم الصيت—السِدّهي (التحقّق/الإنجاز الروحي).» وتشير الآية إلى موضعٍ مقدّس تتأكد قداسته بنجاح شعيرة إندرا: فالعبادة المنضبطة والعمل الطقسي القويم، في مكانٍ مُكرَّس، يُصوَّران طريقًا إلى نيل المنال ورضا الآلهة.

Verse 46

उपास्यते तिग्मतेजा यत्र भूत: समन्तत: । नरनारायणो ब्रह्मा मनु: स्थाणुश्व पजचम:,उसी स्थानपर सब ओर सम्पूर्ण जगत्‌के लोग लोकस्रष्टा प्रचण्ड तेजस्वी सनातन भगवान्‌ भूतनाथकी उपासना करते हैं। नर, नारायण, ब्रह्मा, मनु और पाँचवें भगवान्‌ शिव वहाँ सदा स्थित रहते हैं

قال سنجيا: في تلك الديار المقدّسة، من كل جانب، يعبد جميع الكائنات الربَّ الأزليَّ الإشراق، الشديدَ البهاء، سيّدَ المخلوقات. وهناك يقيم نارا ونارايانا، وبراهما، ومانو، وكذلك سْثانو (شيفا) المعدود خامسًا—إشارةً إلى أن الملجأ الأعلى للعالم هو التفاني للذات الإلهية، وراء اضطراب الحرب.

Verse 47

तत्र दिव्या त्रिपथगा प्रथम तु प्रतिषछ्ठिता । ब्रह्मलोकादपक्रान्ता सप्तधा प्रतिपद्यते,ब्रह्मलोकसे उतरकर त्रिपथगामिनी दिव्य नदी गंगा पहले उस बिन्दुसरोवरमें ही प्रतिष्ठित हुई थीं। वहींसे उनकी सात धाराएँ विभक्त हुई हैं

هناك استقرّت أولًا الغانغا الإلهية—المعروفة بتريپثاغا، «التي تجري في العوالم الثلاثة». هبطت من برهمالوكـا، ثم تجلّت في سبعة مجارٍ متميّزة. ويبرز السرد نظام الكون المقدّس: أصلٌ سماوي، وموضعُ استقرارٍ لائق، وتوزيعٌ منضبط لخير العوالم.

Verse 48

वस्वोकसारा नलिनी पावनी च सरस्वती । जम्बूनदी च सीता च गज्जा सिन्धुश्च सप्तमी,उन धाराओंके नाम इस प्रकार हैं--वस्वोकसारा, नलिनी, पावनी सरस्वती, जम्बूनदी, सीता, गंगा और सिंधु

قال سنجيا: «تُسمّى المجاري المقدّسة السبعة: فَسْفوكَسارا، ناليني، بافَني، سَرَسْوَتي، جامبونَدي، سيتا، غانغا، والسابع سِندهو.» وفي هذا السياق، فإن تسمية الأنهار الموقّرة تُبرز الطهارة واليُمن وقوة الجغرافيا المقدّسة على التطهير ضمن الكون الأخلاقي للملحمة.

Verse 49

अचिन्त्या दिव्यसंकाशा प्रभोरेषैव संविधि: । उपासते यत्र सत्र॑ सहस्रयुगपर्यये,यह (सात धाराओंका प्रादुर्भाव जगत्‌के उपकारके लिये) भगवान्‌का ही अचिन्त्य एवं दिव्य सुन्दर विधान है। जहाँ लोग कल्पके अन्ततक यज्ञानुष्ठानके द्वारा परमात्माकी उपासना करते हैं

قال سانجيا: «إن هذا التشريع للربّ فوق مدارك الفكر، متلألئٌ وإلهيّ. وفي ذلك المقام يعبد الناسُ العليَّ الأسمى عبرَ مجلسٍ عظيمٍ من القربان (ساترا) يمتدّ حتى يكتمل ألفُ يوغا».

Verse 50

दृश्यादृश्या च भवति तत्र तत्र सरस्वती । एता दिव्या: सप्तगज्जस्त्रिषु लोकेषु विश्रुता:,इन सात धाराओंमें जो सरस्वती नामवाली धारा है, वह कहीं प्रत्यक्ष दिखायी देती है और कहीं अदृश्य हो जाती है। ये सात दिव्य गंगाएँ तीनों लोकोंमें विख्यात हैं

قال سانجيا: «هناك يصير النهر المسمّى سَرَسْوَتِي ظاهرًا في مواضع، ثم يختفي عن الأبصار في مواضع أخرى. وهذه الجداول السبعة الإلهية—المشهود لها باسم “الغانغا السبع”—مشهورة في العوالم الثلاثة».

Verse 51

रक्षांसि वै हिमवति हेमकूटे तु गुह्का: । सर्पा नागाश्न निषधे गोकर्ण च तपोवनम्‌,हिमालयपर राक्षस, हेमकूटपर गुह्मक तथा निषधपर्वतपर सर्प और नाग निवास करते हैं। गोकर्ण तो तपोवन है

قال سانجيا: «حقًّا، على هِمَفَت يسكن الرّاكشاسا؛ وعلى هِمَكُوطَة يقيم الغوهيَكَة؛ وعلى نِشَذَة تسكن الحيّاتُ والنّاغا. وأمّا غوكَرْنَة فهو تَپَوَفَنَة—غابةٌ مقدّسة للزهد والرياضة الروحية.»

Verse 52

देवासुराणां सर्वेषां श्वेतपर्वत उच्यते । गन्धर्वा निषधे नित्यं नीले ब्रह्मर्षयस्तथा । शुज्भवांस्तु महाराज देवानां प्रतिसंचर:,श्वैतपर्वत सम्पूर्ण देवताओं और असुरोंका निवासस्थान बताया जाता है। निषधगिरिपर गन्धर्व तथा नीलगिरिपर ब्रह्मर्षि निवास करते हैं। महाराज! शुंगवान्‌ पर्वत तो केवल देवताओंकी ही विहारस्थली है

قال سانجيا: «يُقال إن شْوِيتَپَرْفَتَة (Śvetaparvata) هي المسكن المشترك للجميع—للآلهة وللأسورا معًا. ويسكن الغاندھرفا على نِشَذَة على الدوام، وكذلك يقيم البراهمارشِي (Brahmarṣi) على نِيلَة. أمّا شُونْگَفَان، أيها الملك العظيم، فهو منتجعٌ وموضعُ تنزّه لا يؤمّه إلا الآلهة.»

Verse 53

इत्येतानि महाराज सप्त वर्षाणि भागश: । भूतान्युपनिविष्टानि गतिमन्ति ध्रुवाणि च,राजेन्द्र! इस प्रकार स्थावर और जंगम सम्पूर्ण प्राणी इन सात वर्षोमें विभागपूर्वक स्थित हैं

قال سانجيا: «وهكذا، أيها الملك العظيم، تُقام جميعُ الكائنات في هذه الفَرْشَات السبع (varṣa)، كلٌّ بحسب القسم الذي خُصِّص له. فمنها المتحرّك ومنها الثابت؛ وكلٌّ يثبت في مقامه وفق النظام الذي قُدِّر له.»

Verse 54

तेषामृद्धिर्बहुविधा दृश्यते दैवमानुषी । अशक्या परिसंख्यातु श्रद्धेया तु बुभूषता,उनकी अनेक प्रकारकी दैवी और मानुषी समृद्धि देखी जाती है। उसकी गणना असम्भव है। कल्याणकी इच्छा रखनेवाले मनुष्यको उस समृद्धिपर विश्वास करना चाहिये

قال سنجيا: «فيهم تُرى ضروبٌ كثيرة من الازدهار، إلهيةً وبشرية. لا يُستطاع إحصاؤها على التمام. غير أنّ من يبتغي الخير الحقّ ينبغي أن يضع ثقته في ذلك الازدهار (وفي النظام الأعلى الذي يمنحه)».

Verse 55

(स वै सुदर्शनद्वीपो दृश्यते शशवद्‌ द्विधा ।) यां तु पृष्छसि मां राजन्‌ दिव्यामेतां शशाकृतिम्‌ । पाश्वें शशस्य द्वे वर्षे उक्ते ये दक्षिणोत्तरे कर्णो तु नागद्वीपश्च काश्यपद्दवीप एव च,इस प्रकार वह सुदर्शनद्वीप बताया गया है, जो दो भागोंमें विभक्त होकर चन्द्रमण्डलमें प्रतिबिम्बित हो खरगोशकी-सी आकृतिमें दृष्टिगोचर होता है। राजन! आपने जो मुझसे इस शशाकृति (खरगोशकी-सी आकृति)-के विषयमें प्रश्न किया है उसका वर्णन करता हूँ, सुनिये। पहले जो दक्षिण और उत्तरमें स्थित (भारत और ऐरावत नामक) दो द्वीप बताये गये हैं, वे ही दोनों उस शश (खरगोश)-के दो पार्श्वभाग हैं। नागद्वीप तथा काश्यपद्दीप उसके दोनों कान हैं

قال سنجيا: «إنّ سودرشَنَ-دْفيبا تُرى حقًّا كأنها منقسمة إلى قسمين، وتظهر على قرص القمر في هيئة أرنب. أيها الملك، إذ تسألني عن هذه العلامة الإلهية “ذات الشكل الأرنبّي”، فاسمع وصفي لها: إنّ المنطقتين اللتين ذُكرتا من قبل في الجنوب والشمال تُعدّان جانبي ذلك الأرنب؛ وأمّا ناغا-دْفيبا وكاشيَبا-دْفيبا فهما أذناه.»

Verse 56

ताम्रपर्ण: शिरो राजज्छीमान्‌ मलयपर्वतः । एतद्‌ द्वितीयं द्वीपस्य दृश्यते शशसंस्थितम्‌,राजन! ताम्रवर्णके वृक्षों और पत्रोंसे सुशोभित श्रीमान्‌ मलयपर्वत ही इसका सिर है। इस प्रकार यह सुदर्शनद्वीपका दूसरा भाग खरगोशके आकारमें दृष्टिगोचर होता है

قال سنجيا: «أيها الملك، إنّ جبل مَلَيا البهيّ، الموشّى بأوراقٍ نحاسية اللون، هو “رأس” تلك الناحية. وهكذا تُرى القسمة الثانية من الجزيرة متّخذةً هيئة أرنب.»

Verse 306

शतं वर्षसहस्राणां शिरसैव पिनाकधृक्‌ । वह पवित्र कुण्ड स्वयं गंगाजीने ही प्रकट किया है, जो अपनी अगाध जलराशिके कारण समुद्रके समान शोभा पाता है। जिन्हें अपने ऊपर धारण करना पर्वतोंके लिये भी कठिन था, उन्हीं गंगाको पिनाकधारी भगवान्‌ शिव एक लाख वर्षोतक अपने मस्तकपर ही धारण किये रहे

قال سنجيا: «إنّ الربّ حامل قوس بيناكا—شِيفا—قد حمل على رأسه نفسه مئةَ ألفِ سنةٍ الحوضَ المقدّس، تجلّي الغانغا الطاهر، الذي يلمع كالمحيط لعُمق مياهه وغزارتها التي لا تُدرك. تلك الغانغا التي يعسر على الجبال أن تحتمل ثقلها، حملها الإله حامل بيناكا على رأسه تمام مئة ألف سنة—صورةٌ للكبح الإلهي والقوة الحامية التي تسند ما كان ليغمر العالم لولاها.»

Verse 356

एकादश सहस्राणि वर्षाणां परमायुष: । गन्धमादनके अन्यान्य पार्श्चर्ती पर्वतोंपर दूसरी-दूसरी नदियाँ हैं, जहाँ निवास करनेवाले लोगोंकी आयु ग्यारह हजार वर्षोकी होती है

قال سنجيا: «وعلى جبل غندهمادانا أنهارٌ أخرى أيضًا، تجري بمحاذاة جوانب الجبل. ويُقال إنّ سكان تلك النواحي يبلغون عمرًا أسمى قدره أحد عشر ألف سنة.»

Verse 433

द्रष्ट भागीरथीं गद्ञामुवास बहुला: समा: । उसीके पास विशाल, दिव्य, उज्ज्वल तथा कांचनमयी बालुकासे सुशोभित रमणीय बिन्दुसरोवर है, जहाँ राजा भगीरथने भागीरथी गंगाका दर्शन करनेके लिये बहुत वर्षोतक निवास किया था

قال سنجيا: رغبةً في مشاهدة نهر الغانغا «بهاغيراثي»، أقام هناك سنين طويلة. وبالقرب منه بحيرة بهيجة تُدعى «بِندوسارَس»—واسعة، ذات طابع إلهي، متلألئة، مزدانة برمال ذهبية—وفيها أقام الملك بهاغيراثا زمنًا مديدًا في الزهد والتعبّد، قاصدًا نيل رؤية النهر المقدّس. ويؤكد هذا المقطع ثبات المثابرة والتوقير للغرض الطاهر بوصفه صورةً من صور الدارما.

Frequently Asked Questions

The chapter presents an epistemic dilemma rather than a battlefield choice: how to speak responsibly about the world’s measures and structure—what can be established by pramāṇa and reasoning versus what must be acknowledged as acintya and therefore not reducible to argumentative proof.

A graded model of reality and knowledge is taught: embodied existence depends on elemental composition and sensory qualities, while sound methodology requires distinguishing inferentially tractable domains from trans-empirical claims, cultivating restraint and clarity in interpretation.

No explicit phalaśruti is stated; the meta-commentary appears as methodological guidance—Saṃjaya’s note that acintya realities are not to be “proved” by tarka—positioning the chapter as a conceptual prologue to subsequent geographic cataloging.