Adhyaya 53
Bhishma ParvaAdhyaya 5359 Versesश्वेत के प्रारम्भिक दबाव के बाद भीष्म के हस्तक्षेप से कौरव-पक्ष की ओर झुकाव; दिन का अंत कौरव-उत्साह और पाण्डव-क्रोध के साथ।

Adhyaya 53

Rajo-dhūli-saṃmūḍha-saṅgrāmaḥ (The Dust-Obscured Battle and Mutual Charges)

Upa-parva: Kurukṣetra-saṅgrāma-varṇana (Battlefield Chronicle under Bhīṣma)

Saṃjaya reports that once both armies are arrayed, Arjuna (Dhanañjaya), described as an atiratha, strikes down a ratha-contingent and repeatedly fells chariot-leaders with arrows. Despite losses, Dhṛtarāṣṭra’s forces press on, seeking conspicuous renown and treating withdrawal as tantamount to death. The fighting becomes chaotic: broken chariots, rapid turns, and fleeing units raise dense dust that obscures the sun and dissolves clear identification; combatants recognize one another only by inference, calls, and lineage-names. Yet the major formations do not collapse—Kaurava vyūhas are held together under the protection of the resolute Bhāradvāja (Droṇa), while the Pāṇḍava formation is guarded by Savyasācin (Arjuna) and reinforced by Bhīma. The narrative then catalogs mixed-arm engagements—horsemen against horsemen, charioteers against charioteers, elephant-riders against elephant-riders, infantry against multiple arms—producing a landscape strewn with weapons, banners, armor, and bodies. As dust settles, omens of devastation are suggested through the appearance of numerous headless trunks (kabandhas). The chapter closes by naming leading champions on both sides who repeatedly break opposing units, culminating in Duryodhana’s advance with a thousand chariots and a renewed, intensified clash as the Pāṇḍavas counter-march against Droṇa and Bhīṣma.

Chapter Arc: धृतराष्ट्र श्वेत के सेनापति-रूप में अग्रसर होने और संग्राम के प्रथम दिन की भीषणता का समाचार सुनकर संजय से पूछते हैं—श्वेत के गिरने के बाद युद्ध का प्रवाह किस ओर मुड़ा। → संजय बतलाते हैं कि विराटपुत्र श्वेत ने क्रोध और प्रतिज्ञा से प्रेरित होकर कौरव-पक्ष के प्रमुख रथियों पर धावा बोला; उसके बाण-वर्ष से अनेक योद्धा विचलित हुए, पर भीष्म अपने प्रचण्ड पराक्रम से रणभूमि को ढँक देते हैं—उनके रथ से छूटे बाण पक्षियों-से आकाश भर देते हैं। → भीष्म का श्वेत पर निर्णायक प्रहार—भीष्म के तीक्ष्ण, बहु-प्रहारक शर-वर्ष के सामने श्वेत का रथ-बल टूटता है और सेनापति श्वेत युद्ध में निपातित होता है; कौरवों में उत्साह और पाण्डवों में ज्वाला-सा रोष भड़क उठता है। → श्वेत-वध के बाद कौरव-सेना संभलती है, भीष्म की ध्वजा-सी स्थिरता से प्रथम दिन का युद्ध समापन की ओर जाता है; धृतराष्ट्र के मन में विजय-आशा जागती है, पर संजय संकेत देता है कि यह विजय-उल्लास क्षणिक है क्योंकि पाण्डवों का क्रोध अब और तीव्र होगा। → श्वेत-वध से पाण्डवों के भीतर जो ‘प्रज्वलित मन’ उठता है, वह अगले दिन किस महाविनाशक प्रतिशोध में फूटेगा—यही अनकहा भय अगले प्रसंग पर छोड़ दिया जाता है।

Shlokas

Verse 1

ऑपन--माज छा जि: एकोनपज्चाशत्तमो<ड्ध्याय: शंखका युद्ध, भीष्मका प्रचण्ड पराक्रम तथा प्रथम दिनके युद्धकी समाप्ति धृतराष्ट उवाच श्वैते सेनापतौ तात संग्रामे निहते परै: । किमकुर्वन्‌ महेष्वासा: पञ्चाला: पाण्डवै: सह,धृतराष्ट्रने पूछा--तात! सेनापति श्वेतके शत्रुओंद्वारा युद्धस्थलमें मारे जानेपर महान्‌ धनुर्धर पांचालों और पाण्डवोंने क्या किया?

قال دِهرتَراشْترا: يا بُنيّ، حين قُتل شفيتا، قائد الجيش، في ساحة القتال على يد الأعداء، ماذا فعل الرماة العظام—البانشالا مع الباندافا—بعد ذلك؟

Verse 2

सेनापतिं समाकर्ण्य श्वेतं युधि निपातितम्‌ । तदर्थ यततां चापि परेषां प्रपलायिनाम्‌

قال دِهرتَراشْترا: حين سمعتُ أن شفيتا، القائد، قد صُرع في القتال، وأن الآخرين—مع أنهم كانوا يسعون إلى ذلك الهدف نفسه—قد أخذوا يفرّون من العدو، (فأخبرني بما تلا ذلك).

Verse 3

मन: प्रीणाति मे वाक्‍्यं जयं संजय शृण्वत: । प्रत्युपायं चिन्तयतो लज्जां प्राप्रोति मे न हि

قال دِهرتَراشْترا: يا سانجيا، إن كلماتك تُبهج قلبي وأنا أستمع، حتى لأشعر كأن النصر قد صار لي. وبينما أظل أفكّر في التدابير المضادّة، لا يعتري نفسي خجلٌ البتّة.

Verse 4

स हि वीरो<नुरक्तश्न वृद्ध: कुरुपतिस्तदा । संजय! सेनापति श्वेत युद्धमें मारे गये। उनकी रक्षाके लिये प्रयत्न करनेपर भी शत्रुओंको पलायन करना पड़ा तथा अपने पक्षकी विजय हुई--से सब बातें सुनकर मेरे मनमें बड़ी प्रसन्नता हो रही है। शत्रुओंके प्रतीकारका उपाय सोचते हुए मुझे अपने पक्षके द्वारा की गयी अनीतिका स्मरण करके भी लज्जा नहीं आती है। वे वृद्ध एवं वीर कुरुराज भीष्म हमपर सदा अनुराग रखते हैं (इस कारण ही उन्होंने श्वेतके साथ ऐसा व्यवहार किया होगा) | २-३ ह || कृतं वैरं सदा तेन पितु: पुत्रेण धीमता

قال دِهْرِتَرَاشْتْرَا: «إنّ ذلك البطل الشيخ، سيدَ الكورو، كان يومئذٍ حقًّا مُخْلِصًا لنا. يا سَنْجَيَا، لقد قُتِلَ قائدي شْفِيتا (Śveta) في ساحة القتال. وهكذا فقد أرسى ذلك الابنُ الحكيمُ عداوةً راسخةً على الأب.»

Verse 5

सर्व बल॑ परित्यज्य दुर्ग संश्रित्य तिष्तति,पहले तो वह समस्त सेनाका परित्याग करके (अकेला ही) दुर्गमें छिपा रहता था। फिर पाण्डवोंके प्रतापसे दुर्गम प्रदेशमें रहकर निरन्तर शत्रुओंको बाधा पहुँचाते हुए सदाचारका पालन करने लगा

قال دِهْرِتَرَاشْتْرَا: «لما تخلّى عن كل عونٍ عسكريّ، لجأ إلى حصنٍ وأقام فيه. في البدء انسحب من الجيش كلّه واختبأ في القلعة وحيدًا؛ ثم، تحت وطأة بأسِ الباندافا، عاش في نواحٍ وعرةٍ بعيدة المنال، يعرقل الأعداء على الدوام، ومع ذلك يحافظ على سلوك الأبرار.»

Verse 6

पाण्डवानां प्रतापेन दुर्ग देशं निवेश्य च । सपत्नान्‌ सततं बाधन्नार्यवृत्तिमनुछित:,पहले तो वह समस्त सेनाका परित्याग करके (अकेला ही) दुर्गमें छिपा रहता था। फिर पाण्डवोंके प्रतापसे दुर्गम प्रदेशमें रहकर निरन्तर शत्रुओंको बाधा पहुँचाते हुए सदाचारका पालन करने लगा

قال دِهْرِتَرَاشْتْرَا: «إذ ضُغِطَ عليه ببأسِ الباندافا، تراجع ولجأ إلى معقلٍ عسير المنال. غير أنّه، وهو يواصل مضايقة خصومه على الدوام، أخذ كذلك يسلك سلوكًا يوافق العُرف النبيل والبرّ.»

Verse 7

आश्चर्य वै सदा तेषां पुरा राज्ञां सुदुर्मति: । ततो युधिष्छिरे भक्त: कथं संजय सूदित:,क्योंकि पूर्वकालमें अपने साथ विरोध करनेवाले उन राजाओंके प्रति उसकी बुद्धिमें दुर्भाव था; पर संजय! आश्चर्य तो यह है कि ऐसा शूरवीर श्वेत, जो युधिष्ठिरका बड़ा भक्त था, मारा कैसे गया?

قال دِهْرِتَرَاشْتْرَا: «لأنّ عقله في سالف الزمان كان يضمر سوءًا تجاه أولئك الملوك الذين خالفوه. ولكن يا سَنْجَيَا، العجب كل العجب: كيف قُتِلَ شْفِيتا (Śveta)، وهو بطلٌ شديد الإخلاص ليودهِشْتِهيرا (Yudhiṣṭhira)؟»

Verse 8

प्रक्षिप्त: सम्मतः क्षुद्र: पुत्रो मे पुरुषाधम: । न युद्ध रोचयेद्‌ भीष्मो न चाचार्य: कथंचन

قال دِهْرِتَرَاشْتْرَا: «ابني—الذي يُعَدُّ حقيرًا دنيئًا، أحطَّ الناس منزلة—قد طُرِحَ جانبًا. لا بِهِيشْما (Bhīṣma) ولا المُعَلِّم (Droṇa) يرضيان بالحرب أبدًا.»

Verse 9

न वासुदेवो वार्ष्णेयो धर्मराजश्व॒ पाण्डव:

قال دِهْرِتَرَاشْتْرَا: «ليس فاسوديفا، الفارْشْنِيَّ (كريشنا)، ولا دَهرْمَراجا، الباندَفَ (يودهيشثيرا)…»—تأمّلٌ مضطربٌ لا يكاد يصدّق، يُمهِّد للسرد الآتي من زاوية السلطان الأخلاقي: فحتى من اشتهروا بالاستقامة وكبح النفس يُساقون إلى أزمة الحرب التي لا مردّ لها.

Verse 10

वार्यमाणो मया नित्यं गान्धार्या विदुरेण च,मैंने, गान्धारीने और विदुरने तो सदा ही उसे मना किया है, जमदग्निपुत्र परशुरामने तथा महात्मा व्यासजीने भी उसे युद्धसे रोकनेका प्रयत्न किया है; तथापि कई, शकुनि तथा दुःशासनके मतमें आकर पापी दुर्योधन सदा युद्धका ही निश्चय रखता आया है। उसने पाण्डवोंको कभी कुछ नहीं समझा

قال دِهْرِتَرَاشْتْرَا: «لقد حاولتُ دائمًا كفَّه، وكذلك غاندھاري وفيدورا. وباراشوراما ابنُ جامَدَغْني، وڤياسا عظيمُ النفس، سعيا أيضًا إلى منعه من الحرب. غير أنّ دوريوذانا الآثم، وقد استمالته مشورةُ شكوني ودُحشاسانا، ظلّ لا يعقد عزمه إلا على الحرب. ولم يَعُدّ الباندَفَةَ يومًا ذوي شأن.»

Verse 11

जामदग्न्येन रामेण व्यासेन च महात्मना । दुर्योधनो युध्यमानो नित्यमेव हि संजय,मैंने, गान्धारीने और विदुरने तो सदा ही उसे मना किया है, जमदग्निपुत्र परशुरामने तथा महात्मा व्यासजीने भी उसे युद्धसे रोकनेका प्रयत्न किया है; तथापि कई, शकुनि तथा दुःशासनके मतमें आकर पापी दुर्योधन सदा युद्धका ही निश्चय रखता आया है। उसने पाण्डवोंको कभी कुछ नहीं समझा

قال دِهْرِتَرَاشْتْرَا: «يا سَنجايا، مع أنّ راما جامَدَغْنْيا (باراشوراما) وڤياسا عظيمَ النفس قد حاولا كفَّه، فإنّ دوريوذانا لا يزال أبدًا مولعًا بالقتال. وحتى بعد أن نُصح مرارًا بترك الحرب، يصرّ على عزمٍ ثابتٍ للمعركة—كاشفًا عن إرادةٍ تصلّبت في وجه نصح الحكماء وضبط النفس الأخلاقي.»

Verse 12

कर्णस्य मतमास्थाय सौबलस्य च पापकृत्‌ । दुःशासनस्य च तथा पाण्डवान्‌ नान्वचिन्तयत्‌,मैंने, गान्धारीने और विदुरने तो सदा ही उसे मना किया है, जमदग्निपुत्र परशुरामने तथा महात्मा व्यासजीने भी उसे युद्धसे रोकनेका प्रयत्न किया है; तथापि कई, शकुनि तथा दुःशासनके मतमें आकर पापी दुर्योधन सदा युद्धका ही निश्चय रखता आया है। उसने पाण्डवोंको कभी कुछ नहीं समझा

قال دِهْرِتَرَاشْتْرَا: «اتّخذ موقفه على مشورةِ كَرْنَة، وعلى مشورةِ شكوني ابنِ سوبالا؛ ذلك الصانعُ للإثم—دوريوذانا—وسار كذلك على رأي دُحشاسانا. وهكذا لم يُعمل فكره قطّ في الباندَفَة كما ينبغي.»

Verse 13

तस्याहं व्यसन घोरें मन्ये प्राप्तं तु संजय । श्वैतस्य च विनाशेन भीष्मस्य विजयेन च

قال دِهْرِتَرَاشْتْرَا: «يا سَنجايا، أرى أنّ نازلةً مروّعة قد حلّت به—إذ هلك شڤايتا، وإذ نال بهيشما الظفر.»

Verse 14

संक्रुद्ध: कृष्णसहित: पार्थ: किमकरोद्‌ युधि । संजय! मेरा तो विश्वास है कि दुर्योधनपर घोर संकट प्राप्त होनेवाला है। श्वेतके मारे जाने और भीष्मकी विजय होनेसे अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए श्रीकृष्णसहित अर्जुनने युद्धसस्‍्थलमें क्या किया? ।। १३ है || अर्जुनाद्धि भयं भूयस्तन्मे तात न शाम्यति,तात! अर्जुनसे मुझे अधिक भय बना रहता है और वह भय कभी शान्त नहीं होता; क्योंकि कुन्ती-नन्दन अर्जुन शूरवीर तथा शीघ्रतापूर्वक अस्त्र संचालन करनेवाला है। मैं समझता हूँ कि वह अपने बाणोंद्वारा शत्रुओंके शरीरोंको मथ डालेगा

قال دِهْرِتَرَاشْتْرَا: «يا بُنَيّ، إن خوفي من أرجونا لا يزداد إلا اشتدادًا ولا يهدأ. فأرجونا ابن كونتي بطلٌ جسور، سريعٌ خاطفٌ في تناول السلاح. وإني لأعتقد أنه بسِهامه سيُقَلِّبُ أجساد أعدائه ويُمَزِّقُها تمزيقًا.»

Verse 15

स हि शूरश्न कौन्तेय: क्षिप्रकारी धनंजय: । मन्ये शरै: शरीराणि शत्रूणां प्रमथिष्यति,तात! अर्जुनसे मुझे अधिक भय बना रहता है और वह भय कभी शान्त नहीं होता; क्योंकि कुन्ती-नन्दन अर्जुन शूरवीर तथा शीघ्रतापूर्वक अस्त्र संचालन करनेवाला है। मैं समझता हूँ कि वह अपने बाणोंद्वारा शत्रुओंके शरीरोंको मथ डालेगा

قال دِهْرِتَرَاشْتْرَا: «فإن أرجونا دهننْجَيا، ابن كونتي، لبطلٌ حقًّا، سريعٌ حاسمٌ في الفعل. أخشاه على الدوام، ولا يهدأ ذلك الخوف. يا بُنَيّ، أظنّه بسِهامه سيَسْحَقُ ويُقَلِّبُ أجساد أعدائه.»

Verse 16

ऐन्द्रिमिन्द्रानुजसमं महेन्द्रसदृशं बले । अमोघक्रोधसंकल्पं दृष्टवा व: किमभून्मन:,इन्द्रकुमार अर्जुन भगवान्‌ विष्णुके समान पराक्रमी और महेन्द्रके समान बलवान है। उसका क्रोध और संकल्प कभी व्यर्थ नहीं होता। उसे देखकर तुमलोगोंके मनमें क्या विचार उठा था?

«أرجونا ابنُ إندرا، شجاعته كفيشنو وقوته كمَهِندرا. غضبه وعزمه لا يذهبان سُدًى قط. حين رأيتموه، أيُّ خاطرٍ نهض في قلوبكم؟»

Verse 17

तथैव वेदविच्छूरो ज्वलनार्कसमद्युति: । इन्द्रास्त्रविदमेयात्मा प्रपतन्‌ समितिंजय:,अर्जुन वेदज्ञ, शौर्यसम्पन्न, अग्नि और सूर्यके समान तेजस्वी, इन्द्रास्त्रका ज्ञाता, अमेय आत्मबलसे सम्पन्न, वेगपूर्वक आक्रमण करनेवाला और बड़े-बड़े संग्रामोंमें विजय पानेवाला है। वह ऐसे-ऐसे अस्त्रोंका प्रयोग करता है, जिनका हलका-सा स्पर्श भी वज्रके समान कठोर है। महारथी अर्जुन अपने हाथमें सदा तलवार खींचे ही रहता है और उसका प्रहार करके विकट गर्जना करता है

قال دِهْرِتَرَاشْتْرَا: «وكذلك أرجونا—عالِمٌ بالڤيدا وبطلٌ حقّ—متلألئٌ كالنار المتأججة وكالشمس. هو عارفٌ بأسلحة إندرا السماوية، ذو قوةٍ باطنةٍ لا تُقاس، يندفع إلى الهجوم اندفاعًا، قاهرًا لجماعات الأعداء. وبمثل هذه البأس والمهارة في السلاح يقف في ساحة القتال قوةً مهيبة، يبعث الرهبة بسطوة فنّه الحربي.»

Verse 18

वज्संस्पर्शरूपाणामस्त्राणां च प्रयोजक:ः । स खड्गाक्षेपहस्तस्तु घोष॑ चक्रे महारथ:,अर्जुन वेदज्ञ, शौर्यसम्पन्न, अग्नि और सूर्यके समान तेजस्वी, इन्द्रास्त्रका ज्ञाता, अमेय आत्मबलसे सम्पन्न, वेगपूर्वक आक्रमण करनेवाला और बड़े-बड़े संग्रामोंमें विजय पानेवाला है। वह ऐसे-ऐसे अस्त्रोंका प्रयोग करता है, जिनका हलका-सा स्पर्श भी वज्रके समान कठोर है। महारथी अर्जुन अपने हाथमें सदा तलवार खींचे ही रहता है और उसका प्रहार करके विकट गर्जना करता है

قال دِهْرِتَرَاشْتْرَا: «إنه لَسَيِّدٌ في تسخير أسلحةٍ يكون مجردُ مسِّها كالصاعقة. وذلك المحارب العظيم على العربة، وقد رفع سيفه بيده، ضرب وأطلق زئيرًا مُرعِبًا.»

Verse 19

स संजय महाप्राज्ञो द्रुपदस्थात्मजो बली । धृष्टद्युम्न: किमकरोच्छवेते युधि निपातिते,संजय! ट्रपदके परम बुद्धिमान पुत्र बलवान धृष्टद्युम्नने श्वेतके युद्धमें मारे जानेपर क्या किया?

قال دِهْرِتَرَاشْتْرَا: «يا سَنْجَيَا، حين سقط شْفِيتَا صريعًا في ساحة القتال، ماذا صنع عندئذٍ دْهْرِشْتَدْيُومْنَا الجبّار—ابن دْرُوبَدَا، ذو العقل الراجح؟»

Verse 20

पुरा चैवापराधेन वधेन च चमूपते: । मन्ये मन: प्रजज्वाल पाण्डवानां महात्मनाम्‌,पहले भी कौरवोंद्वारा पाण्डवोंका अपराध हुआ है; उससे तथा सेनापतिके वधसे महामना पाण्डवोंके हृदयमें आग-सी लग गयी होगी, यह मेरा विश्वास है

قال دِهْرِتَرَاشْتْرَا: «لقد سَبَقَ أن وُقِعَ عليهم الظلمُ والاعتداء، وها هو اليوم يُضاف إليه قتلُ قائدهم. وإني لأعتقد أن قلوبَ الباندافا ذوي النفوس العظيمة قد اشتعلت نارًا. وغضبُهم المولود من الأذى والجور لا بد أنه الآن يتأجّج بعنف.»

Verse 21

तेषां क्रोधं चिन्तयंस्तु अह:सु च निशासु च । न शान्तिमधिगच्छामि दुर्योधनकृतेन हि । कथं चाभून्महायुद्ध॑ सर्वमाचक्ष्व संजय,दुर्योधनके कारण पाण्डवोंके मनमें जो क्रोध है, उसका चिन्तन करके मुझे न तो दिनमें शान्ति मिलती है, न रात्रिमें ही। संजय! वह महायुद्ध किस प्रकार हुआ, यह सब मुझे बताओ

قال دِهْرِتَرَاشْتْرَا: «إني كلما فكّرتُ في غضبِ الباندافا ليلًا ونهارًا لم أجد سكينة، لأنه إنما نشأ من صنيعِ دُرْيُوذَنَ. يا سَنْجَيَا، أخبرني كيف قامت تلك الحرب العظمى؛ واقصص عليّ كلَّ شيء.»

Verse 22

संजय उवाच शृणु राजन्‌ स्थिरो भूत्वा तवापनयनो महान्‌ । न च दुर्योधने दोषमिममाधातुमहसि,संजयने कहा--राजन्‌! स्थिर होकर सुनिये। इस युद्धके होनेमें सबसे बड़ा अन्याय आपका ही है। इसका सारा दोष आपको दुर्योधनके ही माथे नहीं मढ़ना चाहिये

قال سَنْجَيَا: «أيها الملك، استمع بثبات. إن أعظمَ الجور في جلب هذه النازلة يقع عليك أنت. فلا ينبغي لك أن تُلقي اللوم كلَّه على دُرْيُوذَنَ وحده.»

Verse 23

गतोदके सेतुबन्धो यादृक्‌ तादूड्मतिस्तव । संदीप्ते भवने यद्वत्‌ कृूपस्य खननं तथा,जैसे पानीकी बाढ़ निकल जानेपर पुल बाँधनेका प्रयास किया जाय अथवा घरमें आग लग जानेपर उसे बुझानेके लिये कुआँ खोदनेकी चेष्टा की जाय, उसी प्रकार आपकी यह समझ है

قال سَنْجَيَا: «إن رأيك كمن يحاول بناءَ جسرٍ بعد أن انحسر السيل، أو كمن يحفر بئرًا بعدما اشتعل البيت نارًا. وكذلك فهمُك جاء متأخرًا—حين ضاع وقتُ الفعل في أوانه وبما ينفع.»

Verse 24

गतपूर्वाह्नभूयिष्ठे तस्मिन्नहनि दारुणे । तावकानां परेषां च पुनर्युद्धमवर्तत,उस भयंकर दिनके पूर्वभागका अधिकांश व्यतीत हो जानेपर आपके और पाण्डवोंके सैनिकोंमें पुनः युद्ध आरम्भ हुआ

قال سنجيا: لما مضى أكثرُ ضُحى ذلك اليوم الرهيب، اضطربت المعركة من جديد بين جندك وجند العدو.

Verse 25

श्वेतं तु निहतं दृष्टवा विराटस्य चमूपतिम्‌ । कृतवर्मणा च सहित दृष्टवा शल्यमवस्थितम्‌

قال سنجيا: لما رأى شْوِيتا—قائد جيش فيرَاطا—صرعى، ورأى شَالْيَا ثابتًا مع كِرِتَفَرْمَن، انكشفت عزائم المحاربين واصطفافاتهم في ساحة الوغى.

Verse 26

स विस्फार्य महच्चापं शक्रचापोपमं बली

قال سنجيا: إنّ ذلك البطل القويّ مدَّ قوسه العظيم—كقوس شَكْرَة (إندرا)—فأطنب له رنينًا، مُعلِنًا الاستعداد للقتال.

Verse 27

महता रथसंघेन समन्तात्‌ परिरक्षित:

قال سنجيا: كان محميًّا من كل جانب بحشدٍ عظيم من المركبات الحربية.

Verse 28

तमापततन्तं सम्प्रेक्ष्य मत्तवारणविक्रमम्‌,मतवाले हाथीके समान पराक्रम प्रकट करनेवाले शंखको धावा करते देख आपके सात रथियोंने मौतके दाँतोंमें फँसे हुए मद्राज शल्यको बचानेकी इच्छा रखकर उन्हें चारों ओरसे घेर लिया

قال سنجيا: لما رأوا شَنْخا يندفع مهاجمًا، مُظهِرًا بأسًا كبأس الفيل الهائج، أحاط به فرسانُ مركباتك السبعة من كل جانب، رغبةً في إنقاذ شَالْيَا ملك مَدْرَة، وقد بدا كأنه وقع بين أنياب الموت.

Verse 29

तावकानां रथा: सप्त समन्तात्‌ पर्यवारयन्‌ । मद्रराजं परीप्सन्तो मृत्योर्दष्टान्तरं गतम्‌,मतवाले हाथीके समान पराक्रम प्रकट करनेवाले शंखको धावा करते देख आपके सात रथियोंने मौतके दाँतोंमें फँसे हुए मद्राज शल्यको बचानेकी इच्छा रखकर उन्हें चारों ओरसे घेर लिया

فأحاطت سبعُ مركباتٍ حربيةٍ من جانبكم من كلِّ ناحية، رغبةً في إنقاذ ملكِ المَدْرَةِ شَلْيَةَ، كأنّه قد علق بين أنيابِ الموت ومضى إلى فجوةِ الهلاك؛ إذ رأوا شانْخا يندفع مُظهِرًا بأسًا كَبأسِ فيلٍ هائج.

Verse 30

बृहदूबलश्न॒ कौसल्यो जयत्सेनश्व मागध: । तथा रुकक्‍्मरथो राजन पुत्र: शल्यस्य मानित:,राजन! उन रथियोंके नाम ये हैं--कोसलनरेश बृहदबल, मगधदेशीय जयत्सेन, शल्यके प्रतापी पुत्र रुक्मरथ, अवन्ति-के राजकुमार विन्द और अनुविन्द, काम्बोजराज सुदक्षिण तथा बृहत्क्षत्रके पुत्र सिन्धुराज जयद्रथ

قال سَنْجَيا: «يا ملك، من بين أبرَزِ فرسانِ المركباتِ الحربية: بْرِهَدْبَلا ملكُ كوسالا، وجَياتْسِينا من ماغَدها، وكذلك رُكْمَرَثا، الابنُ المكرَّمُ الشجاعُ لشَلْيَة.»

Verse 31

विन्दानुविन्दावावन्त्यौ काम्बोजश्च सुदक्षिण: । बृहत्क्षत्रस्थ दायाद: सैन्धवश्चल जयद्रथ:,राजन! उन रथियोंके नाम ये हैं--कोसलनरेश बृहदबल, मगधदेशीय जयत्सेन, शल्यके प्रतापी पुत्र रुक्मरथ, अवन्ति-के राजकुमार विन्द और अनुविन्द, काम्बोजराज सुदक्षिण तथा बृहत्क्षत्रके पुत्र सिन्धुराज जयद्रथ

قال سَنْجَيا: «وِندَا وأَنُوِندَا، أميرا أَوَنْتِي؛ وسودَكْشِينا ملكُ كامبوجا؛ وجَياَدْرَثا من السِّندهو، وارثُ سلالةِ بْرِهَتْكْشَتْرَة—هؤلاء هم فرسانُ المركباتِ المشهورون.»

Verse 32

नानाधातुविचित्राणि कार्मुकाणि महात्मनाम्‌ | विस्फारितान्यदृश्यन्त तोयदेष्विव विद्युत:,इन महामना वीरोंके फैलाये हुए अनेक रूप-रंगके विचित्र धनुष बादलोंमें बिजलियोंके समान दृष्टिगोचर हो रहे थे

قال سَنْجَيا: «إنّ أقواسَ أولئك العظامِ النفوس—الموشّاةَ بمعادنَ شتّى وبصنعةٍ عجيبة—كانت تُرى ممدودةً إلى أقصاها، تلمع كالبَرقِ في السُّحُبِ الماطرة.»

Verse 33

ते तु बाणमयं वर्ष शड्खमूर्थ्नि न्‍्यपातयन्‌ | निदाघान्ते5निलोद्धूता मेघा इव नगे जलम्‌,उन सबने शंखके मस्तकपर बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी, मानो ग्रीष्म-ऋतुके अन्तमें वायुद्वारा उठाये हुए मेघ पर्वतपर जल बरसा रहे हों

قال سَنْجَيا: «ثم أمطروا على رأسِ شانْخا وابلًا من السهام، كأنّ سُحُبًا تسوقها الرياحُ في أواخر القيظ تصبُّ ماءها على جبل.»

Verse 34

ततः क्रुद्धो महेष्वास: सप्तभल्लै: सुतेजनै: । धनूंषि तेषामाच्छिद्य ननर्द पृतनापति:,उस समय महान धनुर्धर सेनापति शंखने कुपित होकर तेज किये हुए भल्‍ल नामक सात बाणोंद्वारा उन सातों रथियोंके धनुष काटकर गर्जना की

قال سانجيا: عندئذٍ اشتعل غضبُ الرامي العظيم، فبسبعةِ سهامٍ من نوع «بهلّا» حادّةٍ كالموسى قطع أقواسَ أولئك المحاربين، ثم زأر زئيرًا مدوّيًا بصفته قائدَ الجيش.

Verse 35

ततो भीष्मो महाबाहुर्विनद्य जलदो यथा । तालमात्र धनुर्गृद्दा शडुखमभ्यद्रवद्‌ रणे,तदनन्तर महाबाहु भीष्मने मेघके समान गर्जना करके चार हाथ लंबा धनुष लेकर रणभूमिमें शंखपर धावा किया

قال سانجيا: ثم إن بهيشما، عظيمَ الساعدين، هدر كالسحاب الرعدي، وتناول قوسًا بطول نخلة، واندفع في المعركة نحو المحارب حامل الصدفة (الشنخ).

Verse 36

तमुद्यन्तमुदीक्ष्याथ महेष्वासं महाबलम्‌ | संत्रस्ता पाण्डवी सेना वातवेगहतेव नौ:,उस समय महाधनुर्धर महाबली भीष्मको युद्धके लिये उद्यत देख पाण्डवसेना वायुके वेगसे डगमग होनेवाली नौकाकी भाँति काँपने लगी

قال سانجيا: ولمّا رأت جيوشُ الباندافا بهيشما—المحاربَ الجبّار، سيّدَ القوس العظيم—ينهض مستعدًّا للقتال، استولى عليها الفزع وارتجفت كقاربٍ تضربه رياحٌ عاتية.

Verse 37

ततोअ्र्जुन: संत्वरित: शड्खस्यासीत्‌ पुर:सर: । भीष्माद्‌ रक्ष्योड्यमद्येति ततो युद्धमवर्तत,यह देख अर्जुन तुरंत ही शंखके आगे आ गये। उनके आगे आनेका उद्देश्य यह था कि आज भीष्मके हाथसे शंखको बचाना चाहिये। फिर तो महान्‌ युद्ध आरम्भ हुआ

قال سانجيا: عندئذٍ أسرع أرجونا إلى المقدّمة، فوقف أمام حامل الشنخ، عازمًا أن يحميه في ذلك اليوم من قبضة بهيشما. وهناك اندفعت المعركة العظمى إلى الحركة.

Verse 38

हाहाकारो महानासीद्‌ योधानां युधि युध्यताम्‌ । तेजस्तेजसि सम्पृक्तमित्येवं विस्मयं ययु:,उस समय रणक्षेत्रमें जूझनेवाले योद्धाओंका महान्‌ हाहाकार सब ओर फैल गया। तेजके साथ तेज टक्कर ले रहा है, यह कहते हुए सब लोग बड़े विस्मयमें पड़ गये

قال سانجيا: عندئذٍ ارتفع بين المحاربين المتقاتلين في الميدان صراخٌ عظيمٌ مضطرب، وانتشر في كل ناحية. ولمّا رأوا البهاء يصطدم بالبهاء، أُخذ الجميع بالدهشة.

Verse 39

अथ शल्यो गदापाणिरवतीर्य महारथात्‌ | शड्ुखस्य चतुरो वाहानहनद्‌ भरतर्षभ,भरतश्रेष्ठ! उस समय राजा शल्यने हाथमें गदा लिये अपने विशाल रथसे उतरकर शंखके चारों घोड़ोंको मार डाला

قال سانجيا: ثم إنّ الملك شاليا، قابضًا على هراوةٍ بيده، نزل من عربته العظيمة وضرب فأسقط خيول شانخا الأربعة قتلى.

Verse 40

स हताश्चाद्‌ रथात्‌ तूर्ण खड्गमादाय विद्रुतः | बीभत्सोश्न रथं प्राप्प पुन: शान्तिमविन्दत,घोड़े मारे जानेपर शंख तुरंत ही तलवार लेकर रथसे कूद पड़ा और अर्जुनके रथपर चढ़कर उसने पुनः शान्तिकी साँस ली

قال سانجيا: فلما قُتلت خيوله، قفز شانخا سريعًا من العربة والسيف بيده. ولما بلغ عربة بيبهاتسو (أرجونا) صعد إليها، وبما وجد فيها من ملجأ استعاد رباطة جأشه.

Verse 41

ततो भीष्मरथात्‌ तूर्णमुत्पतन्ति पतत्त्रिण: । यैरन्तरिक्षं भूमिश्व सर्वतः समवस्तृता,तत्पश्चात्‌ भीष्मके रथसे शीघ्रतापूर्वक पंखयुक्त बाण पक्षीके समान उड़ने लगे, जिन्होंने पृथ्वी और आकाश सबको आच्छादित कर लिया

قال سانجيا: ثم انطلقت من عربة بهيشما في الحال سهامٌ مُجَنَّحة تطير كأنها طيور، حتى بدا كأن السماء والأرض قد غُطّيتا بها من كل جانب.

Verse 42

पज्चालानथ मत्स्यांश्व केकयांश्व प्रभद्रकान्‌ | भीष्म: प्रहरतां श्रेष्ठ; पातयामास पत्रिभि:,योद्धाओंमें श्रेष्ठ भीष्म पांचाल, मत्स्य, केकय तथा प्रभद्रक वीरोंको अपने बाणोंसे मार-मारकर गिराने लगे

قال سانجيا: ثم إنّ بهيشما—وهو أبرع الضاربين في ساحة القتال—هجم على البانشالا والماتسيا والكيكايا ومحاربي البرابهدراكا، فكان يُسقطهم مرارًا بسهامه.

Verse 43

उत्सृज्य समरे राजन्‌ पाण्डवं सव्यसाचिनम्‌ । अभ्यद्रवत पाज्चाल्यं द्रुपदं सेनया वृतम्‌

قال سانجيا: أيها الملك، في خضمّ المعركة أعرض عن أرجونا الباندفي، الرامي الماهر بكلتا يديه، واندفع نحو دروبادا ملك البانشالا، وهو محاطٌ بجيشه.

Verse 44

अग्निनेव प्रदग्धानि वनानि शिशिरात्यये

قال سنجيا: «كما تُحرق الغابات بالنار عند انقضاء الشتاء، كذلك أُبيدوا—مُحترقين مُجدَبين مُخرَّبين».

Verse 45

शरदग्धान्यदृश्यन्त सैन्यानि द्रुपदस्य ह । जैसे ग्रीष्म-ऋतुमें आग लगनेसे सारे वन दग्ध हो जाते हैं, उसी प्रकार द्रुपदकी सारी सेनाएँ भीष्मके बाणोंसे दग्ध दिखायी देने लगीं || ४४ ह ।। अत्यतिष्ठद्‌ रणे भीष्मो विधूम इव पावक:,उस समय भीष्म रणभूमिमें धूमरहित अग्निके समान खड़े थे। जैसे दुपहरीमें अपने तेजसे तपते हुए सूर्यकी ओर देखना कठिन है, उसी प्रकार पाण्डव-सेनाके सैनिक भीष्मकी ओर दृष्टिपात करनेमें भी असमर्थ हो गये

قال سنجيا: بدت جموع دروبادا كأنها مُحترقة—كما تُلتهم الغابة في قيظ الصيف إذا اندلع فيها الحريق. كذلك بدا جيش دروبادا كله كأنه احترق بسهام بهيشما. ثم ثبت بهيشما في ساحة القتال كالنار التي لا دخان لها. وكما يعسر التحديق في شمس الظهيرة المتقدة، كذلك عجز محاربو جيش الباندافا حتى عن أن يوجّهوا أبصارهم نحو بهيشما.

Verse 46

मध्यंदिने यथा5<दित्यं तपन्तमिव तेजसा । न शेकुः पाण्डवेयस्य योधा भीष्म निरीक्षितुम्‌,उस समय भीष्म रणभूमिमें धूमरहित अग्निके समान खड़े थे। जैसे दुपहरीमें अपने तेजसे तपते हुए सूर्यकी ओर देखना कठिन है, उसी प्रकार पाण्डव-सेनाके सैनिक भीष्मकी ओर दृष्टिपात करनेमें भी असमर्थ हो गये

قال سنجيا: كما يعسر النظر إلى الشمس المتقدة عند الظهيرة، كذلك لم يستطع محاربو الباندافا أن ينظروا إلى بهيشما ولو نظرة. فقد وقف في ساحة القتال كالنار التي لا دخان لها، يشعّ ببهاء طاغٍ حتى تزلزلت شجاعتهم ورباطة جأشهم أمام حضوره.

Verse 47

वीक्षांचक्रु: समन्तात्‌ ते पाण्डवा भयपीडिता: । त्रातारं नाध्यगच्छन्त गाव: शीतार्दिता इव,पाण्डव योद्धा भयसे पीड़ित हो सब ओर देखने लगे; परंतु सर्दीसे पीड़ित हुई गौओंकी भाँति उन्हें अपना कोई रक्षक नहीं मिला

قال سنجيا: وقد أرهقهم الخوف، أخذ الباندافا ينظرون من كل جانب؛ لكنهم لم يجدوا حامياً—كقطعان البقر المعذَّبة ببرد الشتاء، تلتمس المأوى عبثاً.

Verse 48

सा तु यौधिष्ठिरी सेना गाड़ेयशरपीडिता । सिंहेनेव विनिर्भिन्ना शुक्ला गौरिव गोपते,राजन्‌! गंगानन्दन भीष्मके बाणोंसे पीड़ित हुई वह युधिष्ठिरकी (श्वैत- परिधानविभूषित) सेना सिंहके द्वारा सतायी हुई सफेद गायके समान प्रतीत होने लगी

قال سنجيا: أما جيش يودهيشثيرا، وقد عُذِّب عذاباً شديداً بوابل السهام الكثيف، فقد بدا—يا أيها الملك—كَبَقَرةٍ بيضاء يطاردها الأسد ويمزقها. وحين أصابته نبال بهيشما، ابن الغانغا، بدا ذلك الجيش كأنه يُفتَّت في لهيب سَورة الحرب.

Verse 49

हते विप्रद्रुते सैन्ये निरुत्साहे विमर्दिते । हाहाकारो महानासीत्‌ पाण्डुसैन्येषु भारत,भारत! पाण्डव-सेनाके सैनिक बहुत-से मारे गये, बहुतेरे भाग गये, कितने रौंद डाले गये और कितने ही उत्साहशून्य हो गये। इस प्रकार पाण्डवदलमें बड़ा हाहाकार मच गया था इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि शड्खयुद्धे प्रथणदिवसावहारे एकोनपज्चाशत्तमो5 ध्याय: इस प्रकार श्रीमह्या भारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्यवधपर्वमें शंखका युद्ध तथा प्रथम दिनके युद्धका उपसंहाराविषयक उनचासवाँ अध्याय पूरा हुआ

قال سنجيا: لما قُتِلَ الجيشُ وتفرّق هاربًا، وسُلِبَ عزمه، وسُحِقَ في لُجّةِ الالتحام، ارتفع بين قوات أبناء باندو صراخٌ عظيمٌ من الكرب، يا بهاراتا.

Verse 50

ततो भीष्म: शान्तनवो नित्यं मण्डलकार्मुक:ः । मुमोच बाणान्‌ दीप्ताग्रानहीनाशीविषानिव,उस समय शान्तनुनन्दन भीष्म अपने धनुषको खींचकर गोल बना देते और उसके द्वारा विषैले सर्पोंकी भाँति भयंकर प्रज्वलित अग्रभागवाले बाणोंकी निरन्तर वर्षा करते थे

قال سنجيا: ثم إنّ بهيشما ابن شانتانو، الماهر دائمًا في شدّ قوسه بحركةٍ دائرية، أخذ يطلق سهامًا متّقدة الرؤوس—مروّعة كالأفاعي السامّة—يصبّها صبًّا بلا انقطاع.

Verse 51

शरैरेकायनीकुर्वन्‌ दिश: सर्वा यतव्रतः । जघान पाण्डवरथानादिश्यादिश्य भारत,भारत! नियमपूर्वक व्रतोंका पालन करनेवाले भीष्म सम्पूर्ण दिशाओंमें बाणोंसे एक रास्ता बना देते और पाण्डवरथियोंको चुन-चुनकर--उनके नाम ले-लेकर मारते थे

قال سنجيا: وكان بهيشما مواظبًا على نذوره، منضبط السلوك؛ فبسهامٍ متتابعة بدا كأنه يشقّ طريقًا واحدًا واضحًا في كل الجهات. ثم، يا بهاراتا، أخذ يصرع فرسان مركبات الباندافا واحدًا بعد واحد—يناديهم بأسمائهم وهو يصيبهم—فيسقطون صرعى.

Verse 52

ततः सैन्येषु भग्नेषु मथितेषु च सर्वश: । प्राप्ते चास्तं दिनकरे न प्राज्ञायत किंचन,इस प्रकार सारी सेना मथित हो उठी, व्यूह भंग हो गया और सूर्य अस्ताचलको चले गये; उस समय अँधेरेमें कुछ भी सूझ नहीं पड़ता था

قال سنجيا: ثم لما انكسرت الجيوش واضطربت اضطرابًا تامًّا من كل جانب، ولما بلغ قرص الشمس مغربه، لم يعد يُدرَك في الظلمة شيءٌ على وجه اليقين.

Verse 53

भीष्म॑ च समुदीर्यन्तं दृष्टवा पार्था महाहवे । अवहारमकुर्वन्त सैन्यानां भरतर्षभ,भरतश्रेष्ठ! इधर, उस महान्‌ युद्धमें भीष्मका वेग अधिकाधिक प्रचण्ड होता जा रहा था, यह देख कुन्तीके पुत्रोंने अपनी सेनाओंको युद्धक्षेत्रसे पीछे हटा लिया

قال سنجيا: لما رأى أبناء بريثا بهيشما يندفع في ذلك القتال العظيم بقوةٍ تزداد اشتدادًا، سحبوا جيوشهم من ساحة المعركة، يا فحلَ البهاراتيين.

Verse 86

न कृपो न च गान्धारी नाहं संजय रोचये । मेरा पुत्र दुर्योधन क्षुद्र स्वभावका है। वह कर्ण आदिका प्रिय तथा चंचल बुद्धिवाला है। मेरी दृष्टिमें वह समस्त पुरुषोंमें अधम है (इसीलिये उसके मनमें युद्धके लिये आग्रह है)। संजय! मैं, भीष्म, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य तथा गान्धारी--इनमेंसे कोई भी युद्ध नहीं चाहता था

قال دِهْرِتَرَاشْتْرَة: «لا كِرِبَا ولا غاندھاري—ولا أنا يا سَنْجَيَ—نُقِرّ هذا الأمر. إن ابني دُريودھَنَة دنيءُ الطبع ضيّقُ النفس: يهوى كَرْنَة وأمثاله، وعقله متقلّب لا يثبت. وفي حكمي هو أحطّ الرجال؛ ولذلك تعلّق قلبه بالحرب. يا سَنْجَيَ، بيننا—بهيشما، ودرونا، وكِرِبَا، وغاندھاري—لم يكن أحدٌ يريد هذه الحرب حقًّا.»

Verse 93

न भीमो नार्जुनश्वैव न यमौ पुरुषर्षभौ । वृष्णिवंशी भगवान्‌ वासुदेव, पाण्डुपुत्र धर्मराज युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन तथा पुरुषरत्न नकुल-सहदेव भी युद्ध नहीं पसंद करते थे

قال دِهْرِتَرَاشْتْرَة: «لا بِهيما ولا أرجونا، ولا البطلان التوأمان (نَكولا وسَهَدِيفا)، ولا حتى الربّ فاسوديفا المنحدر من سلالة فِرِشْنِي، كانوا يجدون لذّة في الحرب. بل إن يودهيشثِرا ابن باندو، المشهور بلقب دهرماراجا، مع بهيمسينا وأرجونا، ومع التوأمين كالجواهر نكولا وسهديفا، لم يكونوا يحبّون الحرب.»

Verse 256

शड्ख: क्रोधात्‌ प्रजज्वाल हविषा हव्यवाडिव । विराटके सेनापति श्वेतको मारा गया और राजा शल्यको कृतवर्माके साथ रथपर बैठा हुआ देख शंख क्रोधसे जल उठा, मानो अग्निमें घीकी आहुति पड़ गयी हो

قال سَنْجَيَ: «اشتعل شَنْخَة غضبًا، كالنار القربانية حين تُغذّى بقربان السمن المصفّى. فلما رأى شْوِيتَكَة قائد جند فيرَاط قد قُتل، ورأى أيضًا الملك شَالْيَة جالسًا على العربة مع كِرِتَفَرْمَا، تهيّج غضب شَنْخَة وازداد اتقادًا—كأن السمن صُبَّ على اللهيب.»

Verse 266

अभ्यधावज्जिघांसन्‌ वै शल्यं मद्राधिपं युधि । उस बलवान वीरने इन्द्रधनुषके समान अपने विशाल शरासनको कानोंतक खींचकर मद्रराज शल्यको युद्धमें मार डालनेकी इच्छासे उनपर धावा किया

قال سَنْجَيَ: «ثم اندفع مُسرعًا، قاصدًا قتل شَالْيَة سيد مَدْرَة في قلب المعركة. فشدّ ذلك البطل الجسور قوسه العظيم حتى بلغ أذنه، مقوّسًا كقوس قزح إندرا، ثم هجم على ملك مَدْرَة بعزمٍ لا يلين ليصرعه.»

Verse 276

सृजन्‌ बाणमयं वर्ष प्रायाच्छल्यरथं प्रति । विशाल रथसेनाके द्वारा सब ओरसे घिरकर बाणोंकी वर्षा करते हुए उसने शल्यके रथपर आक्रमण किया

قال سَنْجَيَ: «وأطلق وابلًا من السهام، ومع أنه كان مُحاطًا من كل جانب بحشدٍ عظيم من العربات، فقد واصل ضغطه على عربة شَالْيَة، يمطرها بالنصال من كل جهة.»

Verse 436

तस्योद्वेगभयाच्चापि संश्रित: पाण्डवान्‌ पुरा । उस बुद्धिमान्‌ विराटपुत्र श्वेतने अपने पिताके साथ वैर बाँध रखा था, इस कारण पिताके द्वारा प्राप्त होनेवाले उद्वेग एवं भयसे श्वेतने पहले ही पाण्डवोंकी शरण ले ली थी,प्रियं सम्बन्धिनं राजन्‌ शरानवकिरन्‌ बहून्‌ । राजन! भीष्मने समरभूमिमें सव्यसाची अर्जुनको छोड़कर सेनासे घिरे हुए पांचालराज ट्रपदपर धावा किया और अपने प्रिय सम्बन्धीपर बहुत-से बाणोंकी वर्षा की

قال دِهْرِتَرَاشْتْرَا: «بسبب الاضطراب والخوف الناشئين عن تلك العداوة، كان قد لجأ من قبل إلى آل باندافا. أيها الملك، ثم أمطر بهيشما قريبه العزيز بوابلٍ من السهام».

Frequently Asked Questions

The narration juxtaposes disciplined formation-defense and duty-bound persistence with the explicit pursuit of renown (yaśas) even at lethal cost, raising the tension between role-obligation and the moral weight of continuing violence amid evident devastation.

Operationally, the chapter highlights that cohesion and identification systems (signals, names, inferred recognition) sustain collective action when visibility and certainty collapse; ethically, it illustrates how intention and social duty can override self-preservation in kṣātra contexts.

No explicit phalaśruti appears in this chapter; its meta-significance is structural—situating tactical realism and omen-like imagery (kabandhas) to frame the war as both a strategic contest and a civilizational crisis within the epic’s moral architecture.