
Śākadvīpa–Pramāṇa–Varṇana (Measurements and Description of Śākadvīpa)
Upa-parva: Bhūmi–Dvipāntara–Jyotiṣa Saṃvāda (Cosmographic Discourse on Continents, Oceans, and Luminaries)
Dhṛtarāṣṭra requests precise dimensions of Jambūkhāṇḍa, the surrounding ocean, and further islands (Śāka, Kuśa, Śālmala, Krauñca), including celestial phenomena (Rāhu; Soma and Arka). Sañjaya answers by outlining a seven-island schema and gives quantitative measures: Jambū-parvata’s diameter is stated in yojanas, and the salt ocean is described as double in extent, circular, and adorned with diverse regions and mountains. He then introduces Śākadvīpa as double the measure of Jambūdvīpa, encircled by the milk ocean, and characterized by auspicious settlements where famine and mortality are absent. At Dhṛtarāṣṭra’s insistence, Sañjaya expands: he names prominent mountains (including Meru and others), describes how rains originate, and explains the ‘Śyāma’ designation by associating it with Kṛṣṇa’s presence and radiance. The chapter enumerates rivers (including Gaṅgā in multiple courses and several named streams), notes that countless sacred rivers cannot be fully listed, and describes four communities (Magā, Maśakā, Mānasā, Mandagā) with occupational tendencies. The account culminates in a governance motif: no king, no punishment system—mutual protection through adherence to svadharma—followed by a closure stating the limits of what can be said about Śākadvīpa.
Chapter Arc: संजय धृतराष्ट्र से कहता है कि उत्तर दिशा के द्वीपों और लोक-रचनाओं की एक प्राचीन, श्रुतिपरंपरा में सुरक्षित कथा है—जहाँ भूगोल स्वयं धर्म-ज्ञान का मानचित्र बन जाता है। → वर्णन क्रमशः विस्तृत होता जाता है: कुश, क्रौंच, पुष्कर आदि द्वीप; उनके चारों ओर घृत, दधिमण्ड, सुरा, जल, क्षीर आदि समुद्र; और यह नियम कि द्वीप-पर्वत-समुद्र परस्पर उत्तरोत्तर द्विगुण विस्तार वाले हैं—मानव-बुद्धि के लिए असीम विस्तार का दबाव रचता है। → पुष्करद्वीप में मणिरत्न-समृद्ध पुष्कर पर्वत का वर्णन और उसके आगे देव-गन्धर्व-सेवित प्रदेशों, ब्रह्मा के नित्य निवास तथा असंख्य, अतुल परिमाण वाले दिव्य गजराज (जैसे सुप्रतीक) आदि का उल्लेख—यहाँ दृश्य-वैभव और ब्रह्माण्डीय माप का चरम उत्कर्ष आता है। → संजय इस ‘भूमिपर्व’ के श्रवण-फल को भी जोड़ता है: जो राजा इसे मनोयोग से सुनता है, उसकी श्री, आयु, बल, कीर्ति और तेज बढ़ते हैं—ज्ञान को राजधर्म की समृद्धि से बाँधकर अध्याय को फलश्रुति में स्थिर करता है। → कुरुक्षेत्र के युद्ध-वृत्तांत से हटकर यह ब्रह्माण्ड-भूगोल आगे और भी लोकों/देशों की ओर संकेत करता है, मानो अगला वर्णन इस असीम रचना के और गूढ़ स्तर खोल देगा।
Verse 1
# द्वादशोड् ध्याय: कुश, क्रौंच और पुष्कर आदि द्वीपोंका तथा राहु, सूर्य एवं चन्द्रमाके प्रमाणका वर्णन संजय उवाच उत्तरेषु च कौरव्य द्वीपेषु श्रूयते कथा । एवं तत्र महाराज ब्रुवतश्न निबोध मे,संजय बोले--महाराज! कुरुनन्दन! इसके बाददवाले द्वीपोंके विषयमें जो बातें सुनी जाती हैं, वे इस प्रकार हैं; उन्हें आप मुझसे सुनिये
قال سنجيا: «يا سليلَ الكورو، أيها الملك، تُروى روايةٌ موروثة عن الجزر الشمالية. والآن، وأنا أسردها، فأصغِ بإمعان وافهمها عني».
Verse 2
घृततोय: समुद्रो5त्र दधिमण्डोदको5पर: । सुरोद: सागरश्वैव तथान्यो जलसागर:,क्षीरोद समुद्रके बाद घृतोद समुद्र है। फिर दधिमण्डोदक समुद्र है। इनके बाद सुरोद समुद्र है, फिर मीठे पानीका सागर है
قال سنجيا: «هنا بحرٌ من الغِهْرِتا (السمن المُصفّى)، وبحرٌ آخر من الجزء المائي للّبن الرائب. وهناك أيضاً بحرٌ من السُّرَا (شرابٍ مُخمَّر)، وبحرٌ آخر من الماء العذب».
Verse 3
परस्परेण द्विगुणा: सर्वे द्वीपा नराधिप । पर्वताश्न महाराज समुद्रै: परिवारिता:,महाराज! इन समुद्रोंसे घिरे हुए सभी द्वीप और पर्वत उत्तरोत्तर दुगुने विस्तारवाले हैं
قال سنجيا: «يا سيّدَ الناس، أيها الملك العظيم، إن جميع الجزر والجبال، المحاطة بهذه البحار، يتضاعف اتساعها تباعاً؛ فكلّ واحدٍ منها أوسعُ بمرّتين من الذي قبله».
Verse 4
गौरस्तु मध्यमे द्वीपे गिरिर्मान:शिलो महान् । पर्वत: पश्चिमे कृष्णो नारायणसखो नृप,नरेश्वर! इनमेंसे मध्यम द्वीपमें मनः:शिला (मैनसिल)-का एक बहुत बड़ा पर्वत है; जो “गौर” नामसे विख्यात है। उसके पश्चिममें “कृष्ण” पर्वत है, जो नारायणको विशेष प्रिय है
قال سنجيا: «يا ملكَ الناس، من بين تلك الجزر، في الجزيرة الوسطى جبلٌ عظيم يُدعى مانَهْشِلا (Manaḥśilā)، مشهورٌ باسم “غاورا”. وإلى غربه جبلُ “كريشنا” (Kṛṣṇa)، وهو محبوبٌ على نحوٍ خاص لدى نارايَنا (Nārāyaṇa).»
Verse 5
तत्र रत्नानि दिव्यानि स्वयं रक्षति केशव: । प्रसन्नश्चाभवत् तत्र प्रजानां व्यद्धत् सुखम्,स्वयं भगवान् केशव ही वहाँ दिव्य रत्नोंको रखते और उनकी रक्षा करते हैं। वे वहाँकी प्रजापर प्रसन्न हुए थे, इसलिये उनको सुख पहुँचानेकी व्यवस्था उन्होंने स्वयं की है
هناك كان كيشافا (كريشنا) بنفسه يحفظ الجواهر الإلهية ويذود عنها. وقد سُرَّ بأهل تلك الديار، فلذلك دبّر بيده هو ما يبلّغهم السعادة والهناء.
Verse 6
कुशस्तम्ब: कुशद्वीपे मध्ये जनपदै: सह । सम्पूज्यते शाल्मलिश्न द्वीपे शाल्मलिके नूप,नरेश्वर! कुशद्वीपमें कुशोंका एक बहुत बड़ा झाड़ है, जिसकी वहाँके जनपदोंमें रहनेवाले लोग पूजा करते हैं। उसी प्रकार शाल्मलिद्वीपमें शाल्मलि (सेंमर) वृक्षकी पूजा की जाती है
قال سنجيا: في وسط كوشادفيبا تقوم كتلة عظيمة من عشب الكوشا تُدعى «كوشاستمبا»، ويعبدها أهل أقاليم تلك البلاد. وكذلك، يا ملك الملوك، في شالمليدفيبا تُعبد شجرة «شالملي» (شجرة القطن الحريري/السمّار).
Verse 7
क्रौज्चद्वीपे महाक्रौड्चो गिरी रत्नचयाकर: । सम्पूज्यते महाराज चातुर्वण्येन नित्यदा,क्रौंचद्वीपमें महाक्रौंच नामक एक महान् पर्वत है, जो रत्नराशिकी खान है। महाराज! वहाँ चारों वर्णॉके लोग सदा उसीकी पूजा करते हैं
قال سنجيا: أيها الملك العظيم، في جزيرة-قارة تُدعى كراونتشادفيبا تقوم جبال شامخة اسمها «مهاكراونتشا»، وهي منجم حقيقي لأكوام الجواهر. وهناك يعبدها الناس من الطبقات الأربع على الدوام.
Verse 8
गोमन्त: पर्वतो राजन् सुमहान् सर्वधातुक: । यत्र नित्यं निवसति श्रीमानू कमललोचन:
قال سنجيا: أيها الملك، هناك جبل يُدعى «غومنتا»، عظيم الاتساع، غنيّ بكل صنوف المعادن. وهناك يقيم على الدوام ذلك الممجَّد، ذو العينين كاللوتس، حاضرًا حضورًا لا ينقطع.
Verse 9
मोक्षिश्रि: संस्तुतो नित्यं प्रभुनारायणो हरि: । राजन! वहीं गोमन्त नामक विशाल पर्वत है, जो सम्पूर्ण धातुओंसे सम्पन्न है। वहाँ मोक्षकी इच्छा रखनेवाले उपासकोंके मुखसे अपनी स्तुति सुनते हुए सबके स्वामी श्रीमान् कमलनयन भगवान् नारायण नित्य निवास करते हैं ।। ८ ह ।। कुशद्वीपे तु राजेन्द्र पर्वतो विद्रुमैश्वचित:
قال سنجيا: أيها الملك، حقًّا إن هناك جبلًا فسيحًا يُدعى «غومنتا»، غنيًّا بكل صنوف المعادن. وهناك يقيم أبدًا الرب المبارك نارايانا—هاري، سيّد الجميع، الممجَّد ذو العينين كاللوتس—مصغيًا إلى تسبيحه يخرج من أفواه العابدين الذين يبتغون الموكشا (الخلاص). وفي كوشادفيبا أيضًا، يا خير الملوك، يوجد جبل مزدان ببريق كأنه المرجان.
Verse 10
द्युतिमान् नाम कौरव्य तृतीय: कुमुदो गिरि:,कौरव्य! वहीं परम कान्तिमान् कुमुद नामक तीसरा पर्वत है। चौथा पुष्पवान, पाँचवाँ कुशेशय और छठा हरिगिरि है। ये छः कुशद्वीपके श्रेष्ठ पर्वत हैं
قال سنجيا: «يا كاورافيا، إن الجبل الثالث هناك هو الجبل البهيّ المسمّى كُمودا». وفي هذا السرد الكونيّ للجغرافيا المقدّسة يواصل الراوي رسم معالم كوشادفيبا، جاعلًا القمم المسمّاة علاماتٍ على نظام العالم وبنيانه.
Verse 11
कौरव्य! वहीं परम कान्तिमान् कुमुद नामक तीसरा पर्वत है। चौथा पुष्पवान, पाँचवाँ कुशेशय और छठा हरिगिरि है। ये छः कुशद्वीपके श्रेष्ठ पर्वत हैं
قال سنجيا: «يا سليل الكورو، هناك أيضًا الجبل الثالث، شديد الإشراق، واسمه كُمودا. والرابع بُشْبَفان، والخامس كُشِيشَيا، والسادس هَرِيگِيري. وهذه الستة هي أرفع جبال كوشادفيبا.»
Verse 12
तेषामन्तरविष्कम्भो द्विगुण: सर्वभागश: । औद्िदं प्रथम वर्ष द्वितीयं वेणुमण्डलम्,इन पर्वतोंके बीचका विस्तार सब ओरसे उत्तरोत्तर दूना होता गया है। कुशद्वीपके पहले वर्षका नाम उद्धिद् है। दूसरेका नाम वेणुमण्डल है राजन्! जिसमें हमलोग निवास करते हैं और जहाँ हमारे पूर्वजोंने पुण्यकर्मोंका अनुष्ठान किया है, यह वही भारतवर्ष है। आपने इसका पूरा-पूरा वर्णन सुन लिया है ।। इति श्रीमहा भारते भीष्मपर्वणि भूमिपर्वणि उत्तरद्वीपादिसंस्थानवर्णने द्वादशोडध्याय:
قال سنجيا: «وبين تلك (الأقاليم) يصير الامتداد الفاصل، في كل ناحية، يتضاعف على التدرّج. فأول قِسم (varṣa) من كوشادفيبا يُدعى أوديدا، والثاني يُدعى فينومندلا. وهكذا يُبيَّن ترتيب القارات وأقسامها ضمن جغرافيا كونية تُؤطِّر حياة البشر وواجبهم (الدهرما).»
Verse 13
चतुर्थ: पुष्पवान् नाम पञ्चमस्तु कुशेशय: । षष्ठो हरिगिरिराम षडेते पर्वतोत्तमा:,तृतीयं सुरथाकारं चतुर्थ कम्बलं स्मृतम् । धृतिमत् पज्चमं वर्ष षष्ठ॑ वर्ष प्रभाकरम् तीसरेका नाम सुरथाकार, चौथेका कम्बल, पाँचवेंका धृतिमान् और छठे वर्षका नाम प्रभाकर है
قال سنجيا: «ومنها: الرابع يُدعى بُشْبَفان، والخامس كُشِيشَيا، والسادس هَرِيگِيري-راما—وهؤلاء الستة مشهورون بأنهم جبالٌ فاضلة. وكذلك تُذكَر الناحية الثالثة باسم سُرَثاكارا، والرابعة باسم كَمبَلا، والخامسة باسم دْهْرِتيمَت، والسادسة باسم بْرَبهاكَرَ.»
Verse 14
सप्तमं कापिल वर्ष सप्तैते वर्षलम्भका: । एतेषु देवगन्धर्वा: प्रजाश्न॒ जगतीश्वर,सातवाँ वर्ष कापिल कहलाता है। ये सात वर्षसमुदाय हैं। पृथ्वीपते! इन सबमें देवता, गन्धर्व तथा मनुष्य सानन्द विहार करते हैं। उनमेंसे किसीकी मृत्यु नहीं होती है। नरेश्वर! वहाँ लुटेरे अथवा म्लेच्छ-जातिके लोग नहीं हैं
قال سنجيا: «والناحية السابعة تُدعى كابِلا؛ وهذه هي الأقسام السبعة العظمى للأرض. يا ربّ العالم، فيها يقيم الآلهة والگندهرفا والبشر في سرور، يتنعّمون بمساكنهم. لا موت هناك؛ ويا أيها الملك، لا لصوص ولا قبائل مْلِتشّا (mleccha) المتوحّشة في ذلك الموضع.»
Verse 15
विहरन्ते रमन्ते च न तेषु म्रियते जन: । न तेषु दस्यव: सन्ति म्लेच्छजात्योडपि वा नूप,सातवाँ वर्ष कापिल कहलाता है। ये सात वर्षसमुदाय हैं। पृथ्वीपते! इन सबमें देवता, गन्धर्व तथा मनुष्य सानन्द विहार करते हैं। उनमेंसे किसीकी मृत्यु नहीं होती है। नरेश्वर! वहाँ लुटेरे अथवा म्लेच्छ-जातिके लोग नहीं हैं
قال سانجيا: «هناك تجول الكائنات وتتنعم؛ ولا يموت بينهم أحد. أيها الملك، في تلك الأقاليم لا لصوص، ولا حتى قوم من سلالةٍ أجنبية (مليتشّا).»
Verse 16
गौरप्रायो जन: सर्व: सुकुमारश्न पार्थिव । अवशिष्ठेषु सर्वेषु वक्ष्यामि मनुजेश्वर,मनुजेश्वर! इन वर्षोके सभी लोग प्राय: गोरे और सुकुमार होते हैं। अब मैं शेष सम्पूर्ण द्वीपोंके विषयमें बताता हूँ
قال سانجيا: «أيها الملك، إن أهل تلك الأقاليم في الغالب بيضُ البشرة، رقيقو البنية. والآن، يا سيد البشر، سأصف لك كذلك سائر الجزر الباقية.»
Verse 17
यथाश्रुतं महाराज तदव्यग्रमना: शृणु । क्रौज्चद्वीपे महाराज क्रौज्चो नाम महागिरि:,महाराज! मैंने जैसा सुन रखा है, वैसा ही सुनाऊँगा। आप शान्तचित्त होकर सुनिये। क्रौंचद्वीपमें क्रौंच नामक विशाल पर्वत है
قال سانجيا: «أيها الملك العظيم، أصغِ بقلبٍ غير مشتّت، فإني أروي الأمر كما سمعته. في كراونتشا-دفيبا (Krauñca-dvīpa)، أيها الملك، جبلٌ عظيم يُدعى كراونتشا (Krauñca).»
Verse 18
क्रौज्चात् परो वामनको वामनादनन््धकारक: । अन्धकारात् परो राजन् मैनाक: पर्वतोत्तम:,राजन! क्रौंचके बाद वामन पर्वत है, वामनके बाद अन्धकार और अन्धकारके बाद मैनाक नामक श्रेष्ठ पर्वत है। प्रभो! मैनाकके बाद उत्तम गोविन्द गिरि है। गोविन्दके बाद निबिड नामक पर्वत है
قال سانجيا: «أيها الملك، بعد كراونتشا يأتي جبل فامانا (Vāmana)، وبعد فامانا جبل أندهاكاراكا (Andhakāraka)، وبعد أندهاكاراكا، أيها الملك، جبل مايناكا (Maināka)، وهو أرفع الجبال.»
Verse 19
मैनाकात् परतो राजन् गोविन्दो गिरिरुत्तम: । गोविन्दात् परतो राजन् निबिडो नाम पर्वतः,राजन! क्रौंचके बाद वामन पर्वत है, वामनके बाद अन्धकार और अन्धकारके बाद मैनाक नामक श्रेष्ठ पर्वत है। प्रभो! मैनाकके बाद उत्तम गोविन्द गिरि है। गोविन्दके बाद निबिड नामक पर्वत है
قال سانجيا: «أيها الملك، بعد مايناكا (Maināka) يأتي جوفيندا (Govinda)، وهو جبلٌ جليل؛ وبعد جوفيندا، أيها الملك، جبلٌ يُدعى نيبيدا (Nibida).»
Verse 20
परस्तु द्विगुणस्तेषां विष्कम्भो वंशवर्धन । देशांस्तत्र प्रवक्ष्यामि तन्मे निगदत: शृणु,कुरुवंशकी वृद्धि करनेवाले महाराज! इन पर्वतोंके बीचका विस्तार उत्तरोत्तर दूना होता गया है। उनमें जो देश बसे हुए हैं, उनका परिचय देता हूँ; सुनिये
قال سانجيا: «يا مُنمّي سلالة الكورو، لقد صار الاتساع بين تلك السلاسل الجبلية يتضاعف تباعًا. والآن سأصف الأقاليم القائمة هناك؛ فاستمع إليّ وأنا أسردها».
Verse 21
क्रौज्चस्य कुशलो देशो वामनस्य मनोनुग: । मनोनुगात् परश्नोष्णो देश: कुरुकुलोद्वह,क्रौंचपर्वतके निकट कुशल नामक देश है। वामन-पर्वतके पास मनोनुग देश है। कुरुकुलश्रेष्ठ! मनोनुगके बाद उष्ण देश आता है
قال سانجيا: «قرب جبل كراونتش (Krauñca) تقع أرض تُدعى كوشالا (Kuśala). وبجوار جبل فامانا (Vāmana) أرض اسمها مانونوغا (Manonuga). يا أكرمَ الكورو، وبعد مانونوغا تأتي أرض تُسمّى أُشْنَة (Uṣṇa).»
Verse 22
उष्णात् पर: प्रावरक: प्रावारादन्धकारक: । अन्धकारकदेशात् तु मुनिदेश: पर: स्मृत:,उष्णके बाद प्रावरक, प्रावरकके बाद अन्धकारक और अन्धकारकके बाद उत्तम मुनिदेश बताया गया है
قال سانجيا: «وبعد أُشْنَة (Uṣṇa) تقع برَاوَرَكَة (Prāvaraka)؛ وبعد برَاوَرَة (Prāvara) تقع أَنْدَهَكَارَكَة (Andhakāraka)؛ وبعد أَنْدَهَكَارَكَة يُذكر أنّ هناك أرضًا فاضلة تُدعى مُنِيديشَة (Munideśa).»
Verse 23
मुनिदेशात् परश्रैव प्रोच्यते दुन्दुभिस्वन: । सिद्धचारणसंकीर्णो गौरप्रायो जनाधिप
قال سانجيا: «يا سيدَ الناس، من أرض الحكماء—ومن مواضع أخرى أيضًا—يُسمَع دويٌّ كقرع طبل حرب عظيم: رنينٌ عميقٌ مبشِّر، وسط حشدٍ من السِّدْهَة (Siddha) والشارَنة (Cāraṇa)، وتغلب هناك إشراقةٌ بيضاءُ ساطعة.»
Verse 24
पुष्करे पुष्करो नाम पर्वतो मणिरत्नवान्,पुष्करद्वीपमें पुष्कर नामक पर्वत है, जो मणियों तथा रत्नोंसे भरा हुआ है
قال سانجيا: «في جزيرة بُشْكَرَ (Puṣkara-dvīpa) جبلٌ يُدعى بُشْكَرَ (Puṣkara)، زاخرٌ بالجواهر والدرر النفيسة.»
Verse 25
तत्र नित्यं प्रभवति स्वयं देव: प्रजापति: । त॑ पर्युपासते नित्यं देवा: सर्वे महर्षय:
قال سانجيا: «هناك يتجلّى براجاباتي—الربّ الإلهي—على الدوام بقوّته هو. وهناك أيضًا تلازمه الآلهة كلّها والريشيّون العظام، يداومون على خدمته بخشوعٍ وإجلال.»
Verse 26
जम्बूद्वीपात् प्रवर्तन्ते रत्नानि विविधान्युत
قال سانجيا: «ومن جمبودفيبا تنبثق وتُستخرج جواهر ثمينة شتّى الأنواع.»
Verse 27
द्वीपेषु तेषु सर्वेषु प्रजानां कुरुसत्तम । ब्रह्मचर्येण सत्येन प्रजानां हि दमेन च
قال سانجيا: «يا خيرَ الكورو، في تلك الجزر كلّها كان الناس يُقوَّمون ويُسَدَّدون بآداب البراهمتشريا، وبالصدق، وبكبح النفس؛ وهي فضائل بها يستقيم المجتمع ويُصان.»
Verse 28
आरोग्यायु:प्रमाणाभ्यां द्विगुणं द्विगुणं तत: । जम्बूद्वीपसे अनेक प्रकारके रत्न अन्यान्य सब द्वीपोंमें वहाँकी प्रजाओंके उपयोगके लिये भेजे जाते हैं। कुरुश्रेष्ठ! ब्रह्मचर्य, सत्य और इन्ट्रियसंयमके प्रभावसे उन सब द्वीपोंकी प्रजाओंके आरोग्य और आयुका प्रमाण जम्बूद्वीपकी अपेक्षा उत्तरोत्तर दूना माना गया है ।। एको जनपदो राजन ड्ीपेष्वेतेषु भारत । उक्ता जनपदा येषु धर्मश्लैक: प्रदृश्यते,भरतवंशी नरेश! वास्तवमें इन देशोंमें एक ही जनपद है। जिन द्वीपोंमें अनेक जनपद बताये गये हैं, उनमें भी एक प्रकारका ही धर्म देखा जाता है
قال سانجيا: «في تلك الجزر يُقال إن مقدار العافية ومدى العمر يتضاعفان، ثم يتضاعفان مرةً أخرى، قياسًا إلى جمبودفيبا. وتُرسَل أنواع كثيرة من الجواهر من جمبودفيبا إلى سائر الجزر لينتفع بها أهلها. يا خيرَ الكورو، وبقوة البراهمتشريا والصدق وكبح الحواس يُعَدّ سكان تلك الجزر أرفعَ منزلةً، على مراتب متزايدة، في الصحة وطول العمر من سكان جمبودفيبا. أيها الملك، يا بهاراتا، إن بين هذه الجزر—في الحقيقة—مملكةً واحدة؛ وحتى حيث تُذكر أقاليم كثيرة، يُرى دارما واحدٌ متّحدٌ هو السائد.»
Verse 29
ईश्वरो दण्डमुद्यम्य स्वयमेव प्रजापति: । दीपानेतान् महाराज रक्ष॑स्तिषछ्ठति नित्यदा,महाराज! सबके ईश्वर प्रजापति ब्रह्मा स्वयं ही दण्ड लेकर इन द्वीपोंकी रक्षा करते हुए इनमें नित्य निवास करते हैं
قال سانجيا: «أيها الملك العظيم، إن الربّ—براجاباتي نفسه—يرفع عصا السلطان، ويقيم هنا على الدوام، حارسًا لهذه الجزر.»
Verse 30
स राजा स शिवो राजन् स पिता प्रपितामह: । गोपायति नरश्रेष्ठ प्रजाःसजडपण्डिता:,नरश्रेष्ठ! प्रजापति ही वहाँके राजा हैं। वे कल्याणस्वरूप होकर सबका कल्याण करते हैं। राजन! वे ही पिता और प्रपितामह हैं। जडसे लेकर चेतनतक समस्त प्रजाकी वे ही रक्षा करते हैं
قال سنجيا: «أيها الملك، إنه حقًّا الملك؛ وهو عينُ اليُمن والبركة. يعمل لخير الجميع. أيها السلطان، هو لشعبه كالأب، بل كالجَدِّ الأعلى. يا خيرَ الرجال، إنه يحمي الرعية كلَّها—من بليد الفهم إلى الحكيم.»
Verse 31
भोजन चात्र कौरव्य प्रजा: स्वयमुपस्थितम् | सिद्धमेव महाबाहो तद्धि भुञ्जन्ति नित्यदा,महाबाहु कुरुनन्दन! यहाँकी प्रजाओंके पास सदा पका-पकाया भोजन स्वयं उपस्थित हो जाता है और उसीको खाकर वे लोग रहते हैं
قال سنجيا: «يا كاورفيا، في هذه الأرض يجد الناس طعامهم مُعَدًّا مطبوخًا، يظهر من تلقاء نفسه. يا عظيمَ الساعد، إنهم يعيشون يومًا بعد يوم بأكل ذلك القوت الجاهز.»
Verse 32
ततः परं समा नाम दृश्यते लोकसंस्थिति: । चतुरस््र॑ महाराज त्रयस्त्रिंशत् तु मण्डलम्,उसके बाद समानामवाली लोगोंकी बस्ती देखी जाती है। महाराज! वह चौकोर बसी हुई है। उसमें तैंतीस मण्डल हैं
قال سنجيا: «ثم بعد ذلك، أيها الملك، تبدو مستوطنة لقوم يُدعون سَمَا. وهي موضوعة على هيئة مربّع، وفي داخلها ثلاثةٌ وثلاثون إقليماً (مَنْدَلا).»
Verse 33
तत्र तिष्ठन्ति कौरव्य चत्वारो लोकसम्मता: । दिग्गजा भरतश्रेष्ठ वामनैरावतादय:
«هناك، يا سليلَ الكورو، تقف أربعةُ فيلةٍ ذائعةُ الصيت في العوالم كلها—فيلةُ الجهات الحارسة، يا خيرَ آلِ بهارتا—فامَنا، وإيرافَتا، وسواهما.»
Verse 34
कुरुनन्दन! भरतश्रेष्ठ)! वहाँ लोकविख्यात वामन, ऐरावत, सुप्रतीक और अंजन--ये चार दिग्गज रहते हैं ।। सुप्रतीकस्तथा राजन् प्रभिन्नकरटामुख: । तस्याहं परिमाणं तु न संख्यातुमिहोत्सहे
قال سنجيا: «يا بهجةَ الكورو، يا خيرَ آلِ بهارتا! في تلك الجهة تقيم أربعةُ فيلةٍ حارسةٍ مشهورة في العالم—فامَنا، وإيرافَتا، وسوبرَتيكا، وأَنْجَنا. وأما سوبرَتيكا، أيها الملك، فله وجهٌ تسيلُ صدغاه في هيجان الرُّت؛ ولا أجرؤ هنا على إحصاء عِظَمِ مقداره.»
Verse 35
तत्र वै वायवो वान्ति दिग्भ्य: सर्वाभ्य एव हि
قال سنجيا: «هناك حقًّا كانت الرياح تهبّ من كلّ الجهات دون استثناء».
Verse 36
असम्बद्धा महाराज तान् निगृह्नन्ति ते गजा: । पुष्करै: पद्मसंकाशैविंकसद्धिमहाप्र भै:
قال سنجيا: «أيها الملك، إن تلك الفيلة تقبض عليهم وتسحقهم بلا كابح، وتضربهم بخراطيم كأنها زهور لوتس—منبسطة تمامًا، متلألئة، متوهّجة بعظيم البهاء—وسط ضجيج المعركة.»
Verse 37
शतधा पुनरेवाशु ते तान् मुज्चन्ति नित्यश: । श्वसद्धिर्मुच्यमानास्तु दिग्गजैरिह मारुता:
قال سنجيا: «مرّة بعد مرّة، سريعًا وعلى الدوام، تُطلَق الرياح هنا مئةَ ضعف؛ وحين تُعتَق تندفع بفحيحٍ شديد، كأنما تسوقها فيلةُ الجهات العظام.»
Verse 38
आगच्छन्ति महाराज ततस्तिष्ठन्ति वै प्रजा: । वहाँ सब दिशाओंसे खुली हुई हवा आती है। उसे वे चारों दिग्गज ग्रहण करके रोक रखते हैं। फिर वे विकसित कमलसदृश परम कान्तिमान् शुण्डदण्डके अग्रभागसे उस हवाको सैकड़ों भागोंमें करके तुरंत ही सब ओर छोड़ते हैं, यह उनका नित्यका काम है। महाराज! साँस लेते हुए उन दिग्गजोंके मुखसे मुक्त होकर जो वायु यहाँ आती है, उसीसे सारी प्रजा जीवन धारण करती है ।। धृतराष्ट उवाच परो वै विस्तरो>त्यर्थ त्वया संजय कीर्तित:
قال دِهْرِتَرَاشْتْرَة: «يا سنجيا، لقد أسهبتَ في وصف هذا الأمر إسهابًا شديدًا؛ إن الرعية تتقدّم ثم تقف في مواضعها.»
Verse 39
दर्शितं द्वीपसंस्थानमुत्तरं ब्रूहि संजय । धृतराष्ट्र बोले--संजय! तुमने द्वीपोंकी स्थितिके विषयमें तो बड़े विस्तारके साथ वर्णन किया है। अब जो अन्तिम विषय--सूर्य, चन्द्रमा तथा राहुका प्रमाण बताना शेष रह गया है, उसका वर्णन करो ।। ३८ ह || संजय उवाच उक्ता द्वीपा महाराज ग्रहं वै शुणु तत्त्वतः,संजय बोले--महाराज! मैंने द्वीपोंका वर्णन तो कर दिया। अब ग्रहोंका यथार्थ वर्णन सुनिये। कौरव-श्रेष्ठत राहुकी जितनी बड़ी लंबाई-चौड़ाई सुननेमें आती है, वह आपको बताता हूँ। महाराज! सुना है कि राहु ग्रह मण्डलाकार है
قال سنجيا: «أيها الملك العظيم، لقد وصفتُ القارات (dvīpa). والآن فاسمع، على وفق الحقيقة، خبر الأجرام السماوية (graha).»
Verse 40
स्वर्भानो: कौरवश्रेष्ठ यावदेव प्रमाणत: । परिमण्डलो महाराज स्वर्भानु: श्रूयते ग्रह:,संजय बोले--महाराज! मैंने द्वीपोंका वर्णन तो कर दिया। अब ग्रहोंका यथार्थ वर्णन सुनिये। कौरव-श्रेष्ठत राहुकी जितनी बड़ी लंबाई-चौड़ाई सुननेमें आती है, वह आपको बताता हूँ। महाराज! सुना है कि राहु ग्रह मण्डलाकार है
قال سنجيا: «يا خيرَ الكورو، سأُخبرك—بقدر ما عُرف من مقاديره—بسعة سْفَربهانو (راهُو). أيها الملك العظيم، يُروى أن سْفَربهانو كوكبٌ ذو هيئةٍ مستديرة.»
Verse 41
योजनानां सहस्राणि विष्कम्भो द्वादशास्य वै । परिणाहेन षट्त्रिंशद् विपुलत्वेन चानघ,निष्पाप नरेश! राहु ग्रहका व्यासगत विस्तार बारह हजार योजन है और उसकी परिधिका विस्तार छत्तीस हजार योजन है
قال سنجيا: «أيها الملك الطاهر الذي لا عيب فيه ولا إثم! إن قطرَ راهُو حقًّا اثنا عشر ألفَ يوجنة، وبالمحيط يبلغ ستةً وثلاثين ألفَ يوجنة.»
Verse 42
षष्टिमाहु: शतान्यस्य बुधा: पौराणिकास्तथा । चन्द्रमास्तु सहस्राणि राजन्नेकादश स्मृत:,पौराणिक विद्वान् उसकी विपुलता (मोटाई) छः: हजार योजनकी बताते हैं। राजन! चन्द्रमाका व्यास ग्यारह हजार योजन है
قال سنجيا: «أيها الملك، إن علماء البورانا يقررون أن سُمكه ستونُ مئةٍ (أي ستةُ آلاف) يوجنة. وأما القمر، أيها الملك، فيُذكر أن قطره أحدَ عشرَ ألفَ يوجنة.»
Verse 43
विष्कम्भेण कुरुश्रेष्ठ त्रयस्त्रिंशत् तु मण्डलम् । एकोनषष्टिविष्कम्भं शीतरश्मेर्महात्मन:,कुरुश्रेष्ठ उनकी परिधि या मण्डलका विस्तार तैंतीस हजार योजन बताया गया है और महामना शीतरश्मि चन्द्रमाका वैपुल्यगत विस्तार (मोटाई) उनसठ सौ योजन है
قال سنجيا: «يا خيرَ الكورو، إن محيطَ ذلك القرص (أو امتداده الدائري) يُوصَف بأنه ثلاثةٌ وثلاثون ألفَ يوجنة. وأما شيتارَشمي—القمر ذو النفس العظيمة—فسُمكه تسعٌ وخمسون مئةً من اليوجنات.»
Verse 44
सूर्यस्त्वष्टोी सहस्राणि द्वे चान्ये कुरुनन्दन । विष्कम्भेण ततो राजन् मण्डलं त्रिंशता समम्,कुरुनन्दन! सूर्यका व्यासगत विस्तार दस हजार योजन है और उनकी परिधि या मण्डलका विस्तार तीस हजार योजन है तथा उनकी विपुलता अद्बावन सौ योजनकी है। अनघ! इस प्रकार शीघ्रगामी परम उदार भगवान् सूर्यके त्रिविध विस्तारका वर्णन सुना जाता है
قال سنجيا: «يا بهجةَ الكورو، إن قطرَ الشمس عشرةُ آلافِ يوجنة؛ وأيها الملك، إن قرصها الدائري يبلغ محيطُه ثلاثين ألفَ يوجنة.»
Verse 45
अष्टपञ्चाशतं राजन् विपुलत्वेन चानघ । श्रूयते परमोदार: पतगो5सौ विभावसु:,कुरुनन्दन! सूर्यका व्यासगत विस्तार दस हजार योजन है और उनकी परिधि या मण्डलका विस्तार तीस हजार योजन है तथा उनकी विपुलता अद्बावन सौ योजनकी है। अनघ! इस प्रकार शीघ्रगामी परम उदार भगवान् सूर्यके त्रिविध विस्तारका वर्णन सुना जाता है
قال سنجيا: «أيها الملك، أيها الطاهر من الإثم! إن الشمس—فيبهافاسو (Vibhāvasu)، ذلك النور “ذو الجناحين” السريع المسير، بالغ السخاء—يُروى أن لها سَعَةً عظيمة مقدارها ثمانيةٌ وخمسون (مئة) في العرض».
Verse 46
एतत् प्रमाणमर्कस्य निर्दिष्टमिह भारत | स राहुश्छादयत्येती यथाकालं महत्तया
قال سنجيا: «يا بهاراتا، هذا هو مقدار الشمس كما قُرِّر هنا. إن راهو، بعظيم قدرته، يأتي في الوقت المعيَّن فيغشاها ويسترها.»
Verse 47
चन्द्रादित्यौ महाराज संक्षेपो5यमुदाह्नत: । इत्येतत् ते महाराज पृच्छत: शास्त्रचक्षुषा
قال سنجيا: «أيها الملك العظيم، لقد ذكرتُ بإيجاز شأن القمر والشمس. وهذا ما أعلنته لك، أيها الملك الجليل، جوابًا عن سؤالك—سؤالٍ صدر بعين الشاسترا، عين المعرفة المقدسة المُميِّزة.»
Verse 48
सर्वमुक्तं यथातत्त्वं तस्माच्छममवाप्रुहि । भारत! यहाँ सूर्यका प्रमाण बताया गया, इन दोनोंसे अधिक विस्तार रखनेके कारण राहु यथासमय इन सूर्य और चन्द्रमाको आच्छादित कर लेता है। महाराज! आपके प्रश्नके अनुसार शास्त्रदृष्टिसे ग्रहोंके विषयमें संक्षेपसे बताया गया। ये सारी बातें मैंने आपके सामने यथार्थरूपसे उपस्थित की हैं। अतः आप शान्ति धारण कीजिये || ४६-४७ ह ।। यथोद्दिष्टं मया प्रोक्ते सनिर्माणमिदं जगत्
قال سنجيا: «لقد ذكرتُ كلَّ شيءٍ على حقيقته كما هو؛ فاستعدْ سكينتك، يا بهاراتا. وكما أشرتُ، فقد وصفتُ هذا الكون مع نظامه وتكوينه.»
Verse 49
तस्मादाश्व॒स कौरव्य पुत्र दुर्योधन प्रति । इस जगत्का स्वरूप कैसा है और इसका निर्माण किस प्रकार हुआ है, ये सब बातें मैंने शास्त्रोक्त रीतिसे बतायी हैं; अतः कुरुनन्दन! आप अपने पुत्र दुर्योधनकी ओरसे निश्चिन्त रहिये || ४८ $ ।। श्रुत्वेदं भरतश्रेष्ठ भूमिपर्व मनोनुगम्,भरतश्रेष्ठ जो राजा इस भूमिपर्वको मनोयोगपूर्वक सुनता है, वह श्रीसम्पन्न, सफलमनोरथ तथा श्रेष्ठ पुरुषोंद्वारा सम्मानित होता है और उसके बल, आयु, कीर्ति तथा तेजकी वृद्धि होती है
قال سنجيا: «لذلك، يا كاورافا، اطمئنّ بشأن ابنك دُريودهانا. لقد بيّنتُ، على النهج الذي تُعلِّمه الشاسترا، ما طبيعة هذا العالم وكيف وقع خلقه. فلهذا، يا بهجة آل كورو، دع عنك القلق من أجل دُريودهانا. يا خيرَ البهاراتيين، إن من يصغي بإمعان إلى هذا ‘بهومي-بارفَن’ (الخطاب في الأرض/العالم)—وخاصةً إن كان ملكًا—يُرزَق رخاءً؛ وتثمر مقاصده؛ ويُكرَّم من الرجال النبلاء؛ وتزداد قوته وعمره وسمعته وبهاؤه.»
Verse 50
श्रीमान् भवति राजन्य: सिद्धार्थ: साधुसम्मत: । आयुर्बलं च कीर्तिश्व तस्य तेजश्न वर्धते,भरतश्रेष्ठ जो राजा इस भूमिपर्वको मनोयोगपूर्वक सुनता है, वह श्रीसम्पन्न, सफलमनोरथ तथा श्रेष्ठ पुरुषोंद्वारा सम्मानित होता है और उसके बल, आयु, कीर्ति तथा तेजकी वृद्धि होती है
أيها الملك، من يصغي إلى «قسم الأرض» (Bhūmi-parva) هذا بإخلاصٍ وتركيزٍ صار ذا سؤددٍ ونعمة، مُحقَّقَ المراد، مُكرَّمًا عند الصالحين؛ وتزداد له طولُ العمر والقوةُ والذكرُ الحسنُ وبريقُ التجلّي والهيبة.
Verse 51
य: शृणोति महीपाल पर्वणीदं यतव्रत: । प्रीयन्ते पितरस्तस्य तथैव च पितामहा:,भूपाल! जो मनुष्य दृढ़तापूर्वक संयम एवं व्रतका पालन करते हुए प्रत्येक पर्वके दिन इस प्रसंगको सुनता है, उसके पितर और पितामह पूर्ण तृप्त होते हैं
قال سنجيا: أيها الملك، من يلتزم ضبط النفس ويثبت على نذرٍ منضبط، ثم يستمع إلى هذا الخبر في كل يوم عيدٍ مقدّس، فإن أسلافه وآباءه الأقدمين يرضون عنه رضًا تامًّا ويُسرّون سرورًا كاملًا.
Verse 52
इदं तु भारतं वर्ष यत्र वर्तामहे वयम् । पूर्व: प्रवर्तितं पुण्यं तत् सर्व श्रुतववानसि
قال سنجيا: «هذه هي الأرض التي تُدعى بهاراتا (Bhārata) التي نقيم فيها الآن. وقد سمعتَ كاملةً السنّة القديمة المباركة التي أطلقها الأوّلون».
Verse 96
सुधामा नाम दुर्धर्षो द्वितीयो हेमपर्वत:ः । राजेन्द्र! कुशद्वीपमें सुधामा नामसे प्रसिद्ध दूसरा सुवर्णमय पर्वत है, जो मूँगोंसे भरा हुआ और दुर्गम है
قال سنجيا: «يا ملك الملوك، في كوشادڤيپا (Kuśadvīpa) جبلٌ ثانٍ يُعرف بسودهاما (Sudhāmā)؛ يتلألأ ببهاء الذهب، عسيرُ المنال لا يُغلب، مملوءٌ بثرواتٍ كأنها مرجان، وشديدُ الوعورة عسيرُ الاجتياز».
Verse 236
एते देशा महाराज देवगन्धर्वसेविता: । मुनिदेशके बाद जो देश है, उसे दुन्दुभिस्वन कहते हैं। वह सिद्धों और चारणोंसे भरा हुआ है। जनेश्वर! वहाँके लोग प्राय: गोरे होते हैं। महाराज! इन सभी देशोंमें देवता और गन्धर्व निवास करते हैं
قال سنجيا: «أيها الملك العظيم، إن هذه الأقاليم يرتادها وتسكنها الكائنات الإلهية والگندهرفا (Gandharva).» وفي الوصف الأوسع يبرز السردُ بلادًا نائيةً تقترن بحضورٍ مقدّس أو شبه إلهي—مُشيرًا إلى أن العالم وراء ساحة القتال فسيحٌ ذو طبقاتٍ أخلاقيةٍ دقيقة، تسكنه كائناتٌ تُوجّه حياتها إلى رياضاتٍ أسمى وثقافةٍ مُهذّبة، على نقيض الصراع البشري الوشيك.
Verse 256
वाम्भि्मनो5नुकूलाभि: पूजयन्तो जनाधिप । वहाँ स्वयं प्रजापति भगवान् ब्रह्मा नित्य निवास करते हैं। जनेश्वर! सम्पूर्ण देवता और महर्षि मनोनुकूल वचनोंद्वारा प्रतिदिन उनकी पूजा करते हुए सदा उन्हींकी उपासनामें लगे रहते हैं
قال سنجيا: «يا سيّد الرجال، إنهم يعبدونه بكلمات توافق القلب. وهناك يقيم برهمَا، براجابتي المبارك، بنفسه إقامةً أبدية. يا حاكم الشعب، إن جميع الآلهة والريشيّات العظام يعبدونه يومًا بعد يوم بكلامٍ مُرضٍ، ويظلون على الدوام مواظبين على عبادته».
Verse 346
असंख्यात: स नित्यं हि तिर्यगूर्ध्वमधस्तथा । राजन! इनमेंसे सुप्रतीक नामक गजराज, जिसके गण्डस्थलसे मदकी धारा बहती रहती है, उसका परिमाण कैसा और कितना है, यह मैं नहीं बता सकता। वह नीचे-ऊपर तथा अगल-बगलमें सब ओर फैला हुआ है। वह अपरिमित है
قال سنجيا: «أيها الملك، إنه حقًّا فوق العدّ—غير قابل للقياس على الدوام—يمتدّ جانبًا، وإلى أعلى، وإلى أسفل كذلك. ولا يمكن بيان سعته بيانًا دقيقًا».
Dhṛtarāṣṭra seeks verifiable structure—dimensions (viṣkambha), surrounding oceans, and the named islands—then demands a detailed expansion of Śākadvīpa beyond a brief synopsis.
The chapter links prosperity and social stability to disciplined svadharma: communities are portrayed as self-regulating, with ethical conduct substituting for coercive authority, implying that order can be sustained through internalized norms.
Yes. Sañjaya explicitly marks the discourse boundary by stating that only so much can be spoken and heard about Śākadvīpa, functioning as a catalog-closure rather than a ritual phalaśruti.