Mahabharata Adhyaya 103
Bhishma ParvaAdhyaya 10358 Versesपाण्डव-पक्ष के पक्ष में क्षणिक उभार—अभिमन्यु के प्रहार से कुरु-सेना तितर-बितर; पर कौरव-पक्ष घेराबंदी/लक्ष्य-वध की ओर बढ़ता हुआ।

Adhyaya 103

भीष्मवधोपाय-प्रश्नः (Inquiry into the means to overcome Bhīṣma) | Chapter 103

Upa-parva: Bhīṣma-vadha-upāya-mantra (Counsel on the means to neutralize Bhīṣma)

Sañjaya reports that as the sun set, a severe twilight obscured the battlefield and both forces executed an orderly withdrawal. The Pāṇḍavas, distressed by Bhīṣma’s decisive pressure, convene with the Vṛṣṇis and Sṛñjayas to deliberate on welfare and strategy. Yudhiṣṭhira confesses despair, contemplates renunciation, and asks Kṛṣṇa for guidance consistent with svadharma. Kṛṣṇa responds by reaffirming the coalition’s capability, offering to confront Bhīṣma himself if necessary, and re-centering the discussion on duty and achievable means. The group then approaches Bhīṣma unarmed and without armor, honoring him and requesting counsel: how to secure victory, regain the kingdom, and reduce broader loss. Bhīṣma states that as long as he fights with weapons he is effectively unconquerable, but he identifies a limiting rule: he will not engage against certain categories (including one known to have been female earlier) and specifically will not strike when Śikhaṇḍin is placed before Arjuna. He instructs Arjuna to exploit this interval and strike decisively, after which victory becomes feasible. Returning to camp, Arjuna voices personal reluctance to fight his elder; Kṛṣṇa counters with prior commitment, kṣātra-dharma, and the necessity of neutralizing Bhīṣma. The chapter closes with a settled operational decision: position Śikhaṇḍin in the forefront while Arjuna suppresses other threats and targets Bhīṣma.

Chapter Arc: द्रौपदी के पाँचों पुत्र और वीर अभिमन्यु राक्षस अलम्बुष के साथ रणभूमि में टकराते हैं; सौभद्र का बाण-वर्षा बादल की धाराओं-सा बरसता है और कुरु-सेना में हड़कम्प मच जाता है। → अभिमन्यु अनेक अनीकों को ऐसे उड़ा देता है जैसे वायु रूई के ढेर; क्रोध में वह देव-सेना को भगाने वाले वृत्र के समान कुरु-चमू को खदेड़ता है। कौरव-पक्ष उसे रोकने के उपाय खोजता है, पर ‘महौषधि’ जैसा कोई सरल उपचार नहीं दिखता। → अलम्बुष और अभिमन्यु का घोर द्वंद्व—दोनों क्रोधदीप्त, लाल नेत्रों से काल और अग्नि के समान एक-दूसरे को देखते हैं। अलम्बुष बाणों से विद्ध होकर क्षण भर तम में डूबता है, फिर होश पाकर दूने क्रोध से शत्रुओं के बाण, ध्वज, अश्व और धनुष काट डालता है; रण का केंद्र एक ही द्वंद्व बन जाता है। → युद्ध का प्रवाह अभिमन्यु की प्रचंडता के इर्द-गिर्द सिमटता है; कौरव-सेना पीछे हटती और पुनर्गठन करती है, जबकि राक्षस-श्रेष्ठ अलम्बुष अपनी विद्या-बल से टिके रहने का प्रयास करता है। → कौरव-पक्ष में यह निश्चय उभरता है कि ‘तुरंत जाकर’ सुभद्रा-पुत्र का वध किया जाए और भीष्म-द्रोण को आगे कर निर्णायक घेरा बनाया जाए—अगले क्षणों में अभिमन्यु पर सामूहिक प्रहार का संकेत।

Shlokas

Verse 1

ऑपनआक्राता बछ। 2 शततमो< ध्याय: द्रौपदीके पाँचों पुत्रों और अभिमन्युका राक्षस हक इक षके साथ घोर युद्ध एवं अभिमन्युके द्वारा नष्ट होती हुई - सेनाका युद्धभूमिसे पलायन संजय उवाच अभिमन्यू रथोदार: पिशड्रैस्तुरगोत्तमै: । अभिदुद्राव तेजस्वी दुर्योधनबलं महत्‌

قال سنجيا: أيها الملك، إن أبهيمانيو المتلألئ—وهو أبرع الفرسان على المركبات—امتطى مركبةً بهيّة تجرّها خيولٌ ممتازة شقراء مائلة إلى الحمرة، ثم اندفع اندفاعًا مباشرًا نحو جيش دوريودhana العظيم.

Verse 2

विकिरञ्शरवर्षाणि वारिधारा इवाम्बुद: | न शेकुः समरे क्रुद्धं सौभद्रमरिसूदनम्‌

قال سنجيا: «كان ينثر وابلًا من السهام كما تنثر السحابةُ سيولَ المطر. وتقدّم ابنُ سوبهدرا—قاتلُ الأعداء—وهو في غضبٍ عارم داخل المعركة. يا سليلَ كورو، لم يستطع محاربوك أن يصدّوه في القتال.»

Verse 3

(क्रोडरूपं हरिमिव प्रविशन्तं महार्णवम्‌ ।) शस्त्रौधिणं गाहमानं सेनासागरमक्षयम्‌ । निवारयितुमप्याजौ त्वदीया: कुरुनन्दन

قال سنجيا: كما دخل هَري في هيئة الخنزير البريّ (فاراهَا) إلى المحيط العظيم، كذلك اندفع قاتلُ الأعداء—ابنُ سوبهادرا—وقد استبدّ به الغضب في ساحة القتال، فاقتحم بحرَ جيش الكوروَفَة الذي بدا لا ينفد، وهو يتقدّم وسط سيلٍ جارفٍ من السلاح. يا بهجةَ آلِ كورو، لم يستطع جنودُك أن يردّوه في ميدان الحرب.

Verse 4

तेन मुक्ता रणे राजज्शरा: शत्रुनिबर्हणा: । क्षत्रियाननयञ्शूरान्‌ प्रेतताजनिवेशनम्‌,राजन! रणक्षेत्रमें अभिमन्युके छोड़े हुए शत्रुनाशक बाणोंने बहुत-से शूरवीर क्षत्रियोंको यमराजके लोकमें पहुँचा दिया

قال سنجيا: أيها الملك، إن السهامَ الماحقةَ للأعداء التي أُطلقت في المعركة ساقَت كثيرًا من محاربي الكشترية الشجعان إلى دارِ السيد يَما—أي إنهم قُتلوا وأُرسلوا إلى مملكة الموت.

Verse 5

यमदण्डोपमान्‌ घोसग्ज्वलिताशीविषोपमान्‌ | सौभद्र: समरे क्रुद्ध: प्रेषयामाससायकान्‌

قال سنجيا: في خِضَمّ القتال، كان ابنُ سوبهادرا—وقد استحكم غضبُه—يواصل إطلاق سهامٍ مروّعة كعصا عقاب يَما، ومخيفة كالأفاعي السامّة ذات الأفواه المتّقدة.

Verse 6

सरथान्‌ रथिनस्तूर्ण हयांश्नैव ससादिन: । गजारोहांश्व सगजान्‌ दारयामास फाल्गुनि:,अर्जुनकुमारने रथोंसहित रथियों, सवारोंसहित घोड़ों और हाथियोंसहित गजारोहियोंको तुरंत ही विदीर्ण कर डाला

قال سنجيا: ثم إن فالغوني (أرجونا) شقَّ الصفوف سريعًا، فمزّق مقاتلي العربات مع عرباتهم، والخيول مع فرسانها، وراكبي الفيلة مع فيلتهم—فحطّمهم جميعًا.

Verse 7

तस्य तत्‌ कुर्वतः कर्म महत्‌ संख्ये महीभूत: । पूजयांचक्रिरे हृष्टा: प्रशशंसुश्व फाल्गुनिम्‌,युद्धमें ऐसा महान्‌ पराक्रम करते हुए अभिमन्यु और उसके कर्मकी सभी राजाओंने प्रसन्न होकर भूरि-भूरि प्रशंसा की

قال سنجيا: وبينما كان يأتي بذلك الفعل—مُظهِرًا بأسًا عظيمًا في المعركة—ابتهج الملوك في قلوبهم، فأكرموه وأخذوا يثنون مرارًا على فالغوني (أرجونا).

Verse 8

तान्यनीकानि सौभद्रो द्रावयामास भारत । तूलराशीनिवाकाशे मारुत: सर्वतो दिशम्‌

قال سنجيا: يا بهارتا، إن ابن سوبهادرا قد بدّد تلك التشكيلات القتالية، فبعثر الجنود في كل اتجاه—كما تعصف الريح بأكوام القطن فترفعها إلى السماء.

Verse 9

तेन विद्राव्यमाणानि तव सैन्यानि भारत । त्रातारं नाध्यगच्छन्त पड़्के मग्ना इव द्विपा:,भरतनन्दन! अभिमन्युके द्वारा खदेड़ी जाती हुई आपकी सेनाएँ कीचड़में फँसे हुए हाथियोंके समान किसीको अपना रक्षक न पा सकी

قال سنجيا: يا بهارتا، إن جنودك وقد دُفعوا إلى الفرار على يده لم يجدوا لهم حامياً—كالفيلة الغارقة في الوحل، لا تظفر بموطئ قدم ثابت.

Verse 10

विद्राव्य सर्वसैन्यानि तावकानि नरोत्तम | अभिमन्यु: स्थितो राजन विधूमो 5ग्निरिव ज्वलन्‌,नरश्रेष्ठू आपकी सम्पूर्ण सेनाओंको खदेड़कर अभिमन्यु धूमरहित अग्निकी भाँति प्रकाशित हो रहा था

قال سنجيا: يا خير الرجال، يا أيها الملك، بعد أن طرد أباهم جميع قواتك، ثبت أبهيمانيو قائماً، متوهجاً كالنار الصافية التي لا دخان لها.

Verse 11

न चैनं तावका राजन्‌ विषेहुररिघातिनम्‌ | प्रदीप्तं पावक॑ यद्धत्‌ पतड़ा: कालचोदिता:

قال سنجيا: أيها الملك، لم يستطع محاربوك أن يصمدوا له—أبهيمانيو، قاتل الأعداء. وكما أن العثّ، مدفوعاً بالقدر، لا يطيق ناراً متقدة فيهلك بحرّها، كذلك غُلبت جموعك أمام هجومه العنيف.

Verse 12

प्रहरन्‌ सर्वशत्रुभ्य: पाण्डवानां महारथ: । अदृश्यत महेष्वास: सवज्र इव वासव:,सम्पूर्ण शत्रुओंपर प्रहार करता हुआ पाण्डव-महारथी महाधनुर्धर अभिमन्यु वज्रधारी इन्द्रके समान दृष्टिगोचर हो रहा था

قال سنجيا: وهو يضرب جميع الأعداء، بدا أبهيمانيو—المحارب العظيم على العربة من آل باندافا، الرامي الجبار—كأنه فاسافا (إندرا) نفسه حاملاً الفَجْرَة، صاعقته.

Verse 13

हेमपृष्ठं धनुश्चास्य ददृशे विचरद्‌ दिशः । तोयदेषु यथा राजन्‌ राजमाना शतह्ृददा

قال سانجيا: «يا أيها الملك، لقد أبصرتُ قوسَه ذا الظهر المذهَّب المتلألئ، يجول في جميع الجهات. كان يبرق كالصاعقة تلمع في غمام المطر—صورةٌ لبهاء الفروسية تزيد رهبة المشهد وتوتره الأخلاقي في ساحة القتال، حيث تُقابِلُ البراعةُ والسطوعُ الثمنَ المأساويَّ للحرب.»

Verse 14

शराश्ष निशिता: पीता निश्चरन्ति सम संयुगे | वनात्‌ फुल्लद्रुमाद्‌ राजन्‌ भ्रमराणामिव व्रजा:

قال سانجيا: «في خِضَمِّ تلك المعركة المتكافئة، كانت السهام الحادّة اللامعة تتدفّق بلا انقطاع من قوسه. يا أيها الملك، كانت تنهمر كأسراب النحل تخرج من أطراف غابةٍ تفيض بالأشجار المتفتّحة—صورةٌ تُعلي شأن البأس الحربي، وتُذكّر بأن الحرب، وإن بدت ذات إيقاعٍ قاتمٍ منضبط، تُطلق قوى لا تُقاوَم كقوى الطبيعة.»

Verse 15

तथैव चरतस्तस्य सौभद्रस्य महात्मन: । रथेन काज्चनाड्रेन ददृशुर्नान्तरं जना:,महामना सुभद्राकुमार अभिमन्यु सुवर्णमय रथके द्वारा पूर्ववत्‌ रणभूमिमें विचरता रहा; लोगोंने उसकी गतिमें कोई अन्तर नहीं देखा

قال سانجيا: «وكما كان من قبل، ظلّ ابنُ سوبهادرا العظيمُ النفس يجول في ساحة القتال؛ ولم يرَ الناسُ في حركته أدنى فتورٍ ولا أيَّ انقطاع، وهو على مركبته الحربية الموشّاة بالذهب.»

Verse 16

मोहयित्वा कृपं द्रोणं द्रौणिं च सबूहदूबलम्‌ | सैन्धवं च महेष्वासो व्यचरल्लघु सुष्ठ च

قال سانجيا: «بعد أن أوقع كِرِبا، ودرونا، وابنَ درونا (أشڤاتّاما)، وبِرِهادبالا، وكذلك ملكَ السِّندهو جايادراثا في الحيرة، أخذ ذلك الرامي العظيم يجول من كل جانب—سريعًا وبهيّ الطلعة في حركته.»

Verse 17

मण्डलीकृतमेवास्य धनु: पश्याम भारत । सूर्यममण्डलसंकाशं दहतस्तव वाहिनीम्‌

قال سانجيا: «يا بهاراتا، إني أرى قوسَ أبهيمانيو كأنه يتكوّن على الدوام في هيئة دائرة، متلألئًا كقرص الشمس، وهو يحرق جندك.»

Verse 18

त॑ दृष्टवा क्षत्रिया: शूरा: प्रतपन्तं तरस्विनम्‌ । द्विफाल्गुनमिमं लोक॑ मेनिरे तस्य कर्मभि:

قال سانجيا: لما رأى المحاربون الكشاتريا الشجعان ذلك البطل السريع الجبار، متقدًا بحمية القتال ومُوقِعًا الأذى بالعدو، حكموا من خلال أفعاله وظنّوا أن في هذا العالم قد صار الآن أرجونان اثنان.

Verse 19

तेनादिता महाराज भारती सा महाचमू: । व्यभ्रमत्‌ तत्र तत्रैव योषिन्मदवशादिव,महाराज! अभिमन्युसे पीड़ित हुई भरतवंशियोंकी वह विशाल सेना मदोन्मत्त युवतीकी भाँति वहीं चक्कर काट रही थी

قال سانجيا: أيها الملك، لما ضربهم وأوقعهم في الاضطراب، ترنّحت تلك الجموع العظيمة من آل بهاراتا هنا وهناك، تدور في الموضع نفسه—كامرأة ثملة مغلوبة على أمرها بالشهوة—تحت ضغط هجوم أبهيمانيو.

Verse 20

द्रावयित्वा महासैन्यं कम्पयित्वा महारथान्‌ । नन्दयामास सुहृदो मयं जित्वेव वासव:,मयासुरपर विजय पानेवाले इन्द्रकी भाँति अभिमन्युने उस विशाल सेनाको भगाकर, महारथियोंको कँपाकर अपने सुहृदोंको आनन्दित किया

قال سانجيا: بعدما طرد الجموع العظيمة وأرعد قلوب فرسان المركبات العظام، أبهيمانيو أفرح أولياءه—كما يفرح إندرا (فاسافا) بعد قهره للشيطان مايا.

Verse 21

तेन विद्राव्यमाणानि तव सैन्यानि संयुगे । चक्कुरार्तस्वनं घोरं पर्जन्यनिनदोपमम्‌,उसके द्वारा युद्धमें खदेड़े हुए आपके सैनिक मेघोंकी गर्जनाके समान घोर आर्तनाद करने लगे

قال سانجيا: لما طُرِد جنودك على أيديِه في لُجّة القتال، أطلقوا صرخة فزعٍ مروّعة، كدويّ الرعد في سحبٍ حاملةٍ للمطر.

Verse 22

त॑ श्रुत्वा निनदं घोरं तव सैन्यस्थ भारत । मारुतोद्धूतवेगस्य सागरस्येव पर्वणि

قال سانجيا: يا ملكَ بهاراتا، حين سُمِع ذلك الزئيرُ المروّعُ ينبعث من داخل جيشك، بدا كهديرِ المحيط عند مدّ البدر، إذ تدفع الرياحُ مياهه فتُهيّجها بعنف. وفي تلك اللحظة، وقد هزّه صخبُ المعركة، خاطب دوريودانا ألامبوشا—ذلك الراكشاسا ابنَ رِشْيَشْرِنْغا—متحدثًا عن بأسِ ابن أرجونا، ومشبّهًا إياه بأرجونا ثانٍ.

Verse 23

दुर्योधनस्तदा राजजन्नार्ष्पशृद्धिमभाषत । एष कार्ष्णिमहाबाहो द्वितीय इव फाल्गुन:

قال سنجيا: أيها الملك، عندئذٍ خاطب دوريودhana أَلَمْبوشا ابن رِشْيَشْرِنْغا قائلاً: «يا عظيمَ الذراعين، إن هذا الكارْشْني كأنه فالغونا (أرجونا) ثانٍ».

Verse 24

चमूं द्रावयते क्रोधाद्‌ वृत्रो देवचमूमिव । तस्य चान्यन्न पश्यामि संयुगे भेषजं महत्‌

قال سنجيا: «في غضبه يبدّد الجيش كما بدّد فِرِتْرا من قبلُ جموعَ الآلهة. وفي زحمة القتال لا أرى له علاجًا عظيمًا غير ذلك.»

Verse 25

स गत्वा त्वरितं वीरं॑ जहि सौभद्रमाहवे

قال سنجيا: «فامضِ سريعًا إلى هناك، أيها البطل، واضرب سَوْبَهَدْرا (أبهيمانيو) في المعركة.»

Verse 26

स एवमुक्तो बलवान राक्षसेन्द्र: प्रतापवान्‌,आपके पुत्र दुर्योधनके ऐसा कहनेपर उसकी आज्ञासे बलवान्‌ एवं प्रतापी राक्षसराज अलम्बुष तुरंत ही वर्षाकालके मेघकी भाँति जोर-जोरसे गर्जना करता हुआ समरभूमिमें गया

قال سنجيا: وهكذا، لما خوطب بتلك الكلمات، فإن سيدَ الرَّكْشَسَة القويَّ المهيب—أَلَمْبوشا—إذ سمع قول دوريودhana وامتثل لأمره، مضى في الحال إلى ساحة القتال، يزمجر زئيرًا عاليًا كغمامِ المونسون.

Verse 27

प्रययौ समरे तूर्ण तव पुत्रस्य शासनात्‌ । नर्दमानो महानादं प्रावृषीव बलाहक:

قال سنجيا: بأمرِ ابنك أسرع في الحال إلى المعركة. وكان يزأر بزئيرٍ عظيم مدوٍّ كغمامِ المطر في موسم المونسون، فتقدّم أَلَمْبوشا إلى ساحة الوغى.

Verse 28

तस्य शब्देन महता पाण्डवानां बल॑ महत्‌ | प्राचलत्‌ सर्वतो राजन वातोद्धूत इवार्णव:,राजन! उसके महान्‌ गर्जनसे वायुसे विक्षुब्ध हुए समुद्रके समान पाण्डवोंकी विशाल सेनामें सब ओर हलचल मच गयी

قال سانجيا: أيها الملك، بقوة ذلك الزئير الهائل اضطرب جيش الباندافا العظيم من كل جانب—كالمحيط إذا هاجته ريحٌ عاصفة فتموّج واضطرب.

Verse 29

बहवश्न महाराज तस्य नादेन भीषिता: । प्रियान्‌ प्राणान्‌ परित्यज्य निपेतुर्धरणीतले

قال سانجيا: أيها الملك، إن كثيرًا من المحاربين، وقد أفزعهم ذلك الزئير الرعدي، تركوا أرواحهم العزيزة وسقطوا على الأرض.

Verse 30

महाराज! उसके सिंहनादसे भयभीत हो बहुत-से सैनिक अपने प्यारे प्राणोंको त्यागकर पृथ्वीपर गिर पड़े ।।

قال سانجيا: أيها الملك، لما فزع كثير من الجنود من ذلك الزئير الشبيه بزئير الأسد، تركوا أرواحهم العزيزة وسقطوا على الأرض. وأما كارشني، وقد امتلأ فرحًا وحماسة، فأمسك قوسه وقد رُكِّب السهم؛ وكأنه يرقص على مقعد العربة اندفع مباشرة نحو ذلك الراكشسا.

Verse 31

ततः स राक्षस: क्रुद्ध: सम्प्राप्यैवार्जुनिं रणे । नातिदूरे स्थितां तस्य द्रावयामास वै चमूम्‌

قال سانجيا: ثم إن ذلك الراكشسا، وقد اشتعل غضبًا، لما دنا من ابن أرجونا في ساحة القتال، أخذ يطرد جيشه القائم غير بعيد عنه.

Verse 32

तां वध्यमानां च तथा पाण्डवानां महाचमूम्‌ । प्रत्युद्ययौ रणे रक्षो देवसेनां यथा बल:

قال سانجيا: وبينما كان جيش الباندافا العظيم يُنهك على هذا النحو تحت وطأة الضرب، اندفع ذلك الراكشسا في المعركة عليه—كما اندفع بالَا، الدايتيّا، قديمًا على جيش الآلهة.

Verse 33

विमर्द: सुमहानासीत्‌ तस्य सैन्यस्य मारिष । रक्षसा घोररूपेण वध्यमानस्य संयुगे,आर्य! युद्धस्थलमें भयंकर राक्षसके द्वारा मारी जाती हुई उस सेनाका महान्‌ संहार होने लगा

قال سنجيا: «يا أيها الجليل، لقد نشبت في ذلك الجيش ملحمةٌ عظيمة. وإذ كان يُقطَع ويُباد في المعركة على يد راكشسا ذي هيئةٍ مرعبةٍ مخيفة، ابتدأت في ساحة القتال مذبحةٌ هائلة.»

Verse 34

ततः शरसहसैस्तां पाण्डवानां महाचमूम्‌ । व्यद्रावयद्‌ रणे रक्षो दर्शयन्‌ स्वपराक्रमम्‌

قال سنجيا: ثم في خضمّ القتال، أخذ ذلك الراكشسا—مُظهِرًا بأسه—يدفع جيش الباندافا العظيم إلى الفرار بآلاف السهام.

Verse 35

सा वध्यमाना च तथा पाण्डवानामनीकिनी । रक्षसा घोररूपेण प्रदुद्राव रणे भयात्‌,उस घोर राक्षसके द्वारा उस प्रकार मारी जाती हुई वह पाण्डवसेना भयके मारे रणभूमिसे भाग चली

قال سنجيا: وهكذا، إذ كانت جموع الباندافا تُضرَب وتُقتَل على ذلك النحو على يد راكشسا ذي منظرٍ مروّع، ولّت من ساحة القتال فزعًا.

Verse 36

प्रमृद्य च रणे सेनां पद्मिनीं वारणो यथा । ततोऊभिदुद्राव रणे द्रौपदेयान्‌ू महाबलान्‌

قال سنجيا: وبعد أن داس الجيش في المعركة دَوسًا—كما يهيج الفيلُ غديرًا مملوءًا باللوتس فيعكره ويسحقه—اندفع ألامبوشا بعد ذلك على أبناء دروبدي الأقوياء في غمرة القتال.

Verse 37

तेतु क्रुद्धा महेष्वासा द्रौपदेया: प्रहारिण: । राक्षसं दुद्रुवु: संख्ये ग्रहा: पडच रविं यथा

قال سنجيا: عندئذٍ اندفع أبناء دروبدي الخمسة—وهم رماةٌ عظام ماهرون في الضرب—غضابًا نحو ذلك الراكشسا في ساحة القتال، كأن خمسة كواكب تهجم على الشمس.

Verse 38

वीर्यवद्धिस्ततस्तैस्तु पीडितो राक्षसोत्तम: । यथा युगक्षये घोरे चन्द्रमा: पञ्चभिरग्रहै:

قال سنجيا: هكذا، وقد أُرهِق وضُيِّق عليه من أولئك المحاربين ذوي البأس، غُلِبَ سيِّدُ الرَّاكشَسَة وأُثقِل كاهله—كالقمر في هولِ نهايةِ عصرٍ كونيّ، حين تقبض عليه خمسةُ «غْرَهَا» وتُؤذيه.

Verse 39

उस समय उन पराक्रमी द्रौपदीपुत्रोंद्वारा वह श्रेष्ठ राक्षस उसी प्रकार पीड़ित होने लगा, जैसे भयानक प्रलयकाल आनेपर चन्द्रमा पाँच ग्रहोंद्वारा पीड़ित होते हैं ।।

قال سنجيا: عندئذٍ أخذ ذلك الرَّاكشَسَةُ الأوحد يُضايَق ويُقاسِي على أيدي أبناء دروبدي الأقوياء—كالقمر حين يقترب زمنُ الفناء الكونيّ المهيب، فتقهره خمسةُ «غْرَهَا». ثم إنَّ براتيفيندْهيا، وهو عظيمُ القوة، مزّق الرَّاكشَسَةَ سريعًا بسهامٍ حادّةٍ أتته من كل جانب—صلبةٍ كالحديد، غير كليلةِ الرؤوس، لا تُقاوَمُ شدّتُها.

Verse 40

स तैभिन्नतनुत्राण: शुशुभे राक्षसोत्तम: । मरीचिभिरिवार्कस्य संस्यूतो जलदो महान्‌

قال سنجيا: وقد اخترقت تلك السهام درعه وغاصت في جسده، ازداد سيِّدُ الرَّاكشَسَةِ بهاءً—كغيمةٍ عظيمةٍ مشبعةٍ بأشعة الشمس.

Verse 41

विषक्तै: स शरैश्वापि तपनीयपरिच्छदै: । आर्ष्यशृद्िर्बभौ राजन्‌ दीप्तशुड्र इवाचल:,राजन! शरीरमें धँसे हुए उन सुवर्णभूषित बाणों-द्वारा राक्षत अलम्बुष चमकीले शिखरोंवाले पर्वतकी भाँति सुशोभित हुआ

قال سنجيا: أيها الملك، وقد غُرِزت في جسده سهامٌ مُذهَّبة من كل ناحية، تلألأ الرَّاكشَسَةُ أَلَمْبوشا—كجبلٍ تتوهّج قممه، وجسده مُشْرَعِبٌّ بالرماح والسهام.

Verse 42

ततस्ते भ्रातर: पड्च राक्षसेन्द्रं महाहवे । विव्यधुर्निशितैर्बाणैस्तपनीयवि भूषितै:,तदनन्तर उन पाँचों भाइयोंने उस महासमरमें सुवर्णभूषित तीक्ष्ण बाणोंद्वारा राक्षसराज अलम्बुषको क्षत-विक्षत कर दिया

قال سنجيا: ثم إنَّ الإخوة الخمسة، في ذلك القتال العظيم، طعنوا سيِّدَ الرَّاكشَسَةِ بسهامٍ حادّةٍ مُذهَّبة، فأثخنوه جراحًا.

Verse 43

स निर्भिन्न: शरैघेरिर्भुजगै: कोपितैरिव । अलम्बुषो भृशं राजन्‌ नागेन्द्र इव चुक़रुधे

قال سنجيا: «أيها الملك، إن ألامبوشا—وقد خُرِق بتلك السهام المروِّعة وأُثخِن جراحًا، كمن هاجمته حيّاتٌ غاضبة—اشتعل غضبًا، كفيلٍ عظيمٍ أُلهِب بخطّاف المِهْمَاز. ففي لهيب المعركة تُوقد الإصابةُ السخطَ، فتدفعه إلى الانتقام لا إلى التراجع.»

Verse 44

सो&तिविद्धो महाराज मुहूर्तमथ मारिष । प्रविवेश तमो दीर्घ पीडितस्तैर्महारथै:,महाराज! उन महारथियोंके बाणोंसे अत्यन्त आहत और पीड़ित हो अलम्बुष दो घड़ीतक भारी मोह (मूर्च्छा)-में डूबा रहा

قال سنجيا: «أيها الملك، لما أُصيب ألامبوشا مرارًا بسهام أولئك الفرسان العظام على المركبات، وعُذِّب ألمًا شديدًا، غاص برهةً في ظلمةٍ عميقة—وقد غلبه الذهول وفقدان الوعي. ويُظهر المشهد أن الحرب تُسقط حتى المشهورين تحت وطأة الألم والصدمة، وأن حدود الجسد تقطع كبرياء المرء وبأسه.»

Verse 45

प्रतिलभ्य तत: संज्ञां क्रोधेन द्विगुणीकृत: । चिच्छेद सायकांस्तेषां ध्वजांश्वैव धनूंषि च,तदनन्तर होशमें आकर वह दूने क्रोधसे जल उठा। फिर उसने उनके सायकों, ध्वजों और धनुषोंके टुकड़े-टुकड़े कर डाले

قال سنجيا: «فلما استعاد وعيه اشتعل غضبه مضاعفًا؛ ثم قطّع سهامهم وراياتهم وأقواسهم إربًا.»

Verse 46

एकैकं पञ्चभिर्बाणैराजघान स्मयतन्निव | अलनम्बुषो रथोपस्थे नृत्यन्निव महारथ:,इसके बाद रथकी बैठकमें नृत्य-सा करते हुए महारथी अलम्बुषने मुसकराते हुए उनमेंसे एक-एकको पाँच-पाँच बाणोंद्वारा घायल कर दिया

قال سنجيا: «ثم، وهو يبتسم كأن الأمر لهوٌ، أصاب ألامبوشا—ذلك المحارب العظيم على العربة—كلَّ واحدٍ منهم بخمسة سهام. وكان على منصة العربة يتحرك كأنه يرقص، مُظهرًا براعةً واثقةً متباهيةً كثيرًا ما تلازم نشوة القتال وكبرياءه.»

Verse 47

त्वरमाण: सुसंरब्धो हयांस्तेषां महात्मनाम्‌ । जघान राक्षस: क्रुद्ध: सारथींश्व महाबल:

قال سنجيا: «مندفعًا مسرعًا في هيجانٍ عارم، ضرب الراكساس الغاضب—العظيم القوة—خيولَ أولئك النبلاء، وضرب سُوّاقَ عرباتهم كذلك. ويُبرز هذا المشهد كيف أن العنف في جنون المعركة قد يغدو في آنٍ واحدٍ محسوبًا وعشوائيًّا، فيستهدف لا المقاتلين وحدهم، بل أيضًا دعائم الحرب—الدوابّ والسائقين—فيزيد الفوضى والمعاناة.»

Verse 48

बिभेद च सुसंरब्ध: पुनश्नैनान्‌ सुसंशितै: । शरैरबहुविधाकारै: शतशो5थ सहस्रश:,इसके बाद पुनः कुपित हो भाँति-भाँतिके सैकड़ों और हजारों तीखे बाणोंद्वारा उन सबको गहरी चोट पहुँचायी

قال سنجيا: وقد استبدّ به الغضب وعاود الضغط في الهجوم، طعنهم مرةً أخرى بسهامٍ حادّةٍ محكمة الصقل، شتّى الأنواع—مئاتٍ بل آلافًا—فأوقع بهم جراحًا غائرة.

Verse 49

विरथांश्व महेष्वासान्‌ कृत्वा तत्र स राक्षस: । अभिदुद्राव वेगेन हन्तुकामो निशाचर:,उन महाथनुर्धर वीरोंको रथहीन करके युद्धमें उन्हें मार डालनेकी इच्छासे निशाचर अलम्बुषने बड़े वेगसे उनपर धावा किया

قال سنجيا: بعدما جرّد هناك أولئك الرماة العظام من عرباتهم وخيولهم، اندفع ذلك الراكشسا—ألمبوشا، جوّال الليل—بسرعةٍ عظيمة، قاصدًا قتلهم في ساحة القتال.

Verse 50

तानर्दितान्‌ रणे तेन राक्षसेन दुरात्मना | दृष्टवार्जुनसुत: संख्ये राक्षसं समुपाद्रवत्‌

قال سنجيا: لما رأى أولئك الإخوة يُعذَّبون ويُضايَقون في ساحة القتال على يد ذلك الراكشسا الخبيث، اندفع أبهيمانيو ابن أرجونا، في خضمّ المعمعة، مرةً أخرى وهاجم الراكشسا.

Verse 51

तयो: समभवद्‌ युद्ध वृत्रवासवयोरिव । ददृशुस्तावका: सर्वे पाण्डवाश्न महारथा:,फिर उन दोनोंमें वृत्रासुर और इन्द्रके समान भयंकर युद्ध होने लगा। आपके और पाण्डवपक्षके सभी महारथी उस युद्धको देखने लगे

قال سنجيا: واندلع بينهما قتالٌ مروّع كقتال فِرترا مع فاسافا (إندرا). فوقف جميع عظماء المقاتلين على العربات من جانبك، وكذلك الباندافا، يتفرّجون على ذلك النزال.

Verse 52

तौ समेतौ महायुद्धे क्रोधदीप्तौ परस्परम्‌ । महाबलौ महाराज क्रोधसंरक्तलोचनौ

قال سنجيا: أيها الملك العظيم، لقد التقى الاثنان في تلك المعركة الجليلة، وكلٌّ منهما يتّقد غضبًا على الآخر. وكانا عظيمي القوة، وقد احمرّت أعينهما من شدة السخط.

Verse 53

परस्परमवेक्षेतां कालानलसमौ युधि । तयो: समागमो घोरो बभूव कटुकोदय:

قال سنجيا: في خِضَمِّ المعركة كان الاثنان يتبادلان النظر، كالموتِ والنارِ الكالانَلية التي تلتهم كلَّ شيء. وكان لقاؤهما مروِّعًا، ونهض كمنعطفٍ مُرٍّ مشؤوم—ينذر بعواقب قاسية تولد من سَعير الحرب وغضبها.

Verse 54

यथा देवासुरे युद्धे शक्रशम्बरयो: पुरा

قال سنجيا: «كما كان في الأزمنة السالفة، في حرب الآلهة مع الأسورا، ذلك القتال المشهور بين شَكرا وشَمبَرا…»

Verse 99

इस प्रकार श्रीमह्याभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें परस्पर व्यूढ-रचनाके पश्चात्‌ उत्पातदर्शनविषयक निन्‍यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ

قال سنجيا: وهكذا، في «شري مهابهاراتا»، ضمن «بيشما بارفا»—وخاصة في القسم المتعلّق بمقتل بيشما—وبعد أن رتّب الجيشان صفوفهما في تشكيلاتٍ متقابلة، اختُتم الفصل التاسع والتسعون، المتناول لمشاهدة الطوالع والنُّذُر المشؤومة.

Verse 100

महाराज! उस महायुद्धमें क्रोधसे उद्दीप्त हो आँखें लाल-लाल करके एक-दूसरेसे भिड़े हुए वे दोनों महाबली वीर युद्धमें काल और अग्निके समान परस्पर देखने लगे। उनका वह घोर संग्राम अत्यन्त कटु परिणामको प्रकट करनेवाला था। पूर्वकालमें देवासुर-संग्रामके अवसरपर इन्द्र और शम्बरासुरमें जैसा भयंकर युद्ध हुआ था

قال سنجيا: أيها الملك! في تلك المعركة العظمى، انقضَّ البطلان الجباران—وقد احمرّت أعينهما وتلظّت غضبًا—واشتبكا، وتبادلا النظر كأنهما الموتُ والنارُ وقد تجسّدا. وكان قتالهما المروِّع ينذر بعاقبة مُرّة. لقد كان مهولًا كالصدام القديم بين إندرا والأسورا شَمبَرا في حرب الآلهة والشياطين.

Verse 246

ऋते त्वां राक्षसश्रेष्ठ सर्वविद्यासु पारगम्‌ । जैसे वृत्रासुर देवताओंकी सेनाको मार भगाता था

قال سنجيا: «لا أرى أحدًا سواك—يا خيرَ الرّاكشَسَة، يا من بلغتَ الغاية في كلِّ فنٍّ وعلم—يصلح لهذا الأمر. فكما كان فِرتراَسورا قديمًا يطرد جيوشَ الآلهة طردًا، كذلك هذا المحارب، في غضبه، يدفعُ قواتي إلى التراجع. وفي هذا الميدان، إذا استثنينا بطلًا مثلك—الأسمى بين الرّاكشَسَة والمتمرّس في جميع الفنون—فإني لا أتبين أحدًا يمكن أن يكون الدواءَ الأمثل لهذا “الداء” الذي استولى على الجيش».

Verse 256

वयं पार्थ हनिष्यामो भीष्मद्रोणपुरोगमा: । “अतः तुम तुरंत जाकर युद्धके मैदानमें वीर सुभद्राकुमारका वध करो और हमलोग भीष्म तथा द्रोणाचार्यको आगे करके अर्जुनको मार डालेंगे!

قال سَنْجَيا: «يا بارثا (أرجونا)، وبِهِيشْما ودْرُونا في مقدّمة جموعنا، سنقتلك.»

Frequently Asked Questions

Yudhiṣṭhira and Arjuna confront a dharma-saṅkaṭa: how to pursue rightful sovereignty and public welfare while facing an elder-teacher figure (Bhīṣma) whose defeat feels morally burdensome, yet whose continued command makes resolution unattainable.

The chapter frames ethical action as duty executed with discernment: consult wisely, honor constraints, and act without collapsing into either despair-driven withdrawal or uncontrolled aggression—thus aligning strategy with svadharma.

No explicit phalaśruti is stated; the meta-function is structural: it supplies a sanctioned tactical-ethical rationale (Bhīṣma’s own declared constraint) that legitimizes the coming turning point within the epic’s broader causality of karma, vows, and consequence.

Read Mahabharata in the Vedapath app

Scan the QR code to open this directly in the app, with audio, word-by-word meanings, and more.

Continue reading in the Vedapath app

Open in App