
Ādi-parva Adhyāya 98 — Paraśurāma’s kṣatriya suppression; Dīrghatamas, Bali, Sudēṣṇā, and the birth of Aṅga
Upa-parva: Anukramaṇikā–Vaṃśānucarita (Genealogical & Exempla Cycle: Bhīṣma’s recollective narratives)
Bhīṣma recounts that Paraśurāma (Jāmadagnya Rāma), enraged by his father’s killing, slays the Haihaya ruler Arjuna (Kārtavīrya) and cuts off his many arms; he then repeatedly campaigns with powerful weapons, rendering the earth ‘without kṣatriyas’ for a traditional count of twenty-one times. The narrative turns to restoration: kṣatriya women seek progeny through disciplined brāhmaṇas, framed as a socially observed mechanism for reconstituting rulership. Next, the account introduces the sage Utathya and his wife Mamatā; Bṛhaspati approaches her despite her pregnancy, and the unborn child protests, leading to Bṛhaspati’s curse. The child becomes the sage Dīrghatamas, who later begets sons for Utathya’s lineage; those sons, driven by greed and delusion, abandon the blind elder in the Gaṅgā. King Bali rescues Dīrghatamas and requests sons for dynastic continuity. Bali sends his queen Sudēṣṇā, who refuses due to the sage’s age and blindness and instead sends a nurse; from her are born eleven sons (including Kākṣīvat), whom Dīrghatamas claims as his own due to their maternal status. After appeasement, Sudēṣṇā is sent again; Dīrghatamas foretells a truthful, radiant son, and Aṅga is born. Bhīṣma closes by generalizing that many capable rulers arose through such arrangements, presenting the episode as precedent and counsel for pragmatic continuity under dharma.
Chapter Arc: कुरुवंश के वृद्ध, तपस्वी-राजा प्रतीप के एकांत अध्ययन-ध्यान में सरिता-देवी गंगा का मनुष्य-रूप में प्रकट होना—और उसका निर्भीक, अलौकिक आसन ग्रहण। → गंगा का दिव्य सौंदर्य और संकेतों से भरा व्यवहार (राजा की दाहिनी जंघा पर बैठना) राजधर्म और लोकलज्जा—दोनों को चुनौती देता है। प्रतीप उसके रहस्य को पहचानते हुए भी संयम रखते हैं और उसे पुत्रवधू बनने का प्रस्ताव देते हैं; गंगा शर्तों सहित स्वीकृति का संकेत देती है, जिससे भविष्य के विवाह-धर्म की शर्तबद्धता स्थापित होती है। → प्रतीप का निर्णायक वचन—‘स्नुषा मे भव… पुत्रार्थ त्वां वृणोम्यहम्’—और गंगा का यह संकेत कि वह कुरुवंश के लिए ‘परायण’ (श्रेष्ठ आश्रय/भाग्य) बनेगी, परंतु एक शर्त के साथ; यहीं से शान्तनु-गंगा प्रसंग का बीज दृढ़ होता है। → प्रतीप गंगा को अपने लिए नहीं, वंश-धर्म के लिए स्वीकारते हैं; पुत्र-प्राप्ति हेतु तप और प्रतीक्षा करते हैं। आगे चलकर शान्तनु का जन्म, राज्याभिषेक और गंगा से पुनर्मिलन की भूमिका तैयार हो जाती है। → शान्तनु एक दिन उस परम तेजस्विनी स्त्री को देखते हैं और मधुर वाणी से पूछते हैं—‘देवी वा दानवी वा त्वं…?’—अब यह रहस्योद्घाटन और शर्तबद्ध विवाह किस दिशा में जाएगा?
Verse 1
अफड-्-क+ >> सप्तनवतितमो< ध्याय: राजा प्रतीपका गंगाको पुत्रवधूके रूपमें स्वीकार करना और शान्तनुका जन्म
قال فَيْشَمْبايَنَة: بعد ذلك حكم الملكُ برَتيبا الأرضَ، وكان على الدوام مُنصرفاً إلى خير جميع الكائنات. وذات مرة قصدَ غَنْغادْوارا، بوابةَ نهر غَنْغا، فجلس في موضعٍ واحد على هيئةٍ واحدة، يلازمُ الجَپا (japa) سنينَ طويلة.
Verse 2
तस्य रूपगुणोपेता गड्जा स्त्रीरूपधारिणी | उत्तीर्य सलिलात् तस्माललोभनीयतमाकृति:
حينئذٍ اتخذتْ غَنْغا، إلهةُ النهر الموصوفةُ بالجمال والخصال الرفيعة، هيئةَ فتاةٍ شابّة. فخرجت من الماء، متجلّيةً في صورةٍ فاتنةٍ إلى الغاية، واقتربت من الملك-الريشي برَتيبا.
Verse 3
अधीयानस्य राजर्षेर्दिव्यरूपा मनस्विनी । दक्षिणं शालसंकाशमूरु भेजे शुभानना
قال فَيْشَمْبايَنَة: وبينما كان الملك-الريشي برَتيبا منكبّاً على الدرس المقدّس، اتخذتْ غَنْغا، الثابتةَ العزم ذاتَ الجمال الإلهي، هيئةَ فتاةٍ حسناء. خرجت من الماء بوجهٍ ميمون، وجلست على فخذ الملك الأيمن العريض كأنه شجرةُ شالا. وكان منظرها آسراً كحوريةٍ سماوية، ووجهها بالغَ الحُسن.
Verse 4
प्रतीपस्तु महीपालस्तामुवाच यशस्विनीम् | करोमि कि ते कल्याणि प्रियं यत् तेडभिकाड्क्षितम्
قال فَيَشَمْبَايَنَة: إنّ الملكَ برَتِيبَة، سيّدَ الأرض، خاطبَ تلك المرأةَ الجليلةَ الجالسةَ على فخذه قائلاً: «يا ذاتَ اليُمنِ والبِشر، أيُّ أمنيةٍ عزيزةٍ لكِ أُنجِزُها؟ وما الذي تشتهين؟»
Verse 5
रूयुवाच त्वामहं कामये राजन् भजमानां भजस्व माम् | त्याग: कामवतीनां हि स्त्रीणां सद्धिर्विगर्हित:
قالت رُويُو: «أيها الملك، إنني أرغب فيك أنت. قد تعلّق قلبي بك، فاقبلني. فإنّ رفضَ النساءِ اللواتي أتينَ تحت سلطانِ الهوى يُعَدُّ مذموماً عند أهلِ الفضيلة.»
Verse 6
प्रतीप उवाच नाहं परस्त्रियं कामाद् गच्छेयं वरवर्णिनि । न चासवर्णा कल्याणि धर्म्यमेतद्धि मे व्रतम्
قال برَتِيبَة: «يا حسناءُ، لا أستطيع بدافعِ الشهوةِ أن أذهبَ إلى امرأةِ غيري. ولا، يا مباركة، أرتبطُ بمن ليست من طبقتي. فهذا نذري الموافقُ للدَّرْمَا.»
Verse 7
रूयुवाच नाश्रेयस्यस्मि नागम्या न वक्तव्या च कहिचित् । भजन्तीं भज मां राजन् दिव्यां कन्यां वरस्त्रियम्
قالت المرأة: «أيها الملك، لستُ مشؤومةً، ولا غيرَ صالحةٍ للوصال، ولستُ ممن يُقال فيه قولٌ مُعيبٌ بحقّ. فاقبلني، أيها الملك، فقد جئتُك بمودّة—عذراءَ سماويةً، وامرأةً فاضلة. فاستقبلني.»
Verse 8
प्रतीप उवाच त्वया निवृत्तमेतत् तु यन्मां चोदयसि प्रियम् । अन्यथा प्रतिपन्न॑ मां नाशयेद् धर्मविप्लव:
قال برَتِيبَة: «يا حسناءُ، إنّ ما تحثّينني عليه بوصفه رغبةً عزيزةً، قد نُقِضَ في الحقيقة من قِبَلِكِ أنتِ. فإن أنا قبلتُه على وجهٍ آخر، مخالفاً للدَّرْمَا، فإنّ انقلابَ الدَّرْمَا ذاك سيجلبُ هلاكي أنا أيضاً.»
Verse 9
प्राप्प दक्षिणमूरुं मे त्वमाश्लिष्टा वराड़ने । अपत्यानां स्नुषाणां च भीरु विद्धोतदासनम्
قال براتِيبا: «يا ذات الأعضاء الحسنة، لقد أقبلتِ فاعتنقتِ فخذي الأيمن. يا خجولة، اعلمي أن هذا المقعد إنما هو للأبناء والبنات وللكنّات (زوجات الأبناء).»
Verse 10
सव्योरु: कामिनीभोग्यस्त्वया स च विवर्जित: । तस्मादहं नाचरिष्ये त्वयि काम॑ वराड़ने
قال براتِيبا: «إن الفخذ الأيسر هو موضع عناق المرأة، غير أنك أعرضتِ عنه. لذلك، يا ذات الأعضاء الحسنة، لن أتعامل معكِ بدافع الشهوة.»
Verse 11
स््नुषा मे भव सुश्रोणि पुत्रार्थ त्वां वृणोम्यहम् । स्नुषापक्षं हि वामोरु त्वमागम्य समाश्रिता
قال براتِيبا: «يا حسناء الخصر، كوني كنّتي؛ فإني أختارك لابني. لأنكِ، يا جميلة الفخذين، قد أقبلتِ إلى هنا واعتصمتِ بالجانب من فخذي المخصص للكنّة.»
Verse 12
रूयुवाच एवमप्यस्तु धर्मज्ञ संयुज्येयं सुतेन ते । त्वद्धक्त्या तु भजिष्यामि प्रख्यातं भारतं कुलम्
قالت المرأة: «فليكن كذلك، يا عارف الدharma. سأقترن بابنك. وبسبب إخلاصي لك، سأدخل في سلالة بهاراتا المشهورة وأقوم على صونها.»
Verse 13
पृथिव्यां पार्थिवा ये च तेषां यूयं परायणम् । गुणा न हि मया शकया वक्तुं वर्षशतैरपि,पृथ्वीपर जितने राजा हैं, उन सबके आपलोग उत्तम आश्रय हैं। सौ वर्षोमें भी आपलोगोंके गुणोंका वर्णन मैं नहीं कर सकती
قال براتِيبا: «من بين جميع الملوك القاطنين على الأرض، أنتم ملاذهم الأعلى ومرجعهم الأخير. حقًّا، ولو مضت مئة سنة ما استطعتُ أن أصف فضائلكم وصفًا تامًّا.»
Verse 14
कुलस्य ये व: प्रथितास्तत्साधुत्वमथोत्तमम् | समयेनेह धर्मज्ञ आचरेयं च यद् विभो
قال براتِيبا: «إن الملوك من سلالتك الذين ذاع صيتهم—إن فضيلتهم لَتُعَدُّ الأسمى حقًّا. يا عارف الدارما، سأدخل في زواجٍ من ابنِك بشرطٍ واحد، أيها السيد: كلُّ سلوكٍ أتبنّاه هنا يجب أن يقبله ابنُك؛ فلا يسأل عنه ولا يُحاكمه أبدًا. فإذا عشتُ على هذا العهد، عمّقتُ مودّتي له. ومن خلال أبناءٍ أبرارٍ محبوبين يولدون مني، ينال ابنُك بلوغَ العالم السماوي.»
Verse 15
तत् सर्वमेव पुत्रस्ते न मीमांसेत कर्हिचित् | एवं वसन्ती पुत्रे ते वर्धयिष्याम्यहं रतिम्
«فليكن ابنُك إذن لا يسأل ولا يُفتّش في شيءٍ من ذلك أبدًا. فإن أقامت معه على هذا الوجه، فأنا بنفسي سأرعى وأزيد رباطَ المحبة بينهما.»
Verse 16
वैशम्पायन उवाच तथेत्युक्ता तु सा राजंस्तत्रैवान्तरधीयत,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! राजा प्रतीपने “तथास्तु” कहकर उसकी शर्त स्वीकार कर ली। तत्पश्चात् वह वहीं अन्तर्धान हो गयी
قال فايشَمبايانا: «أيها الملك، لما أُجيبت بـ“ليكن كذلك” توارت في الحال، هناك في الموضع نفسه. وتُبرز هذه الحادثة الثقلَ الأخلاقي لكلمة الحاكم: فإذا قُبِل الشرط صار الوفاءُ بذلك القبول واجبًا مُلزِمًا، ولو انحجب الطرف الآخر عن الأنظار.»
Verse 17
पुत्रजन्म प्रतीक्षन् वै स राजा तदधारयत् | एतस्मिन्नेव काले तु प्रतीप: क्षत्रियर्षभ:
قال فايشَمبايانا: «إن ذلك الملك، وهو ينتظر مولدَ ابنٍ، ثبت على عزمه واحتمل الأمر برباطة جأش. وفي ذلك الزمان نفسه كان براتِيبا، ثورَ الكشاتريا، مثالًا للقوة الملكية مقرونةً بالصبر والواجب.»
Verse 18
(प्रतीपस्य तु भारयायां गर्भ: श्रीमानवर्धत । श्रिया परमया युक्त: शरच्छुक्ले यथा शशी ।।
قال فايشَمبايانا: «في زوجةِ براتِيبا الملكة نما جنينٌ مشرق، موفورٌ بأسمى البهاء—كالقمر يزداد امتلاءً في النصف المضيء من خريفٍ صافٍ. ثم لما حلّ الشهر العاشر، ولدت الملكةُ الكبرى لبراتِيبا غلامًا يتلألأ كالشمس، يحمل سماتِ حملٍ ذي منشأٍ إلهي. وهكذا، لذلك الزوجين الملكيين وقد بلغا الكِبَر، وُلد الملكُ مهابهِشا من جديدٍ في صورةِ ابن—بشارةٌ مباركة بأن العظمة والمسؤولية قد تعودان إلى العالم عبر نسبٍ مشروعٍ وفق الدارما وبمشيئةٍ سماوية.»
Verse 19
शान्तस्य जज्ञे संतानस्तस्मादासीत् स शान्तनु: । शान्त पिताकी संतान होनेसे वे शान्तनु कहलाये। (तस्य जातस्य कृत्यानि प्रतीपो5कारयत् प्रभु: । जातकर्मादि विप्रेण वेदोक्तै: कर्मभिस्तदा ।।
قال فايشَمبايانا: وُلِد لِشَانتا ابنٌ، فلذلك عُرِف باسم «شانتانو». ويعكس هذا الاسم مثالًا أخلاقيًّا: فهويّة الحاكم تقوم على الفضيلة والسكينة (śānti) المتجسّدتين في سلالته، وتُؤطَّر حياته بطقوس الفيدا وبسلوكٍ منضبط يهيّئه لحماية العالم وممارسة الدارما.
Verse 20
पुण्यकर्मकृदेवासीच्छान्तनु: कुरुसत्तम: । प्रतीप: शान्तनु पुत्रं यौवनस्थं ततो5न्वशात्
قال فايشَمبايانا: كان شانتانو، خيرَ الكورو، صانعًا للأعمال المبرورة حقًّا، مواظبًا على السلوك القويم، مستحضرًا دومًا الثواب الذي لا يفنى مما تُكسبه الأفعال الحسنة. ثم إن الملك برتيبا وجّه ابنه شانتانو، وقد بلغ سنّ الشباب، وسدّده إلى طريق واجب المُلك والفضيلة المنضبطة.
Verse 21
पुरा स्त्री मां समभ्यागाच्छान्तनो भूतये तव । त्वामाव्रजेद् यदि रह: सा पुत्र वरवर्णिनी
قال فايشَمبايانا: «قديماً، يا شانتانو، أتتني امرأةٌ مرةً—وكان مجيئها لخيرك. يا بُنيّ، إنْ أقبلت إليك تلك السيدة الحسناء في خلوةٍ يوماً ما، ممتلئةً رغبةً وتبتغي أن تنال منك ولداً، فلا تسأل تلك المرأة الإلهية المتلألئة: “يا سيدتي، من أنتِ؟ ابنةُ مَن أنتِ؟” وما شابه ذلك».
Verse 22
कामयानाभिरूपाद्या दिव्या स्त्री पुत्रकाम्यया । सा त्वया नानुयोक्तव्या कासि कस्यासि चाड़ने
قال فايشَمبايانا: «يا شانتانو، في الأزمنة السالفة جاءتني امرأةٌ سماويةٌ متألّقة، جميلةٌ فاتنة، مدفوعةً برغبة الحصول على ولد. فإن أتتك تلك السيدة الإلهية البهيّة يوماً في خلوة، وقد امتلأت شغفاً نحوك وتريد أن تحمل، فلا تسألها: “من أنتِ؟ ابنةُ مَن أنتِ؟” وما شابه ذلك».
Verse 23
यच्च कुर्यान्न तत् कर्म सा प्रष्टव्या त्वयानघ । मन्नियोगाद् भजन्तीं तां भजेथा इत्युवाच तम्
قال فايشَمبايانا: «يا من لا عيب فيه، مهما فعلتْ فلا تسألها عن ذلك الفعل. فإن اختارتك، فبأمري اقبلها زوجةً لك.» هكذا خاطب الملك برتيبا ابنه، واضعاً قاعدةً للسلوك تقوم على كبح النفس، والثقة، والطاعة لسلطان الأب.
Verse 24
वैशम्पायन उवाच एवं संदिश्य तनयं प्रतीप: शान्तनुं तदा । स्वे च राज्येडभिषिच्यैनं वन॑ राजा विवेश ह
قال فايشَمبايانا: هكذا لمّا أوصى ابنه شانتانو، قام الملك برتيبا في الحال بتتويجه وتكريسه على مُلكه. ثم انصرف الملك إلى الغابة معتزلاً—وهو فعلُ تخلٍّ موافقٌ للدارما، يثبت نظامَ الخلافة وواجبَ الحاكم أن يسلّم السلطان في أوانه.
Verse 25
स राजा शानन््तनुर्धीमान् देवराजसमप्युति: । बभूव मृगयाशील: शान्तनुर्वनगोचर:,बुद्धिमान् राजा शान्तनु देवराज इन्द्रके समान तेजस्वी थे। वे हिंसक पशुओंको मारनेके उद्देश्यसे वनमें घूमते रहते थे
قال فايشَمبايانا: إنّ الملك شانتانو، الحكيم المتألّق كملك الآلهة، قد أُولِع بالصيد وصار يطوف في الغابات. ويضع هذا البيت بهاءَ الملك وقوّتَه إلى جانب سعيٍ ينطوي على العنف تجاه الحيوان، فيُثير توتّراً أخلاقيّاً بين بأس الملوك وثِقَل إزهاق الروح للهوٍ أو عادة.
Verse 26
स मृगान् महिषांश्वैव विनिघध्नन् राजसत्तम: । गड्जामनुचचारैक: सिद्धचारणसेविताम्
قال فايشَمبايانا: إنّ شانتانو، خيرَ الملوك، كان وهو يطارد الظباء وجواميس البرّ ويصرعها، يتجوّل وحيداً على ضفاف الغانغا—ذلك النهر الموقّر الذي يؤمّه السِدّها والشارَنا. ويجعل المشهد بأسَ الملك ووحدتَه في مواجهة أرضٍ مقدّسة، مُلمِّحاً إلى توتّرٍ أخلاقي بين صيد الملوك وعنفه وبين حرمة المجال النهري الذي يُقال إنّ الكائنات العليا تسير فيه.
Verse 27
स कदाचिन्महाराज ददर्श परमां स्त्रियम् । जाज्वल्यमानां वपुषा साक्षाच्छियमिवापराम्
قال فايشَمبايانا: أيها الملك، في مرةٍ من المرات أبصر امرأةً فائقة الجمال، يتلألأ جسدها كأنه يشتعل نوراً—كأنّ لاكشمي نفسها قد تجسّدت عياناً في هيئةٍ أخرى. ويؤكد البيت أنّ البهاء العجيب يُقرأ علامةً على اليُمن والرضا الإلهي، كما يمهّد لما سيأتي بإظهار أنها ليست امرأةً عادية.
Verse 28
सर्वानिवद्यां सुदतीं दिव्याभरण भूषिताम् । सूक्ष्माम्बरधरामेकां पद्मोदरसमप्रभाम्
قال فايشَمبايانا: كانت كاملةَ الأعضاء لا عيب فيها، حسنةَ الأسنان، متزيّنةً بحُلِيٍّ سماوية. لبست ثوباً رقيقاً لطيفاً، ووقفت وحدها، وكان بهاؤها كالنور الكامن في جوف زهرة اللوتس—صورةً لجمالٍ بلا دنس، صيغت بوقارٍ وتحرّز.
Verse 29
तां दृष्टवा हृष्टरोमा भूद् विस्मितो रूपसम्पदा । पिबन्निव च नेत्राभ्यां नातृष्पत नराधिप:
فلما رآها الملكُ اقشعرّ بدنه طربًا، ودهش لوفرة جمالها؛ ولم يستطع سيدُ الناس أن يرتوي—كأنه يشرب حُسنها بعينيه شربًا.
Verse 30
सा च दृष्टवैव राजानं विचरन्तं महाद्युतिम् स्नेहादागतसौहार्दा नातृप्पत विलासिनी
وأما هي، الفتاة الرشيقة، فما إن رأت الملكَ شانتانو يتنقّل في بهائه العظيم حتى أُسرت به. ومن فرط المودّة نهض في قلبها ودٌّ دافئ؛ وظلّت تحدّق فيه فلا تشبع—لا تكاد تُحوّل بصرها عنه.
Verse 31
तामुवाच ततो राजा सान्त्वयज्शलक्ष्णया गिरा | देवी वा दानवी वा त्वं गन्धर्वी चाथ वाप्सरा:
ثم خاطبها الملكُ بكلامٍ لطيفٍ مُسَكِّنٍ رقيق: «سواءٌ أكنتِ إلهةً أم عفريتة، غندرفيةً أم أبسرا—أيًّا كنتِ…»
Verse 32
यक्षी वा पन्नगी वापि मानुषी वा सुमध्यमे । याचे त्वां सुरगर्भाभे भार्या मे भव शोभने
«يا رشيقةَ الخصر! سواءٌ أكنتِ يَكْشِيّةً، أو ابنةَ حيّةٍ (ناغا)، أو بشرية—يا جميلةً متلألئةً كابنةٍ سماوية—إني أتوسّل إليك: كوني زوجتي.»
Verse 97
इति श्रीमहा भारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि शान्तनूपाख्याने सप्तनवतितमो< ध्याय:
وهكذا ينتهي الفصل السابع والتسعون من قسم السَّمْبَهَفا ضمن الآدي بَرفا من المهابهارتا الجليلة، في خبر الملك شانتانو.
Verse 156
पुत्रै: पुण्यै: प्रियैश्वैव स्वर्ग प्राप्स्पति ते सुतः । आपके कुलमें जो विख्यात राजा हो गये हैं
قال براتِيبا: «بأبناءٍ أتقياءَ محبوبين ينال ابنُك السماء». وفي سياق ذلك الحوار وضعتِ الفتاةُ شرطًا أخلاقيًّا للزواج: أن يقبل الأميرُ سلوكَها دون ريبةٍ أو لوم. فإن هو صان ذلك القيد ووثق بها، وعدتْ أن تُنمّي محبتها له، وأن الأبناءَ الصالحينَ الأحباءَ الذين تلدهم سيكونون سببَ بلوغه العوالمَ السماوية.
Verse 173
तपस्तेपे सुतस्यार्थे सभार्य: कुरुनन्दन । इसके बाद पुत्रके जन्मकी प्रतीक्षा करते हुए राजा प्रतीपने उसकी बात याद रखी। कुरुनन्दन! इन्हीं दिनों क्षत्रियोंमें श्रेष्ठ प्रतीप अपनी पत्नीको साथ लेकर पुत्रके लिये तपस्या करने लगे
قال فايشَمبايانا: «يا بهجةَ آلِ كورو، إن الملكَ براتِيبا، مع ملكته، شرع في رياضاتٍ وزهاداتٍ (تَبَس) طلبًا لولد. وإذ كان يذكر ما قيل له من قبل، ظلّ ينتظر مولد الطفل بترقّبٍ وأمل.»
The chapter juxtaposes retaliatory justice with social repair: Paraśurāma’s vengeance escalates into systemic suppression, while later sections ask how society restores legitimate rulership after disruption—without denying the ethical costs of coercion, desire, and abandonment.
Dharma is shown as historically adaptive: unchecked violence and unrestrained desire generate disorder, while continuity requires disciplined norms, truthful recognition of responsibility, and protective kingship (as exemplified by Bali’s rescue and petition for lawful progeny).
No explicit phalaśruti is stated; the meta-function is genealogical and normative—offering precedent to interpret later lineage claims and to frame restoration mechanisms as culturally recognized within the epic’s ethical-historical logic.
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