
Vāg-yuddha and Nimitta-darśana before the Gadāyuddha (Verbal Duel and Omens)
Upa-parva: Gadāyuddha-prastāva (Prelude to the Mace-Duel)
Vaiśaṃpāyana narrates a tense sequence in which a verbal duel (vāg-yuddha) and omen imagery frame the imminent mace engagement. Dhṛtarāṣṭra, described as grief-stricken, laments the reversal of fortune: his son—once commander of vast forces—goes forward on foot with a mace, a sign of narrowed options and approaching finality. Saṃjaya then reports the challenger’s summons to Pārtha’s side for combat and the appearance of alarming portents: harsh winds, dust-rain, darkness over directions, thunderous sounds, meteors, an untimely eclipse, trembling earth, falling mountain peaks, agitated animals, and disembodied cries. Observing these nimittas, Bhīma addresses Yudhiṣṭhira, declaring long-contained anger and vowing to end Duryodhana, explicitly listing prior grievances—attempted burning at Vāraṇāvata, the dice deception, Draupadī’s public humiliation, exile and concealment—thus converting personal memory into a public moral indictment. Duryodhana replies that rhetoric is sufficient and demands action, and the gathered kings encourage him. The chapter closes with both sides moving toward the formal commencement of the gadā encounter amid heightened battlefield soundscape and readiness.
Chapter Arc: धृतराष्ट्र संजय से पूछते हैं—बलराम के सान्निध्य में, गदायुद्ध उपस्थित होने पर, मेरा पुत्र दुर्योधन भीम के सामने कैसे उतरा? → संजय बताता है कि बलराम को निकट पाकर दुर्योधन का उत्साह और युद्ध-लालसा प्रज्वलित हो उठती है। समन्तपञ्चक तीर्थ में राजाओं और पाण्डव-पक्ष सहित सभासदों का विशाल समुदाय बैठता है; दुर्योधन सबको निकट बैठकर निर्णायक द्वंद्व देखने का निमंत्रण देता है। दोनों योद्धा—बलराम के शिष्य—क्रोध से भरे, हाथों में गदा लिए, गजों और अग्नि के समान उग्र दिखते हैं। → भीम और दुर्योधन एक-दूसरे को प्रलयकाल के दो सूर्य-सम तेजस्वी, काल-मृत्यु के समान परंतप रूप में देखते हैं—और समस्त सभा के सामने गदायुद्ध का क्षण उपस्थित हो जाता है, जहाँ दोनों की क्रुद्ध प्रतिज्ञा और कौशल टकराने को तत्पर है। → सभा-व्यवस्था और दर्शक-समूह की स्वीकृति के साथ युद्ध-स्थल का विधान पूर्ण होता है; द्वंद्व को सार्वजनिक, नियमबद्ध और बलराम की छाया में प्रतिष्ठा मिलती है। → दोनों महाबली आमने-सामने खड़े हैं—पहला प्रहार किसका होगा, और किसकी गदा धर्म-यश का निर्णय करेगी?
Verse 1
/ ऑपनआक्रात बछ। आर: 2 पञ्चपज्चाशत्तमो< ध्याय: बलरामजीकी सलाहसे सबका कुरुक्षेत्रके समन््तपंचक तीर्थमें जाना और वहाँ हे तथा दुर्योधनमें गदायुद्धकी या वैशम्पायन उवाच एवं तदभवद् युद्ध तुमुलं जनमेजय । यत्र दुःखान्वितो राजा धृतराष्ट्रोडब्रवीदिदम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! इस प्रकार वह तुमुल युद्ध हुआ, जिसके विषयमें अत्यन्त दुःखी हुए राजा धृतराष्ट्रने इस तरह प्रश्न किया
毗湿摩波耶那说道:“噢,阇那美阇耶,如此便发生了那场喧腾惨烈的大战;而提哩多罗湿罗陀王悲痛欲绝,便说出了这些话。”此偈将战争呈现为道德的浩劫,而非单纯的观战之事;其最直接的果报便是哀恸,迫使那位盲王追问所发生的一切。
Verse 2
धृतराष्ट्र रवाच राम॑ संनिहितं दृष्टवा गदायुद्ध उपस्थिते । मम पुत्र: कथं भीम॑ प्रत्ययुध्यत संजय,धृतराष्ट्र बोले--संजय! गदायुद्ध उपस्थित होनेपर बलरामजीको निकट आया देख मेरे पुत्रने भीमसेनके साथ किस प्रकार युद्ध किया?
提哩多罗湿罗陀说道:“三阇耶,当钉锤决斗已然开始,而我又见罗摩(婆罗罗摩)近在旁侧时,我的儿子是以何种方式与毗摩对战、相抗而斗的?”
Verse 3
संजय उवाच रामसांनिध्यमासाद्य पुत्रो दुर्योधनस्तव । युद्धकामो महाबाहु: समहृष्यत वीर्यवान्,संजयने कहा--राजन्! बलरामजीको निकट पाकर युद्धकी इच्छा रखनेवाला आपका शक्तिशाली पुत्र महाबाहु दुर्योधन बड़ा प्रसन्न हुआ
三阇耶说道:大王啊,来到婆罗罗摩面前时,你的儿子难敌——臂力雄伟,英勇善战,渴望交锋——心中大为欢喜。此偈强调:一位受敬重的长者与强大战士近在身旁,足以鼓舞斗士的决心,纵然这场战争的道德代价依旧沉重。
Verse 4
दृष्टवा लाडूलिन राजा प्रत्युत्थाय च भारत । प्रीत्या परमया युक्त: समभ्यर्च्य यथाविधि
三阇耶说道:婆罗多啊,见到拉杜林王,他便起身相迎;怀着至高的善意,依照礼法如仪致敬奉礼。此景表明:纵在战争的严酷之中,恭敬迎接与正当行止的规范仍被守持不坠。
Verse 5
ततो युधिष्छिरं रामो वाक्यमेतदुवाच ह
三阇耶说道:随后,罗摩(婆罗罗摩)以如下言辞对坚战(郁陀史提罗)开口——这是在战争的道德重压之中所赐忠告的关键时刻;此处之言,旨在引导与克制,而非仅为求胜。
Verse 6
मधुरं धर्मसंयुक्त शूराणां हितमेव च | तब बलरामने युधिष्ठिरसे मधुर वाणीमें शूरवीरोंके लिये हितकर धर्मयुक्त वचन कहा --][५% || मया श्रुतं कथयतामृषीणां राजसत्तम,“नृपश्रेष्ठ! मैंने माहात्म्य-कथा कहनेवाले ऋषियोंके मुखसे यह सुना है कि कुरुक्षेत्र परम पावन पुण्यमय तीर्थ है। वह स्वर्ग प्रदान करनेवाला है। देवता, ऋषि तथा महात्मा ब्राह्मण सदा उसका सेवन करते हैं
三阇耶说道:他所说之言,语调甘美,契合达摩,且确为诸勇士之利——即便在战争的严酷之中,也意在导正行止。
Verse 7
कुरुक्षेत्रं परं पुण्यं पावन स्वर्ग्यमेव च । दैवतैर्ऋषिभिर्जुषं ब्राह्मणैश्व महात्मभि:,“नृपश्रेष्ठ! मैंने माहात्म्य-कथा कहनेवाले ऋषियोंके मुखसे यह सुना है कि कुरुक्षेत्र परम पावन पुण्यमय तीर्थ है। वह स्वर्ग प्रदान करनेवाला है। देवता, ऋषि तथा महात्मा ब्राह्मण सदा उसका सेवन करते हैं
三阇耶说道:“俱卢之野(库鲁克舍特罗)至为神圣——能净化罪垢,且确能赐予天界。我曾从称述其伟大之仙圣口中听闻:此圣地常为诸天、诸仙(ṛṣi)以及大心的婆罗门所往来、所珍重。”
Verse 8
तत्र वै योत्स्यमाना ये देहं त्यक्ष्यन्ति मानवा: । तेषां स्वर्गे ध्रुवी वास: शक्रेण सह मारिष,“माननीय नरेश! जो मानव वहाँ युद्ध करते हुए अपने शरीरका त्याग करेंगे, उनका निश्चय ही स्वर्गलोकमें इन्द्रके साथ निवास होगा
三阇耶说道:“尊者啊,凡在彼处战斗而舍身之人,必得天界安稳之居所,与释迦罗(因陀罗)同住。”
Verse 9
तस्मात् समन्तपञ्चकमितो याम द्रुतं नूप । प्रथितोत्तरवेदी सा देवलोके प्रजापते:,“अतः नरेश्वर! हम सब लोग यहाँसे शीघ्र ही समन्तपंचक तीर्थमें चलें। वह भूमि देवलोकमें प्रजापतिकी उत्तरवेदीके नामसे प्रसिद्ध है। त्रिलोकीके उस परम पुण्यतम सनातन तीर्थमें युद्ध करके मृत्युको प्राप्त हुआ मनुष्य निश्चय ही स्वर्गलोकमें जायगा”
三阇耶说道:“因此,大王啊,我们当从此处速往三漫多般遮迦(Samantapañcaka)。那片土地在天界以‘北坛’(uttaravedī)之名著称,乃生主(Prajāpati)之北方祭坛。在三界之中至圣而常住的此永恒圣地里,凡战死者必定归于天界。”
Verse 10
तस्मिन् महापुण्यतमे त्रैलोक्यस्य सनातने । संग्रामे निधन प्राप्य ध्रुवं स्वर्गे भविष्यति,“अतः नरेश्वर! हम सब लोग यहाँसे शीघ्र ही समन्तपंचक तीर्थमें चलें। वह भूमि देवलोकमें प्रजापतिकी उत्तरवेदीके नामसे प्रसिद्ध है। त्रिलोकीके उस परम पुण्यतम सनातन तीर्थमें युद्ध करके मृत्युको प्राप्त हुआ मनुष्य निश्चय ही स्वर्गलोकमें जायगा”
三阇耶说道:“在那三界皆闻名、至为殊胜功德且永恒的圣地之中,凡于战阵中得死者,必定升入天界。”
Verse 11
तथेत्युक्त्वा महाराज कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिर: । समन्तपज्चकं वीर: प्रायादभिमुख: प्रभु:,महाराज! तब “बहुत अच्छा”, कहकर वीर राजा कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर समन्तपंचक तीर्थकी ओर चल दिये। उस समय अमर्षमें भरा हुआ तेजस्वी राजा दुर्योधन हाथमें विशाल गदा लेकर पाण्डवोंके साथ पैदल ही चला
三阇耶说道:“大王啊,他说了‘就如此吧’之后,昆蒂之子、英勇的坚战(尤提士提罗)这位至尊君主,便面向萨曼塔潘恰迦出发。”
Verse 12
ततो दुर्योधनो राजा प्रगृह्म महतीं गदाम् | पदभ्याममर्षी द्युतिमानगच्छत् पाण्डवैः सह,महाराज! तब “बहुत अच्छा”, कहकर वीर राजा कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर समन्तपंचक तीर्थकी ओर चल दिये। उस समय अमर्षमें भरा हुआ तेजस्वी राजा दुर्योधन हाथमें विशाल गदा लेकर पाण्डवोंके साथ पैदल ही चला
三阇耶说道:随后,难敌王执起一柄巨大的钉锤,徒步而行。他虽因怨愤而心火炽燃,却仍以武者的决意熠熠生辉;大王啊,他与般度诸子一同前进。
Verse 13
तथा<<यान्तं गदाहस्तं वर्मणा चापि दंशितम् | अन्तरिक्षचरा देवा: साधु साध्वित्यपूजयन्,गदा हाथमें लिये कवच धारण किये दुर्योधनको इस प्रकार आते देख आकाशमें विचरनेवाले देवता साधु-साधु कहकर उसकी प्रशंसा करने लगे
三阇耶说道:见难敌如此前行——手执钉锤,身披甲胄——行于虚空的诸天齐声称赞,呼道:“善哉!善哉!”
Verse 14
वातिकाश्चारणा ये तु दृष्टवा ते हर्षमागता: । स पाण्डवै: परिवृत: कुरुराजस्तवात्मज:
三阇耶说道:见到他,那些天界的吟游诗人与歌者都欢喜起来。你的儿子——俱卢之王——站在那里,被般度诸子环绕。
Verse 15
मत्तस्येव गजेन्द्रस्य गतिमास्थाय सो5व्रजत् । वातिक और चारण भी उसे देखकर हर्षसे खिल उठे। पाण्डवोंसे घिरा हुआ आपका पुत्र कुरुराज दुर्योधन मतवाले गजराजकी-सी गतिका आश्रय लेकर चल रहा था ।। १४३ || ततः शड्खनिनादेन भेरीणां च महास्वनै:
三阇耶说道:大王啊,纵被般度诸子团团围住,你的儿子难敌犹陀那仍以发情狂怒的象王之步伐昂然前进——步步骄悍有力,即在敌阵夹逼之中也显出不屈的挑衅。随即,海螺号角齐鸣,战鼓轰然大作,整个战场回响震荡。
Verse 16
ततस्ते तु कुरुक्षेत्रं प्राप्ता नरवरोत्तमा:,तस्मिन् देशे त्वनिरिणे ते तु युद्धमरोचयन् । तदनन्तर वे सभी श्रेष्ठ नरवीर आपके पुत्रके साथ पश्चिमाभिमुख चलकर पूर्वोक्त कुरक्षेत्रमें आ पहुँचे। वह उत्तम तीर्थ सरस्वतीके दक्षिण तटपर स्थित एवं सदगतिकी प्राप्ति करानेवाला था। वहाँ कहीं ऊसर भूमि नहीं थी। उसी स्थानमें आकर सबने युद्ध करना पसंद किया
三阇耶说道:随后,那些最杰出的人来到俱卢之野。见此地无盐碱荒瘠之患,地势清净,亦宜吉祥行旅,他们便择此处为决战之所——使战争在被视为正当的土地上定夺,而非在污秽不祥之地了结。
Verse 17
प्रतीच्यभिमुखं देशं यथोद्दिष्टं सुतेन ते । दक्षिणेन सरस्वत्या: स्वयनं तीर्थमुत्तमम्
三阇耶说道:“(他们)依你儿子所指,向那面向西方的地域前行——沿萨拉斯瓦蒂河的南岸——直趋斯瓦亚那,那最殊胜的圣渡口。”
Verse 18
ततो भीमो महाकोटिं गदां गृह्माथ वर्मभूत्
三阇耶说道:于是,毗摩抓起一柄巨大的利刃般锋锐的钉头槌;披甲在身,仿佛化作一具活的胸甲,准备迎接战局下一次凶猛的转折。
Verse 19
अवबद्धशिरस्त्राण: संख्ये काज्चनवर्म भूत्
三阇耶说道:在鏖战之中,他将头盔系得牢固,身披金甲——在战争沉重的道义之下,显出有意的备战与严整的坚决。
Verse 20
वर्मभ्यां संयतो वीरी भीमदुर्योधनावुभौ
三阇耶说道:两位英雄——毗摩与难敌——甲胄紧束,克己自持,整肃备战;在这场决定性的决斗中,他们彼此对峙。
Verse 21
रणमण्डलमध्यस्थौ भ्रातरौ तौ नरर्षभौ
三阇耶说道:就在战阵的正中,那两位兄弟——人中雄牛——稳立于厮杀的核心。
Verse 22
तावन्योन्यं निरीक्षेतां क्रुद्धाविव महाद्विपौ
三阇耶说道:二人相向而立,目光紧锁彼此——如同两头发情的巨象,怒意翻涌,随时将要冲撞。
Verse 23
सम्प्रहष्टमना राजन् गदामादाय कौरव:
三阇耶说道:大王啊,那位俱卢族的战士心中欢腾,举起铁杵——好战欲燃,被战争凶猛的势头所驱使。
Verse 24
सृक्किणी संलिहन् राजन् क्रोधरक्तेक्षण: श्वसन | ततो दुर्योधनो राजन् गदामादाय वीर्यवान्
三阇耶说道:“大王啊,他舔着嘴角,喘息粗重,双目因愤怒而赤红;随后,勇力过人的难敌举起了铁杵。”
Verse 25
भीमसेनमभिप्रेक्ष्य गजो गजमिवादह्दयत् | नरेश्वर! तदनन्तर शक्तिशाली कुरुवंशी राजा दुर्योधन प्रसन्नचित्त हो गदा हाथमें ले क्रोधसे लाल आँखें करके गलफरोंको चाटता और लंबी साँसें खींचता हुआ भीमसेनकी ओर देखकर उसी प्रकार ललकारने लगा, जैसे एक हाथी दूसरे हाथीको पुकार रहा हो ।। अद्विसारमयीं भीमस्तथैवादाय वीर्यवान्
三阇耶说道:杜尤陀那一见毗摩塞那,便如象呼象般向他发出挑战。随即,那位出自俱卢族的强盛之王——杜尤陀那,心中怀着冷峻的自信——执起铁杵;怒火使他双目赤红,他舔着嘴唇,长长吸气,朝毗摩咆哮,宛如雄象对宿敌的怒吼。英勇的毗摩也同样举起了自己那沉重可怖的铁杵。
Verse 26
तावुद्यतगदापाणी दुर्योधनवृकोदरौ
三阇耶说道:于是二人——杜尤陀那与弗利阔达罗(毗摩)——各自高举铁杵在手,立于场中,蓄势待战。
Verse 27
तावुभौ समतिक्रुद्धावुभी भीमपराक्रमौ
三阇耶说道:二人同样被怒火点燃,皆为具备毗摩般威力的战士;战意凶决,彼此相当,随着战场的狂烈之势愈发高涨。
Verse 28
उभौ सदृशकर्माणौ यमवासवयोरिव,महाराज! शत्रुओंको संताप देनेवाले वे दोनों महाबली वीर यमराज, इन्द्र, वरुण, श्रीकृष्ण, बलराम, कुबेर, मधु, कैटभ, सुन्द, उपसुन्द, राम, रावण तथा बालि और सुमग्रीवके समान पराक्रम दिखानेवाले थे तथा काल एवं मृत्युके समान जान पड़ते थे
三阇耶说道:大王啊!那两位大力英雄行事相类,如阎摩与婆娑婆(因陀罗)一般。他们令仇敌受煎熬,其武威可比阎摩、因陀罗、伐楼那、黑天(克里希那)、婆罗罗摩、毗沙罗伐那(俱毗罗);又如著名的宿敌之对——摩度与凯多婆、孙陀与优婆孙陀、罗摩与罗波那、婆利与苏格利婆——一般显赫;实在宛如时间与死亡的化身。
Verse 29
तथा सदृशकर्माणौ वरुणस्य महाबलौ । वासुदेवस्य रामस्य तथा वैश्रवणस्य च,महाराज! शत्रुओंको संताप देनेवाले वे दोनों महाबली वीर यमराज, इन्द्र, वरुण, श्रीकृष्ण, बलराम, कुबेर, मधु, कैटभ, सुन्द, उपसुन्द, राम, रावण तथा बालि और सुमग्रीवके समान पराक्रम दिखानेवाले थे तथा काल एवं मृत्युके समान जान पड़ते थे
三阇耶说道:大王啊!那两位大力英雄,其行事可比伐楼那,又可比婆苏提婆(黑天)、罗摩(婆罗罗摩)与毗沙罗伐那(俱毗罗);他们灼烧仇敌。其武威如阎摩、因陀罗、伐楼那、黑天、婆罗罗摩、俱毗罗一般,又如著名的宿敌之对——摩度与凯多婆、孙陀与优婆孙陀、罗摩与罗波那、婆利与苏格利婆——一般显赫;仿佛时间与死亡亲临。
Verse 30
सदृशौ तौ महाराज मधुकैटभयोर्युधि । उभौ सदृशकर्माणौ तथा सुन्दोपसुन्दयो:,महाराज! शत्रुओंको संताप देनेवाले वे दोनों महाबली वीर यमराज, इन्द्र, वरुण, श्रीकृष्ण, बलराम, कुबेर, मधु, कैटभ, सुन्द, उपसुन्द, राम, रावण तथा बालि और सुमग्रीवके समान पराक्रम दिखानेवाले थे तथा काल एवं मृत्युके समान जान पड़ते थे
三阇耶说道:“大王啊,那二人在战阵中彼此相似,如同摩度与凯多婆;在功业行事上也同样相似,如同孙陀与优波孙陀。战火狂怒之际,他们显现为无双的勇士,灼烧仇敌;其威力之盛,令人如见时间(迦罗)与死亡(摩利提优)本身而心生战栗。”
Verse 31
रामरावणयोश्रैव वालिसुग्रीवयोस्तथा । तथैव कालस्य समीौ मृत्योश्रैव परंतपौ,महाराज! शत्रुओंको संताप देनेवाले वे दोनों महाबली वीर यमराज, इन्द्र, वरुण, श्रीकृष्ण, बलराम, कुबेर, मधु, कैटभ, सुन्द, उपसुन्द, राम, रावण तथा बालि और सुमग्रीवके समान पराक्रम दिखानेवाले थे तथा काल एवं मृत्युके समान जान पड़ते थे
三阇耶说道:“大王啊,那两位英雄,折磨仇敌者,似与罗摩与罗波那相等,也如婆利与苏格利婆一般;同样地,他们又宛如时间(迦罗)本身与死亡(摩利提优)——不可抗拒之力的化身。”
Verse 32
अन्योन्यमभिधावन्तौ मत्ताविव महाद्विपौ । वासितासंगमे दृप्ती शरदीव मदोत्कटौ,जैसे शरद-ऋतुमें मैथुनकी इच्छावाली हथिनीसे समागम करनेके लिये दो मतवाले हाथी मदोन्मत्त होकर एक-दूसरेपर धावा करते हों, उसी प्रकार अपने बलका गर्व रखनेवाले वे दोनों वीर एक-दूसरेसे टक्कर लेनेको उद्यत थे। शत्रुओंका दमन करनेवाले वे दोनों योद्धा दो सर्पोके समान प्रज्वलित क्रोधरूपी विषका वमन करते हुए एक-दूसरेको रोषपूर्वक देख रहे थे
三阇耶说道:“如同两头巨象醉于发情之狂,彼此冲撞——骄矜而癫狂,恰似秋时为求与顺从的雌象交合而奔突——那两位英雄也因自恃其力而昂然推进,欲相撞击。二人皆为制敌者,怒目相向,仿佛两条毒蛇喷吐炽烈的嗔毒。”
Verse 33
उभौ क्रोधविषं दीप्तं वमन््तावुरगाविव । अन्योन्यमभिसंरब्धौ प्रेक्षमाणावरिंदमौ,जैसे शरद-ऋतुमें मैथुनकी इच्छावाली हथिनीसे समागम करनेके लिये दो मतवाले हाथी मदोन्मत्त होकर एक-दूसरेपर धावा करते हों, उसी प्रकार अपने बलका गर्व रखनेवाले वे दोनों वीर एक-दूसरेसे टक्कर लेनेको उद्यत थे। शत्रुओंका दमन करनेवाले वे दोनों योद्धा दो सर्पोके समान प्रज्वलित क्रोधरूपी विषका वमन करते हुए एक-दूसरेको रोषपूर्वक देख रहे थे
三阇耶说道:“两位战士如同双蛇喷吐炽焰之毒,皆被怒火点燃。彼此激愤相缠,那两位制敌者怒目对视,蓄势待发,随时将要相撞。”
Verse 34
उभौ भरतशार्दूलौ विक्रमेण समन्वितौ । सिंहाविव दुराधर्षों गदायुद्धविशारदौ,भरतवंशके वे विक्रमशाली सिंह दो जंगली सिंहोंके समान दुर्जय थे और दोनों ही गदायुद्धके विशेषज्ञ माने जाते थे
三阇耶说道:“二人皆为婆罗多族的‘虎子’,具足勇武,如双狮般难以撼动;并且二人都被公认为钉锤(伽陀)格斗的宗师。”
Verse 35
नखदंष्टायुधौ वीरौ व्याप्राविव दुरुत्सहौ । प्रजासंहरणे क्षुब्धौ समुद्राविव दुस्तरी
三阇耶说道:“那两位英雄仿佛以爪牙为兵刃,犹如猛虎——凶烈难当。为毁灭众生而激荡,他们又如两片翻腾的海洋,汹涌不可渡。”
Verse 36
लोहिताज्विव क्रुद्धौ प्रतपन््तोी महारथौ । पंजों और दाढ़ोंसे प्रहार करनेवाले दो व्याप्रोंक समान उन दोनों वीरोंका वेग शत्रुओंके लिये दुः:सह था। प्रलयकालनमें विक्षुब्ध हुए दो समुद्रोंके समान उन्हें पार करना कठिन था। वे दोनों महारथी क्रोधमें भरे हुए दो मंगल ग्रहोंक समान एक-दूसरेको ताप दे रहे थे || ३५६ || पूर्वपश्चिमजौ मेघौ प्रेक्षमाणावरिंदमौ
三阇耶说道:那两位大车战士怒火炽盛,灼然如两团赤焰。又如双虎以爪牙扑击,其冲势令敌军难以承受。恰似劫末之时两海翻涌,难以渡越。怒意盈胸的两位摩诃罗陀彼此灼逼,如两颗似火星的凶曜相对,各以烈焰灼热对方。
Verse 37
गर्जमानौ सुविषमं क्षरन्तौ प्रावृषीव हि । जैसे वर्षा-ऋतुमें पूर्व और पश्चिम दिशाओंमें स्थित दो वृष्टिकारक मेघ भयंकर गर्जना कर रहे हों, उसी प्रकार शत्रुओंका दमन करनेवाले वे दोनों वीर एक-दूसरेको देखते हुए भयानक सिंहनाद कर रहे थे ।। रश्मियुक्तौ महात्मानौ दीप्तिमन्ती महाबलौ
三阇耶说道:他们以可怖的威势咆哮,倾泻其力如同季风暴雨。那两位大心之士,光辉炽盛、神力无双——恰似分立东、西两方的行雨云——彼此凝视,发出骇人的狮子吼,誓要摧伏群敌。
Verse 38
व्यात्राविव सुसंरब्धौ गर्जन्ताविव तोयदौ
三阇耶说道:二人怒意如狂,犹如双虎;又如行雨之云,轰然咆哮——战场之怒膨胀成风暴的写照,愤恨与傲气驱使武士走向血腥的正面冲突。
Verse 39
गजाविव सुसंरब्धौ ज्वलिताविव पावकौ
三阇耶说道:二人怒势如狂,犹如发情狂奔的雄象;怒焰炽燃,又如两团烈火——这正是战争中失控的愤怒如何把力量化作吞噬一切的毁灭。
Verse 40
रोषात् प्रस्फुरमाणोष्ठी निरीक्षन्तौ परस्परम्
三阇耶说道:二人因愤怒而唇角颤动,彼此凝视不移——这是内心怒火的外在征象;在战争的道德氛围中,它预示着接下来的言语或行动将更多由激情驱使,而非由克制节制所引导。
Verse 41
उभौ परमसंदहृष्टावुभी परमसम्मतौ
三阇耶说道:二人都欢喜至极,而彼此亦受最高敬重——在战争严酷的道德氛围中,这是一幅相互振奋、相互认可的图景。
Verse 42
सदश्चवाविव हेषन्तौ बृहन्ताविव कुञ्जरौ । वृषभाविव गर्जन्तौ दुर्योधनवृकोदरौ
三阇耶说道:“杜尔约陀那与弗利科达罗(毗摩)嘶鸣如烈马,巍然如巨象,咆哮如雄牛。”在这战场图景中,诗人加重了道德张力:两位勇士被骄傲、愤怒与往昔誓言的重负所驱使,以近乎兽性的力量相对而立——暗示战争如何能将人的审思与依达摩的自制,压缩为粗猛而压倒一切的冲动。
Verse 43
आसन च ददौ तस्मै पर्यपृच्छदनामयम् । भरतनन्दन! हलधरको देखते ही राजा युधिष्ठिर उठकर खड़े हो गये और बड़े प्रेमसे विधिपूर्वक उनकी पूजा करके उन्हें बैठनेके लिये उन्होंने आसन दिया तथा उनके स्वास्थ्यका समाचार पूछा,दैत्याविव बलोन्मत्तौ रेजतुस्तौ नरोत्तमौ । दोनों अत्यन्त हर्ष और उत्साहमें भरे थे। दोनों ही बड़े सम्मानित वीर थे। मनुष्योंमें श्रेष्ठ वे दुर्योधन और भीमसेन हींसते हुए दो अच्छे घोड़ों, चिग्घाड़ते हुए दो गजराजों और हँकड़ते हुए दो साँड़ों तथा बलसे उन्मत्त हुए दो दैत्योंके समान शोभा पाते थे || ४१-४२ ६ || ततो दुर्योधनो राजन्निदमाह युधिष्ठिरम्
三阇耶说道:婆罗多之子尤提施提罗一见到持犁者哈拉达拉(婆罗罗摩),便立刻起身而立。他以亲切而恭敬之心,依礼致敬供奉,奉上座位,并问候安康——此举以待客之道、敬长之礼与自持之德,在战事紧张之中仍护持达摩。
Verse 44
भ्रातृभि: सहितं चैव कृष्णेन च महात्मना । रामेणामितवीर्येण वाक््यं शौटीर्यसम्मतम्
三阇耶说道:在诸兄弟相随之下,又有大心的黑天(克里希那)与威力无量的罗摩(婆罗罗摩)在侧,他说出了契合豪勇之气的言辞——正是危局之中武士应有的言语。
Verse 45
केकयै: सृग्जयैर्दप्तं पञ्चालैश्व महात्मभि: । राजन्! तदनन्तर दुर्योधनने अमितपराक्रमी बलराम, महात्मा श्रीकृष्ण, महामनस्वी पांचाल, संजय, केकयगण तथा अपने भाइयोंके साथ खड़े हुए अभिमानी युधिष्ठिरसे इस प्रकार गर्वयुक्त वचन कहा-- ।। ४३-४४ $ ।। इदं व्यवसितं युद्ध मम भीमस्य चोभयो:
三阇耶说道:“大王啊,当羯迦耶人、斯林阇耶人以及心怀广大之般遮罗诸雄被激起斗志之后,骄傲的坚战——与勇力无量的婆罗罗摩、伟大的室利·奎师那、志节高远的般遮罗诸将、三阇耶、羯迦耶军众以及自己的诸弟并立——便以自负之言说道:‘此战已坚决定下——在我与毗摩之间,为我二人而战。’”
Verse 46
श्र॒त्वा दुर्योधनवच: प्रत्यपद्यन्त तत्तथा,दुर्योधनकी यह बात सुनकर सब लोगोंने उसे स्वीकार कर लिया, फिर तो राजाओंका वह विशाल समूह वहाँ सब ओर बैठ गया। नरेशोंकी वह मण्डली आकाशमें सूर्यमण्डलके समान दिखायी दे रही थी। उन सबके बीचमें भगवान् श्रीकृष्णके बड़े भ्राता तेजस्वी महाबाहु बलरामजी विराजमान हुए। महाराज! सब ओरसे सम्मानित होते हुए नीलाम्बरधारी, गौरकान्ति बलभद्रजी राजाओंके बीचमें वैसे ही शोभा पा रहे थे, जैसे रात्रिमें नक्षत्रोंसे घिरे हुए पूर्ण चन्द्रमा सुशोभित होते हैं
三阇耶说道:“听了难敌之言,聚集的诸王便一一应允。于是那浩大的君王之众在彼处四面就坐。王者之环宛如天际日轮。其间婆罗罗摩——臂力雄伟、光辉炽盛、世尊室利·奎师那所敬奉的长兄——灿然端坐。大王啊,四方礼敬之下,身披青衣、肤色皎洁的巴拉婆陀罗在诸王之间熠熠生辉,恰似夜空满天星辰环拱的圆满明月。”
Verse 47
ततः समुपविष्टं तत् सुमहद्राजमण्डलम् । विराजमान ददृशे दिवीवादित्यमण्डलम्,दुर्योधनकी यह बात सुनकर सब लोगोंने उसे स्वीकार कर लिया, फिर तो राजाओंका वह विशाल समूह वहाँ सब ओर बैठ गया। नरेशोंकी वह मण्डली आकाशमें सूर्यमण्डलके समान दिखायी दे रही थी। उन सबके बीचमें भगवान् श्रीकृष्णके बड़े भ्राता तेजस्वी महाबाहु बलरामजी विराजमान हुए। महाराज! सब ओरसे सम्मानित होते हुए नीलाम्बरधारी, गौरकान्ति बलभद्रजी राजाओंके बीचमें वैसे ही शोभा पा रहे थे, जैसे रात्रिमें नक्षत्रोंसे घिरे हुए पूर्ण चन्द्रमा सुशोभित होते हैं
三阇耶说道:“于是那浩大的诸王之环既已就坐,便显得光彩夺目——宛如天际日轮。”
Verse 48
तेषां मध्ये महाबाहु: श्रीमान् केशवपूर्वज: । उपविष्टो महाराज पूज्यमान: समन्ततः,दुर्योधनकी यह बात सुनकर सब लोगोंने उसे स्वीकार कर लिया, फिर तो राजाओंका वह विशाल समूह वहाँ सब ओर बैठ गया। नरेशोंकी वह मण्डली आकाशमें सूर्यमण्डलके समान दिखायी दे रही थी। उन सबके बीचमें भगवान् श्रीकृष्णके बड़े भ्राता तेजस्वी महाबाहु बलरामजी विराजमान हुए। महाराज! सब ओरसे सम्मानित होते हुए नीलाम्बरधारी, गौरकान्ति बलभद्रजी राजाओंके बीचमें वैसे ही शोभा पा रहे थे, जैसे रात्रिमें नक्षत्रोंसे घिरे हुए पूर्ण चन्द्रमा सुशोभित होते हैं
三阇耶说道:“大王啊,在他们当中端坐着那位显赫的雄臂者——凯沙瓦(奎师那)的长兄——四方皆以礼敬奉。”
Verse 49
शुशुभे राजमध्यस्थो नीलवासा: सितप्रभ: । नक्षत्रैरिव सम्पूर्णो वृतो नेशि निशाकर:,दुर्योधनकी यह बात सुनकर सब लोगोंने उसे स्वीकार कर लिया, फिर तो राजाओंका वह विशाल समूह वहाँ सब ओर बैठ गया। नरेशोंकी वह मण्डली आकाशमें सूर्यमण्डलके समान दिखायी दे रही थी। उन सबके बीचमें भगवान् श्रीकृष्णके बड़े भ्राता तेजस्वी महाबाहु बलरामजी विराजमान हुए। महाराज! सब ओरसे सम्मानित होते हुए नीलाम्बरधारी, गौरकान्ति बलभद्रजी राजाओंके बीचमें वैसे ही शोभा पा रहे थे, जैसे रात्रिमें नक्षत्रोंसे घिरे हुए पूर्ण चन्द्रमा सुशोभित होते हैं
三阇耶说道:“在诸王之中,光辉的婆罗提婆——身着青衣,皎然如雪——显得格外庄严华美。被群王环绕之时,他宛如夜空圆满明月,四周群星拱卫。”
Verse 50
तो तथा तु महाराज गदाहस्तौ सुदुःसहौ । अन्योन्यं वाम्भिरुग्राभिस्तक्षमाणौ व्यवस्थितौ,महाराज! हाथमें गदा लिये वे दोनों दुःसह वीर एक-दूसरेको अपने कठोर वचनोंद्वारा पीड़ा देते हुए खड़े थे
三阇耶说道:“大王啊,如此,那两位不可抵挡的英雄,各执钉锤在手,迎面而立,以严酷凶猛之言相互刺伤——这是随后暴烈杀伐的凶兆前奏;当傲慢与愤怒遮蔽自制之时,即便强者亦难免失其节度。”
Verse 51
अप्रियाणि ततो<न्योन्यमुक्त्वा तौ कुरुसत्तमौ । उदीक्षन्तौ स्थितौ तत्र वृत्रशक्रौ यथा55हवे,परस्पर कट वचनोंका प्रयोग करके वे दोनों कुरुकुलके श्रेष्ठतम वीर वहाँ युद्धस्थलमें वृत्रासुर और इन्द्रके समान एक-दूसरेको देखते हुए युद्धके लिये डटे रहे
彼此抛掷了刺耳难听的言辞之后,那两位库鲁族最卓越的英雄仍立于战场之上,目光紧锁对方——如同弗栗陀与因陀罗对阵在即——坚定不移,整装待战。
Verse 54
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापव॑नें बलदेवजीकी तीर्थयात्राके प्रसंगमें सारस्वतोपाख्यानविषयक चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ
至此,《圣摩诃婆罗多》之《沙利耶篇》(Śalya Parva)中,属于“钉锤篇”(Gadāparvan)之段落,在巴拉提婆(Baladeva)朝圣行旅的语境下,叙述“萨拉斯瓦塔支传”(Sārasvata Upākhyāna)者,第五十四章告终。
Verse 55
इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि युद्धारम्भे पजचपड्चाशत्तमो<5 ध्याय: ।। ५५ || इस प्रकार श्रीमह्याभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें युद्धका आरम्भविषयक पचपनवाँ अध्याय पूरा हुआ
三阇耶说道:“至此,在《圣摩诃婆罗多》之《沙利耶篇》中,尤指‘钉锤篇’(Gadāparvan)关于钉锤决斗之段落,叙述战事开端的第五十五章告终。”
Verse 156
सिंहनादैश्व शूराणां दिश: सर्वा: प्रपूरिता: । उस समय शंखोंकी ध्वनि, रणभेरियोंके गम्भीर घोष और शूरवीरोंके सिंहनादोंसे सम्पूर्ण दिशाएँ गूँज उठी थीं
三阇耶说道:诸勇士发出狮子般的战吼,四方皆被充满而轰然回响——一股不祥的武烈之潮汹涌而起,昭示战事升级,也显出众战士同心一志,准备为所择之业押上性命。
Verse 173
तस्मिन् देशे त्वनिरिणे ते तु युद्धमरोचयन् । तदनन्तर वे सभी श्रेष्ठ नरवीर आपके पुत्रके साथ पश्चिमाभिमुख चलकर पूर्वोक्त कुरक्षेत्रमें आ पहुँचे। वह उत्तम तीर्थ सरस्वतीके दक्षिण तटपर स्थित एवं सदगतिकी प्राप्ति करानेवाला था। वहाँ कहीं ऊसर भूमि नहीं थी। उसी स्थानमें आकर सबने युद्ध करना पसंद किया
三阇耶说道:在那片地方,毫无盐碱荒瘠之地,他们便择此决战。随后,那些最卓越的勇士与陛下之子一道,面向西方行军,抵达先前所说的俱卢战场(Kurukṣetra)。那上妙的圣渡口位于萨拉斯瓦蒂河(Sarasvatī)南岸,据说能赐予吉祥的归宿。彼处处处无荒芜之土。众人会集于此,皆愿在此投入战斗。
Verse 183
बिश्रद्रूपं महाराज सदृशं हि गरुत्मत: । फिर तो भीमसेन कवच पहनकर बहुत बड़ी नोकवाली गदा हाथमें ले गरुडका-सा रूप धारण करके युद्धके लिये तैयार हो गये
三阇耶说道:“大王啊,他显出辉煌而令人战栗的形貌,确如迦楼罗(Garuḍa)一般。”随即,毗摩塞那披上铠甲,手执尖端巨大的铁杵,现出迦楼罗般的威仪,整装待战。
Verse 193
रराज राजन पुत्रस्ते काउचन: शैलराडिव । तत्पश्चात् दुर्योधन भी सिरपर टोप लगाये सोनेका कवच बाँधे भीमके साथ युद्धके लिये डट गया। राजन! उस समय आपका पुत्र सुवर्णमय गिरिराज मेरुके समान शोभा पा रहा था
三阇耶说道:大王啊,陛下的俱卢之子光耀如群山之主。随后,难敌(Duryodhana)戴上头盔,系紧金色胸甲,稳立不动,准备与毗摩交战。大王啊,那一刻,陛下之子灿然如金色的须弥山(Meru),放射出巍峨山岳般的辉光。
Verse 206
संयुगे च प्रकाशेते संरब्धाविव कुञ्जरी । कवच बाँधे हुए दोनों वीर भीमसेन और दुर्योधन युद्धभूमिमें कुपित हुए दो मतवाले हाथियोंके समान प्रकाशित हो रहे थे
三阇耶说道:在战阵之中,毗摩塞那与难敌——两位雄杰,甲胄已系——在战场上分外显眼,宛如两头暴怒而醉狂的巨象。他们的怒焰与武威之光,使其格外夺目。
Verse 216
अशोभेतां महाराज चन्द्रसूर्याविवोदितौ । महाराज! रणमण्डलके बीचमें खड़े हुए ये दोनों नरश्रेष्ठ भ्राता उदित हुए चन्द्रमा और सूर्यके समान शोभा पा रहे थे
三阇耶说道:“大王啊,那二人光耀如新升之月与初出之日。”立于战场中央的两位兄弟英雄,灿然若月日并升。
Verse 226
दहन्तौ लोचनै राजन् परस्परवधैषिणौ । राजन! क्रोधमें भरे हुए दो गजराजोंके समान एक-दूसरेके वधकी इच्छा रखनेवाले वे दोनों वीर परस्पर इस प्रकार देखने लगे, मानो नेत्रोंद्वारा एक-दूसरेको भस्म कर डालेंगे
三阇耶说道:大王啊,那两位英雄——各自一心求取对方之死——彼此凝视,仿佛要以目光将对手焚成灰烬。此景昭示:怒火一旦失控,勇武便化作吞噬之焰,使同归于尽也显得可欲。
Verse 256
आह्वयामास नृपतिं सिंहं सिंहो यथा वने । उसी प्रकार पराक्रमी भीमसेनने लोहेकी गदा लेकर राजा दुर्योधनको ललकारा, मानो वनमें एक सिंह दूसरे सिंहको पुकार रहा हो
三阇耶说道:正如林中雄狮呼唤另一头雄狮,勇猛的毗摩塞那执起铁制大槌,向都律约陀那王发出挑战。此象征凸显了力量与意志的巅峰对决——正面相逢——置于骨肉相残之战的道德重负之下,王者之傲与刹帝利之法(kṣatriya-dharma)在最后的武艺试炼中激烈碰撞。
Verse 266
संयुगे च प्रकाशेतां गिरी सशिखराविव । दुर्योधन और भीमसेन दोनोंकी गदाएँ ऊपरको उठी थीं। उस समय रणभूमिमें वे दोनों शिखरयुक्त दो पर्वतोंके समान प्रकाशित हो रहे थे
三阇耶说道:在鏖战之中,两人光耀如双峰并峙的两座高山。都律约陀那与毗摩塞那高举大槌;战场上,那举起的兵器使他们宛如巍峨发光的山岳之躯——生动呈现了武者的骄矜与可怖的决绝,正将战争推向命定的终局。
Verse 386
जहृषाते महाबाहू सिंहकेसरिणाविव । रोषमें भरे हुए दो व्याप्रों, गरजते हुए दो मेघों और दहाड़ते हुए दो सिंहोंके समान वे दोनों महाबाहु वीर हर्षोत्फुल्ल हो रहे थे
三阇耶说道:那两位臂力无双的英雄欢腾振奋,胸中怒焰翻涌——如两虎含怒,如两团雷云轰鸣,如两头雄狮长吼。他们的喜悦并非温柔的欢愉,而是战士临近决战时那种炽烈的亢奋。
Verse 396
ददृशाते महात्मानौ सशृज्भाविव पर्वतौ । वे दोनों महामनस्वी योद्धा परस्पर कुपित हुए दो हाथियों, प्रज्वलित हुई दो अग्नियों और शिखरययुक्त दो पर्वतोंके समान दिखायी देते थे
三阇耶说道:那两位伟大心魂的战士,宛如两座生角的高山。怒与威严相对而立,他们在战阵之中彼此迎面,力量与决心尽皆显现。
Verse 406
तौ समेतौ महात्मानौ गदाहस्तौ नरोत्तमौ । उन दोनोंके ओठ रोषसे फड़क रहे थे। वे दोनों नरश्रेष्ठ एक-दूसरेपर दृष्टिपात करते हुए हाथमें गदा ले परस्पर भिड़नेके लिये उद्यत थे
三阇耶说道:那两位大心之勇士,人中最胜者,手执钉锤,迎面相对。他们的嘴唇因愤怒而颤动;彼此凝视,各自挺立待发,准备相撞——怒火驱使他们在战场上道义崩坏的阴影中,走向一场决定性的、暴烈的交锋。
Verse 453
उपोपविष्टा: पश्यध्वं सहितैर्नुपपुड़वैः । “वीरो! मेरा और भीमसेनका जो यह युद्ध निश्चित हुआ है, इसे आप लोग सभी श्रेष्ठ नरेशोंके साथ निकट बैठकर देखिये”
三阇耶说道:“诸位与最杰出的诸王一同近坐观看。勇士啊,我与毗摩塞那之间已然坚决定下的决斗——愿你们众人连同最上之君王,皆在近旁就座,亲眼作证。”
Verse 2736
उभौ शिष्यौ गदायुद्धे रोहिणेयस्य धीमत: । दोनों ही अत्यन्त क्रोधमें भरे थे। दोनों भयंकर पराक्रम प्रकट करनेवाले थे और दोनों ही गदायुद्धमें बुद्धिमान् रोहिणीनन्दन बलरामजीके शिष्य थे
三阇耶说道:二人皆为智者罗希涅耶(婆罗罗摩)之弟子,精于钉锤之战。盛怒如火,各自显出骇人的勇力——武艺一旦被嗔怒驱使,便在战场上化作可怖之势。
Verse 3736
ददृशाते कुरुश्रेष्ठी कालसूर्याविवोदितौ । महामनस्वी महाबली कुरुश्रेष्ठ दुर्योधन और भीमसेन प्रखर किरणोंसे युक्त, प्रलयकालमें उगे हुए दो दीप्तिशाली सूर्योके समान दृष्टिगोचर हो रहे थे
三阇耶说道:俱卢族中最卓绝的二人——难敌与毗摩塞那——映入眼帘,恰如劫末之时升起的两轮炽日,凶烈光芒迸射。那一刻,战争的道义重负更显锋利:雄心与巨力向外辉耀,然而这辉耀属于毁灭之景,勇武与破坏并肩而立。
The dilemma concerns whether end-stage resolution through single-combat can remain aligned with kṣātra-dharma when the combatants’ motivations are shaped by accumulated grievances and the demand for retributive closure.
The chapter frames speech as ethical memory: earlier choices persist as causal forces, and public narratives of justice emerge through explicit recollection of harms, even as duty requires disciplined action rather than prolonged provocation.
No explicit phalaśruti appears here; the meta-function is carried by nimitta imagery and layered narration, signaling interpretive gravity and preparing the listener for consequential resolution rather than offering a stated salvific benefit.