Adhyaya 39
Shalya ParvaAdhyaya 3946 Verses

Adhyaya 39

Ārṣṭiṣeṇa’s Siddhi and the Tīrtha-Boons; Sindhudvīpa–Devāpi Brāhmaṇya; Viśvāmitra’s Tapas Begins

Upa-parva: Tīrtha–Tapas and Brāhmaṇya Attainment Episode (Ārṣṭiṣeṇa–Sindhudvīpa–Devāpi–Viśvāmitra)

Janamejaya queries the ascetic accomplishments of Ārṣṭiṣeṇa and how Sindhudvīpa, Devāpi, and Viśvāmitra obtained brāhmaṇya. Vaiśaṃpāyana recounts that in Kṛtayuga Ārṣṭiṣeṇa, though dwelling in the guru’s household, does not attain completion of learning; becoming disenchanted, he undertakes intense tapas and thereby gains unsurpassed Vedic attainment and siddhi. At a tīrtha on a great river he proclaims three boons: bathing there yields abundant fruit comparable to an aśvamedha; fear from wild creatures ceases; and even modest effort brings substantial merit. Having declared this, he departs to the celestial realm. In that same tīrtha Sindhudvīpa and Devāpi attain great brāhmaṇya. The narrative then turns to Viśvāmitra: born a kṣatriya as Gādhi’s son, he becomes king but cannot adequately protect the earth, hears of rākṣasa danger, and marches with a fourfold army to Vasiṣṭha’s hermitage, where his troops cause disruption. Vasiṣṭha, angered, commands his cow to manifest fierce Śabara warriors who rout the army. Seeing this, Viśvāmitra concludes tapas is supreme and begins severe ascetic observances at a Sarasvatī tīrtha, enduring attempted divine obstacles; his radiance grows, Brahmā grants his boon request to become a brāhmaṇa, and he then moves through the world fulfilled. The chapter closes by noting Rāma’s gifts to brahmins at the same tīrtha and his journey onward toward Baka’s hermitage, linking tīrtha, gift-economy, and ascetic exempla.

Chapter Arc: सारस्वत-उपाख्यान के पूर्व अध्याय के समापन के बाद कथा तुरंत हलधर बलराम की तीर्थयात्रा पर लौटती है—वे ब्राह्मणों को दान देकर रात्रि-निवास करते हैं और प्रातः तीर्थ-लाभ हेतु शीघ्र प्रस्थान करते हैं। → बलराम औशनस-तीर्थ (कपालमोचन) पहुँचते हैं, जहाँ एक प्राचीन, भयावह स्मृति जुड़ी है—राम द्वारा पूर्वकाल में क्षिप्त राक्षस के कारण ‘कपाल’ और ‘मोचन’ का प्रसंग। जनमेजय जिज्ञासा से पूछते हैं कि यह तीर्थ ‘कपालमोचन’ क्यों कहलाया और यहाँ किस महामुनि का प्रभाव है। → कपालमोचन/औशनस-तीर्थ की महिमा और उसकी सिद्धि-शक्ति का उद्घोष होता है—यह ‘सर्वपापप्रशमन’ और ‘सिद्धिक्षेत्र’ है; साथ ही पृथूदक-तीर्थ का फल भी प्रतिपादित होता है कि सरस्वती के उत्तर तट पर जप करते हुए देहत्याग करने वाले को पुनर्मृत्यु का भय नहीं रहता। → बलराम विधिपूर्वक स्नान करते हैं, महात्मा ब्राह्मणों को विपुल धन-दान देते हैं, मुनियों से पूजित होकर जल-स्पर्श कर अनुमति लेते हैं और अगले तीर्थ की ओर आगे बढ़ते हैं—तीर्थयात्रा का क्रम धर्म-दान से पुष्ट होता है। → तीर्थ-क्रम आगे भी चलता है—कथा संकेत देती है कि अगले पवित्र स्थल पर नई महिमा/पुराकथा और बलराम के अगले दान-स्नान का वर्णन आने वाला है।

Shlokas

Verse 1

इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापव॑नें बलदेवजीकी तीर्थयात्राके प्रसंगमें सारस्वतोपाख्यानविषयक अड़तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ३८ ॥। (दाक्षिणात्य अधिक पाठके ५६ श्लोक मिलाकर कुल ६४ ३ “लोक हैं।) - इन्हीं ऋषियोंकी तपस्यासे कल्पान्तरमें दितिके गर्भले उनचास मरुदगणोंका आविर्भाव हुआ। ये ही दितिके उदरमें एक गर्भके रूपमें प्रकट हुए, फिर इन्द्रके वज़्से कटकर उनचास अमर शरीरोंके रूपमें उत्पन्न हुए--ऐसा समझना चाहिये। एकोनचत्वारिशोड ध्याय: आओऔशनस एवं कपालमोचनतीर्थकी माहात्म्यकथा तथा रुषंगुके आश्रम पृथूदकतीर्थकी महिमा वैशम्पायन उवाच उषित्वा तत्र रामस्तु सम्पूज्याश्रमवासिन: । तथा मड़कणके प्रीति शुभां चक्रे हलायुध:,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन! उस सप्तसारस्वत-तीर्थमें रहकर हलधर बलरामजीने आश्रमवासी ऋषियोंका पूजन किया और मंकणक मुनिपर अपनी उत्तम प्रीतिका परिचय दिया

毗湿摩波耶那说道:“大王啊,他在那神圣的萨拉斯瓦蒂地区圣渡(tīrtha)停留之后,执犁的罗摩(巴拉罗摩)依礼敬奉住在林苑中的诸仙,又向牟尼曼迦那迦显露吉祥的善意与亲厚的敬爱。”

Verse 2

दत्त्वा दानं द्विजातिभ्यो रजनीं तामुपोष्य च । पूजितो मुनिसड्घैश्न प्रातरुत्थाय लाड़ली,भरतनन्दन! वहाँ ब्राह्मणोंको दान दे उस रात्रिमें निवास करनेके पश्चात्‌ प्रातःकाल उठकर मुनिमण्डलीसे सम्मानित हो महाबली लांगलधारी बलरामने पुनः तीर्थके जलमें स्नान किया और सम्पूर्ण ऋषि-मुनियोंकी आज्ञा ले अन्य तीर्थोर्में जानेके लिये वहाँसे शीघ्रतापूर्वक प्रस्थान कर दिया

毗湿摩波耶那说道:“他向两次生的婆罗门施与布施,又守斋度过那一夜。执犁的巴拉罗摩为诸仙众所礼敬,黎明时起身,行毕所规定的仪轨;并在诸圣者尽皆许可之下辞别,随即迅速启程,前往别处诸圣渡巡礼。”

Verse 3

अनुज्ञाप्य मुनीन्‌ सर्वान्‌ स्पृष्टवा तोयं च भारत । प्रययौ त्वरितो रामस्तीर्थहेतोर्महाबल:,भरतनन्दन! वहाँ ब्राह्मणोंको दान दे उस रात्रिमें निवास करनेके पश्चात्‌ प्रातःकाल उठकर मुनिमण्डलीसे सम्मानित हो महाबली लांगलधारी बलरामने पुनः तीर्थके जलमें स्नान किया और सम्पूर्ण ऋषि-मुनियोंकी आज्ञा ले अन्य तीर्थोर्में जानेके लिये वहाँसे शीघ्रतापूर्वक प्रस्थान कर दिया

毗湿摩波耶那说道:“噢,婆罗多啊,他向诸牟尼一一辞别,又触及圣水之后,力大无比的罗摩(巴拉罗摩)便匆匆启程,一心要巡访诸圣渡。”

Verse 4

ततस्त्वौशनसं तीर्थमभाजगाम हलायुध: । कपालमोचन नाम यत्र मुक्तो महामुनि:,तदनन्तर हलधारी बलराम औशनसतीर्थमें आये, जिसका दूसरा नाम कपालमोचनतीर्थ भी है। महाराज! पूर्वकालमें भगवान्‌ श्रीरामने एक राक्षसको मारकर उसे दूर फेंक दिया था। उसका विशाल सिर महामुनि महोदरकी जाँघमें चिपक गया था। वे महामुनि इस तीर्थमें स्नान करनेपर उस कपालसे मुक्त हुए थे

毗湿摩波耶那说道:“随后,持犁者哈拉尤陀(巴拉罗摩)前往名为奥沙那萨的圣渡,此处亦称‘迦波罗摩遮那’(解脱骷髅之地)——昔日一位大牟尼曾在此摆脱那紧缠不去的骷髅。”

Verse 5

महता शिरसा राजन ग्रस्तजड्घो महोदर: । राक्षसस्य महाराज रामक्षिप्तस्य वै पुरा,तदनन्तर हलधारी बलराम औशनसतीर्थमें आये, जिसका दूसरा नाम कपालमोचनतीर्थ भी है। महाराज! पूर्वकालमें भगवान्‌ श्रीरामने एक राक्षसको मारकर उसे दूर फेंक दिया था। उसका विशाल सिर महामुनि महोदरकी जाँघमें चिपक गया था। वे महामुनि इस तीर्थमें स्नान करनेपर उस कपालसे मुक्त हुए थे

毗湿摩波耶那说:“大王啊,昔日大圣摩诃陀罗曾被一颗巨大的头骨黏缚在大腿上,沉重难当——那是久远以前世尊罗摩所诛杀并远掷的罗刹之颅。其后,执犁的婆罗罗摩来到奥舍那娑圣渡(Auśanasa-tīrtha),此处亦名‘解颅圣渡’(Kapāla-mocana-tīrtha)。大圣摩诃陀罗在此圣地沐浴,遂从那头骨的缠缚中解脱。”

Verse 6

तत्र पूर्व तपस्तप्तं काव्येन सुमहात्मना । यत्रास्य नीतिरखिला प्रादुर्भूता महात्मन:,महात्मा शुक्राचार्यने वहीं पहले तप किया था, जिससे उनके हृदयमें सम्पूर्ण नीति- विद्या स्फुरित हुई थी

毗湿摩波耶那说:“在那地方,往昔大德迦毗耶(即舒克罗阿阇梨)曾修行严峻苦行。正是在那里,‘尼提’之全学——治国之道与正行之法——圆满地在这位圣者心中显现。”

Verse 7

यत्रस्थ श्षिन्तयामास दैत्यदानवविग्रहम्‌ । तत्‌ प्राप्य च बलो राजंस्तीर्थप्रवरमुत्तमम्‌

毗湿摩波耶那说:“他立于其处,追思代底耶与达那婆之间的争战。既至此地,婆罗王(Bala)便来到那至上殊胜的圣渡,名闻为诸圣渡之最。”

Verse 8

जनमेजय उवाच कपालमोचन ब्रह्मन्‌ कथं यत्र महामुनि:

阇那美阇耶问道:“婆罗门啊,解颅圣渡啊,在那里究竟如何发生的,大圣者?”

Verse 9

वैशम्पायन उवाच पुरा वै दण्डकारण्ये राघवेण महात्मना,वने विचरतो राजन्नस्थि भिनत्त्वास्फुरत्‌ तदा । वैशम्पायनजीने कहा--नृपश्रेष्ठ! पूर्वकालकी बात है, रघुकुलतिलक महात्मा श्रीरामचन्द्रजीने दण्डकारण्यमें रहते समय जब राक्षसोंके संहारका विचार किया, तब तीखी धारवाले धुरसे जनस्थानमें उस दुरात्मा राक्षसका मस्तक काट दिया। वह कटा हुआ मस्तक उस महान्‌ वनमें ऊपरको उछला और दैवयोगसे वनमें विचरते हुए महोदर मुनिकी जाँधमें जा लगा। नरेश्वर! उस समय उनकी हड्डी छेदकर वह भीतरतक घुस गया

毗湿摩波耶那说:“最胜之王啊,久远以前,在檀陀迦林中,罗睺后裔、伟大的罗摩徜徉于荒林之时,忽有一段骨骸被刺穿,猛然飞迸而出,重重击中。”

Verse 10

वसता राजशार्दूल राक्षसान्‌ शमयिष्यता । जनस्थाने शिरश्कछिन्नं राक्षसस्य दुरात्मन:

毗舍波耶那说道:“噫,诸王之虎!当你居于彼处,意在镇伏罗刹之时,在阇那斯他那,那恶罗刹之首已被斩落。”

Verse 11

क्षुरेण शितधारेण उत्पपात महावने । महोदरस्य तल्लग्नं जंघायां वै यदृच्छया

毗舍波耶那说道:在那大森林中,一柄刃口锋利如剃刀者忽然迸起;纯属偶然,它竟嵌入摩诃陀罗的小腿胫骨。此事昭示:在暴力与纷乱之际,伤害往往无心而至、猝不及防——提醒人们生命之脆弱,以及放纵混乱之举所负的道德重担。

Verse 12

स तेन लग्नेन तदा द्विजातिर्न शशाक ह

当时因那物紧紧附着牵制,“两生者”竟不能作为、亦不能前行——他的决意被那攫住他的东西所阻。

Verse 13

स पूतिना विसत्रवता वेदनार्तों महामुनि:

毗舍波耶那说道:那位大圣者为痛楚所折磨,又遭腥秽脓液淋漓之患——此象征昭示:在战争余烬最沉重的时刻,肉身的败坏与苦痛亦相随而至,使听者记起暴力所付出的严酷、足以警醒良知的代价。

Verse 14

जगाम सर्वतीर्थानि पृथिव्यां चेति नः श्रुतम्‌ । उस मस्तकसे दुर्गन्धयुक्त पीब बहती रहती थी और महामुनि महोदर वेदनासे पीड़ित हो गये थे। हमने सुना है कि मुनिने किसी तरह भूमण्डलके सभी तीर्थोंकी यात्रा की ।। स गत्वा सरित: सर्वा: समुद्रांश्ष महातपा:,उन महातपस्वी महर्षिने सम्पूर्ण सरिताओं और समुद्रोंकी यात्रा करके वहाँ रहनेवाले पवित्रात्मा मुनियोंसे वह सब वृत्तान्त कह सुनाया। सम्पूर्ण तीर्थोमें स्नान करके भी वे उस कपालसे छुटकारा न पा सके

毗舍波耶那说道:“我等闻之:他遍行大地一切圣渡。那位大苦行者走遍诸河,乃至大海,将此事始末尽告于彼处居住的清净圣仙。然而,即便在一切圣地沐浴,他仍不能摆脱那骷髅。”

Verse 15

कथयामास तत्‌ सर्वमृषीणां भावितात्मनाम्‌ | आपलुत्य सर्वतीर्थेषु न च मोक्षमवाप्तवान्‌,उन महातपस्वी महर्षिने सम्पूर्ण सरिताओं और समुद्रोंकी यात्रा करके वहाँ रहनेवाले पवित्रात्मा मुनियोंसे वह सब वृत्तान्त कह सुनाया। सम्पूर्ण तीर्थोमें स्नान करके भी वे उस कपालसे छुटकारा न पा सके

毗舍波耶那说道:他将这一切经过,尽数告知那些自心清净、修持严谨的仙圣。然而,即便在一切圣渡(tīrtha)中沐浴,他仍未得解脱——纵有大苦行,遍历江河与大海,也无法摆脱那头骨所加之重负。

Verse 16

सतु शुश्राव विप्रेन्द्र मुनीनां वचनं महत्‌ । सरस्वत्यास्तीर्थवरं ख्यातमौशनसं तदा

毗舍波耶那说道:随后,婆罗门中最贤者啊,他听闻诸牟尼郑重其事的言辞——讲到萨拉斯瓦蒂河上一处最胜圣渡,古来受敬、声名远播,名为“奥沙那萨”(Auśanasa)。

Verse 17

स तु गत्वा ततस्तत्र तीर्थमौशनसं द्विज:,तदनन्तर वे ब्रह्मर्षि वहाँ औशनसतीर्थमें गये और उसके जलसे आचमन एवं स्नान किया। उसी समय वह कपाल उनके चरण (जाँघ)-को छोड़कर पानीके भीतर गिर पड़ा

于是那位婆罗门前往名为“奥沙那萨”(Auśanasa)的圣渡。抵达圣地后,这位梵仙行了阿遮摩那(ācamana,啜水净礼),并在其水中沐浴。就在那一刻,紧缠在他大腿/足上的头骨忽然松脱,坠入水中。

Verse 18

तत औशनसे तीर्थे तस्योपस्पृशतस्तदा । तच्छिरश्नरणं मुक्त्वा पपातान्तर्जले तदा,तदनन्तर वे ब्रह्मर्षि वहाँ औशनसतीर्थमें गये और उसके जलसे आचमन एवं स्नान किया। उसी समय वह कपाल उनके चरण (जाँघ)-को छोड़कर पानीके भीतर गिर पड़ा

此时在“奥沙那萨”圣渡,他正行阿遮摩那与仪式沐浴之际,那紧附于他大腿/足上的头骨松开束缚,当即坠入水中。

Verse 19

विमुक्तस्तेन शिरसा परं सुखमवाप ह । स चाप्यन्तर्जले मूर्धा जगामादर्शनं विभो,प्रभो! उस मस्तक या कपालसे मुक्त होनेपर महोदर मुनिको बड़ा सुख मिला। साथ ही वह मस्तक भी (जो उनकी जाँघसे छूटकर गिरा था) पानीके भीतर अदृश्य हो गया

毗舍波耶那说道:从那头(或头骨)中解脱后,圣者摩诃陀罗获得了极大的轻安与喜悦。而那头骨也随之沉入水中,隐没不见——伟力者啊。

Verse 20

ततः स विशिरा राजन्‌ पूतात्मा वीतकल्मष: । आजगामाश्रमं प्रीत: कृतकृत्यो महोदर:,राजन! उस कपालसे मुक्त हो निष्पाप एवं पवित्र अन्तःकरणवाले महोदर मुनि कृतकृत्य हो प्रसन्नतापूर्वक अपने आश्रमपर लौट आये

毗湿摩波耶那说道:于是,国王啊,摩诃陀罗——摆脱了那紧缠于身的骷髅之缚,内心清净,罪垢尽除——欢然返回自己的林居道场,自觉所求已成。

Verse 21

सो<थ गत्वा$55श्रमं पुण्यं विप्रमुक्तो महातपा: । कथयामास तत्‌ सर्वमृषीणां भावितात्मनाम्‌,संकटसे मुक्त हुए उन महातपस्वी मुनिने अपने पवित्र आश्रमपर जाकर वहाँ रहनेवाले पवित्रात्मा ऋषियोंसे अपना सारा वृत्तान्त कह सुनाया

随后,那位大苦行者既脱离此厄,便回到自己神圣的林居道场,将一切经过尽数讲述给住在那里的自持修心的诸仙贤。

Verse 22

ते श्रुत्वा वचनं तस्य ततस्तीर्थस्य मानद । कपालमोचनमिति नाम चक्कुः समागता:,मानद! तदनन्तर वहाँ आये हुए महर्षियोंने महोदर मुनिकी बात सुनकर उस तीर्थका नाम कपालमोचन रख दिया

听罢他的话,赐荣者啊,聚集于彼处的诸圣贤便将那处圣渡命名为“迦波罗摩遮那”(Kapālamocana),意为“解脱骷髅之缚之地”。

Verse 23

स चापि तीर्थप्रवरं पुनर्गत्वा महानृषि: । पीत्वा पय: सुविपुलं सिद्धिमायात्‌ तदा मुनि:

那位大圣者又一次前往最殊胜的圣渡,饮下极其丰盈的乳汁;于是,这位牟尼当时便证得悉地(成就)。

Verse 24

इसके बाद महर्षि महोदर पुनः उस श्रेष्ठ तीर्थमें गये और वहाँका प्रचुर जल पीकर उत्तम सिद्धिको प्राप्त हुए ।। तत्र दत्त्वा बहून्‌ दायान्‌ विप्रान्‌ सम्पूज्य माधव: । जगाम वृष्णिप्रवरो रुषड्रोराश्रमं तदा,वृष्णिवंशावतंस बलरामजीने वहाँ ब्राह्मणोंकी पूजा करके उन्हें बहुत धनका दान किया। इसके बाद वे रुषंगु मुनिके आश्रमपर गये

在那里,摩陀婆——弗利什尼族中最卓越者——以应有的恭敬礼遇婆罗门,并施与丰厚的赠礼。既尽了布施与尊师重道之义务,他便前往仙人鲁桑古的道场。

Verse 25

यत्र तप्तं तपो घोरमार्टिषिणेन भारत । ब्राह्मण्यं लब्धवांस्तत्र विश्वामित्रो महामुनि:,भरतनन्दन! वहीं आर्रिश्तो मुनिने घोर तपस्या की थी और वहीं महामुनि विश्वामित्रने ब्राह्मणत्व प्राप्त किया थ

毗舍波耶那说:噢,婆罗多啊,正是在那一处——圣者阿尔提希行持严酷苦行之地——大圣维湿瓦密多得证婆罗门(brāhmaṇa)之位与其灵性权威。

Verse 26

सर्वकामसमृद्धं च तदाश्रमपदं॑ महत्‌ | मुनिभिव्रद्यिणैश्वैव सेवितं सर्वदा विभो,प्रभो! वह महान्‌ आश्रम सम्पूर्ण मनोवांछित वस्तुओंसे सम्पन्न है। वहँ बहुत-से मुनि और ब्राह्मण सदा निवास करते हैं

毗舍波耶那说:那座宏大的隐修聚落富足圆满,诸般所愿与所需皆备。它常为圣贤与婆罗门(brāhmaṇa)所往来供奉,噢,大能之主——噢,可敬者——使其成为持戒与圣学长存之地。

Verse 27

ततो हलधर: श्रीमान्‌ ब्राह्मणैः परिवारित: । जगाम तत्र राजेन्द्र रुषड्गुस्तनुमत्यजत्‌

随后,光辉的持犁者哈拉陀罗(婆罗罗摩),为婆罗门(brāhmaṇa)所环绕,自彼处启行,噢,诸王之最;而鲁沙德古舍身而逝,走到了生命的尽头。

Verse 28

राजेन्द्र! तत्पश्चात्‌ श्रीमान्‌ हलधर ब्राह्मणोंसे घिरकर उस स्थानपर गये, जहाँ रुषंगुने अपना शरीर छोड़ा थ ।। रुषड्गुर्ब्राह्मिणो वृद्धस्तपोनित्यश्व॒ भारत । देहन्यासे कृतमना विचिन्त्य बहुधा तदा,भारत! बूढ़े ब्राह्मण रुषंगु सदा तपस्यामें संल्गन रहते थे। एक समय उन महातपस्वी रुषंगु मुनिने शरीर त्याग देनेका विचार करके बहुत कुछ सोचकर अपने सभी पुत्रोंको बुलाया और उनसे कहा--'मुझे पृथूदक तीर्थमें ले चलो"

毗舍波耶那说:噢,诸王之最!其后,光辉的哈拉陀罗在婆罗门(brāhmaṇa)簇拥下,前往年迈的婆罗门利善古(Ṛṣaṅgu)舍身之处。噢,婆罗多啊,利善古恒常专注于苦行。彼时,他既已决意舍弃此身,便反复多方思量。

Verse 29

ततः सर्वानुपादाय तनयान्‌ वै महातपा: । रुषड्गुरब्रवीत्‌ तत्र नयध्वं मां पृूधूदकम्‌,भारत! बूढ़े ब्राह्मण रुषंगु सदा तपस्यामें संल्गन रहते थे। एक समय उन महातपस्वी रुषंगु मुनिने शरीर त्याग देनेका विचार करके बहुत कुछ सोचकर अपने सभी पुत्रोंको बुलाया और उनसे कहा--'मुझे पृथूदक तीर्थमें ले चलो"

于是,大苦行者利善古(Ṛṣaṅgu)召集诸子,在那里说道:“噢,婆罗多啊,带我前往普利图达迦(Pṛthūdaka)。”

Verse 30

विज्ञायातीतवयसं रुषड्गुं ते तपोधना: । तं च तीर्थमुपानिन्यु: सरस्वत्यास्तपोधनम्‌,उन तपस्वी पुत्रोंने तपोधन रुषंगुको अत्यन्त वृद्ध जानकर उन्हें सरस्वतीके उस उत्तम तीर्थमें पहुँचा दिया

毗湿摩波耶那说:他们认出鲁沙德古(Ruṣaḍgu)已过盛年,那些以苦行为财的修行者便引他前往萨拉斯瓦蒂河(Sarasvatī)那处神圣的渡口(tīrtha),为持戒苦修之人所敬仰的圣地。

Verse 31

स तैः पुत्रैस्तदा धीमानानीतो वै सरस्वतीम्‌ । पुण्यां तीर्थशतोपेतां विप्रसड्घैर्निषेविताम्‌

于是,那位智者被诸子引至萨拉斯瓦蒂河(Sarasvatī)——圣洁之流,点缀着上百处圣渡(tīrtha),常有婆罗门仙贤的集会前来依止。

Verse 32

स तत्र विधिना राजजन्नाप्लुत्य सुमहातपा: । ज्ञात्वा तीर्थगुणांश्वैव प्राहेदमृषिसत्तम:

在那里,那位大苦行者依仪轨在王者之渡沐浴。洞悉此圣渡(tīrtha)的功德与殊胜之后,最上之仙贤便开口说道。

Verse 33

सुप्रीत: पुरुषव्यात्र सर्वान्‌ पुत्रानुपासत: । राजन! नरव्याप्र! वे पुत्र जब उन बुद्धिमान्‌ मुनिको ब्राह्मणसमूहोंसे सेवित तथा सैकड़ों तीर्थोंसे सुशोभित पुण्यसलिला सरस्वतीके तटपर ले आये, तब वे महातपस्वी महर्षि वहाँ विधिपूर्वक स्नान करके तीर्थके गुणोंको जानकर अपने पास बैठे हुए सभी पुत्रोंसे प्रसन्नतापूर्वक बोले-- ।। सरस्वत्युत्तरे तीरे यस्त्यजेदात्मनस्तनुम्‌

毗湿摩波耶那说:人中之虎啊,国王心怀欢悦,诸子皆侍立左右。那些儿子将他带到萨拉斯瓦蒂河(Sarasvatī)神圣的河岸——此处为智者与婆罗门贤众所依止,又以百处圣渡(tīrtha)而增辉。其间,大苦行者、诸大圣仙(maharṣi)依仪轨沐浴;明了此圣地之殊胜功德后,便欣然对近旁就坐的诸子说道:“凡在萨拉斯瓦蒂北岸舍弃此身者……”

Verse 34

तत्राप्लुत्य स धर्मात्मा उपस्पृश्य हलायुध:

在那里,他沐浴之后,那位具正法之心者——持犁者哈拉尤达(Halāyudha,即婆罗罗摩 Balarāma)——依礼行净水触水之净仪(ācamana),合乎法度。

Verse 35

ससर्ज यत्र भगवॉल्लोकॉल्लोकपितामह:,कुरुवंशी नरेश! तत्पश्चात्‌ बलवान्‌ एवं प्रतापी बलभद्रजी उस तीर्थमें आ गये, जहाँ लोकपितामह भगवान्‌ ब्रह्माने सृष्टि की थी, जहाँ कठोर व्रतका पालन करनेवाले मुनिश्रेष्ठ आहएिषिणने बड़ी भारी तपस्या करके ब्राह्मणत्व पाया था तथा जहाँ राजर्षि सिन्धुद्वीप, महान्‌ तपस्वी देवापि और महायशस्वी, उमग्रतेजस्वी एवं महातपस्वी भगवान्‌ विश्वामित्र मुनिने भी ब्राह्मणत्व प्राप्त किया था

毗湿摩耶那说道:噢,俱卢族的王啊!其后,强健而英勇的巴拉跋陀罗(婆罗罗摩)来到那处神圣的渡口——在那里,世间之祖、至尊梵天(Brahmā)曾开显创造;在那里,持守严厉誓戒的最上诸牟尼,以广大苦行而得婆罗门之位;亦在那里,王仙信度岛(Sindhudvīpa)、大苦行者提婆阿毗(Devāpi),以及名闻遐迩、威光炽烈、苦行至极的圣者毗湿瓦密多罗(Viśvāmitra),同样获得婆罗门之身分。

Verse 36

यत्रार्टिषिण: कौरव्य ब्राह्मण्यं संशितव्रत: । तपसा महता राजन प्राप्तवानृषिसत्तम:,कुरुवंशी नरेश! तत्पश्चात्‌ बलवान्‌ एवं प्रतापी बलभद्रजी उस तीर्थमें आ गये, जहाँ लोकपितामह भगवान्‌ ब्रह्माने सृष्टि की थी, जहाँ कठोर व्रतका पालन करनेवाले मुनिश्रेष्ठ आहएिषिणने बड़ी भारी तपस्या करके ब्राह्मणत्व पाया था तथा जहाँ राजर्षि सिन्धुद्वीप, महान्‌ तपस्वी देवापि और महायशस्वी, उमग्रतेजस्वी एवं महातपस्वी भगवान्‌ विश्वामित्र मुनिने भी ब्राह्मणत्व प्राप्त किया था

毗湿摩耶那说道:“噢,俱卢之子啊,噢,大王——此处正是圣地:最上圣者阿尔提希那(Ārtiṣiṇa)坚守严厉誓戒,以广大苦行而得婆罗门之位。”

Verse 37

सिन्धुद्वीपश्च राजर्षिदेवापिश्व महातपा: । ब्रह्माण्यं लब्धवान्‌ यत्र विश्वामित्रस्तथा मुनि:,कुरुवंशी नरेश! तत्पश्चात्‌ बलवान्‌ एवं प्रतापी बलभद्रजी उस तीर्थमें आ गये, जहाँ लोकपितामह भगवान्‌ ब्रह्माने सृष्टि की थी, जहाँ कठोर व्रतका पालन करनेवाले मुनिश्रेष्ठ आहएिषिणने बड़ी भारी तपस्या करके ब्राह्मणत्व पाया था तथा जहाँ राजर्षि सिन्धुद्वीप, महान्‌ तपस्वी देवापि और महायशस्वी, उमग्रतेजस्वी एवं महातपस्वी भगवान्‌ विश्वामित्र मुनिने भी ब्राह्मणत्व प्राप्त किया था

毗湿摩耶那说道:“此处正是圣地:王仙信度岛、大苦行者提婆阿毗,以及圣者毗湿瓦密多罗,都在这里获得婆罗门之位。”

Verse 38

महातपस्वी भगवानुग्रतेजा महायशा: । तत्राजगाम बलवान बलभद्र: प्रतापवान्‌,कुरुवंशी नरेश! तत्पश्चात्‌ बलवान्‌ एवं प्रतापी बलभद्रजी उस तीर्थमें आ गये, जहाँ लोकपितामह भगवान्‌ ब्रह्माने सृष्टि की थी, जहाँ कठोर व्रतका पालन करनेवाले मुनिश्रेष्ठ आहएिषिणने बड़ी भारी तपस्या करके ब्राह्मणत्व पाया था तथा जहाँ राजर्षि सिन्धुद्वीप, महान्‌ तपस्वी देवापि और महायशस्वी, उमग्रतेजस्वी एवं महातपस्वी भगवान्‌ विश्वामित्र मुनिने भी ब्राह्मणत्व प्राप्त किया था

毗湿摩耶那说道:福德具足的婆罗罗摩——苦行之力深厚,灵威炽盛,名声显赫——来到那处圣地。噢,俱卢族的王啊,强大而英勇的巴拉跋陀罗也抵达了那里。

Verse 39

इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि बलदेवतीर्थयात्रायां सारस्वतोपाख्यान एकोनचत्वारिंशो5ध्याय:

至此,《尊贵的摩诃婆罗多》之《沙利耶篇》“伽陀分”中,记述婆罗罗摩巡礼诸圣渡(提尔塔)之“萨罗湿伐多(Sārasvata)故事”的第三十九章圆满结束。

Verse 73

विधिवद्‌ वै ददौ वित्तं ब्राह्मणानां महात्मनाम्‌ | वहीं रहकर उन्होंने दैत्यों अथवा दानवोंके युद्धके विषयमें विचार किया था। राजन! उस श्रेष्ठ तीर्थमें पहुँचकर बलरामजीने महात्मा ब्राह्मणोंको विधिपूर्वक धनका दान दिया था

Vaiśaṃpāyana said: In full accordance with prescribed rites, he bestowed wealth as gifts upon the great-souled Brāhmaṇas. The act underscores the dharmic ideal that even amid the pressures of war and pilgrimage, one should honor sacred duty through proper generosity to worthy recipients.

Verse 86

मुक्त: कथं चास्य शिरो लग्नं केन च हेतुना । जनमेजयने पूछा--ब्रह्मन! उस तीर्थका नाम कपालमोचन कैसे हुआ, जहाँ महामुनि महोदरको छुटकारा मिला था? उनकी जाँघमें वह सिर कैसे और किस कारणसे चिपक गया था?

Janamejaya asked: “O Brahmin, how did that sacred ford come to be called Kapālamocana—the ‘Liberation from the Skull’—where the great sage Mahodara obtained release? And how did that skull become stuck to his thigh, and for what reason did it happen?”

Verse 113

वने विचरतो राजन्नस्थि भिनत्त्वास्फुरत्‌ तदा । वैशम्पायनजीने कहा--नृपश्रेष्ठ! पूर्वकालकी बात है, रघुकुलतिलक महात्मा श्रीरामचन्द्रजीने दण्डकारण्यमें रहते समय जब राक्षसोंके संहारका विचार किया, तब तीखी धारवाले धुरसे जनस्थानमें उस दुरात्मा राक्षसका मस्तक काट दिया। वह कटा हुआ मस्तक उस महान्‌ वनमें ऊपरको उछला और दैवयोगसे वनमें विचरते हुए महोदर मुनिकी जाँधमें जा लगा। नरेश्वर! उस समय उनकी हड्डी छेदकर वह भीतरतक घुस गया

Vaiśampāyana said: “O king, as he was roaming in the forest, it then struck—splitting the bone. (In the remembered tale: when the noble Rāma, dwelling in Daṇḍakāraṇya and intent on destroying the rākṣasas, cut off the head of a wicked rākṣasa at Jana-sthāna with a sharp-edged weapon, that severed head sprang upward in the great forest and, by the turn of fate, hit the thigh of the sage Mahodara who was wandering there, piercing through the bone and driving in.)”

Verse 126

अभिगन्तुं महाप्राज्ञस्तीर्थान्यायतनानि च । उस मस्तकके चिपक जानेसे वे महाबुद्धिमान्‌ ब्राह्मण किसी तीर्थ या देवालयमें सुगमतापूर्वक आ-जा नहीं सकते थे

Vaiśampāyana said: Because it had stuck fast upon his head, that highly intelligent brāhmaṇa could no longer go with ease to sacred fords (tīrthas) or to holy shrines. Thus, a seemingly small physical affliction became an obstacle to religious movement and observance, showing how bodily constraint can impede one’s customary dharmic routines.

Verse 336

पृथूदके जप्यपरो नैनं श्वोमरणं तपेत्‌ । “जो सरस्वतीके उत्तर तटपर पृथूदकतीर्थमें जप करते हुए अपने शरीरका परित्याग करता है, उसे भविष्यमें पुन: मृत्युका कष्ट नहीं भोगना पड़ता”

Vaiśampāyana said: One who, intent on japa, relinquishes the body at the sacred ford called Pṛthūdaka on the northern bank of the Sarasvatī is not thereafter afflicted by the suffering of death again. The passage upholds the Mahābhārata’s ethic that disciplined devotion at a consecrated tīrtha, joined with conscious renunciation, is held to yield liberation from repeated mortality.

Verse 1663

सर्वपापप्रशमन सिद्धिक्षेत्रमनुत्तमम्‌ । विप्रवर! उन्होंने मुनियोंके मुखसे यह महत्त्वपूर्ण बात सुनी कि “सरस्वतीका श्रेष्ठ तीर्थ जो औशनस नामसे विख्यात है, सम्पूर्ण पापोंको नष्ट करनेवाला तथा परम उत्तम सिक्िकक्षेत्र है'

毗舍波耶那说道:“噢,最上之婆罗门!他们从诸牟尼之口听闻这一沉重的真理:‘在萨拉斯瓦蒂河上,有一处最胜的圣渡口(tīrtha),以“奥舍那萨”(Auśanasa)之名著称。它能灭尽一切罪垢,并且是成就灵验(siddhi)的无上道场。’”

Verse 3436

दत्त्वा चैव बहून्‌ दायान्‌ विप्राणां विप्रवत्सल: । धर्मात्मा विप्रवत्सल हलधर बलरामजीने उस तीर्थमें स्नान करके ब्राह्मणोंको बहुत धनका दान किया

毗舍波耶那说道:“他敬爱婆罗门,心系法(dharma)。执犁者巴拉罗摩在那处圣地(tīrtha)沐浴之后,向婆罗门们施与了大量财物。”

Frequently Asked Questions

The chapter frames a conflict between external authority (royal power, inherited status) and internal authority (earned spiritual legitimacy): it asks what truly grounds social-spiritual rank and effective protection—force or disciplined merit.

Sustained self-regulation (niyama), austerity (tapas), and clarity of purpose are portrayed as capable of reconstituting identity and capability, even when conventional routes (formal study or kingship) appear insufficient.

Yes. Ārṣṭiṣeṇa’s proclamations function as an embedded phalaśruti: bathing at the tīrtha is said to yield abundant merit akin to an aśvamedha, reduce fear from wild creatures, and grant large results even with limited effort.