Adhyaya 32
Shalya ParvaAdhyaya 3282 Versesसमर का प्रवाह सामूहिक रण से हटकर निर्णायक, नियमबद्ध गदा-द्वंद्व की ओर मुड़ता है।

Adhyaya 32

Bhīma–Duryodhana Gadāyuddha Saṃkalpa (Resolve for the Mace Duel)

Upa-parva: Gadāyuddha-prastāva (Prelude to the Mace Duel)

Saṃjaya reports Duryodhana’s repeated roaring challenge. Vāsudeva Kṛṣṇa, angered on Yudhiṣṭhira’s behalf, criticizes the proposal that Yudhiṣṭhira might accept single combat to become king by killing only one opponent, characterizing it as a hazardous repetition of the earlier ‘uneven wager’ logic associated with dice-play. Kṛṣṇa assesses Duryodhana as exceptionally trained (kṛtī) in mace-fighting and doubts that Arjuna, Yudhiṣṭhira, or the Mādrī sons can match him in that weapon-domain; he warns that facing Duryodhana ‘by the rules’ introduces uncertainty. Bhīma responds by dispelling despondency, asserting superior equipment and confidence, and declaring his intent to end the enmity decisively. Kṛṣṇa then affirms Bhīma’s prior battlefield achievements and frames the duel as both strategic necessity and vow-fulfillment, advising sustained effort against a capable opponent. Bhīma addresses Yudhiṣṭhira, publicly reiterates grievances (Vāraṇāvata, the dice-hall episode, losses of elders and allies), and challenges Duryodhana directly. Duryodhana replies with counter-boasting, asserting readiness and superiority in gadā-yuddha. The allied forces respond with acclamation; the battlefield soundscape (drums, elephants, horses) marks formal escalation into the duel.

Chapter Arc: युधिष्ठिर की वाणी—राजधर्म की मर्यादा और युद्ध-न्याय की कसौटी—तालाब में छिपे दुर्योधन को ललकारती है: बाहर आओ, और किसी एक पाण्डव के साथ गदायुद्ध स्वीकार करो। → राजभाव से पूजित दुर्योधन पहली बार ऐसी कठोर फटकार सुनता है; उसका अभिमान आहत होता है—जिसके सिर पर छत्र की छाया रही, वह अब कटु वचन कैसे सहे? भीतर-भीतर प्रतिशोध की ज्वाला भड़कती है, और वह शर्तें व विकल्प रखता है कि पाण्डवों में से कोई भी एक उसके साथ गदा लेकर उतरे। → अन्तर्जल से वह नागेन्द्र-सा निःश्वास छोड़ता हुआ उभरता है—स्वर्णाभूषित अंगद, लोहे की भारी गदा हाथ में—और पंचाल-पाण्डव उसे देखकर हर्ष से तालियाँ बजाते हैं; दुर्योधन उसी क्षण उपहास का प्रतिफल चुकाने की प्रतिज्ञा करता है और यमलोक भेजने की धमकी देता है। → दुर्योधन औपचारिक रूप से गदायुद्ध के लिए प्रस्तुत होता है, गदा को अपना चुना हुआ आयुध घोषित करता है, और पाण्डव-पक्ष से किसी एक योद्धा को सामने आने की चुनौती देता है—युद्ध अब नियमबद्ध द्वंद्व की देहरी पर आ खड़ा होता है। → कौन उतरेगा—भीम, अर्जुन, या कोई अन्य—और क्या यह द्वंद्व धर्म-नियमों के भीतर रह पाएगा?

Shlokas

Verse 1

न२्चक्स्स्त्तािस्सि (9) £:-.१/०्ट द्वात्रिशोड्थ्याय: युधिष्ठिरके कहनेसे दुर्योधनका तालाबसे बाहर होकर किसी एक पाण्डवके साथ गदायुद्धके लिये तैयार होना धृतराष्ट्र रवाच एवं संतर्ज्यमानस्तु मम पुत्रो महीपति: । प्रकृत्या मन्युमान्‌ वीर: कथमासीत्‌ परंतप:,धृतराष्ट्रने पूछा--संजय! शत्रुओंको संताप देनेवाला मेरा वीर पुत्र राजा दुर्योधन स्वभावसे ही क्रोधी था। जब युधिष्ठिरने उसे इस प्रकार फटकारा, तब उसकी कैसी दशा हुई?

持国王说道:“三阇耶!当我的儿子——那位国王——如此被斥责、被激怒时,那位天性易怒、焚灼敌人的勇士难敌(Duryodhana)作何反应?在尤提士提罗锋利的话语之后,他的心境落入何等境地?”

Verse 2

न हि संतर्जना तेन श्रुतपूर्वा कथठ्चन । राजभावेन मान्यश्व सर्वलोकस्य सो5भवत्‌,उसने पहले कभी किसी तरह ऐसी फटकार नहीं सुनी थी; क्योंकि राजा होनेके कारण वह सब लोगोंके सम्मानका पात्र था

他从未以任何方式听过这样的斥责;因为凭借王者之位,他一向是举世所敬、被视为当受尊荣之人。

Verse 3

यस्यातपत्रच्छायापि स्वका भानोस्तथा प्रभा । खेदायैवाभिमानित्वात्‌ सहेत्‌ सैवं कथं गिर:

由提施提罗说道:“有一人,连他王伞的荫影都如太阳之光般辉耀;却因傲慢,把这份光辉反倒化作烦忧之因——这样的人,怎能忍受这般言辞?”

Verse 4

अभिमानी होनेके कारण जिसके मनमें अपने छत्रकी छाया और सूर्यकी प्रभा भी खेद ही उत्पन्न करती थी, वह ऐसी कठोर बातें कैसे सह सकता था? ।। इयं च पृथिवी सर्वा सम्लेच्छाटविका भृशम्‌ | प्रसादाद्‌ प्रियते यस्य प्रत्यक्ष तव संजय,संजय! तुमने तो प्रत्यक्ष ही देखा था कि म्लेच्छों तथा जंगली जातियोंसहित यह सारी पृथ्वी दुर्योधनकी कृपासे ही जीवन धारण करती थी

由提施提罗说道:“而这整个大地——挤满了弥勒叉人以及居林的诸部族——也曾凭那人的恩泽而得以维系、井然有序;他的威势,你亲眼所见,三阇耶。如此骄矜之人,连自家王伞之荫与日光之辉都觉沉重,又怎能忍受这般严酷之言?”

Verse 5

स तथा तर्ज्यमानस्तु पाण्डुपुत्रैर्विशेषत: । विहीनश् स्वकैर्भुत्यर्निर्जने चावृतो भूशम्‌

于是,他被严厉斥责——尤其出自般度诸子——竟发现自己失却了随从,在荒寂之处四面受困。

Verse 6

स श्रुत्वा कटुका वाचो जययुक्ता: पुनः पुनः । किमब्रवीत्‌ पाण्डवेयांस्तन्ममाचक्ष्व संजय

听到那一遍又一遍、夹带胜利夸言的刻薄之语后,由提施提罗问道:“他对般度诸子说了什么?三阇耶,把那事告诉我。”

Verse 7

इस समय वह अपने सेवकोंसे हीन हो चुका था और एकान्त स्थानमें घिर गया था। उस दशामें विशेषत: पाण्डवोंने जब उसे वैसी कड़ी फटकार सुनायी, तब शत्रुओंके विजयसे युक्त उन कटुवचनोंको बारंबार सुनकर दुर्योधनने पाण्डवोंसे क्या कहा? यह मुझे बताओ ।। संजय उवाच तर्ज्यमानस्तदा राजन्नुदकस्थस्तवात्मज: । युधिष्ठिरेण राजेन्द्र भ्रातृभि: सहितेन ह

三阇耶说道:“大王啊,那时你的儿子立于水中,正遭严厉呵斥。诸王之主啊,他被由提施提罗与其诸弟一同责难。”

Verse 8

श्रुत्वा स कटुका वाचो विषमस्थो नराधिप: । दीर्घमुष्णं च नि:श्वस्य सलिलस्थ: पुन: पुन:

三阇耶说道:听到那些刻薄的言辞,国王——陷入险恶的困境——一次又一次地长长吐出灼热的叹息,仿佛沉没水中,被水势压迫,挣扎着要稳住自身。

Verse 9

सलिलान्तर्गतो राजा धुन्वन्‌ हस्तौ पुनः पुन: । मनश्लकार युद्धाय राजानं चाभ्यभाषत

三阇耶说道:那国王浸在水中,反复抖动双手,收摄心神以备战斗;随后也对另一位国王开口,召他前来交战,决意再起。

Verse 10

संजयने कहा--राजाधिराज! राजन! उस समय भाइयोंसहित युधिष्ठिरने जब इस प्रकार फटकारा, तब जलमें खड़े हुए आपके पुत्रने उन कठोर वचनोंको सुनकर गरम-गरम लंबी साँस छोड़ी। राजा दुर्योधन विषम परिस्थितिमें पड़ गया था और पानीमें स्थित था; इसलिये बारंबार उच्छवास लेता रहा। उसने जलके भीतर ही अनेक बार दोनों हाथ हिलाकर मन-ही-मन युद्धका निश्चय किया और राजा युधिष्ठिरसे इस प्रकार कहा-- ।। ७ “7१ || यूयं ससुह्ृद: पार्था: सर्वे सरथवाहना: । अहमेकः: परिद्यूनो विरथो हतवाहनः,“तुम सभी पाण्डव अपने हितैषी मित्रोंको साथ लेकर आये हो। तुम्हारे रथ और वाहन भी मौजूद हैं। मैं अकेला थका-माँदा, रथहीन और वाहनशाून्य हूँ

三阇耶说道:大帝啊,国王啊!当与诸弟同在的坚战如此呵斥之时,你的儿子立于水中,听见那严厉之语,便一再吐出灼热而悠长的气息。都利耶陀那王陷入危急之境,又身在水里,因此屡屡长叹。就在水中,他多次挥动双手,心中决意一战,遂对坚战王说道:“你们般度五子携善意盟友而来,人人具备战车与坐骑;唯我一人疲惫不堪,无车可乘,坐骑与车乘皆已毁坏。”

Verse 11

आत्तशस्त्रै रथोपेतैर्बहुभि: परिवारित: । कथमेकः पदातिः सन्नशस्त्रो योद्धुमुत्सहे,“तुम्हारी संख्या अधिक है। तुमने रथपर बैठकर नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लेकर मुझे घेर रखा है। फिर तुम्हारे साथ मैं अकेला पैदल और अस्त्र-शस्त्रोंसे रहित होकर कैसे युद्ध कर सकता हूँ?

“你们人数众多,执持兵刃,乘坐战车,又以多人将我围困。我独自一人,徒步而无兵器,怎能还敢应战?”

Verse 12

एकैकेन तु मां यूयं योधयध्वं युधिष्ठिर । न होको बहुभिववीरिर्याय्यो योधयितुं युधि,'युधिष्ठि! तुमलोग एक-एक करके मुझसे युद्ध करो। युद्धमें बहुत-से वीरोंके साथ किसी एकको लड़नेके लिये विवश करना न्यायोचित नहीं है

三阇耶说道:“坚战啊,你们当与我一一相斗。战阵之中,逼一名战士同时对抗众多英雄,并非公正之举。”

Verse 13

विशेषतो विकवच: श्रान्तश्षापत्समाश्रित: । भृशं विक्षतगात्रश्न श्रानन्‍्लवाहनसैनिक:,“विशेषतः उस दशामें जिसके शरीरपर कवच नहीं हो, जो थका-माँदा, आपत्तिमें पड़ा और अत्यन्त घायल हो तथा जिसके वाहन और सैनिक भी थक गये हों, उसे युद्धके लिये विवश करना न्यायसंगत नहीं है

尤其是,那些身无甲胄、疲惫不堪、陷于危难、遍体重创,连车乘与士卒也都困乏的人,强迫其再赴战阵,实非公正。

Verse 14

न मे त्वत्तो भयं राजन्‌ न च पार्थाद्‌ वकोदरात्‌ । फाल्गुनाद्‌ वासुदेवाद्‌ वा पञज्चालेभ्यो5थवा पुन:,राजन! मुझे न तो तुमसे, न कुन्तीके बेटे भीमसेनसे, न अर्जुनसे, न श्रीकृष्णसे अथवा पांचालोंसे ही कोई भय है। नकुल-सहदेव, सात्यकि तथा अन्य जो-जो तुम्हारे सैनिक हैं उनसे भी मैं नहीं डरता। युद्धमें क्रोधपूर्वक स्थित होनेपर मैं अकेला ही तुम सब लोगोंको आगे बढ़नेसे रोक दूँगा

三阇耶说道:“大王啊,我不惧你;也不惧帕尔塔之子弗利科达罗(毗摩);不惧法尔古那(阿周那);不惧婆苏提婆(奎师那);亦不惧般遮罗诸军。”

Verse 15

यमाभ्यां युयुधानाद्‌ वा ये चान्ये तव सैनिका: । एक: सर्वानहं क्रुद्धो वारयिष्ये युधि स्थित:,राजन! मुझे न तो तुमसे, न कुन्तीके बेटे भीमसेनसे, न अर्जुनसे, न श्रीकृष्णसे अथवा पांचालोंसे ही कोई भय है। नकुल-सहदेव, सात्यकि तथा अन्य जो-जो तुम्हारे सैनिक हैं उनसे भी मैं नहीं डरता। युद्धमें क्रोधपूर्वक स्थित होनेपर मैं अकेला ही तुम सब लोगोंको आगे बढ़नेसे रोक दूँगा

无论是摩德利的双子,还是优优陀那(萨提亚基),抑或你军中任何别的勇士——我若在阵中立定,怒火炽然,便将独自阻住他们所有人,不许前进。

Verse 16

धर्ममूला सतां कीर्तिर्मिनुष्याणां जनाधिप । धर्म चैवेह कीर्ति च पालयन्‌ प्रबवीम्पहम्‌,“नरेश्वर! साधु पुरुषोंकी कीर्तिका मूल कारण धर्म ही है। मैं यहाँ उस धर्म और कीर्तिका पालन करता हुआ ही यह बात कह रहा हूँ

三阇耶说道:“人中之主啊,善人之名声以达摩为根。正是为了在此世护持达摩、守全令名,我才说出这些话。”

Verse 17

अहमुत्थाय सर्वान्‌ वै प्रतियोत्स्यामि संयुगे । अनुगम्यागतान्‌ सवनितून्‌ संवत्सरो यथा,“मैं उठकर रणभूमिमें एक-एक करके आये हुए तुम सब लोगोंके साथ युद्ध करूँगा, ठीक उसी तरह, जैसे संवत्सर बारी-बारीसे आये हुए सम्पूर्ण ऋतुओंको ग्रहण करता है

三阇耶说道:“我将起身,在战场上迎击你们所有人——你们谁按次第上前,我便逐一应战——正如一年依其序次,接纳并包容诸季节的到来。”

Verse 18

अद्य वः सरथान्‌ साथ्वानशस्त्रो विरथोडपि सन्‌ | नक्षत्राणीव सर्वाणि सविता रात्रिसंक्षये

桑阇耶说道:“今日,即便你们无战车,即便你们无兵刃,即便你们只是步卒而立,你们仍将光耀夺目,压过并遮没他们所有人——正如长夜将尽之时,太阳升起,使群星尽皆黯淡。”

Verse 19

अद्यानण्यं गमिष्यामि क्षत्रियाणां यशस्विनाम्‌,एतावदुकक्‍्त्वा वचनं विरराम जनाधिप: । “भरतश्रेष्ठ) आज मैं भाइयोंसहित तुम्हारा वध करके उन यशस्वी क्षत्रियोंक ऋणसे उऋण हो जाऊँगा। बाह्लीक, द्रोण, भीष्म, महामना कर्ण, शूरवीर जयद्रथ, भगदत्त, मद्रराजशल्य, भूरिश्रवा, सुबलकुमार शकुनि तथा पुत्रों, मित्रों, सुहृदों एवं बन्धु-बान्धवोंके ऋणसे भी उऋण हो जाऊँगा।” राजा दुर्योधन इतना कहकर चुप हो गया

桑阇耶说道:“今日我将赴往他世,因为我已偿清对那些显赫刹帝利的债。”说到这里,人中之主便沉默了。

Verse 20

बाह्लीकद्रोणभीष्माणां कर्णस्य च महात्मन: । जयद्रथस्य शूरस्य भगदत्तस्य चोभयो:

桑阇耶说道:“(他提及)婆诃利迦、德罗那与毗湿摩;又提及大魂的迦尔那;英勇的阇耶陀罗他;以及婆伽达多——两军之中最卓绝的战士。”

Verse 21

मद्रराजस्य शल्यस्य भूरिश्रवस एव च | पुत्राणां भरतश्रेष्ठ शकुने: सौबलस्य च

桑阇耶说道:“婆罗多族中最卓越者啊,(他又提及)摩陀罗王沙利耶之子们,也提及布利湿罗婆娑,并提及苏婆罗之子沙昆尼的诸子。”

Verse 22

मित्राणां सुह्ृदां चैव बान्धवानां तथैव च । आनृण्यमद्य गच्छामि हत्वा त्वां भ्रातृभि: सह

桑阇耶说道:“今日我将摆脱对朋友、善意之人以及亲族的债——以诛杀你,并连同你的兄弟们一并诛杀。”

Verse 23

युधिछिर उवाच दिष्ट्या त्वमपि जानीषे क्षत्रधर्म सुयोधन

坚战(Yudhiṣṭhira)说道:“幸甚,你也明白刹帝利之法,哦,苏由檀那(Suyodhana)。”

Verse 24

दिष्ट्या ते वर्तते बुद्धिर्युद्धायैव महाभुज । दिष्ट्या शूरोडसि कौरव्य दिष्ट्या जानासि संगरम्‌

坚战说道:“幸甚,臂力雄伟者,你的心志全然系于战斗。幸甚,俱卢后裔,你是勇士;幸甚,你明了交锋之道。”

Verse 25

युधिष्ठिर बोले--सुयोधन! सौभाग्यकी बात है कि तुम भी क्षत्रिय-धर्मको जानते हो। महाबाहो! यह जानकर प्रसन्नता हुई कि अभी तुम्हारा विचार युद्ध करनेका ही है। कुरुनन्दन! तुम शूरवीर हो और युद्ध करना जानते हो--यह हर्ष और सौभाग्यकी बात है ।। यस्त्वमेको हि नः सर्वान्‌ संगरे योद्धुमिच्छसि । एक एकेन संगम्य यत्‌ ते सम्मतमायुधम्‌

坚战说道:“苏由檀那!幸甚,你也知晓刹帝利之法。臂力雄伟者,我欣然得知,你的心念仍只在求战。俱卢之裔,你是勇士,亦通晓战斗——此乃可喜可庆之事。既然你孤身一人,竟欲在战场上与我等众人交锋,那么便一一相会、逐个对决;你可择取你认为合宜的兵器。”

Verse 26

स्वयमिष्टं च ते काम॑ वीर भूयो ददाम्यहम्‌

坚战说道:“并且,勇士啊,我再一次赐予你你自己所求的恩许。”

Verse 27

दुर्योधन उवाच एकश्चेद्‌ योद्धुमाक्रन्दे शूरोडद्य मम दीयताम्‌

难敌(Duryodhana)说道:“若有哪怕一位勇士愿在这呼号震天的混战中与我交锋,就在今日把他赐给我吧。”

Verse 28

हन्तैक॑ भवतामेक: शक्‍यं मां योडभिमन्यते

杜尤陀那说道:“来吧——你们之中只要有一人,自认有能耐的,就上前来与我对阵!”在战火炽烈之际,他向敌方勇士发出单挑之约,以傲然的自信与挑衅,作为对力量与荣誉的试炼;而战争的约束正一寸寸崩塌。

Verse 29

पदातिर्गदया संख्ये स युध्यतु मया सह | मैं हर्षक साथ कह रहा हूँ कि 'तुममेंसे कोई भी एक वीर जो मुझ अकेलेको जीत सकनेका अभिमान रखता हो, वह रणभूमिमें पैदल ही गदाद्वारा मेरे साथ युद्ध करे' ।। वृत्तानि रथयुद्धानि विचित्राणि पदे पदे

杜尤陀那说道:“让他与我交战——下马步战,以钉头槌相搏。我满怀自信地宣告:你们之中哪位英雄自负能独自胜我,就踏入战场,与我同样步战执槌相斗。战车对决已然走到尽头;每一步之间,这场争斗都转出诡异的变局。”

Verse 30

|| अस्त्राणामपि पर्यायं कर्तुमिच्छन्ति मानवा:

杜尤陀那说道:“即便手握兵刃,人也总想换一回合——要扭转局势,夺回优势。”在战争的伦理阴影下,这句话点出人心的不安:宁肯用尽手段翻转命运,也不愿承担责任与后果。

Verse 31

इस प्रकार श्रीमह्याभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापवरमें दुर्योधन-युधिष्ठिरसंवादविषयक इकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ,गदया त्वां महाबाहो विजेष्यामि सहानुजम्‌ महाबाहो! मैं गदाके द्वारा भाइयोंसहित तुमको, पांचालों और सूंजयोंको तथा जो तुम्हारे दूसरे सैनिक हैं, उनको भी जीत लूँगा। युधिष्ठिर! मुझे इन्द्रसे भी कभी घबराहट नहीं होती

杜尤陀那以被傲慢灌醉的武人姿态,对坚战王(尤提士提罗)宣称:“大臂者啊,我将以此钉头槌击败你与诸弟。凭这钉头槌,我也要征服般遮罗人、斯林阇耶人,以及一切站在你一边的军队。尤提士提罗,我从不知惧——纵是因陀罗亦然。”此言将决斗塑成的并非依循达摩的衡量之战,而是夸示霸权的狂言,显露出傲慢与对正当节制的蔑视,如何驱动战争走向最后的暴烈。

Verse 32

पज्चालान्‌ सृञ्जयांश्वैव चे चान्ये तव सैनिका: । न हि मे सम्भ्रमो जातु शक्रादपि युधिष्ठिर,महाबाहो! मैं गदाके द्वारा भाइयोंसहित तुमको, पांचालों और सूंजयोंको तथा जो तुम्हारे दूसरे सैनिक हैं, उनको भी जीत लूँगा। युधिष्ठिर! मुझे इन्द्रसे भी कभी घबराहट नहीं होती इति श्रीमहा भारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि युधिष्ठिरदुर्योधनसंवादे द्वात्रिंशो 5ध्याय: ।। ३२ ।। इस प्रकार श्रीमह्याभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें युधिष्ठिर और दुर्योधनका संवादविषयक बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

杜尤陀那说道:“般遮罗人、斯林阇耶人,以及你所有其他军队——我将以钉头槌尽数击败他们,也击败你与诸弟。尤提士提罗,大臂者啊,我从不知惧——不,纵是释迦罗(因陀罗)本人亦然。”

Verse 33

युधिछ्िर उवाच उत्तिषोत्तिष्ठ गान्धारे मां योधय सुयोधन । एक एकेन संगम्य संयुगे गदया बली,युधिष्ठिर बोले--गान्धारीनन्दन! सुयोधन! उठो-उठो और मेरे साथ युद्ध करो। बलवान तो तुम हो ही। युद्धमें गदाके द्वारा अकेले किसी एक वीरके साथ ही भिड़कर अपने पुरुषत्वका परिचय दो। एकाग्रचित्त होकर युद्ध करो। यदि इन्द्र भी तुम्हारे आश्रयदाता हो जायाँ तो भी आज तुम्हारे प्राण नहीं बच सकते

坚战(Yudhiṣṭhira)说道:“起来,起来啊,甘陀利之子——苏由陀那!来与我一战。你确实强壮;因此在此战中,当以钉头槌与一名勇士正面相逢,显出你的男子气概。收摄其心,专注而战。”

Verse 34

पुरुषो भव गान्धारे युध्यस्व सुसमाहित: । अद्य ते जीवितं नास्ति यदीन्द्रोडपि तवाश्रयः,युधिष्ठिर बोले--गान्धारीनन्दन! सुयोधन! उठो-उठो और मेरे साथ युद्ध करो। बलवान तो तुम हो ही। युद्धमें गदाके द्वारा अकेले किसी एक वीरके साथ ही भिड़कर अपने पुरुषत्वका परिचय दो। एकाग्रचित्त होकर युद्ध करो। यदि इन्द्र भी तुम्हारे आश्रयदाता हो जायाँ तो भी आज तुम्हारे प्राण नहीं बच सकते

坚战说道:“做个男子汉吧,甘陀利之子;收摄心神,沉着而战。今日你的性命必不保全——纵使因陀罗亲自作你的庇护者也无济于事。”

Verse 35

संजय उवाच एतत्‌ स नरशार्दूलो नामृष्यत तवात्मज: । सलिलान्तर्गतः श्वभ्रे महानाग इव श्वसन्‌,संजय कहते हैं--राजन्‌! युधिष्ठिरके इस कथनको जलमें स्थित हुआ आपका पुत्र पुरुषसिंह दुर्योधन नहीं सह सका। वह बिलमें बैठे हुए विशाल सर्पके समान लंबी साँस खींचने लगा

三阇耶说道:大王啊,你的儿子杜罗约陀那——人中之虎——忍受不了这些话。他藏身于水中的坑穴里,长长地、沉沉地喘息着,宛如盘踞巢穴的大蛇。

Verse 36

तथासौ वाक्प्रतोदेन तुद्यमान: पुनः पुनः । वचो न ममृषे राजन्नुत्तमाश्वचः कशामिव,राजन! जैसे अच्छा घोड़ा कोड़ेकी मार नहीं सह सकता है, उसी प्रकार वचनरूपी चाबुकसे बार-बार पीड़ित किया जाता हुआ दुर्योधन युधिष्ठिरकी उस बातको सहन न कर सका

三阇耶说道:大王啊,他一次又一次被言语之鞭所刺痛,终于忍受不了那番话——正如良马难堪鞭挞一般。

Verse 37

संक्षो भ्य सलिलं वेगाद्‌ गदामादाय वीर्यवान्‌ | अद्विसारमयीं गुर्वीं काड्चनाड्रद भूषणाम्‌

三阇耶说道:他猛然发力,激荡水面,搅起浪涌;那强悍的战士抓起自己的钉头槌——沉重无比,以坚不可屈的金属铸成,并饰以金制臂钏——为惨烈的战事整装待发。

Verse 38

स भिवत्त्वा स्तम्भितं तोयं स्कन्‍्धे कृत्वा5ड5यसीं गदाम्‌

三阇耶说道:他先行礼致敬,随即稳住身心,将铁制大槌扛在肩上,以克制而坚定的意志向前迈进。这一刻凸显了武士的纪律:纵在杀伐之中,行动亦以礼敬与自制为其框架。

Verse 39

ततः शैक्यायसीं गुर्वी जातरूपपरिष्कृताम्‌

三阇耶说道:随后显现出一件沉重的铁制兵器,精心锻造,并以黄金装饰——这是战争冷峻工艺的写照:毁灭之力在外表上被铸成华丽。

Verse 40

गदाहस्तं तु तं दृष्टवा सशृुदड्भमिव पर्वतम्‌

三阇耶说道:见他手执大槌——如同群峰簇拥的高山——诸战士望见一尊可怖而不可撼动的强力之象,正是战争残酷升级的标记:此刻由力量与决意主宰一切。

Verse 41

प्रजानामिव संक़्रुद्धं शूलपाणिमिव स्थितम्‌ । हाथमें गदा लिये हुए दुर्योधनको पाण्डवोंने इस प्रकार देखा, मानो कोई शुंगयुक्त पर्वत हो अथवा प्रजापर कुपित होकर हाथमें त्रिशूल लिये हुए रुद्रदेव खड़े हों ।। सगदो भारतो भाति प्रतपन्‌ भास्करो यथा,वह गदाधारी भरतवंशी वीर तपते हुए सूर्यके समान प्रकाशित हो रहा था। शत्रुओंका दमन करनेवाले महाबाहु दुर्योधनको हाथमें गदा लिये जलसे निकला हुआ देख समस्त प्राणी ऐसा मानने लगे, मानो दण्डधारी यमराज प्रकट हो गये हों

三阇耶说道:般度诸子看见杜律约陀那手执大槌而立——仿佛鲁陀罗为众生而怒,持三叉戟伫立;又如一座生角之山突起在他们面前。那位婆罗多族的英雄,执槌而耀,光辉如炽日。见这位臂力雄伟、摧伏仇敌的杜律约陀那携兵器自水中而出,万类众生都觉得仿佛执罚杖的阎摩已然显现——这是战争道德幽暗中无情毁灭的凶兆。

Verse 42

तमुत्तीर्ण महाबाहुं गदाहस्तमरिंदमम्‌ | मेनिरे सर्वभूतानि दण्डपाणिमिवान्तकम्‌,वह गदाधारी भरतवंशी वीर तपते हुए सूर्यके समान प्रकाशित हो रहा था। शत्रुओंका दमन करनेवाले महाबाहु दुर्योधनको हाथमें गदा लिये जलसे निकला हुआ देख समस्त प्राणी ऐसा मानने लगे, मानो दण्डधारी यमराज प्रकट हो गये हों

三阇耶说道:当那位臂力雄伟的英雄(自水中)登出,手执大槌、摧敌如碎时,万类众生都以为他如同手持罚杖的阎摩——死之主——现身于世。此景更添战争的道德张力:一名战士的愤怒与决意,便足以将恐惧的阴影投向人间,使暴力呈现出宇宙报应般令人敬畏的形貌。

Verse 43

वज्हस्तं यथा शक्रं शूलहस्तं यथा हरम्‌ । ददृशु: सर्वपञ्चाला: पुत्रं तव जनाधिप,नरेश्वर! सम्पूर्ण पांचालोंने आपके पुत्रको वज्रधारी इन्द्र और त्रिशूलधारी रुद्रके समान देखा

三阇耶说道:“噢,人中之主,噢,大王——众般遮罗人都看见你的儿子,宛如执金刚雷霆的释迦罗(因陀罗),又宛如执三叉戟的诃罗(鲁陀罗/湿婆)。”

Verse 44

तमुत्तीर्ण तु सम्प्रेक्ष्य समहृष्यन्त सर्वश: । पज्चाला: पाण्डवेयाश्व तेडन्योन्यस्य तलान्‌ ददुः,उसे जलसे बाहर निकला देख समस्त पांचाल और पाण्डव हर्षसे खिल उठे और एक- दूसरेसे हाथ मिलाने लगे

三阇耶说道:见他安然脱出,众般遮罗人与般度诸子尽皆欢欣,彼此道贺,相互执手以庆。

Verse 45

अवहासं तु त॑ मत्वा पुत्रो दुर्योधनस्तव । उद्वृत्य नयने क्रुद्धों दिधक्षुरिव पाण्डवान्‌,महाराज! उनके इस हाथ मिलानेको दुर्योधनने अपना उपहास समझा; अतः क्रोधपूर्वक आँखें घुमाकर पाण्डवोंकी ओर इस प्रकार देखा, मानो उन्हें जलाकर भस्म कर देना चाहता हो

三阇耶说道:将那举动当作讥诮,你的儿子难敌(杜尔约陀那)怒火中烧,转动双目,凝视般度诸子,噢大王,仿佛要将他们焚成灰烬。

Verse 46

त्रिशिखां भ्रुकुटीं कृत्वा संदष्टदशनच्छद: । प्रत्युवाच ततस्तान्‌ वै पाण्डवान्‌ सह केशवान्‌,उसने अपनी भौंहोंको तीन जगहसे टेढ़ी करके दाँतोंसे ओठको दबाया और श्रीकृष्णसहित पाण्डवोंसे इस प्रकार कहा

三阇耶说道:他将眉间拧作三重怒纹,紧咬双唇、牙关紧闭,随即对般度诸子答言——其时凯沙瓦(奎师那)与他们同在。

Verse 47

दुर्योधन उवाच अस्यावहासस्य फल प्रतिभोक्ष्यथ पाण्डवा: । गमिष्यथ हता: सद्यः: सपञ्चाला यमक्षयम्‌,दुर्योधन बोला--पांचालो और पाण्डवो! इस उपहासका फल तुम्हें अभी भोगना पड़ेगा; मेरे हाथसे मारे जाकर तुम तत्काल यमलोकमें पहुँच जाओगे

难敌(杜尔约陀那)说道:“般度诸子啊,你们如今当受此讥诮之果。立时被杀,你们——连同般遮罗人——都将前往阎摩之所。”

Verse 48

संजय उवाच उत्थितश्न जलात्‌ तस्मात्‌ पुत्रो दुर्योधनस्तव । अतिष्ठत गदापाणी रुधिरेण समुक्षित:,संजय कहते हैं--राजन्‌! आपका पुत्र दुर्योधन उस जलसे निकलकर हाथमें गदा लिये खड़ा हो गया। वह रक्तसे भीगा हुआ था

三阇耶说道:“大王啊,你的儿子难敌(Duryodhana)从那水中起身沐浴后走了出来,手执钉锤,稳稳站立。他浑身被鲜血浸透,却仍摆出继续鏖战的姿态。”

Verse 49

तस्य शोणितदिग्धस्य सलिलेन समुक्षितम्‌ शरीरं सम तदा भाति ख्रवन्निव मही धर:,उस समय खूनसे लथपथ हुए दुर्योधनका शरीर पानीसे भीगकर जलका स्रोत बहानेवाले पर्वतके समान प्रतीत होता था

三阇耶说道:“那时,难敌的身体先被鲜血涂染,又被水浸透,宛如一座山岳,诸多溪流自其上奔泻而下。”

Verse 50

तमुद्यतगदं वीर मेनिरे तत्र पाण्डवा: | वैवस्वतमिव क्ुद्धं शूलपाणिमिव स्थितम्‌,वहाँ हाथमें गदा उठाये हुए वीर दुर्योधनको पाण्डवोंने क्रोधमें भरे हुए यमराज तथा हाथमें त्रिशूल लेकर खड़े हुए रुद्रके समान समझा

三阇耶说道:“在那里,般度诸子见那英雄难敌高举钉锤,便以为他如同暴怒的阎摩——日神毗婆斯梵之子——又如同手执三叉戟而立的鲁陀罗。”

Verse 51

स मेघनिनदो हर्षन्नर्दन्निव च गोवृष: । आजुहाव ततः: पार्थान्‌ गदया युधि वीर्यवान्‌,उस पराक्रमी वीरने हँकड़ते हुए साँड़के समान मेघके तुल्य गम्भीर गर्जना करते हुए बड़े हर्षके साथ गदायुद्धके लिये पाण्डवोंको ललकारा

三阇耶说道:“那位骁勇之士欣然振奋,咆哮如雄牛,声沉若云雷;随即在战场上以钉锤之战,向般度诸王子发出挑战。”

Verse 52

दुर्योधन उवाच एकैकेन च मां यूयामासीदत युधिष्छिर । न होको बहुभिन्याय्यो वीरो योधयितुं युधि,दुर्योधन बोला--युधिष्ठिर! तुमलोग एक-एक करके मेरे साथ युद्धके लिये आते जाओ। रणभूमिमें किसी एक वीरको बहुसंख्यक वीरोंके साथ युद्धके लिये विवश करना न्यायसंगत नहीं है

难敌说道:“坚战(Yudhiṣṭhira)啊,你们当一人一人地前来与我交战。战场之上,逼一名勇士与众多勇士相斗,并非公正之道。”

Verse 53

न्यस्तवर्मा विशेषेण श्रान्तश्नाप्सु परिप्लुत: । भृशं विक्षतगात्रश्न हतवाहनसैनिक:,विशेषतः उस वीरको जिसने अपना कवच उतार दिया हो, जो थककर जलमें गोता लगाकर विश्राम कर रहा हो, जिसके सारे अंग अत्यन्त घायल हो गये हों तथा जिसके वाहन और सैनिक मार डाले गये हों, किसी समूहके साथ युद्धके लिये बाध्य करना कदापि उचित नहीं है

杜尤陀那说道:“绝不可——尤其不可结队逼战——去强迫那已卸下铠甲、疲惫不堪而浸入水中以求喘息复力、四肢重创,并且战车(或坐骑)与随从兵士皆已被杀之人再入战阵。”

Verse 54

अवश्यमेव योद्धव्यं सर्वरेव मया सह । युक्त त्वयुक्तमित्येतद्‌ वेत्सि त्वं चैव सर्वदा,मुझे तो तुम सब लोगोंके साथ अवश्य युद्ध करना है; परंतु इसमें क्या उचित है और क्या अनुचित; इसे तुम सदा अच्छी तरह जानते हो

杜尤陀那说道:“我必须战斗——无可避免——并要你们众人伴我左右。然而此事何为合宜、何为不合宜——你向来洞然明白。”

Verse 55

युधिछिर उवाच मा भूदियं तव प्रज्ञा कथमेवं सुयोधन । यदाभिमन्युं बहवो जघ्नुर्युधि महारथा:,युधिष्ठिने कहा--सुयोधन! जब तुम बहुत-से महारथियोंने मिलकर युद्धमें अभिमन्युको मारा था, उस समय तुम्हारे मनमें ऐसा विचार क्‍यों नहीं उत्पन्न हुआ?

坚战(郁提希提罗)说道:“愿你莫怀此等‘聪明’——你怎能如此言说,苏由陀那?当年众多大车战士在战场上合力击杀阿毗曼纽之时,为何同样的念头不曾在你心中生起?”

Verse 56

क्षत्रधर्म भृशं क्रूरं निरपेक्षं सुनिर्धणम्‌ । अन्यथा तु कथं हन्युरभिमन्युं तथा गतम्‌

坚战说道:“刹帝利之法极其残酷——无怜悯,不顾哀求,毫无慈悲。若非如此,他们又怎能在他那般境地之时杀死阿毗曼纽?”

Verse 57

सर्वे भवन्तो धर्मज्ञा: सर्वे शूरास्तनुत्यज: । वास्तवमें क्षत्रियधर्म बड़ा ही क्रूर, किसीकी भी अपेक्षा न रखनेवाला तथा अत्यन्त निर्दय है; अन्यथा तुम सब लोग धर्मज्ञ, शूरवीर तथा युद्धमें शरीरका विसर्जन करनेको उद्यत रहनेवाले होकर भी उस असहाय-अवस्थामें अभिमन्युका वध कैसे कर सकते थे ।। ५६३ || न्यायेन युध्यतां प्रोक्ता शक्रलोकगति: परा

坚战说道:“你们众人皆知达摩,皆为勇士,甘愿在战场上舍身。然则实情是:刹帝利之法酷烈至极——不欠任何人情,在其要求之中毫无怜悯。若非如此,你们这些知法而英勇、时刻准备捐躯之人,又怎会在他无助之际杀死阿毗曼纽?据说,依正义而战者,其至高归宿乃是释迦罗(因陀罗)之界。”

Verse 58

यद्येकस्तु न हन्तव्यो बहुभिर्धर्म एव तु । तदाभिमन्युं बहवो निजघ्नुस्त्वन्मते कथम्‌,न्यायपूर्वक युद्ध करनेवाले वीरोंके लिये परम उत्तम इन्द्रलोककी प्राप्ति बतलायी गयी है। “बहुत-से योद्धा मिलकर किसी एक वीरको न मारें' यदि यही धर्म है तो तुम्हारी सम्मतिसे अनेक महारथियोंने अभिमन्युका वध कैसे किया?

坚战(Yudhiṣṭhira)说道:“若依达摩之法,多人不应合击斩杀一名战士,那么按你自己的判断,众多斗士又怎会合力杀死阿毗曼纽(Abhimanyu)?你称公正作战的英雄可得至高归宿——因陀罗之界;然而此举却似乎违背了公平交战的根本准则。”

Verse 59

सर्वो विमृशते जन्तुः कृच्छुस्थो धर्मदर्शनम्‌ । पदस्थ: पिद्ठितं द्वारं परलोकस्य पश्यति,प्राय: सभी प्राणी जब स्वयं संकटमें पड़ जाते हैं तो अपनी रक्षाके लिये धर्मशास्त्रकी दुहाई देने लगते हैं और जब अपने उच्च पदपर प्रतिष्ठित होते हैं, उस समय उन्हें परलोकका दरवाजा बंद दिखायी देता है

坚战说道:“众生一旦陷入困厄,便反思并援引达摩之见以求自护;可当人安坐权位、势力既成时,却仿佛看见通往来世之门紧闭——直到危难再临,才想起正义的要求。”

Verse 60

आमुज्च कवचं वीर मूर्थजान्‌ यमयस्व च । यच्चान्यदपि ते नास्ति तदप्यादत्स्व भारत

坚战说道:“卸下你的甲胄吧,勇士;也束起你的发髻。凡你所缺的其他一切,也都取去吧,婆罗多之裔。”

Verse 61

वीर भरतनन्दन! तुम कवच धारण कर लो, अपने केशोंको अच्छी तरह बाँध लो तथा युद्धकी और कोई आवश्यक सामग्री जो तुम्हारे पास न हो, उसे भी ले लो ।। इममेकं च ते काम॑ वीर भूयो ददाम्यहम्‌ । पज्चानां पाण्डवेयानां येन त्वं योद्धुमिच्छसि,वीर! मैं पुनः तुम्हें एक अभीष्ट वर देता हँ--'पाँचों पाण्डवोंमेंसे जिसके साथ युद्ध करना चाहो, उस एकका ही वध कर देनेपर तुम राजा हो सकते हो अथवा यदि स्वयं मारे गये तो स्वर्गलोक प्राप्त कर लोगे। शूरवीर! बताओ, युद्धमें जीवनकी रक्षाके सिवा तुम्हारा और कौन-सा प्रिय कार्य हम कर सकते हैं?

坚战说道:“勇士啊,婆罗多族的荣光,披上你的甲胄,紧束你的发髻,并取齐你尚缺的战阵所需。再者,我还赐你一项恩许:在般度的五子之中,你愿与谁交战——若你只杀那一人,便可为王;若你自己战死,便得升天界。告诉我吧,英勇之士——除护你性命之外,在此战中我们还能为你成就何等你所珍爱的事?”

Verse 62

त॑ हत्वा वै भवान्‌ राजा हतो वा स्वर्गमाप्रुहि । ऋते च जीवितादू वीर युद्धे कि कर्म ते प्रियम्‌,वीर! मैं पुनः तुम्हें एक अभीष्ट वर देता हँ--'पाँचों पाण्डवोंमेंसे जिसके साथ युद्ध करना चाहो, उस एकका ही वध कर देनेपर तुम राजा हो सकते हो अथवा यदि स्वयं मारे गये तो स्वर्गलोक प्राप्त कर लोगे। शूरवीर! बताओ, युद्धमें जीवनकी रक्षाके सिवा तुम्हारा और कौन-सा प्रिय कार्य हम कर सकते हैं?

坚战说道:“若你杀了那一人,便可为王;若你战死,便可升天。勇士啊——除护全性命之外,此战之中还有何事是你所珍爱、要我们为你成就的?”

Verse 63

संजय उवाच ततस्तव सुतो राजन्‌ वर्म जग्राह काउ्चनम्‌ | विचित्र च शिरस्त्राणं जाम्बूनदपरिष्कृतम्‌,संजय कहते हैं--राजन्‌! तदनन्तर आपके पुत्रने सुवर्णमय कवच तथा स्वर्णजटित विचित्र शिरस्त्राण धारण किया

三阇耶说道:“于是,哦大王,你的儿子披上金色胸甲,又戴上奇异的头盔,以精炼的阎浮那陀金华丽装饰。”

Verse 64

सो<वबद्धशिरस्त्राण: शुभकाञ्चनवर्म भृत्‌ । रराज राजन पुत्रस्ते काउ्चन: शैलराडिव,महाराज! शिरस्त्राण बाँधकर सुन्दर सुवर्णमय कवच धारण करके आपका पुत्र स्वर्णमय गिरिराज मेरुके समान शोभा पाने लगा

三阇耶说道:“哦大王,你的儿子——头盔系得牢固,身披华美金甲——光耀如金色的群山之主。”

Verse 65

संनद्ध: सगदो राजन्‌ सज्ज: संग्राममूर्धनि । अब्रवीत्‌ पाण्डवान्‌ सर्वान्‌ पुत्रो दुर्योधनस्तव,नरेश्वर! युद्धके मुहानेपर सुसज्जित हो कवच बाँधे और गदा हाथमें लिये आपके पुत्र दुर्योधनने समस्त पाण्डवोंसे कहा--

三阇耶说道:“哦大王,你的儿子难敌——披甲在身,手执钉锤,整装立于战阵最前——向众般度子弟开口说道。”

Verse 66

भ्रातृणां भवतामेको युध्यतां गदया मया । सहदेवेन वा योत्स्ये भीमेन नकुलेन वा

三阇耶说道:“你们兄弟之中,任一人出来与我以钉锤相斗。我已备战——无论是娑诃提婆,或是怖摩,或是那俱罗。”

Verse 67

योत्स्ये5हं संगरं प्राप्प विजेष्ये च रणाजिरे,'रणक्षेत्रमें पहुँचकर मैं तुममेंसे किसी एकके साथ युद्ध करूँगा और मेरा विश्वास है कि समरांगणमें विजय पाऊँगा। पुरुषसिंह! आज मैं सुवर्णपत्रजटित गदाके द्वारा वैरके उस पार पहुँच जाऊँगा, जहाँ जाना किसीके लिये भी अत्यन्त कठिन है

三阇耶说道:“抵达战场之后,我将在这场交锋中作战,并必在战阵拥挤之处取胜。于战地之上,我将与尔等之一人相斗,并确信能在斗场得胜。哦人中之狮!今日我以镶饰金片之钉锤,必将越过仇怨之彼岸——抵达那对任何人都极难到达的境界。”

Verse 68

अहमटद्य गमिष्यामि वैरस्यान्तं सुदुर्गमम्‌ । गदया पुरुषव्याप्र हेमपट्टनिबद्धया,'रणक्षेत्रमें पहुँचकर मैं तुममेंसे किसी एकके साथ युद्ध करूँगा और मेरा विश्वास है कि समरांगणमें विजय पाऊँगा। पुरुषसिंह! आज मैं सुवर्णपत्रजटित गदाके द्वारा वैरके उस पार पहुँच जाऊँगा, जहाँ जाना किसीके लिये भी अत्यन्त कठिन है

三阇耶说道:“今日我将前往这场仇怨那难以抵达的尽头。噫,人中之虎!凭我这以金箍缠束的铁杵(钺槌),我必越过这宿怨的遥远彼岸。”

Verse 69

गदायुद्धे न मे कश्चित्‌ सदृशो5स्तीति चिन्तये । गदया वो हनिष्यामि सर्वानेव समागतान्‌,“मैं इस बातको सदा याद रखता हूँ कि “गदायुद्धमें मेरी समानता करनेवाला दूसरा कोई नहीं है।” गदाके द्वारा सामने आनेपर मैं तुम सभी लोगोंको मार डालूँगा

三阇耶说道:“我牢牢记得:在杵战之中,无人能与我比肩。待你们来到我面前,我必以此杵击倒你们——此处聚集的所有人——一个不留。”

Verse 70

न मे समर्था: सर्वे वै योद्धुं न्‍्यायेन केचन । न युक्तमात्मना वक्तुमेवं गर्वोद्धतं वच: । अथवा सफल होतत्‌ करिष्ये भवतां पुर:,“तुम सभी लोग अथवा तुममेंसे कोई भी मेरे साथ न्यायपूर्वक युद्ध करनेमें समर्थ नहीं हो। मुझे स्वयं ही अपने विषयमें इस प्रकार गर्वसे उद्धत वचन नहीं कहना चाहिये, तथापि कहना पड़ा है अथवा कहनेकी क्या आवश्यकता? मैं तुम्हारे सामने ही यह सब सफल कर दिखाऊँगा

三阇耶说道:“你们并非全都——甚至你们之中任何一人——也无力与我在公平的较量中一战。我本不该以这般傲慢、被骄矜点燃的话自夸;然而话既已出口。或者说,又何必多言?就在你们眼前,我将使此言成真。”

Verse 71

अस्मिन्‌ मुहुर्ते सत्यं वा मिथ्या वै तद्‌ भविष्यति । गृह्नातु च गदां यो वै योत्स्यतेडद्य मया सह,“मेरा वचन सत्य है या मिथ्या, यह इसी मुहूर्तमें स्पष्ट हो जायगा। आज मेरे साथ जो भी युद्ध करनेको उद्यत हो, वह गदा उठावे”

三阇耶说道:“就在此刻,我所言真伪立见分晓。今日凡愿与我一战者,取杵在手!”

Verse 183

तेजसा नाशयिष्यामि स्थिरीभवत पाण्डवा: । 'पाण्डवो! स्थिर होकर खड़े रहो। आज मैं अस्त्र-शस्त्र एवं रथसे हीन होकर भी घोड़ों और रथोंपर चढ़कर आये हुए तुम सब लोगोंको उसी तरह अपने तेजसे नष्ट कर दूँगा, जैसे रात्रिके अन्तमें सूर्यदेव सम्पूर्ण नक्षत्रोंकी अपने तेजसे अदृश्य कर देते हैं

三阇耶说道:“站稳吧,般度之子们!今日纵使我失却兵刃与战车,我也要凭自身威光将你们尽数摧灭——正如长夜将尽之时,太阳以其光辉使群星尽皆隐没。”

Verse 226

एतावदुकक्‍्त्वा वचनं विरराम जनाधिप: । “भरतश्रेष्ठ) आज मैं भाइयोंसहित तुम्हारा वध करके उन यशस्वी क्षत्रियोंक ऋणसे उऋण हो जाऊँगा। बाह्लीक, द्रोण, भीष्म, महामना कर्ण, शूरवीर जयद्रथ, भगदत्त, मद्रराजशल्य, भूरिश्रवा, सुबलकुमार शकुनि तथा पुत्रों, मित्रों, सुहृदों एवं बन्धु-बान्धवोंके ऋणसे भी उऋण हो जाऊँगा।” राजा दुर्योधन इतना कहकर चुप हो गया

三阇耶说道:说完这些话,人中之主便沉默了。“噢,婆罗多族中最卓越者!今日我将与诸弟兄一道诛杀你们,由此偿清我对那些声名显赫的刹帝利所负之债。我也将从对巴赫利迦、德罗那、毗湿摩、伟心的迦尔那、英勇的阇耶陀罗他、婆伽达多、摩陀罗王沙利耶、布利湿罗婆、苏婆罗之子沙昆尼,以及对我的诸子、朋友、善意之人和亲族所负之债中解脱。”说到这里,杜尔约陀那王便缄默不语。

Verse 253

तत्‌ त्वमादाय युध्यस्व प्रेक्षकास्ते वयं स्थिता: । तुम रणभूमिमें अकेले ही एक-एकके साथ भिड़कर हम सब लोगोंसे युद्ध करना चाहते हो तो ऐसा ही सही। जो हथियार तुम्हें पसंद हो, उसीको लेकर हमलोगोंमेंसे एक-एकके साथ युद्ध करो। हम सब लोग दर्शक बनकर खड़े रहेंगे

坚战说道:“那么就执起你所中意的兵器来战吧。我们将立于此处作观者。若你愿与我们众人交锋——在战场上逐一与每人单独相遇——便依你所愿。择你所喜之器,依次与我们一人一人对战;我们都将站立为证。”

Verse 263

हत्वैकं भवतो राज्यं हतो वा स्वर्गमाप्तुहि | वीर! मैं स्वयं ही पुनः तुम्हें यह अभीष्ट वर देता हूँ कि “हममेंसे एकका भी वध कर देनेपर सारा राज्य तुम्हारा हो जायगा अथवा यदि तुम्हीं मारे गये तो स्वर्गलोक प्राप्त करोगे”

坚战说道:“若你能杀死我们之中哪怕一人,王国便归你;若你被杀,你也必将得至天界。”

Verse 293

इदमेकं गदायुद्ध॑ भवत्वद्याद्भुतं महत्‌ । रथके विचित्र युद्ध तो पग-पगपर हुए हैं। आज यह एक अत्यन्त अद्भुत गदायुद्ध भी हो जाय

杜尔约陀那说道:“愿今日这唯一的一场棍棒(钉锤)之决,成为宏大而奇绝的盛事。”

Verse 306

युद्धानामपि पर्यायो भवत्वनुमते तव | मनुष्य बारी-बारीसे एक-एक अस्त्रका प्रयोग करना चाहते हैं; परंतु आज तुम्हारी अनुमतिसे युद्ध भी क्रमश: एक-एक योद्धाके साथ ही हो

杜尔约陀那说道:“愿战斗也能在你同意之下,依次轮转而行。正如人们愿将兵器一件一件按序施用一般——凭你的许可——也让这场交战循序推进:勇士对勇士,一人接一人。”

Verse 373

अन्तर्जलात्‌ समुत्तस्थौ नागेन्द्र इव नि:श्वसन्‌ । वह पराक्रमी वीर बड़े वेगसे सोनेके अंगदसे विभूषित एवं लोहेकी बनी हुई भारी गदा हाथमें लेकर पानीको चीरता हुआ उसके भीतरसे उठ खड़ा हुआ और सर्पराजके समान लंबी साँस खींचने लगा

三阇耶说道:他自水中奋然而起,喘息如龙蛇之王。那位骁勇无比的战士,臂戴金钏,手执沉重的铁制钉锤,劈开水势而出,长长地、强劲地吸了一口气——在战场暴烈之中,显出不屈不挠的武者决心。

Verse 383

उदतिष्ठत पुत्रस्ते प्रतपन्‌ रश्मिवानिव । कंधेपर लोहेकी गदा रखकर बँधे हुए जलका भेदन करके आपका वह पुत्र प्रतापी सूर्यके समान ऊपर उठा

三阇耶说道:你的儿子又一次站起,炽烈如光辉的太阳。铁锤搁在肩上,他冲破那仿佛束缚他的水势,向上腾出——英勇灿然,宛如旭日东升。此景正显其坚忍:纵被拘束、被压沉,他仍奋力夺回立足之势,再入战阵。

Verse 393

गदां परामृशद्‌ धीमान्‌ धार्तराष्ट्री महाबल: । इसके बाद महाबली बुद्धिमान्‌ दुर्योधनने लोहेकी बनी हुई वह सुवर्णभूषित भारी गदा हाथमें ली

三阇耶说道:随后,那位睿智而大力的持国之子握起了他的兵器——沉重的铁锤,且以黄金装饰。在冷酷的战争法则中,这一刻标志着难敌的郑重备战:他以力量与兵器技艺迎敌,选择交锋,而非退却或和解。

Verse 663

अथवा फाल्‍्गुनेनाद्य त्वया वा भरतर्षभ । “भरतश्रेष्ठ! तुम्हारे भाइयोंमेंसे कोई एक मेरे साथ गदाद्वारा युद्ध करे। मैं सहदेव, नकुल, भीमसेन, अर्जुन अथवा स्वयं तुमसे भी युद्ध कर सकता हूँ

三阇耶说道:“否则,婆罗多族中的雄杰啊,今日就让阿周那上前——或由你亲自来。‘婆罗多之最!让你诸兄弟中任一人与我以铁锤相斗。我能与娑诃提婆、那俱罗、毗摩塞那、阿周那,甚至与你本人交战。’”

Verse 2736

आयुधानामियं चापि वृता त्वत्सम्मते गदा । दुर्योधन बोला--राजन्‌! यदि ऐसी बात है तो इस महासमरमें मेरे साथ लड़नेके लिये आज किसी भी एक शूरवीरको दे दो और तुम्हारी सम्मतिके अनुसार हथियारोंमें मैंने एकमात्र इस गदाका ही वरण किया है

难敌说道:“在诸般兵器之中,并蒙王者允准,我唯独选定此锤为我唯一之兵。”

Frequently Asked Questions

Whether it is ethically and strategically defensible for Yudhiṣṭhira to accept a ‘win-the-kingdom-by-killing-one’ proposal when the opponent is a specialist in mace combat—raising the tension between duty to conclude war and duty to avoid reckless, unfairly stacked contests.

Competence and context matter in dharmic action: righteous intent does not substitute for prudent means. Leadership must evaluate skill asymmetry, procedural legitimacy, and vow-bound responsibilities before committing to irreversible decisions.

No explicit phalaśruti is stated here; the meta-function is narrative-ethical rather than ritual-promissory, positioning the duel as a morally charged culmination of earlier actions and vows within the epic’s karmic logic.