
शल्यपर्व — चतुर्विंशोऽध्यायः | Śalya Parva, Chapter 24: Disruption of Kaurava Formations and the Elephant Encirclement
Upa-parva: Duryodhana–Dhṛṣṭadyumna Encounter and the Gaja-Āvaraṇa (Elephant Encirclement) Episode
Saṃjaya reports that Arjuna (Dhanañjaya), with unwavering resolve (saṅkalpa) and the Gāṇḍīva, releases volleys likened to thunderbolts, driving sections of the Kaurava force into flight even as Duryodhana watches. The scene catalogs battlefield degradation—chariots losing yokes, axles, wheels, drivers, and archers running out of missiles—alongside human reactions: calling for sons, fathers, allies, and abandoning kin in panic. Some units pause to drink water, re-armor, and regroup, returning to the fight, while others re-enter under Duryodhana’s command with renewed aggression. Dhṛṣṭadyumna advances in anger; Duryodhana responds with concentrated arrow clusters, wounding Dhṛṣṭadyumna and killing his horses and charioteer, forcing Duryodhana to withdraw on horseback after his chariot is compromised. A mass elephant deployment then surrounds the five principal Pāṇḍava chariot-warriors, momentarily restricting mobility. Arjuna breaks the elephant screen with sharp nārācas, felling great elephants, while Bhīma dismounts with gadā to smash elephants at close range, causing widespread disorder. Yudhiṣṭhira and the Mādrī-sons also strike elephant-fighters with specialized arrows. Meanwhile, Aśvatthāmā, Kṛpa, and Kṛtavarmā search for the absent Duryodhana amid heavy losses, and the narrative closes on the Kaurava leadership’s anxiety and redeployment away from the Pāñcāla front toward Śakuni (Saubala).
Chapter Arc: मृदु-सा एक शब्द उठते ही संजय की दृष्टि युद्धभूमि पर टिक जाती है—जहाँ श्रीकृष्ण के सम्मुख अर्जुन, दुर्योधन के दुराग्रह को कुल-विनाश का बीज बताकर धिक्कारता है। → शकुनि शीघ्रता से वाहिनी के पास जाकर बार-बार ललकारता है—‘त्वरित होकर युद्ध करो’; पर क्षत्रिय-रथी उत्तर देते हैं कि रण के मध्य में टिके रहना ही धर्म है। इसी बीच अर्जुन कृष्ण से आग्रह करता है कि रथ को सैन्य-सागर में प्रविष्ट कराएँ—अठारह दिन के महायुद्ध की पराकाष्ठा में अब निर्णायक प्रहार चाहिए। → अर्जुन का बाण-वर्षा-रूप प्रकट होता है—नतपर्वण शरों का महान शब्द गूँजता है; शरौघ कवचों में अटकते नहीं, रथियों और वाहिनी पर बादल-सी धार बनकर टूटते हैं, और कौरव-पक्ष की रथी-सेना का संहार आरम्भ हो जाता है। → अर्जुन दुर्योधन की नीति-चेष्टा को विदुर-वचन की कसौटी पर रखकर ‘कुलक्षय-कर्ता’ ठहराता है और कृष्ण से कहता है कि कौरव-चमू की ओर बढ़ें—वह दुर्योधन और उसकी वाहिनी को शित-शरों से दबा देगा; युद्ध का प्रवाह पाण्डव-पक्ष के पक्ष में झुकता दिखता है। → अर्जुन की प्रतिज्ञा के बाद प्रश्न हवा में लटकता है—क्या यह बाण-वर्षा दुर्योधन तक सीधे पहुँचेगी, या कौरव-पक्ष कोई नया व्यूह/प्रतिरोध खड़ा करेगा?
Verse 1
अत-#--#क्रतज चतुर्विशो$ध्याय: श्रीकृष्णके सम्मुख अर्जुनद्वारा दुर्योधनके दुराग्रहकी निन्दा और रथियोंकी सेनाका संहार संजय उवाच तस्मिन् शब्दे मृदौ जाते पाण्डवैर्निहते बले । अश्लैः सप्तशतै: शिष्टैरुपावर्तत सौबल:,संजय कहते हैं--राजन्! जब पाण्डवयोद्धाओंने अधिकांश सेनाका संहार कर डाला और युद्धका कोलाहल कम हो गया, तब सुबलपुत्र शकुनि शेष बचे हुए सात सौ घुड़सवारोंके साथ कौरव-सेनाके समीप चला गया
三阇耶说道:大王啊,当般度诸将已斩灭大半军势,战场喧嚣亦渐息之时,苏婆罗之子沙昆尼回转而来,率仅存的七百骑兵趋近俱卢军阵——那是大势将倾却仍紧攥最后一支纪律残部的景象,在顽执所酿的道义废墟之中尤显凄然。
Verse 2
स यात्वा वाहिनी तूर्णमब्रवीत् त्वरयन् युधि । युद्धयध्वमिति संहृष्टा: पुनः पुनररिंदमा:
三阇耶说道:他疾赴军前,于战阵之中催促众人,反复高呼:“战斗!”于是那些能制伏敌人的勇士被激起豪情,一次又一次被鼓动投入厮杀。
Verse 3
शकुनेस्तद् वच: श्रुत्वा तमूचुर्भरतर्षभ
三阇耶说道:听罢沙昆尼之言,他们便对他说——噢,婆罗多族中的雄牛——在这场战争道义紧绷、气氛沉重之中,回应他的劝告。
Verse 4
असौ तिष्ठति कौरव्यो रणमध्ये महाबल: । यत्रैतत् सुमहच्छत्र॑ पूर्णचन्द्रसमप्रभम्
三阇耶说道:“看哪,那位力大无比的俱卢人正立于战阵中央——就在他那极其宏大的王伞放射出如满月般光辉之处。”
Verse 5
यत्र ते सतनुत्राणा रथास्तिष्ठन्ति दंशिता: । भरतश्रेष्ठ शकुनिकी वह बात सुनकर जन क्षत्रियोंने उसे यह उत्तर दिया--'प्रभो! महाबली कुरुराज रणक्षेत्रके मध्यभागमें वहाँ खड़े हैं, जहाँ यह पूर्ण चन्द्रमाके समान कान्तिमान् विशाल छत्र तना हुआ है तथा जहाँ वे शरीर-रक्षक आवरणों एवं कवचोंसे सुसज्जित रथ खड़े हैं ।। यत्रैष तुमुलः शब्द: पर्जन्यनिनदोपम:
三阇耶说道:“噢,婆罗多族中最卓越者,在那里——你那些防护周密、武备齐全的战车列阵之处——诸刹帝利听了沙昆尼的话,便回答道:‘主上,俱卢的强王正驻立于战场中央,在这巨大王伞之下;那王伞光辉灿然,如满月照耀。那里也停着装有护罩与甲胄的战车。正是在那里,喧腾的轰鸣声四起,宛如雨云雷震。’”
Verse 6
एवमुक्तस्तु तैयोंथै: शकुनि: सौबलस्तदा,नरेश्वर! तब उन योद्धाओंके ऐसा कहनेपर सुबलपुत्र शकुनि वहीं गया, जहाँ आपका पुत्र दुर्योधन समरांगणमें विचित्र युद्ध करनेवाले वीरोंद्वारा सब ओरसे घिरा हुआ खड़ा था
三阇耶说道:那些武士如此禀告后,苏婆罗之子沙昆尼便动身——噢,大王——前往你儿子难敌所立之处;他在战场上被四面八方精于多种凶猛战法的英雄所环围。
Verse 7
प्रययौ तत्र यत्रासौ पुत्रस्तव नराधिप । सर्वतः संवृतो वीरै: समरे चित्रयोधिभि:,नरेश्वर! तब उन योद्धाओंके ऐसा कहनेपर सुबलपुत्र शकुनि वहीं गया, जहाँ आपका पुत्र दुर्योधन समरांगणमें विचित्र युद्ध करनेवाले वीरोंद्वारा सब ओरसे घिरा हुआ खड़ा था
三阇耶说道:噢,大王,苏婆罗之子沙昆尼便前往你儿子所在之处;他在战场上立着,四面皆为精于多样奇绝战法的勇士所围。
Verse 8
ततो दुर्योधन दृष्टवा रथानीके व्यवस्थितम् । स रथांस्तावकान् सर्वान् हर्षयन् शकुनिस्तत:,प्रजानाथ! तदनन्तर दुर्योधनको रथसेनामें खड़ा देख आपके सम्पूर्ण रथियोंका हर्ष बढ़ाता हुआ शकुनि अपनेको कृतार्थ-सा मानकर बड़े हर्षके साथ राजा दुर्योधनसे इस प्रकार बोला--
于是,杜尤陀那见战车军已列阵就位。其时,沙昆尼鼓舞你方诸车战勇士,使众人欢欣振奋;他自以为功业已成,满怀喜悦,对杜尤陀那王如此说道。
Verse 9
दुर्योधनमिदं वाक््यं हृष्टरूपो विशाम्पते । कृतकार्यमिवात्मानं मन्यमानोअब्रवीन्नपम्,प्रजानाथ! तदनन्तर दुर्योधनको रथसेनामें खड़ा देख आपके सम्पूर्ण रथियोंका हर्ष बढ़ाता हुआ शकुनि अपनेको कृतार्थ-सा मानकर बड़े हर्षके साथ राजा दुर्योधनसे इस प्रकार बोला--
沙昆尼面露喜色,对杜尤陀那——万民之主——说了这番话;他自以为大事已毕,便欢然开口。
Verse 10
जहि राजन् रथानीकममश्चा: सर्वे जिता मया | नात्यक्त्वा जीवितं संख्ये शक्यो जेतुं युधिषछ्ठिर:,“राजन! शत्रुकी रथसेनाका नाश कीजिये। समस्त घुड़सवारोंको मैंने जीत लिया है। राजा युधिष्छिर अपने प्राणोंका परित्याग किये बिना जीते नहीं जा सकते
“大王,当击溃敌之战车军。至于骑兵,我已尽皆制伏。欲在战场上胜过坚战(Yudhiṣṭhira),非得抱定以命相搏、甚至舍命之决心不可。”
Verse 11
हते तस्मिन् रथानीके पाण्डवेनाभिपालिते | गजानेतान् हनिष्याम: पदातींश्वेतरांस्तथा,'पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरके द्वारा सुरक्षित इस रथ-सेनाका संहार हो जानेपर हम इन हाथीसवारों, पैदलों और घुड़सवारोंका भी वध कर डालेंगे”
“待那支由般度之子坚战所护的战车军被歼灭之后,我们便要再诛这些象兵,以及步兵与其余骑兵。”
Verse 12
श्रुत्वा तु वचनं तस्य तावका जयगृद्धिन: । जवेनाभ्यपतन् हृष्टा: पाण्डवानामनीकिनीम्,विजयाभिलाषी शकुनिकी यह बात सुनकर आपके सैनिक अत्यन्त प्रसन्न हो बड़े वेगसे पाण्डव-सेनापर टूट पड़े
听了他的话,你方将士贪求胜利,皆大为振奋,遂以极快之势猛扑般度军阵。
Verse 13
सर्वे विवृततूणीरा: प्रगृहीतशरासना: । शरासनानि धुन्वाना: सिंहनादान् प्रणेदिरे,सबके तरकसोंके मुँह खुल गये, सबने हाथमें धनुष ले लिये और सभी धनुष हिलाते हुए जोर-जोरसे सिंहनाद करने लगे
三阇耶说道:众人皆敞开箭箙,牢牢执弓在手;摇动弓身,齐发震天狮吼。
Verse 14
ततो ज्यातलनिर्घोष: पुनरासीद् विशाम्पते । प्रादुरासीच्छराणां च सुमुक्तानां सुदारुण:,प्रजानाथ! तदनन्तर फिर प्रत्यंचाकी टंकार और अच्छी तरह छोड़े हुए बाणोंकी भयानक सनसनाहट प्रकट होने लगी
三阇耶说道:于是,噢万民之主,弓弦的震响再度响起;而那善射而出的箭矢,也显出骇人的尖啸疾驰之声。
Verse 15
तान् समीपगतान् दृष्टवा जवेनोद्यतकार्मुकान् । उवाच देवकीपुत्रं कुन्तीपुत्रो धनंजय:,उन सबको बड़े वेगसे धनुष उठाये पास आया देखकर कुन्तीकुमार अर्जुनने देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्णसे इस प्रकार कहा--
见那些武士迅疾逼近,皆举弓待发,昆蒂之子檀那阇耶(阿周那)便对提婆姬之子奎师那说道。
Verse 16
चोदयाश्वानसम्भ्रान्त: प्रविशैतद् बलार्णवम् । अन्तमद्य गमिष्यामि शत्रूणां निशितै: शरै:,“जनार्दन! आप स्वस्थचित्त होकर इन घोड़ोंको हाँकिये और इस सैन्यसागरमें प्रवेश कीजिये। आज मैं तीखे बाणोंसे शत्रुओंका अन्त कर डालूँगा। परस्पर भिड़कर इस महान् संग्रामके आरम्भ हुए आज अठारह दिन हो गये
三阇耶说道:“噢阇那尔达那,心神安定地驱策这些战马,闯入这军阵之海。今日我将以锐利之箭,终结诸敌。”这场由双方相撞而起的大战,如今已至第十八日。
Verse 17
अष्टादश दिनान्यद्य युद्धस्यास्य जनार्दन | वर्तमानस्य महतः समासाद्य परस्परम्,“जनार्दन! आप स्वस्थचित्त होकर इन घोड़ोंको हाँकिये और इस सैन्यसागरमें प्रवेश कीजिये। आज मैं तीखे बाणोंसे शत्रुओंका अन्त कर डालूँगा। परस्पर भिड़कर इस महान् संग्रामके आरम्भ हुए आज अठारह दिन हो गये
三阇耶说道:“噢阇那尔达那,自这场大战开端——自两军近身相接之时——至今已满十八日;这浩大的冲突不曾停歇。”
Verse 18
अनन्तकल्पा ध्वजिनी भूत्वा होषां महात्मनाम् | क्षयमद्य गता युद्धे पश्य दैव॑ यथाविधम्,“इन महामनस्वी कौरवोंके पास अपार सेना थी; परंतु युद्धमें इस समयतक प्रायः नष्ट हो गयी। देखिये, प्रारब्धका कैसा खेल है?
三阇耶说道:“纵然那心志高远的俱卢诸王昔日曾拥有不可胜量的大军,如今在这场战争中也几乎尽归毁灭。且看天命——依其既定之道运转——如何展开它的戏局。”
Verse 19
समुद्रकल्पं च बल धार्तराष्ट्रस्य माधव । अस्मानासाद्य संजातं गोष्पदोपममच्युत,“माधव! अच्युत! दुर्योधनकी समुद्र-जैसी अनन्त सेना हमलोगोंसे टक्कर लेकर आज गायकी खुरीके समान हो गयी है
三阇耶说道:“噢,摩陀婆!噢,阿周陀!达尔陀罗湿多罗一族的军势——昔日浩瀚如海——与我军相撞之后,如今竟缩小得如同牛蹄印一般。”
Verse 20
हते भीष्मे तु संदध्याच्छिवं स्थादिह माधव । न च तत् कृतवान् मूढो धार्तराष्ट्र: सुबालिश:,“माधव! यदि भीष्मके मारे जानेपर दुर्योधन सन्धि कर लेता तो यहाँ सबका कल्याण होता; परंतु उस अज्ञानी मूर्खने वैसा नहीं किया
三阇耶说道:“噢,摩陀婆!若达利陀罗湿多罗之子在毗湿摩被杀之后便议和,此地众人本可得安。可那迷狂而愚昧至极之人,并未如此行事。”
Verse 21
उक्त भीष्मेण यद् वाक््यं हितं तथ्यं च माधव । तच्चापि नासौ कृतवान् वीतबुद्धिः सुयोधन:
三阇耶说道:“噢,摩陀婆!毗湿摩所说那有益而真实的忠告,也未被那判断尽失的苏由陀那付诸实行。”
Verse 22
“मधुकुलभूषण! भीष्मजीने जो सच्ची और हितकर बात बतायी थी, उसे भी उस बुद्धिहीन दुर्योधनने नहीं माना ।। तस्मिंस्तु तुमुले भीष्मे प्रच्युते धरणीतले । न जाने कारणं कि तु येन युद्धमवर्तत,“तदनन्तर घमासान युद्ध आरम्भ हुआ और उसमें भीष्मजी पृथ्वीपर मार गिराये गये। फिर भी न जाने क्या कारण था, जिससे युद्ध चालू ही रह गया
三阇耶说道:“噢,摩度族的荣饰!毗湿摩所说那真实而有益的忠告,愚昧的杜由陀那也不肯采纳。并且在那可怖的喧嚣动荡之中,毗湿摩倒卧大地之后,我仍不能明了究竟因何缘故,这战争竟仍旧延续不息。”
Verse 23
इस प्रकार श्रीमह्याभारत शल्यपर्वमें संकुलयुद्धविषयक तेईसवाँ अध्याय पूरा हुआ,मूढांस्तु सर्वथा मन्ये धार्तराष्ट्रानू सुबालिशान् । पतिते शान्तनो: पुत्रे येडकार्षु: संयुगं पुन: “मैं धृतराष्ट्रके सभी पुत्रोंको सर्वथा मूर्ख और नादान समझता हूँ, जिन्होंने शान्तनुनन्दन भीष्मजीके धराशायी होनेपर भी पुनः युद्ध जारी रखा
三阇耶说道:“我以为持国之子尽皆迷妄愚昧;因为即便圣檀努之子(毗湿摩)已然倒下,他们仍选择再度开战。”此言含有道德上的谴责:在受人敬仰的长者、护持达摩者陨落之后仍执意行暴,正显其对劝诫、后果与正当克制的盲目。
Verse 24
अनन्तरं च निहते द्रोणे ब्रह्म॒विदां वरे राधेये च विकर्णे च नैवाशाम्यत वैशसम्,“तत्पश्चात् वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ द्रोणाचार्य, राधापुत्र कर्ण और विकर्ण मारे गये तो भी यह मार-काट बंद नहीं हुई इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि संकुलयुद्धे चतुर्विशो5ध्याय:
三阇耶说道:即便陀罗那——诸通晓圣典者中最卓越者——已被诛杀,罗陀耶(迦尔纳)与毗迦尔那亦相继陨落,这场屠戮仍未止息。由此可见:一旦战场之上达摩崩坏,杀业便会越过任何一位英雄的死亡而继续蔓延。
Verse 25
अल्पावशिटष्टे सैन्येडस्मिन् सूतपुत्रे च पातिते । सपुत्रे वै नरव्याप्रे नैवाशाम्यत वैशसम्,'पुत्रसहित नरश्रेष्ठ सूतपुत्रके मार गिराये जानेपर जब कौरव-सेना थोड़ी-सी ही बच रही थी तो भी यह युद्धकी आग नहीं बुझी
三阇耶说道:即便此军只余些许残部,即便车夫之子已被击倒——连同那虎般勇猛的英雄及其子——屠戮仍未止息。战争的暴烈一旦放出,便不肯熄灭;复仇与哀恸使毁灭之火长燃不息,纵然大势似已定局。
Verse 26
श्रुतायुषि हते वीरे जलसन्धे च पौरवे । श्रुतायुधे च नृपती नैवाशाम्यत वैशसम्,'श्रुतायु, वीर जलसन्ध, पौरव तथा राजा श्रुतायुधके मारे जानेपर भी यह संहार बंद नहीं हुआ
三阇耶说道:即便勇武的室罗多优斯被杀,即便出自普罗婆族系的阇罗三陀与室罗多优陀王亦已陨落,屠戮仍未止息。暴力的势头一旦在战场上被放出,便继续吞噬生命,超越任何一场胜利;这显明战争的狂怒往往长于名将的倒下。
Verse 27
भूरिश्रवसि शल्ये च शाल्वे चैव जनार्दन । आव्न्त्येषु च वीरेषु नैवाशाम्यत वैशसम्
三阇耶说道:“噢,阇那尔达那啊,屠戮并未止息——无论在部利室罗婆娑之中,在舍利耶之中,在舍罗婆之中,还是在阿槃提的勇士之中。杀伐不息,仿佛再多的苦难也不能熄灭战争的狂焰。”
Verse 28
“'जनार्दन! भूरिश्रवा, शल्य, शाल्व तथा अवन्ति देशके वीर मारे गये तो भी यह युद्धकी ज्वाला शान्त न हो सकी ।। जयद्रथे च निहते राक्षसे चाप्यलायुधे । बाह्विके सोमदत्ते च नैवाशाम्यत वैशसम्,“जयद्रथ, बाह्विक, सोमदत्त तथा राक्षस अलायुध--ये सभी परलोकवासी हो गये तो भी यह युद्धकी प्यास न बुझ सकी
三阇耶说道:“噢,阇那尔陀那!纵然布利湿罗婆、沙利耶、沙尔瓦以及阿凡提国的勇士都已被诛,这场战争的烈焰仍未熄灭。即便阇耶陀罗被杀,罗刹阿罗耶优陀亦已伏诛,巴诃毗迦与苏摩达多也相继陨落,这血腥暴行仍不曾止息。”
Verse 29
भगदत्ते हते शूरे काम्बोजे च सुदारुणे | दुःशासने च निहते नैवाशाम्यत वैशसम्,“भगदत्त, शूरवीर काम्बोजराज सुदक्षिण तथा अत्यन्त दारुण दुःशासनके मारे जानेपर भी कौरवोंकी युद्ध-पिपासा शान्त नहीं हुई
三阇耶说道:“即便勇猛的婆伽达多被杀,迦摩波阇之王——战阵凶悍的苏达克希那——亦被诛,纵然杜沙娑那也已倒下,俱卢族的好战狂热仍未平息。”
Verse 30
दृष्टवा विनिहतान् शूरान् पृथड्माण्डलिकान् नृपान् | बलिनश्च रणे कृष्ण नैवाशाम्यत वैशसम्,“श्रीकृष्ण! विभिन्न मण्डलोंके स्वामी शूरवीर बलवान् नरेशोंको रणभूमिमें मारा गया देखकर भी यह युद्धकी आग बुझ न सकी
三阇耶说道:“噢,奎师那!纵然亲见诸多分邦之主、英勇而强大的诸王在战场上被杀,这可怖的杀戮仍未止息;战争的烈焰不肯熄灭。”
Verse 31
अक्षौहिणीपतीन् दृष्टवा भीमसेननिपातितान् | मोहाद् वा यदि वा लोभान्नैवाशाम्यत वैशसम्,'भीमसेनके द्वारा धराशायी किये गये अक्षौहिणी-पतियोंको देखकर भी मोहवश अथवा लोभके कारण युद्ध बंद न हो सका
三阇耶说道:“纵然看见统领整支大军的诸将被毗摩塞那击倒,这屠戮仍未止息——或因迷妄,或因贪欲。”
Verse 32
को नु राजकुले जात: कौरवेयो विशेषत: । निरर्थक॑ महद् वैरं कुर्यादन्य: सुयोधनात्
三阇耶说道:“有谁生于王族——尤其是俱卢一脉——会像苏由陀那(难敌)那样,平白无故地结下如此深重的大仇呢?”
Verse 33
'राजाके कुलमें उत्पन्न होकर विशेषत: कुरुकुलकी संतान होकर दुर्योधनके सिवा दूसरा कौन ऐसा है, जो व्यर्थ ही (अपने बन्धुओंके साथ) महान् वैर बाँधे ।। गुणतो< भ्यधिकान ज्ञात्वा बलत: शौर्यतो5पि वा । अमूढ: को नु युद्धयेत जानन् प्राज्ञो हिताहितम्,“दूसरोंको गुणसे, बलसे अथवा शौर्यसे भी अपनी अपेक्षा महान् जानकर भी अपने हित और अहितको समझनेवाला मूढ़ताशून्य कौन ऐसा बुद्धिमान् पुरुष होगा? जो उनके साथ युद्ध करेगा
三阇耶说道:“生于王族,尤其又是俱卢家族的后裔——除难敌(Duryodhana)之外,还有谁会徒然结下深重仇怨,甚至与自己的亲族为敌?明知他人于德行、于力量,乃至于勇武都胜过自己,哪一个心智清明、通达利害的智者,会选择与他们开战呢?”
Verse 34
यन्न तस्य मनो हा[सीत् त्वयोक्तस्य हितं वच: । प्रशमे पाण्डवै: सार्थ सोडन्यस्य शृुणुयात् कथम्,“आपके द्वारा हितकारक वचन कहे जानेपर भी जिसका पाण्डवोंके साथ संधि करनेका मन नहीं हुआ, वह दूसरेकी बात कैसे सुन सकता है?
三阇耶说道:“即便你说了为他着想的良言,他的心也未曾转向与般度五子和解。既如此,他又怎会听得进旁人的话呢?”
Verse 35
येन शान्तनवो वीरो द्रोणो विदुर एव च । प्रत्याख्याता: शमस्यार्थे कि नु तस्याद्य भेषजम्,“जिसने संधिके विषयमें वीर शान्तनुनन्दन भीष्म, द्रोणाचार्य और विदुरजीकी भी बात माननेसे इनकार कर दी, उसके लिये अब कौन-सी दवा है?
三阇耶说道:“当人们求和之时,他竟连圣檀奴之子、英勇的毗湿摩(Bhīṣma),以及德罗那与毗度罗的劝告都加以拒绝——如今对他还能有什么救治之方呢?”
Verse 36
मौख्याद् येन पिता वृद्ध: प्रत्याख्यातो जनार्दन । तथा माता हित॑ वाक््यं भाषमाणा हितैषिणी
三阇耶说道:“噢,阇那尔达那(Janārdana)啊,他因愚昧而背弃了年迈的父亲;同样也拒绝了母亲出于慈爱、为他着想而说的良言。”
Verse 37
प्रत्याख्याता ह[सत्कृत्य स कस्मै रोचयेद् वच: । 'जनार्दन! जिसने मूर्खतावश अपने वृद्ध पिताकी भी बात नहीं मानी और हितकी बात बतानेवाली अपनी हितैषिणी माताका भी अपमान करके उसकी आज्ञा माननेसे इनकार कर दिया, उसे दूसरे किसीकी बात क्यों रुचेगी? ।। कुलान्तकरणो व्यक्त जात एष जनार्दन
三阇耶说道:“噢,阇那尔达那啊,若有人连在恭敬奉上的劝告都已拒绝,他还会觉得谁的话中听呢?他因愚昧而不听年迈父亲之言,又侮辱那位为他着想、说出有益之语的母亲,并拒不遵从她的命令——他又怎会乐于听取旁人的忠告?显然,噢阇那尔达那,此人降生,正是其家族的公然毁灭者。”
Verse 38
नैष दास्यति नो राज्यमिति मे मतिरच्युत,“अच्युत! मैं समझता हूँ, यह अब भी हमें अपना राज्य नहीं देगा। तात! महात्मा विदुरने मुझसे अनेक बार कहा है कि “मानद! दुर्योधन जीते-जी राज्यका भाग नहीं लौटायेगा
三阇耶说道:“阿周陀啊,我已确信:他决不会把我们的国土归还。诚然,高尚的毗度罗屡次告诫我:只要杜罗约陀那尚在人世,他便绝不会恢复哪怕一份疆土。”
Verse 39
उक्तो5हं बहुशस्तात विदुरेण महात्मना । न जीवन दास्यते भागं धार्तराष्ट्रस्तु मानद,“अच्युत! मैं समझता हूँ, यह अब भी हमें अपना राज्य नहीं देगा। तात! महात्मा विदुरने मुझसे अनेक बार कहा है कि “मानद! दुर्योधन जीते-जी राज्यका भाग नहीं लौटायेगा
三阇耶说道:“尊者,那位大心的毗度罗曾多次对我说:‘赐荣者啊,持国之子只要尚存于世,便不会给出(王国的)任何一份。’”
Verse 40
यावत् प्राणा धरिष्यन्ति धार्तराष्ट्रस्य दुर्मते: । तावद् युष्मास्वपापेषु प्रचरिष्यति पापकम्,“दुर्बुद्धि दुर्योधनके प्राण जबतक शरीरमें स्थित रहेंगे, तबतक तुम निष्पाप बन्धुओंपर भी वह पापपूर्ण बर्ताव ही करता रहेगा
三阇耶说道:“只要那心术邪恶的持国之子尚有一息在身,他就会继续作恶——甚至对你们这些无罪的兄弟亦然。”
Verse 41
न च युक्तोडन्यथा जेतुमृते युद्धेन माधव । इत्यब्रवीत् सदा मां हि विदुर: सत्यदर्शन:,“माधव! युद्धके सिवा और किसी उपायसे दुर्योधनको जीतना सम्भव नहीं है।' यह बात सत्यदर्शी विदुरजी सदासे ही मुझे कहते आ रहे हैं
三阇耶说道:“噢,摩陀婆啊,除战争之外,别无他法可以征服他。” 见真之人毗度罗一直如此告诫我。
Verse 42
तत् सर्वमद्य जानामि व्यवसायं दुरात्मन: । यदुक्त वचन तेन विदुरेण महात्मना
三阇耶说道:“如今我已彻底明白那恶心之人的决意与用心。一切果然正如大心的毗度罗所言。”
Verse 43
“महात्मा विदुरने जो बात कही है, उसके अनुसार मैं उस दुरात्माके सम्पूर्ण निश्चयको आज जानता हूँ ।। यो हि श्रुत्वा वच: पथ्यं जामदग्न्याद् यथातथम् । अवामन्यत दुर्बुद्धिर्धुव॑ं नाशमुखे स्थित:,“जिस दुर्बुद्धिने यमदग्निनन्दन परशुरामजीके मुखसे यथार्थ एवं हितकारक वचन सुनकर भी उसकी अवहेलना कर दी, वह निश्चय ही विनाशके मुखमें स्थित है
“依照大德毗度罗所言,今日我已洞悉那恶人全部的决意。凡人既已听闻由阇摩达格尼之子(帕罗修罗摩)如实而又有益的忠告,却仍以乖僻之见加以轻蔑者,必定正立于毁灭之口。”
Verse 44
उक्त हि बहुश: सिद्धैर्जातमात्रे सुयोधने । एन॑ प्राप्य दुरात्मान॑ क्षयं क्षत्रं गमिष्यति,“दुर्योधनके जन्म लेते ही सिद्ध पुरुषोंने बारंबार कहा था कि “इस दुरात्माको पाकर क्षत्रियजातिका विनाश हो जायगा”
“确实,在苏约陀那方才降生之时,诸位成就的圣者便屡次宣告:‘得此恶人,刹帝利之族必趋于毁灭。’”
Verse 45
तदिदं वचन तेषां निरुक्तं वै जनार्दन । क्षयं याता हि राजानो दुर्योधनकृते भूशम्
“噢,阇那尔达那,这正是他们所说之言:诸王因杜尤陀那而覆灭,尽皆倒伏尘土。”
Verse 46
“जनार्दन! उनकी वह बात यथार्थ हो गयी; क्योंकि दुर्योधनके कारण बहुत-से राजा नष्ट हो गये ।। सोउ्द्य सर्वान् रणे योधान् निहनिष्यामि माधव । क्षत्रियेषु हतेष्वाशु शून्ये च शिबिरे कृते
“阇那尔达那啊,他们的话已成真实:因杜尤陀那之故,许多国王已被毁灭。故而今日,摩陀婆啊,我将于战场上诛尽诸将士;待刹帝利迅速被斩,营帐化为空寂之时,那罪业的果报便将昭然显现。”
Verse 47
वधाय चात्मनो<स्माभि: संयुगं रोचयिष्यति । तदन्तं हि भवेद् वैरमनुमानेन माधव,“माधव! आज मैं रणभूमिमें शत्रुपक्षेके समस्त योद्धाओंको मार गिराऊँगा। इन क्षत्रियोंका शीघ्र ही संहार हो जानेपर जब सारा शिविर सूना हो जायगा, तब वह अपने वधके लिये हमलोगोंके साथ जूझना पसंद करेगा। माधव! मेरे अनुमानसे उसका वध होनेपर ही इस वैरका अन्त होगा
“他将选择与我们交锋,求取自身之死。摩陀婆啊,当刹帝利武士迅速被歼,整个营地尽成荒寂之时,他便宁愿与我们一战,只为被诛。摩陀婆,依我推断,唯有他死,此仇怨方得终结。”
Verse 48
एवं पश्यामि वार्ष्णेय चिन्तयन् प्रज्ञया स्वया । विदुरस्य च वाक्येन चेष्टया च दुरात्मन:,“वृष्णिनन्दन! मैं अपनी बुद्धिसे, विदुरजीके वाक्यसे और दुरात्मा दुर्योधनकी चेष्टासे भी सोच-विचारकर ऐसा ही होता देखता हूँ
三阇耶说道:“噢,弗利什尼族的后裔啊,我以自身的明辨深思,又参照毗度罗的劝诫,并观那心性邪恶的杜罗约陀那之行径——我看见诸事正如这般分毫不差地展开。”
Verse 49
तस्माद् याहि चमूं वीर यावद्धन्मि शितै: शरै: । दुर्योधनं महाबाहो वाहिनी चास्य संयुगे,“अतः वीर! महाबाहो! आप कौरव-सेनाकी ओर चलिये, जिससे मैं पैने बाणोंद्वारा युद्धस्थलमें दुर्योधन और उसकी सेनाका संहार करूँ
三阇耶说道:“因此,噢,英雄、大臂者,速向军阵推进——趁尚有时机,我将以锐利之箭射杀杜罗约陀那,并在战斗的冲撞中一并歼灭他的军旅。”
Verse 50
क्षेममद्य करिष्यामि धर्मराजस्य माधव । हत्वैतद् दुर्बलं सैन्यं धार्तराष्ट्रस्य पश्यत:,“माधव! आज मैं दुर्योधनके देखते-देखते इस दुर्बल सेनाका नाश करके धर्मराजका कल्याण करूँगा”
三阇耶说道:“噢,摩陀婆啊,今日我必为法王奠定安泰:就在持国之子眼前,使他除了目睹别无他法,我将摧毁这支已然衰弱的俱卢军。”
Verse 51
संजय उवाच अभीषुहस्तो दाशार्हस्तथोक्त: सव्यसाचिना । तद् बलौघममित्राणामभीत: प्राविशद् बलात्,संजय कहते हैं--राजन्! सव्यसाची अर्जुनके ऐसा कहनेपर घोड़ोंकी बागडोर हाथमें लिये दशार्हकुल-नन्दन श्रीकृष्णने निर्भय हो शत्रुओंके उस सैन्य-सागरमें बलपूर्वक प्रवेश किया
三阇耶说道:“大王啊!当善于左右开弓的阿周那如此言毕,达沙尔诃族之荣光——圣克里希那,手执缰绳,毫无惧色,凭借威势强行闯入那敌军如海的阵中。”
Verse 52
कुन्तखड््गशरैघोरंं शक्तिकण्टकसंकुलम् । गदापरिघपन्थानं रथनागमहाद्रुमम्
三阇耶说道:“那景象骇人至极——长矛、利剑与箭雨森然交错;标枪密集如荆棘丛生;钉头锤与铁杵竟成行进之路;战车与战象则如参天巨木般矗立。”
Verse 53
तत्र गच्छ द्रुतं राज॑स्ततो द्रक्ष्यसि कौरवम् । “राजन! जहाँ यह मेघोंकी गम्भीर गर्जनाके समान भयानक शब्द गूँज रहा है, वहीं शीघ्रतापूर्वक चले जाइये, वहाँ आप कुरुराजका दर्शन कर सकेंगे”,हयपत्तिलताकीर्ण गाहमानो महायशा: । व्यचरत्तत्र गोविन्दो रथेनातिपताकिना
三阇耶说道:“大王,速往彼处;在那里你将得见俱卢之主。就在那雷云般深沉可怖的轰鸣回荡之地——正是那里。” 当时,声名显赫的戈文达(奎师那)乘着高旗战车,冲入马群、步卒与战车交织的密阵之中,往来驰骋。
Verse 54
वह सेना एक वनके समान थी। वह वन कुन्त, खड्ग और बाणोंसे अत्यन्त भयंकर प्रतीत होता था, शक्तिरूपी काँटोंसे भरा हुआ था, गदा और परिघ उसमें जानेके मार्ग थे, रथ और हाथी उसमें रहनेवाले बड़े-बड़े वृक्ष थे, घोड़े और पैदलरूपी लताओंसे वह व्याप्त हो रहा था, महायशस्वी भगवान् श्रीकृष्ण ऊँची पताकावाले रथके द्वारा उस सैन्यवनमें प्रवेश करके सब ओर विचरने लगे ।। ते हया: पाण्डुरा राजन् वहन्तो<र्जुनमाहवे । दिक्षु सर्वास्वदृश्यन्त दाशाहेण प्रचोदिता:,राजन! श्रीकृष्णके द्वारा हाँके गये वे सफेद घोड़े युद्धस्थलमें अर्जुनको ढोते हुए सम्पूर्ण दिशाओंमें दिखायी पड़ते थे
三阇耶说道:大王,那支军队宛如一片森林。此“军林”以矛、剑与箭而显得极其可怖;以“沙克提”之枪为荆棘遍布;以钉锤与铁杖为入林之径;战车与大象为其中参天巨木;马群与步卒如藤蔓般蔓延其间。声名显赫的圣者室利·奎师那乘高旗战车进入这“军林”,四方驰行。又有那被达沙尔哈(室利·奎师那)催策的淡白骏马,载着阿周那奔赴战阵,在战场四面皆可见其踪影。
Verse 55
ततः प्रायाद् रथेनाजी सव्यसाची परंतप: । किरन् शरशतांस्तीक्ष्णान् वारिधारा घनो यथा
三阇耶说道:于是,善用双手的阿周那——焚灼敌军者——乘战车向阵中推进,散射数百支锐箭,如雨云倾泻不绝的水幕。
Verse 56
इषुभिश्छाद्यमानानां समरे सव्यसाचिना
三阇耶说道:在战场上,他们被善用双手的弓手(阿周那)射出的箭雨所覆盖——所淹没。
Verse 57
इन्द्राशनिसमस्पर्शा गाण्डीवप्रेषिता: शरा:
三阇耶说道:从甘狄婆弓放出的箭矢,其触击如因陀罗之霹雳;一击之威,势不可当。
Verse 58
नरान् नागान् समाहत्य हयांश्वापि विशाम्पते । अपतन्त रणे बाणा: पतड़ा इव घोषिण:,प्रजानाथ! इन्द्रके वज़्की भाँति कठोर स्पर्शवाले बाण गाण्डीवसे प्रेरित हो मनुष्यों, घोड़ों और हाथियोंका भी संहार करके शब्द करनेवाले टिड्डीदलोंके समान रणभूमिमें गिर पड़ते थे
三阇耶说道:“噢,万民之主!那些箭矢击倒了人、巨象,亦及战马,随即落满战场,轰鸣呼啸,如蝗群翻涌。它们自甘狄婆弓发出,挟着坚硬如因陀罗金刚雷霆般的冲击力俯冲而下,显出战争无情的势头:技艺与兵器所至,毁灭转瞬即临。”
Verse 59
आसीत् सर्वमवच्छन्नं गाण्डीवप्रेषितै: शरैः । न प्राज्ञायन्त समरे दिशो वा प्रदिशोडपि वा,गाण्डीव धनुषसे छूटे हुए बाणोंद्वारा उस रणभूमिकी सारी वस्तुएँ आच्छादित हो गयी थीं। दिशाओं अथवा विदिशाओंका भी ज्ञान नहीं हो पाता था
三阇耶说道:“甘狄婆所发之箭遮蔽了整个战场。在那场交锋中,连方位与四隅之间的方向都难以辨认——箭雨如暴风,抹去了战争中一切凭依与秩序。”
Verse 60
सर्वमासीज्जगत् पूर्ण पार्थनामाड्कितै: शरै: । रुक्मपुड्खैस्तैलधौतै: कर्मारपरिमार्जिति:,अर्जुनके नामसे अंकित, तेलके धोये और कारीगरके साफ किये सुवर्णमय पंखवाले बाणोंद्वारा वहाँका सारा जगत् व्याप्त हो रथा था
三阇耶说道:“彼处仿佛整个世界都被刻有‘帕尔塔’之名的箭矢充满——金色羽翎,油洗洁净,铁匠磨拭光滑;阿周那的箭簇如此密集,遍布战阵。”
Verse 61
ते दहयमाना: पार्थेन पावकेनेव कुञ्जरा: । पार्थ न प्रजहुर्घोरा वध्यमाना: शितै: शरै:,दावानलके आगसे चलनेवाले हाथियोंके समान पार्थके पैने बाणोंकी मार खाकर दग्ध होते हुए वे घोर कौरवयोद्धा अर्जुनको छोड़कर हटते नहीं थे
三阇耶说道:“纵使被帕尔塔之箭灼烧,如同大象陷于林火,那些凶猛的俱卢战士即便被锐箭击杀,也不肯离开阿周那。”
Verse 62
शरचापधर: पार्थ: प्रज्वलन्निव भास्कर: । ददाह समरे योधान् कक्षमग्निरिव ज्वलन्,जैसे जलती हुई आग घास-फ़ूसके ढेरको जला देती है, उसी प्रकार सूर्यके समान प्रकाशित होनेवाले धनुष-बाणधारी अर्जुनने समरांगणमें आपके योद्धाओंको दग्ध कर दिया
三阇耶说道:“持弓挟箭的普利塔之子阿周那,炽然如日,在战场上灼烧你方勇士——正如烈火吞噬枯槁的灌木丛。”
Verse 63
यथा वनान्ते वनपैर्विसृष्ट: कक्ष दहेत् कृष्णगति: सुघोष: । भूरिद्रुमं शुष्कलतावितानं भृशं समृद्धो ज्वलन: प्रतापी,जैसे वनचरोंद्वारा वनके भीतर लगायी हुई आग धीरे-धीरे बढ़कर प्रज्वलित एवं महान् तापसे युक्त हो घास-फ़ूसके ढेरको, बहुसंख्यक वृक्षोंको और सूखी हुई लतावल्लरियोंको भी जलाकर भस्म कर देती है, उसी प्रकार नाराचसमूहोंद्वारा ताप देनेवाले, बाणरूपी ज्वालाओंसे युक्त, वेगवान्, प्रचण्ड तेजस्वी और अमर्षमें भरे हुए अर्जुनने समरांगणमें आपके पुत्रकी सारी रथसेनाको शीघ्रतापूर्वक भस्म कर डाला
三阇耶说道:“正如在密林深处,林中之人点起的火——以幽暗而不可遏止的速度奔走,轰然咆哮——渐渐膨胀成凶猛炽烈的大火,将灌木丛、成片的树木与枯藤交织的篷盖尽皆烧成灰烬;同样,阿周那——其箭如火舌,迅疾,光焰可怖,又为不屈的怒意所驱——在战场上迅速吞没了你儿子的全部战车军。”
Verse 64
एवं स नाराचगणप्रतापी शरार्चिरुच्चावचतिग्मतेजा: । ददाह सर्वा तव पुत्रसेना- ममृष्यमाणस्तरसा तरस्वी,जैसे वनचरोंद्वारा वनके भीतर लगायी हुई आग धीरे-धीरे बढ़कर प्रज्वलित एवं महान् तापसे युक्त हो घास-फ़ूसके ढेरको, बहुसंख्यक वृक्षोंको और सूखी हुई लतावल्लरियोंको भी जलाकर भस्म कर देती है, उसी प्रकार नाराचसमूहोंद्वारा ताप देनेवाले, बाणरूपी ज्वालाओंसे युक्त, वेगवान्, प्रचण्ड तेजस्वी और अमर्षमें भरे हुए अर्जुनने समरांगणमें आपके पुत्रकी सारी रथसेनाको शीघ्रतापूर्वक भस्म कर डाला
三阇耶说道:“于是那位大勇士,凭借成群的那罗迦箭雨之威而愈发凶猛——其气势锋利,因箭矢般的火焰光辉而炽然——焚尽了你诸子之军。因难以忍受(羞辱与战压),又被迅猛之力所驱,强大的阿周那在战场上迅速吞没他们的战车兵势,正如林中所燃的野火蔓延,以巨热将草木与枯藤化为灰烬。”
Verse 65
तस्येषव: प्राणहरा: सुमुक्ता नासज्जन् वै वर्मसु रुक्मपुड्खा: । न चद्ठितीयं प्रमुमोच बाणं नरे हये वा परमद्दिपे वा,उनके अच्छी तरह छोड़े हुए सुवर्णमय पंखवाले प्राणान्तकारी बाण कवचोंपर नहीं अटवकते थे। उन्हें छेदकर भीतर घुस जाते थे। वे मनुष्य, घोड़े अथवा विशालकाय हाथीपर भी दूसरा बाण नहीं छोड़ते थे (एक ही बाणसे उसका काम तमाम कर देते थे)
三阇耶说道:“他的夺命之箭,发放得极其精准,尾羽如金,并不滞留在甲胄之上;它们穿透铠甲,直入其内。无论是人、马,甚至雄伟的大象,他都不再放第二箭——一箭足以了结。”
Verse 66
अनेकरूपाकृतिभिहिं बाणै- महारथानीकमनुप्रविश्य । स एवैकस्तव पुत्रस्य सेनां जघान दैत्यानिव वज्रपाणि:,जैसे वज्रधारी इन्द्र दैत्योंका संहार कर डालते हैं, उसी प्रकार एकमात्र अर्जुनने ही रथियोंकी विशाल सेनामें प्रवेश करके अनेक रूप-रंगवाले बाणोंद्वारा आपके पुत्रकी सेनाका विनाश कर दिया
三阇耶说道:“他闯入强大战车武士的浩大军阵,以千姿百态的箭矢击射;阿周那仅凭一己之力便毁灭了你儿子的军队——正如执金刚杵的因陀罗屠戮代底耶诸魔。”
Verse 236
अपृच्छत् क्षत्रियांस्तत्र क्व नु राजा महाबल: । वह तुरंत कौरव-सेनामें पहुँचकर सबको युद्धके लिये शीघ्रता करनेकी प्रेरणा देता हुआ बोला--“शत्रुओंका दमन करनेवाले वीरो! तुम हर्ष और उत्साहके साथ युद्ध करो।” ऐसा कहकर उसने वहाँ बारंबार क्षत्रियोंसे पूछा--“महाबली राजा दुर्योधन कहाँ है?”
三阇耶说道:“在那里,他一再询问聚集的武士:‘那位大力之王究竟在何处?’他迅速赶到俱卢军阵之中,催促众人速赴战斗,高声道:‘能镇压敌人的英雄们啊,当以欢欣与昂扬之气奋战!’说罢,他又一次又一次问那里的刹帝利们:‘力大无比的杜尔约陀那王在何处?’”
Verse 376
तथास्य दृश्यते चेष्टा नीतिश्वैव विशाम्पते । 'जनार्दन! निश्चय ही यह अपने कुलका विनाश करनेवाला पैदा हुआ है। प्रजानाथ! इसकी नीति और चेष्टा ऐसी ही दिखायी देती है
三阇耶说道:“同样地,噢万民之主,他的行止与谋略也被看得清清楚楚,正是那般。‘阇那尔达那啊!确凿无疑——此人乃为毁灭自身宗族而生。噢护民者,他的计策与举动,分明就是如此。’”
Verse 556
प्रादुरासीन्महान् शब्द: शराणां नतपर्वणाम् | फिर तो जैसे बादल पानीकी धारा बरसाता है, उसी प्रकार शत्रुओंको संताप देनेवाले अर्जुन युद्धस्थलमें सैकड़ों पैने बाणोंकी वर्षा करते हुए रथके द्वारा आगे बढ़े। उस समय झुकी हुई गाँठवाले बाणोंका महान् शब्द प्रकट होने लगा
随即,带弯节之箭发出轰然巨响。正如云层倾泻雨瀑,折磨敌军的阿周那乘车向前推进,在战场上洒下数百支锋利之箭,如雨而落。
Verse 566
असज्जन्तस्तनुत्रेषु शरौघा: प्रापतन् भुवि । सव्यसाची अर्जुनद्वारा समरभूमिमें बाणोंसे आच्छादित होनेवाले सैनिकोंके कवचोंपर उनके बाण अटकते नहीं थे। वे चोट करके पृथ्वीपर गिर जाते थे
三阇耶说道:箭雨并不嵌入战士的甲胄;击中之后,便坠落于地。于是,在被阿周那箭矢覆盖的战场上,飞矢不附着于士卒的护具,只在撞击后落向大地。
The chapter frames a leadership dilemma: whether to preserve authority through tactical withdrawal after logistical breakdown (loss of chariot support) or to risk symbolic persistence that may amplify troop panic and systemic collapse.
Resolve (saṅkalpa) becomes effective only when paired with functional support systems and disciplined action; conversely, fear spreads when coordination fails, showing how inner states and external structures mutually condition outcomes.
No explicit phalaśruti is stated in this passage; its meta-significance lies in illustrating how the epic links ethical causality and practical competence—morale, logistics, and leadership—within the broader trajectory toward war termination.