Adhyaya 82
Ashvamedhika ParvaAdhyaya 8231 Versesपाण्डव-पक्ष के लिए निर्णायक विजय; प्रतिरोध टूटकर स्वीकृति में परिणत।

Adhyaya 82

अर्जुन–उलूपीसंवादः (Arjuna and Ulūpī: Explanation of Śānti and the Maṇipūra Resolution)

Upa-parva: Aśvamedhānugamana (Arjuna’s Horse-Guard Expedition) – Maṇipūra Episode

Arjuna addresses Ulūpī (daughter of the Nāga lord) with inquiries about her purpose and welfare, also asking whether he, Babhruvāhana, or Citrāṅgadā has caused any offense. Ulūpī responds with a clarifying account: she bears no grievance and requests Arjuna’s forbearance while she explains her actions. She frames the earlier Maṇipūra confrontation as a prescribed śānti (remedial pacification) connected to Bhīṣma’s death, which occurred under ethically complex conditions—Bhīṣma was not felled in straightforward combat but while engaged with Śikhaṇḍin. Ulūpī recounts a tradition involving the Vasus and Gaṅgā, indicating that without such śānti Arjuna would incur adverse karmic consequences; the arranged defeat by his own son functions as the corrective. Arjuna accepts the explanation, expresses satisfaction, and then instructs Babhruvāhana to attend Yudhiṣṭhira’s upcoming Aśvamedha with ministers and both mothers. Babhruvāhana agrees to come in a service capacity at the sacrifice; Arjuna, constrained by consecration (dīkṣā), declines to enter the city and continues following the sacrificial horse after due honors and leave-taking.

Chapter Arc: अश्वमेध का घोड़ा स्वेच्छाचारी होकर सीमाओं को लाँघता चला जाता है, और किरीटधारी अर्जुन उसके पीछे-पीछे चलते हुए दैवयोग से राजगृह (मगध) के निकट आ पहुँचते हैं। → नगर के पास अर्जुन को देखकर सहदेव का पुत्र (मगध-वीर) क्षत्रधर्म के अनुरूप चुनौती देता है—अश्व का अनुगमन रोकना ही उसके राज्य-गौरव की परीक्षा बन जाता है। रथ, ध्वज, पताका, अश्व और यंत्रों का वर्णन युद्ध-यंत्रणा को तीक्ष्ण करता है। → सव्यसाची क्रुद्ध होकर गाण्डीव खींचते हैं; शत्रु-पक्ष के अश्वों को निर्जीव कर देते हैं और सारथियों के शिर काटते हैं; फिर क्षुर से विरोधी का विशाल, विचित्र धनुष काटकर ध्वज-पताका गिरा देते हैं—मगध-वीर का प्रतिरोध निर्णायक रूप से टूट जाता है। → अर्जुन के वचन और पराक्रम से मेघसन्धि/मगध-पक्ष को सत्य का बोध होता है; वह हाथ जोड़कर अर्जुन का सम्मान करता है और अश्वमेध-घोड़े के अनुगमन में बाधा नहीं देता। → घोड़ा पुनः अपनी इच्छा से समुद्र-तट की ओर बढ़ता है—वंग, पुंड्र, कोसल आदि प्रदेशों में आगे अनेक म्लेच्छ-सेनाओं से संघर्ष का संकेत देता हुआ।

Shlokas

Verse 1

इस प्रकार श्रीमह्याभारत आश्वमेधिकपरववके अन्तर्गत अनुगीतापर्वरमें अश्चका अनुसरणविषयक इक्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ८१ ॥। ऑपन-- माल बछ। अकाल द्रयशीतितमो< ध्याय: मगधराज मेघसन्धिकी पराजय वैशम्पायन उवाच स तु वाजी समुद्रान्तां पर्येत्य वसुधामिमाम्‌ । निवृत्तो5भिमुखो राजन्‌ येन वारणसाह्दयम्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन! इसके बाद वह घोड़ा समुद्रपर्यन्त सारी पृथ्वीकी परिक्रमा करके उस दिशाकी ओर मुँह करके लौटा, जिस ओर हस्तिनापुर था

毗湿摩耶那说道:“大王,那祭马周行此大地,直至海洋之涯,便回转身来,面向婆罗那萨呼耶(哈斯提那补罗)所在的方向而归。”

Verse 2

अनुगच्छंश्न॒ तुरगं निवृत्तो5थ किरीटभृत्‌ । यदृच्छया समापेदे पुरं राजगृहं तदा,किरीटधारी अर्जुन भी घोड़ेका अनुसरण करते हुए लौट पड़े और दैवेच्छासे राजगृह नामक नगरमें आ पहुँचे

毗湿摩波耶那说:于是,戴冠的阿周那虽已折返,却仍追随阿湿婆梅陀祭马;凭借天命的安排,他恰巧来到名为王舍城(Rājagṛha)的城邑。

Verse 3

तमभ्याशगतं दृष्टवा सहदेवात्मज: प्रभो | क्षत्रधमें स्थितो वीर: समरायाजुहाव ह,प्रभो! अर्जुनको अपने नगरके निकट आया देख क्षत्रिय-धर्ममें स्थित हुए वीर सहदेवकुमार राजा मेघसन्धिने उन्हें युद्धके लिये आमन्त्रित किया

毗湿摩波耶那说:见阿周那逼近自己的城邑,勇武的弥伽散提王——萨诃提婆之子——坚守刹帝利之法,便依武士礼法正式向他发起决战挑战。

Verse 4

ततः पुरात्‌ स निष्क्रम्प रथी धन्‍वी शरी तली । मेघसन्धि: पदातिं तं धनंजयमुपाद्रवत्‌,तत्पश्चात्‌ स्वयं भी धनुष-बाण और दस्तानेसे सुसज्जित हो रथपर बैठकर नगरसे बाहर निकला। मेघसन्धिने पैदल आते हुए धनंजयपर धावा किया

毗湿摩波耶那说:随后他出城而来,乘战车,执弓在手,备有箭矢与护具。弥伽散提却徒步前进,猛然冲向檀那阇耶(阿周那)发动攻击。

Verse 5

आसाद्य च महातेजा मेघसन्धिर्धनंजयम्‌ । बालभावान्महाराज प्रोवाचेद॑ न कौशलात्‌,महाराज! धनंजयके पास पहुँचकर महातेजस्वी मेघसन्धिने बुद्धिमानीके कारण नहीं, मूर्खतावश निम्नांकित बात कही--

毗湿摩波耶那说:当那光辉炽盛的弥伽散提走近檀那阇耶时,噢,大王,他说出了如下言辞——并非出于谨慎或谋略,而是出于幼稚的愚妄。

Verse 6

किमयं चार्यते वाजी स्त्रीमध्य इव भारत । हयमेनं हरिष्यामि प्रयतस्व विमोक्षणे,“भरतनन्दन! इस घोड़ेके पीछे क्‍यों फिर रहे हो! यह तो ऐसा जान पड़ता है, मानो स्त्रियोंके बीच चल रहा हो। मैं इसका अपहरण कर रहा हूँ। तुम इसे छुड़ानेका प्रयत्न करो

毗湿摩波耶那说:“噢,婆罗多的后裔!为何要这样牵引这匹祭马——仿佛它行走在妇人之中?我将夺走此马;你且竭尽全力来解救它吧!”

Verse 7

अदत्तानुनयो युद्धे यदि त्वं पितृभिर्मम । करिष्यामि तवातिथ्यं प्रहर प्रहहामि च,“यदि युद्धमें मेरे पिता आदि पूर्वजोंने कभी तुम्हारा स्वागत-सत्कार नहीं किया है तो आज मैं इस कमीको पूर्ण करूँगा। युद्धके मैदानमें तुम्हारा यथोचित आतिथ्य-सत्कार करूँगा। पहले मुझपर प्रहार करो, फिर मैं तुमपर प्रहार करूँगा”

毗湿摩波耶那说道:“若在战阵之中,我的父辈与先祖从未以应有的礼数迎接并尊敬你,那么今日我当补足此缺。在这战场上,我将以待客之礼相报——你先击我,然后我再回击你。”

Verse 8

इत्युक्त: प्रत्युवाचैनं प्रहसन्निव पाण्डव: । विघ्नकर्ता मया वार्य इति मे व्रतमाहितम्‌,उसके ऐसा कहनेपर पाण्घुपुत्र अर्जुनने उसे हँसते हुए-से इस प्रकार उत्तर दिया --नरेश्वर! मेरे बड़े भाईने मेरे लिये इस व्रतकी दीक्षा दिलायी है कि जो मेरे मार्गमें विघ्न डालनेको उद्यत हो, उसे रोको। निश्चय ही यह बात तुम्हें भी विदित है। अतः तुम अपनी शक्तिके अनुसार मुझपर प्रहार करो। मेरे मनमें तुमपर कोई रोष नहीं है”

阿周那这位般度子被如此言及,仿佛含笑答道:“凡欲阻我行程者,皆当为我所制止——此乃加诸我身的誓愿。故而你当尽你之力来击我;我心中对你并无嗔怒。”

Verse 9

भ्रात्रा ज्येष्देन नृपते तवापि विदितं ध्रुवम्‌ । प्रहरस्व यथाशक्ति न मन्युर्विद्यते मम,उसके ऐसा कहनेपर पाण्घुपुत्र अर्जुनने उसे हँसते हुए-से इस प्रकार उत्तर दिया --नरेश्वर! मेरे बड़े भाईने मेरे लिये इस व्रतकी दीक्षा दिलायी है कि जो मेरे मार्गमें विघ्न डालनेको उद्यत हो, उसे रोको। निश्चय ही यह बात तुम्हें भी विदित है। अतः तुम अपनी शक्तिके अनुसार मुझपर प्रहार करो। मेरे मनमें तुमपर कोई रोष नहीं है”

毗湿摩波耶那说道:“大王,此事你也必定知晓:我被长兄以誓愿所系。故而你当依你之力击我;我心中并无怒意。”

Verse 10

इत्युक्त: प्राहरत्‌ पूर्व पाण्डवं मगधेश्वर: । किरन्‌ शरसहस्राणि वर्षाणीव सहस्रदूक्‌,अर्जुनके ऐसा कहनेपर मगधनरेशने पहले उनपर प्रहार किया। जैसे सहसनेत्रधारी इन्द्र जलकी वर्षा करते हैं, उसी प्रकार मेघसन्धि अर्जुनपर सहस्रों बाणोंकी झड़ी लगाने लगा

毗湿摩波耶那说道:既被如此告知,摩揭陀王便先向般度子出手。他倾泻千百箭矢,如千眼因陀罗降下甘霖一般,将箭雨铺天盖地洒向阿周那。

Verse 11

ततो गाण्डीवभृच्छूरो गाण्डीवप्रहितै: शरै: । चकार मोघांस्तान्‌ बाणान्‌ सयत्नान्‌ भरतर्षभ,भरतश्रेष्ठ। तब गाण्डीवधारी शूरवीर अर्जुनने गाण्डीव धनुषसे छोड़े गये बाणोंद्वारा मेघसन्धिके प्रयत्नपूर्वक चलाये गये उन सभी बाणोंको व्यर्थ कर दिया

随后,执持甘狄婆的英雄阿周那,以甘狄婆所发之箭,使对方竭力射来的诸箭尽皆落空——噫,婆罗多族中的雄杰。

Verse 12

स मोघं तस्य बाणौघं कृत्वा वानरकेतन: । शरान्‌ मुमोच ज्वलितान्‌ दीप्तास्यानिव पन्नगान्‌,शत्रुके बाणसमूहको निष्फल करके कपिध्वज अर्जुनने प्रज्वलित बाणका प्रहार किया। वे बाण मुखसे आग उगलनेवाले सर्पोंके समान जान पड़ते थे

毗湿摩波耶那说:他先使对手的箭雨尽成徒劳;随后,旗帜绘有哈奴曼徽记的阿周那放出炽燃之箭,宛如口吐烈焰的群蛇。

Verse 13

ध्वजे पताकादण्डेषु रथे यन्त्रे हयेषु च । अन्येषु च रथाज्रेषु न शरीरे न सारथौ,उन्होंने मेघसन्धिकी ध्वजा, पताका, दण्ड, रथ, यन्त्र, अश्व तथा अन्य रथांगोंपर बाण मारे; परंतु उसके शरीर और सारथिपर प्रहार नहीं किया

毗湿摩波耶那说:他把箭射向战车的徽记与部件——旗帜、旌幡、旗杆、车架、机括、战马以及其他构件——却不射伤那武士的身体,也不伤车夫。

Verse 14

संरक्ष्यमाण: पार्थेन शरीरे सव्यसाचिना । मन्यमान: स्ववीर्य तन्‍्मागध: प्राहिणोच्छरान्‌,यद्यपि सव्यसाची अर्जुनने जान-बूझकर उसके शरीरकी रक्षा की तथापि वह मगधराज इसे अपना पराक्रम समझने लगा और अर्जुनपर लगातार बाणोंका प्रहार करता रहा

尽管帕尔塔——能左右开弓的阿周那——有意护住他的身体,摩揭陀王却以为这是自己勇力所致,仍不断向阿周那倾泻箭雨。

Verse 15

ततो गाण्डीवधन्वा तु मागधेन भूशाहतः । बभौ वसनन्‍्तसमये पलाश: पुष्पितो यथा,मगधराजके बाणोंसे अत्यन्त घायल होकर गाण्डीवधारी अर्जुन रक्तसे नहा उठे। उस समय वे वसन्त-ऋतुमें फूले हुए पलाश-वृक्षकी भाँति सुशोभित हो रहे थे

于是,执持甘狄婆的阿周那被摩揭陀王的箭重创,浑身浴血却愈发耀目,宛如春时盛放的婆罗沙树。

Verse 16

अवध्यमान: सो< भ्यघ्नन्मागध: पाण्डवर्ष भम्‌ । तेन तस्थौ स कौरव्य लोकवीरस्य दर्शने,कुरुनन्दन! अर्जुन तो उसे मार नहीं रहे थे, परंतु वह उन पाण्डवशिरोमणिपर बारंबार चोट कर रहा था। इसीलिये विश्वविख्यात वीर अर्जुनकी दृष्टिमें वह तबतक ठहर सका

毗湿摩波耶那说:阿周那虽不将他击杀,那摩揭陀人仍一再攻击这位般度族中的雄杰。正因这般执拗,哦,俱卢中的至善者,他才得以在这位举世闻名的英雄眼前站立片刻——只要阿周那仍克制不取其命。

Verse 17

सव्यसाची तु संक्रुद्धों विकृष्प बलवद्‌ धनु: । हयांश्वकार निर्जीवान्‌ सारथेश्व शिरोडहरत्‌,अब सव्यसाची अर्जुनका क्रोध बढ़ गया। उन्होंने अपने धनुषको जोरसे खींचा और मेघसन्धिके घोड़ोंको प्राणहीन करके उसके सारथिका भी सिर उड़ा दिया

毗湿摩波耶那说:于是,双手皆能施射的阿周那怒火炽盛,猛力张弓;他射倒战马,使之尽皆毙命,又斩落御者之首。

Verse 18

धनुश्नास्य महच्चित्रं क्षुरेण प्रचकर्त ह । हस्तावापं पताकां च ध्वजं चास्य न्यपातयत्‌,फिर उसके विशाल एवं विचित्र धनुषको क्षुरसे काट डाला और उसके दस्ताने, पताका तथा ध्वजाको भी धरतीपर काट गिराया

毗湿摩波耶那说:他以刃利如剃刀之器,斩断那战士宏大而奇异的弓;又将其护臂、旗帜与旌标尽皆击落于地。

Verse 19

स राजा व्यथितो व्यश्वो विधनुर्हतसारथि: । गदामादाय कौन्तेयमभिदुद्राव वेगवान्‌,घोड़े, धनुष और सारथिके नष्ट हो जानेपर मेघसन्धिको बड़ा दुःख हुआ। वह गदा हाथमें लेकर कुन्तीनन्दन अर्जुनकी ओर बड़े वेगसे दौड़ा

毗湿摩波耶那说:那国王悲愤震惶——马已尽失,弓亦被毁,御者又遭斩杀——便执起钉锤,挟着凶猛的冲势,直扑昆蒂之子阿周那。

Verse 20

तस्यापतत एवाशु गदां हेमपरिष्कृताम्‌ । शरैश्वकर्त बहुधा बहुभिग्गुप्रवाजितै:,उसके आते ही अर्जुनने गृध्रपंखयुक्त बहुसंख्यक बाणोंद्वारा उसकी सुवर्णभूषित गदाके शीघ्र ही अनेक टुकड़े कर डाले

毗湿摩波耶那说:他方才扑至,阿周那便以无数缀有兀鹫羽的箭矢,迅疾将那镶金之钉锤射得粉碎,裂作多段。

Verse 21

सा गदा शकलीभूता विशीर्णमणिबन्धना । व्याली विमुच्यामानेव पपात धरणीतले,उस गदाकी मूँठ टूट गयी और उसके टुकड़े-टुकड़े हो गये। उस दशामें वह हाथसे छूटी हुई सर्पिणीके समान पृथ्वीपर गिर पड़ी

毗湿摩波耶那说:那钉锤已成碎片,宝石系扣尽皆断裂;它从手中滑脱,坠落尘土之上,宛如一条雌蛇被放开时倏然落地。

Verse 22

विरथ॑ं विधनुष्कं च गदया परिवर्जितम्‌ | सान्त्वपूर्वमिदं वाक्‍्यमब्रवीत्‌ कपिकेतन:,जब मेघसन्धि रथ, धनुष और गदासे भी वंचित हो गया, तब कपिध्वज अर्जुनने उसे सान्त्वना देते हुए इस प्रकार कहा--

当他失去战车、失去弓,甚至连钉锤也被夺去时,旗帜上绘有哈奴曼徽记的阿周那以安抚劝慰之言对他说道。

Verse 23

पर्याप्त: क्षत्रधर्मो<यं दर्शित: पुत्र गम्यताम्‌ । बह्नेतत्‌ समरे कर्म तव बालस्य पार्थिव,“बेटा! तुमने क्षत्रियधर्मका पूरा-पूरा प्रदर्शन कर लिया। अब अपने घर जाओ। भूपाल! तुम अभी बालक हो। इस समरांगणमें तुमने जो पराक्रम किया है, यही तुम्हारे लिये बहुत है

毗湿摩波耶那说道:“够了——孩子,你已将刹帝利之法尽数展现。如今回家去吧。噢,国王,你仍是孩童;你在此战场上所显的勇武,已绰绰有余。”

Verse 24

युधिष्ठटिरस्य संदेशो न हन्तव्या नूपा इति । तेन जीवसि राजंस्त्वमपराद्धो5पि मे रणे,“राजन! महाराज युधिष्ठटिरका यह आदेश है कि “तुम युद्धमें रुजाओंका वध न करना।' इसीलिये तुम मेरा अपराध करनेपर भी अबतक जीवित हो”

毗湿摩波耶那说道:“这是由提施提罗的命令:‘不可杀诸王。’因此,噢,国王,纵然你在战斗中冒犯了我,你仍得以活命——因为我遵从了那道戒令。”

Verse 25

इति मत्वा तदात्मान प्रत्यादिष्टं सम मागध: । तथ्यमित्यभिगम्यैनं प्राउजलि: प्रत्यपूजयत्‌,अर्जुनकी यह बात सुनकर मेघसन्धिको यह विश्वास हो गया कि अब इन्होंने मेरी जान छोड़ दी है। तब वह अर्जुनके पास गया और हाथ जोड़ उनका समादर करते हुए कहने लगा--

他明白自己确已被饶命,并被正式遣退,便以摩揭陀之身走近阿周那;双手合十致敬,恭恭敬敬地向他致礼。

Verse 26

पराजितो<स्मि भद्ठ ते नाहं योद्धुमिहोत्सहे । यद्‌ यत्‌ कृत्यं मया तेड्द्य तद्‌ ब्रूहि कृतमेव तु,“वीरवर! आपका कल्याण हो। मैं आपसे परास्त हो गया। अब मैं युद्ध करनेका उत्साह नहीं रखता। अब आपको मुझसे जो-जो सेवा लेनी हो, वह बताइये और उसे पूर्ण की हुई ही समझिये'

“尊贵的勇士啊,我已败北,愿你吉祥。我已无意再在此处交战。今日你要我做何事,只管吩咐——就当作已经办妥。”

Verse 27

तमर्जुन: समाश्चास्य पुनरेवेदमब्रवीत्‌ । आगन्तव्यं परां चैत्रीमश्वमेथे नृपस्य न:,तब अर्जुनने उसे धैर्य देते हुए पुनः इस प्रकार कहा--“राजन्‌! तुम आगामी चैत्रमासकी पूर्णिमाको हमारे महाराजके अश्वमेधयज्ञमें अवश्य आना”

毗湿摩波耶那说:阿周那安抚了他,又再次说道:“大王,来临的制多罗月(Caitra)望日,你务必前来参加我王的马祭(Aśvamedha)。”

Verse 28

इत्युक्त: स तथेत्युक्त्वा पूजयामास तं इयम्‌ । फाल्गुनं च युधि श्रेष्ठ विधिवत्‌ सहदेवज:,उनके ऐसा कहनेपर सहदेवपुत्रने 'बहुत अच्छा” कहकर उनकी आज्ञा शिरोधार्य की और उस घोड़े तथा युद्धस्थलके श्रेष्ठ वीर अर्जुनका विधिपूर्वक पूजन किया

毗湿摩波耶那说:他听罢便答道:“谨遵此命。”恭敬受令后,又依正仪礼敬奉那匹马,并礼敬战场第一勇士——法尔古那(阿周那)。

Verse 29

ततो यथेष्टमगमत्‌ पुनरेव स केसरी । ततः समुद्रतीरेण वज्भान्‌ पुण्ड्रानू सकोसलान्‌,तदनन्तर वह घोड़ा पुनः अपनी इच्छाके अनुसार आगे चला। वह समुद्रके किनारे- किनारे होता हुआ वड़, पुण्ड्र और कोसल आदि देशोंमें गया

毗湿摩波耶那说:随后,那如狮般的勇者又随其所愿继续前行。继而沿着海岸而行,穿过旁伽(Vaṅga)、奔陀罗(Puṇḍra),又经由憍萨罗(Kośala)等诸国。

Verse 30

तत्र तत्र च भूरीणि म्लेच्छसैन्यान्यनेकश: । विजिग्ये धनुषा राजन्‌ गाण्डीवेन धनंजय:,राजन! उन देशोंमें अर्जुनने केवल गाण्डीव धनुषकी सहायतासे म्लेच्छोंकी अनेक सेनाओंको परास्त किया

毗湿摩波耶那说:“在那一处又一处的诸多地域中,哦,大王,檀那阇耶(阿周那)凭其弓——甘狄婆(Gāṇḍīva)之威,屡次击败无数弥勒叉(mleccha)军队。”

Verse 82

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि अश्वानुसरणे मागधपराजये दयशीतितमो<्ध्याय:

至此,《圣摩诃婆罗多》之《马祭篇》(Āśvamedhika Parva)中《阿努歌罗》(Anugītā)小段,叙述追随祭马与摩揭陀人败北的第八十二章告终。

Frequently Asked Questions

The chapter problematizes responsibility for Bhīṣma’s death: although strategically achieved, it is portrayed as not a straightforward combat kill, prompting the need for remedial śānti so that strategic necessity does not remain ethically unresolved.

Even when actions occur within a sanctioned conflict, ethically ambiguous means may require restorative measures; dharma is maintained through acknowledgement, proportionate remediation, and reintegration rather than denial or triumphalism.

There is no explicit phalaśruti formula; instead, the meta-function is etiological and normative—linking a narrative event to karmic consequence and presenting śānti as the interpretive key that prevents moral residue from persisting into the post-war order.