Adhyaya 7
Ashvamedhika ParvaAdhyaya 727 Verses

Adhyaya 7

Marutta Seeks Saṃvarta’s Priestly Support; Conditions, Truth-Discipline, and Rival Powers

Upa-parva: Marutta–Saṃvarta Saṃvāda (Episode on Marutta’s Sacrifice and Saṃvarta’s Priestly Agency)

This chapter presents a structured dialogue among Saṃvarta, King Marutta, and the narrator Vyāsa. Saṃvarta first asks how Marutta recognized him; Marutta replies that Nārada identified Saṃvarta as his guru’s son, prompting trust. Saṃvarta confirms and inquires about Nārada’s whereabouts; Marutta reports that Nārada entered the sacrificial fire after granting leave. Vyāsa notes Saṃvarta’s satisfaction, followed by Saṃvarta’s harsh, testing speech. Saṃvarta describes his own altered condition (wind-dominated, unstable form) and initially redirects Marutta to his capable elder brother Bṛhaspati, emphasizing that without Bṛhaspati’s permission he will not officiate. Marutta states he already approached Bṛhaspati but was refused, allegedly due to Indra’s discouragement and competitive tension. Saṃvarta then outlines the stakes: if Saṃvarta officiates, Bṛhaspati and Indra may become angry; Marutta must demonstrate unwavering commitment. Marutta vows steadfastness, after which Saṃvarta commits to arranging inexhaustible resources for the rite and promises Marutta parity with Indra, while stating his own motive is not wealth but to counter the hostility of both his brother and Indra. The chapter opens with an explicit truth-warning: truthful speech yields fulfillment of aims; falsehood brings severe consequences.

Chapter Arc: मरुत्त राजा, नारद के मुख से ‘गुरुपुत्र’ संवर्त की अद्भुत कीर्ति सुनकर, उसे खोजता हुआ आता है—और सामने एक उन्मत्त-से, रूक्ष वाणी वाले ब्राह्मण को पाकर भी श्रद्धा नहीं छोड़ता। → संवर्त बार-बार कठोर शब्दों में मरुत्त को परखता और झिड़कता है; मरुत्त विनयपूर्वक अपना हेतु बताता है—वह संवर्त को अपना याजक बनाना चाहता है। संवर्त भीतर से बृहस्पति द्वारा तिरस्कृत होने की पीड़ा और इन्द्र-आश्रित व्यवस्था के प्रति वितृष्णा प्रकट करता है, और कहता है कि अब उसका मन बृहस्पति के पास लौटने का नहीं। → मरुत्त का आग्रह चरम पर पहुँचता है—वह संवर्त का साथ छोड़ने को अशुभ मानता है और उसके चरणों में दृढ़ निष्ठा रखता है। तब संवर्त प्रतिज्ञा करता है: वह मरुत्त को ‘अक्षय धन’ दिलाएगा, देव-गन्धर्वों सहित इन्द्र तक को चुनौती देने योग्य वैभव देगा, और उसे इन्द्र के समकक्ष प्रतिष्ठा तक पहुँचा देगा—यद्यपि वह स्वयं धन-संग्रह या यजमान-लाभ के लिए नहीं, बल्कि इन्द्र-भ्राता (बृहस्पति) के प्रति ‘विप्रिय’ करने की धुरी पर यह करेगा। → संवर्त मरुत्त का यज्ञ कराने की स्वीकृति देता है और अपने उद्देश्य स्पष्ट करता है—यह कर्म व्यक्तिगत लोभ से नहीं, बल्कि अपमानित गुरु-शिष्य-सम्बन्ध की गाँठ और देव-राजनीति के प्रतिरोध से प्रेरित है; मरुत्त को सत्य-निष्ठ रहने का संकेत भी मिलता है कि सत्य बोलने से मनोरथ सिद्ध होते हैं। → संवर्त की प्रतिज्ञा के बाद प्रश्न लटकता है—क्या यह यज्ञ इन्द्र की सत्ता को सचमुच चुनौती देगा, और बृहस्पति-इन्द्र की प्रतिक्रिया किस रूप में प्रकट होगी?

Shlokas

Verse 1

/ अपन क्रात बछ। अर: सप्तमो<्ध्याय: संवर्त और मरुत्तकी बातचीत, मरुत्तके विशेष आग्रहपर संवर्तका यज्ञ करानेकी स्वीकृति देना संवर्त उवाच कथमस्मि त्वया ज्ञात: केन वा कथितो<स्मि ते । एतदाचक्ष्व मे तत्त्वमिच्छसे चेन्मम प्रियम्‌,संवर्त बोले--राजन! तुमने मुझे कैसे पहचाना है? किसने तुम्हें मेरा परिचय दिया है? यदि मेरा प्रिय चाहते हो तो यह सब मुझे ठीक-ठीक बताओ

桑婆尔塔说道:“大王,你是如何认出我的?又是谁将我的来历告诉了你?若你真想取悦于我,就把此事如实、分明地说来。”

Verse 2

सत्यं ते ब्रुवतः सर्वे सम्पत्स्यन्ते मनोरथा: । मिथ्या च ब्रुवतो मूर्धा शतधा ते स्फुटिष्यति,यदि सच-सच बता दोगे तो तुम्हारे सारे मनोरथ पूर्ण होंगे और यदि झूठ बोलोगे तो तुम्हारे मस्तकके सैकड़ों टुकड़े हो जायँगे

桑婆尔塔说道:“你若说真话,你的一切所愿皆将成就;你若说谎,你的头颅将裂作百片。”

Verse 3

मरुत्त उवाच नारदेन भवान्‌ महामाख्यातो हाटता पथि । गुरुपुत्रो ममेति त्वं ततो मे प्रीतिरुत्तमा,मरुत्तने कहा--मुने! भ्रमणशील नारदजीने रास्तेमें मुझे आपका परिचय दिया और पता बताया। आप मेरे गुरु अंगिराके पुत्र हैं, यह जानकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है

摩鲁塔说道:“牟尼啊,我行旅在路时,那罗陀详尽地谈起你,并将你介绍于我。得知你是我所敬奉之师安吉罗娑(Aṅgiras)之子,我的欢喜便达于极致。”

Verse 4

संवर्त उवाच सत्यमेतद्‌ भवानाह स मां जानाति सत्रिणम्‌ | कथयस्व तदेतन्मे क्व नु सम्प्रति नारद:,संवर्त बोले--राजन्‌! तुम ठीक कहते हो, नारदको यह मालूम है कि मैं यज्ञ कराना जानता हूँ और गुप्त वेषमें घूम रहा हूँ। अच्छा यह तो बताओ, इस समय नारद कहाँ हैं?

桑婆尔塔说道:“大王,你所言不虚。那罗陀知道我善于主持祭祀,纵然我以隐蔽之身行走世间。既如此,告诉我——那罗陀如今在何处?”

Verse 5

मरुत्त उवाच भवन्तं कथयित्वा तु मम देवर्षिसत्तम: । ततो मामभ्यनुज्ञाय प्रविष्टो हव्यवाहनम्‌,मरुत्तने कहा--मुने! मुझे आपका परिचय और पता बताकर देवर्षिशिरोमणि नारद मुझे जानेकी आज्ञा दे स्वयं अग्निमें प्रवेश कर गये थे

马鲁塔说道:“他先将你引见于我,那位天界仙圣之最便准我告退;既赐允诺,便投入哈维耶瓦哈那(阿耆尼)——即火神之火本身。”

Verse 6

व्यास उवाच श्र॒त्वा तु पार्थिवस्यैतत्‌ संवर्त: प्रमुदं गत: । एतावदहमप्येवं शक्‍नुयामिति सोडब्रवीत्‌,व्यासजी कहते हैं--राजन्‌! राजाकी यह बात सुनकर संवर्तको बड़ी प्रसन्नता हुई और बोले--“इतना तो मैं भी कर सकता हूँ

毗耶娑说道:听了国王这番话,三跋尔多大为欢喜,答道:“这点事——连我也做得到。”

Verse 7

ततो मरुत्तमुन्मत्तों वाचा निर्भ्त्सयन्निव । रूक्षया ब्राह्मणो राजन्‌ पुन: पुनरथाब्रवीत्‌,राजन! वे उन्मत वेषधारी ब्राह्मण देवता मरुत्तको अपनी रूखी वाणीद्वारा बारंबार फटकारते हुए-से बोले-- इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अश्वमेधपर्वणि संवर्तमरुत्तीये सप्तमो5ध्याय:

随后,王啊,那婆罗门仿佛癫狂一般,以粗厉之言不断斥责马鲁塔;一遍又一遍,他用生硬的口吻说着,宛如严加申斥。

Verse 8

वातप्रधानेन मया स्वचित्तवशवर्तिना । एवं विकृतरूपेण कथं याजितुमिच्छसि,“नरेश्वर! मैं तो वायु-प्रधान--बावला हूँ, अपने मनकी मौजसे ही सब काम करता हूँ, मेरा रूप भी विकृत है। अतः मुझ-जैसे व्यक्तिसे तुम क्‍यों यज्ञ कराना चाहते हो?

“我为风大所主,飘忽不定、躁动任性,只随己心而行;我的形貌亦不端整、不加修饰。故而,人中王啊,你为何要让像我这样的人来主持祭祀?”

Verse 9

भ्राता मम समर्थक्षु वासवेन च संगत: । वर्तते याजने चैव तेन कर्माणि कारय,“मेरे भाई बृहस्पति इस कार्यमें पूर्णतः समर्थ हैं। आजकल इन्द्रके साथ उनका मेलजोल बढ़ा हुआ है। वे उनके यज्ञ करानेमें लगे रहते हैं। अतः उन्हींसे अपने सारे यज्ञकर्म कराओ

“我兄弟于此事全然胜任,且与瓦萨瓦(因陀罗)交往甚密;他正勤于主持诸般祭祀。故当由他为你办理一切祭仪。”

Verse 10

गार्हस्थ्यं चैव याज्याश्न सर्वा गृह्माश्व देवता: । पूर्वजेन ममाक्षिप्तं शरीरं वर्जितं त्विदम्‌,“घर-गृहस्थीका सारा सामान, यजमान तथा गृहदेवताओंके पूजन आदि कर्म--इन सबको इस समय मेरे बड़े भाईने अपने अधिकारमें कर लिया है। मेरे पास तो केवल मेरा एक शरीर ही छोड़ रखा है

“家居之道与祭祀所需的一切器用,以及对祭主与家神的供奉诸业——此时此刻,都已被我长兄收归其权下。留给我的,唯有这具躯身而已。”

Verse 11

नाहं तेनाननुज्ञातस्त्वामाविक्षित कहिचित्‌ | याजयेयं कथंचिद्‌ वै स हि पूज्यतमो मम,“अविक्षित्‌-कुमार! मैं उनकी आज्ञा प्राप्त किये बिना कभी किसी तरह भी तुम्हारा यज्ञ नहीं करा सकता; क्योंकि वे मेरे परम पूजनीय भाई हैं

毗耶娑说道:“阿毗克希多啊,若未得他允准,我无论如何都不能为你主持祭祀。他于我最为可敬,堪受至高的敬礼。”

Verse 12

स त्वं बृहस्पतिं गच्छ तमनुज्ञाप्य चाव्रज । ततो<हं याजयिष्ये त्वां यदि यष्टमिहेच्छसि,“अतः तुम बृहस्पतिके पास जाओ और उनकी आज्ञा लेकर आओ। उस दशामें यदि तुम यज्ञ कराना चाहो तो मैं यज्ञ करा दूँगा”

毗耶娑说道:“因此你当去见布里哈斯帕提,求得他的许可,再回到此处。那时,若你在此情形下确实仍欲行祭,我便为你主持,使仪轨得以完成。”

Verse 13

मरुत्त उवाच बृहस्पतिं गत: पूर्वमहं संवर्त तच्छूणु । न मां कामयते याज्यमसौ वासवकाम्यया,मरुत्तने कहा--संवर्तजी! मैं पहले बृहस्पतिजीके ही पास गया था। वहाँका समाचार बताता हूँ, सुनिये। वे इन्द्रको प्रसन्न रखनेकी इच्छासे अब मुझे अपना यजमान बनाना नहीं चाहते हैं

马鲁塔说道:“三婆尔多啊,我先前已先去见过布里哈斯帕提。我将把那里的情形告知你——且听。因欲取悦瓦萨瓦(因陀罗),他如今不愿以我为祭主。”

Verse 14

अमरं याज्यमासाद्य याजयिष्ये न मानुषम्‌ | शक्रेण प्रतिषिद्धो5हं मरुत्तं मा सम याजये:,उन्होंने स्पष्ट कह दिया है कि “अमर यजमान पाकर अब मैं मरणधर्मा मनुष्यका यज्ञ नहीं कराऊँगा।” साथ ही इन्द्रने मना भी किया है कि “आप मरुत्तका यज्ञ न कराइयेगा; क्योंकि ब्रह्मन! वह राजा सदा मेरे साथ ईर्ष्या रखता है।' इन्द्रकी इस बातको आपके भाईने “एवमस्तु"” कहकर स्वीकार कर लिया है

马鲁塔说道:“他明言:‘如今我既得一位不死的祭主,便不再为必死之人主持祭祀。’又有释迦罗(因陀罗)禁我:‘不可为马鲁塔行祭;那位国王常怀嫉妒,与我为敌。’你兄长应允了因陀罗之命,说:‘如是。’”

Verse 15

स्पर्थते हि मया विप्र सदा हि स तु पार्थिव: । एवमस्त्विति चाप्युक्तो भ्रात्रा ते बलसूदन:,उन्होंने स्पष्ट कह दिया है कि “अमर यजमान पाकर अब मैं मरणधर्मा मनुष्यका यज्ञ नहीं कराऊँगा।” साथ ही इन्द्रने मना भी किया है कि “आप मरुत्तका यज्ञ न कराइयेगा; क्योंकि ब्रह्मन! वह राजा सदा मेरे साथ ईर्ष्या रखता है।' इन्द्रकी इस बातको आपके भाईने “एवमस्तु"” कहकर स्वीकार कर लिया है

马鲁塔说道:“婆罗门啊,那位国王确实总是嫉妒我。你的兄长——诛灭婆罗者——也已对此表示同意,说:‘就这样吧。’”

Verse 16

स मामधिगतं प्रेम्णा याज्यत्वेन बुभूषति । देवराजं समाश्रित्य तद्‌ विद्धि मुनिपुड़्व,मुनिप्रवर! मैं बड़े प्रेमसे उनके पास गया था; परंतु वे देवराज इन्द्रका आश्रय लेकर मुझे अपना यजमान बनाना ही नहीं चाहते हैं। इस बातको आप अच्छी तरह जान लें

他怀着深情来接近我,想要接纳我为祭主(yajamāna)。然而他依凭天帝因陀罗——诸神之王——实际上并不愿真正立我为祭主。最上仙人啊,请你明明白白知晓此事。

Verse 17

सो5हमिच्छामि भवता सर्वस्वेनापि याजितुम्‌ । कामये समत्तिक्रान्तुं वासवं त्वत्कृतैर्गुणै:,अतः मेरी इच्छा यह है कि मैं सर्वस्व देकर भी आपसे ही यज्ञ कराऊँ और आपके द्वारा सम्पादित गुणोंके प्रभावसे इन्द्रको भी मात कर दूँ

马鲁塔说道:“因此我愿由你来为我主持此祭——纵使我必须散尽全部财宝。我渴望凭你所成就的卓越功德,超越瓦萨瓦(因陀罗)本人。”

Verse 18

न हि मे वर्तते बुद्धिर्गन्तु ब्रह्मन्‌ बृहस्पतिम्‌ । प्रत्याख्यातो हि तेनास्मि तथानपकृते सति,ब्रह्म! अब बृहस्पतिके पास जानेका मेरा विचार नहीं है; क्योंकि बिना अपराधके ही उन्होंने मेरी प्रार्थना अस्वीकृत कर दी है

马鲁塔说道:“婆罗门啊,我已不再有决心去见布里哈斯帕提。因为我并未冒犯于他,他却拒绝了我的请求。在这种情形下,我若再去求他,仿佛什么都未发生,便是不合礼法。”

Verse 19

संवर्त उवाच चिकीर्षसि यथाकामं सर्वमेतत्‌ त्वयि ध्रुवम्‌ यदि सर्वानभिप्रायान्‌ कर्तासि मम पार्थिव,संवर्तने कहा--पृथ्वीनाथ! यदि मेरी इच्छाके अनुसार काम करो तो तुम जो कुछ चाहोगे, वह निश्चय ही पूर्ण होगा

三跋尔多说道:“国王啊,你想成就的一切,必定都能由你而得以保障。然而,大王,若你愿意实行我所有的意图,那么你所欲求之事必将无不圆满。”

Verse 20

याज्यमानं मया हि त्वां बृहस्पतिपुरन्दरौ । द्विषेतां समभिक्रुद्धावेतदेक॑ समर्थसे:,जब मैं तुम्हारा यज्ञ कराऊँगा, तब बृहस्पति और इन्द्र दोनों ही कुपित होकर मेरे साथ द्वेष करेंगे। उस समय तुम्हें मेरे पक्षका समर्थन करना होगा

当我为你主持祭祀之时,婆罗诃斯波提与普兰达罗(因陀罗)二神必将震怒,对我怀怨。那时你须能做到一事:坚定不移地站在我这一边。

Verse 21

स्थैर्यमत्र कथं मे स्यात्‌ सत्त्वं नि:संशयं कुरु । कुपितस्त्वां न हीदानीं भस्म कुर्या सबान्धवम्‌,परंतु इस बातका मुझे विश्वास कैसे हो कि तुम मेरा साथ दोगे। अतः जैसे भी हो, मेरे मनका संशय दूर हो; नहीं तो अभी क्रोधमें भरकर मैं बन्धु-बान्धवोंसहित तुम्हें भस्म कर डालूँगा

三婆尔多说道:“我在此如何才能安定——我如何才能确信你的决心?请将我的疑虑尽皆消除。因为若此刻怒火攫住我,我便能将你连同你的亲族一并化为灰烬。”

Verse 22

मरुत्त उवाच यावत्‌ तपेत्‌ सहसांशुस्तिष्ेर॑श्वापि पर्वता: । तावल्लोकान्न लभेयं त्यजेयं सड़तं यदि,मरुत्तने कहा--ब्रह्मन! यदि मैं आपका साथ छोड़ दूँ तो जबतक सूर्य तपते हों और जबतक पर्वत स्थिर रहें तबतक मुझे उत्तम लोकोंकी प्राप्ति न हो

马鲁塔说道:“婆罗门啊,若我背弃与你结下的同盟与相伴之约,那么只要千光之日仍炽烈照耀,只要群山仍巍然屹立,我便不得登临更高的世界。背弃誓约,其道德之报应即如此。”

Verse 23

मा चापि शुभबुद्धित्वं लभेयमिह कहिचित्‌ । विषयै: सड़तं चास्तु त्यजेयं सड़तं यदि,यदि आपका साथ छोड़ दूँ तो मुझे संसारमें शुभ बुद्धि कभी न प्राप्त हो और मैं सदा विषयोंमें ही रचा-पचा रह जाऊँ

马鲁塔说道:“若我曾舍弃与你相伴,愿我在此世永不得高贵的明辨;反倒愿我恒常沉缠于诸欲境与感官之物——若我真敢抛却那份相依之约。”

Verse 24

संवर्त उवाच आविक्षित शुभा बुद्धिर्वर्ततां तव कर्मसु । याजनं हि ममाप्येव वर्तते हृदि पार्थिव,संवर्तने कहा--अविक्षित्‌-कुमार! तुम्हारी शुभ बुद्धि सदा सत्कर्मोंमें ही लगी रहे। पृथ्वीनाथ! मेरे मनमें भी तुम्हारा यज्ञ करानेकी इच्छा तो है ही

三婆尔多说道:“阿毗克希塔啊,愿你高贵的慧心恒常安住于正法之业。大王啊,我心中也确实怀有为你主持祭祀的愿望。”

Verse 25

अभिधास्ये च ते राजलन्नक्षयं द्रव्यमुत्तमम्‌ । येन देवान्‌ सगन्धर्वान्‌ शक्रं चाभिभविष्यसि,राजन! इसके लिये मैं तुम्हें परम उत्तम अक्षय धनकी प्राप्तिका उपाय बतलाऊँगा, जिससे तुम गन्धर्वों-सहित सम्पूर्ण देवताओं तथा इन्द्रको भी नीचा दिखा सकोगे

萨ṁ瓦尔塔说道:“大王,我将告诉你获得最上等、取之不尽之财富的方法——凭此你可胜过诸天与乾闼婆众,甚至使释迦(因陀罗)也蒙受屈辱。”

Verse 26

नतु मे वर्तते बुद्धिर्धने याज्येषु वा पुन: । विप्रियं तु करिष्यामि भ्रातुश्रैन्द्रस्य चोभयो:,मुझको अपने लिये धन अथवा यजमानोंके संग्रहका विचार नहीं है। मुझे तो भाई बृहस्पति और इन्द्र दोनोंके विरुद्ध कार्य करना है

“我心并不系于财富,也不在于招聚祭祀的施主。相反,我要做一件令二者同感不悦之事——我的兄长布里哈斯帕提与因陀罗。”

Verse 27

गमयिष्यामि शक्रेण समतामपि ते ध्रुवम्‌ । प्रियं च ते करिष्यामि सत्यमेतद्‌ ब्रवीमि ते,निश्चय ही मैं तुम्हें इन्द्रकी बराबरीमें बैठाऊँगा और तुम्हारा प्रिय करूँगा। मैं यह बात तुमसे सत्य कहता हूँ

萨ṁ瓦尔塔说道:“我必定使你与释迦(因陀罗)同等。我也将成就你所喜之事。我以真实之言告知于你。”

Frequently Asked Questions

Marutta must choose whether to proceed with a sacrifice through Saṃvarta despite prior rejection by Bṛhaspati and the anticipated hostility of Indra—balancing ambition, legitimacy, and the ethics of authorization.

The chapter foregrounds satya as a regulating principle of discourse and action, and teaches that effective ritual and governance require sanctioned authority, clarity of intent, and steadiness when confronted by higher-power opposition.

A direct phala-style statement appears as a truth-warning: truthful speech is said to fulfill aims, whereas falsehood is threatened with severe consequence; this functions as an internal ethical seal rather than a formal end-of-chapter phalaśruti.