
धृतराष्ट्रस्य वनप्रस्थानानुज्ञा | Permission for Dhṛtarāṣṭra’s Forest-Retirement
Upa-parva: Dhṛtarāṣṭra–Vānaprastha Anujñā (Permission for Forest-Retirement Episode)
Vyāsa addresses Yudhiṣṭhira, arguing that the aged Dhṛtarāṣṭra—especially after the loss of his sons—should not be made to endure prolonged hardship in the city and should be granted leave to pursue forest discipline. He notes Gāndhārī’s capacity to bear grief with steadiness and presents the royal-ascetic trajectory as a precedent: ancient rājarṣis commonly conclude life in the forest. Vaiśaṃpāyana reports Yudhiṣṭhira’s reverential reply: Vyāsa is authoritative, and Dhṛtarāṣṭra is simultaneously father, king, and guru, whose instructions a son should follow by dharma. Vyāsa confirms that Yudhiṣṭhira’s reasoning is correct and instructs him not to obstruct Dhṛtarāṣṭra’s intention, describing death in battle or a regulated death in the forest as compatible endpoints for rājarṣis. He further recalls Dhṛtarāṣṭra’s prior guardianship and ritual generosity during Yudhiṣṭhira’s absence, reinforcing reciprocal obligation. After obtaining consent, Vyāsa departs for the forest; Yudhiṣṭhira then approaches Dhṛtarāṣṭra with deference, citing the concurrence of advisers (including Kṛpa, Vidura, Sañjaya, and Yuyutsu) and requests that the king take provisions before departing for the āśrama.
Chapter Arc: भीष्म के स्वर्गगमन, श्रीकृष्ण के द्वारका-प्रस्थान, और विदुर-संजय के विलग होने के बाद धृतराष्ट्र के चारों ओर शून्य-सा छा जाता है; वह युधिष्ठिर से वनगमन की आज्ञा माँगने का निश्चय करता है। → धृतराष्ट्र गान्धारी सहित अपने पिता (व्यास) की पूर्वानुमति और युधिष्ठिर की सहमति का स्मरण कर सभा-जन, सुहृद्, ब्राह्मण तथा कुरुजांगल की समस्त प्रजा के सामने अपना संकल्प रखता है। नगर-जनपद के चारों वर्ण एकत्र होते हैं; राज्य की स्थिरता, वृद्ध राजा का त्याग, और प्रजा की आशंका—सब एक साथ उभरते हैं। → धृतराष्ट्र सार्वजनिक रूप से घोषणा करता है कि वह गान्धारी के साथ शीघ्र वन को जाएगा—यह ‘न्यास’/उत्तरदायित्व-हस्तांतरण का क्षण है, जहाँ वह युधिष्ठिर की पालक-भूमिका को स्वीकार कर प्रजा के सामने अंतिम बार राज-धर्म की मुहर लगाता है। → युधिष्ठिर धृतराष्ट्र के हित में जो आदेश/उपदेश दिया जाए उसे मानने की प्रतिज्ञा करता है; धृतराष्ट्र को यह संतोष होता है कि युधिष्ठिर के राज्य में प्रजा सुरक्षित है और उसे दुर्योधन के ऐश्वर्य से भी श्रेष्ठ ‘सुख’ (आत्मिक शांति) प्राप्त हो रही है। → वनगमन की तैयारी और विदाई का भाव गहराता है—अगला चरण: धृतराष्ट्र-गान्धारी का वास्तविक प्रस्थान और उसके परिणाम।
Verse 1
ऑपन-मा_ज बछ। अि<-छऋज अष्टमो>< ध्याय: धृतराष्ट्रका कुरुजांगलदेशकी प्रजासे वनमें जानेके लिये आज्ञा माँगना युधिछिर उवाच एवमेतत् करिष्यामि यथा55त्थ पृथिवीपते । भूयश्चैवानुशास्यो5हं भवता पार्थिवर्षभ,युधिष्ठिर बोले--पृथ्वीनाथ! नृपश्रेष्ठी] आप जैसा कहते हैं, वैसा ही करूँगा। अभी आप मुझे कुछ और उपदेश दीजिये अपड-#-रू- नवमो< ध्याय: प्रजाजनोंसे धृतराष्ट्रकी क्षमा-प्रार्थना धृतराष्ट्र रवाच शान्तनु: पालयामास यथावद् वसुधामिमाम् | तथा विचित्रवीर्यश्ष॒ भीष्मेण परिपालित:
尤提施提罗说道:“如此便好。大地之主啊,我必将完全依你所言而行。然而,诸王之雄牛啊,还请再赐我更多训诲。”
Verse 2
भीष्मे स्वर्गमनुप्राप्ते गते च मधुसूदने । विदुरे संजये चैव को<न्यो मां वक्तुमहति,भीष्मजी स्वर्ग सिधारे, भगवान् श्रीकृष्ण द्वारका पधारे और विदुर तथा संजय भी आपके साथ ही जा रहे हैं। अब दूसरा कौन रह जाता है, जो मुझे उपदेश दे सके यथा च पाण्डुर्श्राता मे दयितो भवतामभूत्
尤提施提罗说道:“如今毗湿摩已登天界,摩杜苏达那(奎师那)也已离去,毗度罗与桑阇耶亦随之而去——还有谁配来教诲我呢?正如般度是我挚爱的长兄,你也同样为我们所敬爱。”
Verse 3
यत् तु मामनुशास्तीह भवानद्य हिते स्थित: । कर्तास्मि तन््महीपाल निर्व॒तो भव पार्थिव,भूपाल! पृथ्वीपते! आज मेरे हितसाधनमें संलग्न होकर आप मुझे यहाँ जो कुछ उपदेश देते हैं, मैं उसका पालन करूँगा। आप संतुष्ट हों मया च भवतां सम्यक् शुश्रूषा या कृतानघा:
尤提施提罗说道:“大王啊,今日你为我之利益而在此所赐一切训诲,我必遵行。大地之主啊,愿你心满意足;我也已尽心侍奉于你,清白无过。”
Verse 4
वैशम्पायन उवाच एवमुक्त: स राजर्षिर्धर्मराजेन धीमता । कौन्तेयं समनुज्ञातुमियेष भरतर्षभ,वैशम्पायनजी कहते हैं--भरतश्रेष्ठ! बुद्धिमान् धर्मराज युधिष्ठिरके ऐसा कहनेपर राजर्षि धृतराष्ट्रने कुन्तीकुमारसे जानेके लिये अनुमति लेनेकी इच्छा की और कहा -- यदा दुर्योधनेनेदं भुक्ते राज्यमकण्टकम्
毗湿摩波耶那说道:“婆罗多族之雄牛啊,智者法王(尤提施提罗)如此言毕,王者圣贤德里达罗湿特罗便欲向昆蒂之子(尤提施提罗)请求准许离去。他开口说话,追忆当年杜尤陀那曾无阻无碍地享受王国之乐——以此为自己的退隐与担当立下道德的框架,因不义(adharma)所致的覆灭已然降临。”
Verse 5
पुत्र संशाम्यतां तावन््ममापि बलवान् श्रम: । इत्युक्त्वा प्राविशद् राजा गान्धार्या भवनं तदा,“बेटा! अब शान्त रहो। मुझे बोलनेमें बड़ा परिश्रम होता है (अब तो मैं जानेकी ही अनुमति चाहता हूँ)।' ऐसा कहकर राजा धृतराष्ट्रने उस समय गान्धारीके भवनमें प्रवेश किया अपि तत्र न वो मन्दो दुर्बुद्धिरपराद्धवान् । दुर्योधनने जब अकण्टक राज्यका उपभोग किया था, उस समय उस खोटी बुद्धिवाले मूर्ख नरेशने भी आपलोगोंका कोई अपराध नहीं किया था (वह केवल पाण्डवोंके साथ अन्याय करता रहा) ।। ४ $ || तस्यापराधाद् दुर्बुद्धेरभिमानान्महीक्षिताम्
毗湿摩波耶那说道:“孩子,暂且安静下来。就连我,说话也已成了沉重的劳累。”说罢,德里达罗湿特罗王便走入甘陀利的居所。这一刻凸显了哀痛的疲惫与言语的伦理重量:当情感与责任压得人难以承受时,便当克制自持,守住沉静。
Verse 6
तमासनगतं देवी गान्धारी धर्मचारिणी । उवाच काले कालज्ञा प्रजापतिसमं पतिम्,वहाँ जब वे आसनपर विराजमान हुए, तब समयका ज्ञान रखनेवाली धर्मपरायणा गान्धारी देवीने उस समय प्रजापतिके समान अपने पतिसे इस प्रकार पूछा-- विमर्द: सुमहानासीदनयात् स्वकृतादथ । (घातिता: कौरवेयाश्व पृथिवी च विनाशिता ।) उस दुर्बुद्धिके अपने ही किये हुए अन्याय, अपराध और अभिमानसे यहाँ असंख्य राजाओंका महान् संहार हो गया। सारे कौरव मारे गये और पृथ्वीका विनाश हो गया ।। ५३ || तन्मया साधु वापीदं यदि वासाधु वै कृतम्
他就座之后,坚守正法、洞察时机的王后甘陀利,便对那威仪如同生主波阇波提的夫君开口说道:“由你亲手发动的不义,竟引出了这场可怖的大祸。无数国王被杀,俱卢族的考罗婆尽皆覆灭,连大地也被推向毁坏。告诉我——在此事上,我所行者究竟是对,还是错?”
Verse 7
इस प्रकार श्रीमह्याभारत आश्रमवासिकपवके अन्तर्गत आश्रमवासपर्वमें धृतराष््रका उपसंवादविषयक सातवाँ अध्याय पूरा हुआ,अनुज्ञात: स्वयं तेन व्यासेन त्वं महर्षिणा । युधिष्ठिरस्यानुमते कदारण्यं गमिष्यसि “महाराज! स्वयं महर्षि व्यासने आपको वनमें जानेकी आज्ञा दे दी है और युधिष्ठिरकी भी अनुमति मिल ही गयी है। अब आप कब वनको चलेंगे?” वृद्धोडयं हतपुत्रो5यं दु:खितो5यं नराधिप:
持国王说道:“大王啊,大圣仙毗耶娑已亲自准许你前往林野,坚战之允亦已得之。那么,你何时启程入林?我已年迈,诸子尽亡,悲苦压身啊,人中之主。”
Verse 8
धृतराष्ट उवाच गान्धार्यहमनुज्ञात: स्वयं पित्रा महात्मना । युधिष्ठिरस्यानुमते गन्तास्मि नचिराद् वनम्,धृतराष्ट्रने कहा--गान्धारि! मेरे महात्मा पिता व्यासने स्वयं तो आज्ञा दे ही दी है, युधिष्ठिरकी भी अनुमति मिल गयी है; अत: अब मैं जल्दी ही वनको चलूँगा इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि आश्रमवासपर्वणि धृतराष्ट्रकृतवनगमनप्रार्थनेडष्टमो 5 ध्याय: इयं च कृपणा वृद्धा हतपुत्रा तपस्विनी
持国王说道:“甘陀利,我那大心之父毗耶娑已亲自准许我,坚战亦已应允。因此,不久我便将入林而去。”
Verse 9
अहं हि तावत् सर्वेषां तेषां दुर्दयूतदेविनाम् पुत्राणां दातुमिच्छामि प्रेतभावानुगं वसु,हतपुत्राविमौ वृद्धौ विदित्वा दु:खितौं तथा इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि आश्रमवासपर्वणि धृतराष्ट्रप्रार्थने नवमो<ध्याय:
持国王说道:“就我而言,我愿为那些因赌博之恶而沉沦的诸子,施舍财物——以合乎亡者之礼。既知我与她这两位年迈父母丧子而悲恸沉沦,我便愿行此布施。”
Verse 10
सर्वप्रकृतिसांनिध्यं कारयित्वा स्ववेश्मनि | जानेके पहले मैं चाहता हूँ कि समस्त प्रजाको घरपर बुलाकर अपने मरे हुए उन जुआरी पुत्रोंके उद्देश्य्से उनके पारलौकिक लाभके लिये कुछ धन दान कर दूँ ।। वैशम्पायन उवाच इत्युक्त्वा धर्मराजाय प्रेषयमास वै तदा,अयं च कौरवो राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिर:
他在自家宫邸中安排诸官与要人悉皆到场,遂表明心愿:在一切之前,他要召集全体民众至其宅第,为那些已亡之子——因沉溺赌博而覆灭者——求其后世之利,施舍财物以行布施。说罢,他便遣人通报法王——俱卢的君主、昆蒂之子坚战(Yudhiṣṭhira)。
Verse 11
स च तद् वचनातू् सर्व समानिन्ये महीपतिः । वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! ऐसा कहकर राजा धूृतराष्ट्रने धर्मराज युधिष्ठिरके पास अपना विचार कहला भेजा। राजा युधिष्ठिरने देनेके लिये उनकी आज्ञाके अनुसार वह सब सामग्री जुटा दी (धृतराष्ट्रने उसका यथायोग्य वितरण कर दिया) ।। १०३ || ततः प्रतीतमनसो ब्राह्मणा: कुरुजाड्ुला:,न जातु विषमं चैव गमिष्यति कदाचन ये कभी आपलोगोंके प्रति विषमभाव नहीं रखेंगे। लोकपालोंके समान महातेजस्वी तथा सम्पूर्ण धर्म और अर्थके मर्मज्ञ ये चार भाई जिनके सचिव हैं, वे भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेवसे घिरे हुए महाबाहु महातेजस्वी युधिष्छिर सम्पूर्ण जीव-जगत्के स्वामी भगवान् ब्रहद्माकी भाँति आपलोगोंका इसी तरह पालन करेंगे, जैसे पहलेके लोग करते आये हैं
毗湿摩耶那说道:“阇那弥阇耶啊,如此说罢,持国王便将自己的心意传达给法王坚战。坚战遵从其命,备齐一切施舍所需之物;随后持国王又按其所宜,逐一分配。此事昭示了从王者占有到合乎伦理的托付之转变——财富经由有规有度、目的分明的布施,被导向达摩。”
Verse 12
ततो निष्क्रम्य नृपतिस्तस्मादन्त:पुरात् तदा,चत्वार: सचिवा यस्य भ्रातरो विपुलौजस: । लोकपालसमा द्ोते सर्वधर्मार्थदर्शिन: ये कभी आपलोगोंके प्रति विषमभाव नहीं रखेंगे। लोकपालोंके समान महातेजस्वी तथा सम्पूर्ण धर्म और अर्थके मर्मज्ञ ये चार भाई जिनके सचिव हैं, वे भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेवसे घिरे हुए महाबाहु महातेजस्वी युधिष्छिर सम्पूर्ण जीव-जगत्के स्वामी भगवान् ब्रहद्माकी भाँति आपलोगोंका इसी तरह पालन करेंगे, जैसे पहलेके लोग करते आये हैं
毗湿摩耶那说道:于是国王从内宫而出。随侍者为四位辅臣——皆是他的亲兄弟,勇力雄健——光辉如护世诸神,洞察达摩与利(artha)之全义。(就上下文而言,此段强调:他们决不怀偏私之心;而坚战在毗摩、阿周那、那俱罗与娑诃提婆环卫之下,将依古圣之道,正直地护民治国。)
Verse 13
समवेतांश्व॒ तान् सर्वान् पौरान् जानपदांस्तथा,ब्रहोव भगवानेष सर्वभूतजगत्पति: । (एवमेव महाबाहुर्भीमार्जुनयमैर्वृत: ।) युधिष्ठिरो महातेजा भवतः पालयिष्यति ये कभी आपलोगोंके प्रति विषमभाव नहीं रखेंगे। लोकपालोंके समान महातेजस्वी तथा सम्पूर्ण धर्म और अर्थके मर्मज्ञ ये चार भाई जिनके सचिव हैं, वे भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेवसे घिरे हुए महाबाहु महातेजस्वी युधिष्छिर सम्पूर्ण जीव-जगत्के स्वामी भगवान् ब्रहद्माकी भाँति आपलोगोंका इसी तरह पालन करेंगे, जैसे पहलेके लोग करते आये हैं
毗湿摩耶那说道:“凡此聚集于此的城民与乡民——这位坚战,臂力雄伟、光辉赫奕,身旁有毗摩、阿周那与双生兄弟(那俱罗、娑诃提婆)环卫——必将以同样的方式护佑你们。如同梵天,吉祥的万有之主、众生与世界之君,他将不怀偏私地守护你们,正如古之义人所行。”
Verse 14
तानागतानभिप्रेक्ष्य समस्तं च सुहृज्जनम् । ब्राह्मणांश्र महीपाल नानादेशसमागतान्,अवश्यमेव वक्तव्यमिति कृत्वा ब्रवीमि व: । एष न्यासो मया दत्त: सर्वेषां वो युधिष्ठिर:
国王望见来者齐集——尽是亲善之人,以及自诸方而来的婆罗门——便决意道:“此言必当宣告。”于是对众人说道:“此一托付,此一重任,我已交付于你们众人——(亦交付于)坚战。”
Verse 15
उवाच मतिमान् राजा धृतराष्ट्रोडम्बिकासुत: । भूपाल जनमेजय! राजाने देखा कि समस्त पुरवासी और जनपदके लोग वहाँ आ गये हैं। सम्पूर्ण सुहृद-वर्गके लोग भी उपस्थित हैं और नाना देशोंके ब्राह्मण भी पधारे हैं। तब बुद्धिमान् अम्बिकानन्दन राजा धृतराष्ट्रने उन सबको लक्ष्य करके कहा-- || १३-१४ $ || भवन्त: कुरवश्चैव चिरकालं सहोषिता:,यदेव तै: कृतं किंचिद् व्यलीकं व: सुतैर्मम
毗湿摩耶那说道:于是智者持国王——安比迦之子——对聚集之众开口道:“库鲁诸人啊,你们久已同居共处。若因我诸子之故,对你们曾有丝毫曲折、虚妄、或伤害之事……”(他由此开始当众承认过失,为库鲁之战的浩劫之后的和解与道德清算铺陈道路。)
Verse 16
यदिदानीमहं ब्रूयामस्मिन् काल उपस्थिते,पालयामास नस्तातो विदितार्थो न संशय: । धृतराष्ट्र बोले--सज्जनो! महाराज शान्तनुने इस पृथ्वीका यथावत््रूपसे पालन किया था। उसके बाद भीषद्वारा सुरक्षित हमारे तत्त्वज्ञ पिता विचित्रवीर्यने इस भूमण्डलकी रक्षा की; इसमें संशय नहीं है यदन्येन मदीयेन तदनुज्ञातुमर्ह थ । मेरे पुत्रोंने तथा मुझसे सम्बन्ध रखनेवाले और किसीने आपलोगोंका जो कुछ भी अपराध किया हो, उसके लिये मुझे क्षमा करें और जानेकी आज्ञा दें ।। भवद्धिर्न हि मे मन्यु: कृतपूर्व: कथंचन
毗耶娑之弟子外沙ṃ帕耶那说道:“如今,此时势已临到我们,我必须开口。我们的先祖——大王商坦奴——以正法治理此大地,此事毫无疑惑。其后,我们的父王维奇特拉维尔亚,在毗湿摩的护持之下,守护了此国土;对此亦无不确定。若还有与我相关之人也应蒙准许离去,亦请一并允之。凡我诸子,或我自身,或与我有亲缘之人,曾对诸位有所冒犯——愿诸位宽恕,并赐我们离去之许可。因为诸位从未在任何时候对我显露过怒意。”
Verse 17
अरण्यगमने बुद्धिर्गान्धारीसहितस्य मे,तेषामस्थिरबुद्धीनां लुब्धानां कामचारिणाम्
外沙ṃ帕耶那说道:“我决意与甘达丽同往森林隐居——因为我看见那些人心志不定、贪婪无厌,且被放纵的欲望所驱使。”
Verse 18
भवन्तो>5प्यनुजानन्तु मा च वो5भूदू विचारणा,“अब आपलोग भी मुझे वनमें जानेकी आज्ञा दें। इस विषयमें आपके मनमें कोई अन्यथा विचार नहीं होना चाहिये। आपलोगोंका हमारे साथ जो यह प्रेम-सम्बन्ध सदासे चला आ रहा है, ऐसा सम्बन्ध दूसरे देशके राजाओंके साथ वहाँकी प्रजाका नहीं होगा, ऐसा मेरा विश्वास है कृते याचेडद्य व: सर्वान् गान्धारीसहितो5नघा: । निष्पाप प्रजाजन! मेरे पुत्रोंकी बुद्धि चंचल थी। वे लोभी और स्वेच्छाचारी थे। उनके अपराधोंके लिये आज गान्धारीसहित मैं आप सब लोगोंसे क्षमा-याचना करता हूँ ।। १७४६ || इत्युक्तास्तेन ते सर्वे पौरजानपदा जना: । नोचुर्बाष्पकला: किंचिद् वीक्षांचक्रु: परस्परम् धृतराष्ट्रके इस प्रकार कहनेपर नगर और जनपदमें निवास करनेवाले सब लोग नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए एक-दूसरेका मुँह देखने लगे। किसीने कोई उत्तर नहीं दिया
外沙ṃ帕耶那说道:他如此言毕,城中与乡野的众人皆为泪水所夺,只能彼此相望。无人发出一言以答。
Verse 19
अस्माकं भवतां चैव येयं प्रीतिर्हिं शाश्व॒ती । न च सान्येषु देशेषु राज्ञामिति मतिर्मम,“अब आपलोग भी मुझे वनमें जानेकी आज्ञा दें। इस विषयमें आपके मनमें कोई अन्यथा विचार नहीं होना चाहिये। आपलोगोंका हमारे साथ जो यह प्रेम-सम्बन्ध सदासे चला आ रहा है, ऐसा सम्बन्ध दूसरे देशके राजाओंके साथ वहाँकी प्रजाका नहीं होगा, ऐसा मेरा विश्वास है
外沙ṃ帕耶那说道:“我与你们之间这份长久的情爱,确是恒常不灭。依我之见,他国之中,君与民之间并无如此关系。故而,你们也当准我入林而去;对此事,心中莫生异念。”
Verse 20
शान्तो5स्मि वयसानेन तथा पुत्रविनाकृत: । उपवासकृश श्वास्मि गान्धारीसहितो5नघा:,“निष्पाप प्रजाजन! अब इस बुढ़ापेने गरधारीसहित मुझको बहुत थका दिया है। पुत्रोंके मारे जानेका दुःख भी बना ही रहता है तथा उपवास करनेके कारण भी हम दोनों अधिक दुर्बल हो गये हैं
外沙ṃ帕耶那说道:“我已为老迈所摧,又失却诸子。因持斋断食,我形容枯槁;并且——与甘达丽一道——我已衰弱不堪,噫,汝无垢者。”
Verse 21
“सज्जनो! युधिष्ठिरके राज्यमें मुझे बड़ा सुख मिला है। मैं समझता हूँ कि दुर्योधनके राज्यसे भी बढ़कर सुख मुझे प्राप्त हुआ है”
毗舍婆耶那说道:“诸位贤善之人啊!在由提湿提罗的统治之下,我得到了极大的安乐。我以为,我所获得的幸福,甚至胜过在都利约陀那治下本可得到的幸福。”
Verse 22
मम चान्धस्य वृद्धस्य हतपुत्रस्य का गति: । ऋते वन॑ महाभागास्तन्मानुज्ञातुमरहथ
“至于我——自幼失明,年迈衰老,又丧尽诸子——还剩下什么道路、什么归依呢?诸位贤善之人啊,除了入林而居,已别无所余;因此请准许我如此行。”
Verse 23
“एक तो मैं जन्मका अन्धा हूँ, दूसरे बूढ़ा हो गया हूँ, तीसरे मेरे सभी पुत्र मारे गये हैं। महाभाग प्रजाजन! अब आप ही बतायें, वनमें जानेके सिवा मेरे लिये दूसरी कौन-सी गति है? इसलिये अब आपलोग मुझे जानेकी आज्ञा दें” ।। तस्य तद् वचन श्रुत्वा सर्वे ते कुरुजाड्ला: । बाष्पसंदिग्धया वाचा रुरुदुर्भरतर्षभ,भरतश्रेष्ठ! राजा धृतराष्ट्रकी ये बातें सुनकर वहाँ उपस्थित हुए कुरुजांगलनिवासी सभी मनुष्योंके नेत्रोंस आँसुओंकी धारा बह चली और वे फूट-फूटकर रोने लगे
毗舍婆耶那说道:“其一,我生来失明;其二,我已年老;其三,我的诸子尽皆被杀。诸位高贵的民众啊,你们自己告诉我——除了入林而去,我还能有什么归途?因此,请准我离去。” 听到这番话,俱卢旃伽罗的众人,声音被泪水哽住,便放声痛哭。噢,婆罗多族中的雄牛,婆罗多族中最卓越者——听闻国王持国(Dhṛtarāṣṭra)的言辞,在场所有居于俱卢旃伽罗的男子,双眼泪流如注,抽噎不止。
Verse 24
तानविन्रुवतः किंचित् सर्वान् शोकपरायणान् | पुनरेव महातेजा धृतराष्ट्रोडब्रवीदिदम्,उन सबको शोकमग्न होकर कुछ भी उत्तर न देते देख महातेजस्वी धुृतराष्ट्रने पुनः बोलना आरम्भ किया
见众人皆沉浸于悲痛之中,连一句回应也无,威光赫赫的持国王(Dhṛtarāṣṭra)便又一次开口说道。
Verse 26
स चापि पालयामास यथावत् तच्च वेत्थ ह । उनके बाद मेरे भाई पाण्डुने इस राज्यका यथावत्रूपसे पालन किया। इसे आप सब लोग जानते हैं। अपने प्रजापालनरूपी गुणके कारण ही वे आपलोगोंके परम प्रिय हो गये थे
毗舍婆耶那说道:“在他之后,我的兄长般度(Pāṇḍu)也以正法之道治理此国——此事你们众人皆知。正因他以护民爱民之德行著称,他才成为你们所有人极其敬爱之人。”
Verse 33
असम्यग् वा महाभागास्तत् क्षन्तव्यमतन्द्रितैः । निष्पाप महाभागगण! पाण्डुके बाद मैंने भी आपलोगोंकी भली या बुरी सेवा की है, उसमें जो भूल हुई हो, उसके लिये आप आलस्यरहित प्रजाजन मुझे क्षमा करें
毗舍波耶那说道:“若我有任何不当之举,诸位高贵之人,请你们这些警醒而不懈怠者予以宽恕。噫,无罪的大贤众会!我侍奉诸位之中——无论善或有失——若有过错发生,愿诸位勤勉之民,赦宥于我。”
Verse 63
तद् वो हृदि न कर्तव्यं मया बद्धोडयमञ्जलि: । उस अवसरपर मुझसे भला या बुरा जो कुछ भी कृत्य हो गया, उसे आपलोग अपने मनमें न लावें। इसके लिये मैं आपलोगोंसे हाथ जोड़कर क्षमा-प्रार्थना करता हूँ
“请不要把此事藏在心中;我合掌立于诸位之前。此番我所为——无论善或恶——都请不要萦怀。为此,我以合十之礼恳求诸位宽恕。”
Verse 73
पूर्वराज्ञां च पुत्रो5यमिति कृत्वानुजानथ । “यह राजा धृतराष्ट्र बूढ़ा है। इसके पुत्र मारे गये हैं; अतः यह दुःखमें डूबा हुआ है और यह अपने प्राचीन राजाओंका वंशज है'--ऐसा समझकर आपलोग मेरे अपराधोंको क्षमा करते हुए मुझे वनमें जानेकी आज्ञा दें
毗舍波耶那说道:“念他乃古王之后,请赐其离去之许可。‘此王持国(Dhṛtarāṣṭra)已老;其诸子尽被诛灭;故沉溺于哀痛,而又属往昔君王之世系。’既如此理解,愿诸位宽恕我的过失,并准我辞行,入于林野。”
Verse 83
गान्धारी पुत्रशोकार्ता युष्मान् याचति वै मया । यह बेचारी वृद्धा तपस्विनी गान्धारी, जिसके सभी पुत्र मारे गये हैं तथा जो पुत्रशोकसे व्याकुल रहती है, मेरे साथ आपलोगोंसे क्षमा-याचना करती है
毗舍波耶那说道:“甘陀利因丧子之痛而悲恸不已,正借我之口,向诸位众人恳求。”
Verse 93
अनुजानीत भद्ठं वो त्रजाव शरणं च व: । इन दोनों बूढ़ोंको पुत्रोंके मारे जानेसे दुखी जानकर आपलोग वनमें जानेकी आज्ञा दें। आपका कल्याण हो। हम दोनों आपकी शरणमें आये हैं
毗舍波耶那说道:“请准我等辞行——愿诸位安泰。我们向诸位求庇护。既知这两位长者因丧子之痛而心神摧折,便请允许他们前往林野。愿吉祥临于诸位;我们已来投于诸位的护佑之下。”
Verse 106
सर्वेर्भवद्धिद्रष्टव्य: समेषु विषमेषु च । ये कुरुकुलरत्न कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर आपलोगोंके पालक हैं। अच्छे और बुरे सभी समयोंमें आप सब लोग इनपर कृपादृष्टि रखें
毗湿摩波耶那说道:“你们众人当注目于他——无论顺境或逆境。俱卢族之宝、昆蒂之子——国王由提施提罗,乃你们众人的护持者。因此,在福祸更迭的每一时节,都当以慈悯与扶助之心,将目光安住于他身上。”
Verse 116
क्षत्रियाश्वैव वैश्याश्व शूद्राश्ैव समाययु: । उधर राजाका संदेश पाकर कुरुजांगलदेशके ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शाूद्र वहाँ आये। उन सबके हृदयमें बड़ी प्रसन्नता थी
毗湿摩波耶那说道:“刹帝利、吠舍与首陀罗也一同聚集。得闻国王之命,俱卢—旃伽罗之地的民众——婆罗门、刹帝利、吠舍与首陀罗——皆来到那里,心中充满极大的欢喜。此景昭示众姓同心、各尽其分,恭应王召;在战火摧残之后,仿佛重现一刻群体的秩序与善意。”
Verse 146
भवन्तो5स्य च वीरस्य न्यासभूता: कृता मया । मुझे ये बातें अवश्य कहनी चाहिये, ऐसा सोचकर ही मैं आपलोगोंसे यह सब कहता हूँ। मैं इन राजा युधिष्ठिरको धरोहरके रूपमें आप सब लोगोंके हाथ सौंप रहा हूँ और आपलोगोंको भी इन वीर नरेशके हाथमें धरोहरकी ही भाँति दे रहा हूँ
毗湿摩波耶那说道:“我已使你们众人成为这位英勇国王的托付之人。念及‘这些话我必当说’,故我如此宣告:我将国王由提施提罗作为神圣之托付交在你们手中;同样,我也将你们交付于这位勇武君王之手,如同托付一般——使彼此的责任、护佑与合乎法度的劝谏得以维系。”
Verse 153
परस्परस्य सुह्दद: परस्परहिते रता: । 'सज्जनो! आप और कौरव चिरकालसे एक साथ रहते आये हैं। आप दोनों एक- दूसरेके सुहृद् हैं और दोनों सदा एक-दूसरेके हितमें तत्पर रहते हैं
毗湿摩波耶那说道:“他们彼此为善友,专心于对方之利。‘贤者啊,你与俱卢诸考罗婆久已同居共处;你们互为挚友,双方恒常以彼此的福祉为念。’”
Verse 166
तथा भवद्धधिः कर्तव्यमविचार्य वचो मम । “इस समय मैं आपलोगोंसे वर्तमान अवसरपर जो कुछ कहूँ, मेरी उस बातको आपलोग बिना विचारे स्वीकार करें; यही मेरी प्रार्थना है,अत्यन्तगुरुभक्तानामेषो5ञ्जलिरिदं नम: । आपलोगोंने पहले मुझपर किसी तरह कोई रोष नहीं प्रकट किया है। आपलोग अत्यन्त गुरुभक्त हैं; अतः आपके सामने मेरे ये दोनों हाथ जुड़े हुए हैं और मैं आपको यह प्रणाम करता हूँ
毗湿摩波耶那说道:“故当如此行事——对我之言不必迟疑,不必反复揣度,径直领受。你们从未以任何方式对我显露不悦。既然你们深怀师道之敬,我便在你们面前合掌而立,奉上恭敬的礼拜。”
Verse 173
व्यासस्यानुमते राज्ञस्तथा कुन्तीसुतस्य मे | “मैंने गान्धारीके साथ वनमें जानेका निश्चय किया है; इसके लिये मुझे महर्षि व्यास तथा कुन्तीनन्दन राजा युधिष्ठिरकी भी अनुमति मिल गयी है
毗舍波耶那说:“在圣者毗耶娑的许可之下,并且也得到了国王——昆蒂之子(尤提施提罗)的同意,我已决意与甘达丽一同入林而居。”
Verse 231
युधिष्ठिरगते राज्ये प्राप्तश्चास्मि सुखं महत् । मन्ये दुर्योधनैश्वर्याद् विशिष्टमिति सत्तमा:
毗舍波耶那说:“如今国度已归于尤提施提罗,我也获得了极大的欢喜。我以为此情此景胜过杜尤陀那昔日的王权,噢,德行之最者。”
Verse 1236
ददृशे त॑ जन सर्व सर्वाश्व प्रकृतीस्तथा । तदनन्तर महाराज धुृतराष्ट्र अन्तःपुरसे बाहर निकले और वहाँ नगर तथा जनपदकी समस्त प्रजाके उपस्थित होनेका समाचार सुना
毗舍波耶那说:当时,众人尽皆聚集于彼处,王家诸般机构与资用亦悉在场。其后,噢,大王,持国从内宫而出,听闻禀报:城中与四乡郡县之民,已全数会集。
Whether Yudhiṣṭhira should prioritize retaining the elder king within the polity for symbolic stability or honor Dhṛtarāṣṭhira’s dharmically appropriate wish to renounce, thereby balancing rājadharma with pitṛ-dharma and āśrama-dharma.
Legitimate authority includes knowing when to release control: enabling a lawful life-stage transition (to vānaprastha) is itself dharma, and grief and responsibility can be ethically redirected into disciplined restraint rather than prolonged political entanglement.
No explicit phalaśruti is stated; the meta-commentary operates through normative assertion—Vyāsa frames forest-retirement as the “higher dharma” for rājarṣis and presents non-obstruction as the interpretive key for aligning personal duty with the epic’s broader renunciatory trajectory.