
अौर्ध्वदेहिक-श्राद्धे दानयज्ञविस्तारः | Expansion of the Aurdhvadehika Śrāddha and the Donation-Rite
Upa-parva: Aurdhvadehika–Dāna-Śrāddha Anuśaṅga (Ritual Restitution and Gifts for the Departed)
Vaiśaṃpāyana reports that Dhṛtarāṣṭra, pleased by Vidura’s earlier counsel and by the conduct of King Yudhiṣṭhira (Jīṣṇu’s deeds are noted as a cause of satisfaction), initiates a vast śrāddha-centered donation program. He surveys numerous eminent brāhmaṇas and ṛṣi-leaders and organizes provisions: food and drink, vehicles, garments, gold, gems, household resources, blankets and skins, villages and fields, livestock, ornaments, elephants and horses, and also women and attendants as part of period-specific gift categories. Names of the departed—Bhīṣma, Droṇa, Somadatta, Bāhlika, Duryodhana, their sons, Jayadratha, and other allies—are invoked as the ritual intent is articulated, indicating offerings directed toward the dead (aurdhvadehika). The rite expands under Yudhiṣṭhira’s policy oversight, with accountants and scribes repeatedly confirming what should be given; the king orders amplified disbursements (multiplying standard amounts). The chapter uses extended metaphors of a ‘rain-cloud’ of wealth flooding society, emphasizing abundance, administrative order, and the social saturation of gifts across varṇas. After ten days of sustained giving—accompanied by celebratory arts—Dhṛtarāṣṭra is described as having discharged obligations to sons, grandsons, ancestors, himself, and Gāndhārī, thereby concluding the dāna-yajña.
Chapter Arc: हस्तिनापुर में शोक की धुंध छाई है—धृतराष्ट्र, गांधारी और कुन्ती के वनगमन के बाद नगर और पाण्डव-परिवार का मन राजमहल में नहीं, उस निर्जन वन में अटका है। → ब्राह्मण और पुरवासी बार-बार एक ही प्रश्न को कुरेदते हैं—“वृद्ध राजा अकेले वन में कैसे रहते होंगे? गांधारी और कुन्ती का क्या हाल होगा?” पाण्डव भी राज्य, स्त्रियों, वेदाध्ययन—किसी में रस नहीं पाते; द्रौपदी के पुत्रों और अन्य सुहृदों के वध की स्मृति बार-बार मन को चीरती है। → स्मृति का ज्वार चरम पर पहुँचता है: ‘हतप्रवीर’ और ‘हृतरत्न’ पृथ्वी का चित्र सामने आ जाता है—वीरों के नाश और प्रियजनों के वियोग ने पाण्डवों को किसी भी आश्वासन से परे कर दिया है; द्रौपदी और सुभद्रा का मातृ-शोक भी उसी क्षण कथा का हृदय बनता है। → जीवन को थामने का एकमात्र सहारा वंश-दीप है—उत्तरा के पुत्र परीक्षित को देखकर पाण्डव अपने प्राणों को धारण करते हैं; शोक के बीच उत्तरदायित्व और भविष्य की रेखा उभरती है। → नारद-वाक्य का संकेत अध्याय को आगे की ओर धकेलता है—वन में धृतराष्ट्रादि के जीवन और आगामी घटनाओं का समाचार अभी शेष है।
Verse 1
अपन ह< बक। है २ >> एकविशो< ध्याय: धृतराष्ट्र आदिके लिये पाण्डवों तथा पुरवासियोंकी चिन्ता वैशम्पायन उवाच वनं॑ गते कौरवेन्द्रे द:ःखशोकसमन्विता: । बभूवु: पाण्डवा राजन् मातृशोकेन चान्विता:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! कौरवराज धृतराष्ट्रके वनमें चले जानेपर पाण्डव दुःख और शोकसे संतप्त रहने लगे। माताके विछोहका शोक उनके हृदयको दग्ध किये देता था इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि आश्रमवासपर्वणि एकविंशो5ध्याय: ।। २१ |। इस प्रकार श्रीमह्ााभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत आश्रमवासपर्वमें इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ २१ ॥ ऑपनआक्रा (_) अं क्ाज दाविशोद्ध्याय: माताके लिये पाण्डवोंकी चिन्ता, युधिष्ठिरकी वनमें जानेकी इच्छा, सहदेव और द्रौपदीका साथ जानेका उत्साह तथा रनिवास और सेनासहित युधिष्ठटिरका वनको प्रस्थान वैशम्पायन उवाच एवं ते पुरुषव्याप्रा: पाण्डवा मातृनन्दना: । स्मरन्तो मातरं वीरा बभूवुर्भशदु:ःखिता:
毗湿摩波耶那说道:“大王(阇那梅阇耶)啊,当俱卢之主持国(Dhṛtarāṣṭra)入林而去后,般度五子尽为忧苦与悲恸所压倒。又因丧母之痛而心如火灼,那痛楚在他们胸中久久不息。”
Verse 2
तथा पौरजन: सर्व: शोचन्नास्ते जनाधिपम् । कुर्वाणाश्व कथास्तत्र ब्राह्मणा नृपतिं प्रति,इसी प्रकार समस्त पुरवासी मनुष्य भी राजा धृतराष्ट्रके लिये निरन्तर शोकमग्न रहते थे तथा ब्राह्मणलोग सदा उन वृद्ध नरेशके विषयमें वहाँ इस प्रकार चर्चा किया करते थे
“同样,城中百姓也都为他们的君王长久哀伤。在那里,婆罗门们亦不断相互谈论那位年迈的国王,把他的处境与归宿置于议论的中心。”
Verse 3
कथं नु राजा वृद्ध: स वने वसति निर्जने । गान्धारी च महाभागा सा च कुन्ती पृथा कथम्,“हाय! हमारे बूढ़े महाराज उस निर्जन वनमें कैसे रहते होंगे? महाभागा गान्धारी तथा कुन्तिभोजकुमारी पृथा देवी भी किस तरह वहाँ दिन बिताती होंगी?
“那位年迈的国王究竟如何在荒寂的森林中生活?而高贵的甘达丽与昆蒂——普丽塔——又如何在那儿度过他们的日子?”
Verse 4
सुखा: स हि राजर्षिरसुखी तद् वनं महत् | किमवस्थ: समासाद्य प्रज्ञाचक्षुर्हतात्मज:,“जिनके सारे पुत्र मारे गये, वे प्रज्ञाचक्षु राजर्षि धृतराष्ट्र सुख भोगनेके योग्य होकर भी उस विशाल वनमें जाकर किस अवस्थामें दुःखके दिन बिताते होंगे?
毗湿摩衍那说:“那位王中仙人——本应享受安乐——却变得无喜。诸子尽亡,而其‘眼’唯有智慧;持国王(Dhṛtarāṣṭra)以何等境况进入那广大的森林,又如何在悲苦中度日?”
Verse 5
सुदुष्कृतं कृतवती कुन्ती पुत्रानपश्यती । राज्यश्रियं परित्यज्य वनं सा समरोचयत्,'कुन्तीदेवीने तो बड़ा ही दुष्कर कर्म किया। अपने पुत्रोंके दर्शनसे वंचित हो राज्यलक्ष्मीको ठुकराकर उन्होंने वनमें रहना पसंद किया है
毗湿摩衍那说:“昆蒂做下了极其难行之事。既不得再见诸子,她舍弃王家福泽的荣华,转而选择居于林野——这是战后以苦行之志、依正法而行的出离。”
Verse 6
विदुर: किमवस्थकश्ष भ्रातु: शुश्रूषुरात्मवान् | स च गावल्गणिथर्थीमान् भर्तृपिण्डानुपालक:,“अपने भाईकी सेवामें लगे रहनेवाले मनस्वी विदुरजी किस अवस्थामें होंगे? अपने स्वामीके शरीरकी रक्षा करनेवाले बुद्धिमान संजय भी कैसे होंगे?”
毗湿摩衍那说:“毗度罗将是何等境况——坚忍自持,恒常侍奉其兄?而三阇耶亦复如何——睿智而有志,守护并维系其主之身躯者?”
Verse 7
आकुमारं च पौरास्ते चिन्ताशोकसमाहता: । तत्र तत्र कथाश्षक्रु: समासाद्य परस्परम्,बच्चेसे लेकर बूढ़ेतक समस्त पुरवासी चिन्ता और शोकसे पीड़ित हो जहाँ-तहाँ एक- दूसरेसे मिलकर उपर्युक्त बातें ही किया करते थे
毗湿摩衍那说:“从孩童到老者,城中百姓尽为忧惧与哀恸所击;他们在此处彼处相逢,反复谈论的仍是那些事,心神都系于同一则悲讯。”
Verse 8
पाण्डवाश्वैव ते सर्वे भूशं शोकपरायणा: । शोचन्तो मातरं वृद्धामूषुर्नातिचिरं पुरे,समस्त पाण्डव तो निरन्तर अत्यन्त शोकमें ही डूबे रहते थे। वे अपनी बूढ़ी माताके लिये इतने चिन्तित हो गये कि अधिक कालतक नगरमें नहीं रह सके
毗舍波耶那说:那些般度五子尽为深重的悲痛所压倒,整日沉浸于哀伤之中。因哀悼年迈的母亲,他们无法在城中久留。
Verse 9
तथैव वृद्ध पितरं हतपुत्र॑ जनेश्वरम् । गान्धारी च महाभागां विदुरं च महामतिम्,जिनके पुत्र मारे गये थे, उन बूढ़े ताऊ महाराज धुृतराष्ट्रकी, महाभागा गान्धारीकी और परम बुद्धिमान् विदुरकी अधिक चिन्ता करनेके कारण उन्हें कभी चैन नहीं पड़ती थी। न तो राजकाजमें उनका मन लगता था न स्त्रियोंमें। वेदाध्ययनमें भी उनकी रुचि नहीं होती थी
毗舍波耶那说:“同样地,他也不断牵念那位年迈的族长持国——那位失尽诸子的‘人中王’——以及高贵的甘陀利与大智的毗度罗。因对这些为战争所夺者的忧思不绝,他不得安宁:心不安于国政,不安于享乐,甚至连研习吠陀也提不起兴致。”
Verse 10
नैषां बभूव सम्प्रीतिस्तात् विचिन्तयतां तदा । न राज्ये न च नारीषु न वेदाध्ययनेषु च,जिनके पुत्र मारे गये थे, उन बूढ़े ताऊ महाराज धुृतराष्ट्रकी, महाभागा गान्धारीकी और परम बुद्धिमान् विदुरकी अधिक चिन्ता करनेके कारण उन्हें कभी चैन नहीं पड़ती थी। न तो राजकाजमें उनका मन लगता था न स्त्रियोंमें। वेदाध्ययनमें भी उनकी रुचि नहीं होती थी
毗舍波耶那说:“亲爱的啊,那时那些长者沉溺于忧惧的思虑之中,毫无欢悦可言。他们的心既不乐于王权政事,也不乐于女色与世间享受,甚至连研读吠陀也不能使他们满足。”
Verse 11
परं निर्वेदमगमंश्रिन्तयन्तो नराधिपम् | तं च ज्ञातिवधं घोरं संस्मरन्त: पुनः पुन:,राजा धृतराष्ट्रको याद करके वे अत्यन्त खिन्न एवं विरक्त हो उठते थे। भाई-बन्धुओंके उस भयंकर वधका उन्हें बारंबार स्मरण हो आता था
毗舍波耶那说:他们一想到那位国王,便被深沉的厌离与悲痛所攫住。一次又一次,他们的心回到那场可怖的同族相残之屠戮。
Verse 12
अभिमन्योश्व बालस्य विनाशं रणमूर्थनि । कर्णस्य च महाबाहो संग्रामेष्वपलायिन:,महाबाहु जनमेजय! युद्धके मुहानेपर जो बालक अभिमन्युका अन्यायपूर्वक विनाश किया गया, संग्राममें कभी पीठ न दिखानेवाले कर्णका (परिचय न होनेसे) जो वध किया गया--इन घटनाओंको याद करके वे बेचैन हो जाते थे
毗舍波耶那说:“大臂的阇那美阇耶啊!每当忆起少年阿毗曼纽在战阵前锋被不义所毁,又忆起迦尔那——那位大臂勇士,征战从不背敌而退(却在失势之际、且未被恰当识别时遭杀)——他们内心便躁动不宁,难得安息,被这些事件的道义重负所折磨。”
Verse 13
तथैव द्रौपदेयानामन्येषां सूहदामपि । वध संस्मृत्य ते वीरा नातिप्रमनसो5भवन्,इसी प्रकार द्रौपदीके पुत्रों तथा अन्यान्य सुहृदोंके वधकी बात याद करके उनके मनकी सारी प्रसन्नता भाग जाती थी
同样,当那些英雄回想起德劳帕迪诸子被屠戮——以及其他挚友的惨死——他们的心便无法真正欢喜;失丧的记忆驱散了他们的喜悦。
Verse 14
हतप्रवीरां पृथिवीं हृतरत्नां च भारत । सदैव चिन्तयन्तस्ते न शर्म चोपलेभिरे,भरतनन्दन! जिसके प्रमुख वीर मारे गये तथा रत्नोंका अपहरण हो गया, उस पृथ्वीकी दुर्दशशाका सदैव चिन्तन करते हुए पाण्डव कभी थोड़ी देरके लिये भी शान्ति नहीं पाते थे
毗湿摩耶那说道:“噢,婆罗多啊,他们不断思量大地的困厄——既失去最卓绝的英雄,又被夺去珍宝——般度五子因此不得安宁与慰藉,哪怕片刻也不能。”
Verse 15
द्रौपदी हतपुत्रा च सुभद्रा चैव भाविनी । नातिप्रीतियुते देव्यौ तदा55स्तामप्रहछवत्,जिनके बेटे मारे गये थे, वे ट्रपदकुमारी कृष्णा और भाविनी सुभद्रा दोनों देवियाँ निरन्तर अप्रसन्न और हर्षशून्य-सी होकर चुपचाप बैठी रहती थीं
毗湿摩耶那说道:德劳帕迪痛失诸子,贤淑的苏跋陀罗亦然——两位王族夫人当时都少有欢颜,心无慰藉,被悲痛压伏,默然端坐。
Verse 16
वैराट्यास्तनयं दृष्टवा पितरं ते परीक्षितम् | धारयन्ति सम ते प्राणांस्तव पूर्वपितामहा:,जनमेजय! उन दिनों तुम्हारे पूर्व पितामह पाण्डव उत्तराके पुत्र और तुम्हारे पिता परीक्षितको देखकर ही अपने प्राणोंको धारण करते थे
毗湿摩耶那说道:“噢,阇那梅阇耶啊,那时你的先祖——般度五子——几乎难以支撑生命;唯有见到毗罗吒一系乌多罗之子、也就是你父亲帕利克希特,他们才得以把气息留在身内。”
Verse 20
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपव॑के अन्तर्गत आश्रमवासपर्वमें नारदजीका वाक्यविषयक बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
至此,在《吉祥摩诃婆罗多》中,属于《林居品》(Āśramavāsika Parva)之《林居》篇章里,以那罗陀之言为主的第二十章宣告完结。
How a former sovereign associated with catastrophic outcomes can ethically respond afterward: whether restitution should remain symbolic, or be concretized through structured, large-scale giving that acknowledges communal loss and ritual duty.
Wealth and authority are presented as instruments for dharmic repair when deployed transparently and inclusively—linking śrāddha obligation, public welfare, and administrative accountability rather than personal display.
No formal phalaśruti is stated; instead, the chapter’s meta-logic frames ‘anṛṇatā’ (being free of debts/obligations) as the implied outcome of completing aurdhvadehika rites and the dāna-yajña in a regulated manner.