Adhyaya 132
Vana ParvaAdhyaya 13236 Verses

Adhyaya 132

Aṣṭāvakra–Kahoda Upākhyāna: Śvetaketu’s Āśrama, Sarasvatī, and the Origin of Aṣṭāvakra

Upa-parva: Tīrtha-yātrā / Lomasha-kathā-prasaṅga (Aṣṭāvakra–Śvetaketu Upākhyāna Context)

Lomasha directs Yudhiṣṭhira to the sacred and fruitful āśrama of the renowned mantra-knower Śvetaketu Auḍḍālaki. The chapter notes Śvetaketu’s direct vision of Sarasvatī in human form, linking the episode to vāk (speech) and brahmavidyā (sacred knowledge). It then situates Śvetaketu alongside Aṣṭāvakra (son of Kahoda) as maternal relatives, and recalls their entry into King Janaka of Videha’s yajña arena, where they confront the famed disputant Bandi. Prompted by Yudhiṣṭhira’s inquiry, Lomasha narrates Kahoda’s formation as Uddālaka’s disciplined student and his marriage to Uddālaka’s daughter Sujātā. While Kahoda studies, the unborn child admonishes his father’s recitation; the offended sage curses the fetus to be ‘crooked in eight ways,’ resulting in Aṣṭāvakra’s distinctive body at birth. Sujātā, distressed by poverty late in pregnancy, urges Kahoda to seek wealth; he goes to Janaka and is defeated in debate, being cast into the waters by Bandi. Uddālaka instructs Sujātā to conceal this from the child. Years later, a domestic incident with Śvetaketu triggers Aṣṭāvakra’s discovery of the truth; he resolves, with Śvetaketu, to attend Janaka’s yajña—where learned disputation and the recovery of familial honor become the narrative’s immediate horizon.

Chapter Arc: तीर्थयात्रा के प्रसंग में लोमश ऋषि धर्म की कसौटी पर खरे उतरे राजा उशीनर की कथा उठाते हैं—एक भयभीत कबूतर शरण माँगता है और उसके पीछे भूखा बाज न्याय की माँग लेकर आ खड़ा होता है। → बाज कहता है कि क्षुधा से पीड़ित उसका ‘विहित भक्षण’ रोका जा रहा है; राजा धर्म-लोभ में आकर यदि उसे रोकेगा तो स्वयं धर्म से च्युत होगा। राजा प्रत्युत्तर देता है कि शरणागत की रक्षा परम धर्म है—कबूतर भयार्त है, अतः उसे लौटाना अधर्म होगा। दोनों धर्मों—अहिंसा/शरणागति और जीविका/प्रकृति-धर्म—का टकराव तीखा होता जाता है। → बाज शर्त रखता है: यदि राजा को कबूतर से स्नेह है तो कबूतर के बराबर तौल कर अपना मांस काटकर दे। राजा अपने शरीर का मांस निकाल-निकाल कर तराजू पर रखता है, पर कबूतर का पलड़ा भारी ही रहता है—अंततः राजा स्वयं को ही तराजू पर रख देने को प्रस्तुत होता है, पूर्ण आत्म-त्याग के शिखर पर पहुँचकर। → तभी बाज और कबूतर अपना दिव्य रूप प्रकट करते हैं—बाज इन्द्र है और कबूतर अग्नि (हव्यवाहन)। वे कहते हैं कि वे धर्म की परीक्षा लेने आए थे; राजा उशीनर की शरणागत-रक्षा और आत्म-त्याग से प्रसन्न होकर उसे दिव्य लोक/सदन का दर्शन कराते हैं और उसकी कीर्ति को अमर बताते हैं।

Shlokas

Verse 1

हि आय न () है > 'प्रभास' की जगह 'हाटक' पाठभेद भी मिलता है। एकत्रिशदाधिकशततमो< ध्याय: राजा उशीनरद्वारा बाजको अपने शरीरका मांस देकर शरणमें आये हुए कबूतरके प्राणोंकी रक्षा करना श्येन उवाच धर्मात्मानं त्वाहुरेकं सर्वे राजन्‌ महीक्षित: । सर्वधर्मविरुद्ध त्वं कस्मात्‌ कर्म चिकीर्षसि,तब बाजने कहा--राजन्‌! समस्त भूपाल केवल आपको ही धर्मात्मा बताते हैं। फिर आप यह सम्पूर्ण धर्मोंसे विरुद्ध कर्म कैसे करना चाहते हैं। महाराज! मैं भूखसे कष्ट पा रहा हूँ और कबूतर मेरा आहार नियत किया गया है। आप धर्मके लोभसे इसकी रक्षा न करें। वास्तवमें इसे आश्रय देकर आपने धर्मका परित्याग ही किया है

باز نے کہا: “اے بادشاہ! زمین کے سب حکمران صرف آپ ہی کو سچا دھرماتما کہتے ہیں۔ پھر آپ ایسا کام کیوں کرنا چاہتے ہیں جو ہر اصولِ دھرم کے خلاف ہے؟ بھوک مجھے ستا رہی ہے اور یہ کبوتر میرے لیے مقررہ خوراک ہے۔ دھرم کے ثواب کی لالچ میں اسے نہ بچائیے۔ حقیقت یہ ہے کہ اسے پناہ دے کر آپ نے خود دھرم کو ترک کر دیا ہے۔”

Verse 2

विहितं भक्षणं राजन्‌ पीड्यमानस्य मे क्षुधा । मा रक्षीर्धर्मलो भेन धर्ममुत्सृष्टवानसि,तब बाजने कहा--राजन्‌! समस्त भूपाल केवल आपको ही धर्मात्मा बताते हैं। फिर आप यह सम्पूर्ण धर्मोंसे विरुद्ध कर्म कैसे करना चाहते हैं। महाराज! मैं भूखसे कष्ट पा रहा हूँ और कबूतर मेरा आहार नियत किया गया है। आप धर्मके लोभसे इसकी रक्षा न करें। वास्तवमें इसे आश्रय देकर आपने धर्मका परित्याग ही किया है

باز نے کہا: “اے بادشاہ! بھوک سے ستائے ہوئے میرے لیے کھانا کھانا شریعتِ فطرت کے مطابق ہے۔ یہ کبوتر میری مقررہ خوراک ہے۔ دھرم کے ثواب کی لالچ میں اسے نہ بچائیے؛ ایسا کر کے آپ نے دھرم ہی کو چھوڑ دیا ہے۔”

Verse 3

राजोवाच संत्रस्तरूपस्त्राणार्थी त्वत्तो भीतो महाद्विज । मत्सकाशमनुप्राप्त: प्राणगृध्नुर॒यं द्विज:,राजा बोले--पक्षिराज! यह कबूतर तुमसे डरकर घबराया हुआ है और अपने प्राण बचानेकी इच्छासे मेरे समीप आया है। यह अपनी रक्षा चाहता है। बाज! इस प्रकार अभय चाहनेवाले इस कबूतरको यदि मैं तुमको नहीं सौंप रहा हूँ, यह तो परम धर्म है। इसे तुम कैसे नहीं देख रहे हो?

بادشاہ نے کہا: “اے بزرگ دو بار جنمے! یہ کبوتر تم سے ڈر کر گھبرا گیا ہے اور جان بچانے کی آرزو میں میرے پاس پناہ لینے آیا ہے۔”

Verse 4

एवमभ्यागतस्थेह कपोतस्या भयार्थिन: । अप्रदाने परं धर्म कथं श्येन न पश्यसि,राजा बोले--पक्षिराज! यह कबूतर तुमसे डरकर घबराया हुआ है और अपने प्राण बचानेकी इच्छासे मेरे समीप आया है। यह अपनी रक्षा चाहता है। बाज! इस प्रकार अभय चाहनेवाले इस कबूतरको यदि मैं तुमको नहीं सौंप रहा हूँ, यह तो परम धर्म है। इसे तुम कैसे नहीं देख रहे हो?

بادشاہ نے کہا: “یہ کبوتر خوف زدہ ہو کر یہاں پناہ لینے آیا ہے؛ ایسے پناہ گزیں کو نہ سونپنا ہی اعلیٰ ترین دھرم ہے۔ اے باز! تم اسے کیسے نہیں دیکھتے؟”

Verse 5

प्रस्पन्दमान: सम्भ्रान्त: कपोत: श्येन लक्ष्यते । मत्सकाशं जीवितार्थी तस्य त्यागो विगर्हित:,बाज! देखो तो यह बेचारा कबूतर किस प्रकार भयसे व्याकुल हो थर-थर काँप रहा है। इसने अपने प्राणोंकी रक्षाके लिये ही मेरी शरण ली है। ऐसी दशामें इसे त्याग देना बड़ी ही निन्दाकी बात है। जो मनुष्य ब्राह्मणोंकी हत्या करता है, जो जगन्माता गौका वध करता है तथा जो शरणमें आये हुए को त्याग देता है, इन तीनोंको समान पाप लगता है

باز نے کہا: “دیکھو، یہ بے چارہ کبوتر خوف سے کانپ رہا ہے۔ جان بچانے ہی کے لیے یہ میرے پاس پناہ لینے آیا ہے۔ ایسی حالت میں اسے چھوڑ دینا سخت قابلِ ملامت ہے۔”

Verse 6

यो हि कश्रिद्‌ द्विजान्‌ हन्याद्‌ गां वा लोकस्य मातरम्‌ । शरणागतं च त्यजते तुल्यं तेषां हि पातकम्‌,बाज! देखो तो यह बेचारा कबूतर किस प्रकार भयसे व्याकुल हो थर-थर काँप रहा है। इसने अपने प्राणोंकी रक्षाके लिये ही मेरी शरण ली है। ऐसी दशामें इसे त्याग देना बड़ी ही निन्दाकी बात है। जो मनुष्य ब्राह्मणोंकी हत्या करता है, जो जगन्माता गौका वध करता है तथा जो शरणमें आये हुए को त्याग देता है, इन तीनोंको समान पाप लगता है

باز نے کہا—جو کوئی برہمن کو قتل کرے، یا گائے کو—جو دنیا کی ماں ہے—ذبح کرے، یا پناہ مانگ کر آنے والے کو چھوڑ دے، ان سب کا گناہ ایک سا ہے۔ دیکھو یہ بے چارہ کبوتر خوف سے کانپ رہا ہے؛ اپنی جان بچانے کے لیے ہی اس نے میری پناہ لی ہے۔ ایسی حالت میں اسے ٹھکرا دینا سخت قابلِ ملامت ہے۔

Verse 7

श्येन उवाच आहारात्‌ सर्वभूतानि सम्भवन्ति महीपते | आहारेण विवर्धन्ते तेन जीवन्ति जन्तव:,बाजने कहा--महाराज! सब प्राणी आहारसे ही उत्पन्न होते हैं, आहारसे ही उनकी वृद्धि होती है और आहारसे ही जीवित रहते हैं

باز نے کہا—اے مہاراج! تمام جاندار غذا ہی سے پیدا ہوتے ہیں، غذا ہی سے بڑھتے ہیں، اور اسی غذا کے سہارے جیتے ہیں۔

Verse 8

शक्‍्यते दुस्त्यजे<प्यर्थे चिररात्राय जीवितुम्‌ । न तु भोजनमुत्सृज्य शक्‍यं वर्तयितुं चिरम्‌,जिसको त्यागना बहुत कठिन है, उस अर्थके बिना भी मनुष्य बहुत दिनोंतक जीवित रह सकता है, परंतु भोजन छोड़ देनेपर कोई भी अधिक समयतक जीवन धारण नहीं कर सकता

جس مال کو چھوڑنا نہایت دشوار ہے، اس کے بغیر بھی آدمی بہت دنوں تک زندہ رہ سکتا ہے؛ مگر کھانا ترک کر دے تو کوئی بھی زیادہ عرصہ زندگی قائم نہیں رکھ سکتا۔

Verse 9

भक्ष्याद्‌ वियोजितस्याद्य मम प्राणा विशाम्पते । विसृज्य कायमेष्यन्ति पन्थानमकुतोभयम्‌,प्रजानाथ! आज आपने मुझे भोजनसे वंचित कर दिया है, इसलिये मेरे प्राण इस शरीरको छोड़कर अकुतोभय-पथ ([मृत्यु)-को प्राप्त हो जायँगे। धर्मात्मन्‌! इस प्रकार मेरी मृत्यु हो जानेपर मेरे स्त्री-पुत्र आदि भी (असहाय होनेके कारण) नष्ट हो जायँगे। इस तरह आप एक कबूतरकी रक्षा करके बहुत-से प्राणियोंकी रक्षा नहीं कर रहे हैं

باز نے کہا—اے رعایا کے آقا! آج تم نے مجھے میرے بھکش (خوراک) سے محروم کر دیا ہے؛ اس لیے میری جانیں اس جسم کو چھوڑ کر بے خوف راہ—یعنی موت—کی طرف چلی جائیں گی۔

Verse 10

प्रमृते मयि धर्मात्मन्‌ पुत्रदारादि नड्क्ष्यति | रक्षमाण: कपोतं त्वं बहून्‌ प्राणान्‌ न रक्षसि,प्रजानाथ! आज आपने मुझे भोजनसे वंचित कर दिया है, इसलिये मेरे प्राण इस शरीरको छोड़कर अकुतोभय-पथ ([मृत्यु)-को प्राप्त हो जायँगे। धर्मात्मन्‌! इस प्रकार मेरी मृत्यु हो जानेपर मेरे स्त्री-पुत्र आदि भी (असहाय होनेके कारण) नष्ट हो जायँगे। इस तरह आप एक कबूतरकी रक्षा करके बहुत-से प्राणियोंकी रक्षा नहीं कर रहे हैं

باز نے کہا—اے دین دار! اگر میں مر گیا تو میری بیوی، بچے اور دوسرے وابستگان بھی ہلاک ہو جائیں گے۔ تم اس ایک کبوتر کی حفاظت کرتے ہوئے بھی بہت سی جانوں کی حفاظت نہیں کر رہے۔

Verse 11

धर्म यो बाधते धर्मो न स धर्म: कुधर्म तत्‌ अविरोधात्‌ तु यो धर्म: स धर्म: सत्यविक्रम

شَیْن نے کہا—جو چیز ‘دھرم’ کہلا کر بھی دھرم ہی کو روکے، وہ دھرم نہیں؛ وہ کُدھرم ہے۔ مگر جو دھرم بےتضاد قائم رہے، وہی سچا دھرم ہے، اے ستیہ وِکرم۔

Verse 12

सत्यपराक्रमी नरेश! जो धर्म दूसरे धर्मका बाधक हो वह धर्म नहीं, कुधर्म है। जो दूसरे किसी धर्मका विरोध न करके प्रतिष्ठित होता है वही वास्तविक धर्म है ।। विरोधिषु महीपाल निश्चित्य गुरुलाघवम्‌ । न बाधा विद्यते यत्र तं धर्म समुपाचरेत्‌,परस्परविरुद्ध प्रतीत होनेवाले धर्मोमें गौरव-लाघवका विचार करके, जिसमें दूसरोंके लिये बाधा न हो उसी धर्मका आचरण करना चाहिये

اے سچّے پرَاکرم والے نریش! جو دھرم دوسرے جائز دھرم میں رکاوٹ بنے، وہ دھرم نہیں؛ وہ کُدھرم ہے۔ جو دھرم کسی دوسرے حقّانی فرض کی مخالفت کیے بغیر قائم رہے، وہی حقیقی دھرم ہے۔ پس اے مہيپال! جب فرائض باہم متضاد دکھائی دیں تو گُرو-لَگھو کا وزن کر کے وہی راہ اختیار کرو جس میں دوسروں کے لیے کوئی رکاوٹ نہ ہو۔

Verse 13

गुरुलाघवमादाय धर्माधर्मविनिश्चये । यतो भूयांस्ततो राजन्‌ कुरुष्व धर्मनिश्चयम्‌,राजन! धर्म और अधर्मका निर्णय करते समय पुण्य और पापके गौरव-लाघवपर ही दृष्टि रखकर विचार कीजिये तथा जिसमें अधिक पुण्य हो उसीको आचरणमें लाने योग्य धर्म ठहराइये

اے راجَن! دھرم اور اَدھرم کا فیصلہ کرتے وقت پُنّیہ اور پاپ کے گُرو-لَگھو کو تول کر دیکھو؛ اور جس راہ میں پُنّیہ زیادہ ہو، اسی کو دھرم ٹھہرا کر اپنے عمل کا قاعدہ بنا لو۔

Verse 14

राजोवाच बहुकल्याणसंयुक्तं भाषसे विहगोत्तम | सुपर्ण: पक्षिराट्‌ किं त्वं धर्मज्ञश्नास्यसंशयम्‌,राजाने कहा--पक्षिश्रेष्ठ! तुम्हारी बातें अत्यन्त कल्याणमय गुणोंसे युक्त हैं। तुम साक्षात्‌ पक्षिराज गरुड़ तो नहीं हो? इसमें संदेह नहीं कि तुम धर्मके ज्ञाता हो

راجا نے کہا—اے پرندوں کے سردار! تمہاری باتیں بےشمار خیر و برکت کی صفات سے بھری ہیں۔ کیا تم ساکشات سُپَرْن، پرندوں کے راجا گَرُڑ ہو؟ اس میں شک نہیں کہ تم دھرم کے جاننے والے ہو۔

Verse 15

तथा हि धर्मसंयुक्तं बहु चित्र च भाषसे । न ते>स्त्यविदितं किंचिदिति त्वां लक्षयाम्पहम्‌,तुम जो बातें कह रहे हो वे बड़ी ही विचित्र और धर्मसंगत हैं। मुझे लक्षणोंसे ऐसा जान पड़ता है कि ऐसी कोई बात नहीं है जो तुम्हें ज्ञात न हो

تم جو کچھ کہتے ہو وہ نہایت نادر اور دھرم کے مطابق ہے۔ علامات سے میں یہ سمجھتا ہوں کہ تمہارے لیے کوئی بات نامعلوم نہیں۔

Verse 16

शरणैषिपरित्यागं कथं साध्विति मन्यसे । आहारार्थ समारम्भस्तव चायं॑ विहंगम

باز بولا—جو پناہ مانگے اسے چھوڑ دینا تم کیسے درست سمجھتے ہو؟ اور اے پرندے! تمہاری یہ کوشش تو دراصل خوراک ہی کے لیے ہے۔

Verse 17

तो भी तुम शरणागतके त्यागको कैसे अच्छा मानते हो? यह मेरी समझमें नहीं आता। विहंगम! वास्तवमें तुम्हारा यह उद्योग केवल भोजन प्राप्त करनेके लिये है ।। शव्यश्चाप्यन्यथा कर्तुमाहारो5प्यधिकस्त्वया | गोवृषो वा वराहो वा मृगो वा महिषो5पि वा । त्वदर्थमद्य क्रियतां यच्चान्यदिह काड्क्षसि,परंतु तुम्हारे लिये आहारका प्रबन्ध तो दूसरे प्रकारसे भी किया जा सकता है और वह इस कबूतरकी अपेक्षा अधिक हो सकता है। सूअर, हिरन, भैंसा या कोई उत्तम पशु अथवा अन्य जो कोई भी वस्तु तुम्हें अभीष्ट हो वह तुम्हारे लिये प्रस्तुत की जा सकती है

باز بولا—تمہارے لیے خوراک کا بندوبست کسی اور طریقے سے بھی ہو سکتا ہے، بلکہ اس کبوتر سے زیادہ بھی۔ آج تمہارے لیے عمدہ بیل، یا جنگلی سؤر، یا ہرن، یا بھینسا—یا یہاں جو کچھ تم چاہو—تیار کیا جا سکتا ہے۔ اے پرندے! تمہاری یہ کوشش تو محض خوراک پانے کے لیے ہے؛ پھر جو پناہ لے چکا ہو اسے چھوڑ دینا تم کیسے جائز سمجھتے ہو؟

Verse 18

श्येन उवाच न वराहं न चोक्षाणं न मृगान्‌ विविधांस्तथा । भक्षयामि महाराज कि ममान्येन केनचित्‌

باز بولا—اے مہاراج! میں نہ جنگلی سؤر کھاتا ہوں، نہ بیل، نہ طرح طرح کے ہرن۔ پھر مجھے کسی اور خوراک کی کیا حاجت؟

Verse 19

बाज बोला--महाराज! मैं न सूअर खाऊँगा, न कोई उत्तम पशु और न भाँति-भाँतिके मृगोंका ही आहार करूँगा। दूसरी किसी वस्तुसे भी मुझे क्या लेना है? ।। यस्तु मे देवविहितो भक्ष:ः क्षत्रियपुड़व । तमुत्सूज महीपाल कपोतमिममेव मे,क्षत्रियशिरोमणे! विधाताने मेरे लिये जो भोजन नियत किया है वह तो यह कबूतर ही है; अत: भूपाल! इसीको मेरे लिये छोड़ दीजिये

باز بولا—اے کشتریوں کے سردار! خالق نے میرے لیے جو خوراک مقرر کی ہے وہ یہی کبوتر ہے۔ پس اے بادشاہ، اسے میرے حوالے کر دو؛ مجھے کسی اور غذا کی حاجت نہیں۔

Verse 20

श्येन: कपोतानत्तीति स्थितिरेषा सनातनी । मा राजन्‌ सारमज्ञात्वा कदलीस्कन्धमाश्रय,यह सनातन कालसे चला आ रहा है कि बाज कबूतरोंको खाता है। राजन! धर्मके सारभूत तत्त्वको न जानकर आप केलेके खम्भे (-जैसे सारहीन धर्म) का आश्रय न लीजिये

باز بولا—باز کا کبوتروں کو کھانا ایک ازلی و ابدی دستور ہے۔ اے راجن، دھرم کے جوہر کو سمجھے بغیر کیلے کے تنے کی طرح کھوکھلے سہارے کی پناہ نہ لو۔

Verse 21

राजोवाच राष्ट्र शिबीनामृद्धं वै ददानि तव खेचर । यं वा कामयसे कामं॑ श्येन सर्व ददानि ते,राजाने कहा--विहंगम! मैं शिविदेशका समृद्धिशाली राज्य तुम्हें सौंप दूँगा, और भी जिस वस्तुकी तुम्हें इच्छा होगी वह सब दे सकता हूँ

بادشاہ نے کہا— اے آسمان میں اڑنے والے پرندے! میں تمہیں شِبیوں کی خوشحال سلطنت دے دوں گا۔ یا اے شَیْن! تم جو بھی خواہش کرو، وہ سب میں تمہیں دے دوں گا۔

Verse 22

विनेम॑ पक्षिणं श्येन शरणार्थिनमागतम्‌ । येनेम॑ वर्जयेथास्त्वं कर्मणा पक्षिसत्तम । तदाचक्ष्व करिष्यामि न हि दास्ये कपोतकम्‌,किंतु शरण लेनेकी इच्छासे आये हुए इस पक्षीको नहीं त्याग सकता। पक्षिश्रेष्ठ श्येन! जिस कामके करनेसे तुम इसे छोड़ सको, वह मुझे बताओ; मैं वही करूँगा, किंतु इस कबूतरको तो नहीं दूँगा

اے شَیْن! پناہ کی طلب میں آئے ہوئے اس پرندے کو میں ترک نہیں کر سکتا۔ اے پرندوں میں برتر! ایسا کون سا عمل ہے کہ تم اسے چھوڑ دو—وہ بتاؤ؛ میں وہی کروں گا۔ مگر یہ کبوتر میں نہیں دوں گا۔

Verse 23

श्येन उवाच उशीनर कपोते ते यदि स्नेहो नराधिप । आत्मनो मांसमुत्कृत्य कपोततुलया धृतम्‌,बाज बोला--महाराज उशीनर! यदि आपका इस कबूतरपर स्नेह है तो इसीके बराबर अपना मांस काटकर तराजूमें रखिये। नृपश्रेष्ठी जब वह तौलमें इस कबूतरके बराबर हो जाय तब वही मुझे दे दीजियेगा, उससे मेरी तृप्ति हो जायगी

شَیْن بولا— اے اُشینَر، اے مردوں کے حاکم! اگر اس کبوتر سے تمہیں سچّا سنےہ ہے تو اپنے جسم سے گوشت کاٹ کر ترازو میں رکھو، اور اسے کبوتر کے وزن کے برابر کر دو۔

Verse 24

यदा सम॑ कपोतेन तव मांसं नृपोत्तम | तदा देयं तु तन्महां सा मे तुष्टिर्भविष्यति,बाज बोला--महाराज उशीनर! यदि आपका इस कबूतरपर स्नेह है तो इसीके बराबर अपना मांस काटकर तराजूमें रखिये। नृपश्रेष्ठी जब वह तौलमें इस कबूतरके बराबर हो जाय तब वही मुझे दे दीजियेगा, उससे मेरी तृप्ति हो जायगी

شَیْن بولا— اے بہترین بادشاہ! جب تمہارا گوشت اس کبوتر کے وزن کے برابر ہو جائے، تب وہی مجھے دے دینا؛ اسی سے میری تسکین ہوگی۔

Verse 25

शरीरका मांस काटकर देना है हे कु * £ राजा अनुग्रहमिमं मन्ये श्येन यन्माभियाचसे । तस्मात्‌ तेड्द्य प्रदास्यामि स्वमांसं तुलया धृतम्‌,राजाने कहा--बाज! तुम जो मेरा मांस माँग रहे हो इसे मैं अपने ऊपर तुम्हारी बहुत बड़ी कृपा मानता हूँ, अतः मैं अभी अपना मांस तराजूपर रखकर तुम्हें दिये देता हूँ

بادشاہ نے کہا— اے شَیْن! تم جو مجھ سے میرا ہی گوشت مانگتے ہو، میں اسے اپنے اوپر تمہارا احسان سمجھتا ہوں۔ لہٰذا آج میں اپنا گوشت ترازو میں تول کر تمہیں دے دوں گا۔

Verse 26

लोगमश उवाच उत्कृत्य स स्वयं मांसं राजा परमधर्मवित्‌ | तोलयामास कौन्तेय कपोतेन सम॑ विभो,लोमशजी कहते हैं--कुन्तीनन्दन! तत्पश्चात्‌ परम धर्मज्ञ राजा उशीनरने स्वयं अपना मांस काटकर उस कबूतरके साथ तौलना आरम्भ किया

لوماش نے کہا—اے کُنتی کے فرزند، اے زورآور! اس کے بعد وہ بادشاہ جو دھرم کا اعلیٰ جاننے والا تھا، اپنے ہی ہاتھ سے اپنا گوشت کاٹ کر اس کبوتر کے برابر ترازو میں تولنے لگا۔

Verse 27

पुनश्चोत्कृत्य मांसानि राजा प्रादादुशीनर:,किंतु दूसरे पलड़ेमें रखा हुआ कबूतर उस मांसकी अपेक्षा अधिक भारी निकला, तब महाराज उशीनरने पुनः अपना मांस काटकर चढ़ाया। इस प्रकार बार-बार करनेपर भी जब वह मांस कबूतरके बराबर न हुआ, तब सारा मांस काट लेनेके पश्चात्‌ वे स्वयं ही तराजूपर चढ़ गये

لوماش نے کہا—بادشاہ اُشینر نے پھر اپنے جسم سے گوشت کاٹ کر ترازو میں رکھا؛ مگر دوسرے پلڑے میں رکھا کبوتر اس گوشت سے بھی زیادہ بھاری نکلا۔ تب اس مہاراج نے بار بار مزید گوشت کاٹ کر چڑھایا۔ جب بار بار کرنے پر بھی برابری نہ ہوئی تو جتنا ممکن تھا سب گوشت کاٹنے کے بعد آخرکار وہ خود ہی ترازو پر چڑھ گیا۔

Verse 28

न विद्यते यदा मांसं कपोतेन सम॑ धृतम्‌ । तत उत्कृत्तमांसोडसावारुरोह स्वयं तुलाम्‌,किंतु दूसरे पलड़ेमें रखा हुआ कबूतर उस मांसकी अपेक्षा अधिक भारी निकला, तब महाराज उशीनरने पुनः अपना मांस काटकर चढ़ाया। इस प्रकार बार-बार करनेपर भी जब वह मांस कबूतरके बराबर न हुआ, तब सारा मांस काट लेनेके पश्चात्‌ वे स्वयं ही तराजूपर चढ़ गये

جب کٹا ہوا گوشت کبوتر کے برابر نہ ہوا تو وہ بادشاہ—بار بار گوشت کاٹنے کے باوجود—آخرکار خود ہی ترازو پر چڑھ گیا۔

Verse 29

श्येन उवाच इन्द्रोडहमस्मि धर्मज्ञ कपोतो हव्यवाडयम्‌ । जिज्ञासमानोौ धर्म त्वां यज्ञवाटमुपागतौ

باز نے کہا—اے دھرم کے جاننے والے! میں اندرا ہوں اور یہ کبوتر ہویہ واہن اگنی ہے۔ ہم دونوں تمہارے دھرم کو پرکھنے اور جاننے کے لیے تمہارے یَجْن-واٹ میں آئے ہیں۔

Verse 30

बाज बोला--धर्मज्ञ नरेश! मैं इन्द्र हूँ और यह कबूतर साक्षात्‌ अग्निदेव हैं। हम दोनों आपके धर्मकी परीक्षा लेनेके लिये इस यज्ञशालामें आपके निकट आये थे ।। यत्‌ ते मांसानि गात्रेभ्य उत्कृत्तानि विशाम्पते । एषा ते भास्वती कीर्तिलोकानभिभविष्यति,प्रजानाथ! आपने अपने अंगोंसे जो मांस काटकर चढ़ाये हैं, उससे फैली हुई आपकी प्रकाशमान कीर्ति सम्पूर्ण लोगोंसे बढ़कर होगी

باز نے کہا—اے دھرم کے جاننے والے بادشاہ! میں اندرا ہوں اور یہ کبوتر بعینہٖ ہویہ واہن اگنی دیو ہے۔ ہم دونوں تمہارے دھرم کی آزمائش کے لیے اسی یَجْن شالا میں تمہارے پاس آئے تھے۔ اے رعایا کے پالک! تم نے اپنے اعضا سے جو گوشت کاٹ کر چڑھایا ہے، اس سے تمہاری درخشاں کیرتی تمام جہانوں کی کیرتی سے بڑھ جائے گی۔

Verse 31

यावल्लोके मनुष्यास्त्वां कथयिष्यन्ति पार्थिव । तावत्‌ कीर्तिश्व लोकाश्च स्थास्यन्ति तव शाश्वता:,राजन! संसारके मनुष्य इस जगत्‌में जबतक आपकी चर्चा करेंगे, तबतक आपकी कीर्ति और सनातन लोक स्थिर रहेंगे

اے بادشاہ! اس دنیا میں جب تک لوگ تمہارا ذکر کرتے رہیں گے، تب تک تمہاری شہرت قائم رہے گی—اور اسی کے ساتھ تمہارے ابدی عوالم بھی محفوظ و برقرار رہیں گے۔

Verse 32

इत्येवमुक्त्वा राजानमारुरोह दिवं पुन: । उशीनरोअपि धर्मात्मा धर्मेणावृत्य रोदसी,राजासे ऐसा कहकर इन्द्र फिर देवलोकमें चले गये तथा धर्मात्मा राजा उशीनर भी अपने धर्मसे पृथ्वी और आकाशको व्याप्त कर देदीप्यमान शरीर धारण करके स्वर्गलोकमें चले गये। राजन्‌! यही उन महात्मा राजा उशीनरका आश्रम है जो पुण्यजनक होनेके साथ ही समस्त पापोंसे छुटकारा दिलानेवाला है। तुम मेरे साथ इस पवित्र आश्रमका दर्शन करो। महाराज! वहाँ पुण्यात्मा महात्मा ब्राह्मणोंको सदा सनातन देवता तथा मुनियोंका दर्शन होता रहता है

یوں کہہ کر اندرا دوبارہ دیولोक کو چڑھ گیا۔ اور دھرماتما راجا اُشینر بھی اپنے دھرم کے نور سے زمین و آسمان کو بھر کر، تابناک صورت اختیار کرکے سوَرگ لوک کو پہنچا۔

Verse 33

विभ्राजमानो वपुषाप्यारुरोह त्रिविष्टपम्‌ । तदेतत्‌ सदन राजन्‌ राज्ञस्तस्य महात्मन:,राजासे ऐसा कहकर इन्द्र फिर देवलोकमें चले गये तथा धर्मात्मा राजा उशीनर भी अपने धर्मसे पृथ्वी और आकाशको व्याप्त कर देदीप्यमान शरीर धारण करके स्वर्गलोकमें चले गये। राजन्‌! यही उन महात्मा राजा उशीनरका आश्रम है जो पुण्यजनक होनेके साथ ही समस्त पापोंसे छुटकारा दिलानेवाला है। तुम मेरे साथ इस पवित्र आश्रमका दर्शन करो। महाराज! वहाँ पुण्यात्मा महात्मा ब्राह्मणोंको सदा सनातन देवता तथा मुनियोंका दर्शन होता रहता है

تابناک جسم کے ساتھ چمکتا ہوا وہ تریوِشٹپ (سورگ) کو چڑھ گیا۔ اے بادشاہ! یہ اسی مہاتما راجا کا مسکن ہے۔

Verse 34

पश्यस्वैतन्मया सार्ध पुण्यं पापप्रमोचनम्‌ । तत्र वै सततं देवा मुनयश्व॒ सनातना: । दृश्यन्ते ब्राह्मणै राजन्‌ पुण्यवद्भिर्महात्मभि:,राजासे ऐसा कहकर इन्द्र फिर देवलोकमें चले गये तथा धर्मात्मा राजा उशीनर भी अपने धर्मसे पृथ्वी और आकाशको व्याप्त कर देदीप्यमान शरीर धारण करके स्वर्गलोकमें चले गये। राजन्‌! यही उन महात्मा राजा उशीनरका आश्रम है जो पुण्यजनक होनेके साथ ही समस्त पापोंसे छुटकारा दिलानेवाला है। तुम मेरे साथ इस पवित्र आश्रमका दर्शन करो। महाराज! वहाँ पुण्यात्मा महात्मा ब्राह्मणोंको सदा सनातन देवता तथा मुनियोंका दर्शन होता रहता है

میرے ساتھ اسے دیکھو—یہ مقام باعثِ ثواب اور گناہوں سے رہائی دینے والا ہے۔ اے بادشاہ! وہاں ازلی دیوتا اور رشی ہمیشہ دکھائی دیتے ہیں؛ نیک سیرت، عظیم النفس برہمن ان کا مسلسل دیدار کرتے رہتے ہیں۔

Verse 131

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपवके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें श्येनकपोतीयोपाख्यानविषयक एक सौ इकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

یوں شری مہابھارت کے ون پرَو کے تحت تیرتھ یاترا پرَو میں، لوماش کی تیرتھ یاترا کے پس منظر میں، شَیِنَکَپوتِیَہ اُپاخیان کا ایک سو اکتیسواں باب اختتام کو پہنچا۔

Verse 13131

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां श्येनकपोतीये एकत्रिंशदधिकशततमो< ध्याय:

یوں شری مہابھارت کے ون پرَو کے تیرتھ یاترا پرَو میں، لوماش کی تیرتھ یاترا کے ضمن میں، شَیَن-کپوتی (باز اور کبوتر) کے قصّے کا ایک سو اکتیسواں ادھیائے اختتام کو پہنچا۔

Frequently Asked Questions

The dilemma centers on pursuing material support through high-stakes public debate: Kahoda seeks wealth for household security, but the institutional risks of disputation expose him to catastrophic loss, raising questions about means, prudence, and responsibility.

Speech and learning are ethically charged: knowledge requires humility, and words—whether admonition, recitation, or curse—shape destinies; therefore disciplined study and measured speech are presented as safeguards against avoidable harm.

No explicit phalaśruti is stated in the provided passage; the chapter functions as contextual meta-instruction by embedding moral causality within biography, positioning the episode as an interpretive lens for dharma, debate culture, and restorative action.