
Droṇa–Drupada Saṃvāda and Droṇa’s Reception at the Kuru Court (द्रोण-द्रुपद-संवादः; कुरुनगरप्रवेशः)
Upa-parva: Sambhava Upa-Parva (Genealogies and Early Formations)
Vaiśaṃpāyana narrates Droṇa’s approach to King Drupada, invoking an earlier bond of companionship formed during shared study. Drupada rejects the claim, arguing that enduring friendship is rare and that social relations depend on equivalence of wealth, lineage, and power; he presents a rank-based rationale that a prosperous king does not maintain friendship with one who is materially diminished. Droṇa, internally agitated, departs for Nāgasāhvaya/Hastināpura. There, Kuru youths at play fail to retrieve an object from a well; Droṇa demonstrates technical prowess by extracting it using consecrated reeds, prompting the princes to report him to Bhīṣma. Bhīṣma recognizes Droṇa as an appropriate preceptor and receives him with honors. Droṇa explains his training under Agniveśya and recalls Drupada’s past promise of shared enjoyments upon accession. The Kuru establishment formally entrusts the princes to Droṇa for instruction in weapons. The chapter closes by noting the arrival of other royal students, including Rādheya (Karna), whose competitive orientation toward Arjuna is already signaled.
Chapter Arc: वनवास में संतानहीनता का शोक लिए पाण्डु कुन्ती से उसके पूर्व-प्राप्त वरदान/मन्त्र की बात सुनकर उसे धर्मदेवता के आवाहन हेतु प्रेरित करते हैं। → पाण्डु ‘धर्मतत्त्व’ का पुरातन उपदेश सुनाते हुए बताते हैं कि नियोग/देव-आवाहन जैसी व्यवस्था पूर्वकाल में धर्मसम्मत मानी गई है; परन्तु कुन्ती के मन में लज्जा, संकोच और पतिव्रता-धर्म की मर्यादा का द्वन्द्व उठता है। → कुन्ती अपने पिता-गृह में ब्राह्मण से प्राप्त मन्त्र-वृत्तान्त सुनाकर कहती है कि समय आ गया है; पाण्डु की आज्ञा पाकर वह देवता को हृदय में आवाहन करने को उद्यत होती है—यहीं निर्णय का क्षण बनता है। → कुन्ती पति के प्रिय-हित में रत होकर ‘तथेत्युक्त्वा’ आज्ञा स्वीकार करती है, प्रणाम कर प्रदक्षिणा देती है और पुत्रोत्पत्ति के लिए धर्मदेवता के आवाहन की तैयारी निश्चित हो जाती है। → कुन्ती अब किस देवता का प्रथम आवाहन करेगी और उस आवाहन से किस प्रकार का पुत्र प्रकट होगा—यह अगली कड़ी का उत्कंठा-बिन्दु है।
Verse 1
क्र एकविशर्त्याधेकशततमो< ध्याय: पाण्डुका कुन्तीको समझाना और कुन्तीका पतिकी आज्ञासे पुत्रोत्पत्तिके लिये धर्मदेवताका आवाहन करनेके लिये उद्यत होना वैशम्पायन उवाच एवमुक्तस्तया राजा तां देवीं पुनरब्रवीत् । धर्मविद् धर्मसंयुक्तमिदं वचनमुत्तमम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! कुन्तीके यों कहनेपर धर्मज्ञ राजा पाण्डुने देवी कुन्तीसे पुनः यह धर्मयुक्त बात कही
وَیشَمپایَن نے کہا—جب اُس نے یوں کہا تو دھرم کے جاننے والے راجا پانڈو نے اُس دیوی کُنتی سے پھر خطاب کیا۔ یہ کلام نہایت عمدہ تھا—دھرم سے وابستہ اور دھرم شناس کی زبان سے ادا کیا ہوا۔
Verse 2
पाण्डुरुवाच एवमेतत् पुरा कुन्ति व्युषिताश्वश्चकार ह | यथा त्वयोक्तं कल्याणि स ह्वासीदमरोपम:,पाण्डु बोले--कुन्ती! तुम्हारा कहना ठीक है। पूर्वकालमें राजा व्युषिताश्वने जैसा तुमने कहा है, वैसा ही किया था। कल्याणी! वे देवताओंके समान तेजस्वी थे
پانڈو نے کہا—کُنتی! بات یہی ہے۔ قدیم زمانے میں راجا ویوشِتاشو نے، جیسا تم نے کہا، ویسا ہی کیا تھا۔ اے نیک بخت! وہ دیوتاؤں کی مانند تابناک تھا۔
Verse 3
अथ विविदं प्रवक्ष्यामि धर्मतत्त्वं निबोध मे । पुराणमृषिभिरद्दष्ट धर्मविद्धिर्महात्मभि:,अब मैं तुम्हें यह धर्मका तत्त्व बतलाता हूँ, सुनो। यह पुरातन धर्मतत्त्व धर्मज्ञ महात्मा ऋषियोंने प्रत्यक्ष किया है
اب میں تمہیں دھرم کے گوناگوں تَتّو بیان کرتا ہوں؛ میری بات سن کر سمجھ لو۔ یہ قدیم اصولِ دھرم اُن عظیم رِشیوں نے براہِ راست جانا تھا جو دھرم کے سچے عارف تھے۔
Verse 4
धर्ममेवं जना: सन्त: पुराणं परिचक्षते । भर्ता भार्या राजपुत्रि धर्म्य वाधर्म्यमेव वा,साधु पुरुष इसीको प्राचीन धर्म कहते हैं। राजकन्ये! पति अपनी पत्नीसे जो बात कहे, वह धर्मके अनुकूल हो या प्रतिकूल, उसे अवश्य पूर्ण करना चाहिये--ऐसा वेदज्ञ पुरुषोंका कथन है। विशेषतः ऐसा पति, जो पुत्रकी अभिलाषा रखता हो और स्वयं संतानोत्पादनकी शक्तिसे रहित हो, जो बात कहे, वह अवश्य माननी चाहिये। निर्दोष अंगोंवाली शुभलक्षणे! मैं चूँकि पुत्रका मुँह देखनेके लिये लालायित हूँ, अतएव तुम्हारी प्रसन्नताके लिये मस्तकके समीप यह अंजलि धारण करता हूँ, जो लाल-लाल अंगुलियोंसे युक्त तथा कमलदलके समान सुशोभित है। सुन्दर केशोंवाली प्रिये! तुम मेरे आदेशसे तपस्यामें बढ़े-चढ़े हुए किसी श्रेष्ठ ब्राह्मणके साथ समागम करके गुणवान् पुत्र उत्पन्न करो। सुश्रोणि! तुम्हारे प्रयत्नसे मैं पुत्रवानोंकी गति प्राप्त करूँ, ऐसी मेरी अभिलाषा है
نیک لوگ اسی کو قدیم دھرم کہتے ہیں—اے راجکماری! شوہر بیوی سے جو کچھ کہے، خواہ وہ دھرم کے مطابق ہو یا خلافِ دھرم، اسے پورا کرنا چاہیے۔
Verse 5
यद् ब्रूयात् तत् तथा कार्यमिति वेदविदो विदु: । विशेषत: पुत्रगृध्यी हीन: प्रजननात् स्वयम्,साधु पुरुष इसीको प्राचीन धर्म कहते हैं। राजकन्ये! पति अपनी पत्नीसे जो बात कहे, वह धर्मके अनुकूल हो या प्रतिकूल, उसे अवश्य पूर्ण करना चाहिये--ऐसा वेदज्ञ पुरुषोंका कथन है। विशेषतः ऐसा पति, जो पुत्रकी अभिलाषा रखता हो और स्वयं संतानोत्पादनकी शक्तिसे रहित हो, जो बात कहे, वह अवश्य माननी चाहिये। निर्दोष अंगोंवाली शुभलक्षणे! मैं चूँकि पुत्रका मुँह देखनेके लिये लालायित हूँ, अतएव तुम्हारी प्रसन्नताके लिये मस्तकके समीप यह अंजलि धारण करता हूँ, जो लाल-लाल अंगुलियोंसे युक्त तथा कमलदलके समान सुशोभित है। सुन्दर केशोंवाली प्रिये! तुम मेरे आदेशसे तपस्यामें बढ़े-चढ़े हुए किसी श्रेष्ठ ब्राह्मणके साथ समागम करके गुणवान् पुत्र उत्पन्न करो। सुश्रोणि! तुम्हारे प्रयत्नसे मैं पुत्रवानोंकी गति प्राप्त करूँ, ऐसी मेरी अभिलाषा है
وید کے جاننے والے کہتے ہیں—شوہر جو کہے، اسے بعینہٖ ویسا ہی کرنا چاہیے۔ خصوصاً جب شوہر بیٹے کا خواہاں ہو مگر خود قوتِ تولید میں کمزور ہو۔
Verse 6
यथाहमनवलद्याजड़ि पुत्रदर्शलालस: | तथा रक्ताड्गुलितलः पद्मपत्रनिभ: शुभे,साधु पुरुष इसीको प्राचीन धर्म कहते हैं। राजकन्ये! पति अपनी पत्नीसे जो बात कहे, वह धर्मके अनुकूल हो या प्रतिकूल, उसे अवश्य पूर्ण करना चाहिये--ऐसा वेदज्ञ पुरुषोंका कथन है। विशेषतः ऐसा पति, जो पुत्रकी अभिलाषा रखता हो और स्वयं संतानोत्पादनकी शक्तिसे रहित हो, जो बात कहे, वह अवश्य माननी चाहिये। निर्दोष अंगोंवाली शुभलक्षणे! मैं चूँकि पुत्रका मुँह देखनेके लिये लालायित हूँ, अतएव तुम्हारी प्रसन्नताके लिये मस्तकके समीप यह अंजलि धारण करता हूँ, जो लाल-लाल अंगुलियोंसे युक्त तथा कमलदलके समान सुशोभित है। सुन्दर केशोंवाली प्रिये! तुम मेरे आदेशसे तपस्यामें बढ़े-चढ़े हुए किसी श्रेष्ठ ब्राह्मणके साथ समागम करके गुणवान् पुत्र उत्पन्न करो। सुश्रोणि! तुम्हारे प्रयत्नसे मैं पुत्रवानोंकी गति प्राप्त करूँ, ऐसी मेरी अभिलाषा है
وَیشَمپایَن نے کہا: اے نیک فال شہزادی! نیک لوگ اسی کو قدیم دھرم کہتے ہیں کہ شوہر بیوی سے جو بات کہے—چاہے وہ دھرم کے موافق دکھائی دے یا اس کے خلاف—اسے ضرور پورا کیا جائے؛ یہی وید کے جاننے والوں کا قول ہے۔ خصوصاً جب شوہر بیٹے کی آرزو رکھتا ہو اور خود اولاد پیدا کرنے کی قدرت سے محروم ہو، تو اس کی درخواست ماننی ہی چاہیے۔ اے بے عیب اعضا والی، مبارک نشان خاتون! چونکہ میں بیٹے کا چہرہ دیکھنے کا مشتاق ہوں، اس لیے تیری رضا کے لیے میں اپنے سر کے قریب یہ دستِ دعا اٹھاتا ہوں—سرخ انگلیوں سے آراستہ، کنول کی پنکھڑی کی مانند۔ اے خوبصورت گیسوؤں والی محبوبہ! میرے حکم سے ریاضت میں برتر کسی افضل برہمن کے پاس جا کر ملاپ کر اور ایک بافضیلت بیٹا جن۔ اے کشادہ کولہوں والی! میری خواہش ہے کہ تیرے ہی جتن سے میں اُن لوگوں کی منزل پاؤں جن کے ہاں بیٹے ہوتے ہیں۔
Verse 7
प्रसादार्थ मया ते5यं शिरस्यभ्युद्यतो55जलि: । मन्नियोगात् सुकेशान्ते द्विजातेस्तपसाधिकात्,साधु पुरुष इसीको प्राचीन धर्म कहते हैं। राजकन्ये! पति अपनी पत्नीसे जो बात कहे, वह धर्मके अनुकूल हो या प्रतिकूल, उसे अवश्य पूर्ण करना चाहिये--ऐसा वेदज्ञ पुरुषोंका कथन है। विशेषतः ऐसा पति, जो पुत्रकी अभिलाषा रखता हो और स्वयं संतानोत्पादनकी शक्तिसे रहित हो, जो बात कहे, वह अवश्य माननी चाहिये। निर्दोष अंगोंवाली शुभलक्षणे! मैं चूँकि पुत्रका मुँह देखनेके लिये लालायित हूँ, अतएव तुम्हारी प्रसन्नताके लिये मस्तकके समीप यह अंजलि धारण करता हूँ, जो लाल-लाल अंगुलियोंसे युक्त तथा कमलदलके समान सुशोभित है। सुन्दर केशोंवाली प्रिये! तुम मेरे आदेशसे तपस्यामें बढ़े-चढ़े हुए किसी श्रेष्ठ ब्राह्मणके साथ समागम करके गुणवान् पुत्र उत्पन्न करो। सुश्रोणि! तुम्हारे प्रयत्नसे मैं पुत्रवानोंकी गति प्राप्त करूँ, ऐसी मेरी अभिलाषा है
وَیشَمپایَن نے کہا: “تیری رضا حاصل کرنے کے لیے میں نے اپنے سر کے قریب یہ دستِ دعا اٹھایا ہے۔ اے خوبصورت گیسوؤں والی محبوبہ! میرے ‘نییوگ’ کے حکم سے تپ میں برتر کسی دِوِج برہمن کے پاس جا اور ایک باکردار بیٹا جن۔ اہلِ علم اسی کو قدیم قاعدۂ دھرم کہتے ہیں کہ شوہر بیوی سے جو چاہے—چاہے وہ دھرم کے موافق دکھائی دے یا خلاف—اسے پورا کیا جائے؛ اور خاص طور پر تب، جب شوہر بیٹے کا خواہاں ہو مگر خود اولاد پیدا کرنے سے عاجز ہو۔ اے بے عیب اعضا والی، مبارک خاتون! میں بیٹے کا چہرہ دیکھنے کو بے تاب ہوں؛ اس لیے تیری خوشنودی کے لیے التجا کرتا ہوں—اس نییوگ کو پورا کر، تاکہ تیرے ہی جتن سے میں اُن لوگوں کی منزل پا سکوں جن کے ہاں بیٹے ہوتے ہیں۔”
Verse 8
पुत्रान् गुणसमायुक्तानुत्पादयितुमर्हसि । त्वत्कृतेडहं पृथुश्रोणि गच्छेयं पुत्रिणां गतिम्,साधु पुरुष इसीको प्राचीन धर्म कहते हैं। राजकन्ये! पति अपनी पत्नीसे जो बात कहे, वह धर्मके अनुकूल हो या प्रतिकूल, उसे अवश्य पूर्ण करना चाहिये--ऐसा वेदज्ञ पुरुषोंका कथन है। विशेषतः ऐसा पति, जो पुत्रकी अभिलाषा रखता हो और स्वयं संतानोत्पादनकी शक्तिसे रहित हो, जो बात कहे, वह अवश्य माननी चाहिये। निर्दोष अंगोंवाली शुभलक्षणे! मैं चूँकि पुत्रका मुँह देखनेके लिये लालायित हूँ, अतएव तुम्हारी प्रसन्नताके लिये मस्तकके समीप यह अंजलि धारण करता हूँ, जो लाल-लाल अंगुलियोंसे युक्त तथा कमलदलके समान सुशोभित है। सुन्दर केशोंवाली प्रिये! तुम मेरे आदेशसे तपस्यामें बढ़े-चढ़े हुए किसी श्रेष्ठ ब्राह्मणके साथ समागम करके गुणवान् पुत्र उत्पन्न करो। सुश्रोणि! तुम्हारे प्रयत्नसे मैं पुत्रवानोंकी गति प्राप्त करूँ, ऐसी मेरी अभिलाषा है
اے کشادہ کولہوں والی! تجھے چاہیے کہ اوصاف سے آراستہ بیٹے جنم دے۔ تیری ہی بدولت میں صاحبِ اولاد لوگوں کی منزل پا سکوں گا۔
Verse 9
वैशम्पायन उवाच एवमुक्ता ततः कुन्ती पाण्डुं परपुरंजयम् | प्रत्युवाच वरारोहा भर्तु: प्रियहिते रता,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! इस प्रकार कही जानेपर पतिके प्रिय और हितमें लगी रहनेवाली सुन्दरांगी कुन्ती शत्रुओंकी राजधानीपर विजय पानेवाले महाराज पाण्डुसे इस प्रकार बोली--
وَیشَمپایَن نے کہا: جب کُنتی سے یوں کہا گیا تو وہ خوش اندام خاتون، جو اپنے شوہر کی خوشی اور بھلائی میں ہمہ تن لگی رہتی تھی، دشمنوں کے شہروں کو فتح کرنے والے راجا پانڈو سے یوں بولی۔
Verse 10
(अधर्म: सुमहानेष स्त्रीणां भरतसत्तम । यत् प्रसादयते भर्ता प्रसाद्य: क्षत्रियर्षभ ।। भृणु चेद॑ महाबाहो मम प्रीतिकरं वच: ।।) “भरतश्रेष्ठ! क्षत्रियशिरोमणे! स्त्रियोंके लिये यह बड़े अधर्मकी बात है कि पति ही उनसे प्रसन्न होनेके लिये बार-बार अनुरोध करे; क्योंकि नारीका ही यह कर्तव्य है कि वह पतिको प्रसन्न रखे। महाबाहो! आप मेरी यह बात सुनिये। इससे आपको बड़ी प्रसन्नता होगी। पितृवेश्मन्यहं बाला नियुक्तातिथिपूजने । उग्र॑ पर्यचरं तत्र ब्राह्मणं संशितव्रतम्,बाल्यावस्थामें जब मैं पिताके घर थी, मुझे अतिथियोंके सत्कारका काम सौंपा गया था। वहाँ कठोर व्रतका पालन करनेवाले एक उग्रस्वभावके ब्राह्मणकी, जिनका धर्मके विषयमें निश्चय दूसरोंको अज्ञात है तथा जिन्हें लोग दुर्वासा कहते हैं, मैंने बड़ी सेवा-शुश्रूषा की। अपने मनको संयममें रखनेवाले उन महात्माको मैंने सब प्रकारके यत्नोंद्वारा संतुष्ट किया
کُنتی نے کہا: اے بھرتوں میں برتر، اے کشتریوں کے سردار! عورتوں کے لیے یہ بہت بڑی بے قاعدگی ہے کہ شوہر کو بیوی کی رضا پانے کے لیے بار بار منت سماجت کرنی پڑے؛ کیونکہ شوہر کو خوش رکھنا تو عورت ہی کا فرض ہے۔ اے مہاباہو! میری بات سنئے؛ یہ آپ کو خوش کرے گی۔ جب میں کم سن تھی اور اپنے والد کے گھر میں رہتی تھی تو مجھے مہمانوں کی خاطر تواضع کی خدمت سونپی گئی تھی۔ وہاں میں نے سخت نذر و نیاز والے، تند خو ایک برہمن کی بڑی دلجمعی سے خدمت کی تھی۔
Verse 11
निगूढनिश्चयं धर्मे यं तं दुर्वाससं विदु: । तमहं संशितात्मानं सर्वयत्नैरतोषयम्,बाल्यावस्थामें जब मैं पिताके घर थी, मुझे अतिथियोंके सत्कारका काम सौंपा गया था। वहाँ कठोर व्रतका पालन करनेवाले एक उग्रस्वभावके ब्राह्मणकी, जिनका धर्मके विषयमें निश्चय दूसरोंको अज्ञात है तथा जिन्हें लोग दुर्वासा कहते हैं, मैंने बड़ी सेवा-शुश्रूषा की। अपने मनको संयममें रखनेवाले उन महात्माको मैंने सब प्रकारके यत्नोंद्वारा संतुष्ट किया
وَیشَمپایَن نے کہا—دھرم کے معاملے میں جس کا عزم دوسروں سے پوشیدہ رہتا ہے، جسے لوگ دُروَاسا کے نام سے جانتے ہیں، اُس ضبطِ نفس والے تپسوی مہاتما کو میں نے ہر طرح کی کوشش سے راضی کیا۔
Verse 12
स मे5भिचारसंयुक्तमाचष्ट भगवान् वरम् | मन्त्र त्विमं च मे प्रादादब्रवीच्चैव मामिदम्,“तब भगवान् दुर्वासाने वरदानके रूपमें मुझे प्रयोगविधिसहित एक मन्त्रका उपदेश दिया और मुझसे इस प्रकार कहा--
وَیشَمپایَن نے کہا—تب بھگوان دُروَاسا نے رسم و طریقِ استعمال کے ساتھ ایک بر عطا کیا؛ اور یہ منتر بھی مجھے بخشا، پھر مجھ سے یوں کہا۔
Verse 13
य॑ य॑ देवं त्वमेतेन मन्त्रेणावाहयिष्यसि । अकामो वा सकामो वा वशं ते समुपैष्यति,“तुम इस मन्त्रसे जिस-जिस देवताका आवाहन करोगी, वह निष्काम हो या सकाम, निश्चय ही तुम्हारे अधीन हो जायगा
وَیشَمپایَن نے کہا—اس منتر سے تم جس جس دیوتا کو آہوان کرو گی، وہ بے خواہش ہو یا خواہش مند—یقیناً تمہارے قابو میں آ جائے گا۔
Verse 14
तस्य तस्य प्रसादात् ते राज्ञि पुत्रो भविष्यति । इत्युक्ताहं तदानेन पितृवेश्मनि भारत,“राजकुमारी! उस देवताके प्रसादसे तुम्हें पुत्र प्राप्त होगा।! भारत! इस प्रकार मेरे पिताके घरमें उस ब्राह्मणने उस समय मुझसे यह बात कही थी
وَیشَمپایَن نے کہا—“اے ملکہ، اُس اُس دیوتا کی عنایت سے تجھے بیٹا ہوگا۔” اے بھارت، اُس وقت میرے باپ کے گھر میں اُس برہمن نے مجھ سے یہ بات کہی تھی۔
Verse 15
ब्राह्मणस्य वचस्तथ्यं तस्य कालोडयमागत:ः । अनुज्ञाता त्वया देवमाह्दयेयमहं नृप । तेन मन्त्रेण राजर्षे यथास्यान्नौ प्रजा हिता,“उस ब्राह्मणकी बात सत्य ही होगी। उसके उपयोगका यह अवसर आ गया है। महाराज! आपकी आज्ञा होनेपर मैं उस मन्त्रद्वारा किसी देवताका आवाहन कर सकती हूँ। जिससे राजर्षे! हम दोनोंके लिये हितकर संतान प्राप्त हो
وَیشَمپایَن نے کہا—اُس برہمن کا قول سچا ہے؛ اس کے پورا ہونے کا وقت اب آ پہنچا ہے۔ اے نَرپ، اگر آپ اجازت دیں تو میں اُس منتر سے کسی دیوتا کو آہوان کر سکتی ہوں؛ اے راجرشی، تاکہ ہم دونوں کے لیے فائدہ مند اولاد حاصل ہو۔
Verse 16
(यां मे विद्यां महाराज अददात् स महायशा: । तयाहूत:ः सुर: पुत्र प्रदास्यति सुरोपमम् । अनपत्यकृतं यस्ते शोकं हि व्यपनेष्यति ।। अपत्यकाम एवं स्यान्ममापत्यं भवेदिति ।) “महाराज! उन महायशस्वी महर्षिने जो विद्या मुझे दी थी, उसके द्वारा आवाहन करनेपर कोई भी देवता आकर देवोपम पुत्र प्रदान करेगा, जो आपके संतानहीनताजनित शोकको दूर कर देगा; इस प्रकार मुझे संतान प्राप्त होगी और आपकी पुत्रकामना सफल हो जायगी। आवाहयामि कं देवं ब्रूहि सत्यवतां वर । त्वत्तोड्नुज्ञाप्रतीक्षां मां विद्धास्मिन् कर्मणि स्थिताम्,'सत्यवानोंमें श्रेष्ठ नरेश! बताइये, मैं किस देवताका आवाहन करूँ। आप समझ लें, मैं (आपके संतोषार्थ) इस कार्यके लिये तैयार हूँ। केवल आपसे आज्ञा मिलनेकी प्रतीक्षामें हूँ"
وَیشَمپایَن نے کہا— “اے مہاراج! اُس نہایت نامور مہارشی نے مجھے جو مقدّس علمِ استحضار عطا کیا تھا، اُس کے ذریعے پکارنے پر کوئی دیوتا خود آ کر دیوتا کے مانند ایک بیٹا بخشے گا، جو بے اولادی کے سبب تمہارے دل کا غم دور کر دے گا۔ یوں مجھے اولاد ملے گی اور تمہاری پُتر-کامنہ پوری ہوگی۔ اے سچّوں میں برتر راجا! بتاؤ، میں کس دیوتا کا آہوان کروں؟ جان لو کہ میں اس کرم کے لیے آمادہ ہوں؛ بس تمہاری اجازت کی منتظر ہوں۔”
Verse 17
पाण्डुरुवाच (धन्यो>स्म्यनुगृहीतो$स्मि त्वं नो धात्री कुलस्य हि । नमो महर्षये तस्मै येन दत्तो वरस्तव ।। न चाधधर्मेण धर्मज्ञे शक्या: पालयितुं प्रजा: ।।) अद्यैव त्वं वरारोहे प्रयतस्व यथाविधि । धर्ममावाहय शुभे स हि लोकेषु पुण्यभाक्,पाण्डु बोले-प्रिये! मैं धन्य हूँ, तुमने मुझपर महान् अनुग्रह किया। तुम्हीं मेरे कुलको धारण करनेवाली हो। उन महर्षिको नमस्कार है, जिन्होंने तुम्हें वैसा वर दिया। थधर्मज्ञि! अधर्मसे प्रजाका पालन नहीं हो सकता। इसलिये वरारोहे! तुम आज ही विधिपूर्वक इसके लिये प्रयत्न करो। शुभे! सबसे पहले धर्मका आवाहन करो, क्योंकि वे ही सम्पूर्ण लोकोंमें धर्मात्मा हैं
پانڈو نے کہا— “اے پریے! میں دھنی ہوں؛ تم نے مجھ پر بڑا احسان کیا ہے۔ حقیقتاً تم ہی ہمارے کُل کی دھارک ہو۔ اُس مہارشی کو نمسکار ہے جس کے سبب تمہیں ایسا ور ملا۔ اے دھرم کی جاننے والی! اَدھرم کے ذریعے رعایا کی حفاظت نہیں ہو سکتی۔ اس لیے، اے خوش اندام بانو! آج ہی رسم کے مطابق کوشش کرو۔ اے مبارک خاتون! سب سے پہلے دھرم کا آہوان کرو، کیونکہ وہی سب جہانوں میں پُنّیہ کا حامل اور دھرم کا پیکر ہے۔”
Verse 18
अधर्मेण न नो धर्म: संयुज्यति कथंचन । लोकक्षायं वरारोहे धर्मोडयमिति मन्यते,(इस प्रकार करनेपर) हमारा धर्म कभी किसी तरह अधर्मसे संयुक्त नहीं हो सकता। वरारोहे! लोक भी उनको साक्षात् धर्मका स्वरूप मानता है। धर्मसे उत्पन्न होनेवाला पुत्र कुरुवंशियोंमें सबसे अधिक धर्मात्मा होगा--इसमें संशय नहीं है। धर्मके द्वारा दिया हुआ जो पुत्र होगा, उसका मन अधर्ममें नहीं लगेगा। अतः शुचिस्मिते! तुम मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर धर्मको भी सामने रखते हुए उपचार (पूजा) और अभिचार (प्रयोगविधि)-के द्वारा धर्मदेवताका आवाहन करो
وَیشَمپایَن نے کہا— “اَدھرم کے ذریعے ہمارا دھرم کسی طرح بھی اَدھرم کے ساتھ نہیں جڑتا۔ اے خوش اندام بانو! دنیا بھی اسے ساکشات دھرم مانتی ہے—وہ دھرم جو سماج کو تباہی سے بچاتا ہے۔ دھرم سے پیدا ہونے والا بیٹا کُروؤں میں سب سے بڑھ کر دھرماتما ہوگا؛ اس میں کوئی شک نہیں۔ دھرم کے عطا کردہ بیٹے کا دل اَدھرم میں لذت نہ پائے گا۔ پس اے پاکیزہ مسکراہٹ والی! اپنے من اور حواس کو قابو میں رکھو، دھرم کو پیشِ نظر رکھو، اور مناسب پوجا اور مقررہ رسم و طریق کے مطابق دھرم دیوتا کا آہوان کرو۔”
Verse 19
धार्मिकश्न कुरूणां स भविष्यति न संशय: । धर्मेण चापि दत्तस्य नाधर्मे रंस्यते मन:,(इस प्रकार करनेपर) हमारा धर्म कभी किसी तरह अधर्मसे संयुक्त नहीं हो सकता। वरारोहे! लोक भी उनको साक्षात् धर्मका स्वरूप मानता है। धर्मसे उत्पन्न होनेवाला पुत्र कुरुवंशियोंमें सबसे अधिक धर्मात्मा होगा--इसमें संशय नहीं है। धर्मके द्वारा दिया हुआ जो पुत्र होगा, उसका मन अधर्ममें नहीं लगेगा। अतः शुचिस्मिते! तुम मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर धर्मको भी सामने रखते हुए उपचार (पूजा) और अभिचार (प्रयोगविधि)-के द्वारा धर्मदेवताका आवाहन करो
“اس میں کوئی شک نہیں کہ وہ کُروؤں میں سب سے بڑھ کر دھرماتما ہوگا۔ اور دھرم کے عطا کردہ بیٹے کا دل اَدھرم میں لذت نہ پائے گا۔”
Verse 20
तस्माद् धर्म पुरस्कृत्य नियता त्वं शुचिस्मिते । उपचाराभिचाराभ्यां धर्ममावाहयस्व वै,(इस प्रकार करनेपर) हमारा धर्म कभी किसी तरह अधर्मसे संयुक्त नहीं हो सकता। वरारोहे! लोक भी उनको साक्षात् धर्मका स्वरूप मानता है। धर्मसे उत्पन्न होनेवाला पुत्र कुरुवंशियोंमें सबसे अधिक धर्मात्मा होगा--इसमें संशय नहीं है। धर्मके द्वारा दिया हुआ जो पुत्र होगा, उसका मन अधर्ममें नहीं लगेगा। अतः शुचिस्मिते! तुम मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर धर्मको भी सामने रखते हुए उपचार (पूजा) और अभिचार (प्रयोगविधि)-के द्वारा धर्मदेवताका आवाहन करो
“پس اے پاکیزہ مسکراہٹ والی! ضبط و پابندی کے ساتھ دھرم کو پیشِ نظر رکھو، اور مناسب پوجا اور مقررہ رسم و طریق کے ذریعے یقیناً دھرم کا آہوان کرو۔”
Verse 21
वैशम्पायन उवाच सा तथोक्ता तथेत्युक्त्वा तेन भर्त्रा वराड़ना | अभिवाद्याभ्यनुज्ञाता प्रदक्षिणमवर्तत,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्! अपने पति पाण्डुके यों कहनेपर नारियोंमें श्रेष्ठ कुन्तीने “तथास्तु/ कहकर उन्हें प्रणाम किया और आज्ञा लेकर उनकी परिक्रमा की
وَیشَمپایَن نے کہا—اے راجن! شوہر پانڈو کے یوں کہنے پر عورتوں میں برتر کُنتی نے ‘تَتھاستُ’ کہہ کر انہیں پرنام کیا؛ اجازت لے کر ان کی پرَدَکشِنا کی۔
Verse 120
इस प्रकार श्रीमह्ाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें व्यूषिताश्नोपाख्यानविषयक एक सौ बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
یوں مقدس مہابھارت کے آدی پَرو کے ضمن میں سمبھَو پَرو کے اندر، ویوشِتاشو اُپاکھیان سے متعلق ایک سو بیسویں ادھیائے کی تکمیل ہوئی۔
Verse 121
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि कुन्तीपुत्रोत्पत्त्यनुज्ञाने एकविंशत्यधिकशततमो<ध्याय:
یہ شری مہابھارت کے آدی پَرو کے ضمن میں سمبھَو پَرو کے اندر، کُنتی کے پُتروں کی پیدائش کی اجازت سے متعلق ایک سو اکیسویں ادھیائے کا اختتام ہے۔
The chapter tests whether prior friendship based on shared learning obligates continued reciprocity when social rank diverges—contrasting personal memory and promise with courtly norms of status and propriety.
Speech and promise operate as causal instruments: when commitments are denied or reinterpreted under status logic, resentment and strategic repositioning follow; institutions (like formal tutelage) can transform private grievance into public capability.
No explicit phalaśruti is stated; the meta-function is archival and causal—explaining how Droṇa’s entry into the Kuru polity and the princes’ training become enabling conditions for later large-scale outcomes.