
Chapter Arc: संजय धृतराष्ट्र को बतलाते हैं कि कर्णपुत्र वृषसेन ने नकुल का धनुष-तलवार काटकर उसे रथहीन कर दिया—पाण्डव-पक्ष में क्षणिक हाहाकार और कौरव-पक्ष में उत्साह फैलता है। → दोनों सेनाओं के चुने हुए योद्धा एक-दूसरे पर टूट पड़ते हैं—द्रौपदीपुत्र, शैनेय, द्रुपदवंशी और अन्य महारथी कौरवों का संहार करते हैं; उधर कृप, अश्वत्थामा, दुर्योधन, शकुनि आदि भीषण प्रत्याक्रमण करते हैं। हाथियों-रथों की टक्कर, बाण-वर्षा और सहायक दलों के टूटने से रणभूमि का संतुलन डगमगाता है। → समस्त सेनाओं के बीच किरीटधारी अर्जुन वृषसेन पर धावा बोलते हैं; तीक्ष्ण क्षुर-बाणों से उसके धनुष, भुजाएँ और अंततः शिर/प्राणघातक अंगों पर प्रहार कर उसे रण में गिरा देते हैं—वृषसेन-वध अध्याय का निर्णायक क्षण बनता है। → वृषसेन के गिरते ही कौरव-पक्ष की पंक्तियाँ क्षण भर के लिए शिथिल पड़ती हैं; पाण्डव-पक्ष में उत्साह उठता है, पर विजय-उन्माद टिकता नहीं—क्योंकि यह वध कर्ण के क्रोध को ज्वालामुखी बना देता है। → पुत्रवध से संतप्त कर्ण रोष में अर्जुन के रथ पर रथ चढ़ाकर शीघ्र निर्णायक प्रतिशोध के लिए बढ़ता है—अगला संघर्ष और भी प्रचण्ड होने वाला है।
Verse 1
संजय कहते हैं--महाराज! वृषसेनने नकुलके धनुष और तलवारको काट दिया है, वे रथहीन हो गये हैं, शत्रुके बाणोंसे पीड़ित हैं तथा कर्णके पुत्रने अपने अस्त्रोंद्वारा उन्हें पराजित कर दिया है, यह जानकर श्रेष्ठ पुरुष भीमसेनके आदेशसे हाथोंमें अस्त्र-शस्त्र लिये शत्रुओंका सामना करनेमें समर्थ ट्रुपदके पाँच श्रेष्ठ पुत्र, छठे सात्यकि तथा द्रौपदीके पाँच पुत्र--ये ग्यारह वीर आपके पक्षके हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सैनिकोंका अपने सर्पतुल्य बाणोंद्वारा संहार करते हुए रथोंद्वारा वहाँ शीघ्रतापूर्वक आ पहुँचे। उस समय उनके रथकी पताकाएँ वायुके वेगसे फहरा रही थीं। उनके घोड़े उछलते हुए आ रहे थे और वे सब-के- सब जोर-जोरसे गर्जना कर रहे थे
Wika ni Sañjaya: “O Hari, pinutol ni Vṛṣasena ang busog at tabak ni Nakula; nawalan siya ng karwahe, pinahihirapan ng mga palaso ng kaaway, at dinaig siya ng anak ni Karṇa sa lakas ng mga sandata. Nang malaman ito, sa utos ng pinakadakilang lalaki na si Bhīmasena, labing-isang bayani—ang limang pinakamahusay na anak ni Drupada, si Sātyaki bilang ika-anim, at ang limang anak ni Draupadī—ay dumating doon nang mabilis sakay ng kanilang mga karwahe, tangan ang mga sandata at handang humarap sa kaaway. Sa kanilang paglusob, pinuksa nila ang mga elepante, kabayo, karwahe, at mga kawal na naglalakad ng inyong panig sa pamamagitan ng mga palasong tila ahas. Noon, ang mga watawat ng kanilang mga karwahe ay humahapay sa lakas ng hangin, ang kanilang mga kabayo’y lumulukso pasulong, at silang lahat ay umuungal nang malakas.”
Verse 2
ट्रपदसुतवरिष्ठा: पठ्च शैनेयषष्ठा द्रुपददुहितृपुत्रा: प्च चामित्रसाहा: । द्विरदरथनराश्चान् सूदयन्तस्त्वदीयान् भुजगपतिनिकाशैर्मार्गणैरात्तशस्त्रा:,संजय कहते हैं--महाराज! वृषसेनने नकुलके धनुष और तलवारको काट दिया है, वे रथहीन हो गये हैं, शत्रुके बाणोंसे पीड़ित हैं तथा कर्णके पुत्रने अपने अस्त्रोंद्वारा उन्हें पराजित कर दिया है, यह जानकर श्रेष्ठ पुरुष भीमसेनके आदेशसे हाथोंमें अस्त्र-शस्त्र लिये शत्रुओंका सामना करनेमें समर्थ ट्रुपदके पाँच श्रेष्ठ पुत्र, छठे सात्यकि तथा द्रौपदीके पाँच पुत्र--ये ग्यारह वीर आपके पक्षके हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सैनिकोंका अपने सर्पतुल्य बाणोंद्वारा संहार करते हुए रथोंद्वारा वहाँ शीघ्रतापूर्वक आ पहुँचे। उस समय उनके रथकी पताकाएँ वायुके वेगसे फहरा रही थीं। उनके घोड़े उछलते हुए आ रहे थे और वे सब-के- सब जोर-जोरसे गर्जना कर रहे थे
Sinabi ni Sañjaya: “O Hari, ang limang pinakamararangal na anak ni Drupada—kasama si Śaineya (Sātyaki) bilang ika-anim—at ang limang anak ni Draupadī, pawang mga mandirigmang di matinag sa harap ng kaaway, ay dumating nang matulin sakay ng kanilang mga karwahe. May sandata sa kamay, pinupuksa nila ang iyong mga hukbo—mga elepante, mga karwahe, at mga kawal na naglalakad—sa pamamagitan ng mga palasong tulad ng sa hari ng mga ahas. Ang kanilang mga watawat ay humahapay sa hangin; ang kanilang mga kabayo’y sumisikad pasulong; at sila’y umuungal nang malakas habang sumusugod.”
Verse 3
अथ तव रथमुख्यास्तान् प्रतीयुस्त्वरन्तः कृपह्नदिकसुतौ च द्रौणिदुर्योधनौ च । शकुनिसुतवृकौ च क्राथदेवावृधौ च द्विदजलदघोषै: स्यन्दनै: कार्मुकैश्व,तदनन्तर कृपाचार्य, कृतवर्मा, अश्वत्थामा, दुर्योधन, शकुनिपुत्र उलूक, वृक, क्राथ और देवावृध--ये आपके प्रमुख महारथी बड़ी उतावलीके साथ धनुष लिये हाथी और मेघोंके समान शब्द करनेवाले रथोंपर आरूढ़ हो उन पाण्डववीरोंका सामना करनेके लिये आ पहुँचे
Sinabi ni Sañjaya: Pagkaraan nito, nagmadaling sumulong ang mga pangunahing mandirigmang-karwahe sa iyong panig—si Kṛpa, si Kṛtavarman na anak ni Hārdika, si Aśvatthāman na anak ni Droṇa, at si Duryodhana; at gayundin si Ulūka na anak ni Śakuni, kasama sina Vṛka, Krāthadeva, at Devāvṛdha. Nakalulan sa mga karwaheng umuugong na tila elepante at kulog na ulap, at tangan ang kanilang mga busog, lumapit sila upang salubungin ang mga bayani ng Pāṇḍava.
Verse 4
तव नृप रथिवर्यास्तान् दशैकं च वीरान् नृवर शरवराग्रैस्ताडयन्तो5 भ्यरुन्धन् । नवजलदसवर्णहस्तिभिस्तानुदीयु- गिरिशिखरनिकाशैर्भीमवेगै: कुलिन्दा:
Sinabi ni Sañjaya: “O hari, ang iyong mga pangunahing mandirigmang-karwahe—ang labing-isang bayani—ay napigil at napalibutan habang tinatamaan ng mga ulang palasong matatalim. Pagkaraan, sumugod ang mga Kulinda na may hukbong elepante na maitim na parang bagong ulap ng ulan; ang kanilang paglusob ay nakapanghihilakbot sa bilis, at sa bigat ay tila mga tuktok ng bundok—sumisiksik sa labanan nang may nakalalamang na lakas.”
Verse 5
नरश्रेष्ठ नरेश्वर! कृपाचार्य आदि आपके रथी वीरोंने अपने उत्तम बाणोंद्वारा प्रहार करते हुए वहाँ पाण्डव-पक्षके उन ग्यारह महारथी वीरोंको आगे बढ़नेसे रोक दिया। तत्पश्चात् कुलिन्ददेशके योधा नूतन मेघके समान काले, पर्वतशिखरोंके समान विशालकाय और भयंकर वेगशाली हाथियोंद्वारा कौरववीरोंपर चढ़ आये ।। सुकल्पिता हैमवता मदोत्कटा रणाभिकामै: कृतिभि: समास्थिता: । सुवर्णजालैरवितता बभुर्गजा- स्तथा यथा खे जलदा: सविद्युत:,वे हिमाचलप्रदेशके मदोन्मत्त हाथी अच्छी तरह सजाये गये थे। उनकी पीठोंपर सोनेकी जालियोंसे युक्त झूल पड़े हुए थे और उनके ऊपर युद्धकी अभिलाषा रखनेवाले, रणकुशल कुलिन्द वीर बैठे हुए थे। उस समय रणभूमिमें वे हाथी आकाशमें बिजलीसहित मेघोंके समान शोभा पा रहे थे
Sinabi ni Sañjaya: “O pinakamainam sa mga tao, O hari! Si Kṛpa at ang iba pang mandirigmang-karwahe sa iyong panig, sa pag-ulan ng kanilang pinakamahuhusay na palaso, ay pumigil sa labing-isang dakilang kampeon ng hukbong Pāṇḍava at hindi sila pinahintulutang sumulong. Pagkaraan, sumalakay ang mga mandirigma mula sa lupain ng Kulinda laban sa mga bayani ng Kaurava, sakay ng mga elepanteng maitim na parang bagong ulap, dambuhala na tila mga tuktok ng bundok, at sumusugod nang nakapanghihilakbot ang bilis. Ang mga elepanteng mula sa Himalaya ay maringal ang gayak at lasing sa musth; sa kanilang likod nakaupo ang mga bihasang mandirigmang Kulinda na uhaw sa labanan; at dahil sa mga lambat na ginto na nakabalabal sa kanila, nagningning sila sa larangan na parang mga ulap ng kulog sa langit na may kidlat.”
Verse 6
कुलिन्दपुत्रो दशभिर्महायसै: कृप॑ ससूताश्चमपीडयद् भूशम् । ततः शरद्वत्सुतसायकै्हत: सहैव नागेन पपात भूतले,कुलिन्दराजके पुत्रने लोहेके बने हुए दस विशाल बाणोंसे सारथि और घोड़ोंसहित कृपाचार्यको अत्यन्त पीड़ित कर दिया। तदनन्तर शरद्वानके पुत्र कृपाचार्यके बाणोंद्वारा मारा जाकर वह हाथीके साथ ही पृथ्वीपर गिर पड़ा
Sinabi ni Sañjaya: “Ang anak ng hari ng Kulinda ay lubhang nagpahirap kay Kṛpācārya—kasama ang kanyang kutsero at mga kabayo—sa pamamagitan ng sampung malalaking palasong bakal. Ngunit pagkaraan, nang tamaan ng mga palaso ng anak ni Śaradvat (si Kṛpa), siya’y bumagsak sa lupa kasama ang kanyang elepante.”
Verse 7
कुलिन्दपुत्रावरजस्तु तोमरै- दिवाकरांशुप्रतिमैरयस्मयै: । रथं च विक्षोभ्य ननाद नर्दत- स्ततो<स्य गान्धारपति: शिरो5हरत्,कुलिन्दराजकुमारका छोटा भाई सूर्यकी किरणोंके समान कान्तिमान् एवं लोहेके बने हुए तोमरोंद्वारा गान्धारराजके रथकी धज्जियाँ उड़ाकर जोर-जोरसे गर्जना करने लगा। इतनेहीमें गान्धारराजने उस गर्जते हुए वीरका सिर काट लिया
Sinabi ni Sanjaya: Ang nakababatang kapatid ng prinsipe ng Kulinda, na naghahagis ng mga sibat na bakal na kumikislap na tila sinag ng araw, ay yumanig sa karwahe ng hari ng Gandhara at umungal sa hamon. Ngunit agad din, pinugutan ng panginoon ng Gandhara ang ulo ng mandirigmang umuungal na iyon.
Verse 8
ततः कुलिन्देषु हतेषु तेष्वथ प्रह्ष्रूपास्तव ते महारथा: । भशं प्रदध्मुर्लवणाम्बुसम्भवान् परांश्न बाणासनपाणयो< भ्ययु:,उन कुलिन्द वीरोंके मारे जानेपर आपके महारथी बड़े प्रसन्न हुए। वे जोर-जोरसे शंख बजाने लगे और हाथमें धनुष-बाण लिये शत्रुओंपर टूट पड़े
Sinabi ni Sanjaya: Nang mapatay ang mga mandirigmang Kulinda, ang inyong mga dakilang mandirigma sa karwahe ay hayagang nagalak. Malalakas nilang hinipan ang mga kabibe—na isinilang sa maalat na tubig ng dagat—at, tangan ang busog at palaso, sumugod sila sa kaaway.
Verse 9
अथाभवद् युद्धमतीव दारुणं पुन: कुरूणां सह पाण्डुसृञ्जयै: । शरासिशव्त्यृष्टिगदापरश्वधै- नराश्वनागासुहरं भूशाकुलम्,तदनन्तर कौरवोंका पाण्डवों तथा सूंजयोंके साथ पुनः अत्यन्त भयंकर युद्ध होने लगा। वह घमासान युद्ध बाण, खड्ग, शक्ति, ऋष्टि, गदा और फरसोंकी मारसे मनुष्यों, घोड़ों और हाथियोंके प्राण ले रहा था
Sinabi ni Sanjaya: Pagkaraan, muling sumiklab ang isang labanan na lubhang kakila-kilabot sa pagitan ng mga Kuru at ng mga Pandava kasama ang mga Sṛñjaya. Sa mga palaso, espada, sibat, lansang, pamalo, at palakol, ito’y naging tagakuha ng buhay ng tao, kabayo, at elepante, at ang lupa’y nayanig sa kaguluhan.
Verse 10
रथाश्वमातड्रपदातिभिस्तत: परस्परं विप्रहतापतन् क्षितौ । यथा सविद्युत्स्तनिता बलाहका: समाहता दिग्भ्य इवोग्रमारुतै:
Sinabi ni Sanjaya: Pagkaraan, ang mga karwahero, mga mangangabayo, at mga kawal na naglalakad—na nagbabanggaan sa dikitang sagupaan—ay bumagsak sa lupa. Sila’y gumuho na parang mga ulap ng bagyo na may kidlat at kulog, na pinagsasalpok mula sa lahat ng dako ng marahas na hangin.
Verse 11
जैसे बिजलीकी चमक और गर्जनासे युक्त मेघ भयंकर वायुके वेगसे ताड़ित हो सम्पूर्ण दिशाओंसे गिर जाते हैं, उसी प्रकार रथों, घोड़ों, हाथियों और पैदलोंद्वारा परस्पर मारे जाकर वे युद्धपरायण योद्धा धराशायी होने लगे ।। तत: शतानीकमतान् महागजां- स्तथा रथान् पत्तिगणांश्व तान् बहून् | जघान भोजस्तु हयानथापतन् क्षणाद् विशस्ता: कृतवर्मण: शरै:,तदनन्तर शतानीकद्वारा सम्मानित विशाल गजराजों, अश्वों, रथों और बहुत-से पैदलसमूहोंको कृतवर्माने मार डाला। वे कृतवर्माके बाणोंसे छिन्न-भिन्न हो क्षणभरमें धरतीपर गिर पड़े
Sinabi ni Sanjaya: Kung paanong ang mga ulap na may kidlat at dagundong ng kulog, kapag tinamaan ng bugso ng nakapanghihilakbot na hangin, ay waring gumuho at bumuhos mula sa lahat ng panig, gayon din ang mga mandirigmang tanging digmaan ang nasa isip ay nagsimulang bumagsak sa lupa, pinapatay sa isa’t isa ng mga karwahe, kabayo, elepante, at mga kawal na naglalakad. Pagkaraan, si Kṛtavarman ng angkan ng Bhoja ay pumatay sa malalaking elepanteng pinarangalan ni Śatānīka, pati sa mga karwahe, kabayo, at maraming pangkat ng impanterya; pinira-piraso ng mga palaso ni Kṛtavarman, sila’y bumagsak sa lupa sa isang iglap.
Verse 12
अथापरे द्रौणिहता महाद्विपा- स्त्रय: ससर्वायुधयोधकेतना: । निपेतुरु्व्या व्यसवो निपातिता- स्तथा यथा वज्रहता महाचला:,इसके बाद अअश्वत्थामाने सम्पूर्ण आयुधों, योद्धाओं और ध्वजाओंसहित अन्य तीन विशाल गजराजोंको मार गिराया। उसके द्वारा मारे गये वे विशाल गजराज वज्के मारे हुए महान् पर्वतोंके समान प्राणशून्य होकर पृथ्वीपर गिर पड़े
Wika ni Sañjaya: Pagkaraan, pinabagsak ni Aśvatthāman ang tatlo pang makapangyarihang panginoon ng mga elepante, kasama ang lahat ng kanilang sandata, mga mandirigma, at mga watawat. Napatay niya, ang mga dambuhalang elepanteng iyon ay bumagsak na walang buhay sa lupa, na parang malalaking bundok na winasak ng kulog-sibat ni Indra.
Verse 13
कुलिन्दराजावरजादनन्तर: स्तनान्तरे पत्रिवरैरताडयत् । तवात्मजं तस्य तवात्मज: शरै: शितै: शरीरं व्यहनद् द्विपं च तम्,कुलिन्दराजके छोटे भाईसे भी जो छोटा था, उसने श्रेष्ठ बाणोंद्वारा आपके पुत्रकी छातीमें चोट पहुँचायी। तब आपके पुत्रने अपने तीखे बाणोंसे उसके शरीर और हाथी दोनोंको घायल कर दिया
Wika ni Sañjaya: Ang nakababatang kapatid ng nakababatang kapatid ng hari ng mga Kulinda ay tumama sa dibdib ng iyong anak gamit ang mahuhusay na palasong may balahibo. Bilang tugon, sinugatan ng iyong anak sa pamamagitan ng matatalim na palaso ang katawan ng mandirigmang iyon at pati ang elepanteng sinasakyan niya.
Verse 14
स नागराज: सह राजसूनुना पपात रक्त बहु सर्वत: क्षरन् । महेन्द्रवजप्रहतो 5म्बुदागमे यथा जल गैरिकपर्वतस्तथा
Wika ni Sañjaya: Bumagsak ang panginoon ng mga elepante kasama ang anak ng hari, at ang dugo’y rumagasa mula sa lahat ng panig. Na para bang tinamaan ng kulog-sibat ni Mahendra sa pagdating ng mga ulap-ulan, gumuho siya na gaya ng bundok na pulang okra na binubuhusan ng tubig.
Verse 15
जैसे वर्षाकालमें इन्द्रके वज़्से आहत हुआ गेरूका पर्वत लाल रंगका पानी बहाता है, इसी प्रकार वह गजराज अपने शरीरसे सब ओर बहुत-सा रक्त बहाता हुआ कुलिन्दराजकुमारके साथ ही धराशायी हो गया ।। कुलिन्दपुत्रप्रहितो5परो द्विपः क्राथस्य सूताश्चरथं व्यपोथयत् । ततो5पतत् क्राथशराभिघातित: सहेश्वरो वजहतो यथा गिरि:,अब कुलिन्दराजकुमारने दूसरा हाथी आगे बढ़ाया। उसने क्राथके सारथि, घोड़ों और रथको कुचल डाला, परंतु क्राथके बाणोंसे पीड़ित हो वह हाथी वजच्रताड़ित पर्वतके समान अपने स्वामीके साथ ही धराशायी हो गया
Wika ni Sañjaya: Pagkatapos, ipinaharap ng prinsipe ng Kulinda ang isa pang elepante. Dinurog nito ang kutsero ni Krātha, ang mga kabayo, at ang karwahe. Ngunit nang tamaan at pahirapan ng mga palaso ni Krātha, ang elepanteng iyon—kasama ang sakay—ay bumagsak sa lupa na parang bundok na winasak ng kulog-sibat ni Indra.
Verse 16
रथी द्विपस्थेन हतो5पतच्छरै: क्राथाधिप: पर्वतजेन दुर्जय: । सवाजिसूतेष्वसनध्वजस्तथा यथा महावातहतो महाद्रुम:,तदनन्तर जैसे आँधीका उखाड़ा हुआ विशाल वृक्ष पृथ्वीपर गिर जाता है, उसी प्रकार घोड़े, सारथि, धनुष और ध्वजसहित दुर्जय महारथी क्राथ नरेश हाथीपर बैठे हुए एक पर्वतीय वीरके बाणोंसे मारा जाकर रथसे नीचे जा गिरा
Wika ni Sañjaya: Ang hari ng Krātha, si Durjaya—ang dakilang mandirigmang karwahe na mahirap daigin—ay pinabagsak ng mga palaso ng isang bayaning isinilang sa kabundukan na lumalaban mula sa ibabaw ng elepante. Nahulog siya mula sa karwahe, kasama ang mga kabayo, kutsero, busog, at watawat, at bumagsak sa lupa na parang dambuhalang punong binuwal ng marahas na hangin.
Verse 17
वृको द्विपस्थं गिरिराजवासिनं भृशं शरैर्द्धादशभि: पराभिनत् | ततो वृकं साश्वरथं महाद्विपो द्रुतं चतुर्भिश्वरणैव्यपोथयत्,तब वृकने उस पहाड़ी राजाको बारह बाण मारकर अत्यन्त घायल कर दिया। चोट खाकर पर्वतीय नरेशका वह विशाल गजराज वृककी ओर झपटा और उसने रथ और घोड़ोंसहित वृकको अपने चारों पैरोंसे दबाकर तुरंत ही उसका कचूमर निकाल दिया
Sañjaya said: Vṛka fiercely pierced the mountain-king’s elephant-mounted warrior with twelve arrows, grievously wounding him. Struck and enraged, that great elephant of the hill-chief rushed at Vṛka and, in an instant, crushed him—along with his chariot and horses—by trampling him under its four feet. The episode underscores the brutal reciprocity of battlefield violence: skill and aggression invite immediate counter-force, and in war even a moment’s advantage can turn into sudden destruction.
Verse 18
स नागराज: सनियन्तृको5पतत् तथा हतो बश्रुसुतेषुभिर्भुशम् । स चापि देवावृधसूनुरर्दित: पपात नुन्न: सहदेवसूनुना,अन्तमें बश्रुपुत्रके बाणोंसे अत्यन्त आहत होकर वह गजराज भी संचालकसहित धरतीपर लोट गया। फिर वह देवावृधकुमार भी सहदेवके पुत्रसे पीड़ित हो धराशायी हो गया
Sañjaya said: Struck down with great force by the arrows of Bāhru’s sons, the lordly elephant collapsed to the ground together with its driver. And the son of Devāvṛdha too—harassed and driven back by Sahadeva’s son—fell down, brought low in the press of battle. The scene underscores the relentless reciprocity of war: prowess meets counter-prowess, and even the mighty are felled when dharma has yielded to the logic of the battlefield.
Verse 19
विषाणगात्रावरयोधपातिना गजेन हन्तुं शकुनिं कुलिन्दज: । जगाम वेगेन भृशार्दयंश्न तं ततो<स्य गान्धारपति: शिरो5हरत्,तत्पश्चात् दूसरे कुलिन्दराजकुमारने शकुनिको मार डालनेके लिये दाँत, शरीर और सूँड़के द्वारा बड़े-बड़े योद्धाओंको मार गिरानेवाले हाथीके द्वारा उसपर वेगपूर्वक आक्रमण किया और उसे अत्यन्त घायल कर दिया। तब गान्धारराज शकुनिने उसका सिर काट लिया
Sañjaya said: A prince of the Kulindas, intent on killing Śakuni, charged at him at speed upon an elephant that, with its tusks, massive body, and trunk, had been felling great warriors. He struck Śakuni fiercely and grievously wounded him; but then the lord of Gāndhāra (Śakuni) cut off the attacker’s head. The episode underscores the brutal reciprocity of battlefield violence: even a powerful assault driven by vengeance and martial prowess can be answered instantly by ruthless counter-killing, with little space left for restraint or mercy.
Verse 20
तत:ः शतानीकहता महागजा हया रथा: पत्तिगणाश्न तावका: । सुपर्णवातप्रहता यथोरगा- स्तथागता गां विवशा विचूर्णिता:,यह देख शतानीकने आपकी सेनापर आक्रमण किया। जैसे गरुड़के पंखोंकी हवासे आहत हुए सर्प पृथ्वीपर गिर पड़ते हैं, उसी प्रकार शतानीकद्वारा मारे गये आपके विशाल हाथी, घोड़े, रथ और पैदल विवश हो पृथ्वीपर गिरकर चूर-चूर हो गये
Sañjaya said: Then your great elephants, horses, chariots, and companies of foot-soldiers—struck down by Śatānīka—fell helplessly upon the earth and were shattered. Just as serpents, beaten down by the wind from Garuḍa’s wings, drop to the ground, so too did your forces collapse under Śatānīka’s assault. The verse underscores the ruthless momentum of battle and the fragility of martial pride when confronted by overwhelming prowess.
Verse 21
ततो<भ्यविद्धाद् बहुभि: शितै: शरै: कलिज्जपुत्रो नकुलात्मजं स्मयन् ततो<स्य कोपाद् विचकर्त नाकुलिः: शिर: क्षुरेणाम्बुजसंनिभाननम्,तदनन्तर मुसकराते हुए कलिंगराजके पुत्रने अपने बहुसंख्यक पैने बाणोंद्वारा नकुलके पुत्र शतानीकको क्षत-विक्षत कर दिया। इससे नकुलकुमारको बड़ा क्रोध हुआ और उसने एक क्षुरके द्वारा कलिंगराजकुमारका कमलसदृश मुखवाला मस्तक काट डाला
Sañjaya said: Then the son of the king of Kaliṅga, smiling, struck Nakula’s son with many sharp arrows, wounding him severely. Enraged at this, Nakula’s son retaliated and, with a razor-edged arrow, cut off the Kaliṅga prince’s head—his face likened to a lotus. The episode underscores how mockery and pride on the battlefield can provoke swift, lethal retribution, and how wrath (kopa) drives warriors beyond restraint amid the ethics of war.
Verse 22
तत: शतानीकमविध्यदायसै- स्त्रिभि: शरै: कर्णसुतोअ्डर्जुनं त्रिभि: । त्रिभिश्व भीम॑ नकुलं च सप्तभि- ज॑नार्दनं द्वादशभिश्न॒ सायकै:,तत्पश्चात् कर्णपुत्र वृषसेनने लोहेके बने हुए तीन बाणोंसे शतानीकको घायल कर दिया। फिर उसने अर्जुनको तीन, भीमसेनको तीन, नकुलको सात और श्रीकृष्णको बारह बाणोंसे बींध डाला
Sinabi ni Sañjaya: Pagkaraan nito, tinamaan ng anak ni Karṇa si Śatānīka ng tatlong palasong may dulong bakal. Sumunod, binutas niya si Arjuna ng tatlo, si Bhīmasena ng tatlo, si Nakula ng pito, at si Janārdana (Kṛṣṇa) ng labindalawang palaso. Ipinakikita ng tagpong ito ang walang tigil na pag-igting ng labanan, kung saan sinusubok ang giting at katapatan sa ilalim ng mabagsik na etika ng digmaan.
Verse 23
तदस्य कर्मातिमनुष्यकर्मण: समीक्ष्य हृष्टा: कुरवो5भ्यपूजयन् । पराक्रमज्ञास्तु धनंजयस्य ये हुतोडयमग्नाविति ते तु मेनिरे,अलौकिक पराक्रम करनेवाले वृषसेनके इस कर्मको देखकर समस्त कौरव हर्षमें भर गये और उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे; परंतु जो अर्जुनके पराक्रमको जानते थे, उन्होंने निश्चिरूपसे यह समझ लिया कि अब यह वृषसेन आगकी आहुति बन जायगा
Sinabi ni Sañjaya: Nang makita ang ginawa niya—isang gawang lampas sa sukat ng karaniwang tao—nagalak ang mga Kaurava at pinarangalan siya sa masidhing papuri. Ngunit yaong tunay na nakakakilala sa giting ni Dhanañjaya (Arjuna) ay nagpasya nang tiyak: “Ang Vṛṣasena na ito’y para nang handog na inihagis sa apoy,” at tiyak na lalamunin ng lakas ni Arjuna.
Verse 24
तत: किरीटी परवीरघाती हताश्चमालोक्य नरप्रवीर: । माद्रीसुतं नकुलं लोकमध्ये समीक्ष्य कृष्णं भृशविक्षतं च
Sinabi ni Sañjaya: Pagkaraan nito, si Arjuna—ang may diyadema, mamamatay ng mga bayani ng kaaway, ang pinakadakila sa mga tao—nang makita ang mga mandirigmang nakahandusay na patay, at masdan si Nakula, anak ni Mādrī, na bumagsak sa gitna ng hukbo, at makita rin si Kṛṣṇa na malubhang sugatan, ay tinamaan ng matinding dalamhati at pangamba sa gitna ng pagkawasak ng digmaan.
Verse 25
तमापततन्तं नरवीरमुग्रं महाहवे बाणसहस्रधारिणम्
Sinabi ni Sañjaya: Sa dakilang labanan, sumugod ang mabangis na bayani, tangan ang ulang ng sanlibong palaso—larawan ng walang humpay na lakas-militar na sumusulong sa gitna ng madilim na usaping-moral ng digmaan.
Verse 26
ततो द्रुतं चैकशरेण पार्थ शितेन विद्ध्वा युधि कर्णपुत्र:
Sinabi ni Sañjaya: Pagkaraan nito, sa isang kisap, tinamaan ng anak ni Karṇa si Pārtha sa gitna ng labanan ng iisang palasong matalim na parang talim—isang gawang lalo pang nagpasidhi sa tunggalian, kung saan sinusubok ang giting at paninindigan sa ilalim ng mabigat na hinihingi ng tungkulin sa digmaan.
Verse 27
ननाद नादं सुमहानुभावो विद्ध्वेव शक्रं नमुचि: स वीर: । फिर महानुभाव कर्णपुत्र वीर वृषसेन युद्धस्थलमें कुन्तीकुमार अर्जुनको तुरंत ही एक तीखे बाणसे घायल करके बड़े जोर-जोरसे गर्जना करने लगा। ठीक वैसे ही, जैसे नमुचिने इन्द्रको बींधकर सिंहनाद किया था ।। पुनः स पार्थ वृषसेन उग्रै- बणिरविद्धाद् भुजमूले तु सब्ये
Sinabi ni Sañjaya: Ang makapangyarihan at maringal na bayani na si Vṛṣasena ay umungal nang napakalakas, na wari’y si Namuci na matapos tusukin si Indra ay nagpalabas ng sigaw na tulad ng leon. Muli, sa mababangis na palaso, tinamaan niya si Pārtha (Arjuna) sa ugat ng kaliwang bisig.
Verse 28
पूर्व यथा वृषसेनप्रयुक्ति- रभ्याहत: श्वेतहय: शरैस्तै:
Sinabi ni Sañjaya: Gaya rin ng dati, ang mga puting kabayo ay muling tinamaan ng mga palasong pinakawalan patungo kay Vṛṣasena—muling bumagsak sa kaparehong paraan, habang ang dahas ng digmaan ay walang tigil na umuulit.
Verse 29
ततः किरीटी रणमूर्थ्नि कोपात् कृत्वा त्रिशाखां भ्रुकुटिं ललाटे
Sinabi ni Sañjaya: Pagkaraan, si Kirīṭī (Arjuna), na nakatindig sa pinakaharap ng labanan, sa bugso ng poot ay kinunot ang noo at ginuhit ang kilay sa tatlong tiklop sa kanyang sentido—palatandaang tumigas ang kanyang pasya para sa hinihingi ng makatarungang digmaan.
Verse 30
मुमोच तूर्ण विशिखान् महात्मा वधे धृत: कर्णसुतस्य संख्ये । तदनन्तर किरीटथारी महात्मा अर्जुनने युद्धस्थलमें कर्णपुत्रके वधका दृढ़ निश्चय करके अपने ललाटमें स्थित भौंहोंको क्रोधपूर्वक तीन जगहसे टेढ़ी करके युद्धके मुहानेपर शीघ्रतापूर्वक बाणोंका प्रहार आरम्भ किया ।। आरक्तनेत्रो5न्तकशत्रुहन्ता उवाच कर्ण भृशमुत्स्मयंस्तदा
Sinabi ni Sañjaya: Sa matibay na pasyang patayin ang anak ni Karṇa sa siksik ng labanan, ang dakilang mandirigma ay mabilis na nagpakawala ng sunod-sunod na palaso. Pagkaraan, si Arjuna na may suot na diyadema, na namumula ang mga mata sa galit—mamumuksa ng mga kaaway na wari’y kalaban ng Kamatayan—ay nagsalita kay Karṇa habang ngumiting malamig at mabagsik.
Verse 31
दुर्योधन द्रौणिमुखांश्व॒ सर्वा- नहं रणे वृषसेनं तमुग्रम् । सम्पश्यत: कर्ण तवाद्य संख्ये नयामि लोकं निशितै: पृषत्कै:
Sinabi ni Sañjaya: “O Karṇa, ngayong araw sa gitna ng labanan, habang ikaw ay nakatingin, sa aking matatalim na palaso ay ipapadala ko sa daigdig ng mga patay ang mabangis na Vṛṣasena—at ang lahat ng pangunahing mandirigma, simula kay Aśvatthāmā.”
Verse 32
उस समय उनके नेत्र रोषसे कुछ लाल हो गये थे। वे यमराज-जैसे शत्रुको भी मार डालनेमें समर्थ थे। उस समय उन्होंने मुसकराते हुए वहाँ कर्ण, दुर्योधन और अश्व॒त्थामा आदि सब वीरोंको लक्ष्य करके कहा--'कर्ण! आज युद्धस्थलमें मैं तुम्हारे देखते-देखते उस उमग्रपराक्रमी वीर वृषसेनको अपने पैने बाणोंद्वारा यमलोक भेज दूँगा ।। ऊनं च तावद्धि जना वदन्ति सर्वेर्भवद्धिर्मम सूनुर्हतो5सौ । एको रथो मद्विहीनस्तरस्वी अहं हनिष्ये भवतां समक्षम्,“मेरा वेगशाली वीर पुत्र महारथी अभिमन्यु अकेला था। मैं उसके साथ नहीं था। उस अवस्थामें तुम सब लोगोंने मिलकर उसका वध किया था। तुम्हारे उस कर्मको सब लोग खोटा बताते हैं; परंतु आज मैं तुम सब लोगोंके सामने वृषसेनका वध करूँगा। रथपर बैठे हुए महारथियो! अपने इस पुत्रको बचा सको तो बचाओ। मैं अर्जुन आज रणभूमिमें पहले उग्रवीर वृषसेनको मारूँगा; फिर तुझ विवेकशून्य सूतपुत्रका भी वध कर डालूँगा
Sanjaya said: At that moment his eyes reddened with wrath; he looked capable of striking down even an enemy like Yama himself. Smiling, he fixed his gaze on Karna, Duryodhana, Ashvatthama and the other heroes and declared: “Karna, today—while you watch—I will send that fiercely valiant warrior Vrishasena to Yama’s realm with my keen arrows. People everywhere say this much: all of you together killed my son. Abhimanyu, a swift and mighty chariot-warrior, stood alone, and I was not beside him. The world condemns that deed as blameworthy. Therefore, in your very presence, I will kill Vrishasena. O great chariot-fighters seated on your cars—save this son of yours if you can. I, Arjuna, will first slay the formidable Vrishasena on the battlefield, and then I will also kill you, Karna—the charioteer’s son, bereft of discernment.”
Verse 33
संरक्ष्यतां रथसंस्था: सुतो5य- महं हनिष्ये वृषसेनमुग्रम् । पश्चाद् वधिष्ये त्वामपि सम्प्रमूढ- महं हनिष्ये$र्जुन आजिमध्ये,“मेरा वेगशाली वीर पुत्र महारथी अभिमन्यु अकेला था। मैं उसके साथ नहीं था। उस अवस्थामें तुम सब लोगोंने मिलकर उसका वध किया था। तुम्हारे उस कर्मको सब लोग खोटा बताते हैं; परंतु आज मैं तुम सब लोगोंके सामने वृषसेनका वध करूँगा। रथपर बैठे हुए महारथियो! अपने इस पुत्रको बचा सको तो बचाओ। मैं अर्जुन आज रणभूमिमें पहले उग्रवीर वृषसेनको मारूँगा; फिर तुझ विवेकशून्य सूतपुत्रका भी वध कर डालूँगा
Sañjaya said: “Let the great warriors seated in their chariots protect this son if they can. I shall strike down the fierce Vṛṣasena. Thereafter, you too—bewildered one—shall be slain by me. In the midst of battle, I, Arjuna, will kill you.” The utterance frames the coming combat as a moral reckoning: a public challenge to defend one’s kin and a vow of retribution, invoking the shame of earlier collective wrongdoing and demanding accountability on the battlefield.
Verse 34
तमद्य मूलं कलहस्य संख्ये दुर्योधनापाश्रयजातदर्पम् त्वामद्य हन्तास्मि रणे प्रसहय अस्यैव हन्ता युधि भीमसेन:
“Today, on this battlefield, I shall forcibly slay you—the very root of this quarrel—whose arrogance has arisen from taking refuge in Duryodhana. Indeed, it is Bhīmasena himself who will be the slayer of this man in war.”
Verse 35
स एवमुकत्वा विनिमृज्य चापं लक्ष्यं हि कृत्वा वृषसेनमाजौ
Sañjaya said: Having spoken thus, he wiped and readied his bow; then, fixing Vṛṣasena as his target on the battlefield, he prepared to strike—an image of war’s grim resolve where words immediately harden into action.
Verse 36
विव्याध चैनं दशभि: पृषत्कै- मर्मस्वशड्कं प्रहसन् किरीटी
Sañjaya said: Laughing with fearless confidence, the diademed warrior (Arjuna) pierced him with ten arrows, striking at his vital points—an act that intensifies the ruthless momentum of battle where skill and resolve are tested against the limits of life and duty.
Verse 37
स पार्थबाणाभिहत: पपात रथाद् विबाहुर्विशिरा धरायाम्
Wika ni Sañjaya: Tinamaan ng mga palaso ni Arjuna, siya’y nahulog mula sa kanyang karwahe—naputol ang mga bisig, napugot ang ulo—at bumagsak sa lupa. Ipinapakita ng taludtod ang mabigat at madilim na bigat-moral ng digmaan: ang giting at pagmamataas ay gumuho sa isang kisap kapag nagtagpo ang tadhana at husay sa pakikidigma, at pinaaalalahanan ang nakikinig sa walang-awang wakas ng larangan ng labanan.
Verse 38
सुपुष्पितो वृक्षवरो5तिकायो वातेरित: शाल इवाद्रिशृज्भात् । अर्जुनके बाणोंसे आहत हो बाहु और मस्तकसे रहित होकर वृषसेन उसी प्रकार रथसे नीचे पृथ्वीपर गिर पड़ा, जैसे सुन्दर फूलोंसे भरा हुआ श्रेष्ठ एवं विशाल शालवृक्ष हवाके झोंके खाकर पर्वतशिखरसे नीचे जा गिरा हो ।। सम्प्रेक्ष्य बाणाभिहतं पतन्तं रथात् सुतं सूतज: क्षिप्रकारी
Wika ni Sañjaya: Tinamaan ng mga palaso ni Arjuna, si Vṛṣasena—naputulan ng bisig at napugutan ng ulo—ay nahulog mula sa karwahe at bumagsak sa lupa, na wari’y isang maringal at matayog na punong śāla na hitik sa magagandang bulaklak, na natumba sa bugso ng hangin mula sa tuktok ng bundok. Nang makita ng anak ng karwahero (si Karṇa) ang kanyang anak na tinusok ng mga palaso at nahuhulog mula sa karwahe, siya—mabilis kumilos—ay tumugon agad.
Verse 39
ततः समक्ष स्वसुतं विलोक्य कर्णो हतं श्वेतहयेन संख्ये । संरम्भमागम्य परं महात्मा कृष्णार्जुनी सहसैवा भ्यधावत्,अपने पुत्रको अपनी आँखोंके सामने ही युद्धमें श्वेतवाहन अर्जुनद्वारा मारा गया देख महामनस्वी कर्णको महान् क्रोध हुआ तथा उसने श्रीकृष्ण और अर्जुनपर सहसा आक्रमण कर दिया
Wika ni Sañjaya: Pagkaraan, si Karṇa, nang makita sa harap ng sarili niyang mga mata ang kanyang anak na napatay sa labanan ni Arjuna na may mapuputing kabayo, ay sinakmal ng nag-uumapaw na poot. Ang dakilang mandirigma, udyok ng galit na iyon, ay biglang sumugod upang salakayin sina Kṛṣṇa at Arjuna.
Verse 85
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि वृषसेनवधे पठचाशीतितमो<ध्याय:
Sa gayon nagtatapos ang ikawalongpu’t limang kabanata ng Karṇa Parva ng Śrī Mahābhārata, sa bahaging tumatalakay sa pagpaslang kay Vṛṣasena. Itinatak ni Sañjaya, ang tagapagsalaysay, ang pagsasara ng pangyayaring ito, na binibigyang-diin ang walang-humpay na kabayarang moral at damdamin ng digmaan, kung saan maging ang pagbagsak ng isang mandirigma ay nagiging pasyang liko sa mas malawak na tunggalian.
Verse 256
अभ्यापतत् कर्णसुतो महारथं यथा महेन्द्र नमुचि: पुरा तथा । महासमरमें सहस्रों बाण धारण करनेवाले भयंकर नरवीर महारथी अर्जुनको अपनी ओर आते देख कर्णकुमार वृषसेन भी उनकी ओर उसी प्रकार दौड़ा, जैसे पूर्वकालमें नमुचिने देवराज इन्द्रपर आक्रमण किया था
Wika ni Sañjaya: Ang anak ni Karṇa, isang dakilang mandirigmang nakasakay sa karwahe, ay sumugod sa makapangyarihang bayani gaya ni Namuci noong unang panahon na sumalakay kay Mahendra (Indra). Sa nakapanghihilakbot na siksikan ng labanan, nang makita niyang si Arjuna—nakakakilabot ngunit matatag, may pasan na di-mabilang na mga palaso—ay papalapit sa kanya, si Vṛṣasena man ay sumugod upang salubungin siya, na wari’y muling binubuhay ang sinaunang huwaran ng mapangahas na humahamon sa panginoon ng mga diyos.
Verse 273
तथैव कृष्णं नवश्ि: समार्दयत् पुनश्न पार्थ दशभिर्जघान । इसके बाद वृषसेनने भयंकर बाणोंद्वारा अर्जुनकी बायीं भुजाके मूलभागमें पुन: प्रहार किया तथा नौ बाणोंसे श्रीकृष्णको भी चोट पहुँचाकर दस बाणोंद्वारा कुन्तीकुमार अर्जुनको फिर घायल कर दिया
Sañjaya said: In the same manner, Vṛṣasena struck Śrī Kṛṣṇa with nine arrows, and then again wounded Pārtha (Arjuna) with ten. The scene underscores the relentless intensity of battle, where even the charioteer-guide is not spared, and Arjuna endures repeated blows while remaining steadfast in his duty as a warrior.
Verse 283
संरम्भमीषद्गमितो वधाय कर्णात्मजस्याथ मन: प्रदप्रे । वृषसेनके चलाये हुए उन बाणोंद्वारा पहले ही आहत होकर श्वेतवाहन अर्जुनके मनमें थोड़ा-सा क्रोध जाग्रतू हुआ। फिर उन्होंने मन-ही-मन कर्णकुमारके वधका निश्चय किया
Sañjaya said: Slightly stirred to wrath and intent on slaying Karṇa’s son, Arjuna’s mind was inflamed—having already been struck by the arrows discharged by Vṛṣasena. Thereupon, within himself, he resolved upon the death of the son of Karṇa.
Verse 343
दुर्योधनस्थाधमपूरुषस्य यस्यानयादेष महान् क्षयो5भवत् | “कर्ण! तू ही इस कलहकी जड़ है। दुर्योधनका सहारा मिल जानेसे तेरा घमंड बहुत बढ़ गया है। आज रणक्षेत्रमें मैं हठपूर्वक तेरा वध करूँगा और जिसके अन्यायसे यह महान् संहार हुआ है, उस नराधम दुर्योधनका वध युद्धमें भीमसेन करेंगे”
Sañjaya said: “Karna, you are the very root of this strife. Having gained Duryodhana’s support, your arrogance has greatly increased. Today, on the battlefield, I will stubbornly bring about your death. And Duryodhana—that vilest of men—by whose injustice this vast slaughter has come to pass, will be slain in war by Bhīmasena.”
Verse 356
ससर्ज बाणान् विशिखान् महात्मा वधाय राजन् कर्णसुतस्य संख्ये । राजन्! ऐसा कहकर महात्मा अर्जुनने अपने धनुषको पोंछा और कर्णपुत्र वृषसेनका वध करनेके लिये युद्धमें उसीको लक्ष्य बनाकर बाणोंका प्रहार आरम्भ किया
Sañjaya said: O King, the great-souled Arjuna loosed sharp arrows in the thick of battle, intent on the death of Karṇa’s son. Having spoken thus, he wiped his bow and, fixing Vṛṣasena as his chosen target, began a focused assault—an act framed by the grim ethics of war, where resolve and duty drive a warrior to strike decisively against a formidable foe.
Verse 366
चिच्छेद चास्येष्वसनं भुजौ च क्षुरैश्षतुर्भिनिशितै: शिरश्न | किरीटधारी अर्जुनने हँसते हुए-से दस बाणोंसे उसके मर्मस्थानोंमें निर्भीक होकर आघात किया। फिर चार तीखे छुरोंसे उसके धनुषको, दोनों भुजाओंको तथा मस्तकको भी काट डाला
Sañjaya said: Arjuna, the wearer of the diadem, as though smiling, fearlessly struck his opponent’s vital points with ten arrows. Then, with four razor-sharp shafts, he severed his bow, both arms, and even his head. The scene underscores the grim ethic of battlefield skill: decisive force directed at the enemy’s capacity to fight, carried out without hesitation amid the demands of war.
Verse 386
रथं रथेनाशु जगाम रोषात् किरीटिन: पुत्रवधाभितप्त: । शीघ्रतापूर्वक कार्य करनेवाला सूतपुत्र कर्ण अपने बेटेको बाणविद्ध हो रथसे नीचे गिरते देख पुत्रके वधसे संतप्त हो उठा और रोषमें भरकर रथके द्वारा अर्जुनके रथकी ओर तीव्र वेगसे चला
Sinabi ni Sañjaya: Naglalagablab sa dalamhati sa pagkapatay sa kanyang anak, ang mandirigmang may diyadema ay mabilis na pinatakbo ang kanyang karwahe sa galit, sumugod—karwahe laban sa karwahe—tungo sa kanyang kaaway. Sa moral na himpapawid ng digmaan, ang pansariling pagkalugi ang nagsisindi ng poot, at ang poot na iyon ay agad tumitigas bilang panibagong dahas sa larangan ng labanan.
Verse 2436
समभ्यधावद् वृषसेनमाहवे स सूतजस्य प्रमुखे स्थितस्तदा । तदनन्तर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले मानवलोकके प्रमुख वीर किरीटधारी अर्जुनने समस्त सेनाओंके बीच माद्रीकुमार नकुलके घोड़ोंको वृषसेनद्वारा मारा गया और भगवान् श्रीकृष्णको अत्यन्त घायल हुआ देख युद्धस्थलमें वृषसेनपर धावा किया। वृषसेन उस समय कर्णके सामने खड़ा था
Sinabi ni Sañjaya: Pagkaraan, si Arjuna na may diyadema—ang pangunahing bayani sa mga tao at tagapaglipol ng mga kampeon ng kaaway—ay sumugod kay Vṛṣasena sa larangan ng digmaan. Nang makita niya sa gitna ng mga hukbo na pinatay ni Vṛṣasena ang mga kabayo ni Nakula, anak ni Mādrī, at na si Panginoong Śrī Kṛṣṇa ay malubhang nasugatan, agad na sinalakay ni Arjuna si Vṛṣasena sa kasagsagan ng labanan. Noon, si Vṛṣasena ay nakapuwesto sa harap ni Karṇa.