
कृपोपदेशः — द्रौणेरनिद्रा च (Kṛpa’s Counsel and Drauṇi’s Sleepless Resolve)
Upa-parva: Sauptika Parva — Drauṇi’s Resolve and Counsel of Kṛpa (Chapter 4)
Kṛpa addresses Drauṇi with supportive assurance, stating that the intention to act has arisen and proposing a controlled sequence: rest during the night, then proceed together at dawn with Kṛtavarmā, equipped and coordinated in chariots. Kṛpa amplifies confidence through comparative invulnerability motifs (even Indra cannot restrain them), emphasizing readiness, recovery, and collective strength. Drauṇi replies with heightened agitation, arguing that sleep is impossible for one who is distressed, affronted, or consumed by planning and desire. He enumerates the causes of insomnia: the recollection of Droṇa’s death, the pain of hearing Pāñcāla statements about it, the perceived necessity of retribution against Dṛṣṭadyumna and allied forces, and the burning effect of news about allies’ defeat and the Pāṇḍavas’ victory. He asserts firm determination, concluding that he will undertake a decisive hostile action in the night context (sauptika), after which rest would become possible.
Chapter Arc: रात्रि के धुँधलके में, पराजय की राख पर बैठा अश्वत्थामा भीतर-ही-भीतर जल रहा है—राज्यहानि और पिता-द्रोण के वध की स्मृति उसकी नींद को भस्म कर देती है। → कृपाचार्य और भोजवंशी कृतवर्मा उसे संयम और योजना की राह दिखाते हैं—आज रात कवच-ध्वजा उतारकर विश्राम करो, प्रभात में हम साथ चलेंगे; पर अश्वत्थामा का क्रोध चौगुना होकर जागता है, और दुर्योधन की टूटी जाँघ की दशा सुनकर करुणा भी उसी क्रोध में घुल जाती है। → अश्वत्थामा मन में निश्चय बाँध लेता है कि धृष्टद्युम्न—पिता के वध का कारण—और उसके सहचर पाँचाल, सब रात्रि में ही दंड पाएँगे; प्रतिशोध का यह संकल्प उसके भीतर की अंतिम झिझक को काट देता है। → कृप और कृतवर्मा की ‘प्रभात-युद्ध’ की सलाह के बावजूद, अश्वत्थामा का मन रात के मार्ग पर टिक जाता है—वह मान लेता है कि अब शत्रु-शिविर में सोते हुओं पर ही प्रहार होगा, और उसी से ‘पूर्ण प्रीति’ (विजय-तृप्ति) मिलेगी। → तीनों की दिशा तय हो चुकी है—अगला कदम शत्रु-शिविर की ओर है, जहाँ निद्रा में पड़े पाँचालों पर रात्रि-प्रलय उतरने वाला है।
Verse 1
अ-क्रा् - भोजका अर्थ है भोजवंशी कृतवर्मा। चतुथों5 ध्याय: कृपाचार्यका कल प्रातःकाल युद्ध करनेकी सलाह देना और अश्वत्थामाका इसी रात्रिमें सोते हुओंको मारनेका आग्रह प्रकट करना कृप उवाच दिष्टया ते प्रतिकर्तव्ये मतिर्जातेयमच्युत । नत्वां वारयितुं शक्तो वज़पाणिरपि स्वयम्,कृपाचार्य बोले--तात! तुम अपनी टेकसे टलने-वाले नहीं हो, सौभाग्यकी बात है कि तुम्हारे मनमें बदला लेनेका दृढ़ विचार उत्पन्न हुआ। तुम्हें साक्षात् वज्रधारी इन्द्र भी इस कार्यसे रोक नहीं सकते
กฤปะกล่าวว่า “โอ อจยุตะ นับเป็นมงคลที่ความตั้งใจอันแน่วแน่เพื่อสนองแค้นได้บังเกิดในเจ้า แม้พระอินทร์ผู้ถือวัชระเองก็ไม่อาจห้ามเจ้าให้ละจากการกระทำนี้ได้”
Verse 2
अनुयास्यावहे त्वां तु प्रभाते सहितावुभौ । अद्य रात्रौ विश्रमस्व विमुक्तकवचध्वज:,आज रातमें कवच और ध्वजा खोलकर विश्राम करो। कल सबेरे हम दोनों एक साथ होकर तुम्हारे पीछे-पीछे चलेंगे
ยามรุ่งอรุณ เราทั้งสองจักตามไปเบื้องหลังเจ้า คืนนี้จงพักผ่อนเสีย โดยวางเกราะและธงรบลง
Verse 3
इस प्रकार श्रीमहाभारत सौप्तिकपर्वमें अश्वत्थामाकी मन्त्रणाविषयक तीसरा अध्याय पूरा हुआ,अहं त्वामनुयास्यामि कृतवर्मा च सात्वत: । परानभिमुखं यान्तं रथावास्थाय दंशितौ जब तुम शत्रुओंका सामना करनेके लिये आगे बढ़ोगे, उस समय मैं और सात्वतवंशी कृतवर्मा दोनों ही कवच धारण करके रथोंपर आरूढ़ हो तुम्हारे साथ चलेंगे
เมื่อเจ้าเคลื่อนไปเผชิญหน้าศัตรู เราด้วย—และกฤตวรมะแห่งวงศ์สาตวตะ—จักติดตามเจ้า สวมเกราะและขึ้นรถศึก แล้วไปพร้อมกับเจ้าเมื่อเจ้ามุ่งสู่ฝ่ายตรงข้าม
Verse 4
आवाभ्यां सहित: शत्रून् श्वो निहन्ता समागमे । विक्रम्य रथिनां श्रेष्ठ पजचालान् सपदानुगान्,रथियोंमें श्रेष्ठ वीर! कल सबेरेके संग्राममें हम दोनोंके साथ रहकर तुम अपने शत्रु पांचालों और उनके सेवकोंको बलपूर्वक मार डालना “मैं तो आज सोते समय शत्रुओंका संहार करके निश्चिन्त होनेपर ही विश्राम करूँगा और नींद लूँगा' ।। इति श्रीमहाभारते सौप्तिकपर्वणि द्रौणिमन्त्रणायां चतुर्थोडध्याय:
กฤปะกล่าวว่า— “โอ้ยอดนักรบรถศึก! พรุ่งนี้ยามรุ่งอรุณในสนามรบ จงยืนเคียงข้างเราสองคน แสดงเดชานุภาพ แล้วสังหารศัตรูของเจ้า—เหล่าปัญจาละและผู้ติดตามของพวกเขา—ด้วยกำลัง จงเผยวีรกรรมและทำลายพวกเขาเสีย”
Verse 5
शक्तस्त्वमसि विक्रम्य विश्रमस्व निशामिमाम् | चिरं ते जाग्रतस्तात स्वप तावन्निशामिमाम्,तात! तुम पराक्रम दिखाकर शत्रुओंका वध करनेमें समर्थ हो, अतः इस रातमें विश्राम कर लो। तुम्हें जागते हुए बहुत देर हो गयी है, अब इस रातमें सो लो
กฤปะกล่าวว่า— “ลูกเอ๋ย! เจ้ามีความสามารถที่จะสังหารศัตรูได้ด้วยเดชกล้า ดังนั้นจงพักผ่อนในคืนนี้ เจ้าเฝ้าตื่นมานานแล้ว บัดนี้จงหลับเสียสักครู่ตลอดราตรีนี้”
Verse 6
विश्रान्तश्न विनिद्रश्न स्वस्थचित्तशक्ष॒ मानद । समेत्य समरे शत्रून् वधिष्यसि न संशय:,मानद! थकावट दूर करके नींद पूरी कर लेनेसे तुम्हारा चित्त स्वस्थ हो जायगा। फिर तुम समरभूमिमें जाकर शत्रुओंका वध कर सकोगे, इसमें संशय नहीं है
กฤปะกล่าวว่า— “โอ้ผู้ประทานเกียรติ! เมื่อเจ้าได้พักและหลับเต็มอิ่ม จิตของเจ้าจะมั่นคงและผ่องใส แล้วเมื่อเข้าสู่สนามรบ เจ้าจะสามารถสังหารศัตรูได้—ปราศจากข้อสงสัย”
Verse 7
न हि त्वां रथिनां श्रेष्ठ प्रगहीतवरायुधम् । जेतुमुत्सहते शश्वदपि देवेषु वासव:,तुम रथियोंमें श्रेष्ठ हो, तुमने अपने हाथमें उत्तम आयुध ले रखा है। तुम्हें देवताओंके राजा इन्द्र भी कभी जीतनेका साहस नहीं कर सकते हैं
กฤปะกล่าวว่า— “แท้จริง โอยอดนักรบรถศึก! เมื่อเจ้ากุมอาวุธอันประเสริฐไว้ในมือแล้ว แม้แต่วาสวะ (อินทรา) ผู้เป็นราชาแห่งเทวะ ก็ไม่อาจกล้าคิดจะพิชิตเจ้าได้เลย”
Verse 8
कृपेण सहित यान्त॑ गुप्तं च कृतवर्मणा । को द्रौणिं युधि संरब्धं योधयेदपि देवराट्,जब कृतवमसि सुरक्षित हो द्रोणपुत्र अश्वत्थामा मुझ कृपाचार्यके साथ कुपित होकर युद्धके लिये प्रस्थान करेगा, उस समय कौन वीर, वह देवराज इन्द्र ही क्यों न हो, उसका सामना कर सकता है?
กฤปะกล่าวว่า— “เมื่ออัศวัตถามา บุตรแห่งโทรณะ ได้รับการคุ้มกันจากกฤตวรมัน และไปพร้อมกับเรา ก้าวสู่ศึกด้วยความพิโรธ ใครเล่าจะต่อกรเขาได้ในสนามรบ—แม้ผู้นั้นจะเป็นอินทรา ราชาแห่งเทวะก็ตาม?”
Verse 9
ते वयं निशि विश्रान्ता विनिद्रा विगतज्वरा: । प्रभातायां रजन्यां वै निहनिष्याम शात्रवान्,अतः हमलोग रातमें विश्राम करके निद्रारहित और विगतज्वर हो प्रातःकाल अपने शत्रुओंका संहार करेंगे
กฤปะกล่าวว่า “มาเถิด คืนนี้เราจงพักให้หายเหนื่อย แต่ยังคงตื่นระวังและปราศจากความหวั่นไหว ครั้นรุ่งอรุณมาถึง เราจักเข้าทำลายกองทัพศัตรู”
Verse 10
तव ह्[स्त्राणि दिव्यानि मम चैव न संशय: । सात्वतो5पि महेष्वासो नित्य॑ं युद्धेषु कोविद:,इसमें संशय नहीं कि तुम्हारे और मेरे पास भी दिव्यास्त्र हैं तथा महाधनुर्धर कृतवर्मा भी युद्ध करनेकी कलामें सदा ही कुशल हैं
กฤปะกล่าวว่า “ไม่ต้องสงสัยเลยว่าเจ้ามีอาวุธทิพย์ และเราก็มีเช่นกัน อีกทั้งวีรบุรุษชาวสาตวตะ ผู้เป็นมหาธนูกร กฤตวรมาก็ชำนาญศิลปะแห่งสงครามอยู่เสมอ”
Verse 11
ते वयं सहितास्तात सर्वान् शत्रूनू समागतान् | प्रसह समरे हत्वा प्रीतिं प्राप्स्याम पुष्ललाम्,तात! हम सब लोग एक साथ होकर समरांगणमें सामने आये हुए समस्त शत्रुओंका संहार करके अत्यन्त हर्षका अनुभव करेंगे
กฤปะกล่าวว่า “เจ้าผู้เป็นที่รัก หากเราร่วมมือกันแล้ว—เมื่อสังหารศัตรูทั้งปวงที่มาชุมนุมอยู่เบื้องหน้าในสนามรบด้วยกำลัง—เราจักได้ความอิ่มเอมและความยินดีอย่างยิ่ง”
Verse 12
विश्रमस्व त्वमव्यग्र: स्वप चेमां निशां सुखम् | अहं च कृतवर्मा च त्वां प्रयान्तं नरोत्तमम्,तुम व्यग्रता छोड़कर विश्राम करो और इस रातमें सुखपूर्वक सो लो। कल खबरेरे युद्धके लिये प्रस्थान करते समय तुम-जैसे नरश्रेष्ठ वीरके पीछे शत्रुओंको संताप देनेवाले हम और कृतवर्मा धनुष लेकर एक साथ चलेंगे। बड़ी उतावलीके साथ आगे बढ़ते हुए रथी अश्वत्थामाके साथ हम दोनों भी कवच धारण करके रथपर आखरूढ़ हो यात्रा करेंगे
กฤปะกล่าวว่า “จงพักเถิด อย่ากระวนกระวาย และจงหลับให้สบายตลอดราตรีนี้ พรุ่งนี้ เมื่อท่านผู้เป็นยอดแห่งบุรุษออกเดินไปสู่ศึก ข้ากับกฤตวรมาจะถือคันศรติดตามไปเบื้องหลังร่วมกัน นำความทุกข์เข็ญไปสู่เหล่าศัตรู”
Verse 13
अनुयास्याव सहितौ धन्विनौ परतापनौ | रथिन त्वरया यान्तं रथमास्थाय दंशितौ,तुम व्यग्रता छोड़कर विश्राम करो और इस रातमें सुखपूर्वक सो लो। कल खबरेरे युद्धके लिये प्रस्थान करते समय तुम-जैसे नरश्रेष्ठ वीरके पीछे शत्रुओंको संताप देनेवाले हम और कृतवर्मा धनुष लेकर एक साथ चलेंगे। बड़ी उतावलीके साथ आगे बढ़ते हुए रथी अश्वत्थामाके साथ हम दोनों भी कवच धारण करके रथपर आखरूढ़ हो यात्रा करेंगे
กฤปะกล่าวว่า “เราสองคน—ผู้ถือคันศรและผู้ทำให้ศัตรูร้อนรน—จักติดตามไปด้วยกัน สวมเกราะขึ้นรถศึก แล้วเร่งรุดตามหลังนักรบรถศึกผู้นั้นซึ่งกำลังพุ่งไปข้างหน้าอย่างรวดเร็ว”
Verse 14
स गत्वा शिबिरं तेषां नाम विश्राव्य चाहवे । ततः कर्तासि शत्रूणां युध्यतां कदनं महत्,उस अवस्थामें शत्रुओंके शिविरमें जाकर युद्धके लिये अपने नामकी घोषणा करके सामने आकर जूझते हुए उन शत्रुओंका बड़ा भारी संहार मचा देना
จงไปยังค่ายของพวกเขา แล้วประกาศนามของตนให้กึกก้องท่ามกลางศึก; จากนั้นเข้าประจัญบานต่อหน้า และก่อให้เกิดการสังหารใหญ่หลวงแก่ศัตรู
Verse 15
कृत्वा च कदन तेषां प्रभाते विमले5हनि । विहरस्व यथा शक्र: सूदयित्वा महासुरान्,जैसे इन्द्र बड़े-बड़े असुरोंका विनाश करके सुखपूर्वक विचरते हैं, उसी प्रकार तुम भी कल प्रातःकाल निर्मल दिन निकल आनेपर उन शत्रुओंका विनाश करके इच्छानुसार विहार करो
เมื่อรุ่งอรุณอันผ่องใสมาเยือน จงสังหารพวกเขาให้สิ้น แล้วเที่ยวไปตามปรารถนา—ดุจพระศักระ (อินทรา) ผู้ทำลายมหาอสูรแล้วเสด็จดำเนินอย่างผาสุกในชัยชนะ
Verse 16
त्वं हि शक्तो रणे जेतुं पज्चालानां वरूथिनीम् | दैत्यसेनामिव क्रुद्ध: सर्वदानवसूदन:,जैसे सम्पूर्ण दानवोंका संहार करनेवाले इन्द्र कुपित होनेपर दैत्योंकी सेनाको जीत लेते हैं, उसी प्रकार तुम भी रणभूमिमें पांचालोंकी विशाल वाहिनीपर विजय पानेमें समर्थ हो
เจ้าสามารถพิชิตกองทัพใหญ่แห่งปัญจาละในสนามรบได้—ดุจอินทราผู้ปราบทวยทานวะทั้งปวง เมื่อกริ้วก็พิชิตกองทัพไทตยะได้
Verse 17
मया त्वां सहितं संख्ये गुप्तं च कृतवर्मणा । न सहेत विभु: साक्षाद् वज़पाणिरपि स्वयम्,युद्धस्थलमें जब तुम मेरे साथ खड़े होओगे और कृतवर्मा तुम्हारी रक्षामें लगे होंगे, उस समय हाथमें वज्र लिये हुए साक्षात् देवसम्राट् इन्द्र भी तुम्हारा वेग नहीं सह सकेंगे
เมื่อเจ้าจะยืนหยัดในศึกพร้อมกับเรา และกฤตวรมันตั้งมั่นคุ้มกันเจ้าอยู่ แม้พระอินทราผู้ทรงเดช ถือวัชระอยู่ในพระหัตถ์ ก็ยังมิอาจทานแรงพุ่งของเจ้าได้
Verse 18
न चाहं समरे तात कृतवर्मा न चैव हि | अनिर्जित्य रणे पाण्डून् न च यास्यामि कहिचित्,तात! समरांगणमें मैं और कृतवर्मा पाण्डवोंको परास्त किये बिना कभी पीछे नहीं हटेंगे
ลูกเอ๋ย! ในสมรภูมิ ทั้งเราและกฤตวรมันจะไม่ถอยเป็นอันขาด; หากยังมิได้ปราบปาณฑพให้พ่ายในศึก เราจะไม่จากไป ณ ที่ใดเลย
Verse 19
हत्वा च समरे क्रुद्धान् पज्चालान् पाण्डुभि: सह । निवर्तिष्यामहे सर्वे हता वा स्वर्गगा वयम्,समरांगणमें कुपित हुए पांचालोंको पाण्डवोंसहित मारकर ही हम सब लोग पीछे हटेंगे अथवा स्वयं ही मारे जाकर स्वर्गलोककी राह लेंगे
ในสนามรบ เราทั้งหลายจะถอยกลับก็ต่อเมื่อได้สังหารชาวปัญจาละผู้เดือดดาลพร้อมด้วยโอรสแห่งปาณฑุแล้วเท่านั้น; มิฉะนั้น หากเราถูกสังหารเอง เราก็จักไปสู่สวรรค์.
Verse 20
सर्वोपायै: सहायास्ते प्रभाते वयमाहवे । सत्यमेतन्महाबाहो प्रब्रवीमि तवानघ,निष्पाप महाबाहु वीर! कल प्रातःकाल हमलोग सभी उपायोंसे युद्धमें तुम्हारे सहायक होंगे। मैं तुमसे यह सच्ची बात कह रहा हूँ
โอ้มหาวีรบุรุษผู้มีแขนกำยำและปราศจากมลทิน! ครั้นรุ่งอรุณพรุ่งนี้ในสนามรบ เราทั้งหลายจักเป็นกำลังหนุนแก่ท่านด้วยทุกวิถีทาง นี่คือความจริง ข้ากล่าวแก่ท่านโดยไร้เล่ห์กล.
Verse 21
राजन! मामाके इस प्रकार हितकारक वचन कहनेपर द्रोणकुमार अभश्वत्थामाने क्रोधसे लाल आँखें करके उनसे कहा--
ข้าแต่พระราชา! เมื่อพวกเราผู้หวังดีได้กล่าวถ้อยคำอันเป็นประโยชน์เช่นนั้นแล้ว อัศวัตถามา บุตรแห่งโทรณะ ผู้มีดวงตาแดงฉานด้วยโทสะ ก็ได้ตอบพวกเขา—
Verse 22
आतुरस्य कुतो निद्रा नरस्यामर्षितस्य च । अर्थाश्विन्तयतश्चापि कामयानस्य वा पुनः । तदिदं समनुप्राप्तं पश्य मेउद्य चतुष्टयम्,“मामाजी! जो मनुष्य शोकसे आतुर हो, अमर्षसे भरा हुआ हो, नाना प्रकारके कार्योंकी चिन्ता कर रहा हो अथवा किसी कामनामें आसक्त हो, उसे नींद कैसे आ सकती है? देखिये, ये चारों बातें आज मेरे ऊपर एक साथ आ पड़ी हैं
ท่านน้า! คนที่ระทมทุกข์ด้วยโศก คนที่เดือดดาลด้วยความคับแค้น คนที่หมกมุ่นครุ่นคิดถึงภารกิจนานาประการ หรือคนที่ตกเป็นทาสแห่งกามปรารถนา—จะมีนิทราได้อย่างไร? ดูเถิด วันนี้ทั้งสี่ประการนี้มาประดังลงแก่ข้าพร้อมกัน.
Verse 23
यस्य भागश्नतुर्थो मे स्वप्रमह्नाय नाशयेत् । कि नाम दुःखं लोके5स्मिन् पितुर्वधमनुस्मरन्
แม้ส่วนที่ควรเป็นของข้าจะสูญไปเพียงหนึ่งในสี่ด้วยความทะนงของข้าเองก็ตาม ในโลกนี้จะมีทุกข์ใดเล่าเทียบได้กับความระทมเมื่อระลึกถึงการถูกสังหารของบิดา?
Verse 24
यथा च निहत: पापै: पिता मम विशेषत:,“इन पापियोंने विशेषत: मेरे पिताजीको जिस प्रकार मारा था, वह सब आपने प्रत्यक्ष देखा है। वह घटना मेरे मर्मस्थानोंको छेदे डालती है। ऐसी अवस्थामें मेरे-जैसा वीर इस जगतमें दो घड़ी भी कैसे जीवित रह सकता है?
กฤปะกล่าวว่า—ท่านได้เห็นด้วยตนเองแล้วว่าเหล่าคนบาป โดยเฉพาะอย่างยิ่ง ได้สังหารบิดาของข้าอย่างไร ภาพนั้นแทงทะลุถึงแก่นมรรมหัวใจของข้า ในสภาพเช่นนี้ นักรบอย่างข้าจะอยู่ในโลกนี้ได้แม้เพียงชั่วขณะได้อย่างไร?
Verse 25
प्रत्यक्षमपि ते सर्व तन्मे मर्माणि कृन्तति । कथं हि मादृशो लोके मुहूर्तमपि जीवति,“इन पापियोंने विशेषत: मेरे पिताजीको जिस प्रकार मारा था, वह सब आपने प्रत्यक्ष देखा है। वह घटना मेरे मर्मस्थानोंको छेदे डालती है। ऐसी अवस्थामें मेरे-जैसा वीर इस जगतमें दो घड़ी भी कैसे जीवित रह सकता है?
แม้ท่านจะเห็นทุกสิ่งด้วยตนเอง เหตุการณ์นั้นก็ยังคงกรีดเฉือนมรรมหัวใจของข้า เพราะคนบาปเหล่านั้น โดยเฉพาะอย่างยิ่ง ได้สังหารบิดาของข้าเช่นนั้นแล้ว คนอย่างข้าจะอยู่ในโลกนี้ได้แม้เพียงชั่วขณะได้อย่างไร?
Verse 26
द्रोणो हतेति यद् वाच: पञ्चालानां शृणोम्यहम् | धृष्टद्युम्नमहत्वा तु नाहं जीवितुमुत्सहे
ข้าได้ยินชาวปัญจาลกล่าวว่า ‘โทรณะถูกสังหารแล้ว’ แต่หากข้ายังมิได้สังหารธฤษฏทยุมน์ ข้าย่อมไม่อาจมีกำลังใจจะมีชีวิตต่อไป
Verse 27
'ट्रोणाचार्य धृष्टद्युम्नके हाथसे मारे गये” यह बात जब मैं पांचालोंके मुखसे सुनता आ रहा हूँ, तब धृष्टद्युम्नका वध किये बिना जीवित नहीं रह सकता ।। स मे पितुर्वधाद् वध्य: पञ्चाला ये च संगता: । विलापो भग्नसक्थस्य यस्तु राज्ञो मया श्रुत:
ตั้งแต่ข้าได้ยินจากปากชาวปัญจาลว่า ‘อาจารย์โทรณะถูกธฤษฏทยุมน์สังหารด้วยมือตน’ ข้าย่อมไม่อาจมีชีวิตอยู่ได้หากยังมิได้ฆ่าธฤษฏทยุมน์ เขาพึงถูกข้าสังหารเพราะได้ฆ่าครูผู้ประหนึ่งบิดาของข้า และชาวปัญจาลที่ร่วมมือกับเขาก็เช่นกัน เพราะข้าได้ยินเสียงคร่ำครวญของพระราชาผู้แตกสลายด้วยความโศก—และความโศกนั้นเรียกร้องการล้างแค้น
Verse 28
कस्य हाकरुणस्यापि नेत्राभ्यामश्रु नाव्रजेत्
เมื่อเห็นภาพเช่นนั้น ใครเล่า—แม้จะไร้เมตตาเพียงใด—จะไม่หลั่งน้ำตาจากดวงตา?
Verse 29
यक्षायं मित्रपक्षो मे मयि जीवति निर्जित:
กฤปะกล่าวว่า “ผู้นี้ดุจยักษะ เป็นพวกมิตรและที่พึ่งของเรา แต่เมื่อเรายังมีชีวิตอยู่ เขากลับถูกปราบพ่ายแล้ว”
Verse 30
शोकं मे वर्धयत्येष वारिवेग इवार्णवम् | एकाग्रमनसो मेउ5द्य कुतो निद्रा कुत: सुखम्
กระแสเชี่ยวนี้ยิ่งเพิ่มพูนความโศกของเรา ดุจสายน้ำกรากที่ทำให้มหาสมุทรเอ่อล้น วันนี้จิตของเราไม่อาจตั้งมั่นในสิ่งเดียว แล้วจะมีนิทราได้อย่างไร และจะมีความสุขได้อย่างไร
Verse 31
“मेरे जीते-जी जो यह मेरा मित्र-पक्ष परास्त हो गया, वह मेरे शोककी उसी प्रकार वृद्धि कर रहा है, जैसे जलका वेग समुद्रको बढ़ा देता है। आज मेरा मन एक ही कार्यकी ओर लगा हुआ है, फिर मुझे नींद कैसे आ सकती है और मुझे सुख भी कैसे मिल सकता है? ।। वासुदेवार्जुनाभ्यां च तानहं परिरक्षितान् | अविषद्दुतमान् मन्ये महेन्द्रेणापि सत्तम
กฤปะกล่าวว่า “เมื่อเรายังมีชีวิตอยู่ ความพ่ายแพ้ของฝ่ายมิตรของเรากลับยิ่งพอกพูนความโศก ดุจกระแสน้ำที่ทำให้มหาสมุทรสูงขึ้น วันนี้จิตของเราผูกอยู่กับภารกิจเดียว แล้วนิทราจะมาจากไหน และความสงบจะมีได้อย่างไร? ชนเหล่านั้นที่วาสุเทวะและอรชุนคุ้มครอง เราถือว่าไม่หวั่นไหวและเป็นยอดคน—ประหนึ่งมหেন্দรเองคุ้มกันอยู่”
Verse 32
'सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ मामाजी! पाण्डव और पांचाल जब श्रीकृष्ण और अर्जुनसे सुरक्षित हों, उस दशामें मैं उन्हें देवराज इन्द्रके लिये भी अत्यन्त असहा एवं अजेय मानता हूँ ।। न चापि शक्तः संयन्तुं कोपमेतं समुत्थितम् | त॑ं न पश्यामि लोकेडस्मिन् यो मां कोपान्निवर्तयेत्
โอผู้ประเสริฐในหมู่สัตบุรุษ! เมื่อพวกปาณฑพและปัญจาลอยู่ในความคุ้มครองของพระศรีกฤษณะและอรชุน เราถือว่าแม้แต่เทวราชอินทราก็ยากจะเข้าถึงและมิอาจพิชิตได้ และโทสะที่ลุกขึ้นในยามนี้ เราเองก็ยับยั้งไม่อยู่; ในโลกนี้เราไม่เห็นผู้ใดที่จะห้ามเราจากความพิโรธได้
Verse 33
“इस समय जो क्रोध उत्पन्न हुआ है, इसे मैं स्वयं भी रोक नहीं सकता। इस संसारमें किसी भी ऐसे पुरुषको नहीं देख रहा हूँ, जो मुझे क्रोधसे दूर हटा दे ।। तथैव निश्चिता बुद्धिरेषा साधु मता मम । वार्तिकै: कथ्यमानस्तु मित्राणां मे पराभव:
กฤปะกล่าวว่า “โทสะที่เกิดขึ้นในเรายามนี้ แม้ด้วยความพยายามของตนเองเราก็ยับยั้งไม่อยู่ ในโลกนี้เราไม่เห็นผู้ใดที่จะห้ามเราจากความพิโรธได้ และความตั้งใจของเราก็มั่นคง—ในความเห็นของเรา นี่คือทางที่ถูกต้อง แต่เมื่อได้ยินข่าวคราวและคำเล่าลือ เราก็ระลึกถึงความพ่ายแพ้และความอัปยศของมิตรสหายของเราอีกครั้ง”
Verse 34
पाण्डवानां च विजयो हृदयं दहतीव मे । “इसी प्रकार मैंने जो अपनी बुद्धिमें शत्रुओंके संहारका यह दृढ़ निश्चय कर लिया है, यही मुझे अच्छा प्रतीत होता है। जब संदेशवाहक दूत मेरे मित्रोंकी पराजय और पाण्डवोंकी विजयका समाचार कहने लगते हैं, तब वह मेरे हृदयको दग्ध-सा कर देता है ।। अहं तु कदन कृत्वा शत्रूणामद्य सौप्तिके । ततो विश्रमिता चैव स्वप्ता च विगतज्वर:
ชัยชนะของเหล่าปาณฑพเผาไหม้ดวงใจข้าดุจถูกไฟสุม ฉะนั้นในราตรีนี้ ในการจู่โจมยามหลับ (สౌปฺติก) ข้าจักกระทำการสังหารศัตรูให้สิ้น แล้วจึงพัก—และหลับ—ปราศจากไข้แห่งความทุกข์ระทม
Verse 231
एवमुक्तस्ततो द्रौणिर्मातुलेन हित॑ वच: । अब्रवीन्मातुलं राजन् क्रोधसंरक्तलोचन:
เมื่อถูกมารดุล (ลุงฝ่ายมารดา) กล่าวถ้อยคำอันเป็นประโยชน์แล้ว บุตรแห่งโทรณะคืออัศวัตถามา—ดวงตาแดงฉานด้วยโทสะ—ได้ตอบลุงของตน, ข้าแต่พระราชา
Verse 233
हृदयं निर्दहन्मेड्द्य राज्यहानि न शाम्यति । “इन चारोंका एक चौथाई भाग जो क्रोध है, वही मेरी निद्राको तत्काल नष्ट किये देता है। अपने पिताके वधकी घटनाका बारंबार स्मरण करके इस संसारमें कौन-सा ऐसा दुःख है, जिसका मुझे अनुभव न होता हो। वह दुःखकी आग रात-दिन मेरे हृदयको जलाती हुई अबतक बुझ नहीं पा रही है
ดวงใจของข้ายังคงถูกเผาไหม้; ความสูญสิ้นแห่งราชอาณาจักรไม่ยอมสงบในอกข้า ในบรรดาแรงขับสี่ประการที่ครอบงำมนุษย์ โทสะ—ซึ่งเป็นหนึ่งในสี่—ทำลายนิทราของข้าในบัดดล เมื่อระลึกซ้ำแล้วซ้ำเล่าถึงเหตุแห่งการสังหารบิดา ในโลกนี้มีทุกข์ใดเล่าที่ข้ายังมิได้ลิ้มรส? ไฟแห่งโศกนั้นเผาหัวใจข้าทั้งราตรีและทิวา จนบัดนี้ก็ยังไม่มอดดับ
Verse 276
स पुनर्हदयं कस्य क्रूरस्यापि न निर्दहेत् । *धृष्टद्युम्न तो पिताजीका वध करनेके कारण मेरा वध्य होगा और उसके संगी-साथी जो पांचाल हैं, वे भी उसका साथ देनेके कारण मारे जायँगे। इधर जिसकी जाँघें तोड़ डाली गयी हैं, उस राजा दुर्योधनका जो विलाप मैंने अपने कानों सुना है, वह किस क्रूर मनुष्यके भी हृदयको शोक-दग्ध नहीं कर देगा?
และยิ่งกว่านั้น ใจของผู้ใดเล่า—แม้จะโหดเหี้ยมเพียงใด—จะไม่ถูกเผาด้วยความเศร้าเพราะสิ่งนี้? ธฤษฏทยุมน์จักถูกข้าสังหารเพราะเป็นผู้ฆ่าบิดาข้า และเหล่าปัญจาลผู้เป็นพรรคพวกของเขาก็จักถูกฆ่าเพราะยืนเคียงข้างเขา อีกทั้งเสียงคร่ำครวญของพระเจ้าทุรโยธนะ—ผู้มีต้นขาถูกทุบทำลาย—ซึ่งข้าได้ยินด้วยหูตนเองนั้น จะมีผู้ใดใจแข็งเพียงไหนที่ไม่ถูกไฟแห่งโศกเผาผลาญเมื่อได้ฟัง?
Verse 283
नृपतेर्भग्नसक्थस्य श्रुत्वा तादृगू वच: पुनः । “टूटी जाँघवाले राजा दुर्योधनकी वैसी बात पुनः सुनकर किस निष्ठुरके भी नेत्रोंसे आँसू नहीं बह चलेगा?
เมื่อได้ยินถ้อยคำเช่นนั้นอีกครั้งจากพระเจ้าทุรโยธนะผู้มีต้นขาแตกหัก ผู้ใดเล่า—แม้ใจแข็งเพียงใด—จะไม่ให้น้ำตาเอ่อคลอจากดวงตา?
The tension between disciplined restraint (rest, timing, counsel) and immediate retaliatory impulse driven by grief and anger, raising questions about legitimate conduct when formal war norms have fractured.
The chapter juxtaposes two models of agency: strategic self-regulation as a safeguard for discernment versus emotion-dominated resolve that narrows moral and cognitive flexibility.
No explicit phalaśruti appears in this passage; its meta-function is thematic—positioning psychological causality (śoka, krodha, vārttā) as a driver of consequential action within the epic’s karmic narrative.