Adhyaya 3
Sauptika ParvaAdhyaya 337 Versesयुद्ध का औपचारिक दिन-क्रम समाप्ति की ओर; पर रात्रि में नियम-विहीन हिंसा का नया, अधिक अंधकारमय चरण आरम्भ होने को है।

Adhyaya 3

Aśvatthāmā’s Buddhi-Doctrine and Nocturnal Incursion Resolve (अश्वत्थाम्नः बुद्धिविचारः सौप्तिकसंकल्पश्च)

Upa-parva: Sauptika Upaparva (Night-Raid Deliberation and Resolve)

Sañjaya reports that, after hearing Kṛpa’s auspicious counsel grounded in dharma and artha, Aśvatthāmā—consumed by grief—responds with a general theory of human judgment. He argues that buddhi varies from person to person; each esteems one’s own prajñā, often deprecating others’ intelligence. Judgment is portrayed as contingent on time, circumstance, mental disturbance, age, and fortune or calamity; like a physician tailoring medicine to a diagnosed condition, people tailor strategies to perceived needs. He then applies this reasoning to his present crisis: invoking varṇa ideals assigned by Prajāpati, he frames his own identity tension (Brahmin lineage versus kṣatra conduct) and declares an intention to pursue a kṣatra-coded course. The chapter culminates in operational declarations: the Pāñcālas, confident and asleep, will be targeted at night; he describes the planned camp assault, the intended elimination of key leaders such as Dhṛṣṭadyumna, and the expectation of personal relief and “debt repayment” to fallen figures through retaliatory action.

Chapter Arc: कृप के वचनों को सुनकर भी अश्वत्थामा शोकाग्नि में दहकते हुए अपने भीतर उठती प्रतिशोध-लहर को वश में नहीं कर पाता; वह घोषणा करता है कि आज की रात ही उसका न्याय होगा। → वह मनुष्य-बुद्धि की विचित्रता का तर्क देता है—हर व्यक्ति की बुद्धि अलग है, और काल-योग से वही बुद्धि उलट भी जाती है; घोर व्यसन या अत्यधिक समृद्धि मनुष्य को बुद्धि-विकार की ओर ढकेल देती है। इसी तर्क-आवरण में वह अपने क्रूर संकल्प को ‘अपरिहार्य’ बताकर आगे बढ़ता है। साथ ही वह यह भी स्वीकारता है कि क्षत्रधर्म जानते हुए ब्राह्मणत्व का आश्रय लेकर कोई ‘दूसरा’ महान कर्म करना सत्पुरुषों में प्रशंसित नहीं होगा—फिर भी वह उसी निषिद्ध मार्ग की ओर झुकता है। → अश्वत्थामा स्पष्ट प्रतिज्ञा करता है: आज रात वह सोए हुए पांचालों पर टूट पड़ेगा, धृष्टद्युम्न का सिर पशु की भाँति बलपूर्वक मरोड़ देगा, और ‘सौप्तिक’ अवस्था में पूरी पांचाल-सेना का संहार करेगा—इन्द्र की भाँति दानवों पर आक्रमण करने जैसा। → अध्याय का अंत अश्वत्थामा के निश्चय के कठोर स्थिरीकरण में होता है—वह अपने कृत्य को ‘कृतकृत्य’ होने का साधन मानता है और रात के वध को ही शोक-प्रतिशोध की शांति समझ लेता है; कृप और कृतवर्मा के साथ संवाद के बाद भी उसका मार्ग बदलता नहीं। → रात्रि-शिविर की ओर बढ़ते हुए यह प्रश्न हवा में लटकता है—क्या यह प्रतिशोध ‘धर्म’ कहलाएगा, या युद्ध के बाद बची हुई मर्यादा का अंतिम वध?

Shlokas

Verse 1

भीकम (2 अमान तृतीयो<थध्याय: अश्वत्थामाका कृपाचार्य और कृतवर्माको उत्तर देते हुए उन्हें अपना क्रूरतापूर्ण निश्चय बताना संजय उवाच कृपस्य वचन श्रुत्वा धर्मार्थसहितं शुभम्‌ । अश्वत्थामा महाराज दुःखशोकसमन्वित:,संजय कहते हैं--महाराज! कृपाचार्यका वचन धर्म और अर्थसे युक्त तथा मंगलकारी था। उसे सुनकर अभश्वत्थामा दुःख और शोकमें डूब गया

สัญชัยกล่าวว่า: ข้าแต่พระราชา ครั้นอัศวัตถามาได้ฟังถ้อยคำของกฤปะ อันเป็นมงคลและตั้งอยู่บนธรรมะกับถ้อยคำอันรอบคอบแล้ว ก็ถูกความโศกเศร้าครอบงำจนเต็มเปี่ยมด้วยทุกข์และความอาดูร

Verse 2

इस प्रकार श्रीमह्याभारत सौप्तिकपर्वमें अश्वत्थामा और कृपाचार्यका संवादविषयक दूसरा अध्याय पूरा हुआ,दह्यामानस्तु शोकेन प्रदीप्तेनाग्निना यथा । क्िरूरं मनस्तत: कृत्वा तावुभौ प्रत्यभाषत उसके हृदयमें शोककी आग प्रज्वलित हो उठी। वह उससे जलने लगा और अपने मनको कठोर बनाकर कृपाचार्य और कृतवर्मा दोनोंसे बोला--

เขาถูกความโศกเผาผลาญดุจผู้ถูกไฟที่ลุกโชนแผดเผา ครั้นแล้วจึงทำใจให้แข็งกระด้างจนเป็นความโหด และกล่าวกับทั้งสอง—กฤปะและกฤตวรมัน

Verse 3

पुरुषे पुरुषे बुद्धिया या भवति शोभना । तुष्यन्ति च पृथक्‌ सर्वे प्रज्ञया ते स्वया स्वया,“मामाजी! प्रत्येक मनुष्यमें जो पृथक्‌-पृथक्‌ बुद्धि होती है, वही उसे सुन्दर जान पड़ती है। अपनी-अपनी उसी बुद्धिसे वे सब लोग अलग-अलग संतुष्ट रहते हैं “महामते! आज रातको सोते समय उस पांचाल-सेनाका वध करके मैं कृतकृत्य एवं सुखी हो जाऊँगा” ।। इति श्रीमहा भारते सौप्तिकपर्वणि द्रौणिमन्त्राणायां तृतीयो$ध्याय:

ปัญญาที่บังเกิดในแต่ละคน ย่อมปรากฏว่างามแก่ผู้นั้นเอง ดังนั้นชนทั้งปวงจึงพอใจแยกกันไปตามปรีชาของตน ๆ

Verse 4

सर्वो हि मन्यते लोक आत्मानं बुद्धिमत्तरम्‌ । सर्वस्यात्मा बहुमत: सर्वात्मानं प्रशंसति

ชนทั้งหลายในโลกย่อมสำคัญตนว่าเป็นผู้ฉลาดกว่าใคร ๆ สำหรับแต่ละคน ตนเองเป็นที่รักและมีค่ายิ่งนัก ฉะนั้นทุกคนจึงสรรเสริญตนเอง

Verse 5

“सभी लोग अपने-आपको अधिक बुद्धिमान्‌ समझते हैं। सबको अपनी ही बुद्धि अधिक महत्त्वपूर्ण जान पड़ती है और सब लोग अपनी ही बुद्धिकी प्रशंसा करते हैं ।। सर्वस्य हि स्वका प्रज्ञा साधुवादे प्रतिष्ठिता । परबुद्धि च निन्दन्ति स्वां प्रशंसन्ति चासकृत्‌,“सबकी दृष्टिमें अपनी ही बुद्धि धन्यवाद पानेके योग्य ऊँचे पदपर प्रतिष्ठित जान पड़ती है। सब लोग दूसरोंकी बुद्धिकी निन्दा और अपनी बुद्धिकी बारंबार सराहना करते हैं

สำหรับแต่ละคน ปรีชาของตนย่อมตั้งมั่นอยู่ในฐานะอันควรแก่คำสรรเสริญ เขาจึงติเตียนปัญญาของผู้อื่น และยกย่องปัญญาของตนซ้ำแล้วซ้ำเล่า

Verse 6

कारणान्तरयोगेन योगे येषां समागति: । अन्योन्येन च तुष्यन्ति बहु मन्यन्ति चासकृत्‌,“यदि किन्हीं दूसरे कारणोंके संयोगसे एक समुदायमें जिनके-जिनके विचार परस्पर मिल जाते हैं, वे एक-दूसरेसे संतुष्ट होते हैं और बारंबार एक-दूसरेके प्रति अधिक सम्मान प्रकट करते हैं

เมื่อด้วยการประจวบของเหตุอื่น ๆ ทำให้ในหมู่คณะความคิดของผู้ใดผู้หนึ่งมาบรรจบสอดคล้องกัน ผู้นั้นย่อมพอใจซึ่งกันและกัน และแสดงความนับถือยิ่งขึ้นต่อกันครั้งแล้วครั้งเล่า

Verse 7

तस्यैव तु मनुष्यस्य सा सा बुद्धिस्तदा तदा । कालयोगे विपर्यासं प्राप्यान्योन्यं विपद्यते,“किंतु समयके फेरसे उसी मनुष्यकी वही-वही बुद्धि विपरीत होकर परस्पर विरुद्ध हो जाती है

แต่ด้วยอำนาจแห่งกาล ในคนผู้นั้นเอง ปัญญาเดิม ๆ ณ คราวนั้นคราวนี้กลับวิปริต และตกลงสู่ความขัดแย้งกันเอง จนพินาศไป

Verse 8

विचित्रत्वात्‌ तु चित्तानां मनुष्याणां विशेषत: । चित्तवैक्लव्यमासाद्य सा सा बुद्धि: प्रजायते,“सभी प्राणियोंके विशेषतः मनुष्योंके चित्त एक-दूसरेसे विलक्षण तथा भिन्न-भिन्न प्रकारके होते हैं; अतः विभिन्न घटनाओंके कारण जो चित्तमें व्याकुलता होती है, उसका आश्रय लेकर भिन्न-भिन्न प्रकारकी बुद्धि पैदा हो जाती है

เพราะจิตใจมีความหลากหลาย—โดยเฉพาะในหมู่มนุษย์—เมื่อจิตถูกรบกวนให้หวั่นไหวด้วยเหตุการณ์ ความหวั่นไหวนั้นเองเป็นที่อาศัยให้ปัญญาและความเห็นต่าง ๆ บังเกิดขึ้น

Verse 9

यथा हि वैद्य: कुशलो ज्ञात्वा व्याधिं यथाविधि । भैषज्यं कुरुते योगात्‌ प्रशमार्थमिति प्रभो,'प्रभो! जैसे कुशल वैद्य विधिपूर्वक रोगकी जानकारी प्राप्त करके उसकी शान्तिके लिये योग्यतानुसार औषध प्रदान करता है, इसी प्रकार मनुष्य कार्यकी सिद्धिके लिये अपनी विवेकशक्तिसे विचार करके किसी निश्चयात्मक बुद्धिका आश्रय लेते हैं; परंतु दूसरे लोग उसकी निन्दा करने लगते हैं

ข้าแต่พระผู้เป็นเจ้า! ดุจแพทย์ผู้ชำนาญ เมื่อรู้โรคโดยถูกต้องตามวิธีแล้ว ย่อมจัดยาที่เหมาะสมด้วยความรอบคอบเพื่อให้สงบระงับฉันใด มนุษย์ก็ฉันนั้น เพื่อให้กิจสำเร็จ ย่อมใคร่ครวญด้วยปัญญาของตนแล้วอาศัยความดำริอันแน่วแน่

Verse 10

एवं कार्यस्य योगार्थ बुद्धि कुर्वन्ति मानवा: । प्रज्ञया हि स्वया युक्तास्तां च निन्दन्ति मानवा:,'प्रभो! जैसे कुशल वैद्य विधिपूर्वक रोगकी जानकारी प्राप्त करके उसकी शान्तिके लिये योग्यतानुसार औषध प्रदान करता है, इसी प्रकार मनुष्य कार्यकी सिद्धिके लिये अपनी विवेकशक्तिसे विचार करके किसी निश्चयात्मक बुद्धिका आश्रय लेते हैं; परंतु दूसरे लोग उसकी निन्दा करने लगते हैं

ฉะนั้น เพื่อให้กิจสำเร็จ มนุษย์ย่อมตั้งปัญญาเป็นความดำริอันเด็ดขาด; แต่ถึงแม้เขาจะประกอบด้วยปัญญาของตนเอง มนุษย์อื่นก็ยังพากันติเตียนความดำรินั้นอยู่ดี

Verse 11

अन्यया यौवने मर्त्यों बुद्धथया भवति मोहित: । मध्येडन्यया जरायां तु सो<न्यां रोचयते मतिम्‌,“मनुष्य जवानीमें किसी और ही प्रकारकी बुद्धिसे मोहित होता है, मध्यम अवस्थामें दूसरी ही बुद्धिसे वह प्रभावित होता है; किंतु वृद्धावस्थामें उसे अन्य प्रकारकी ही बुद्धि अच्छी लगने लगती है

มนุษย์ในวัยหนุ่มย่อมหลงด้วยความเข้าใจอย่างหนึ่ง; ครั้นถึงวัยกลางคนก็เอนเอียงไปตามความเข้าใจอีกอย่างหนึ่ง; แต่เมื่อชราแล้วกลับเห็นชอบต่อดุลยพินิจอีกแบบหนึ่ง

Verse 12

व्यसनं वा महाघोरं समृद्धि चापि तादृशीम्‌ । अवाप्य पुरुषो भोज कुरुते बुद्धिवैकृतम्‌,'भोज-]! मनुष्य जब किसी अत्यन्त घोर संकटमें पड़ जाता है अथवा उसे किसी महान्‌ ऐश्वर्यकी प्राप्ति हो जाती है, तब उस संकट और समृद्धिको पाकर उसकी बुद्धिमें क्रमशः शोक एवं हर्षरूपी विकार उत्पन्न हो जाते हैं

โอ ภโชชะ! เมื่อบุรุษตกอยู่ในวิบัติอันน่าสะพรึงกล้ายิ่ง หรือได้ถึงความรุ่งเรืองอันใหญ่หลวงทัดเทียมกัน ครั้นประสบทุกข์หรือความสำเร็จนั้นแล้ว ปัญญาย่อมแปรปรวน—วิบัติก่อให้เกิดโศก และความรุ่งเรืองก่อให้เกิดยินดี

Verse 13

एकस्मिन्नेव पुरुषे सा सा बुद्धिस्तदा तदा । भवत्यकृतधर्मत्वात्‌ सा तस्यैव न रोचते

ในบุรุษคนเดียวกันนั้น ความคิดย่อมแปรเปลี่ยนเป็นอย่างนั้นอย่างนี้ในแต่ละกาล; เพราะเขายังมิได้บำเพ็ญธรรมให้สำเร็จ ความคิดนั้นเองจึงไม่ตั้งมั่นและไม่เป็นที่พอใจแก่เขา

Verse 14

“उस विकारके कारण एक ही पुरुषमें उसी समय भिन्न-भिन्न प्रकारकी बुद्धि (विचारधारा) उत्पन्न हो जाती है; परंतु अवसरके अनुरूप न होनेपर उसकी अपनी ही बुद्धि उसीके लिये अरुचिकर हो जाती है ।। निश्चित्य तु यथाप्रज्ञं यां मतिं साधु पश्यति । तया प्रकुरुते भावं सा तस्योद्योगकारिका,“मनुष्य अपने विवेकके अनुसार किसी निश्चयपर पहुँचकर जिस बुद्धिको अच्छा समझता है, उसीके द्वारा कार्य-सिद्धिकी चेष्टा करता है। वही बुद्धि उसके उद्योगको सफल बनानेवाली होती है

ครั้นไตร่ตรองแล้ว บุรุษย่อมตั้งมั่นตามกำลังปัญญาในความเห็นที่ตนเห็นว่าดี; ด้วยดุลยพินิจนั้นเองเขาจึงลงมือมุ่งสู่ความสำเร็จแห่งกิจ และดุลยพินิจนั้นแหละเป็นแรงให้ความเพียรของเขาบรรลุผล

Verse 15

सर्वो हि पुरुषो भोज साध्वेतदिति निश्चित: । कर्तुमारभते प्रीतो मारणादिषु कर्मसु,“कृतवर्मन्‌! सभी मनुष्य “यह अच्छा कार्य है” ऐसा निश्चय करके प्रसन्नतापूर्वक कार्य आरम्भ करते हैं और हिंसा आदि कर्मोंमें भी लग जाते हैं

โอ ภโชชะ! มนุษย์ทุกคนย่อมตัดสินก่อนว่า “กิจนี้ดีงาม” แล้วจึงเริ่มกระทำด้วยความพอใจ—และด้วยเหตุนี้เอง เขาจึงอาจลงมือในกรรมอย่างการฆ่าและการกระทำอันรุนแรงอื่น ๆ ได้

Verse 16

सर्वे हि बुद्धिमाज्ञाय प्रज्ञां वापि स्वकां नरा: । चेष्टन्ते विविधां चेष्टां हितमित्येव जानते,“सब लोग अपनी ही बुद्धि अथवा विवेकका आश्रय लेकर तरह-तरहकी चेष्टाएँ करते हैं और उन्हें अपने लिये हितकर ही समझते हैं

มนุษย์ทั้งปวงอาศัยความเข้าใจของตนเอง—หรือสิ่งที่ตนถือว่าเป็นวิจารณญาณ—จึงลงมือกระทำการนานาประการ และเห็นว่าการกระทำนั้นเป็นประโยชน์แก่ตนเท่านั้น

Verse 17

उपजाता व्यसनजा येयमद्य मतिर्मम । युवयोस्तां प्रवक्ष्यामि मम शोकविनाशिनीम्‌,आज संकटमें पड़नेसे मेरे अंदर जो बुद्धि पैदा हुई है, उसे मैं आप दोनोंको बता रहा हूँ। वह मेरे शोकका विनाश करनेवाली है

วันนี้ท่ามกลางหายนะ ความดำริหนึ่งได้บังเกิดขึ้นในใจเรา เราจักกล่าวแก่ท่านทั้งสอง—ความเข้าใจซึ่งเกิดจากความทุกข์ยากนี้ มีอานุภาพขจัดความโศกของเราได้

Verse 18

प्रजापति: प्रजा: सृष्टवा कर्म तासु विधाय च । वर्णे वर्णे समाधत्ते होकैक॑ गुणभाग्‌ गुणम्‌,“गुणवान्‌ प्रजापति ब्रह्माजी प्रजाओंकी सृष्टि करके उनके लिये कर्मका विधान करते हैं और प्रत्येक वर्णमें एक-एक विशेष गुणकी स्थापना कर देते हैं

ครั้นปรชาปติทรงสร้างหมู่สัตว์แล้ว ก็ทรงบัญญัติหน้าที่กรรมแก่เขาทั้งหลาย และในแต่ละวรรณะทรงสถาปนาคุณลักษณะเฉพาะอันเป็นเครื่องกำหนดไว้

Verse 19

ब्राह्मणे वेदमग्रयं तु क्षत्रिये तेज उत्तमम्‌ दाक्ष्यं वैश्ये च शूद्रे च सर्ववर्णानुकूलताम्‌,4े ब्राह्मणमें सर्वोत्तम वेद, क्षत्रियमें उत्तम तेज, वैश्यमें व्यापारकुशलता तथा शूद्रमें सब वर्णोके अनुकूल चलनेकी वृत्तिको स्थापित कर देते हैं

ในพราหมณ์ทรงสถาปนาทรัพย์อันประเสริฐคือพระเวท ในกษัตริย์ทรงสถาปนาเดชานุภาพอันสูงสุด ในไวศยะทรงสถาปนาความชำนาญในการงานและการค้า และในศูทรทรงสถาปนานิสัยให้ประพฤติสอดคล้องเกื้อกูลแก่วรรณะทั้งปวง

Verse 20

अदान्तो ब्राह्मणोडसाधुर्निस्तिजा: क्षत्रियो5धम: । अदक्षो निन्द्यते वैश्य: शूद्रश्न प्रतिकूलवान्‌,“मन और इन्द्रियोंको वशमें न रखनेवाला ब्राह्मण अच्छा नहीं माना जाता। तेजोहीन क्षत्रिय अधम समझा जाता है, जो व्यापारमें कुशल नहीं है, उस वैश्यकी निन्‍्दा की जाती है और अन्य वर्णोके प्रतिकूल चलनेवाले शूद्रको भी निन्दनीय माना जाता है

พราหมณ์ผู้มิได้ข่มใจและอินทรีย์ย่อมไม่ชื่อว่าเป็นผู้ประเสริฐ; กษัตริย์ผู้ไร้เดชย่อมถูกนับว่าเลวทราม; ไวศยะผู้ขาดความชำนาญย่อมถูกติเตียน; และศูทรผู้ประพฤติขัดแย้งต่อความกลมเกลียวแห่งวรรณะทั้งหลายก็เป็นผู้ควรถูกตำหนิเช่นกัน

Verse 21

सो5स्मि जात: कुले श्रेष्ठे ब्राह्मणानां सुपूजिते | मन्दभाग्यतयास्म्येतं क्षत्रधर्ममनुछित:,“मैं ब्राह्मणोंके परम सम्मानित श्रेष्ठ कुलमें उत्पन्न हुआ हूँ, तथापि दुर्भाग्यके कारण इस क्षत्रिय-धर्मका अनुष्ठान करता हूँ

ข้าถือกำเนิดในตระกูลอันประเสริฐ เป็นที่เคารพบูชาในหมู่พราหมณ์ยิ่งนัก; แต่ด้วยเคราะห์กรรมอันร้าย ข้าจึงต้องประกอบธรรมของกษัตริย์นักรบนี้

Verse 22

क्षत्रधर्म विदित्वाहं यदि ब्राह्मण्यमाश्रित: । प्रकुर्या सुमहत्‌ कर्म न मे तत्‌ साधुसम्मतम्‌

แม้ข้ารู้ธรรมของกษัตริย์นักรบ หากข้ากลับอาศัยฐานะและความประพฤติแห่งพราหมณ์แล้วกระทำกิจอันใหญ่ยิ่ง (ด้วยความรุนแรง) ข้าย่อมเห็นว่าเหล่าสัตบุรุษจะไม่สรรเสริญ

Verse 23

“यदि क्षत्रियके धर्मको जानकर भी मैं ब्राह्मणत्वका सहारा लेकर कोई दूसरा महान्‌ कर्म करने लगूँ तो सत्पुरुषोंके समाजमें मेरे उस कार्यका सम्मान नहीं होगा ।। धाययंश्व थर्नुर्दिव्यं दिव्यान्यस्त्राणि चाहवे । पितरं निहतं दृष्टवा कि नु वक्ष्यामि संसदि

แม้รู้ธรรมของกษัตริย์นักรบ หากข้ายังอาศัยพราหมณ์ภาวะแล้วไปกระทำกิจใหญ่ประการอื่น กิจนั้นย่อมไม่เป็นที่ยกย่องในหมู่สัตบุรุษ และถึงข้าจะถือคันศรทิพย์กับอาวุธทิพย์ในสนามรบ แต่เมื่อเห็นบิดาถูกสังหารอย่างอยุติธรรม หากไม่ล้างแค้น แล้วในสภาแห่งวีรชนข้าจะกล่าวสิ่งใดได้?

Verse 24

मैं दिव्य धनुष और दिव्य अस्त्रोंको धारण करता हूँ तो भी युद्धमें अपने पिताको अन्यायपूर्वक मारा गया देखकर यदि उसका बदला न लूँ तो वीरोंकी सभामें क्‍या कहूँगा? ।। सो5हमद्य यथाकाममं क्षत्रधर्ममुपास्य तम्‌ । गन्तास्मि पदवीं राज्ञ: पितुश्चापि महात्मन:,“अतः आज मैं अपनी रुचिके अनुसार उस क्षत्रियधर्मका सहारा लेकर अपने महात्मा पिता तथा राजा दुर्योधनके पथका अनुसरण करूँगा

ข้าถือคันศรทิพย์และอาวุธทิพย์อยู่; แต่เมื่อเห็นบิดาถูกสังหารอย่างอยุติธรรมในสงคราม หากไม่ล้างแค้น แล้วในสภาแห่งวีรชนข้าจะกล่าวสิ่งใดได้? เพราะฉะนั้น วันนี้ข้าจะยึดธรรมของกษัตริย์นักรบตามความมุ่งหมายของตน และดำเนินตามหนทางของพระราชาทุรโยธนะและบิดาผู้มหาตมะ

Verse 25

अद्य स्वप्स्यन्ति पञ्चाला विश्वस्ता जितकाशिन: । विमुक्तयुग्यकवचा हर्षेण च समन्विता:

วันนี้ชาวปาญจาลจะหลับอย่างวางใจ ความหวาดระแวงของเขาถูกข่มแล้ว—ปลดแอกและถอดเกราะออก เปี่ยมด้วยความปลื้มปีติ

Verse 26

जयं मत्वा55त्मनश्वैव श्रान्ता व्यायामकर्शिता: । “आज अपनी जीत हुई जान विजयसे सुशोभित होनेवाले पांचाल योद्धा बड़े हर्षमें भरकर कवच उतार, जूओंमें जुते हुए घोड़ोंको खोलकर बेखटके सो रहे होंगे। वे थके तो होंगे ही, विशेष परिश्रमके कारण चूर-चूर हो गये होंगे ।। तेषां निशि प्रसुप्तानां सुस्थानां शिबिरे स्वके

สัญชัยกล่าวว่า— “เมื่อคิดว่า ‘ชัยชนะเป็นของเรา’ เหล่านักรบปัญจาละผู้รุ่งเรืองด้วยชัยจะเปี่ยมด้วยความยินดีใหญ่หลวง เขาทั้งหลายจะถอดเกราะ ปลดม้าที่เทียมรถศึก แล้วหลับอย่างไร้ความหวาดหวั่นในค่ายของตนยามราตรี เขาย่อมอ่อนล้าแน่—ถูกความตรากตรำบั่นทอนจนสิ้นแรง”

Verse 27

अवस्कन्दं करिष्यामि शिबिरस्याद्य दुष्करम्‌ । 'रातमें सुस्थिर चित्तसे सोये हुए उन पांचालोंके अपने ही शिविरमें घुसकर मैं उन सबका संहार कर डालूँगा। समूचे शिविरका ऐसा विनाश करूँगा जो दूसरोंके लिये दुष्कर है।। तानवस्कन्द्य शिबिरे प्रेतभूतविचेतस:

สัญชัยกล่าวว่า— “วันนี้เราจะยกเข้าตีค่ายด้วยการจู่โจมอันยากยิ่งที่ผู้อื่นทำได้ยากนัก เมื่อยามราตรีมาถึง ขณะที่ชาวปัญจาละหลับด้วยใจสงบ เราจะบุกเข้าไปในค่ายของเขาเองแล้วสังหารให้สิ้น เราจะทำลายทั้งค่ายให้พินาศในแบบที่ผู้อื่นยากจะกระทำได้”

Verse 28

अद्य तान्‌ सहितानू सर्वान्‌ धृष्टद्युम्नपुरोगमान्‌

“วันนี้พวกเขาทั้งหมด—ผู้ที่มีธฤษฏทยุมน์เป็นผู้นำอยู่เบื้องหน้า—…”

Verse 29

सूदयिष्यामि विक्रम्य कक्षं दीप्त इवानल: । निहत्य चैव पञज्चालान्‌ शान्तिं लब्धास्मि सत्तम

“เราจะรุกด้วยกำลัง กลืนกินเขตที่พักของเขาดุจไฟที่ลุกโชน และเมื่อสังหารชาวปัญจาละแล้ว โอผู้ประเสริฐ เราจึงจะได้ความสงบในที่สุด”

Verse 30

'साधुशिरोमणे! जैसे जलती हुई आग सूखे जंगल या तिनकोंकी राशिको जला डालती है, उसी प्रकार आज मैं एक साथ सोये हुए धृष्टद्युम्म आदि समस्त पांचालोंपर आक्रमण करके उन्हें मौतके घाट उतार दूँगा। उनका संहार कर लेनेपर ही मुझे शान्ति मिलेगी ।। पज्चालेषु भविष्यामि सूदयन्नद्य संयुगे । पिनाकपाणि: संक्रुद्धः स्वयं रुद्र: पशुष्विव,'जैसे प्रलयके समय क्रोधमें भरे हुए साक्षात्‌ पिनाकधारी रुद्र समस्त पशुओं (प्राणियों)-पर आक्रमण करते हैं, उसी प्रकार आज युद्धमें मैं पांचालॉका विनाश करता हुआ उनके लिये कालरूप हो जाऊँगा

สัญชัยกล่าวว่า— “วันนี้ในสนามรบ เราจะพุ่งเข้าหาชาวปัญจาละและสังหารให้สิ้น ดุจพระรุทระเองผู้ถือปิณากะ โหมด้วยพิโรธ ลงเข้าทำลายหมู่สัตว์ทั้งหลาย ฉันใด เราก็จักเป็นรูปแห่งกาล—ความตาย—แก่ชาวปัญจาละ ฉันนั้น เมื่อเราก่อความพินาศแก่พวกเขา”

Verse 31

अद्याहं सर्वपञ्चालान्‌ निहत्य च निकृत्य च । अर्दयिष्यामि संदहृष्टो रणे पाण्डुसुतांस्तथा,“आज मैं रणभूमिमें समस्त पांचालोंको मारकर उनके टुकड़े-टुकड़े करके हर्ष और उत्साहसे सम्पन्न हो पाण्डवोंको भी कुचल डालूँगा

วันนี้ในสมรภูมิ ข้าจะสังหารชาวปัญจาลาทั้งสิ้น และฉีกกระชากร่างพวกเขาให้แหลก ด้วยความปลาบปลื้มเดือดดาล แล้วจะบดขยี้บุตรแห่งปาณฑุด้วยเช่นกัน

Verse 32

अद्याहं सर्वपञ्चालै: कृत्वा भूमिं शरीरिणीम्‌ । प्रहत्यैकेकशस्तेषु भविष्याम्यनृण: पितु:,“आज समस्त पांचालोंके शरीरोंसे रणभूमिको शरीरधारिणी बनाकर एक-एक पांचालपर भरपूर प्रहार करके मैं अपने पिताके ऋणसे मुक्त हो जाऊँगा

วันนี้ข้าจะโปรยร่างชาวปัญจาลาทั้งหมดให้เกลื่อน จนแผ่นดินประหนึ่งมีเรือนกาย แล้วจะฟันล้มพวกเขาทีละคน เพื่อปลดเปลื้องหนี้คุณบิดาของข้า

Verse 33

दुर्योधनस्य कर्णस्य भीष्मसैन्धवयोरपि । गमयिष्यामि पञ्चालान्‌ पदवीमद्य दुर्गमाम्‌,“आज पांचालोंको दुर्योधन, कर्ण, भीष्म तथा जयद्रथके दुर्गम मार्गपर भेजकर छोड़ूँगा

วันนี้ข้าจะส่งชาวปัญจาลาไปสู่หนทางอันยากยิ่ง—หนทางเดียวกับที่ทุรโยธนะ กรรณะ ภีษมะ และไสณฑวะ (ชัยทรถะ) เคยดำเนินไป

Verse 34

अद्य पाज्चालराजस्य धृष्टद्युम्नस्य वै निशि । नचिरात्‌ प्रमथिष्यामि पशोरिव शिरो बलातू

คืนนี้ไม่นาน ข้าจะบดขยี้ศีรษะของธฤษฏทฺยุมน์ กษัตริย์แห่งปัญจาลา ด้วยกำลังดุจบิดหัวสัตว์เดรัจฉาน

Verse 35

“आज रातमें मैं शीघ्र ही पांचालराज धृष्टद्युम्मके सिरको पशुके मस्तककी भाँति बलपूर्वक मरोड़ डालूँगा ।। अद्य पाज्चालपाण्डूनां शयितानात्मजान्‌ निशि | खड्गेन निशितेनाजौ प्रमथिष्यामि गौतम,“गौतम! आज रातके युद्धमें सोये हुए पांचालों और पाण्डवोंके पुत्रोंको भी मैं अपनी तीखी तलवारसे टूक-टूक कर दूँगा

โอ้ โคตมะ! คืนนี้ในศึก ข้าจะใช้ดาบคมกริบสับบุตรของชาวปัญจาลาและบุตรของปาณฑพที่กำลังหลับใหลให้แหลกเป็นชิ้น ๆ

Verse 36

अद्य पाज्चालसेनां तां निहत्य निशि सौप्तिके । कृतकृत्य: सुखी चैव भविष्यामि महामते

คืนนี้ ในการสังหารยามราตรีต่อผู้หลับใหลนี้ ครั้นฆ่ากองทัพปาญจาลนั้นแล้ว โอผู้ทรงปัญญา เราจักเป็นผู้สำเร็จกิจและอยู่เป็นสุข

Verse 2736

सूदयिष्यामि विक्रम्प मघवानिव दानवान्‌ । 'जैसे इन्द्र दानवोंपर आक्रमण करते हैं, उसी प्रकार मैं भी शिविरमें मुर्दोके समान अचेत पड़े हुए पांचालोंकी छातीपर चढ़कर उन्हें पराक्रमपूर्वक मार डालूँगा

เราจักปราบพวกเขาด้วยวีรภาพ ดุจมฆวาน (พระอินทร์) ปราบเหล่าทานวะ

Frequently Asked Questions

The dilemma lies in treating retaliatory action as ‘proper’ kṣatra conduct while acknowledging that human judgment is unstable under grief and circumstance—raising the ethical question of whether a crisis-conditioned buddhi can legitimately authorize extreme, night-based strategy.

Judgment is presented as situational and frequently self-validating: people privilege their own prajñā, shift views with age and fortune, and rationalize chosen means as ‘hitam’ (beneficial). The passage functions as a cautionary model for how cognition under duḥkha can convert into moral certainty.

No explicit phalaśruti appears in the provided verses. The chapter’s meta-significance is structural: it supplies the justificatory reasoning that bridges counsel and action, clarifying how ethical discourse can be mobilized to stabilize resolve within the epic’s broader dharma-karmic framework.