Adhyaya 2
Sauptika ParvaAdhyaya 245 Versesयुद्धोत्तर रात्रि/परिणाम-काल: रण का शोर थमा है, पर नैतिक-मानसिक संघर्ष चरम पर है; निर्णय-युद्ध अभी शेष है।

Adhyaya 2

Daiva–Puruṣakāra Saṃvāda (Kṛpa’s Counsel on Destiny and Human Effort)

Upa-parva: Kṛpa–Nīti Discourse on Daiva and Puruṣakāra (Sauptika Parva, Adhyāya 2 context)

This chapter presents Kṛpa’s systematic argument that human outcomes are bound to two operative causes: daiva (destiny/circumstance) and puruṣakāra (initiative/effort). He rejects one-sided explanations—neither fate alone nor effort alone reliably produces results—arguing instead for their conjunction. Through agricultural analogies, he explains that rain without cultivation and cultivation without rain are both insufficient, making success contingent on coordinated conditions. Kṛpa then differentiates prudent diligence from sloth, noting that the wise exert themselves while recognizing uncertainty, whereas the idle disparage exertion. He observes that effort can still fail due to adverse conditions, and that unearned gain attracts social censure. The discourse turns to governance: proper initiative includes reverence to the divine, ethical intent, and especially consultation with elders and competent advisors; he proposes approaching Dhṛtarāṣṭra, Gāndhārī, and Vidura for guidance. Finally, Kṛpa critiques Duryodhana’s earlier policy failures—ignoring well-wishers and engaging in hostility against more virtuous opponents—framing the present crisis as the consequence of deficient deliberation and ethically compromised motivation.

Chapter Arc: रात्रि के रक्त-धुएँ के बाद, अश्वत्थामा के भीतर प्रतिशोध की ज्वाला धधकती है; तभी कृपाचार्य उसे रोककर कहते हैं—जो वचन तुमने कहा, उसे मैंने सुन लिया, पर पहले विचार करो कि कर्तव्य क्या है। → कृप ‘दैव’ और ‘पुरुषकार’ के द्वंद्व को सामने रखते हैं—मनुष्य दोनों से बँधा है; न केवल दैव से कार्य सिद्ध होते हैं, न केवल कर्म से, सिद्धि उनके योग से आती है। वे चेताते हैं कि मोह में पड़ा मनुष्य हित-अहित का निर्णय खो देता है, इसलिए सत्पुरुषों से सलाह लेना ही रक्षा है। → कृप का निर्णायक उपदेश: जब बुद्धि भ्रमित हो जाए, तब सुहृदों/विद्वानों से पूछो; वे कारण-निर्णय करके जैसी सलाह दें, वैसा ही करना चाहिए—और दैव-पुरुषार्थ में दैव की प्रबलता को पहचानकर भी पुरुषार्थ से विमुख न हो। → अध्याय का निष्कर्ष ‘आचरण-नीति’ बनता है—कार्य आरम्भ किए बिना प्रयोजन सिद्ध नहीं होता; यदि पुरुषार्थ के बाद भी सिद्धि न मिले तो उसे दैव-आघात मानकर अनावश्यक आत्मदाह/विवाद न करो। → कृप का प्रस्ताव उभरता है—चलो धृतराष्ट्र, गांधारी और महामति विदुर से पूछें; अब प्रश्न है कि यह सलाह अश्वत्थामा के उग्र संकल्प को मोड़ेगी या उसे और घातक दिशा देगी।

Shlokas

Verse 1

/ द्वितीयो5 ध्याय: कृपाचार्यका अश्वत्थामाको दैवकी प्रबलता बताते कर्तव्यके विषयमें सत्पुरुषोंसे सलाह लेनेकी प्रेरणा कृप उवाच श्रुतं ते वचनं सर्व यद्‌ यदुक्त त्वया विभो । ममापि तु वच: किंचिच्छृणुष्वाद्य महाभुज,तब कृपाचार्यने कहा--शक्तिशाली महाबाहो! तुमने जो-जो बात कही है, वह सब मैंने सुन ली। अब कुछ मेरी भी बात सुनो

กฤปะกล่าวว่า “โอ้วีรบุรุษผู้มีแขนกำยำ ข้าพเจ้าได้ฟังถ้อยคำทั้งหมดที่ท่านกล่าวแล้ว บัดนี้จงฟังถ้อยคำเล็กน้อยจากข้าพเจ้าในวันนี้ด้วยเถิด”

Verse 2

आबद्धा मानुषा: सर्वे निबद्धा: कर्मणोर्द्दयो: । दैवे पुरुषकारे च परं ताभ्यां न विद्यते,सभी मनुष्य प्रारब्ध और पुरुषार्थ दो प्रकारके कर्मोंसे बँधे हुए हैं। इन दोके सिवा दूसरा कुछ नहीं है इति श्रीमहाभारते सौप्तिकपर्वणि द्रौणिकृपसंवादे द्वितीयोडध्याय:

กฤปะกล่าวว่า “มนุษย์ทั้งปวงถูกผูกมัดอย่างแน่นหนาด้วยเหตุแห่งการกระทำสองประการ คือ เดวะ/ชะตากรรม (สิ่งที่ลิขิตไว้) และปุรุษการะ/ความเพียรของตน ไม่มีสิ่งที่สามนอกเหนือจากสองประการนี้”

Verse 3

न हि दैवेन सिध्यन्ति कार्याण्येकेन सत्तम । न चापि कर्मणैकेन द्वाभ्यां सिद्धस्तु योगत:

กฤปะกล่าวว่า “โอ้ผู้ประเสริฐในหมู่มนุษย์ กิจการทั้งหลายมิได้สำเร็จด้วยชะตากรรมเพียงอย่างเดียว และมิได้สำเร็จด้วยความเพียรของมนุษย์เพียงอย่างเดียว ความสำเร็จย่อมเกิดจากการประกอบกันอย่างเหมาะสมของทั้งสอง”

Verse 4

सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ अश्वत्थामन्‌! केवल दैव या प्रारब्धसे अथवा अकेले पुरुषार्थसे भी कार्योंकी सिद्धि नहीं होती है। दोनोंके संयोगसे ही सिद्धि प्राप्त होती है ।। ताभ्यामुभाभ्यां सर्वार्था निबद्धा अधमोत्तमा: । प्रवृत्ताश्वैव दृश्यन्ते निवृत्ताश्विव सर्वश:,उन दोनोंसे ही उत्तम-अधम सभी कार्य बँधे हुए हैं। उन्हींसे प्रवृत्ति और निवृत्ति- सम्बन्धी कार्य होते देखे जाते हैं

กฤปะกล่าวว่า “โอ้อัศวัตถามัน ผู้ประเสริฐในหมู่สัตบุรุษ ความสำเร็จมิได้เกิดจากเดวะ/ปรารพธ์เพียงอย่างเดียว และมิได้เกิดจากความเพียรของตนเพียงอย่างเดียว ความสำเร็จย่อมได้มาด้วยการประกอบกันของทั้งสอง จากสองประการนี้เอง เป้าหมายทั้งสูงและต่ำล้วนถูกผูกไว้ และด้วยสองประการนี้เอง ทุกหนแห่งจึงเห็นทั้งการกระทำเพื่อก้าวเข้าสู่กิจ (ปรวฤตติ) และการกระทำเพื่อถอยออก (นิวฤตติ)”

Verse 5

पर्जन्य: पर्वते वर्षन्‌ किन्नु साधयते फलम्‌ । कृष्टे क्षेत्रे तथा वर्षन्‌ किन्न साधयते फलम्‌,बादल पर्वतपर वर्षा करके किस फलकी सिद्धि करता है? वही यदि जोते हुए खेतमें वर्षा करे तो वह कौन-सा फल नहीं उत्पन्न कर सकता?

กฤปะกล่าวว่า “ฝนที่ตกลงบนภูเขา จะบังเกิดผลอันใดเล่า? แต่ฝนเดียวกันนั้น หากตกลงบนทุ่งที่ไถพรวนแล้ว มีผลใดเล่าที่มันจะไม่อาจบังเกิดได้?”

Verse 6

उत्थान चाप्यदैवस्य हानुत्थानं च दैवतम्‌ । व्यर्थ भवति सर्वत्र पूर्वस्तत्र विनिश्चय:,दैवरहित पुरुषका पुरुषार्थ व्यर्थ है और पुरुषार्थशून्य दैव भी व्यर्थ हो जाता है। सर्वत्र ये दो ही पक्ष उठाये जाते हैं। इन दोनोंमें पहला पक्ष ही सिद्धान्तभूत एवं श्रेष्ठ है (अर्थात्‌ दैवके सहयोगके बिना पुरुषार्थ नहीं काम देता है)

กฤปะกล่าวว่า “ความเพียรของมนุษย์หากไร้แรงหนุนแห่งไทวะย่อมสูญเปล่า และไทวะหากปราศจากความเพียรก็ไร้ผลไม่ต่างกัน ทุกแห่งหนผู้คนยกสองทัศนะนี้ขึ้นโต้แย้งกัน แต่ในที่นี้ข้อวินิจฉัยอันแน่นอนคือ ทัศนะฝ่ายแรกเป็นหลักที่ถูกต้องและสูงกว่า—หากปราศจากความสอดคล้องของชะตา เพียงความพยายามของมนุษย์ย่อมไม่สำเร็จ”

Verse 7

सुवृष्टे च यथा देवे सम्यक क्षेत्रे च कर्षिते । बीजं महागुणं भूयात्‌ तथा सिद्धिर्हि मानुषी,जैसे मेघने अच्छी तरह वर्षा की हो और खेतको भी भलीभाँति जोता गया हो, तब उसमें बोया हुआ बीज अधिक लाभदायक हो सकता है। इसी प्रकार मनुष्योंकी सारी सिद्धि दैव और पुरुषार्थके सहयोगपर ही अवलम्बित है

กฤปะกล่าวว่า “ดุจเมล็ดพันธุ์ย่อมงอกงามให้ผลยิ่ง เมื่อเทพประทานฝนต้องกาลและนาก็ไถพรวนไว้เรียบร้อย ฉันใด ความสำเร็จของมนุษย์ก็เกิดขึ้นได้ด้วยการประสานกันของพระกรุณาแห่งไทวะและความเพียรของตน ฉันนั้น”

Verse 8

तयोर्देवं विनिश्ित्य स्वयं चैव प्रवर्तते | प्राज्ञा: पुरुषकारेषु वर्तन्ते दाक्ष्यमाश्रिता:,इन दोनोंमें दैव बलवान्‌ है। वह स्वयं ही निश्चय करके पुरुषार्थकी अपेक्षा किये बिना ही फल-साधमननमें प्रवृत्त हो जाता है, तथापि विद्वान्‌ पुरुष कुशलताका आश्रय ले पुरुषार्थमें ही प्रवृत्त होते हैं

ในสองสิ่งนั้น ไทวะย่อมปรากฏว่าเข้มแข็งกว่า; ราวกับได้กำหนดผลไว้เองแล้ว จึงขับเคลื่อนให้ผลบังเกิดโดยไม่รอคอยความเพียรของมนุษย์ กระนั้นก็ดี บัณฑิตทั้งหลายอาศัยความชำนาญและความสามารถเชิงปฏิบัติ ก็ยังคงประกอบพยายามของตนอยู่มิขาด

Verse 9

इस प्रकार श्रीमह्याभारत सौप्तिकपर्वमें अश्वत्थामाकी मन्त्रणाविषयक पहला अध्याय पूरा हुआ,ताभ्यां सर्वे हि कार्यार्था मनुष्याणां नरर्षभ | विचेष्टन्त: सम दृश्यन्ते निवृत्तास्तु तथैव च नरश्रेष्ठ! मनुष्योंके प्रवृत्ति और निवृत्ति-सम्बन्धी सारे कार्य दैव और पुरुषार्थ दोनोंसे ही सिद्ध होते देखे जाते हैं

สัญชัยกล่าวว่า “โอ้ผู้ประเสริฐในหมู่มนุษย์ กิจทั้งปวงของมนุษย์ย่อมเห็นว่าสำเร็จด้วยสองสิ่งนี้—ไทวะและความเพียรของตน ไม่ว่าผู้คนจะดิ้นรนกระทำหรือจะวางมือถอนตัว ผลก็ปรากฏเสมอกันว่าเกิดจากการทำงานร่วมกันของชะตาและความพยายาม”

Verse 10

कृत: पुरुषकारश्न सो5पि दैवेन सिध्यति । तथास्य कर्मण: कर्तुरभिनिर्वर्ततेी फलम्‌,किया हुआ पुरुषार्थ भी दैवके सहयोगसे ही सफल होता है तथा दैवकी अनुकूलतासे ही कर्ताको उसके कर्मका फल प्राप्त होता है

กฤปะกล่าวว่า “แม้ความเพียรที่ได้กระทำแล้ว ก็สำเร็จได้ด้วยแรงหนุนแห่งไทวะเท่านั้น และเมื่อไทวะเกื้อหนุน ผู้กระทำจึงจะได้รับผลแห่งกรรมของตนโดยแท้”

Verse 11

उत्थानं च मनुष्याणां दक्षाणां दैववर्जितम्‌ । अफल दृश्यते लोके सम्यगप्युपपादितम्‌,चतुर मनुष्योंद्वारा अच्छी तरह सम्पादित किया हुआ पुरुषार्थ भी यदि दैवके सहयोगसे वंचित है तो वह संसारमें निष्फल होता दिखायी देता है

กฤปะกล่าวว่า—แม้ความเพียรอันเข้มแข็งของผู้คนที่ชำนาญ หากปราศจากแรงหนุนแห่งชะตา ก็ปรากฏในโลกนี้ว่าไร้ผล ถึงจะกระทำด้วยความรอบคอบและความสามารถอย่างยิ่งก็ตาม

Verse 12

तत्रालसा मनुष्याणां ये भवन्त्यमनस्विन: । उत्थान ते विगर्हन्ति प्राज्ञानां तन्न रोचते,मनुष्योंमें जो आलसी और मनपर काबू न रखनेवाले होते हैं, वे पुरुषार्थकी निन्‍दा करते हैं। परंतु विद्वानोंको यह बात अच्छी नहीं लगती

ในที่นี้ คนที่เกียจคร้านและไม่อาจครองใจตน ย่อมดูหมิ่นความเพียร; แต่ถ้อยคำนั้นไม่เป็นที่พอใจของบัณฑิต

Verse 13

प्रायशो हि कृतं कर्म नाफलं दृश्यते भुवि । अकृत्वा च पुनर्दु:खं कर्म पश्येन्महाफलम्‌,प्राय: किया हुआ कर्म इस भूतलपर कभी निष्फल होता नहीं देखा जाता है; परंतु कर्म न करनेसे दुःखकी प्राप्ति ही देखनेमें आती है; अतः कर्मको महान्‌ फलदायक समझना चाहिये

กฤปะกล่าวว่า—โดยมากแล้ว กรรมที่ลงมือทำในโลกนี้ไม่ปรากฏว่าไร้ผล; แต่เมื่อไม่กระทำ ย่อมเห็นแต่ความทุกข์ย้อนกลับมา ดังนั้นพึงถือว่ากรรมเป็นสิ่งให้ผลยิ่งใหญ่

Verse 14

चेष्टामकुर्वल्लैभते यदि किंचिद्‌ यदृच्छया । यो वा न लभते कृत्वा दुर्दर्शा तावुभावषि,यदि कोई पुरुषार्थ न करके दैवेच्छासे ही कुछ पा जाता है अथवा जो पुरुषार्थ करके भी कुछ नहीं पाता, इन दोनों प्रकारके मनुष्योंका मिलना बहुत कठिन है

กฤปะกล่าวว่า—หากผู้ใดไม่ลงแรงเลยแต่ได้สิ่งใดมาโดยบังเอิญ หรือผู้ใดลงแรงแล้วกลับไม่ได้สิ่งใดเลย—การได้พบคนทั้งสองจำพวกนี้เป็นสิ่งยากยิ่ง

Verse 15

शवक्‍नोति जीवितुं दक्षो नालस: सुखमेधते । दृश्यन्ते जीवलोकेडस्मिन्‌ दक्षा: प्रायो हितैषिण:,पुरुषार्थमें लगा हुआ दक्ष पुरुष सुखसे जीवन-निर्वाह कर सकता है; परंतु आलसी मनुष्य कभी सुखी नहीं होता है। इस जीव-जगतमें प्राय: तत्परतापूर्वक कर्म करनेवाले ही अपना हित साधन करते देखे जाते हैं

กฤปะกล่าวว่า—ผู้มีความสามารถและขยันหมั่นเพียร ย่อมดำรงชีวิตได้อย่างผาสุก; แต่คนเกียจคร้านย่อมไม่อาจเป็นสุขได้ ในโลกแห่งสรรพชีวิตนี้ โดยมากเห็นได้ว่า ผู้ที่ชำนาญและลงมือทำอย่างแข็งขันเท่านั้นที่ยังประโยชน์แก่ตนได้

Verse 16

यदि दक्ष: समारम्भात्‌ कर्मणो नाश्लुते फलम्‌ | नास्य वाच्यं भवेत्‌ किंचिल्लब्धव्यं वाधिगच्छति,यदि कार्य-दक्ष मनुष्य कर्मका आरम्भ करके भी उसका कोई फल नहीं पाता है तो उसके लिये उसकी कोई निन्दा नहीं की जाती अथवा वह अपने प्राप्तव्य लक्ष्यको पा ही लेता है

หากบุรุษผู้ชำนาญเริ่มกระทำการแล้วแต่ยังมิได้ผล ก็ไม่ควรกล่าวโทษเขา; หรือไม่ช้าก็ย่อมบรรลุสิ่งที่พึงบรรลุในกาลอันควร

Verse 17

अकृत्वा कर्म यो लोके फलं विन्दति घिछित: । स तु वक्तव्यतां याति द्वेष्पो भवति भूयश:,परंतु जो इस जगत्‌में कोई काम न करके बैठा-बैठा फल भोगता है; वह प्राय: निन्दित होता है और दूसरोंके द्वेषका पात्र बन जाता है

แต่ผู้ใดในโลกนี้เสวยผลโดยมิได้กระทำการอันควรแก่ผลนั้น ผู้นั้นย่อมเป็นที่ติฉิน และถูกตราหน้าว่าน่ารังเกียจ กลายเป็นเป้าความชังของผู้อื่นครั้งแล้วครั้งเล่า

Verse 18

एवमेतदनादृत्य वर्तते यस्त्वतो5न्यथा । स करोत्यात्मनो5नर्थनिष बुद्धिमतां नयः:,इस प्रकार जो पुरुष इस मतका अनादर करके इसके विपरीत बर्ताव करता है अर्थात्‌ जो दैव और पुरुषार्थ दोनोंके सहयोगको न मानकर केवल एकके भरोसे ही बैठा रहता है, वह अपना ही अनर्थ करता है, यही बुद्धिमानोंकी नीति है

เป็นดังนั้นแล. แต่ผู้ใดไม่ใส่ใจหลักนี้แล้วประพฤติผิดไป—ไม่ยอมรับการเกื้อหนุนร่วมกันของชะตาและความเพียรมนุษย์ หากยึดเพียงอย่างเดียว—ผู้นั้นย่อมนำความพินาศมาสู่ตนเอง นี่คือแนวทางอันมั่นคงของบัณฑิต

Verse 19

हीन॑ पुरुषकारेण यदि दैवेन वा पुनः । कारणाभ्यामथैताभ्यामुत्थानमफलं भवेत्‌,पुरुषार्थहीन दैव अथवा दैवहीन पुरुषार्थ--इन दो ही कारणोंसे मनुष्यका उद्योग निष्फल होता है

หากผู้ใดขาดความเพียรของตน หรืออีกประการหนึ่งคือขาดวาสนาอันเกื้อหนุน ด้วยเหตุสองประการนี้ประการใดประการหนึ่ง การลุกขึ้นประกอบกิจ—ความอุตสาหะของเขา—ย่อมไร้ผล

Verse 20

हीनं पुरुषकारेण कर्म त्विह न सिद्धयति । दैवतेभ्यो नमस्कृत्य यस्त्वर्थान्‌ सम्यगीहते

กิจที่ขาดความเพียรของมนุษย์ย่อมไม่สำเร็จในโลกนี้. แต่ผู้ใดนอบน้อมแด่เทพยดาก่อน แล้วจึงมุ่งเพียรแสวงหาประโยชน์ของตนโดยชอบด้วยปัญญาและความแน่วแน่ ผู้นั้นย่อมนำกิจของตนไปสู่ความสำเร็จ

Verse 21

सम्यगीहा पुनरियं यो वृद्धानुपसेवते

กฤปะกล่าวว่า “นี่แลเป็นหนทางอันชอบอีกครั้ง—ผู้ใดเข้าไปปรนนิบัติรับใช้บรรดาผู้อาวุโส”

Verse 22

उत्थायोत्थाय हि सदा प्रष्टव्या वृद्धसम्मता:

ควรลุกขึ้นครั้งแล้วครั้งเล่า และคอยไต่ถามขอคำปรึกษาจากบรรดาผู้อาวุโสผู้เป็นที่ยอมรับว่าเปี่ยมปัญญาอยู่เสมอ

Verse 23

वृद्धानां वचन श्रुत्वा यो<भ्युत्थानं प्रयोजयेत्‌

เมื่อได้ฟังถ้อยคำของผู้อาวุโสแล้ว ผู้ใดกระตุ้น (ผู้อื่น) ให้ลุกขึ้นและลงมือกระทำ

Verse 24

रागात्‌ क्रोधाद्‌ भयाल्लो भाद्‌ यो<र्थानीहति मानव:

มนุษย์ผู้ใดถูกครอบงำด้วยความกำหนัด ความโกรธ ความกลัว หรือความโลภ แล้วดิ้นรนแสวงหาลาภทรัพย์

Verse 25

सो<यं दुर्योधनेनार्थों लुब्धेनादीर्घदर्शिना,वार्यमाणो5करोद्‌ वैरं पाण्डवैर्गुणवत्तरै: । दुर्योधन लोभी और अदूरदर्शी था। उसने मूर्खतावश न तो किसीका समर्थन प्राप्त किया और न स्वयं ही अधिक सोच-विचार किया। उसने अपना हित चाहनेवाले लोगोंका अनादर करके दुष्टोंक साथ सलाह की और सबके मना करनेपर भी अधिक गुणवान्‌ पाण्डवोंके साथ वैर बाँध लिया

ดังนี้เอง ทุรโยธนะผู้โลภและไร้สายตายาวไกล ได้นำหายนะนี้มาสู่ตน; แม้ถูกห้ามปรามซ้ำแล้วซ้ำเล่า เขาก็ยังผูกเวรเป็นศัตรูกับเหล่าปาณฑพผู้ประเสริฐด้วยคุณธรรมยิ่งกว่า

Verse 26

असमर्थ्य समारब्धो मूढत्वादविचिन्तित: । हितबुद्धीननादृत्य सम्मन्त्रयासाधुभि: सह

กฤปะกล่าวว่า “ทั้งที่ไร้กำลังจะทำให้สำเร็จ เจ้ากลับเริ่มการงานนี้—ด้วยความหลงและมิได้ไตร่ตรองให้รอบคอบ ละเลยคำของผู้มีปัญญา แล้วไปปรึกษาหารือร่วมกับคนชั่ว”

Verse 27

पूर्वमप्यतिदु:शीलो न धैर्य कर्तुमहति

กฤปะกล่าวว่า “แต่เดิมเขาก็มีความประพฤติชั่วอย่างยิ่ง มิสมควรแก่การทรงความมั่นคงหรือการข่มใจ”

Verse 28

तपत्यर्थे विपन्ने हि मित्राणां न कृतं वच: । पहले भी वह बड़े दुष्ट स्वभावका था। धैर्य रखना तो वह जानता ही नहीं था। उसने मित्रोंकी बात नहीं मानी; इसलिये अब काम बिगड़ जानेपर पश्चात्ताप करता है ।। अनुवर्तामहे यत्तु तं वयं पापपूरुषम्‌

กฤปะกล่าวว่า “เมื่อการงานพังทลาย เขาย่อมไหม้ด้วยความสำนึกผิด เพราะมิได้ทำตามถ้อยคำของมิตรสหาย แต่เดิมเขาก็มีสันดานชั่วอย่างยิ่ง ไม่รู้จักยึดมั่นในความอดทน เขาเมินคำเตือนของพวกพ้อง ครั้นแผนการผิดพลาดจึงคร่ำครวญด้วยความเสียใจ ถึงกระนั้นพวกเราก็ยังตามคนบาปผู้นั้นมา”

Verse 29

अनेन तु ममाद्यापि व्यसनेनोपतापिता

“แม้วันนี้ ข้าก็ยังถูกความวิบัตินี้เผาผลาญอยู่”

Verse 30

बुद्धिश्चिन्तयते किंचित्‌ स्वं श्रेयो नावबुद्धयते । इस संकटसे सर्वथा संतप्त होनेके कारण मेरी बुद्धि आज बहुत सोचने-विचारनेपर भी अपने लिये किसी हितकर कार्यका निर्णय नहीं कर पाती है ।। मुहता तु मनुष्येण प्रष्टव्या: सुह्ददो जना:

กฤปะกล่าวว่า “ปัญญาของข้าคิดใคร่ครวญอยู่บ้าง แต่กลับไม่อาจรู้ได้ว่าอะไรเป็นประโยชน์สูงสุดแก่ตน ข้าถูกวิกฤตนี้เผาผลาญรอบด้าน แม้วันนี้จะตรึกตรองมากเพียงใด ก็ยังตัดสินหนทางอันเป็นคุณแก่ตนไม่ได้ เพราะฉะนั้น ในยามเช่นนี้ มนุษย์พึงไต่ถามสหายผู้จริงใจและผู้หวังดีที่ไว้วางใจได้”

Verse 31

ततोअस्य मूल कार्याणां बुद्धया निश्चित्य वै बुध:

ครั้นแล้วบุรุษผู้มีปัญญาได้ใคร่ครวญด้วยดุลยพินิจอันแจ่มชัด จึงกำหนดแน่วแน่ซึ่งแนวทางการกระทำอันเป็นรากฐานในเรื่องนี้

Verse 32

ते वयं धृतराष्ट्रं च गान्धारीं च समेत्य ह

แล้วพวกเราทั้งหมดก็ไปพร้อมกันเข้าเฝ้าธฤตราษฏระและคานธารี (เข้าไปยังที่ประทับของทั้งสอง)

Verse 33

ते पृष्टास्तु वदेयुर्यच्छेयो न: समनन्तरम्‌

หากได้ทูลถามแล้ว พวกท่านพึงกล่าวโดยฉับพลัน มิให้ชักช้า ว่าสิ่งใดเป็นประโยชน์สูงสุดแก่พวกเรา

Verse 34

तदस्माभि: पुनः कार्यमिति मे नैष्ठिकी मति: । हमारे पूछनेपर वे लोग अब हमारे लिये जो श्रेयस्कर कार्य बतावें, वही हमें करना चाहिये; मेरी बुद्धिका तो यही दृढ़ निश्चय है ।। ३३ $ ।। अनारम्भात्‌ तु कार्याणां नार्थ: सम्पद्यते क्वचित्‌,कार्यको आरम्भ न करनेसे कहीं कोई भी प्रयोजन सिद्ध नहीं होता है; परंतु पुरुषार्थ करनेपर भी जिनका कार्य सिद्ध नहीं होता है, वे निश्चय ही दैवके मारे हुए हैं। इसमें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये

กฤปะกล่าวว่า “ฉะนั้นพวกเราพึงลงมือกระทำอีกครั้ง—นี่คือความเห็นอันมั่นคงของเรา เพราะหากไม่เริ่มต้นการงาน ย่อมไม่มีประโยชน์ใดสำเร็จได้ ณ ที่ใดเลย แต่ผู้ใดเพียรพยายามแล้วงานยังไม่สำเร็จ ผู้นั้นย่อมถูกชะตากรรมกระหน่ำแน่แท้ เรื่องนี้ไม่ควรลังเลให้มากความ”

Verse 35

कृते पुरुषकारे तु येषां कार्य न सिद्धयति । दैवेनोपहतास्ते तु नात्र कार्या विचारणा,कार्यको आरम्भ न करनेसे कहीं कोई भी प्रयोजन सिद्ध नहीं होता है; परंतु पुरुषार्थ करनेपर भी जिनका कार्य सिद्ध नहीं होता है, वे निश्चय ही दैवके मारे हुए हैं। इसमें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये

กฤปะกล่าวว่า “ผู้ใดได้กระทำความเพียรแล้วแต่งานยังไม่สำเร็จ ผู้นั้นย่อมถูกชะตากรรมเล่นงานแน่แท้ ในเรื่องนี้ไม่จำเป็นต้องไตร่ตรองให้มากความ”

Verse 206

दक्षो दाक्षिण्यसम्पन्नो न स मोघधैर्विहन्यते । पुरुषार्थके बिना तो यहाँ कोई कार्य सिद्ध नहीं हो सकता। जो दैवको मस्तक झुकाकर सभी कार्योके लिये भलीभाँति चेष्टा करता है, वह दक्ष एवं उदार पुरुष असफलताओंका शिकार नहीं होता

กฤปะกล่าวว่า “บุรุษผู้สามารถและเปี่ยมด้วยความเอื้ออารี ย่อมไม่ถูกโค่นด้วยความลังเลอันไร้ผล หากปราศจากความเพียรของมนุษย์แล้ว กิจใด ๆ ในโลกนี้ย่อมไม่สำเร็จ แต่ผู้ใดนอบน้อมต่อชะตาแล้วก็ยังพากเพียรให้ถูกต้องในทุกกิจ—บุรุษผู้ชำนาญและสูงศักดิ์เช่นนั้น ย่อมไม่พินาศเพราะความล้มเหลวทั้งหลาย”

Verse 213

आपृच्छति च यच्छेय: करोति च हित॑ वच: । यह भलीभाँति चेष्टा उसीकी मानी जाती है जो बड़े-बूढ़ोंकी सेवा करता है, उनसे अपने कल्याणकी बात पूछता है और उनके बताये हुए हितकारक वचनोंका पालन करता है

กฤปะกล่าวว่า “ความประพฤติของผู้นั้นแลเป็นที่ยกย่อง ผู้รับใช้บรรดาผู้อาวุโส ไต่ถามหนทางสู่ความผาสุกแท้จริง และปฏิบัติตามถ้อยคำอันเป็นประโยชน์ที่ท่านทั้งหลายชี้แนะ”

Verse 226

ते सम योगे पर मूलं तन्मूला सिद्धिरुच्यते । प्रतिदिन सबेरे उठ-उठकर वृद्धजनोंद्वारा सम्मानित पुरुषोंसे अपने हितकी बात पूछनी चाहिये; क्योंकि वे अप्राप्तकी प्राप्ति करानेवाले उपायके मुख्य हेतु हैं। उनका बताया हुआ वह उपाय ही सिद्धिका मूल कारण कहा जाता है

กฤปะกล่าวว่า “ในวินัยแห่งความประพฤติอันถูกต้องนั้นแลมีรากอันสูงสุด และความสำเร็จย่อมมีสิ่งนั้นเป็นรากฐาน เพราะฉะนั้นทุกวันพึงตื่นแต่เช้า เข้าไปหาผู้อาวุโสผู้ควรบูชา แล้วไต่ถามด้วยความเคารพว่าอะไรเป็นประโยชน์แท้จริง เพราะท่านทั้งหลายเป็นเหตุสำคัญแห่งวิธีที่จะทำให้สิ่งที่ยังไม่บรรลุได้บรรลุ และวิธีที่ท่านสั่งสอนนั้นเองเรียกว่า ‘รากแห่งความสำเร็จ’”

Verse 236

उत्थानस्य फलं सम्यक्‌ तदा स लभते5चिरात्‌ | जो वृद्ध पुरुषोंका वचन सुनकर उसके अनुसार कार्य आरम्भ करता है, वह उस कार्यका उत्तम फल शीघ्र ही प्राप्त कर लेता है

กฤปะกล่าวว่า “ผู้ใดฟังถ้อยคำของผู้อาวุโสแล้วเริ่มลงมือทำตามนั้น ผู้นั้นย่อมได้ผลอันถูกต้องและประเสริฐแห่งความเพียรนั้นโดยเร็ว”

Verse 246

अनीशक्षावमानी च स शीतघ्र॑ भ्रश्यते श्रिय: । अपने मनको वशगमें न रखते हुए दूसरोंकी अवहेलना करनेवाला जो मानव राग, क्रोध, भय और लोभसे किसी कार्यकी सिद्धिके लिये चेष्टा करता है, वह बहुत जल्दी अपने ऐश्वर्यसे भ्रष्ट हो जाता है

กฤปะกล่าวว่า “ผู้ใดไร้การข่มตนและดูหมิ่นผู้อื่น ผู้นั้นย่อมตกจากความรุ่งเรืองโดยเร็ว เมื่อมิได้ควบคุมจิตของตน แล้วดิ้นรนเพื่อให้บรรลุสิ่งใดภายใต้อำนาจแห่งราคะ โทสะ ความกลัว และความโลภ ผู้นั้นย่อมสูญสิ้นทรัพย์และอำนาจในไม่ช้า”

Verse 266

वार्यमाणो5करोद्‌ वैरं पाण्डवैर्गुणवत्तरै: । दुर्योधन लोभी और अदूरदर्शी था। उसने मूर्खतावश न तो किसीका समर्थन प्राप्त किया और न स्वयं ही अधिक सोच-विचार किया। उसने अपना हित चाहनेवाले लोगोंका अनादर करके दुष्टोंक साथ सलाह की और सबके मना करनेपर भी अधिक गुणवान्‌ पाण्डवोंके साथ वैर बाँध लिया

แม้ถูกห้ามปรามและตักเตือนซ้ำแล้วซ้ำเล่า เขาก็ยังเลือกผูกเวรกับเหล่าปาณฑพ ผู้ประเสริฐกว่าในคุณธรรมและความเลิศ. ด้วยความโลภและสายตาสั้น เขาดูหมิ่นผู้หวังดี ปรึกษากับคนพาล และแม้ทุกคนจะทัดทาน ก็ยังผูกความเป็นศัตรูอันนำสู่ความพินาศกับปาณฑพผู้ทรงคุณยิ่งกว่า

Verse 283

अस्मानप्यनयस्तस्मात्‌ प्राप्तोडयं दारुणो महान्‌ | हमलोग जो उस पापीका अनुसरण करते हैं, इसीलिये हमें भी यह अत्यन्त दारुण अनर्थ प्राप्त हुआ है

เพราะพวกเราติดตามหนทางบาปนั้นเอง ภัยพิบัติอันใหญ่หลวงและโหดร้ายยิ่งนี้จึงตกมาถึงพวกเราด้วย

Verse 303

तत्रास्य बुद्धिर्विनयस्तत्र श्रेयश्व॒ पश्यति । जब मनुष्य मोहके वशीभूत हो हिताहितका निर्णय करनेमें असमर्थ हो जाय, तब उसे अपने सुहृदोंसे सलाह लेनी चाहिये। वहीं उसे बुद्धि और विनयकी प्राप्ति हो सकती है और वहीं उसे अपने हितका साधन भी दिखायी देता है

ณที่นั้นเอง—ในคำปรึกษาของมิตรผู้หวังดีและน่าไว้วางใจ—มนุษย์ย่อมได้ทั้งปัญญาและความอ่อนน้อม และ ณ ที่นั้นเองย่อมเห็นสิ่งที่เป็นประโยชน์แท้จริง. เมื่อผู้คนถูกความหลงครอบงำจนตัดสินดีชั่วมิได้ พึงไปขอคำแนะนำจากสหายผู้จริงใจ; ด้วยเขาเหล่านั้นย่อมได้สติปัญญาคืนมาและเห็นหนทางแห่งความเกื้อกูลแก่ตน

Verse 316

तेअत्र पृष्टा यथा ब्रूयुस्तत्‌ कर्तव्यं तथा भवेत्‌ | पूछनेपर वे विद्वान्‌ हितैषी अपनी बुद्धिसे उसके कार्योंके मूल कारणका निश्चय करके जैसी सलाह दें, वैसा ही उसे करना चाहिये

เมื่อถามในเรื่องนี้แล้ว บรรดาบัณฑิตผู้หวังดีจะใช้ปัญญาวินิจฉัยเหตุรากของการกระทำ และให้คำแนะนำประการใด ก็ควรกระทำตามนั้น

Verse 326

उपपृच्छामहे गत्वा विदुरं च महामतिम्‌ । अतः हमलोग राजा धुृतराष्ट्र, गान्धारी देवी तथा परम बुद्धिमान्‌ विदुरजीके पास चलकर पूछें

มาเถิด เราจงไปไต่ถามวิดูระผู้มีปัญญาใหญ่. เพราะฉะนั้นเราจงเข้าเฝ้าพระเจ้าธฤตราษฏระ พระนางคานธารี และวิดูระผู้ทรงปรีชาสูงสุด แล้วขอคำปรึกษา

Frequently Asked Questions

The dilemma concerns whether to attribute outcomes to fate or to personal agency, and how to act responsibly when effort may still fail—balancing diligence with humility and avoiding both fatalism and reckless overconfidence.

Sustained, competent effort guided by ethical intent and wise counsel is the recommended norm; success is most likely when initiative aligns with favorable conditions, and failure should be interpreted without collapsing into either blame-only or fate-only explanations.

No explicit phalaśruti is stated; the chapter’s meta-function is normative—establishing a practical-ethical framework for action and consultation that supports later decisions in the post-war narrative.