
कृतयुगवर्णनम् तथा राजधर्मोपदेशः (Kṛtayuga Description and Instruction on Royal Dharma)
Upa-parva: Mārkaṇḍeya–Yuga-Dharma Upadeśa (Prophecy and Royal Ethics Episode)
This chapter continues Mārkaṇḍeya’s account of cyclical time and social restoration. He describes a future re-establishment of order: the protection of the earth for the twice-born, the performance of a great horse-sacrifice, and the installation of auspicious boundaries (maryādā) said to be primordial in origin. The narrative includes a program of security and pacification—suppression of predatory bands and the placement of emblems and weapons in conquered regions as signs of stabilized rule—culminating in the decline of adharma and the increase of dharma when the Kṛta age is attained. Mārkaṇḍeya outlines markers of societal flourishing: ritual activity, public works, thriving agriculture across seasons, and a varṇa-based division of duties presented as normative for that age. The discourse then pivots to direct counsel: Yudhiṣṭhira is urged to resolve dharma-doubt by aligning himself with dharma, practicing compassion, protecting subjects as one’s own children, honoring ancestors and deities, correcting errors through proper giving, and avoiding contempt toward Brahmins. The frame closes with Yudhiṣṭhira’s assent and the listeners’ astonishment at the purāṇic instruction.
Chapter Arc: युधिष्ठिर के समक्ष महर्षि मार्कण्डेय काल-चक्र का द्वार खोलते हैं—चारों युगों की वर्ष-संख्या, ब्रह्मा के दिन-रात का मान, और वह अद्भुत तथ्य कि प्रलय के महाशून्य में भी एक साक्षी बना रहता है। → वर्णाश्रम-धर्म के ढहने का चित्र उभरता है: कलियुग में क्षत्रिय-वैश्य विकर्म में पड़ते हैं, अल्पायु और स्वल्पबल हो जाते हैं; ब्राह्मण बाह्य वेश से मुनि-सा कपट धारण कर जीविका के लिए अधर्म का सहारा लेते हैं। समाज का ताना-बाना उलटता जाता है और नैतिक दिशा धुँधली पड़ती जाती है। → प्रलय का दृश्य: जब लोक देव-दानव-समेत शून्य हो जाते हैं, तब भी मार्कण्डेय का दीर्घजीवी अस्तित्व बना रहता है—और वे उस परम रहस्य के निकट पहुँचते हैं जहाँ ब्रह्मा के दिन-रात में समस्त विश्व का परिवर्तन होता है। इस विराट विनाश के बीच एक दिव्य बालक का दर्शन होता है—लाल-लाल तलवों और कोमल अँगुलियों वाला—जिसे मार्कण्डेय श्रद्धा से मस्तक पर उठाकर प्रणाम करते हैं। → महर्षि काल-मान (युग, सहस्रयुग, ब्राह्म-अहः) का विधान स्थापित करते हैं और कलियुग के लक्षणों द्वारा यह बोध देते हैं कि धर्म का क्षय भी नियति के चक्र में आता है; फिर भी साक्षी-चेतना और परम सत्ता का संकेत प्रलय में भी बना रहता है। → दिव्य बालक का रहस्य—वह कौन है और प्रलय के पार किस सत्य की ओर संकेत करता है—अगले प्रसंग की ओर कथा को धकेल देता है।
Verse 1
हि >> आय न हुक है 7 अष्टा शीर्त्याधिकशततमोब् ध्याय: चारों युगोंकी वर्ष-संख्या एवं कलियुगके प्रभावका वर्णन, प्रलयकालका दृश्य और मार्कण्डेयजीको ४ (02०8 कुन्दजीके दर्शन, मार्कण्डेयजीका भगवान्के उदरमें प्रवेश कर ब्रह्माण्डदर्शन करना और फिर बाहर निकलकर उनसे वार्तालाप करना वैशम्पायन उवाच ततः स पुनरेवाथ मार्कण्डेयं यशस्विनम् । पप्रच्छ विनयोपेतो धर्मराजो युधिषिर:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर विनयशील धर्मराज युधिष्ठिरने यशस्वी मार्कण्डेय मुनिसे पुनः इस प्रकार प्रश्न किया--
वैशम्पायन उवाच । ततः स पुनरेवाथ मार्कण्डेयं यशस्विनम् । पप्रच्छ विनयोपेतो धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥
Verse 2
नैके युगसहस्रान्तास्त्वया दृष्टा महामुने । न चापीह सम: कश्रिदायुष्मान् दृश्यते तव,“महामुने! आपने हजार-हजार युगोंके अन्तमें होनेवाले अनेक महाप्रलयके दृश्य देखे हैं। इस संसारमें आपके समान बड़ी आयुवाला दूसरा कोई पुरुष नहीं दिखायी देता
नैके युगसहस्रान्तास्त्वया दृष्टा महामुने । न चापीह समः कश्चिदायुष्मान् दृश्यते तव ॥
Verse 3
वर्जयित्वा महात्मानं ब्रह्माणं परमेषछ्ठिनम् । न ते$स्ति सदृश: ककश्रिदायुषा ब्रह्मवित्तम,ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ महर्षे! परमेष्ठी महात्मा ब्रह्माजीको छोड़कर दूसरा कोई आपके समान दीर्घायु नहीं है
वर्जयित्वा महात्मानं ब्रह्माणं परमेष्ठिनम् । न तेऽस्ति सदृशः कश्चिदायुषा ब्रह्मवित्तम ॥
Verse 4
अनन्तरिक्षे लोके5स्मिन् देवदानववर्जिते । त्वमेव प्रलये विप्र ब्रह्माणमुपतिष्ठसे,ब्रह्म! जब यह संसार देवता, दानव तथा अन्तरिक्ष आदि लोकोंसे शून्य हो जाता है उस प्रलयकालमें केवल आप ही ब्रह्माजीके पास रहकर उनकी उपासना करते हैं
अनन्तरिक्षे लोकेऽस्मिन् देवदानववर्जिते । त्वमेव प्रलये विप्र ब्रह्माणमुपतिष्ठसे ॥
Verse 5
प्रलये चापि निर्वत्ति प्रबुद्धे च पितामहे । त्वमेक: सृज्यमानानि भूतानीह प्रपश्यसि,ब्रह्मर्ष! फिर प्रलयकाल व्यतीत होनेपर जब पितामह ब्रह्मा जागते हैं, तब सम्पूर्ण दिशाओंमें वायुको फैलाकर उसके द्वारा समस्त जलराशिको इधर-उधर छितराकर (सूखे स्थानोंमें) ब्रह्माजीके द्वारा जो जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्धिज्ज नामक चार प्रकारके प्राणी रचे जाते हैं, उन्हें एकमात्र आप ही (सबसे पहले) अच्छी तरह देख पाते हैं
वैशम्पायन उवाच—प्रलये चापि निर्वृत्ते प्रबुद्धे च पितामहे । त्वमेकः सृज्यमानानि भूतानीह प्रपश्यसि, ब्रह्मर्षे ॥
Verse 6
चतुर्विधानि विप्रर्षे यथावत् परमेछ्िना । वायुभूता दिश: कृत्वा विक्षिप्यापस्ततस्तत:,ब्रह्मर्ष! फिर प्रलयकाल व्यतीत होनेपर जब पितामह ब्रह्मा जागते हैं, तब सम्पूर्ण दिशाओंमें वायुको फैलाकर उसके द्वारा समस्त जलराशिको इधर-उधर छितराकर (सूखे स्थानोंमें) ब्रह्माजीके द्वारा जो जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्धिज्ज नामक चार प्रकारके प्राणी रचे जाते हैं, उन्हें एकमात्र आप ही (सबसे पहले) अच्छी तरह देख पाते हैं
चतुर्विधानि विप्रर्षे यथावत् परमेṣ्ठिना । वायुभूताः दिशः कृत्वा विक्षिप्यापस्ततस्ततः ॥
Verse 7
त्वया लोकगुरु: साक्षात् सर्वलोकपितामह: । आराधितो द्विजश्रेष्ठ तत्परेण समाधिना,द्विजश्रेष्ठी आपने तत्परतापूर्वक चित्तवृत्तियोंका निरोध करके सम्पूर्ण लोकोंके पितामह साक्षात् लोकगुरु ब्रह्माजीकी आराधना की है। विप्रवर! आपने अनेक बार इस जगत्की प्रारम्भिक सृष्टिको प्रत्यक्ष किया है और घोर तपस्याद्वारा (मरीचि आदि) प्रजापतियोंको भी जीत लिया है
त्वया लोकगुरुः साक्षात् सर्वलोकपितामहः । आराधितो द्विजश्रेष्ठ तत्परेण समाधिना ॥
Verse 8
स्वप्रमाणमथो विप्र त्वया कृतमनेकश: । घोरेणाविश्य तपसा वेधसो निर्जितास्त्वया,द्विजश्रेष्ठी आपने तत्परतापूर्वक चित्तवृत्तियोंका निरोध करके सम्पूर्ण लोकोंके पितामह साक्षात् लोकगुरु ब्रह्माजीकी आराधना की है। विप्रवर! आपने अनेक बार इस जगत्की प्रारम्भिक सृष्टिको प्रत्यक्ष किया है और घोर तपस्याद्वारा (मरीचि आदि) प्रजापतियोंको भी जीत लिया है
स्वप्रमाणमथो विप्र त्वया कृतमनेकशः । घोरेणाविश्य तपसा वेधसो निर्जितास्त्वया ॥
Verse 9
नारायणाड्कप्रख्यस्त्वं साम्परायेडतिपठ्यसे । भगवाननेकश: कृत्वा त्वया विष्णोश्व विश्वकृत्,आप भगवान् नारायणके समीप रहनेवाले भक्तोंमें सबसे श्रेष्ठ हैं। परलोकमें आपकी महिमाका सर्वत्र गान होता है। आपने पहले स्वेच्छासे प्रकट होनेवाले सर्वव्यापक ब्रह्मकी उपलब्धिके स्थानभूत हृदयकमलकी कर्णिकाका (योगकी कलासे) अलौकिक उद्घाटन कर वैराग्य और अभ्याससे प्राप्त हुई दिव्य दृष्टिद्वारा विश्वरचयिता भगवान्का अनेक बार साक्षात्कार किया है
नारायणाद्कप्रख्यस्त्वं साम्परायेऽतिपठ्यसे । भगवाननेकशः कृत्वा त्वया विष्णोश्च विश्वकृत् ॥
Verse 10
कर्णिकोद्धरणं दिव्यं ब्रह्यण: कामरूपिण: । रत्नालंकारयोगाशभ्यां दृग्भ्यां दुष्टस्त्वया पुरा,आप भगवान् नारायणके समीप रहनेवाले भक्तोंमें सबसे श्रेष्ठ हैं। परलोकमें आपकी महिमाका सर्वत्र गान होता है। आपने पहले स्वेच्छासे प्रकट होनेवाले सर्वव्यापक ब्रह्मकी उपलब्धिके स्थानभूत हृदयकमलकी कर्णिकाका (योगकी कलासे) अलौकिक उद्घाटन कर वैराग्य और अभ्याससे प्राप्त हुई दिव्य दृष्टिद्वारा विश्वरचयिता भगवान्का अनेक बार साक्षात्कार किया है
वैशम्पायन उवाच— पूर्वं त्वया वैराग्याभ्याससमुद्भूतया दिव्यया दृष्ट्या हृदयकमलस्य कर्णिकोद्धरणं दिव्यं दृष्टम्—यत्र कामरूपिणः सर्वव्यापिनो ब्रह्मणः साक्षात्कारः, रत्नालङ्कारसमन्वितस्य जगत्कारणस्य च। तस्मात् त्वं नारायणसमीपवासिनां भक्तानां मध्ये श्रेष्ठोऽसि; परलोकेषु च तव महिमा सर्वत्र गीयते।
Verse 11
तस्मात् तवान्तको मृत्युर्जरा वा देहनाशिनी । नत्वां विशति विप्रर्षे प्रसादात् परमेछ्चिन:,इसीलिये सबको मारनेवाली मृत्यु तथा शरीरको जर्जर बना देनेवाली जरा आपका स्पर्श नहीं करती है। ब्रह्मर्ष! इसमें भगवान् परमेष्ठीका कृपाप्रसाद ही कारण है
तस्मात् तवान्तको मृत्युर्जरा वा देहनाशिनी । न त्वां विशति विप्रर्षे प्रसादात् परमेṣ्ठिनः ॥
Verse 12
यदा नैवं रविनग्निर्न वायुर्न च चन्द्रमा: । नैवान्तरिक्ष नैवोर्वी शेष भवति किंचन,(महाप्रलयके समय) जब सूर्य, अग्नि, वायु, चन्द्रमा, अन्तरिक्ष और पृथ्वी आदिमेंसे कोई भी शेष नहीं रह जाता, समस्त चराचर जगत् उस एकार्णवके जलमें डूबकर अदृश्य हो जाता है, देवता और असुर नष्ट हो जाते हैं तथा बड़े-बड़े नागोंका संहार हो जाता है, उस समय कमल और उत्पलमें निवास तथा शयन करनेवाले सर्वभूतेश्वर अमितात्मा ब्रह्माजीके पास रहकर केवल आप ही उनकी उपासना करते हैं
यदा नैवं रविर्नाग्निर्न वायुर्न च चन्द्रमा: । नैवान्तरिक्षं नैवोर्वी शेषं भवति किंचन ॥ तदा चराचरं सर्वं एकार्णवजले निमग्नं न दृश्यते; देवासुराश्च नश्यन्ति महोरगाश्च विनश्यन्ति; पद्मोत्पलनिकेतनोऽमितात्मा सर्वभूतेशो ब्रह्मा तिष्ठति, त्वमेव तदा तस्य सन्निधौ स्थित्वा तं पूजयसि ॥
Verse 13
तस्मिन्नेकार्णवे लोके नष्टे स्थावरजड़मे । नष्टे देवासुरगणे समुत्सन्नमहोरगे,(महाप्रलयके समय) जब सूर्य, अग्नि, वायु, चन्द्रमा, अन्तरिक्ष और पृथ्वी आदिमेंसे कोई भी शेष नहीं रह जाता, समस्त चराचर जगत् उस एकार्णवके जलमें डूबकर अदृश्य हो जाता है, देवता और असुर नष्ट हो जाते हैं तथा बड़े-बड़े नागोंका संहार हो जाता है, उस समय कमल और उत्पलमें निवास तथा शयन करनेवाले सर्वभूतेश्वर अमितात्मा ब्रह्माजीके पास रहकर केवल आप ही उनकी उपासना करते हैं
तस्मिन्नेकर्णवे लोके नष्टे स्थावरजङ्गमे । नष्टे देवासुरगणे समुत्सन्नमहोरगे ॥ यदा न रविर्नाग्निर्न वायुर्न च चन्द्रमा: नैवान्तरिक्षं नैवोर्वी शेषं भवति किंचन । तदा सर्वं निमग्नं स्याददृश्यं च चराचरम्; तस्मिन्कालेऽमितात्मा ब्रह्मा तिष्ठति, तस्यैव भक्तिरेवावशिष्यते ॥
Verse 14
शयानममितात्मानं पद्मोत्पलनिकेतनम् | त्वमेक: सर्वभूतेशं ब्रह्माणमुपतिष्ठसि,(महाप्रलयके समय) जब सूर्य, अग्नि, वायु, चन्द्रमा, अन्तरिक्ष और पृथ्वी आदिमेंसे कोई भी शेष नहीं रह जाता, समस्त चराचर जगत् उस एकार्णवके जलमें डूबकर अदृश्य हो जाता है, देवता और असुर नष्ट हो जाते हैं तथा बड़े-बड़े नागोंका संहार हो जाता है, उस समय कमल और उत्पलमें निवास तथा शयन करनेवाले सर्वभूतेश्वर अमितात्मा ब्रह्माजीके पास रहकर केवल आप ही उनकी उपासना करते हैं
शयानममितात्मानं पद्मोत्पलनिकेतनम् । त्वमेकः सर्वभूतेशं ब्रह्माणमुपतिष्ठसि ॥
Verse 15
एतत् प्रत्यक्षत: सर्व पूर्व वृत्तं द्विजोत्तम । तस्मादिच्छाम्यहं श्रोतुं सर्वहेत्वात्मिकां कथाम्,द्विजोत्तम! यह सारा पुरातन इतिहास आपका प्रत्यक्ष देखा हुआ है। इसलिये मैं आपके मुखसे सबके हेतुभूत कालका निरूपण करनेवाली कथा सुनना चाहता हूँ
एतत् प्रत्यक्षतः सर्वं पूर्ववृत्तं द्विजोत्तम । तस्मादिच्छाम्यहं श्रोतुं सर्वहेत्वात्मिकां कथाम् ॥
Verse 16
अनुभूतं हि बहुशस्त्वयैकेन द्विजोत्तम | न ते<स्त्यविदितं किंचित् सर्वलोकेषु नित्यदा,विप्रवर! केवल आपने ही अनेक कल्पोंकी श्रेष्ठ रचनाका बहुत बार अनुभव किया है। सम्पूर्ण लोकोंमें कभी कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जो आपको ज्ञात न हो'
अनुभूतं हि बहुशस्त्वयैकेन द्विजोत्तम । न तेऽस्त्यविदितं किंचित् सर्वलोकेषु नित्यदा ॥
Verse 17
मार्कण्डेय उदाच हन्त ते वर्णयिष्यामि नमस्कृत्वा स्वयम्भुवे । पुरुषाय पुराणाय शाश्वतायाव्ययाय च
मार्कण्डेय उवाच हन्त ते वर्णयिष्यामि नमस्कृत्वा स्वयम्भुवे । पुरुषाय पुराणाय शाश्वतायाव्ययाय च ॥
Verse 18
अव्यक्ताय सुसूक्ष्माय निर्गुणाय गुणात्मने । स एष पुरुषव्याघत्र पीतवासा जनार्दन:
अव्यक्ताय सुसूक्ष्माय निर्गुणाय गुणात्मने । स एष पुरुषव्याघ्र पीतवासा जनार्दनः ॥
Verse 19
एष कर्ता विकर्ता च भूतात्मा भूतकृत् प्रभु: । अचिन्त्यं महदाश्चर्य पवित्रमिति चोच्यते
एष कर्ता विकर्ता च भूतात्मा भूतकृत् प्रभुः । अचिन्त्यं महदाश्चर्यं पवित्रमिति चोच्यते ॥
Verse 20
मार्कण्डेयजी बोले--राजन! मैं स्वयं प्रकट होनेवाले सनातन, अविनाशी, अव्यक्त, सूक्ष्म, निर्गुण एवं गुणस्वरूप पुराणपुरुषको नमस्कार करके तुम्हें वह कथा अभी सुनाता हूँ। पुरुषसिंह! ये जो हमलोगोंके पास बैठे हुए पीताम्बरधारी भगवान् जनार्दन हैं, ये ही संसारकी सृष्टि और संहार करनेवाले हैं। ये ही भगवान् समस्त प्राणियोंके अन्तर्यामी आत्मा और उनके रचयिता हैं। ये पवित्र, अचिन्त्य एवं महान् आश्वर्यमय तत्त्व कहे जाते हैं ।। १७ -7१९ || अनादिनिधनं भूत॑ विश्वमव्ययमक्षयम् | एष कर्ता न क्रियते कारणं चापि पौरुषे,इनका न आदि है, न अन्त। ये सर्वभूतस्वरूप, अव्यय और अक्षय हैं। ये ही सबके कर्ता हैं, इनका कोई कर्ता नहीं है। पुरुषार्थकी प्राप्तिमें भी ये ही कारण हैं
वैशम्पायन उवाच—अनादिनिधनं भूतं विश्वमव्ययमक्षयम्। एष कर्ता न क्रियते, कारणं चापि पौरुषे॥
Verse 21
यद्येष पुरुषो वेद वेदा अपि न त॑ विदुः । सर्वमाश्नर्यमेवैतन्निवृत्तं राजसत्तम
यद्येष पुरुषो वेद वेदा अपि न तं विदुः। सर्वमाश्चर्यमेवैतन्निवृत्तं राजसत्तम॥
Verse 22
चत्वार्याहु: सहस्राणि वर्षाणां तत् कृतं युगम्
चत्वार्याहुः सहस्राणि वर्षाणां तत्कृतं युगम्॥
Verse 23
तस्य तावच्छती संध्या संध्यांशक्ष तथाविध: । चार हजार दिव्य वर्षोका एक सत्ययुग बताया गया है, उतने ही सौ वर्ष उसकी संध्या और संध्यांशके होते हैं (इस प्रकार कुल अड़तालीस सौ दिव्य वर्ष सत्ययुगके हैं) ।। २२३ || त्रीणि वर्षसहस्राणि त्रेतायुगमिहोच्यते
तस्य तावच्छती सन्ध्या सन्ध्यांशश्च तथाविधः। त्रीणि वर्षसहस्राणि त्रेतायुगमिहोच्यते॥
Verse 24
तथा वर्षसहसे द्वे द्वापरं परिमाणत:
तथा वर्षसहस्रे द्वे द्वापरं परिमाणतः॥
Verse 25
सहस्रमेकं वर्षाणां तत: कलियुगं स्मृतम्,तदनन्तर एक हजार दिव्य वर्ष कलियुगका मान कहा गया है, सौ वर्ष उसकी संध्याके और सौ वर्ष संध्यांशके बताये गये हैं (इस प्रकार कलियुग बारह सौ दिव्य वर्षोंका होता है)। संध्या और संध्यांशका मान बराबर-बराबर ही समझो
वैशम्पायन उवाच—ततः कलियुगं स्मृतं सहस्रं दिव्यवर्षाणाम्। तदनन्तरं शतवर्षं संध्या प्रोक्ता, शतवर्षं च संध्यांशः। एवं कलियुगं द्वादशशतं दिव्यवर्षाणि; संध्यासंध्यांशयोः प्रमाणं तुल्यमेवोपधारय।
Verse 26
तस्य वर्षशतं संधि: संध्यांशश्व॒ ततः परम् | संधिसंध्यांशयोस्तुल्यं प्रमाणमुपधारय,तदनन्तर एक हजार दिव्य वर्ष कलियुगका मान कहा गया है, सौ वर्ष उसकी संध्याके और सौ वर्ष संध्यांशके बताये गये हैं (इस प्रकार कलियुग बारह सौ दिव्य वर्षोंका होता है)। संध्या और संध्यांशका मान बराबर-बराबर ही समझो
तस्य संधिः शतवर्षः, संध्यांशश्च ततः परम्। संधिसंध्यांशयोस्तुल्यं प्रमाणमुपधारय॥
Verse 27
क्षीणे कलियुगे चैव प्रवर्तेत कृतं युगम् । एषा द्वादशसाहस्त्री युगाख्या परिकीर्तिता,कलियुगके क्षीण हो जानेपर पुनः सत्ययुगका आरम्भ होता है। इस तरह बारह हजार दिव्य वर्षोकी एक चतुर्युगी बतायी गयी है
क्षीणे कलियुगे चैव प्रवर्तेत कृतं युगम्। एषा द्वादशसाहस्त्री युगाख्या परिकीर्तिता॥
Verse 28
एतत् सहस्रपर्यन्तमहो ब्राह्ममुदाह्नतम् । विश्व हि ब्रह्मभवने सर्वत: परिवर्त्तते
एतत् सहस्रपर्यन्तमहो ब्राह्ममुदाहृतम्। विश्वं हि ब्रह्मभवने सर्वतः परिवर्तते॥
Verse 29
अल्पावशिष्टे तु तदा चुगान्ते भरतर्षभ
अल्पावशिष्टे तु तदा युगान्ते भरतर्षभ।
Verse 30
सहस्रान्ते नरा: सर्वे प्रायशो5नृतवादिन: । यज्ञप्रतिनिधि: पार्थ दानप्रतिनिधिस्तथा
वैशम्पायन उवाच—सहस्रान्ते नराḥ सर्वे प्रायशोऽनृतवादिनः। यज्ञप्रतिनिधिः पार्थ दानप्रतिनिधिस्तथा॥
Verse 31
व्रतप्रतिनिधिश्वैव तस्मिन् काले प्रवर्तते । भरतश्रेष्ठ सहस्र युगकी समाप्तिमें जब थोड़ा-सा ही समय शेष रह जाता है, उस समय कलियुगके अन्तिम भागमें प्राय: सभी मनुष्य मिथ्यावादी हो जाते हैं। पार्थ! उस समय यज्ञ, दान और व्रतके प्रतिनिधि कर्म चालू हो जाते हैं अर्थात् यज्ञ, दान, तप मुख्य विधिसे न होकर गौण विधिसे नाममात्र होने लगते हैं || २९-३० $ ।। ब्राह्मणा: शूद्रकर्माणस्तथा शूद्रा धनार्जका:
व्रतप्रतिनिधिश्चैव तस्मिन् काले प्रवर्तते। ब्राह्मणाḥ शूद्रकर्माणस्तथा शूद्रा धनार्जकाः॥
Verse 32
निवृत्तयज्ञस्वाध्याया दण्डाजिनविवर्जिता:,(सहस्र चतुर्युगके अन्तिम) कलियुगके अन्तिम भागमें ब्राह्मण यज्ञ, स्वाध्याय, दण्ड और मृगचर्मका त्याग कर देंगे और (भनक्ष्याभक्ष्यका विचार छोड़कर) सब कुछ खाने- पीनेवाले हो जायँगे। तात! ब्राह्मण तो जपसे दूर भागेंगे और शूद्र वैदिक मन्त्रोंके जपमें संलग्न होंगे
निवृत्तयज्ञस्वाध्याया दण्डाजिनविवर्जिताः। सर्वभक्षाश्च भविष्यन्ति ब्राह्मणाḥ कलिसंयुगे॥ तात ब्राह्मणा जपाद् दूरं शूद्रा मन्त्रजपोत्सुकाः॥
Verse 33
ब्राह्मणा: सर्वभक्षाश्न॒ भविष्यन्ति कलौ युगे । अजपा ब्राह्मणास्तात शूद्रा जपपरायणा:,(सहस्र चतुर्युगके अन्तिम) कलियुगके अन्तिम भागमें ब्राह्मण यज्ञ, स्वाध्याय, दण्ड और मृगचर्मका त्याग कर देंगे और (भनक्ष्याभक्ष्यका विचार छोड़कर) सब कुछ खाने- पीनेवाले हो जायँगे। तात! ब्राह्मण तो जपसे दूर भागेंगे और शूद्र वैदिक मन्त्रोंके जपमें संलग्न होंगे
ब्राह्मणाḥ सर्वभक्षाश्च भविष्यन्ति कलौ युगे। अजपा ब्राह्मणास्तात शूद्रा जपपरायणाः॥
Verse 34
विपरीते तदा लोके पूर्वरूपं क्षयस्य तत् । बहवो म्लेच्छराजान: पृथिव्यां मनुजाधिप,नरेश्वर! इस प्रकार जब लोगोंके विचार और व्यवहार विपरीत हो जाते हैं, तब प्रलयका पूर्वरूप आरम्भ हो जाता है। उस समय इस पृथ्वीपर बहुत-से म्लेच्छ राजा राज्य करने लगते हैं
विपरीते तदा लोके पूर्वरूपं क्षयस्य तत्। बहवो म्लेच्छराजानः पृथिव्यां मनुजाधिप॥
Verse 35
मृषानुशासिन: पापा मृषावादपरायणा: । आन्ध्रा: शका: पुलिन्दाश्न यवनाश्न नराधिपा:,छलसे शासन करनेवाले, पापी और असत्यवादी आन्ध्र, शक, पुलिन्द, यवन, काम्बोज, बाह्लीक तथा शौर्यसम्पन्न आभीर इस देशके राजा होंगे। नरश्रेष्ठी उस समय कोई ब्राह्मण अपने धर्मके अनुसार जीविका चलानेवाला न होगा
वैशम्पायन उवाच—मृषानुशासिनः पापाः मृषावादपरायणाः। आन्ध्राः शकाः पुलिन्दाश्च यवनाश्च नराधिपाः॥
Verse 36
काम्बोजा बाह्लिका: शूरास्तथा5<5भीरा नरोत्तम | न तदा ब्राह्मण: कश्रनित् स्वधर्ममुपजीवति,छलसे शासन करनेवाले, पापी और असत्यवादी आन्ध्र, शक, पुलिन्द, यवन, काम्बोज, बाह्लीक तथा शौर्यसम्पन्न आभीर इस देशके राजा होंगे। नरश्रेष्ठी उस समय कोई ब्राह्मण अपने धर्मके अनुसार जीविका चलानेवाला न होगा
काम्बोजा बाह्लिकाः शूरास्तथाभीराः नरोत्तम। न तदा ब्राह्मणः कश्चित् स्वधर्ममुपजीवति॥
Verse 37
क्षत्रियाश्षापि वैश्याश्ष विकर्मस्था नराधिप । अल्पायुष: स्वल्पबला: स्वल्पवीर्यपराक्रमा:,नरेश्वर! क्षत्रिय और वैश्य भी अपना-अपना धर्म छोड़कर दूसरे वर्णोके कर्म करने लगेंगे। सबकी आयु कम होगी, सबके बल, वीर्य और पराक्रम घट जायँगे
क्षत्रियाश्चापि वैश्याश्च विकर्मस्था नराधिप। अल्पायुषः स्वल्पबलाः स्वल्पवीर्यपराक्रमाः॥
Verse 38
अल्पसाराल्पदेहाश्व॒ तथा सत्याल्पभाषिण: । बहुशून्या जनपदा मृगव्यालावृता दिश:,मनुष्य नाटे कदके होंगे। उनकी शरीरिक शक्ति बहुत कम हो जायगी और उनकी बातोंमें सत्यका अंश बहुत कम होगा। बहुधा सारे जनपद जनशून्य होंगे। सम्पूर्ण दिशाएँ पशुओं और सर्पोसे भरी होंगी। युगान्तकाल उपस्थित होनेपर अधिकांश मनुष्य (अनुभव न होते हुए भी) वृथा ही ब्रह्मज्ञानकी बातें कहेंगे। शूद्र द्विजातियोंको भो (ऐ) कहकर पुकारेंगे और ब्राह्मणलोग शूट्रोंको आर्य अर्थात् आप कहकर सम्बोधन करेंगे
अल्पसाराल्पदेहाश्च तथा सत्याल्पभाषिणः। बहुशून्या जनपदा मृगव्यालावृता दिशः॥
Verse 39
युगान्ते समनुप्राप्ते वृथा च ब्रह्मवादिन: । भोवादिनस्तथा शाद्रा ब्राह्मणाश्चार्यवादिन:,मनुष्य नाटे कदके होंगे। उनकी शरीरिक शक्ति बहुत कम हो जायगी और उनकी बातोंमें सत्यका अंश बहुत कम होगा। बहुधा सारे जनपद जनशून्य होंगे। सम्पूर्ण दिशाएँ पशुओं और सर्पोसे भरी होंगी। युगान्तकाल उपस्थित होनेपर अधिकांश मनुष्य (अनुभव न होते हुए भी) वृथा ही ब्रह्मज्ञानकी बातें कहेंगे। शूद्र द्विजातियोंको भो (ऐ) कहकर पुकारेंगे और ब्राह्मणलोग शूट्रोंको आर्य अर्थात् आप कहकर सम्बोधन करेंगे
युगान्ते समनुप्राप्ते वृथा च ब्रह्मवादिनः। भोवादिनस्तथा शूद्रा ब्राह्मणाश्चार्यवादिनः॥
Verse 40
युगान्ते मनुजव्याप्र भवन्ति बहुजन्तवः । न तथा घ्राणयुक्ताश्न सर्वगन्धा विशाम्पते,पुरुषसिंह राजन! युगान्तकालमें बहुतसे जीव-जन्तु उत्पन्न हो जायँगे। सब प्रकारके सुगन्धित पदार्थ नासिकाको उतने गन्धयुक्त नहीं प्रतीत होंगे
वैशम्पायन उवाच— युगान्ते मनुजव्याघ्र भवन्ति बहुजन्तवः । न तथा घ्राणयुक्ताश्च सर्वगन्धान् विशाम्पते ॥ पुरुषसिंह राजेन्द्र! तदा सर्वे गन्धा न स्वस्वरूपेण प्रतीयन्ते, तेजोहीना इव भवन्ति ।
Verse 41
रसाश्च मनुजव्यात्र न तथा स्वादुयोगिन: । बहुप्रजा हस्वदेहा: शीलाचारविवर्जिता: । मुखे भगा: स्त्रियो राजन् भविष्यन्ति युगक्षये,नरव्याप्र! इसी प्रकार रसीले पदार्थभी जैसे चाहिये वैसे स्वादिष्ट नहीं होंगे। राजन्! उस समयकी स्त्रियाँ नाटे कदकी और बहुत संतान (बच्चा) पैदा करनेवाली होंगी। उनमें शील और सदाचारका अभाव होगा। युगान्तकालमें स्त्रियाँ मुखसे भगसम्बन्धी यानी व्यभिचारकी ही बातें करनेवाली होंगी। राजन! युगान्त-कालमें हर देशके लोग अन्न बेचनेवाले होंगे। ब्राह्मण वेद बेचनेवाले तथा (प्रायः) स्त्रियाँ वेश्यावृत्तिको अपनानेवाली होंगी-
वैशम्पायन उवाच— रसाश्च मनुजव्याघ्र न तथा स्वादुयोगिनः । बहुप्रजा ह्रस्वदेहाः शीलाचारविवर्जिताः । मुखे भगा: स्त्रियो राजन् भविष्यन्ति युगक्षये ॥ तदा स्त्रियोऽपि मैथुनकथापरायणाः स्युः ।
Verse 42
अट्टशूला जनपदा: शिवशूलाश्षतुष्पथा: । केशशूला: स्त्रियो राजन् भविष्यन्ति युगक्षये,नरव्याप्र! इसी प्रकार रसीले पदार्थभी जैसे चाहिये वैसे स्वादिष्ट नहीं होंगे। राजन्! उस समयकी स्त्रियाँ नाटे कदकी और बहुत संतान (बच्चा) पैदा करनेवाली होंगी। उनमें शील और सदाचारका अभाव होगा। युगान्तकालमें स्त्रियाँ मुखसे भगसम्बन्धी यानी व्यभिचारकी ही बातें करनेवाली होंगी। राजन! युगान्त-कालमें हर देशके लोग अन्न बेचनेवाले होंगे। ब्राह्मण वेद बेचनेवाले तथा (प्रायः) स्त्रियाँ वेश्यावृत्तिको अपनानेवाली होंगी-
वैशम्पायन उवाच— अट्टशूला जनपदाः शिवशूलाश्चतुष्पथाः । केशशूला: स्त्रियो राजन् भविष्यन्ति युगक्षये ॥ एतानि दुःखलक्षणानि युगान्ते प्रादुर्भवन्ति ।
Verse 43
अल्पक्षीरास्तथा गावो भविष्यन्ति जनाधिप । अल्पपुष्पफलाश्चापि पादपा बहुवायसा:,जनेश्वर! युगान्तकालमें गायोंके थनोंमें बहुत कम दूध होगा। वृक्षपर फल और फूल बहुत कम होंगे और उनपर (अच्छे पक्षियोंकी अपेक्षा) कौए ही अधिक बसेरे लेंगे। भूपाल! ब्राह्मणगलोग (लोभवश) ब्रह्महत्या-जैसे पापोंसे लिप्त और मिथ्यावादी नरेशोंसे ही दान- दक्षिणा लेंगे
वैशम्पायन उवाच— अल्पक्षीरास्तथा गावो भविष्यन्ति जनाधिप । अल्पपुष्पफलाश्चापि पादपा बहुवायसाः ॥ तदा श्रीशौचयोः क्षयः, अशुभस्य च प्राबल्यं दृश्यते ।
Verse 44
ब्रह्मवध्यानुलिप्तानां तथा मिथ्याभिशंसिनाम् । नृपाणां पृथिवीपाल प्रतिगृह्नन्ति वै द्विजा:,जनेश्वर! युगान्तकालमें गायोंके थनोंमें बहुत कम दूध होगा। वृक्षपर फल और फूल बहुत कम होंगे और उनपर (अच्छे पक्षियोंकी अपेक्षा) कौए ही अधिक बसेरे लेंगे। भूपाल! ब्राह्मणगलोग (लोभवश) ब्रह्महत्या-जैसे पापोंसे लिप्त और मिथ्यावादी नरेशोंसे ही दान- दक्षिणा लेंगे
वैशम्पायन उवाच— ब्रह्मवध्यानुलिप्तानां तथा मिथ्याभिशंसिनाम् । नृपाणां पृथिवीपाल प्रतिगृह्णन्ति वै द्विजाः ॥ एष धर्मक्षयस्य लक्षणं, यत् लोभवशाद् धर्मधारिणोऽपि पतन्ति ।
Verse 45
लोभमोहपरीताश्च मिथ्याधर्मध्वजावृता: । भिक्षार्थ पृथिवीपाल चज्चूर्यन्ते द्विजैर्दिश:,राजन! वे ब्राह्मण लोभ और मोहमें फँसकर झूठे धर्मका ढोंग रचनेवाले होंगे, इतना ही नहीं, वे भिक्षाके लिये सारी दिशाओंके लोगोंको पीड़ित करते रहेंगे
वैशम्पायन उवाच—राजन्, लोभमोहपरीताश्च मिथ्याधर्मध्वजावृताः। भिक्षार्थं पृथिवीपाल दिशः सर्वाश्च पीडयिष्यन्ति द्विजाः॥
Verse 46
करभारभयाद् भीता गृहस्था: परिमोषका: | मुनिच्छञाकृतिच्छन्ना वाणिज्यमुपजीविन:
करभारभयाद्भीताः गृहस्थाः परिमोषकाः। मुनिच्छद्माकृतिच्छन्ना वाणिज्यमुपजीविनः॥
Verse 47
अर्थलोभान्नरव्याप्र तथा च ब्रह्म॒चारिण:
अर्थलोभान्नरव्यग्रास्तथा च ब्रह्मचारिणः।
Verse 48
आश्रमेषु वृथाचारा: पानपा गुरुतल्पगा: । इह लौकिकमीहन्ते मांसशोणितवर्धनम्
आश्रमेषु वृथाचाराः पानपाः गुरुतल्पगाः। इह लौकिकमीहन्ते मांसशोणितवर्धनम्॥
Verse 49
नरश्रेष्ठल धनके लोभसे ब्रह्मचारी भी आश्रमोंमें दम्भपूर्ण आचारको अपनायेंगे और मद्यपान करके गुरुपत्नीगमन करेंगे। लोग अपने शरीरके मांस और रक्त बढ़ानेवाले इहलौकिक कर्मांमें ही लगे रहेंगे ।। बहुपाषण्डसंकीर्णा: परान्नगुणवादिन: । आश्रमा मनुजव्यात्र भविष्यन्ति युगक्षये,नरश्रेष्ठ) युगान्तकालमें सभी आश्रम अनेक प्रकारके पाखण्डोंसे व्याप्त और दूसरोंसे मिले हुए भोजनका ही गुणगान करनेवाले होंगे
बहुपाषण्डसंकीर्णाः परान्नगुणवादिनः। आश्रमाः मनुजव्याघ्र भविष्यन्ति युगक्षये॥
Verse 50
यर्थर्तुवर्षी भगवान् न तथा पाकशासन: । न चापि सर्वबीजानि सम्यगू रोहन्ति भारत,भगवान् इन्द्र भी ठीक वर्षाऋतुके समय जलकी वर्षा नहीं करेंगे। भारत! भूमिमें बोये हुए सभी बीज ठीकसे नहीं जमेंगे
यथर्तुवर्षी भगवान् न तथा पाकशासनः। न चापि सर्वबीजानि सम्यग् रोहन्ति भारत॥
Verse 51
हिंसाभिरामश्न जनस्तथा सम्पद्यते5शुचि: । अधर्मफलमत्यर्थ तदा भवति चानघ,कलियुगमें सब लोग हिंसामें ही सुख माननेवाले तथा अपवित्र रहेंगे। निष्पाप! उस समय अधर्मका फल बहुत अधिक मात्रामें मिलेगा
हिंसाभिरामश्च जनस्तथा सम्पद्यतेऽशुचिः। अधर्मफलमत्यर्थं तदा भवति चानघ॥
Verse 52
तदा च पृथिवीपाल यो भवेद् धर्मसंयुतः । अल्पायु: स हि मन्तव्यो न हि धर्मो5स्ति कश्नन,भूपाल! उस समय जो भी धर्ममें तत्पर रहेगा, उसकी आयु बहुत थोड़ी देखनेमें आयेगी; क्योंकि उस समय कोई भी धर्म टिक नहीं सकेगा
तदा च पृथिवीपालो यो भवेद् धर्मसंयुतः। अल्पायुः स हि मन्तव्यो न हि धर्मोऽस्ति कश्चन॥
Verse 53
भूयिष्ठं कूटमानैश्व पण्यं विक्रीणते जना: । वणिजकश्न नरव्यात्र बहुमाया भवन्त्युत,लोग बाजारमें झूठे माप-तौल बनाकर बहुत-सा माल बेचते रहेंगे। नरश्रेष्ठीी उस समयके बनिये भी बहुत माया जाननेवाले (धूर्त) होंगे
भूयिष्ठं कूटमानैश्च पण्यं विक्रीणते जनाः। वणिजश्च नरव्याघ्र बहुमाया भवन्त्युत॥
Verse 54
धर्मिष्ठा: परिहीयन्ते पापीयान् वर्धते जन: । धर्मस्य बलहानि: स्यादधर्मश्ष बली तथा,धर्मात्मा पुरुष हानि उठाते दीखेंगे और बड़े-बड़े पापी लौकिक दृष्टिसे उन्नतिशील होंगे। धर्मका बल घटेगा और अधर्म बलवान् होगा
धर्मिष्ठाः परिहीयन्ते पापीयान् वर्धते जनः। धर्मस्य बलहानिः स्यादधर्मश्च बली तथा॥
Verse 55
अल्पायुषो दरिद्राश्न॒ धर्मिष्ठा मानवास्तथा । दीर्घायुष: समृद्धाश्व विधर्माणो युगक्षये,युगान्तकालमें धर्मिष्ठ मानव अल्पायु तथा दरिद्र देखे जायँगे और अधर्मी मनुष्य दीर्घायु तथा समृद्धिशाली देखे जायँगे
वैशम्पायन उवाच—युगक्षये धर्मिष्ठा अपि मानवाः अल्पायुषो दरिद्राश्च दृश्यन्ते; विधर्माणस्तु दीर्घायुषः समृद्धाश्च दृश्यन्ते।
Verse 56
नगराणां विहारेषु विधर्माणो युगक्षये । अधर्मिष्ठिरुपायैश्व प्रजा व्यवहरन्त्युत,युगान्तके समय नगरोंके उद्यानोंमें पापी पुरुष अड्डा जमायेंगे और पापपूर्ण उपायोंद्वारा प्रजाके साथ दुर्व्यवहार करेंगे
वैशम्पायन उवाच—युगक्षये नगराणां विहारेषु विधर्माणो जनाः समागम्य वासं करिष्यन्ति; अधर्मिष्ठैरुपायैश्च प्रजाः प्रति व्यवहरन्ति।
Verse 57
संचयेन तथाल्पेन भवन्त्याब्यमदान्विता: । धनं विश्वासतो न्यस्तं मिथो भूयिष्ठशो नरा:,राजन! थोड़ेसे धनका संग्रह हो जानेपर लोग धनाढ्यताके मदसे उन्मत्त हो उठेंगे। यदि किसीने विश्वास करके अपने धनको धरोहरके रूपमें रख दिया तो अधिकांश पापाचारी और निर्लज मनुष्य उस धरोहरको हड़प लेनेकी चेष्टा करेंगे और उससे साफ कह देंगे कि हमारे यहाँ तुम्हारा कुछ भी नहीं है
वैशम्पायन उवाच—राजन्, अल्पेनापि धनसञ्चयेन नराः समृद्धिमदेन उन्मत्ताः भवन्ति। विश्वासतो न्यस्तं धनं निक्षेपं कृत्वा, बहवो नराः परस्परं तदपहरितुं यतन्ते, निर्लज्जा वदन्ति च—‘अत्र ते किञ्चिदपि नास्ति’ इति।
Verse 58
हर्तु व्यवसिता राजन् पापाचारसमन्विता: । नैतदस्तीति मनुजा वर्तन्ते निरपत्रपा:,राजन! थोड़ेसे धनका संग्रह हो जानेपर लोग धनाढ्यताके मदसे उन्मत्त हो उठेंगे। यदि किसीने विश्वास करके अपने धनको धरोहरके रूपमें रख दिया तो अधिकांश पापाचारी और निर्लज मनुष्य उस धरोहरको हड़प लेनेकी चेष्टा करेंगे और उससे साफ कह देंगे कि हमारे यहाँ तुम्हारा कुछ भी नहीं है
वैशम्पायन उवाच—राजन्, हर्तुं व्यवसिताः पापाचारसमन्विताः मनुजाः निरपत्रपाः सन्तो वदन्ति—‘नैतदस्ति’ इति।
Verse 59
पुरुषादानि सत्त्वानि पक्षिणो5थ मृगास्तथा । नगराणां विहारेषु चैत्येष्वपि च शेरते,मनुष्यका मांस खानेवाले हिंसक जीव तथा पशु-पक्षी नागरिकोंके बगीचों और देवालयोंमें भी शयन करेंगे
वैशम्पायन उवाच—पुरुषादानि सत्त्वानि पक्षिणोऽथ मृगास्तथा नगराणां विहारेषु चैत्येष्वपि च शेरते।
Verse 60
सप्तवर्षष्टवर्षाश्च स्त्रियों गर्भधरा नूप । दशद्वादशवर्षाणां पुंसां पुत्र: प्रजायते,राजन! युगान्तकालमें सात-आठ वर्षकी स्त्रियाँ गर्भ धारण करेंगी और दस-बारह वर्षकी अवस्थावाले पुरुषोंके भी पुत्र होंगे
वैशम्पायन उवाच—राजन्, युगान्तकाले तस्मिन् सप्तवर्षाष्टवर्षाश्च कन्याः गर्भधरा भविष्यन्ति; दशद्वादशवर्षाणां च पुंसां पुत्राः प्रजायेरन्।
Verse 61
भवन्ति षोडशे वर्षे नरा: पलितिनस्तथा । आयु:क्षयो मनुष्याणां क्षिप्रमेव प्रपद्यते,सोलहवें वर्षमें मनुष्योंक बाल पक जायँगे और उनकी आयु शीघ्र ही समाप्त हो जायगी
वैशम्पायन उवाच—षोडशे वर्षे नरा अपि पलितिनो भविष्यन्ति; मनुष्याणामायु:क्षयः क्षिप्रमेव प्रपद्यते।
Verse 62
क्षीणायुषो महाराज तरुणा वृद्धशीलिन: । तरुणानां च यच्छीलं तद् वृद्धेषु प्रजायते,महाराज! उस समयके तरुणोंकी आयु क्षीण होगी और उनका शील-स्वभाव बूढ़ोंका- सा हो जायगा और तरुणोंका जो शील-स्वभाव होना चाहिये, वह बूढ़ोंमें प्रकट होगा
वैशम्पायन उवाच—महाराज, तदा तरुणाः क्षीणायुषो भविष्यन्ति वृद्धशीलिनश्च; तरुणानां यच्छीलं तद् वृद्धेषु प्रजायते।
Verse 63
विपरीतास्तदा नार्यो वज्चयित्वारहत: पतीन् | व्युच्चरन्त्यपि दुःशीला दासै: पशुभिरेव च,उस समयकी विपरीत स्वभाववाली स्त्रियाँ अपने योग्य पतियोंको भी धोखा देकर बुरे शील-स्वभावकी हो जायँगी और सेवकों तथा पशुओंके साथ भी व्यभिचार करेंगी
वैशम्पायन उवाच—तदा नार्यः विपरीताः स्वभावेन, अर्हतः पतीन् वञ्चयित्वा, दुःशीलाः सन्तो दासैः पशुभिरेव च व्युच्चरन्त्यपि।
Verse 64
वीरपत्न्यस्तथा नार्य: संश्रयन्ति नरान् नृप । भर्तारमपि जीवन्तमन्यान् व्यभिचरन्त्युत,राजन! वीर पुरुषोंकी पत्नियाँ भी परपुरुषोंका आश्रय लेंगी और पतिके जीते हुए भी दूसरोंसे व्यभिचार करेंगी
वैशम्पायन उवाच—नृप, वीरपत्न्यस्तथा नार्यः परान् नरान् संश्रयन्ति; भर्तरि जीवन्ति सति, अन्यान् व्यभिचरन्त्युत।
Verse 65
तस्मिन् युगसहस्रान्ते सम्प्राप्ते चायुष: क्षये । अनावृष्टिर्महाराज जायते बहुवार्षिकी,महाराज! इस प्रकार आयुको क्षीण करनेवाले सहस्र युगोंके अन्तिम भागकी समाप्ति होनेपर बहुत वर्षोतक वृष्टि बंद हो जाती है
तस्मिन् युगसहस्रान्ते सम्प्राप्ते चायुषः क्षये । अनावृष्टिर्महाराज जायते बहुवार्षिकी ॥
Verse 66
ततस्तान्यल्पसाराणि सत्त्वानि क्षुधितानि वै । प्रलयं यान्ति भूयिष्ठं पृथिव्यां पृथिवीपते,पृथ्वीपते! इससे भूतलके थोड़ी शक्तिवाले अधिकांश प्राणी भूखसे व्याकुल होकर मर जाते हैं
ततस्तान्यल्पसाराणि सत्त्वानि क्षुधितानि वै । प्रलयं यान्ति भूयिष्ठं पृथिव्यां पृथिवीपते ॥
Verse 67
ततो दिनकरेदीप्तै: सप्तभिर्मनुजाधिप । पीयते सलिल ॑ सर्व समुद्रेषु सरित्सु च,नरेश्वर! तदनन्तर प्रचण्ड तेजवाले सात सूर्य उदित होकर सरिताओं और समुद्रोंका सारा जल सोख लेते हैं
ततो दिनकरेदीप्तैः सप्तभिर्मनुजाधिप । पीयते सलिलं सर्वं समुद्रेषु सरित्सु च ॥
Verse 68
यच्च काष्ठ॑ तृणं चापि शुष्कं चार्द्र च भारत । सर्व तद् भस्मसाद् भूत॑ दृश्यते भरतर्षभ,भरतकुलभूषण! उस समय जो भी तृण-काष्ठ अथवा सूखे-गीले पदार्थ होते हैं, वे सभी भस्मीभूत दिखायी देने लगते हैं
यच्च काष्ठं तृणं चापि शुष्कं चार्द्रं च भारत । सर्वं तद् भस्मसाद् भूतं दृश्यते भरतर्षभ ॥
Verse 69
तत: संवर्तको वह्निवायुना सह भारत | लोकमाविशते पूर्वमादित्यैरुपशोषितम्,भारत! इसके बाद '“संवर्तक” नामकी प्रलयकालीन अग्नि वायुके साथ उन सम्पूर्ण लोकोंमें फैल जाती है, जहाँका जल पहले सात सूर्योंद्वारा सोख लिया गया है
ततः संवर्तको वह्निर्वायुना सह भारत । लोकमाविशते पूर्वमादित्यैरुपशोषितम् ॥
Verse 70
ततः स पृथिवीं भिनत्त्वा प्रविश्य च रसातलम् । देवदानवयक्षाणां भयं जनयते महत्,तत्पश्चात् पृथ्वीका भेदन कर वह अग्नि रसातलतक पहुँच जाती है तथा देवता, दानव और यक्षोंके लिये महान् भय उपस्थित कर देती है
ततः स पृथिवीं भित्त्वा प्रविश्य च रसातलम् । देवदानवयक्षाणां भयं जनयते महत् ॥
Verse 71
निर्दहन् नागलोकं च यच्च किज्चित् क्षिताविह । अधस्तात् पृथिवीपाल सर्व नाशयते क्षणात्,राजन्! वह नागलोकको जलाती हुई इस पृथ्वीके नीचे जो कुछ भी है, उस सबको क्षणभरमें नष्ट कर देती है
निर्दहन् नागलोकं च यच्च किञ्चित् क्षिताविह । अधस्तात् पृथिवीपाल सर्वं नाशयते क्षणात् ॥
Verse 72
ततो योजनविंशानां सहस्राणि शतानि च । निर्दहत्यशिवो वायु: स च संवर्तकोडनल:,इसके बाद वह अमंगलकारी प्रचण्ड वायु और वह संवर्तक अग्नि बाईस हजार योजन तकके लोगोंको भस्म कर डालती है
ततो योजनविंशानां सहस्राणि शतानि च । निर्दहत्यशिवो वायुः स च संवर्तकोऽनलः ॥
Verse 73
सदेवासुरगन्धर्व सयक्षोरगराक्षसम् । ततो दहति दीप्त: स सर्वमेव जगद् विभु:,इस प्रकार सर्वत्र फैली हुई वह प्रज्वलित अग्नि देवता, असुर, गन्धर्व, यक्ष, नाग तथा राक्षसोंसहित सम्पूर्ण विश्वको भस्म कर डालती है
सदेवासुरगन्धर्वसयक्षोरगराक्षसम् । ततो दहति दीप्तः स सर्वमेव जगद् विभुः ॥
Verse 74
ततो गजकुलप्रख्यास्तडिन्मालाविभूषिता: । उत्तिष्ठन्ति महामेघा नभस्यद्भुतदर्शना:,इसके बाद आकाशमें महान् मेघोंकी घोर घटा घिर आती है, जो अद्भुत दिखायी देता है। उनमेंसे प्रत्येक मेघ-समूह हाथियोंके झुंडकी भाँति विशालकाय और श्यामवर्ण तथा बिजलीकी मालाओंसे विभूषित होता है
ततो गजकुलप्रख्यास्तडिन्मालाविभूषिताः । उत्तिष्ठन्ति महामेघा नभस्यद्भुतदर्शनाः ॥
Verse 75
केचिन्नीलोत्पलश्यामा: केचित् कुमुदसंनि भा: । केचित् किज्जल्कसंकाशा: केचित् पीता: पयोधरा:,कुछ बादल नील कमलक समान श्याम और कुछ कुमुद-कुसुमके समान सफेद होते हैं। कुछ जलधरोंकी कान्ति केसरोंके समान दिखायी देती है। कुछ मेघ हल्दीके सदृश पीले और कुछ कारण्डव पक्षीके समान दृष्टिगोचर होते हैं। कोई-कोई कमलदलके समान और कुछ हिंगुल-जैसे जान पड़ते हैं
वैशम्पायन उवाच—केचिन्नीलोत्पलश्यामाḥ केचित्कुमुदसन्निभाḥ। केचित्किञ्जल्कसंकाशाḥ केचित्पीताः पयोधराः॥
Verse 76
केचिद्धारिद्रसंकाशा: कारण्डवनिभास्तथा । केचित् कमलपत्राभा: केचिद्धिड्डुलसप्रभा:,कुछ बादल नील कमलक समान श्याम और कुछ कुमुद-कुसुमके समान सफेद होते हैं। कुछ जलधरोंकी कान्ति केसरोंके समान दिखायी देती है। कुछ मेघ हल्दीके सदृश पीले और कुछ कारण्डव पक्षीके समान दृष्टिगोचर होते हैं। कोई-कोई कमलदलके समान और कुछ हिंगुल-जैसे जान पड़ते हैं
केचिद्धारिद्रसंकाशाः कारण्डवनिभास्तथा। केचित्कमलपत्राभाः केचिद्धिङ्गुलसप्रभाः॥
Verse 77
केचित् पुरवराकारा: केचिद् गजकुलोपमा: । केचिदञ्जनसंकाशा: केचिन्मकरसंनिभा:,कुछ श्रेष्ठ नगरोंके समान, कुछ हाथियोंके झुंड-जैसे, कुछ काजलके रंगवाले और कुछ मगरोंकी-सी आकृतिवाले होते हैं
केचित्पुरवराकाराः केचिद्गजकुलोपमाः। केचिदञ्जनसंकाशाः केचिन्मकरसन्निभाः॥
Verse 78
विद्युन्मालापिनद्धाड: समुत्तिष्ठन्ति वै घना: । घोररूपा महाराज घोरस्वननिनादिता: । ततो जलधरा: सर्वे व्याप्रुवन्ति नभस्तलम्,वे सभी बादल विद्युन्मालाओंसे अलंकृत होकर घिर आते हैं। महाराज! भयंकर गर्जना करनेके कारण उनका स्वरूप बड़ा भयानक जान पढ़ता है। धीरे-धीरे वे सभी जलधर समूचे आकाशमण्डलको ढक लेते हैं
विद्युन्मालापिनद्धाः समुत्तिष्ठन्ति वै घनाः। घोररूपा महाराज घोरस्वननिनादिताः। ततो जलधराः सर्वे व्याप्रुवन्ति नभस्तलम्॥
Verse 79
तैरियं पृथिवी सर्वा सपर्वतवनाकरा । आपूर्यते महाराज सलिलौघपरिप्लुता,महाराज! उनके वर्षा करनेपर पर्वत, वन और खानोंसहित यह सारी पृथ्वी अगाध जलराशिमें ड्ूबकर सब ओरसे भर जाती है
तैरियं पृथिवी सर्वा सपर्वतवनाकरा। आपूर्यते महाराज सलिलौघपरिप्लुता॥
Verse 80
ततस्ते जलदा घोरा राविण: पुरुषर्षभ । सर्वतः प्लावयन्त्याशु चोदिता: परमेछ्िना,पुरुषरत्न! तदनन्तर विधातासे प्रेरित हो गर्जन-तर्जन करनेवाले वे भयंकर मेघ शीघ्र सब ओर वर्षा करके सबको जलसे आप्लावित कर देते हैं
ततस्ते जलदा घोरा राविणः पुरुषर्षभ । सर्वतः प्लावयन्त्याशु चोदिताः परमेच्छिना ॥
Verse 81
वर्षमाणा महत् तोयं पूरयन्तो वसुंधराम् । सुघोरमशिवं रौद्रं नाशयन्ति च पावकम्,महान् जल-समूहकी वर्षा करके वसुन्धराको जलमें डुबोनेवाले वे समस्त मेघ उस अत्यन्त घोर, अमंगलकारी और भयानक अग्निको बुझा देते हैं
वर्षमाणा महत्तोयं पूरयन्तो वसुन्धराम् । सुघोरमशिवं रौद्रं नाशयन्ति च पावकम् ॥
Verse 82
ततो द्वादशवर्षाणि पयोदास्त उपप्लवे । धाराभि: पूरयन्तो वै चोद्यमाना महात्मना,तदनन्तर प्रलयकालके वे पयोधर महात्मा ब्रह्माजीकी प्रेरणा पाकर पृथ्वीको परिपूर्ण करनेके लिये बारह वर्षोतक धारावाहिक वृष्टि करते हैं
ततो द्वादशवर्षाणि पयोदास्त उपप्लवे । धाराभिः पूरयन्तो वै चोद्यमाना महात्मना ॥
Verse 83
ततः समुद्र: स्वां वेलामतिक्रामति भारत । पर्वताश्च विदीर्यन्ते मही चाप्सु निमज्जति,भारत! तदनन्तर समुद्र अपनी सीमाको लाँघ जाता है, पर्वत फट जाते और पृथ्वी पानीमें डूब जाती है
ततः समुद्रः स्वां वेलामतिक्रामति भारत । पर्वताश्च विदीर्यन्ते मही चाप्सु निमज्जति ॥
Verse 84
सर्वतः सहसा भ्रान्तास्ते पयोदा नभस्तलम् । संवेष्टयित्वा नश्यन्ति वायुवेगपराहता:,तत्पश्चात् समस्त आकाशको घेरकर सब ओर फैले हुए वे मेघ वायुके प्रचण्ड वेगसे छिन्न-भिन्न होकर सहसा अदृश्य हो जाते हैं
सर्वतः सहसा भ्रान्तास्ते पयोदा नभस्तलम् । संवेष्टयित्वा नश्यन्ति वायुवेगपराहताः ॥
Verse 85
ततस्तं मारुतं घोरं स्वयम्भूमनुजाधिप । आदि: पद्मालयो देव: पीत्वा स्वपिति भारत,नरेश्वरर इसके बाद कमलमें निवास करनेवाले आदिदेव स्वयं ब्रह्माजी उस भयंकर वायुको पीकर सो जाते हैं
ततः स मारुतो घोरो नराधिप स्वयम्भुवा । आदिदेवेन पद्मालयेन पीतः सुषुपे ततः ॥
Verse 86
तस्मिन्नेकार्णवे घोरे नष्टे स्थावरजड्रमे । नष्टे देवासुरगणे यक्षराक्षसवर्जिते,इस प्रकार चराचर प्राणियों, देवताओं तथा असुर आदिके नष्ट हो जानेपर यक्ष, राक्षस, मनुष्य, हिंसक जीव, वृक्ष तथा अन्तरिक्षसे शून्य उस घोर एकार्णवमय जगतमें मैं अकेला ही इधर-उधर मारा-मारा फिरता हूँ
तस्मिन्नेकर्णवे घोरे नष्टे स्थावरजङ्गमे । नष्टे देवासुरगणे यक्षराक्षसवर्जिते ॥
Verse 87
निर्मनुष्ये महीपाल निःश्वापदमहीरुहे । अनन्तरिक्षे लोके5स्मिन् भ्रमाम्पेकोडहमाहत:,इस प्रकार चराचर प्राणियों, देवताओं तथा असुर आदिके नष्ट हो जानेपर यक्ष, राक्षस, मनुष्य, हिंसक जीव, वृक्ष तथा अन्तरिक्षसे शून्य उस घोर एकार्णवमय जगतमें मैं अकेला ही इधर-उधर मारा-मारा फिरता हूँ
निर्मनुष्ये महीपाल निःश्वापदमहीरुहे । अनन्तरिक्षे लोकेऽस्मिन् भ्रमाम्येकोऽहमाहतः ॥
Verse 88
एकार्णवे जले घोरे विचरन् पार्थिवोत्तम | अपश्यन् सर्वभूतानि वैक्लव्यमगमं तत:,नृपश्रेष्ठी एकार्णवके उस भयंकर जलमें विचरते हुए जब मैंने किसी भी प्राणीको नहीं देखा, तब मुझे बड़ी व्याकुलता हुई
एकार्णवे जले घोरे विचरन् पार्थिवोत्तम । अपश्यन् सर्वभूतानि वैक्लव्यमगमं ततः ॥
Verse 89
ततः सुदीर्घ गत्वाहं प्लवमानो नराधिप । श्रान्त: क्वचिन्न शरणं लभाम्यहमतन्द्रित:,नरेश्वरर उस समय आलस्यशून्य होकर सुदीर्घकाल-तक तैरता हुआ मैं दूर जाकर बहुत थक गया। परंतु कहीं भी मुझे कोई आश्रय नहीं मिला
ततः सुदीर्घं गत्वाहं प्लवमानो नराधिप । श्रान्तः क्वचिन्न शरणं लभाम्यहममतन्द्रितः ॥
Verse 90
ततः कदाचित् पश्यामि तस्मिन् सलिलसंचये । न्यग्रोधं सुमहान्तं वै विशालं पृथिवीपते,राजन्! तदनन्तर एक दिन एकार्णवकी उस अगाध जलराशिमें मैंने एक बहुत विशाल बरगदका वृक्ष देखा
ततः कदाचित् पश्यामि तस्मिन् सलिलसञ्चये । न्यग्रोधं सुमहान्तं वै विशालं पृथिवीपते, राजन् ॥
Verse 91
शाखायां तस्य वृक्षस्य विस्तीर्णायां नराधिप । पर्यड्के पृथिवीपाल दिव्यास्तरणसंस्तृते,नराधिप! उस वृक्षकी चौड़ी शाखापर एक पलंग था, जिसके ऊपर दिव्य बिछौने बिछे हुए थे। महाराज! उस पलंगपर एक सुन्दर बालक बैठा दिखायी दिया, जिसका मुख कमलके समान कमनीय शोभा धारण करनेवाला तथा चन्द्रमाके समान नेत्रोंको आनन्द देनेवाला था। उसके नेत्र प्रफुल्ल पद्मदलके समान विशाल थे
शाखायां तस्य वृक्षस्य विस्तीर्णायां नराधिप । पर्यङ्के पृथिवीपाल दिव्यास्तरणसंस्तृते ॥
Verse 92
उपविष्टं महाराज पद्मेन्दुसद्शाननम् | फुल्लपद्मविशालाक्षं बालं पश्यामि भारत,नराधिप! उस वृक्षकी चौड़ी शाखापर एक पलंग था, जिसके ऊपर दिव्य बिछौने बिछे हुए थे। महाराज! उस पलंगपर एक सुन्दर बालक बैठा दिखायी दिया, जिसका मुख कमलके समान कमनीय शोभा धारण करनेवाला तथा चन्द्रमाके समान नेत्रोंको आनन्द देनेवाला था। उसके नेत्र प्रफुल्ल पद्मदलके समान विशाल थे
उपविष्टं महाराज पद्मेन्दुसदृशाननम् । फुल्लपद्मविशालाक्षं बालं पश्यामि भारत ॥
Verse 93
ततो मे पृथिवीपाल विस्मय: सुमहानभूत् | कथं त्वयं शिशु: शेते लोके नाशमुपागते,पृथ्वीनाथ! उसे देखकर मुझे बड़ा विस्मय हुआ। मैं सोचने लगा--'सारे संसारके नष्ट हो जानेपर भी यह बालक यहाँ कैसे सो रहा है?”
ततो मे पृथिवीपाल विस्मयः सुमहानभूत् । कथं त्वयं शिशुः शेते लोके नाशमुपागते ॥
Verse 94
तपसा चिन्तयंश्वापि तं शिशुं नोपलक्षये । भूतं भव्यं भविष्यं च जानन्नपि नराधिप,नरेश्वर! मैं भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालोंका ज्ञाता होनेपर भी तपस्यासे भलीभाँति चिन्तन करता (ध्यान लगाता) रहा, तो भी उस शिशुके विषयमें कुछ न जान सका
तपसा चिन्तयन्नपि तं शिशुं नोपलक्षये । भूतं भव्यं भविष्यं च जानन्नपि नराधिप ॥
Verse 95
अतसीपुष्पवर्णा भ: श्रीवत्सकृतभूषण: । साक्षाल्लक्ष्म्या इवावास: स तदा प्रतिभाति मे,उसकी अंगकान्ति अलसीके फूलकी भाँति श्याम थी। उसका वक्ष:स्थल श्रीवत्सचिह्नसे विभूषित था। वह उस समय मुझे साक्षात् लक्ष्मीका निवासस्थान-सा प्रतीत होता था
वैशम्पायन उवाच—अतसीपुष्पवर्णाभः श्रीवत्सकृतभूषणः। साक्षाल्लक्ष्म्या इवावासः स तदा प्रतिभाति मे॥
Verse 96
ततो मामब्रवीद् बाल: स पद्मनिभलोचन: । श्रीवत्सधारी द्युतिमान् वाक््यं श्रुतिसुखावहम्
ततो मामब्रवीद् बालः स पद्मनिभलोचनः। श्रीवत्सधारी द्युतिमान् वाक्यं श्रुतिसुखावहम्॥
Verse 97
जानामि त्वां परिश्रान्तं ततो विश्रामकाड्क्षिणम् । मार्कण्डेय इहास्स्व त्वं यावदिच्छसि भार्गव
जानामि त्वां परिश्रान्तं ततो विश्रामकाङ्क्षिणम्। मार्कण्डेय इहास्स्व त्वं यावदिच्छसि भार्गव॥
Verse 98
मुझे विस्मयमें पड़ा देख कमलके समान नेत्रवाले उस श्रीवत्सधारी कान्तिमान् बालकने मुझसे इस प्रकार श्रवणसुखद वचन कहा--'भृगुवंशी मार्कण्डेय! मैं तुम्हें जानता हूँ। तुम बहुत थक गये हो और विश्राम चाहते हो। तुम्हारी जबतक इच्छा हो यहाँ बैठो ।। अभ्यन्तरं शरीरे मे प्रविश्य मुनिसत्तम । आस्स्व भो विहितो वास: प्रसादस्ते कृतो मया,“'मुनिश्रेष्ठ! मैंने तुमपर कृपा की है। तुम मेरे शरीरके भीतर प्रवेश करके विश्राम करो। वहाँ तुम्हारे रहनेके लिये व्यवस्था की गयी है”
वैशम्पायन उवाच—मां विस्मयगतं दृष्ट्वा स पद्मनिभलोचनः। श्रीवत्सधारी द्युतिमान् श्रुतिसुखमिदं वचः॥ भृगुवंशीति मां ज्ञात्वा मार्कण्डेयमथाब्रवीत्। परिश्रान्तोऽसि विश्रामं काङ्क्षसे च मुनिसत्तम॥ यावदिच्छसि तावत्त्वमिहास्स्वेति पुनर्ब्रवीत्। अभ्यन्तरं शरीरे मे प्रविश्य मुनिसत्तम॥ आस्स्व भो विहितो वासः प्रसादस्ते कृतो मया॥
Verse 99
ततो बालेन तेनैवमुक्तस्थासीत् तदा मम । निर्वेदो जीविते दीर्घे मनुष्यत्वे च भारत,उस बालकके ऐसा कहनेपर उस समय मुझे अपने दीर्घ-जीवन और मानव-शरीरपर बड़ा खेद और वैराग्य हुआ
ततो बालेन तेनैवमुक्तस्तथासीत् तदा मम। निर्वेदो जीविते दीर्घे मनुष्यत्वे च भारत॥
Verse 100
ततो बालेन तेनास्यं सहसा विवृतं कृतम् । तस्याहमवशो वकत्रे दैवयोगात् प्रवेशित:,तदनन्तर उस बालकने सहसा अपना मुख खोला और मैं दैवयोगसे परवशकी भाँति उसमें प्रवेश कर गया
ततो बालेन तेनास्यं सहसा विवृतं कृतम् । तस्याहमवशो वक्त्रे दैवयोगात् प्रवेशितः ॥
Verse 101
ततः प्रविष्टस्तत्कुक्षिं सहसा मनुजाधिप । सराष्ट्रनगराकीर्णा कृत्स्नां पश्यामि मेदिनीम्,राजन! उसमें प्रवेश करते ही मैं सहसा उस बालकके उदरमें जा पहुँचा। वहाँ मुझे समस्त राष्ट्रों और नगरोंसे भरी हुई यह सारी पृथ्वी दिखायी दी
ततः प्रविष्टस्तत्कुक्षिं सहसा मनुजाधिप । सराष्ट्रनगराकीर्णां कृत्स्नां पश्यामि मेदिनीम् ॥
Verse 102
गड्डां शतद्रं सीतां च यमुनामथ कौशिकीम् । चर्मण्वतीं वेत्रवर्ती चन्द्रभागां सरस्वतीम्,नरश्रेष्ठ फिर तो मैं उस महात्मा बालकके उदरमें घूमने लगा। घूमते हुए मैंने वहाँ गंगा, सतलज, सीता, यमुना, कोसी, चम्बल, वेत्रवती, चिनाव, सरस्वती, सिन्धु, व्यास, गोदावरी, वस्वोकसारा, नलिनी, नर्मदा, ताम्रपर्णी, वेणा, शुभदायिनी पुण्यतोया, सुवेणा, कृष्णवेणा, महानदी इरामा, वितस्ता (झेलम), महानदी कावेरी, शोणभद्र, विशल्या तथा किम्पुना--इन सबको तथा इस पृथ्वीपर जो अन्य नदियाँ हैं, उनको भी देखा
गङ्गां शतद्रुं सीतां च यमुनामथ कौशिकीम् । चर्मण्वतीं वेत्रवतीं चन्द्रभागां सरस्वतीम् ॥
Verse 103
सिन्धुं चैव विपाशां च नदीं गोदावरीमपि । वस्वोकसारां नलिनीं नर्मदां चैव भारत,नरश्रेष्ठ फिर तो मैं उस महात्मा बालकके उदरमें घूमने लगा। घूमते हुए मैंने वहाँ गंगा, सतलज, सीता, यमुना, कोसी, चम्बल, वेत्रवती, चिनाव, सरस्वती, सिन्धु, व्यास, गोदावरी, वस्वोकसारा, नलिनी, नर्मदा, ताम्रपर्णी, वेणा, शुभदायिनी पुण्यतोया, सुवेणा, कृष्णवेणा, महानदी इरामा, वितस्ता (झेलम), महानदी कावेरी, शोणभद्र, विशल्या तथा किम्पुना--इन सबको तथा इस पृथ्वीपर जो अन्य नदियाँ हैं, उनको भी देखा
सिन्धुं चैव विपाशां च नदीं गोदावरीमपि । वस्वोकसारां नलिनीं नर्मदां चैव भारत ॥
Verse 104
नदीं ताम्रां च वेणां च पुण्यतोयां शुभावहाम् । सुवेणां कृष्णवेणां च इरामां च महानदीम्,नरश्रेष्ठ फिर तो मैं उस महात्मा बालकके उदरमें घूमने लगा। घूमते हुए मैंने वहाँ गंगा, सतलज, सीता, यमुना, कोसी, चम्बल, वेत्रवती, चिनाव, सरस्वती, सिन्धु, व्यास, गोदावरी, वस्वोकसारा, नलिनी, नर्मदा, ताम्रपर्णी, वेणा, शुभदायिनी पुण्यतोया, सुवेणा, कृष्णवेणा, महानदी इरामा, वितस्ता (झेलम), महानदी कावेरी, शोणभद्र, विशल्या तथा किम्पुना--इन सबको तथा इस पृथ्वीपर जो अन्य नदियाँ हैं, उनको भी देखा
नदीं ताम्रां च वेणां च पुण्यतोयां शुभावहाम् । सुवेणां कृष्णवेणां च इरामां च महानदीम् ॥
Verse 105
वितस्तां च महाराज कावेरीं च महानदीम् । शोणं च पुरुषव्याप्र विशल्यां किम्पुनामपि,नरश्रेष्ठ फिर तो मैं उस महात्मा बालकके उदरमें घूमने लगा। घूमते हुए मैंने वहाँ गंगा, सतलज, सीता, यमुना, कोसी, चम्बल, वेत्रवती, चिनाव, सरस्वती, सिन्धु, व्यास, गोदावरी, वस्वोकसारा, नलिनी, नर्मदा, ताम्रपर्णी, वेणा, शुभदायिनी पुण्यतोया, सुवेणा, कृष्णवेणा, महानदी इरामा, वितस्ता (झेलम), महानदी कावेरी, शोणभद्र, विशल्या तथा किम्पुना--इन सबको तथा इस पृथ्वीपर जो अन्य नदियाँ हैं, उनको भी देखा
वैशम्पायन उवाच—महाराज, पुरुषव्याघ्र! वितस्तां च महानदीं कावेरीं च, शोणं च विशल्यां किम्पुनामपि च अहं ददर्श।
Verse 106
एताश्षान्याश्व नद्यो5हं पृथिव्यां या नरोत्तम । परिक्रामन् प्रपश्यामि तस्य कुक्षौ महात्मन:,नरश्रेष्ठ फिर तो मैं उस महात्मा बालकके उदरमें घूमने लगा। घूमते हुए मैंने वहाँ गंगा, सतलज, सीता, यमुना, कोसी, चम्बल, वेत्रवती, चिनाव, सरस्वती, सिन्धु, व्यास, गोदावरी, वस्वोकसारा, नलिनी, नर्मदा, ताम्रपर्णी, वेणा, शुभदायिनी पुण्यतोया, सुवेणा, कृष्णवेणा, महानदी इरामा, वितस्ता (झेलम), महानदी कावेरी, शोणभद्र, विशल्या तथा किम्पुना--इन सबको तथा इस पृथ्वीपर जो अन्य नदियाँ हैं, उनको भी देखा
नरोत्तम! एताश्चान्याश्च नद्योऽहं पृथिव्यां याः सन्ति, तस्य महात्मनः कुक्षौ परिक्रामन् प्रपश्यामि।
Verse 107
ततः समुद्र पश्यामि यादोगणनिषेवितम् । रत्नाकरममित्रघ्न पयसो निधिमुत्तमम्,शत्रुसूदन! इसके बाद जलजन्तुओंसे भरे हुए अगाध जलके भण्डार परम उत्तम रत्नाकर समुद्रको भी देखा
ततः समुद्रं पश्यामि यादोगणनिषेवितम्। रत्नाकरम् अमित्रघ्न! पयसो निधिमुत्तमम्॥
Verse 108
तत्र पश्यामि गगन चन्द्रसूर्यविराजितम् । जाज्वल्यमानं तेजोभि: पावकार्कसमप्रभम्,वहाँ मुझे चन्द्रमा और सूर्यसे सुशोभित आकाशमण्डल दिखायी दिया, जो अनन्त तेजसे प्रज्वलित तथा अग्नि एवं सूर्यके समान देदीप्यमान था
तत्र पश्यामि गगनं चन्द्रसूर्यविराजितम्। जाज्वल्यमानं तेजोभिः पावकार्कसमप्रभम्॥
Verse 109
पश्यामि च महीं राजन् काननैरुपशोभिताम् । (सपर्वतवनद्वीपां निमग्नाशतसड्कुलाम् ।) यजन्ते हि तदा राजन् ब्राह्मणा बहुभिर्मखै:,राजन! वहाँकी भूमि विविध काननोंसे सुशोभित, पर्वत, वन और द्वीपोंसे उपलक्षित तथा सैकड़ों सरिताओंसे संयुक्त दिखायी देती थी। ब्राह्मणलोग नाना प्रकारके यज्ञोंद्वारा भगवान् यज्ञपुरुषकी आराधना करते थे
पश्यामि च महीं राजन् काननैरुपशोभिताम्। पर्वतवनद्वीपाढ्यां शतशः सरिताकुलाम्॥ यजन्ते हि तदा राजन् ब्राह्मणा बहुभिर्मखैः। यज्ञपुरुषं देवं तैः सम्यगभ्यर्चितं तदा॥
Verse 110
क्षत्रियाश्ष प्रवर्तन्ते सर्ववर्णानुरंजनै: । वैश्या: कृषिं यथान्यायं कारयन्ति नराधिप,नरेश्वर! क्षत्रिय राजा सब वर्णोकी प्रजाका अनुरंजन करते--सबको सुखी और प्रसन्न रखते थे। वैश्य न्यायपूर्वक खेतीका काम और व्यापार करते थे
वैशम्पायन उवाच— क्षत्रियाः सर्ववर्णानुरञ्जनैः स्वधर्मं प्रवर्तयन्ति, सर्वान् सुखिनः प्रसन्नांश्च कुर्वन्ति। वैश्याश्च, नराधिप, न्यायेन विधिना च कृषिं वाणिज्यं च कारयन्ति।
Verse 111
शुश्रूषायां च निरता द्विजानां वृषलास्तदा । ततः परिपतन् राजंस्तस्य कुक्षौ महात्मन:,शूद्र तीनों द्विजातियोंकी सेवा-शुश्रूषामें लगे रहते थे। राजन! यह सब देखते हुए जब मैं उस महात्मा बालकके उदरमें भ्रमण करता आगे बढ़ा, तब हिमवान्, हेमकूट, निषध, रजतयुक्त श्वेतगिरि, गन्धमादन, मन्दराचल, महागिरि नील, सुवर्णमय पर्वत मेरु, महेन्द्र, उत्तम विन्ध्यगिरि, मलय तथा पारियात्र पर्वत देखे। ये तथा और भी बहुत-से पर्वत मुझे उस बालकके उदरमें दिखायी दिये। वे सब-के-सब नाना प्रकारके रत्नोंसे विभूषित थे। राजन! वहाँ घूमते हुए मैंने सिंह, व्याप्र और वाराह आदि पशु भी देखे
वैशम्पायन उवाच— शूद्रास्तदा द्विजानां शुश्रूषायां निरताः। ततः परं, राजन्, तस्य महात्मनः कुक्षौ परिपतन् अहं ददर्श पर्वतान् बहून्— हिमवन्तं हेमकूटं निषधं रजतान्वितं श्वेतगिरिं गन्धमादनं मन्दराचलं महागिरिं नीलं सुवर्णमयं मेरुं महेन्द्रं विन्ध्यं गिरिमुत्तमं मलयं पारियात्रं च, अन्यांश्च बहून्; सर्वे नानारत्नविभूषिताः। तत्र विचरन् सिंहान् व्याघ्रान् वराहांश्चादीन् पशूनपि ददर्श।
Verse 112
हिमवन्तं च पश्यामि हेमकूटं च पर्वतम् । निषध॑ चापि पश्यामि श्वेतं च रजतान्वितम्,शूद्र तीनों द्विजातियोंकी सेवा-शुश्रूषामें लगे रहते थे। राजन! यह सब देखते हुए जब मैं उस महात्मा बालकके उदरमें भ्रमण करता आगे बढ़ा, तब हिमवान्, हेमकूट, निषध, रजतयुक्त श्वेतगिरि, गन्धमादन, मन्दराचल, महागिरि नील, सुवर्णमय पर्वत मेरु, महेन्द्र, उत्तम विन्ध्यगिरि, मलय तथा पारियात्र पर्वत देखे। ये तथा और भी बहुत-से पर्वत मुझे उस बालकके उदरमें दिखायी दिये। वे सब-के-सब नाना प्रकारके रत्नोंसे विभूषित थे। राजन! वहाँ घूमते हुए मैंने सिंह, व्याप्र और वाराह आदि पशु भी देखे
हिमवन्तं च पश्यामि हेमकूटं च पर्वतम्। निषधं चापि पश्यामि श्वेतं च रजतान्वितम्॥
Verse 113
पश्यामि च महीपाल पर्वतं गन्धमादनम् । मन्दरं मनुजव्याप्र नीलं चापि महागिरिम्,शूद्र तीनों द्विजातियोंकी सेवा-शुश्रूषामें लगे रहते थे। राजन! यह सब देखते हुए जब मैं उस महात्मा बालकके उदरमें भ्रमण करता आगे बढ़ा, तब हिमवान्, हेमकूट, निषध, रजतयुक्त श्वेतगिरि, गन्धमादन, मन्दराचल, महागिरि नील, सुवर्णमय पर्वत मेरु, महेन्द्र, उत्तम विन्ध्यगिरि, मलय तथा पारियात्र पर्वत देखे। ये तथा और भी बहुत-से पर्वत मुझे उस बालकके उदरमें दिखायी दिये। वे सब-के-सब नाना प्रकारके रत्नोंसे विभूषित थे। राजन! वहाँ घूमते हुए मैंने सिंह, व्याप्र और वाराह आदि पशु भी देखे
पश्यामि च महीपाल पर्वतं गन्धमादनम्। मन्दरं मनुजव्याघ्र नीलं चापि महागिरिम्॥
Verse 114
पश्यामि च महाराज मेरुं कनकपर्वतम् | महेन्द्र चैव पश्यामि विन्ध्यं च गिरिमुत्तमम्,शूद्र तीनों द्विजातियोंकी सेवा-शुश्रूषामें लगे रहते थे। राजन! यह सब देखते हुए जब मैं उस महात्मा बालकके उदरमें भ्रमण करता आगे बढ़ा, तब हिमवान्, हेमकूट, निषध, रजतयुक्त श्वेतगिरि, गन्धमादन, मन्दराचल, महागिरि नील, सुवर्णमय पर्वत मेरु, महेन्द्र, उत्तम विन्ध्यगिरि, मलय तथा पारियात्र पर्वत देखे। ये तथा और भी बहुत-से पर्वत मुझे उस बालकके उदरमें दिखायी दिये। वे सब-के-सब नाना प्रकारके रत्नोंसे विभूषित थे। राजन! वहाँ घूमते हुए मैंने सिंह, व्याप्र और वाराह आदि पशु भी देखे
पश्यामि च महाराज मेरुं कनकपर्वतम्। महेन्द्रं चैव पश्यामि विन्ध्यं च गिरिमुत्तमम्॥
Verse 115
मलयं चापि पश्यामि पारियात्र च पर्वतम् | एते चान्ये च बहवो यावन्त: पृथिवीधरा:,शूद्र तीनों द्विजातियोंकी सेवा-शुश्रूषामें लगे रहते थे। राजन! यह सब देखते हुए जब मैं उस महात्मा बालकके उदरमें भ्रमण करता आगे बढ़ा, तब हिमवान्, हेमकूट, निषध, रजतयुक्त श्वेतगिरि, गन्धमादन, मन्दराचल, महागिरि नील, सुवर्णमय पर्वत मेरु, महेन्द्र, उत्तम विन्ध्यगिरि, मलय तथा पारियात्र पर्वत देखे। ये तथा और भी बहुत-से पर्वत मुझे उस बालकके उदरमें दिखायी दिये। वे सब-के-सब नाना प्रकारके रत्नोंसे विभूषित थे। राजन! वहाँ घूमते हुए मैंने सिंह, व्याप्र और वाराह आदि पशु भी देखे
वैशम्पायन उवाच— मलयं चापि पश्यामि पारियात्रं च पर्वतम् । एते चान्ये च बहवो यावन्तः पृथिवीधराः । महात्मनः शिशोः कुक्षौ विचरन् अहं तदा हिमवन्तं हेमकूटं निषधं रजतयुक्तं श्वेतगिरिं गन्धमादनं मन्दराचलं महागिरिं नीलं सुवर्णमयं मेरुं महेन्द्रं उत्तमं विन्ध्यं मलयं पारियात्रं च ददर्श । एते चान्ये च बहवः पर्वता मया तत्र दृष्टाः, सर्वे नानारत्नविभूषिताः ।
Verse 116
तस्योदरे मया दृष्टा: सर्वे रत्नविभूषिता: । सिंहान् व्याप्रान् वराहांश्न॒ पश्यामि मनुजाधिप,शूद्र तीनों द्विजातियोंकी सेवा-शुश्रूषामें लगे रहते थे। राजन! यह सब देखते हुए जब मैं उस महात्मा बालकके उदरमें भ्रमण करता आगे बढ़ा, तब हिमवान्, हेमकूट, निषध, रजतयुक्त श्वेतगिरि, गन्धमादन, मन्दराचल, महागिरि नील, सुवर्णमय पर्वत मेरु, महेन्द्र, उत्तम विन्ध्यगिरि, मलय तथा पारियात्र पर्वत देखे। ये तथा और भी बहुत-से पर्वत मुझे उस बालकके उदरमें दिखायी दिये। वे सब-के-सब नाना प्रकारके रत्नोंसे विभूषित थे। राजन! वहाँ घूमते हुए मैंने सिंह, व्याप्र और वाराह आदि पशु भी देखे
तस्योदरे मया दृष्टाः सर्वे रत्नविभूषिताः । सिंहान् व्याघ्रान् वराहांश्च पश्यामि मनुजाधिप ॥
Verse 117
पृथिव्यां यानि चान्यानि सत्त्वानि जगतीपते । तानि सर्वाण्यहं तत्र पश्यन् पर्यचरं तदा,पृथ्वीपते! भूमण्डलमें जितने प्राणी हैं, उन सबको देखते हुए मैं उस समय उस बालकके उदरमें विचरता रहा
पृथिव्यां यानि चान्यानि सत्त्वानि जगतीपते । तानि सर्वाण्यहं तत्र पश्यन् पर्यचरं तदा ॥
Verse 118
कुक्षौ तस्य नरव्याघ्र प्रविष्ट: संचरन् दिश: । शक्रादींश्वापि पश्यामि कृत्स्नान् देवगणानहम्,नरश्रेष्ठ उस शिशुके उदरमें प्रविष्ट हो सम्पूर्ण दिशाओंमें भ्रमण करते हुए इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवताओंके भी दर्शन हुए
कुक्षौ तस्य नरव्याघ्र प्रविष्टः संचरन् दिशः । शक्रादींश्चापि पश्यामि कृत्स्नान् देवगणानहम् ॥
Verse 119
साध्यान् रुद्रांस्तथा5<दित्यान् गुह्मकान् पितरस्तदा । सर्पान् नागान् सुपर्णाश्च वसूनप्यश्चिनावपि,पृथ्वीपते! साध्य, रुद्र, आदित्य, गुह्यक, पितर, सर्प, नाग, सुपर्ण, वसु, अश्विनीकुमार, गन्धर्व, अप्सरा, यक्ष तथा ऋषियोंका भी मैंने दर्शन किया। दैत्य-दानवसमूह, नाग, सिंहिकाके पुत्र (राहु आदि) तथा अन्य देवशत्रुओंको भी देखा। राजन्! इस लोकमें मैंने जो कुछ भी स्थावर-जंगम पदार्थ देखे थे, वे सब मुझे उस महात्माकी कुक्षिमें दृष्टिगोचर हुए। महाराज! मैं प्रतिदिन फलाहार करता और इस सम्पूर्ण जगतमें घूमता रहता
साध्यान् रुद्रांस्तथादित्यान् गुह्यकान् पितरस्तथा । सर्पान् नागान् सुपर्णांश्च वसूनप्यश्विनावपि ॥ गन्धर्वाप्सरसः यक्षान् ऋषींश्चापि ददर्श ह । दैत्यदानवसंघांश्च सिंहिकापुत्रकानपि । राह्वादीन् देवशत्रूंश्चान्यान् अपि ददर्श ह । यच्च स्थावरजङ्गमं दृष्टं मया भूतले नृप । तत्सर्वं तत्र कुक्षौ तस्य महात्मनः समदृश्यत । अहं च नित्यं फलाहारः सर्वलोकं विचराम्यहम् ॥
Verse 120
गन्धर्वाप्सरसो यक्षानषींश्वैव महीपते । देत्यदानवसड्घांश्व नागांश्न मनुजाधिप,पृथ्वीपते! साध्य, रुद्र, आदित्य, गुह्यक, पितर, सर्प, नाग, सुपर्ण, वसु, अश्विनीकुमार, गन्धर्व, अप्सरा, यक्ष तथा ऋषियोंका भी मैंने दर्शन किया। दैत्य-दानवसमूह, नाग, सिंहिकाके पुत्र (राहु आदि) तथा अन्य देवशत्रुओंको भी देखा। राजन्! इस लोकमें मैंने जो कुछ भी स्थावर-जंगम पदार्थ देखे थे, वे सब मुझे उस महात्माकी कुक्षिमें दृष्टिगोचर हुए। महाराज! मैं प्रतिदिन फलाहार करता और इस सम्पूर्ण जगतमें घूमता रहता
वैशम्पायन उवाच— महीपते, मनुजाधिप, पृथ्वीपते! अहं गन्धर्वाप्सरसः, यक्षान् ऋषींश्च ददर्श; दैत्यदानवसङ्घांश्च, नागांश्चापि ददर्श। साध्यान् रुद्रान् आदित्यान् गुह्यकान् पितॄन्, सर्पान् नागान् सुपर्णान् वसून्, अश्विनीकुमारौ, गन्धर्वान् अप्सरसः यक्षांश्च बहून् अपश्यं। सिंहिकातनयान् (राह्वादीन्) अन्यांश्च देवशत्रून् ददर्श। राजन्, अस्मिन् लोके मया यत्किञ्चित् स्थावरजङ्गमं दृष्टं, तत्सर्वं तस्य महात्मनः कुक्षौ मम दृष्टिगोचरम् अभवत्। महाराज, अहं प्रतिदिनं फलाहारः सन् अस्मिन् कृत्स्ने जगति विचरामि।
Verse 121
सिंहिकातनयांश्वापि ये चान्ये सुरशत्रव: । यच्च किंचिन्मया लोके दृष्टं स्थावरजड्रमम्,पृथ्वीपते! साध्य, रुद्र, आदित्य, गुह्यक, पितर, सर्प, नाग, सुपर्ण, वसु, अश्विनीकुमार, गन्धर्व, अप्सरा, यक्ष तथा ऋषियोंका भी मैंने दर्शन किया। दैत्य-दानवसमूह, नाग, सिंहिकाके पुत्र (राहु आदि) तथा अन्य देवशत्रुओंको भी देखा। राजन्! इस लोकमें मैंने जो कुछ भी स्थावर-जंगम पदार्थ देखे थे, वे सब मुझे उस महात्माकी कुक्षिमें दृष्टिगोचर हुए। महाराज! मैं प्रतिदिन फलाहार करता और इस सम्पूर्ण जगतमें घूमता रहता
वैशम्पायन उवाच— सिंहिकातनयान् अपि ये चान्ये सुरशत्रवः, तानप्यहं ददर्श। यच्च किञ्चिन्मया लोके दृष्टं स्थावरजङ्गमम्, पृथ्वीपते, तत्सर्वं तस्य महात्मनः कुक्षौ ममाभवत् प्रत्यक्षम्। साध्यान् रुद्रान् आदित्यान् गुह्यकान् पितॄन्, सर्पान् नागान् सुपर्णान् वसून्, अश्विनौ, गन्धर्वाप्सरसो यक्षान् ऋषींश्च ददर्श। दैत्यदानवसङ्घान्, नागान्, सिंहिकातनयान् (राह्वादीन्) अन्यांश्च देवशत्रून् अपश्यं। राजन्, यत्सर्वं मया जगद्रूपेण दृष्टं, तत्सर्वं तस्मिन् समाहृतमिव ममाभात्। महाराज, अहं प्रतिदिनं फलैरेव जीवन् कृत्स्नं जगदिदं विचरामि।
Verse 122
सर्व पश्याम्यहं राजंस्तस्य कुक्षौ महात्मन: । चरमाण: फलाहार: कृत्स्नं जगदिदं विभो,पृथ्वीपते! साध्य, रुद्र, आदित्य, गुह्यक, पितर, सर्प, नाग, सुपर्ण, वसु, अश्विनीकुमार, गन्धर्व, अप्सरा, यक्ष तथा ऋषियोंका भी मैंने दर्शन किया। दैत्य-दानवसमूह, नाग, सिंहिकाके पुत्र (राहु आदि) तथा अन्य देवशत्रुओंको भी देखा। राजन्! इस लोकमें मैंने जो कुछ भी स्थावर-जंगम पदार्थ देखे थे, वे सब मुझे उस महात्माकी कुक्षिमें दृष्टिगोचर हुए। महाराज! मैं प्रतिदिन फलाहार करता और इस सम्पूर्ण जगतमें घूमता रहता
वैशम्पायन उवाच— राजन्, अहं तस्य महात्मनः कुक्षौ सर्वं पश्यामि। फलाहारः चरन्, विभो, पृथ्वीपते, कृत्स्नं जगदिदं तत्र मया दृष्टम्।
Verse 123
अन्तःशरीरे तस्याहं वर्षाणामधिकं शतम् । न च पश्यामि तस्याहं देहस्यान्तं कदाचन,उस बालकके शरीरके भीतर मैं सौ वर्षमे अधिक कालतक घूमता रहा, तो भी कभी उसके शरीरका अन्त नहीं दिखायी दिया
वैशम्पायन उवाच— तस्य बालस्य शरीरान्तः अहं वर्षाणामधिकं शतम् विचचार; तथापि तस्य देहस्यान्तं कदाचन नापश्यम्।
Verse 124
सततं धावमानश्ष् चिन्तयानो विशाम्पते । (भ्रमंस्तत्र महीपाल यदा वर्षगणान् बहून् ।) आसादयामि नैवान्तं तस्य राजन् महात्मन:,युधिष्ठिर! मैं निरन्तर दौड़ लगाता और चिन्तामें पड़ा रहता था। महाराज! जब बहुत वर्षोतक भ्रमण करनेपर भी उस महात्माके शरीरका अन्त नहीं मिला, तब मैंने मन, वाणी और क्रियाद्वारा उन वरदायक एवं वरेण्य देवताकी ही विधिपूर्वक शरण ली
वैशम्पायन उवाच— सततं धावमानः चिन्तयानो विशाम्पते, तत्र बहून् वर्षगणान् भ्रमन्, महीपाल, तस्य राजन् महात्मनः अन्तं नैवासादयम्। अथ राजन्, मनसा वाचा कर्मणा च, वरदं वरेण्यं देवं विधिवत् शरणं प्रपद्ये।
Verse 125
ततस्तमेव शरणं गतो<5स्मि विधिवत् तदा । वरेण्यं वरदं देव॑ं मनसा कर्मणैव च,युधिष्ठिर! मैं निरन्तर दौड़ लगाता और चिन्तामें पड़ा रहता था। महाराज! जब बहुत वर्षोतक भ्रमण करनेपर भी उस महात्माके शरीरका अन्त नहीं मिला, तब मैंने मन, वाणी और क्रियाद्वारा उन वरदायक एवं वरेण्य देवताकी ही विधिपूर्वक शरण ली
ततस्तमेव शरणं गतोऽस्मि विधिवत् तदा । वरेण्यं वरदं देवं मनसा कर्मणैव च ॥ युधिष्ठिर! अहं निरन्तरं धावन् चिन्ताकुलोऽभवम्; बहुवर्षाणि भ्रमन्नपि तस्य महात्मनः शरीरस्यान्तं नालभे, तदा मनसा वाचा क्रियया च तमेव वरदं वरेण्यं देवं विधिपूर्वकं शरणं प्रपन्नवान् ॥
Verse 126
ततो<5हं सहसा राजन् वायुवेगेन नि:सृतः । महात्मनो मुखात् तस्य विवृतात् पुरुषोत्तम,पुरुषरत्न युधिष्ठिर! उनकी शरण लेते ही मैं वायुके समान वेगसे उक्त महात्मा बालकके खुले हुए मुखकी राहसे सहसा बाहर निकल आया
ततोऽहं सहसा राजन् वायुवेगेन निःसृतः । महात्मनो मुखात् तस्य विवृतात् पुरुषोत्तम ॥ पुरुषरत्न युधिष्ठिर! तस्य शरणं गृहीत्वा वायुवेगसमो भूत्वा तस्य महात्मनः विवृतमुखमार्गेण सहसा बहिर्निःसृतवानस्मि ॥
Verse 127
ततस्तस्यैव शाखायां न्यग्रोधस्य विशाम्पते । आस्ते मनुजशार्दूल कृत्स्नमादाय वै जगत्,नरश्रेष्ठ राजन! बाहर आकर देखा तो उसी बरगदकी शाखापर उसी बाल-वेषसे सम्पूर्ण जगत्को अपने उदरमें लेकर श्रीवत्सचिह्लसे सुशोभित वह अमिततेजस्वी बालक पूर्ववत् बैठा हुआ है
ततस्तस्यैव शाखायां न्यग्रोधस्य विशाम्पते । आस्ते मनुजशार्दूल कृत्स्नमादाय वै जगत् ॥ बहिर्निष्क्रम्य पश्यामि तमेव बालवेषधरं तस्यैव न्यग्रोधशाखायाम्, कृत्स्नं जगदुदरे धारयन्तं पूर्ववत् उपविष्टम् ॥
Verse 128
तेनैव बालवेषेण श्रीवत्सकृतलक्षणम् | आसीन तं॑ नरव्याप्र पश्याम्यमिततेजसम्,नरश्रेष्ठ राजन! बाहर आकर देखा तो उसी बरगदकी शाखापर उसी बाल-वेषसे सम्पूर्ण जगत्को अपने उदरमें लेकर श्रीवत्सचिह्लसे सुशोभित वह अमिततेजस्वी बालक पूर्ववत् बैठा हुआ है
तेनैव बालवेषेण श्रीवत्सकृतलक्षणम् । आसीनं तं नरव्याघ्र पश्याम्यमिततेजसम् ॥ बहिर्निष्क्रम्य पश्यामि तमेव बालवेषधरं तस्यैव न्यग्रोधशाखायाम् आसीनम्; श्रीवत्सलक्षणोपेतं, अमिततेजसं, कृत्स्नजगदुदरधारिणमिव पूर्ववत् ॥
Verse 129
ततो मामब्रवीद् बाल: स प्रीत: प्रहसन्निव । श्रीवत्सधारी द्युतिमान् पीतवासा महाद्युति:,तब महातेजस्वी पीताम्बरधारी श्रीवत्सभूषित कान्तिमान् उस बालकने प्रसन्न होकर हँसते हुए-से मुझसे कहा--
ततो मामब्रवीद् बालः स प्रीतः प्रहसन्निव । श्रीवत्सधारी द्युतिमान् पीतवासा महाद्युतिः ॥ ततः स महाद्युतिः पीतवासा श्रीवत्सधारी द्युतिमान् बालः प्रीतः प्रहसन्निव मामिदं वचनमब्रवीत् ॥
Verse 130
अपीदानीं शरीरेडस्मिन् मामके मुनिसत्तम | उषितस्त्व॑ सुविश्रान्तो मार्कण्डेय ब्रवीहि मे,“'मुनिश्रेष्ठ मार्कण्डेय! क्या तुम मेरे इस शरीरमें रहकर विश्राम कर चुके? मुझे बताओ”
वैशम्पायन उवाच— अपीदानीं शरीरेऽस्मिन् मामके मुनिसत्तम । उषितस्त्वं सुविश्रान्तो मार्कण्डेय ब्रवीहि मे ॥
Verse 131
मुहूर्तादथ मे दृष्टि: प्रादुर्भूता पुनर्नवा । यया निर्मुक्तमात्मानमपश्यं लब्धचेतसम्,फिर दो ही घड़ीमें मुझे एक नवीन दृष्टि प्राप्त हुई, जिससे मैं अपने-आपको मायासे मुक्त और सचेत अनुभव करने लगा
मुहूर्तादथ मे दृष्टिः प्रादुर्भूता पुनर्नवा । यया निर्मुक्तमात्मानमपश्यं लब्धचेतसम् ॥
Verse 132
तस्य ताम्रतलौ तात चरणौ सुप्रतिषछ्ितौ । सुजातौ मृदुरक्ताभिरड्जुलीभिविराजितौ
तस्य ताम्रतलौ तात चरणौ सुप्रतिष्ठितौ । सुजातौ मृदुरक्ताभिरङ्गुलीभिविराजितौ ॥
Verse 133
दृष्टवा परिमितं तस्य प्रभावममितौजस:,उस अमित तेजस्वी शिशुका अनन्त प्रभाव देखकर मैं यत्नपूर्वक उसके समीप गया और विनीतभावसे हाथ जोड़कर सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा उस कमलनयन देवताका दर्शन किया
दृष्ट्वा परिमितं तस्य प्रभावममितौजसः । तममिततेजसं बालं दृष्ट्वा प्रयत्नतः समीपं जगामाहं विनीतोऽञ्जलिमुद्यतः ॥
Verse 134
विनयेनाञ्जलिं कृत्वा प्रयत्नेनोपगम्य ह । दृष्टो मया स भूतात्मा देवः कमललोचन:,उस अमित तेजस्वी शिशुका अनन्त प्रभाव देखकर मैं यत्नपूर्वक उसके समीप गया और विनीतभावसे हाथ जोड़कर सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा उस कमलनयन देवताका दर्शन किया
विनयेनाञ्जलिं कृत्वा प्रयत्नेनोपगम्य ह । दृष्टो मया स भूतात्मा देवः कमललोचनः ॥
Verse 135
तमहं प्राउ्जलिर्भूत्वा नमस्कृत्येदमन्रुवम् । ज्ञातुमिच्छामि देव त्वां मायां चैतां तवोत्तमाम्,फिर हाथ जोड़े नमस्कार करके मैंने उससे इस प्रकार कहा--देव! मैं आपको और आपकी इस उत्तम मायाको जानना चाहता हूँ
तमहं प्राञ्जलिर्भूत्वा नमस्कृत्येदमब्रुवम् । ज्ञातुमिच्छामि देव त्वां मायां चैतां तवोत्तमाम् ॥
Verse 136
आस्थयेनानुप्रविष्टो5हं शरीरे भगवंस्तव । दृष्टवानखिलान् सर्वान् समस्तान् जठरे हि ते,'भगवन्! मैंने आपके मुखकी राहसे शरीरमें प्रवेश करके आपके उदरमें समस्त सांसारिक पदार्थोका अवलोकन किया है
आस्थयेनानुप्रविष्टोऽहं शरीरे भगवंस्तव । दृष्टवानखिलान् सर्वान् समस्तान् जठरे हि ते ॥
Verse 137
तव देव शरीरस्था देवदानवराक्षसा: । यक्षगन्धर्वनागाश्न जगत् स्थावरजड्रमम्
तव देव शरीरस्था देवदानवराक्षसाः । यक्षगन्धर्वनागाश्च जगत् स्थावरजङ्गमम् ॥
Verse 138
“देव! आपके शरीरमें देवता, दानव, यक्ष, राक्षस, गन्धर्व, नाग तथा समस्त स्थावर- जंगमरूप जगत् विद्यमान है ।। त्वत्प्रसादाच्च मे देव स्मृतिर्न परिहीयते । ट्रुतमन्त:शरीरे ते सततं परिवर्तिन:,'प्रभो! आपकी कृपासे आपके शरीरके भीतर निरन्तर शीघ्र गतिसे घूमते रहनेपर भी मेरी स्मरणशक्ति नष्ट नहीं हुई है
तव देव शरीरस्थाः देवदानवयक्षराक्षसगन्धर्वनागाः स्थावरजङ्गमं च जगत् । त्वत्प्रसादाच्च मे देव स्मृतिर्न परिहीयते । त्वरितमन्तःशरीरे ते सततं परिवर्तिनः ॥
Verse 139
निर्गतो5हमकामस्तु इच्छया ते महाप्रभो । इच्छामि पुण्डरीकाक्ष ज्ञातुं त्वाहमनिन्दितम्,“महाप्रभो! मैं अपनी अभिलाषा न रहनेपर भी केवल आपकी इच्छासे बाहर निकल आया हूँ। कमलनयन! आप सर्वोत्कृष्ट देवताको मैं जानना चाहता हूँ
निर्गतोऽहमकामस्तु इच्छया ते महाप्रभो । इच्छामि पुण्डरीकाक्ष ज्ञातुं त्वाहमनिन्दितम् ॥
Verse 140
इह भूत्वा शिशु: साक्षात् कि भवानवतिष्ठते । पीत्वा जगदिदं सर्वमेतदाख्यातुमहसि,“आप इस सम्पूर्ण जगत्को पी करके यहाँ साक्षात् बालकवेषमें क्यों विराजमान हैं? यह सब बतानेकी कृपा करें
इह भूत्वा शिशुः साक्षात् किं भवानवतिष्ठते । पीत्वा जगदिदं सर्वमेतदाख्यातुमर्हसि ॥
Verse 141
किमर्थ च जगत् सर्व शरीरस्थं तवानघ । कियन्तं च त्वया कालमिह स्थेयमरिंदम,“अनघ! यह सारा संसार आपके शरीरमें किसलिये स्थित है? शत्रुदमन! आप कितने समयतक यहाँ इस रूपमें रहेंगे?
किमर्थं च जगत्सर्वं शरीरस्थं तवानघ । कियन्तं च त्वया कालमिह स्थेयमरिंदम ॥
Verse 142
एतदिच्छामि देवेश श्रोतु ब्राह्मणकाम्यया । त्वत्त: कमलपत्राक्ष विस्तरेण यथातथम्,'देवेश्वर! कमलनयन! ब्राह्मणमें जो सहज जिज्ञासा होती है, उससे प्रेरित होकर मैं आपसे यह सब बातें यथाविधि विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ
एतदिच्छामि देवेश श्रोतुं ब्राह्मणकाम्यया । त्वत्तः कमलपत्राक्ष विस्तरेण यथातथम् ॥
Verse 143
महद्धयेतदचिन्त्यं च यदहं दृष्टवान् प्रभो । इत्युक्त: स मया श्रीमान् देवदेवो महाद्युति: । सान्त्वयन् मामिदं वाक्यमुवाच वदतां वर:,'प्रभो! मैंने जो कुछ देखा है, यह अगाध और अचिन्त्य है।” मेरे इस प्रकार पूछनेपर वे वक्ताओंमें श्रेष्ठ महातेजस्वी देवाधिदेव श्रीभगवान् मुझे सान्त्वना देते हुए इस प्रकार बोले
महद्ध्येतदचिन्त्यं च यदहं दृष्टवान्प्रभो । इत्युक्तः स मया श्रीमान्देवदेवो महाद्युतिः । सान्त्वयन् मामिदं वाक्यमुवाच वदतां वरः ॥
Verse 187
इस प्रकार श्रीम्याभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वनें मत्स्योपाख्यानविषयक एक सौ सतासीवाँ अध्याय पूरा हुआ
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि मत्स्योपाख्यानविषये सप्ताशीतितमोऽध्यायः समाप्तः ॥
Verse 188
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि अष्टाशीत्यधिकशततमो<ध्याय:
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि अष्टाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः।
Verse 213
आदितो मनुजव्याप्र कृत्स्नस्य जगत: क्षये । ये अन्तर्यामी आत्मा होनेसे सबको जानते हैं, परंतु इन्हें वेद भी नहीं जानते। नृपशिरोमणे! नरश्रेष्ठ! सम्पूर्ण जगत्का प्रलय होनेके पश्चात् इन आदिभूत परमेश्वरसे ही यह सम्पूर्ण आश्वर्यमय जगत् पुनः उत्पन्न हो जाता है
आदितो मनुजव्याघ्र कृत्स्नस्य जगतः क्षये । अन्तर्यामी पर आत्मा सर्वं जानाति, तं तु वेदा अपि न विदुः । नृपशिरोमणे नरश्रेष्ठ! कृत्स्नस्य जगतः प्रलयेऽनन्तरं तस्मादादिभूतात् परमेश्वरादेव पुनरिदं सर्वमाश्चर्यमयं जगदुत्पद्यते ॥
Verse 236
तस्य तावच्छती संध्या संध्यांशश्व॒ ततः: परम् । तीन हजार दिव्य वर्षोका त्रेतायुग बताया जाता है, उसकी संध्या और संध्यांशके भी उतने ही (तीन-तीन) सौ दिव्य वर्ष होते हैं (इस तरह यह युग छत्तीस सौ दिव्य वर्षोंका होता है)
तस्य तावच्छती संध्या संध्यांशश्च ततः परम् । त्रेतायुगं त्रिसहस्रं दिव्यवर्षाणि कीर्तितम् । संध्यासंध्यांशयोश्चैव त्रिशतं त्रिशतं स्मृतम् । एवं षट्त्रिंशत्सहस्रं शतानि च दिव्यवर्षाणि भवन्ति ॥
Verse 246
तस्यापि द्विशती संध्या संध्यांशश्ष तथाविध: । द्वापरका मान दो हजार दिव्य वर्ष है तथा उतने ही सौ दिव्य वर्ष उसकी संध्या और संध्यांशके हैं (अत: सब मिलकर चौबीस सौ दिव्य वर्ष द्वापरके हैं)
तस्यापि द्विशती संध्या संध्यांशश्च तथाविधः । द्वापरं द्विसहस्रं तु दिव्यवर्षाणि कीर्तितम् । संध्यासंध्यांशयोश्चैव द्विशतं द्विशतं स्मृतम् । एवं चतुर्विंशतिशतं दिव्यवर्षाणि भवन्ति ॥
Verse 283
लोकानां मनुजव्याघ्र प्रलयं त॑ विदुर्बुधा: । नरश्रेष्ठ] एक हजार चतुर्युग बीतनेपर ब्रह्माजीका एक दिन होता है। यह सारा जगत् ब्रह्माके दिनभर ही रहता है (और वह दिन समाप्त होते ही नष्ट हो जाता है।) इसीको विद्वान् पुरुष लोकोंका प्रलय मानते हैं
लोकानां मनुजव्याघ्र प्रलयं तद्विदुर्बुधाः । सहस्रं चतुर्युगानां ब्रह्मणोऽहः प्रकीर्तितम् । तावदेव स्थितं विश्वं ब्रह्मणोऽह्नि दिवानिशम् । अहःक्षये तु नश्येत, एष लोकप्रलयः स्मृतः ॥
Verse 316
क्षत्रधर्मेण वाप्यत्र वर्तयन्ति गते युगे । युगकी समाप्तिके समय ब्राह्मण शूद्रोंके कर्म करते हैं और शाद्र वैश्योंकी भाँति धनोपार्जन करने लगते हैं अथवा क्षत्रियोंके कर्मसे जीविका चलाने लगते हैं
क्षत्रधर्मेण वाप्यत्र वर्तयन्ति गते युगे । युगान्ते संप्राप्ते लोका जीविकां क्षत्रकर्मणा वहन्ति, वर्णधर्मव्यतिकरश्च जायते ॥
Verse 463
मिथ्या च नखरोमाणि धारयन्ति तदा द्विजा: । गृहस्थलोग करके भारसे डरकर लुटेरे बन जायाँगे। ब्राह्मण मुनियों-जैसी कपटपूर्ण आकृति धारण किये वैश्यवृत्तिसे जीविका चलायेंगे और झूठे दिखावेके लिये नख तथा दाढ़ी-मूछ धारण करेंगे
मिथ्या च नखरोमाणि धारयन्ति तदा द्विजाः । आश्रमभारभयात् केचिद् दस्युत्वं प्रतिपद्यन्ते; मुनिवेषधरा वैश्यवृत्त्या जीविकां वहन्ति, केवलदर्शनेन नखदाढीश्मश्रूणि च वर्धयन्ति ॥
Verse 1323
प्रयत्नेन मया मूर्ध्ना गृहीत्वा हभिवन्दितौ | तात! तदनन्तर मैंने कोमल और लाल रंगकी अँगुलियोंसे सुशोभित लाल-लाल तलवेवाले उस बालकके सुन्दर एवं सुप्रतिष्ठित चरणोंको प्रयत्नपूर्वक पकड़कर उन्हें अपने मस्तकसे प्रणाम किया
प्रयत्नेन मया मूर्ध्ना गृहीत्वाभिवन्दितौ । ततः स तात तस्य बालस्य सुन्दरौ सुप्रतिष्ठितौ चरणौ मृदुलारुणाङ्गुलिशोभितौ रक्ततलौ च प्रयत्नतः गृहीत्वा मस्तके निधाय प्रणतोऽहम् ॥
Yudhiṣṭhira asks how to remain established in dharma while protecting subjects and acting in the world without deviating from svadharma; the response frames doubt itself as a risk to dharmic stability when it becomes excessive suspicion toward sound counsel.
Govern through compassion and protection as if subjects were one’s own children; correct missteps through appropriate giving; honor ancestors and deities; and maintain disciplined respect toward learned authorities, treating dharma as the ruler’s continuous inner alignment in thought, speech, and action.
Yes. The chapter explicitly frames the discourse as conveying past and future knowledge remembered from Vāyu-proclaimed tradition and r̥ṣi-praised purāṇic material, and it closes by noting the audience’s astonishment at the purāṇa-style exposition—signaling its didactic and archival intent.