Adhyaya 90
Udyoga ParvaAdhyaya 9051 Versesयुद्ध आरम्भ नहीं; कूटनीति का निर्णायक चरण—शान्ति-प्रयास और अहंकार की टक्कर से युद्ध की अनिवार्यता बढ़ती प्रतीत होती है।

Adhyaya 90

विदुरस्य कृष्णं प्रति शमोपदेशः (Vidura’s Counsel to Krishna on the Limits of Peace)

Upa-parva: Krishna–Vidura Saṃvāda (Peace-Counsel Context within Udyoga-parva)

Vaiśaṃpāyana reports a nocturnal exchange in which Vidura addresses Kṛṣṇa after Kṛṣṇa has eaten and rested. Vidura argues that Kṛṣṇa’s proposed visit/mission to the Kaurava side is not “well-resolved” in terms of practical reception, because Duryodhana is characterized as transgressing artha and dharma, disregarding śāstra, and being driven by pride, suspicion, ingratitude, and preference for pleasing falsehoods. Vidura predicts that even beneficial advice (śreyo’pi) will not be accepted due to impulsive belligerence. He notes the psychological effect of amassed forces: Duryodhana mistakes military concentration for accomplished success and relies on Karṇa’s perceived capacity to defeat opponents. The chapter further frames the Kaurava coalition as collectively decided against giving the Pāṇḍavas their due, rendering conciliatory speech ineffective—likened to singing to the deaf. Vidura cautions against entering the hostile assembly amid many ill-disposed actors, while simultaneously affirming Kṛṣṇa’s extraordinary power and intelligence; his warning is presented as arising from affection for the Pāṇḍavas and respectful friendship toward Kṛṣṇa.

Chapter Arc: शान्तिदूत बनकर जनार्दन श्रीकृष्ण हस्तिनापुर में दुर्योधन के भवन में प्रवेश करते हैं—ऐसे घर में, जो इन्द्र-भवन के समान वैभवशाली है, पर भीतर नीति का अन्धकार छिपा है। → कक्ष-द्वारों और प्रहरी-व्यवस्था को लाँघते हुए कृष्ण सभा-भवन तक पहुँचते हैं, जहाँ कुरु-राजा और सहस्रों राजाओं की भीड़ है। दुर्योधन पक्ष के लोग औपचारिक सत्कार करते हैं, पर कृष्ण का आगमन उनके अहंकार और भय—दोनों को चुभता है। कृष्ण स्पष्ट कर देते हैं कि उनका आत्मभाव धर्मचारी पाण्डवों से एक है—जो पाण्डवों से द्वेष करता है, वह कृष्ण से भी द्वेष करता है। → दुर्योधन कृष्ण को भोजन-निमन्त्रण देता है; पर केशव उसे अस्वीकार कर देते हैं—दूत का अन्न पहले न्याय से, शान्ति-प्रयास की स्वीकृति से, और धर्म-मार्ग पर चलने की प्रतिज्ञा से जुड़ा है; अन्यथा वह सत्कार भी अपमान बन जाता है। → सभा में कृष्ण का तेज ‘निर्मल सूर्य’ के समान दीखता है; कौरव-राजा और अन्य राजागण उपासना-सत्कार करते हैं, पर कृष्ण का निर्णय अडिग रहता है—वे दुर्योधन के वैभव से नहीं, धर्म के पक्ष से बँधे हैं। → दुर्योधन पूछता है—‘आपके लिए प्रस्तुत अन्न-जल-वस्त्र-शय्या आपने क्यों नहीं ग्रहण किए?’—और आगे होने वाली तीखी नीति-वार्ता का द्वार खुल जाता है।

Shlokas

Verse 1

[दाक्षिणात्य अधिक पाठके १६ “लोक मिलाकर कुल १०६ ३“लोक हैं।] #सस्न का तन (0) अनजाने एकनवतितमो< ध्याय: श्रीकृष्णका दुर्योधनके घर जाना एवं उसके निमन्त्रणको अस्वीकार करके विदुरजीके घरपर भोजन करना वैशम्पायन उवाच पृथामामन्त्रय गोविन्द: कृत्वा चाभिप्रदक्षिणम्‌ । दुर्योधनगृहं शौरिर्भ्यगच्छदरिंदम:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! शत्रुओंका दमन करनेवाले शूरनन्दन श्रीकृष्ण कुन्तीकी परिक्रमा करके एवं उनकी आज्ञा ले दुर्योधनके घर गये

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ପୃଥା (କୁନ୍ତୀ)ଙ୍କୁ ବିଦାୟ ନେଇ ଏବଂ ଶ୍ରଦ୍ଧାରେ ତାଙ୍କୁ ପ୍ରଦକ୍ଷିଣ କରି, ଶତ୍ରୁଦମନକାରୀ ଶୌରିନନ୍ଦନ ଗୋବିନ୍ଦ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କ ଗୃହକୁ ଗଲେ।

Verse 2

लक्ष्म्या परमया युक्त पुरन्दरगृहोपमम्‌ । विचित्रैरासनैर्युक्त प्रविवेश जनार्दन:,वह घर इन्द्रभवनके समान उत्तम शोभासे सम्पन्न था। उसमें यथास्थान विचित्र आसन सजाकर रखे गये थे। श्रीकृष्णने उस गृहमें प्रवेश किया

ସେ ଗୃହ ପରମ ଲକ୍ଷ୍ମୀରେ ଯୁକ୍ତ, ପୁରନ୍ଦର (ଇନ୍ଦ୍ର)ଙ୍କ ଭବନ ସଦୃଶ ଥିଲା। ତାହାରେ ଯଥାସ୍ଥାନେ ବିଚିତ୍ର ଆସନଗୁଡ଼ିକ ସଜାଯାଇଥିଲା। ଜନାର୍ଦନ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ସେ ଗୃହରେ ପ୍ରବେଶ କଲେ।

Verse 3

तस्य कक्ष्या व्यतिक्रम्य तिस्रो द्वा:स्थैरवारित: । ततो<भ्रघनसंकाशं गिरिकूटमिवोच्छितम्‌

ତାହାର ବାହ୍ୟ ପରିସର ଅତିକ୍ରମ କରି, ଦ୍ୱାରପାଳମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା କ୍ରମେ ତିନିଟି ଦ୍ୱାରରେ ରୋକାଯାଇ, ପରେ ସେ ଏକ ଉଚ୍ଚ ଉଦ୍ଧତ ଦୃଶ୍ୟ ଦେଖିଲେ—ଘନ ମେଘପୁଞ୍ଜ ସଦୃଶ ଶ୍ୟାମ, ଏବଂ ପର୍ବତଶିଖର ସଦୃଶ ଉନ୍ନତ।

Verse 4

तत्र राजसहसैश्न कुरुभिश्चाभिसंवृतम्‌

ସେଠାରେ ସେଇ ସ୍ଥାନଟି ସହସ୍ର ସହସ୍ର ରାଜା ଓ କୁରୁମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ସବୁଦିଗରୁ ଘେରାଯାଇ, ଲୋକସମୂହରେ ଠସେଇ ଥିଲା—ଯେନ ଏକ ମହାରାଜସଭା, ଯେଉଁଠି ସତ୍ତା, ସନ୍ଧି-ମିତ୍ରତା ଓ ଧର୍ମର ପ୍ରଶ୍ନ ସାମ୍ନାସାମ୍ନି ତୋଳାଯାଉଥିଲା।

Verse 5

दुःशासनं च कर्ण च शकुनिं चापि सौबलम्‌

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—“(ସେ) ଦୁଃଶାସନ, କର୍ଣ୍ଣ ଏବଂ ସୌବଳପୁତ୍ର ଶକୁନିଙ୍କ ନାମ ମଧ୍ୟ ଉଚ୍ଚାରଣ କଲେ।” ଏହି ପଙ୍କ୍ତି ପରାମର୍ଶ ଓ ବିରୋଧର ମୁଖ୍ୟ କର୍ତ୍ତାମାନଙ୍କୁ ଆଗକୁ ଆଣି, ଯୁଦ୍ଧମୁଖୀ ନୈତିକ ପତନକୁ ଅଧିକ ତୀବ୍ର କରେ।

Verse 6

अभ्यागच्छति दाशाहें धार्तराष्ट्री महायशा:

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ନିର୍ଦ୍ଧାରିତ ସମୟରେ ମହାଯଶସ୍ବିନୀ ଧାର୍ତ୍ତରାଷ୍ଟ୍ରୀ (ଗାନ୍ଧାରୀ) ଆଗକୁ ବଢ଼ି ଆସିଲେ। ଏହି ପଙ୍କ୍ତି ତାଙ୍କର ଗମ୍ଭୀର, ଗରିମାମୟ ପ୍ରବେଶକୁ ସୂଚାଏ ଏବଂ ଯୁଦ୍ଧସଙ୍କଟ ନିକଟ ଆସୁଥିବାବେଳେ କୁରୁଗୃହରେ ଉପଦେଶ ଓ ନୈତିକ ଚାପର ପର୍ବକୁ ପ୍ରସ୍ତୁତ କରେ।

Verse 7

समेत्य धार्तराष्ट्रेण सहामात्येन केशव:

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—କେଶବ (କୃଷ୍ଣ) ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ଓ ତାଙ୍କ ଅମାତ୍ୟମାନଙ୍କ ସହ ଏକତ୍ର ହୋଇ (ବିଷୟଟି ଉପରେ ଆଲୋଚନା କରିବାକୁ) ଅଗ୍ରସର ହେଲେ। ଏହି ପଙ୍କ୍ତି ରାଜ୍ୟସ୍ତରୀୟ ଔପଚାରିକ ପରାମର୍ଶକୁ ସୂଚାଏ, ଯେଉଁଠି ଦାୟିତ୍ୱ ସାଂଘିକ—ଏକ ନୈତିକ ମୁହୂର୍ତ୍ତ, ଯେଉଁବେଳେ ବୁଦ୍ଧିମତୀ ଉପଦେଶ ଦ୍ୱାରା ସଂଘର୍ଷ ରୋକି ଧର୍ମ ରକ୍ଷା ହେବା ଉଚିତ।

Verse 8

तत्र जाम्बूनदमयं पर्यड्कं सुपरिष्कृतम्‌

ସେଠାରେ ଜାମ୍ବୂନଦ ସୁବର୍ଣ୍ଣରେ ନିର୍ମିତ, ଅତ୍ୟନ୍ତ ସୁସଜ୍ଜିତ ଏକ ପର୍ଯ୍ୟଙ୍କ (ଶୟ୍ୟା/ଆସନ) ପ୍ରସ୍ତୁତ ଥିଲା—ଏହା ରାଜବୈଭବ ଓ ଦରବାରୀ ଆତିଥ୍ୟାଚାରର ସୂକ୍ଷ୍ମ ପାଳନକୁ ସୂଚାଏ, ଯେତେବେଳେ ରାଜନୈତିକ ତଣାପୋଡ଼ ଭିତରେ ଭିତରେ ବଢ଼ୁଥିଲା।

Verse 9

विविधास्तरणास्तीर्णमभ्युपाविशदच्युत: । उस राजसभामें सुन्दर रत्नोंसे विभूषित एक सुवर्णमय पर्यक रखा हुआ था, जिसपर भाँति-भाँतिके बिछौने बिछे हुए थे। भगवान्‌ श्रीकृष्ण उसीपर विराजमान हुए ।। ८ ह ।। तस्मिन्‌ गां मधुपर्क चाप्युदकं च जनार्दने

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଅଚ୍ୟୁତ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ବିଭିନ୍ନ ପ୍ରକାର ଆସ୍ତରଣ ପଥାରିତ ସେହି ପର୍ଯ୍ୟଙ୍କରେ ଆସନ ଗ୍ରହଣ କଲେ। ସେହି ରାଜସଭାରେ ସୁନ୍ଦର ରତ୍ନରେ ବିଭୂଷିତ ଏକ ସୁବର୍ଣ୍ଣମୟ ଶୟ୍ୟା ରଖାଯାଇଥିଲା; ତାହାରେ ନାନା ପ୍ରକାର ଶୟନାସ୍ତରଣ ପଥାରା ଥିଲା, ଏବଂ ସେଠାରେ ଭଗବାନ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ମହିମାରେ ବିରାଜିତ ହେଲେ। ପରେ ଜନାର୍ଦ୍ଦନଙ୍କ ସତ୍କାରାର୍ଥ—ଅତିଥିଧର୍ମ ଅନୁସାରେ—ଗାଈ, ମଧୁପର୍କ ଓ ଜଳ ଆଣାଗଲା।

Verse 10

तत्र गोविन्दमासीन प्रसन्नादित्यवर्चसम्‌

ସେଠାରେ ସେ ଗୋବିନ୍ଦଙ୍କୁ ଆସୀନ ଦେଖିଲେ—ପ୍ରସନ୍ନ, ଏବଂ ସୂର୍ଯ୍ୟ ସମ ଦୀପ୍ତିମାନ।

Verse 11

ततो दुर्योधनो राजा वार्ष्णेयं जयतां वरम्‌

ତାପରେ ରାଜା ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ବାର୍ଷ୍ଣେୟଙ୍କୁ—ଜୟୀମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠଙ୍କୁ—ସମ୍ବୋଧନ କଲେ।

Verse 12

ततो दुर्योधन: कृष्णमब्रवीत्‌ कुरुसंसदि

ତାପରେ କୁରୁସଭାରେ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କୁ କହିଲେ।

Verse 13

मृदुपूर्व शठोदर्क कर्णमाभाष्य कौरव: । तब कुरुराज दुर्योधनने कर्णसे सलाह लेकर कौरवसभामें श्रीकृष्णसे पूछा। पूछते समय उसकी वाणीमें पहले तो मृदुता थी, परंतु अन्तमें शठता प्रकट होने लगी थी ।। १२ ६ || कस्मादन्नानि पानानि वासांसि शयनानि च

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—କୌରବ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ପ୍ରଥମେ କର୍ଣ୍ଣଙ୍କୁ ମୃଦୁ ବାଣୀରେ ସମ୍ବୋଧନ କଲେ, କିନ୍ତୁ ଶେଷରେ ତାଙ୍କ କଥାରେ ଶଠତା ପ୍ରକାଶ ପାଇଲା। କର୍ଣ୍ଣଙ୍କ ପରାମର୍ଶ ନେଇ ସେ କୌରବସଭାରେ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ପଚାରିଲେ—“କେଉଁ କାରଣରୁ ଅନ୍ନ-ପାନ, ବସ୍ତ୍ର ଓ ଶୟନ ଇତ୍ୟାଦିର ବ୍ୟବସ୍ଥା କରାଯାଉଛି?”

Verse 14

उभयोश्वाददा: साहामुभयोश्व हिते रत:,आपने तो दोनों पक्षोंको ही सहायता दी है, आप उभयपक्षके हित-साधनमें तत्पर हैं। माधव! महाराज धूृतराष्ट्रके आप प्रिय सम्बन्धी भी हैं। चक्र और गदा धारण करनेवाले गोविन्द! आपको धर्म और अर्थका सम्पूर्णरूपसे यथार्थ ज्ञान भी है; फिर मेरा आतिथ्य ग्रहण न करनेका क्या कारण है; यह मैं सुनना चाहता हूँ

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଆପଣ ଉଭୟ ପକ୍ଷକୁ ସହାୟତା ଦେଇଛନ୍ତି ଏବଂ ଉଭୟଙ୍କ ହିତସାଧନରେ ତତ୍ପର। ମାଧବ! ଆପଣ ମହାରାଜ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ପ୍ରିୟ ସମ୍ବନ୍ଧୀ ମଧ୍ୟ। ଚକ୍ର-ଗଦାଧର ଗୋବିନ୍ଦ! ଧର୍ମ ଓ ଅର୍ଥର ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଏବଂ ଯଥାର୍ଥ ଜ୍ଞାନ ଆପଣଙ୍କୁ ଅଛି; ତେବେ ମୋର ଆତିଥ୍ୟ ଗ୍ରହଣ ନ କରିବାର କାରଣ କ’ଣ? ମୁଁ ତାହା ଶୁଣିବାକୁ ଇଚ୍ଛା କରୁଛି।

Verse 15

सम्बन्धी दयितश्नासि धृतराष्ट्रस्य माधव । त्वं हि गोविन्द धर्मार्थो वेत्थ तत्त्वेन सर्वश: । तत्र कारणमिच्छामि श्रोतुं चक्रगदाधर,आपने तो दोनों पक्षोंको ही सहायता दी है, आप उभयपक्षके हित-साधनमें तत्पर हैं। माधव! महाराज धूृतराष्ट्रके आप प्रिय सम्बन्धी भी हैं। चक्र और गदा धारण करनेवाले गोविन्द! आपको धर्म और अर्थका सम्पूर्णरूपसे यथार्थ ज्ञान भी है; फिर मेरा आतिथ्य ग्रहण न करनेका क्या कारण है; यह मैं सुनना चाहता हूँ

ମାଧବ! ଆପଣ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ପ୍ରିୟ ସମ୍ବନ୍ଧୀ। ଗୋବିନ୍ଦ! ଧର୍ମ ଓ ଅର୍ଥକୁ ଆପଣ ତତ୍ତ୍ୱତଃ ସର୍ବପ୍ରକାରେ ଜାଣନ୍ତି। ତେଣୁ, ଚକ୍ର-ଗଦାଧର, ଆପଣ ମୋର ଆତିଥ୍ୟ କାହିଁକି ଗ୍ରହଣ କରୁନାହାନ୍ତି—ସେ କାରଣ ମୁଁ ଶୁଣିବାକୁ ଇଚ୍ଛା କରୁଛି।

Verse 16

वैशम्पायन उवाच स एवमुक्तो गोविन्द: प्रत्युवाच महामना: । उद्यन्मेघस्वन: काले प्रगृह्म विपुलं भुजम्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्‌! इस प्रकार पूछे जानेपर उस समय महामनस्वी कमलनयन श्रीकृष्णने अपनी विशाल भुजा ऊपर उठाकर राजा दुर्योधनको सजल जलधरके समान गम्भीर वाणीमें उत्तर देना आरम्भ किया। उनका वह वचन परम उत्तम, युक्तिसंगत, दैन्य-रहित प्रत्येक अक्षरकी स्पष्टतासे सुशोभित तथा स्थान-श्रष्टता एवं संकीर्णता आदि दोषोंसे रहित था

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଏପରି କୁହାଯାଇଲେ ମହାମନା ଗୋବିନ୍ଦ ପ୍ରତ୍ୟୁତ୍ତର ଦେଲେ। ସେ ସମୟରେ ସେ ନିଜ ବିଶାଳ ଭୁଜା ଉଠାଇ, ଉଦ୍ୟତ ମେଘଗର୍ଜନା ସଦୃଶ ଗମ୍ଭୀର ସ୍ୱରରେ କଥା ଆରମ୍ଭ କଲେ।

Verse 17

अलघूकृतमग्रस्तमनिरस्तमसंकुलम्‌ । राजीवनेत्रो राजानं हेतुमद्‌ वाक्यमुत्तमम्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्‌! इस प्रकार पूछे जानेपर उस समय महामनस्वी कमलनयन श्रीकृष्णने अपनी विशाल भुजा ऊपर उठाकर राजा दुर्योधनको सजल जलधरके समान गम्भीर वाणीमें उत्तर देना आरम्भ किया। उनका वह वचन परम उत्तम, युक्तिसंगत, दैन्य-रहित प्रत्येक अक्षरकी स्पष्टतासे सुशोभित तथा स्थान-श्रष्टता एवं संकीर्णता आदि दोषोंसे रहित था

ରାଜୀବନେତ୍ର ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ରାଜାଙ୍କୁ ଏକ ଉତ୍ତମ, ହେତୁମୟ ବାକ୍ୟ କହିଲେ—ଯାହା ନ ତୁଚ୍ଛ, ନ ଅପୂର୍ଣ୍ଣ, ନ ଅସଙ୍ଗତ, ନ ଜଟିଳ।

Verse 18

कृतार्था भुज्जते दूता: पूजां गृह्नन्ति चैव ह । कृतार्थ मां सहामात्यं समर्चिष्यसि भारत,“भारत! ऐसा नियम है कि दूत अपना प्रयोजन सिद्ध होनेपर ही भोजन और सम्मान स्वीकार करते हैं। तुम भी मेरा उद्देश्य सिद्ध हो जानेपर ही मेरा और मेरे मन्त्रियोंका सत्कार करना'

ଦୂତମାନଙ୍କର ନିୟମ ଏହି—ପ୍ରୟୋଜନ ସିଦ୍ଧ ହେଲେ ତେବେ ମାତ୍ର ସେମାନେ ଭୋଜନ କରନ୍ତି ଓ ପୂଜା-ସମ୍ମାନ ଗ୍ରହଣ କରନ୍ତି। ତେଣୁ, ହେ ଭାରତ! ମୋର ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟ ସିଦ୍ଧ ହେଲାପରେ, ମୋ ମନ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କ ସହିତ ମୋତେ ଯଥୋଚିତ ଭାବେ ସମ୍ମାନ କର।

Verse 19

एवमुक्तः प्रत्युवाच धार्तराष्ट्रो जनार्दनम्‌ । न युक्त भवतास्मासु प्रतिपत्तुमसाम्प्रतम्‌,यह सुनकर दुर्योधनने जनार्दनसे कहा--“आपको हमलोगोंके साथ ऐसा अनुचित बर्ताव नहीं करना चाहिये”

ଏପରି କୁହାଯାଇଥିବାବେଳେ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ର ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ଜନାର୍ଦ୍ଦନଙ୍କୁ ପ୍ରତିଉତ୍ତର ଦେଲା—“ଏ ସମୟରେ ଆମ ପ୍ରତି ଆପଣଙ୍କର ଅନୁଚିତ ବ୍ୟବହାର ଯୁକ୍ତିସଙ୍ଗତ ନୁହେଁ।”

Verse 20

कृतार्थ वाकृतार्थ च त्वां वयं मधुसूदन । यतामहे पूजयितुं दाशाह न च शकक्‍्नुम:,“दशाहनन्दन मधुसूदन! आपका उद्देश्य सफल हो या न हो, हमलोग तो आपके सम्मानका प्रयत्न करते ही हैं; किंतु हमें सफलता नहीं मिल रही है

“ହେ ମଧୁସୂଦନ! ଆପଣଙ୍କ କାର୍ଯ୍ୟ ସିଦ୍ଧ ହେଉ କି ନ ହେଉ, ହେ ଦାଶାର୍ହ, ଆମେ ଆପଣଙ୍କୁ ପୂଜା-ସତ୍କାର କରିବାକୁ ଚେଷ୍ଟା କରୁଛୁ; କିନ୍ତୁ ପାରୁନାହୁଁ।”

Verse 21

न च तत्‌ कारणं विद्यो यस्मिन्‌ नो मधुसूदन । पूजां कृतां प्रीयमाणैर्नामंस्था: पुरुषोत्तम,“मधुदैत्यका विनाश करनेवाले पुरुषोत्तम! हमें ऐसा कोई कारण नहीं जान पड़ता, जिसके होनेसे आप हमारी प्रेमपूर्वक अर्पित की हुई पूजा ग्रहण न कर सकें

“ହେ ମଧୁସୂଦନ! ଆମେ ପ୍ରେମରେ ଆନନ୍ଦିତ ହୋଇ ଯେ ପୂଜା କରିଛୁ, ତାହା ଆପଣ ଗ୍ରହଣ ନ କରିବେ—ଏପରି କାରଣ କିଛି ଆମେ ଜାଣୁନାହୁଁ। ହେ ପୁରୁଷୋତ୍ତମ! ଏହି ଶ୍ରଦ୍ଧାରୁ ମୁହଁ ଫେରାନ୍ତୁ ନାହିଁ।”

Verse 22

वैरं नो नास्ति भवता गोविन्द न च विग्रह: । स भवान्‌ प्रसमीक्ष्यैतन्नेदृशं वक्तुमहीति,“गोविन्द! आपके साथ हमलोगोंका न तो कोई वैर है और न झगड़ा ही है। इन सब बातोंका विचार करके आपको ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये”

“ହେ ଗୋବିନ୍ଦ! ଆପଣଙ୍କ ସହ ଆମର ନ ବୈର ଅଛି, ନ ଝଗଡ଼ା। ଏହା ସବୁ ଭଲଭାବେ ବିଚାର କରି ଆପଣ ଏପରି କଥା କହିବା ଉଚିତ ନୁହେଁ।”

Verse 23

वैशम्पायन उवाच एवमुक्तः: प्रत्युवाच धार्तराष्ट्रं जनार्दन: । अभिवीक्ष्य सहामात्यं दाशार्ह: प्रहसन्निव,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन! यह सुनकर दशार्हकुलभूषण जनार्दनने मन्त्रियोंसहित दुर्योधनकी ओर देखकर हँसते हुए-से उत्तर दिया

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଏପରି କୁହାଯାଇଥିବାବେଳେ ଜନାର୍ଦ୍ଦନ ଧାର୍ତ୍ତରାଷ୍ଟ୍ର (ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ) କୁ ପ୍ରତିଉତ୍ତର ଦେଲେ। ଦାଶାର୍ହ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ତାଙ୍କ ମନ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କ ସହିତ ତାଙ୍କୁ ଦେଖି, ଯେନ ମନ୍ଦ ହାସ୍ୟ କରୁଥିବା ପରି, କହିଲେ।

Verse 24

नाहं कामाजन्न संरम्भान्न द्वेषान्नार्थकारणात्‌ । न हेतुवादाल्लोभाद्‌ वा धर्म जह्यां कथंचन,“राजन! मैं कामसे, क्रोधसे, द्वेषसे, स्वार्थवश, बहानेबाजी अथवा लोभसे भी किसी प्रकार धर्मका त्याग नहीं कर सकता

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ! କାମନାରୁ, ଉଗ୍ର କ୍ରୋଧରୁ, ଦ୍ୱେଷରୁ, ସ୍ୱାର୍ଥକାରଣରୁ, କୁତର୍କର ଅଜୁହାଟରୁ କିମ୍ବା ଲୋଭରୁ—କୌଣସି ପରିସ୍ଥିତିରେ ମୁଁ ଧର୍ମକୁ ତ୍ୟାଗ କରେନି।

Verse 25

सम्प्रीतिभोज्यान्यन्नानि आपद्धोज्यानि वा पुनः । न च सम्प्रीयसे राजन्‌ न चैवापद्गता वयम्‌,“किसीके घरका अन्न या तो प्रेमके कारण भोजन किया जाता है या आप त्तिमें पड़नेपर। नरेश्वर! प्रेम तो तुम नहीं रखते और किसी आपफत्तिमें हम नहीं पड़े हैं

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ! ଅନ୍ୟର ଘରର ଅନ୍ନ ସ୍ନେହରୁ ଭୋଜନ କରାଯାଏ, କିମ୍ବା ଆପଦରେ ପଡିଲେ। କିନ୍ତୁ ତୁମେ ଆମ ପ୍ରତି ସ୍ନେହ ରଖୁନାହ, ଏବଂ ଆମେ ମଧ୍ୟ କୌଣସି ଆପଦରେ ନୁହେଁ।

Verse 26

अकम्माद्‌ द्वेष्टि वै राजन्‌ जन्मप्रभृति पाण्डवान्‌ | प्रियानुवर्तिनो भ्रातृन्‌ सर्व: समुदितान्‌ गुणै:ः,“राजन! पाण्डव तुम्हारे भाई ही हैं, वे अपने प्रेमियोंका साथ देनेवाले और समस्त सदगुणोंसे सम्पन्न हैं, तथापि तुम जन्मसे ही उनके साथ अकारण ही द्वेष करते हो

ହେ ରାଜନ! ପାଣ୍ଡବମାନେ ତୁମର ଭାଇ—ସେମାନେ ପ୍ରିୟଜନଙ୍କ ପକ୍ଷ ଅନୁସରଣକାରୀ ଏବଂ ସମସ୍ତ ଗୁଣରେ ସମୃଦ୍ଧ; ତଥାପି ତୁମେ ଜନ୍ମରୁ ହିଁ କାରଣ ବିନା ସେମାନଙ୍କୁ ଦ୍ୱେଷ କରୁଛ।

Verse 27

अकस्माच्चैव पार्थानां द्वेषणं नोपपद्यते । धर्मे स्थिता: पाण्डवेया: कस्तान्‌ कि वक्तुमहति,“बिना कारण ही कदुन्तीपुत्रोंके साथ द्वेष रखना तुम्हारे लिये कदापि उचित नहीं है। पाण्डव सदा अपने धर्ममें स्थित रहते हैं, अतः उनके विरुद्ध कौन क्या कह सकता है?

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ପୃଥାପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ପ୍ରତି ହଠାତ୍, କାରଣ ବିନା ଦ୍ୱେଷ ରଖିବା ଯୁକ୍ତିସଙ୍ଗତ ନୁହେଁ। ପାଣ୍ଡବମାନେ ଧର୍ମରେ ଅଟୁଟ; ତେଣୁ ସେମାନଙ୍କ ବିରୋଧରେ କିଏ କ’ଣ କହିପାରିବ?

Verse 28

यस्तान्‌ दवेष्टि स मां द्वेष्टि यस्ताननु स मामनु । ऐकात्म्यं मां गतं विद्धि पाण्डवैर्धर्मचारिभि:,'जो पाण्डवोंसे द्वेष करता है, वह मुझसे भी द्वेष करता है और जो उनके अनुकूल है, वह मेरे भी अनुकूल है। तुम मुझे धर्मात्मा पाण्डवोंके साथ एकरूप हुआ ही समझो

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଯେ ତାଙ୍କୁ ଦ୍ୱେଷ କରେ, ସେ ମୋତେ ମଧ୍ୟ ଦ୍ୱେଷ କରେ; ଯେ ତାଙ୍କ ପକ୍ଷରେ, ସେ ମୋ ପକ୍ଷରେ। ଧର୍ମଚାରୀ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ସହିତ ମୁଁ ଏକାତ୍ମ ହୋଇଛି—ଏହା ଜାଣ।

Verse 29

कामक्रोधानुवर्ती हि यो मोहाद्‌ विरुरुत्सति । गुणवन्तं च यो द्वेष्टि तमाहु: पुरुषाधमम्‌,“जो काम और क्रोधके वशीभूत होकर मोहवश किसी गुणवान्‌ पुरुषके साथ विरोध करना चाहता है, उसे पुरुषोंमें अधम कहा गया है

ଯେ କାମ ଓ କ୍ରୋଧର ବଶୀଭୂତ ହୋଇ, ମୋହବଶତଃ ଗୁଣବାନ୍ ପୁରୁଷଙ୍କୁ ବିରୋଧ କରିବାକୁ ଚାହେ ଏବଂ ତାଙ୍କୁ ଦ୍ୱେଷ କରେ—ତାକୁ ମନୁଷ୍ୟମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଅଧମ କୁହାଯାଏ।

Verse 30

य: कल्याणगुणान्‌ ज्ञातीन्‌ मोहाल्लो भाद दिदृक्षते । सो<जितात्माजितक्रोधो न चिरं तिष्ठति श्रियम्‌,“जो कल्याणमय गुणोंसे युक्त अपने कुटुम्बीजनोंको मोह$ और लोभःकी दृष्टिसे देखना चाहता है, वह अपने मन और क्रोधको न जीतनेवाला पुरुष दीर्घकालतक राजलक्ष्मीका उपभोग नहीं कर सकता

ଯେ ମୋହ ଓ ଲୋଭରେ ନିଜର କଲ୍ୟାଣଗୁଣସମ୍ପନ୍ନ ଜ୍ଞାତିମାନଙ୍କୁ ସ୍ୱାର୍ଥଦୃଷ୍ଟିରେ ଦେଖେ—ଯେ ଆତ୍ମା ଓ କ୍ରୋଧକୁ ଜିତିନାହିଁ—ସେ ଦୀର୍ଘକାଳ ରାଜଶ୍ରୀକୁ ଧାରଣ କରିପାରେ ନାହିଁ।

Verse 31

अथ यो गुणसम्पन्नान्‌ हृदयस्याप्रियानपि । प्रियेण कुरुते वश्यांश्विरं यशसि तिष्ठति,“जो अपने मनको प्रिय न लगनेवाले गुणवान्‌ व्यक्तियोंको भी अपने प्रिय व्यवहारद्वारा वशमें कर लेता है, वह दीर्घकालतक यशस्वी बना रहता है

ଯେ ହୃଦୟକୁ ଅପ୍ରିୟ ଲାଗୁଥିବା ଗୁଣସମ୍ପନ୍ନ ଲୋକମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ନିଜର ପ୍ରିୟ ଓ ମଧୁର ବ୍ୟବହାରଦ୍ୱାରା ଅନୁକୂଳ କରି ନେଇଥାଏ—ସେ ଦୀର୍ଘକାଳ ଯଶରେ ପ୍ରତିଷ୍ଠିତ ରହେ।

Verse 32

(द्विषदन्न न भोक्तव्यं द्विषन्तं नैव भोजयेत्‌ । पाण्डवान्‌ द्विषसे राजन्‌ मम प्राणा हि पाण्डवा: ।। ) “जो द्वेष रखता हो, उसका अन्न नहीं खाना चाहिये। द्वेष रखनेवालेको खिलाना भी नहीं चाहिये। राजन! तुम पाण्डवोंसे द्वेष रखते हो और पाण्डव मेरे प्राण हैं। सर्वमेतन्न भोक्तव्यमन्नं दुष्टगाभिसंहितम्‌ । क्षत्तुरेकस्य भोक्तव्यमिति मे धीयते मति:,“तुम्हारा यह सारा अन्न दुर्भावनासे दूषित है। अतः मेरे भोजन करनेयोग्य नहीं है। मेरे लिये तो यहाँ केवल विदुरका ही अन्न खानेयोग्य है। यह मेरी निश्चित धारणा है”

ଦ୍ୱେଷ ରଖୁଥିବା ଲୋକର ଅନ୍ନ ଭୋଜନ କରିବା ଉଚିତ ନୁହେଁ; ଦ୍ୱେଷୀକୁ ଭୋଜନ କରାଇବା ମଧ୍ୟ ଉଚିତ ନୁହେଁ। ରାଜନ୍, ତୁମେ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କୁ ଦ୍ୱେଷ କରୁଛ—ଏବଂ ପାଣ୍ଡବମାନେ ମୋ ପ୍ରାଣ ସମାନ। ତେଣୁ ତୁମର ଏହି ସମସ୍ତ ଅନ୍ନ ଦୁର୍ଭାବନାରେ ଦୂଷିତ; ମୋ ପାଇଁ ଭୋଜ୍ୟ ନୁହେଁ। ମୋର ନିଶ୍ଚିତ ମତ—ଏଠାରେ କେବଳ କ୍ଷତ୍ତା ବିଦୁରଙ୍କ ଅନ୍ନ ମାତ୍ର ମୋ ପାଇଁ ଭୋଜ୍ୟ।

Verse 33

एवमुक्‍्त्वा महाबाहुर्दुर्योधनममर्षणम्‌ । निश्चक्राम ततः शुभ्राद्‌ धार्तराष्ट्रनिवेशनात्‌,अमर्षशील दुर्योधनसे ऐसा कहकर महाबाहु श्रीकृष्ण उसके भव्य भवनसे बाहर निकले

ଏପରି କହି ମହାବାହୁ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ଅମର୍ଷଶୀଳ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନକୁ ସେଠାରେ ଛାଡ଼ି, ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ଭବ୍ୟ ନିବାସରୁ ବାହାରିଗଲେ।

Verse 34

निर्याय च महाबाहुर्वासुदेवो महामना: । निवेशाय ययौ वेश्म विदुरस्य महात्मन:,वहाँसे निकलकर महामना महाबाहु भगवान्‌ वासुदेव ठहरनेके लिये महात्मा विदुरके भवनमें गये

ସେଠାରୁ ପ୍ରସ୍ଥାନ କରି ମହାବାହୁ, ମହାମନା ବାସୁଦେବ ରାତ୍ରି-ନିବାସ ପାଇଁ ମହାତ୍ମା ବିଦୁରଙ୍କ ଗୃହକୁ ଗଲେ।

Verse 35

तमभ्यगच्छद्‌ द्रोणश्व॒ कृपो भीष्मो5थ बाह्लिक:ः । कुरवश्न महाबाहुं विदुरस्य गृहे स्थितम्‌,उस समय द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, भीष्म, बाह्नलीक तथा अन्य कौरवोंने भी महाबाहु श्रीकृष्णका अनुसरण किया। विदुरके घरमें ठहरे हुए यदुवंशी वीर मधुसूदनसे वे सब कौरव बोले--'वृष्णिनन्दन! हमलोग रत्न-धनसे सम्पन्न अपने घरोंको आपकी सेवामें समर्पित करते हैं!

ତେବେ ଦ୍ରୋଣ, କୃପ, ଭୀଷ୍ମ, ବାହ୍ଲୀକ ଓ ଅନ୍ୟ କୁରୁମାନେ ବିଦୁରଙ୍କ ଗୃହରେ ଅବସ୍ଥିତ ମହାବାହୁ (ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ)ଙ୍କ ନିକଟକୁ ଆସିଲେ।

Verse 36

श्रिया ज्वलन्तं प्रासादमारुरोह महायशा: । द्वारपालोंने रोक-टोक नहीं की। उस राजभवनकी तीन ड्योढ़ियाँ पार करके महायशस्वी श्रीकृष्ण एक ऐसे प्रासादपर आरूढ़ हुए, जो आकाशमें छाये हुए शरद्‌-ऋतुके बादलोंके समान श्वेत, पर्वतशिखरके समान ऊँचा तथा अपनी अद्भुत प्रभासे प्रकाशमान था,त ऊचुर्माधवं वीरं कुरवो मधुसूदनम्‌ । निवेदयामो वार्ष्णेय सरत्नांस्ते गृहान्‌ वयम्‌ उस समय द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, भीष्म, बाह्नलीक तथा अन्य कौरवोंने भी महाबाहु श्रीकृष्णका अनुसरण किया। विदुरके घरमें ठहरे हुए यदुवंशी वीर मधुसूदनसे वे सब कौरव बोले--'वृष्णिनन्दन! हमलोग रत्न-धनसे सम्पन्न अपने घरोंको आपकी सेवामें समर्पित करते हैं!

ମହାୟଶସ୍ବୀ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ଶ୍ରୀରେ ଜ୍ୱଳନ୍ତ ପ୍ରାସାଦକୁ ଆରୋହଣ କଲେ। ତେବେ କୁରୁମାନେ ବୀର ମଧୁସୂଦନ ମାଧବଙ୍କୁ କହିଲେ—“ହେ ବାର୍ଷ୍ଣେୟ! ରତ୍ନସମୃଦ୍ଧ ଆମ ଗୃହଗୁଡ଼ିକୁ ଆମେ ଆପଣଙ୍କ ସେବାରେ ନିବେଦନ କରୁଛୁ।”

Verse 37

तानुवाच महातेजा: कौरवान्‌ मधुसूदन: । सर्वे भवन्तो गच्छन्तु सर्वा मेड5पचिति: कृता,तब महातेजस्वी मधुसूदनने कौरवोंसे कहा--“आप सब लोग अपने घरोंको जाया; आपके द्वारा मेरा सारा सम्मान सम्पन्न हो गया”

ତେବେ ମହାତେଜସ୍ବୀ ମଧୁସୂଦନ କୁରୁମାନଙ୍କୁ କହିଲେ—“ଆପଣମାନେ ସମସ୍ତେ ଏବେ ଯାଆନ୍ତୁ; ଆପଣମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ମୋ ପ୍ରତି ସମସ୍ତ ସମ୍ମାନ-ସତ୍କାର ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ହୋଇଛି।”

Verse 38

यातेषु कुरुषु क्षत्ता दाशार्हमपराजितम्‌ । अभ्यर्चयामास तदा सर्वकामै: प्रयत्नवान्‌

କୁରୁମାନେ ଚାଲିଯାଇବା ପରେ କର୍ତ୍ତବ୍ୟନିଷ୍ଠ କ୍ଷତ୍ତା (ବିଦୁର) ସେତେବେଳେ ଅପରାଜିତ ଦାଶାର୍ହ (ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ)ଙ୍କୁ ସମସ୍ତ ପ୍ରକାର କାମ୍ୟ ଉପଚାରରେ ଯତ୍ନପୂର୍ବକ ସତ୍କାର କଲେ।

Verse 39

कौरवोंके चले जानेपर विदुरजीने कभी पराजित न होनेवाले दशार्हनन्दन श्रीकृष्णको समस्त मनोवांछित वस्तुएँ समर्पित करके प्रयत्नपूर्वक उनका पूजन किया ।। ततः क्षत्तान्नपानानि शुचीनि गुणवन्ति च । उपाहरदनेकानि केशवाय महात्मने

କୌରବମାନେ ଚାଲିଯାଇବା ପରେ ବିଦୁର ମହାତ୍ମା କେଶବ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ଅନେକ ପ୍ରକାର ଶୁଚି ଓ ଗୁଣବତୀ ଅନ୍ନ-ପାନ ଆଣି ଅର୍ପଣ କଲେ ଏବଂ ମନୋବାଞ୍ଛିତ ବସ୍ତୁ ସମର୍ପଣ କରି ପ୍ରୟତ୍ନପୂର୍ବକ ପୂଜା କଲେ।

Verse 40

तदनन्तर उन्होंने अनेक प्रकारके पवित्र एवं गुणकारक अन्न-पान महात्मा केशवको अर्पित किये ।। तैस्तर्पयित्वा प्रथमं ब्राह्मणान्‌ मघुसूदन: । वेदविद्धयो ददौ कृष्ण: परमद्रविणान्यपि,मधुसूदनने उस अन्न-पानसे पहले ब्राह्मणोंको तृप्त किया, फिर उन्होंने उन वेदवेत्ताओंको श्रेष्ठ धन भी दिया

ତାପରେ ସେମାନେ ମହାତ୍ମା କେଶବଙ୍କୁ ଅନେକ ପ୍ରକାର ପବିତ୍ର ଓ ଗୁଣକର ଅନ୍ନ-ପାନ ଅର୍ପଣ କଲେ। ମଧୁସୂଦନ ପ୍ରଥମେ ସେହି ଭୋଜନରେ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କୁ ତୃପ୍ତ କରି, ପରେ ବେଦବିଦ୍ମାନଙ୍କୁ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଧନ ମଧ୍ୟ ଦାନ କଲେ।

Verse 41

ततो<नुयायिभि: सार्थ मरुद्धिरिव वासव: । विदुरान्नानि बुभुजे शुचीनि गुणवन्ति च,तदनन्तर देवताओंसहित इन्द्रकी भाँति अनुचरोंसहित भगवान्‌ श्रीकृष्णने विदुरजीके पवित्र एवं गुणकारक अन्न-पान ग्रहण किये

ତାପରେ ଅନୁଚରମାନଙ୍କ ସହ—ମରୁତମାନଙ୍କ ସହିତ ବାସବ (ଇନ୍ଦ୍ର) ପରି—ଭଗବାନ୍ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ବିଦୁରଙ୍କ ଅର୍ପିତ ଶୁଚି ଓ ଗୁଣବତୀ ଅନ୍ନ-ପାନ ଗ୍ରହଣ କରି ଭୋଜନ କଲେ।

Verse 46

धार्तराष्ट्र महाबाहुं ददर्शासीनमासने । वहाँ उन्होंने सिंहासनपर बैठे हुए धृतराष्ट्रपुत्र महाबाहु दुर्योधनको देखा, जो सहस्रों राजाओं तथा कौरवोंसे घिरा हुआ था

ସେଠାରେ ସେ ସିଂହାସନରେ ଆସୀନ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ର ମହାବାହୁ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କୁ ଦେଖିଲେ; ସେ କୌରବମାନେ ଓ ସହସ୍ର ରାଜାମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ଘେରାଯାଇଥିଲେ।

Verse 56

दुर्योधनसमीपे तानासनस्थान्‌ ददर्श सः । दुर्योधनके पास ही दुःशासन, कर्ण तथा सुबलपुत्र शकुनि--ये भी आसनोंपर बैठे थे। श्रीकृष्णने उनको भी देखा

ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କ ସମୀପରେ ନିଜ ନିଜ ଆସନରେ ବସିଥିବା ଦୁଃଶାସନ, କର୍ଣ୍ଣ ଏବଂ ସୁବଳପୁତ୍ର ଶକୁନିଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ଦେଖିଲେ।

Verse 66

उदतिष्ठत्‌ सहामात्य: पूजयन्‌ मधुसूदनम्‌ । दशाहनन्दन श्रीकृष्णके आते ही महायशस्वी दुर्योधन मधुसूदनका सम्मान करते हुए मन्त्रियोंसहित उठकर खड़ा हो गया

ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ଆସିବାମାତ୍ରେ ମହାଯଶସ୍ବୀ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରନନ୍ଦନ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ, ମଧୁସୂଦନଙ୍କୁ ସମ୍ମାନ କରି, ମନ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କ ସହିତ ଉଠି ଦାଁଡ଼ିଲା।

Verse 76

राजभिस्तत्र वाष्णेय: समागच्छद्‌ यथावय: । मन्त्रियोंसहित दुर्योधनसे मिलकर वृष्णिकुलभूषण केशव अवस्थाके अनुसार वहाँ सभी राजाओंसे यथायोग्य मिले

ସେଠାରେ ବୃଷ୍ଣିକୁଳଭୂଷଣ କେଶବ, ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କ ସହ ଏବଂ ମନ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କ ସହିତ, ପ୍ରତ୍ୟେକଙ୍କ ପଦମର୍ଯ୍ୟାଦା ଓ ଅବସ୍ଥା ଅନୁଯାୟୀ, ସମବେତ ସମସ୍ତ ରାଜାଙ୍କୁ ଯଥାଯୋଗ୍ୟ ଭାବେ ମିଶିଲେ।

Verse 90

इस प्रकार श्रीमह्याभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें श्रीकृष्ण-कुन्ती- संवादविषयक नब्बेवाँ अध्याय पूरा हुआ

ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ଭଗବଦ୍ୟାନପର୍ବରେ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ-କୁନ୍ତୀ-ସଂବାଦବିଷୟକ ନବ୍ବେତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।

Verse 91

इति श्रीमहा भारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि श्रीकृष्णदुर्योधनसंवादे एकनवतितमो<ध्याय:

ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ଭଗବଦ୍ୟାନପର୍ବରେ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ-ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ-ସଂବାଦବିଷୟକ ଏକନବତିତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।

Verse 96

निवेदयामास तदा गृहान्‌ राज्यं च कौरव: । उस समय कुरुराजने जनार्दनकी सेवामें गौ, मधुपर्क, जल, गृह तथा राज्य सब कुछ निवेदन कर दिया

ସେତେବେଳେ କୌରବରାଜ ଜନାର୍ଦନଙ୍କ ସେବାରେ ନିଜ ଗୃହ, ଜଳ, ମଧୁପର୍କ, ଗୋ—ଏବଂ ଏତିକି ନୁହେଁ, ରାଜ୍ୟ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ—ସବୁକିଛି ନିବେଦନ କଲା।

Verse 106

उपासांचक्रिरे सर्वे कुरवो राजभि: सह । उस पर्यकपर बैठे हुए भगवान्‌ गोविन्द निर्मल सूर्यके समान तेजस्वी प्रतीत हो रहे थे। उस समय राजाओंसहित समस्त कौरव उनके पास आकर बैठ गये

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସମବେତ ରାଜାମାନଙ୍କ ସହ ସମସ୍ତ କୁରୁମାନେ ଭଗବାନ୍ ଗୋବିନ୍ଦଙ୍କୁ ଉପାସନା କରି ପ୍ରଣାମ କଲେ। ସେ ପର୍ୟ୍ୟଙ୍କରେ ଆସୀନ ଥାଇ ନିର୍ମଳ, ନିର୍ମେଘ ସୂର୍ଯ୍ୟ ପରି ତେଜସ୍ୱୀ ଦିଶୁଥିଲେ। ତାପରେ ରାଜାମାନଙ୍କ ସହ ସମଗ୍ର କୌରବସମୂହ ତାଙ୍କ ନିକଟକୁ ଆସି ବସିଲା।

Verse 116

न्यमन्त्रयद्‌ भोजनेन नाभ्यनन्दच्च केशव: । तदनन्तर राजा दुर्योधनने विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ श्रीकृष्णको भोजनके लिये निमन्त्रित किया; परंतु केशवने उस निमन्त्रणको स्वीकार नहीं किया

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ରାଜା ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ବିଜୟୀ ବୀରମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ଭୋଜନ ପାଇଁ ନିମନ୍ତ୍ରଣ କଲା; କିନ୍ତୁ କେଶବ ସେହି ନିମନ୍ତ୍ରଣକୁ ନ ଅନୁମୋଦନ କଲେ, ନ ଗ୍ରହଣ କଲେ।

Verse 136

त्वदर्थमुपनीतानि नाग्रहीस्त्वं जनार्दन | (दुर्योधन बोला--) जनार्दन! आपके लिये अन्न, जल, वस्त्र और शय्या आदि जो वस्तुएँ प्रस्तुत की गयीं, उन्हें आपने ग्रहण क्‍यों नहीं किया?

ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—ଜନାର୍ଦନ! ଆପଣଙ୍କ ପାଇଁ ଅନ୍ନ, ଜଳ, ବସ୍ତ୍ର ଓ ଶୟ୍ୟା ଆଦି ଯାହା ଉପସ୍ଥାପିତ ହୋଇଥିଲା, ଆପଣ କାହିଁକି ଗ୍ରହଣ କଲେ ନାହିଁ?

Frequently Asked Questions

Whether a principled peace mission should proceed when the opposing leadership is assessed as unwilling to accept equitable restitution—raising the dilemma between attempting śama through counsel and avoiding futile or risky engagement in a hostile assembly.

Effective ethical action requires both right intention and situational discernment: speech and counsel have limits when recipients are governed by passion and prestige, and when collective resolve is fixed against justice.

No explicit phalaśruti is stated; the meta-level function is diagnostic—clarifying how adharma can become institutionally stabilized, thereby explaining why even exemplary counsel may not alter outcomes.