
अक्षविजय-प्रसङ्गः (Escalation of Wagers and Shakuni’s Repeated Declarations of Victory)
Upa-parva: Dyūta Parva (Dice-Match Episode)
The chapter records a patterned escalation in the dice match. Śakuni challenges Yudhiṣṭhira to name any remaining “unconquered” wealth. Yudhiṣṭhira responds by enumerating vast, near-hyperbolic measures of treasure and then successively concrete holdings: cattle and horses, settlements and land, and personal ornaments. After each declaration, Vaiśaṃpāyana notes Śakuni’s settled resolve and reliance on deception, followed by the repeated verdict “jitam” (won). The stakes then shift from property to persons: Nakula is implicitly drawn into the wager, and Sahadeva is offered next, with Yudhiṣṭhira framing them through virtues and affection. Arjuna and Bhīma are subsequently invoked as unparalleled leaders in battle and protection, yet are still wagered and lost as Śakuni continues the same refrain. The dialogue includes Yudhiṣṭhira’s ethical protest that Śakuni seeks to divide well-disposed brothers, contrasted with Śakuni’s taunting civility and gambler’s psychology. The sequence culminates in Śakuni proposing Draupadī (Kṛṣṇā Pāñcālī) as the remaining stake; Yudhiṣṭhira describes her beauty and qualities in extended imagery and agrees to wager her. The assembly reacts with distress and condemnation, while Dhṛtarāṣṭra’s repeated questioning and some courtiers’ jubilation reveal polarized institutional sentiment.
Chapter Arc: विदुर का प्रस्थान—महाबुद्धिमान् क्षत्त विदुर मार्ग पार कर धर्मपुत्र युधिष्ठिर की राजधानी में प्रवेश करते हैं, जहाँ राजगृह कुबेर-भवन-सा दीप्तिमान है। → युधिष्ठिर विदुर के मनोहर हर्ष को देखकर कुशल-क्षेम पूछते हैं और परिवार-जन की स्थिति जानना चाहते हैं। इसके बाद पाण्डव राजकीय मर्यादा के अनुसार रथारूढ़ होकर (बाह्लीक-योजित रथ) हस्तिनापुर की ओर बढ़ते हैं और वहाँ उपस्थित राजाओं—सोमदत्त, दुर्योधन, शल्य, शकुनि, दुःशासन आदि—से औपचारिक भेंट करते हैं। सत्कार, रत्नमय गृह, स्त्रियों (दुःशला-प्रमुख) का स्वागत—सबके भीतर एक अनकहा दबाव बनता है कि यह मिलन केवल सौजन्य नहीं, किसी बड़े आयोजन की भूमिका है। → रात सुखपूर्वक बिताकर प्रातः संध्योपासनादि नित्यकर्म के बाद पाण्डव रमणीय सभा में प्रवेश करते हैं; वहाँ ‘जुआरियों’ द्वारा अभिनन्दन—सभा का स्वर बदल देता है और संकेत मिलता है कि आगे का केंद्र राजधर्म नहीं, द्यूत-क्रीड़ा होगी। → पाण्डव राजकीय अनुशासन में दिनचर्या निभाते हुए (स्त्रियों से संवाद, व्यायाम, केश-प्रसाधन, भोजन) सभा-जीवन में सम्मिलित हो जाते हैं; बाह्यतः सब कुछ शिष्टाचार और ऐश्वर्य से परिपूर्ण दिखता है। → सभा में जुआरियों की उपस्थिति और अभिनन्दन यह प्रश्न छोड़ देता है—क्या युधिष्ठिर इस निमंत्रण को धर्मसम्मत सीमा में रख पाएँगे, या द्यूत का जाल उन्हें बाँध लेगा?
Verse 1
अपन बछ। है २ >> अष्टपञ्चाशत्तमो< ध्याय: विदुर और युधिष्ठिरकी बातचीत तथा युधिष्ठिरका हस्तिनापुरमें जाकर सबसे मिलना वैशम्पायन उवाच ततः प्रायाद् विदुरो5श्वैरुदारै- महाजवैब॑लिभि: साधुदान्तै: । बलान्नियुक्तो धृतराष्ट्रेण राज्ञा मनीषिणां पाण्डवानां सकाशे,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर राजा धृतराष्ट्रके बलपूर्वक भेजनेपर विदुरजी अत्यन्त वेगशाली, बलवान् और अच्छी प्रकार काबूमें किये हुए महान् अश्वोंसे जुते रथपर सवार हो परम बुद्धिमान पाण्डवोंके समीप गये
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଜନମେଜୟ! ତାପରେ ରାଜା ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ଦୃଢ଼ ଆଦେଶରେ ପ୍ରେରିତ ହୋଇ, ବିଦୁର ଉତ୍ତମ, ଅତିବେଗଶାଳୀ, ବଳବାନ ଓ ସୁଶିକ୍ଷିତ ଅଶ୍ୱଯୁକ୍ତ ରଥରେ ଆରୋହଣ କରି, ପ୍ରଜ୍ଞାବାନ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ନିକଟକୁ ଗଲେ।
Verse 2
सो$5भिपत्य तदध्वानमासाद्य नृपते: पुरम् प्रविवेश महाबुद्धि: पूज्यमानो द्विजातिभि:,महाबुद्धिमान् विदुरजी उस मार्गको तय करके राजा युधिष्ठिरकी राजधानीमें जा पहुँचे और वहाँ द्विजातियोंसे सम्मानित होकर उन्होंने नगरमें प्रवेश किया
ସେ ମାର୍ଗକୁ ଶୀଘ୍ର ଅତିକ୍ରମ କରି, ମହାବୁଦ୍ଧିମାନ ବିଦୁର ରାଜାଙ୍କ ନଗରକୁ ପହଞ୍ଚିଲେ ଏବଂ ଦ୍ୱିଜମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ପୂଜିତ-ସମ୍ମାନିତ ହୋଇ ରାଜଧାନୀରେ ପ୍ରବେଶ କଲେ।
Verse 3
स राजगृहमासाद्य कुबेरभवनोपमम् | अभ्यागच्छत धर्मात्मा धर्मपुत्रं युधिष्ठिरम्,कुबेरके भवनके समान सुशोभित राजमहलमें जाकर धर्मात्मा विदुर धर्मपुत्र युधिष्ठिरसे मिले। सत्यवादी महात्मा अजमीढनन्दन अजातशत्रु राजा युधिष्ठिरने विदुरजीका यथावत् आदर-सत्कार करके उनसे पुत्रसहित धृतराष्ट्रकी कुशल पूछी
କୁବେରଭବନ ସଦୃଶ ଶୋଭାମୟ ରାଜମହଳକୁ ପହଞ୍ଚି ଧର୍ମାତ୍ମା ବିଦୁର ଧର୍ମପୁତ୍ର ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ ଭେଟିଲେ। ସତ୍ୟବାଦୀ, ମହାତ୍ମା, ଅଜମୀଢନନ୍ଦନ ଅଜାତଶତ୍ରୁ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ବିଦୁରଙ୍କୁ ଯଥାବିଧି ଆଦର-ସତ୍କାର କରି, ପରେ ପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ସହିତ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ କୁଶଳ-କ୍ଷେମ ପଚାରିଲେ।
Verse 4
त॑ वै राजा सत्यधृतिर्महात्मा अजातशन्रुरविंदुरं यथावत् । पूजापर्व प्रतिगृह्माजमीढ- स्ततो<पृच्छद् धृतराष्ट्रं सपुत्रम्,कुबेरके भवनके समान सुशोभित राजमहलमें जाकर धर्मात्मा विदुर धर्मपुत्र युधिष्ठिरसे मिले। सत्यवादी महात्मा अजमीढनन्दन अजातशत्रु राजा युधिष्ठिरने विदुरजीका यथावत् आदर-सत्कार करके उनसे पुत्रसहित धृतराष्ट्रकी कुशल पूछी
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ତାପରେ ସତ୍ୟଧୃତିଧାରୀ ମହାତ୍ମା, ଅଜାତଶତ୍ରୁ, ଅଜମୀଢବଂଶଜ ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିର ବିଦୁରଙ୍କୁ ଯଥାବିଧି ସ୍ୱୀକାର କରି ପୂଜା-ସତ୍କାର କଲେ। ଆଚାରପୂର୍ବକ ମର୍ଯ୍ୟାଦା ସମାପ୍ତ ହେଲାପରେ ସେ ପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ସହିତ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ କୁଶଳ-କ୍ଷେମ ପଚାରିଲେ।
Verse 5
युधिषछ्िर उवाच विज्ञायते ते मनसो<प्रहर्ष: कच्चित् क्षत्त: कुशलेनागतो5सि । कच्चित् पुत्रा: स्थविरस्यानुलोमा वशानुगाश्चापि विशो5थ कच्चित्,युधिष्ठिर बोले--विदुरजी! आपका मन प्रसन्न नहीं जान पड़ता। आप कुशलसे तो आये हैं? बूढ़े राजा धृतराष्ट्रके पुत्र उनके अनुकूल चलते हैं न? तथा सारी प्रजा उनके वशमें हैन?
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ହେ କ୍ଷତ୍ତା (ବିଦୁର), ତୁମ ମନରେ ହର୍ଷ ଦେଖାଯାଉନାହିଁ; ତୁମେ କୁଶଳରେ ଆସିଛ କି? ବୃଦ୍ଧ ରାଜାଙ୍କ ପୁତ୍ରମାନେ କି ତାଙ୍କ ଅନୁକୂଳ ଚାଲୁଛନ୍ତି? ଏବଂ ପ୍ରଜାମାନେ ମଧ୍ୟ କି ତାଙ୍କ ବଶରେ, ଆଜ୍ଞାକାରୀ ଅଛନ୍ତି?
Verse 6
विदुर उवाच राजा महात्मा कुशली सपुत्र आस्ते वृतो ज्ञातिभिरिन्द्रकल्प: । प्रीतो राजन् पुत्रगणैर्विनीतै- विशोक एवात्मरतिर्महात्मा,विदुरने कहा--राजन! इन्द्रके समान प्रभावशाली महामना राजा धुृतराष्ट्र अपने जातिभाइयों तथा पुत्रोंसहित सकुशल हैं। अपने विनीत पुत्रोंसे वे प्रसन्न रहते हैं। उनमें शोकका अभाव है। वे महामना अपनी आत्मामें ही अनुराग रखनेवाले हैं
ବିଦୁର କହିଲେ—ରାଜନ, ଇନ୍ଦ୍ରସଦୃଶ ପ୍ରଭାବଶାଳୀ ମହାତ୍ମା ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ସହିତ କୁଶଳରେ ଅଛନ୍ତି; ଜ୍ଞାତି-ବନ୍ଧୁମାନେ ତାଙ୍କୁ ଘେରି ରହିଛନ୍ତି। ବିନୀତ ପୁତ୍ରମାନଙ୍କୁ ଦେଖି ସେ ପ୍ରୀତ; ସେ ଶୋକରହିତ, ଏବଂ ସେଇ ମହାତ୍ମା ଆତ୍ମସନ୍ତୋଷରେ ରମଣ କରନ୍ତି।
Verse 7
इदं तु त्वां कुरुगाजो 5 भ्युवाच पूर्व पृष्टवा कुशलं चाव्ययं च । इयं सभा त्वत्सभातुल्यरूपा भ्रातृणां ते दृश्यतामेत्य पुत्र,कुरुराज धृतराष्ट्रने पहले तुमसे कुशल और आरोग्य पूछकर यह संदेश दिया है कि वत्स! मैंने तुम्हारी सभाके समान ही एक सभा तैयार करायी है। तुम अपने भाइयोंके साथ आकर अपने दुर्योधन आदि भाइयोंकी इस सभाको देखो। इसमें सभी इष्ट-मित्र मिलकर द्यूतक्रीड़ा करें और मन बहलावें। हम सभी कौरव तुम सबसे मिलकर बहुत प्रसन्न होंगे
କିନ୍ତୁ ପ୍ରଥମେ କୁରୁରାଜ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ତୁମ କୁଶଳ ଓ ଅକ୍ଷୟ ଆରୋଗ୍ୟ ପଚାରି ଏହି ସନ୍ଦେଶ ଦେଇଛନ୍ତି—‘ବତ୍ସ, ତୁମ ସଭା ସମାନ ରୂପବତୀ ଏହି ସଭା ପ୍ରସ୍ତୁତ କରାଯାଇଛି; ତୁମେ ଭାଇମାନଙ୍କ ସହିତ ଆସି ଏହାକୁ ଦେଖ।’
Verse 8
समागम्य भ्रातृभि: पार्थ तस्यां सुहृद्द्यूत॑ क्रियतां रम्यतां च | प्रीयामहे भवतां संगमेन समागता: कुरवश्चापि सर्वे,कुरुराज धृतराष्ट्रने पहले तुमसे कुशल और आरोग्य पूछकर यह संदेश दिया है कि वत्स! मैंने तुम्हारी सभाके समान ही एक सभा तैयार करायी है। तुम अपने भाइयोंके साथ आकर अपने दुर्योधन आदि भाइयोंकी इस सभाको देखो। इसमें सभी इष्ट-मित्र मिलकर द्यूतक्रीड़ा करें और मन बहलावें। हम सभी कौरव तुम सबसे मिलकर बहुत प्रसन्न होंगे
ବିଦୁର କହିଲେ—ହେ ପାର୍ଥ! ଭ୍ରାତୃମାନଙ୍କ ସହ ଏଠାକୁ ଆସି ସେଇ ରମ୍ୟ ନୂତନ ସଭାଗୃହ ଦେଖ। ସେଠାରେ ସୁହୃଦ ଓ ହିତେଚ୍ଛୁମାନେ ଏକତ୍ର ହୋଇ ବିନୋଦାର୍ଥେ ଦ୍ୟୂତକ୍ରୀଡା କରୁନ୍ତୁ। ତୁମ ସଙ୍ଗମରେ ଆମେ ସମସ୍ତ କୁରୁ, ହେ କୁରୁରାଜ, ଅତ୍ୟନ୍ତ ପ୍ରସନ୍ନ ହେବୁ।
Verse 9
दुरोदरा विहिता ये तु तत्र महात्मना धृतराष्ट्रेण राज्ञा । तान् द्रक्ष्य्से कितवान् संनिविष्टा- नित्यागतो<हं नूपते तज्जुषस्व,महामना राजा धृतराष्ट्रने वहाँ जो जूएके स्थान बनवाये हैं, उनको और वहाँ जुटकर बैठे हुए धूर्त जुआरियोंको तुम देखोगे। राजन! मैं इसीलिये आया हूँ। तुम चलकर उस सभा एवं द्यूतक्रीड़ाका सेवन करो
ବିଦୁର କହିଲେ—ହେ ରାଜନ! ମହାତ୍ମା ରାଜା ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ଯେଉଁଠାରେ ଦ୍ୟୂତସ୍ଥାନ ବ୍ୟବସ୍ଥା କରାଇଛନ୍ତି, ସେଗୁଡ଼ିକୁ ତୁମେ ଦେଖିବ; ଏବଂ ସେଠାରେ ଏକତ୍ର ବସିଥିବା ଧୂର୍ତ୍ତ ଜୁଆଡ଼ିମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ। ଏହି କାରଣରୁ ମୁଁ ତୁମ ପାଖକୁ ଆସିଛି; ତୁମେ ଯାଇ ସେଇ ସଭା ଓ ଦ୍ୟୂତକ୍ରୀଡାକୁ ଗ୍ରହଣ କର।
Verse 10
युधिछिर उवाच द्यूते क्षत्त: कलहो विद्यते नः को वै द्यूत॑ रोचयेद् बुध्यमान: । कि वा भवान् मन्यते युक्तरूपं भवद्वाक्ये सर्व एव स्थिता: सम,युधिष्ठटिरने पूछा--विदुरजी! जूएमें तो झगड़ा-फसाद होता है। कौन समझदार मनुष्य जूआ खेलना पसंद करेगा अथवा आप क्या ठीक समझते हैं; हम सब लोग तो आपकी आज्ञाके अनुसार ही चलनेवाले हैं
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ହେ କ୍ଷତ୍ତୃ (ବିଦୁର)! ଦ୍ୟୂତରେ କଳହ-ବିବାଦ ହୁଏ; ତେବେ କେଉଁ ବୁଦ୍ଧିମାନ ଲୋକ ଦ୍ୟୂତକୁ ରୁଚି କରିବ? ଆପଣ ଯାହାକୁ ଯୁକ୍ତ ଓ ଯଥୋଚିତ ଭାବନ୍ତି, ସେହି କଥା କହନ୍ତୁ; ଆମେ ସମସ୍ତେ ଆପଣଙ୍କ ବାକ୍ୟାନୁସାରେ ଅବସ୍ଥିତ।
Verse 11
विदुर उवाच जानाम्यहं द्यूतमनर्थमूलं कृतश्च यत्नो5स्य मया निवारणे । राजा च मां प्राहिणोत् त्वत्सकाशं श्र॒त्वा विद्वन्छेय इहाचरस्व,विदुरजीने कहा--विद्वन्! मैं जानता हूँ, जूआ अनर्थकी जड़ है; इसीलिये मैंने उसे रोकनेका प्रयत्न भी किया तथापि राजा धुृतराष्ट्रने मुझे तुम्हारे पास भेजा है, यह सुनकर तुम्हें जो कल्याणकर जान पड़े, वह करो
ବିଦୁର କହିଲେ—ହେ ବିଦ୍ୱନ! ମୁଁ ଜାଣେ ଦ୍ୟୂତ ଅନର୍ଥର ମୂଳ; ଏହାକୁ ନିବାରିବାକୁ ମୁଁ ପ୍ରୟାସ ମଧ୍ୟ କରିଛି। ତଥାପି ରାଜା ମୋତେ ତୁମ ପାଖକୁ ପଠାଇଛନ୍ତି। ଏହା ଶୁଣି, ଏଠାରେ ତୁମକୁ ଯାହା ଶ୍ରେୟସ୍କର ଲାଗେ, ସେହି କର।
Verse 12
युधिछिर उवाच के तत्रान्ये कितवा दीव्यमाना विना राज्ञो धृतराष्ट्रस्य पुत्रै: । पृच्छामि त्वां विदुर ब्रूहि नस्तान् यैर्दीव्याम: शतश: संनिपत्य,युधिष्ठिरने पूछा--विदुरजी! वहाँ राजा धृतराष्ट्रके पुत्रोंकी छोड़कर दूसरे कौन-कौन धूर्त जुआ खेलनेवाले हैं? यह मैं आपसे पूछता हूँ। आप उन सबको बताइये, जिनके साथ मिलकर और सैकड़ोंकी बाजी लगाकर हमें जुआ खेलना पड़ेगा
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ହେ ବିଦୁର! ରାଜା ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ପୁତ୍ରମାନଙ୍କୁ ଛାଡ଼ି ସେଠାରେ ଆଉ କେଉଁ କେଉଁ ଧୂର୍ତ୍ତ ଜୁଆଡ଼ି ଦ୍ୟୂତ ଖେଳୁଛନ୍ତି? ମୁଁ ଆପଣଙ୍କୁ ପଚାରୁଛି—ସେମାନଙ୍କୁ ଆମକୁ କହନ୍ତୁ; ଯେମାନଙ୍କ ସହ ଏକତ୍ର ହୋଇ ଶତଶଃ ପଣ ରଖି ଆମେ ଦ୍ୟୂତ ଖେଳିବାକୁ ପଡ଼ିବ।
Verse 13
विदुर उवाच गान्धारराज: शकुनिर्विशाम्पते राजातिदेवी कृतहस्तो मताक्ष: । विविंशतिक्षित्रसेनश्ष॒ राजा सत्यव्रत: पुरुमित्रो जयश्वल,विदुरने कहा--राजन्! वहाँ गान्धारराज शकुनि है, जो जुएका बहुत बड़ा खिलाड़ी है। वह अपनी इच्छाके अनुसार पासे फेंकनेमें सिद्ध॒हस्त है। उसे द्यूतविद्याके रहस्यका ज्ञान है। उसके सिवा राजा विविंशति, चित्रसेन, राजा सत्यव्रत, पुरुमित्र और जय भी रहेंगे
ବିଦୁର କହିଲେ—ହେ ପ୍ରଜାପତି ରାଜନ! ସେଠାରେ ଗାନ୍ଧାରରାଜ ଶକୁନି ଅଛି—ଅତ୍ୟନ୍ତ ନିପୁଣ ଜୁଆରି; ନିଜ ଇଚ୍ଛାମତେ ପାଶା ଛାଡ଼ିବାରେ ସିଦ୍ଧହସ୍ତ ଏବଂ ଦ୍ୟୂତର ଗୁପ୍ତ କୌଶଳ ଜାଣେ। ତାଙ୍କ ସହ ରାଜା ବିବିଂଶତି, ଚିତ୍ରସେନ, ରାଜା ସତ୍ୟବ୍ରତ, ପୁରୁମିତ୍ର ଓ ଜୟ ମଧ୍ୟ ଥିବେ।
Verse 14
युधिष्ठिर उवाच महाभया: कितवा: संनिविष्टा मायोपधा देवितारोअत्र सन्ति । धात्रा तु दिष्टस्य वशे किलेदं सर्व जगत् तिष्ठति न स्वतन्त्रम्,युधिष्ठिर बोले--तब तो वहाँ बड़े भयंकर, कपटी और धूर्त जुआरी जुटे हुए हैं। विधाताका रचा हुआ यह सम्पूर्ण जगत् दैवके ही अधीन है; स्वतन्त्र नहीं है
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ତେବେ ସେଠାରେ ମହାଭୟଙ୍କର ଜୁଆରି—ମାୟା ଓ କପଟରେ ପୂର୍ଣ୍ଣ ଧୂର୍ତ୍ତ—ଏକତ୍ର ହୋଇଛନ୍ତି। କିନ୍ତୁ ଏହି ସମଗ୍ର ଜଗତ ବିଧାତାଙ୍କ ନିର୍ଦ୍ଧାରିତ ଭାଗ୍ୟର ଅଧୀନରେ ଅଛି; ସ୍ୱାଧୀନ ନୁହେଁ।
Verse 15
नाहं राज्ञो धृतराष्ट्रस्य शासना- न्न गन्तुमिच्छामि कवे दुरोदरम् | इष्टो हि पुत्रस्य पिता सदैव तदस्मि कर्ता विदुरात्थ मां यथा
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ହେ ଜ୍ଞାନୀ! କେବଳ ରାଜା ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ଆଜ୍ଞାରେ ମୁଁ ଦ୍ୟୂତକ୍ରୀଡାକୁ ଯିବାକୁ ଇଚ୍ଛା କରୁନି। ପିତା ପୁତ୍ରଙ୍କୁ ସଦା ପ୍ରିୟ; ତେଣୁ, ବିଦୁର, ତୁମେ ଯେପରି କହିଛ, ସେପରି ମୁଁ କରିବି।
Verse 16
बुद्धिमान् विदुरजी! मैं राजा धृतराष्ट्रकी आज्ञासे जूएमें अवश्य चलना चाहता हूँ। पुत्रको पिता सदैव प्रिय है; अतः: आपने मुझे जैसा आदेश दिया है, वैसा ही करूँगा ।। न चाकाम: शकुनिना देविताहं न चेन्मां जिष्णुराह्मयिता सभायाम् | आहूतो<हं न निवर्ते कदाचित् तदाद्ठितं शाश्रवृतं वै व्रतं मे,मेरे मनमें जूआ खेलनेकी इच्छा नहीं है। यदि मुझे विजयशील राजा धृतराष्ट्र सभामें न बुलाते, तो मैं शकुनिसे कभी जुआ न खेलता; किंतु बुलानेपर मैं कभी पीछे नहीं हटूँगा। यह मेरा सदाका नियम है
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ହେ ବୁଦ୍ଧିମାନ ବିଦୁର! ରାଜା ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ଆଜ୍ଞାରେ ମୁଁ ନିଶ୍ଚୟ ଦ୍ୟୂତକ୍ରୀଡାକୁ ଯିବି। ପିତା ପୁତ୍ରଙ୍କୁ ସଦା ପ୍ରିୟ; ତେଣୁ ତୁମେ ଯେପରି କହିଛ, ସେପରି ମୁଁ କରିବି। ମୋର ଜୁଆ ଖେଳିବାର ଇଚ୍ଛା ନାହିଁ। ଯଦି ବିଜୟଶାଳୀ ରାଜା ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ମୋତେ ସଭାକୁ ଡାକିନଥାନ୍ତେ, ମୁଁ ଶକୁନି ସହ କେବେ ଦ୍ୟୂତ ଖେଳୁନଥାନ୍ତି; କିନ୍ତୁ ଏକଥର ଆହ୍ୱାନ ହେଲେ ମୁଁ କେବେ ପଛୁଆ ହୁଏନି—ଏହା ମୋର ଶାଶ୍ୱତ ବ୍ରତ।
Verse 17
वैशम्पायन उवाच एवमुकक््त्वा विदुरं धर्मराज: प्रायात्रिकं सर्वमाज्ञाप्य तूर्णम् । प्रायाच्छवो भूते सगण: सानुयात्र: सह स्त्रीभिद्रौपदीमादि कृत्वा,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! विदुरसे ऐसा कहकर धर्मराज युधिष्िरने तुरंत ही यात्राकी सारी तैयारी करनेके लिये आज्ञा दे दी। फिर सबेरा होनेपर उन्होंने अपने भाई- बन्धुओं, सेवकों तथा द्रौपदी आदि स्त्रियोंके साथ हस्तिनापुरकी यात्रा की
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଜନମେଜୟ! ବିଦୁରଙ୍କୁ ଏପରି କହି ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ତୁରନ୍ତ ଯାତ୍ରାର ସମସ୍ତ ପ୍ରସ୍ତୁତି କରିବାକୁ ଆଜ୍ଞା ଦେଲେ। ପରେ ପ୍ରଭାତେ ସେ ଭାଇମାନେ, ବନ୍ଧୁ-ବାନ୍ଧବ ଓ ସେବକମାନଙ୍କ ସହ, ଦ୍ରୌପଦୀ ଓ ଅନ୍ୟ ସ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କୁ ସାଥିରେ ନେଇ, ହସ୍ତିନାପୁର ଦିଗକୁ ପ୍ରସ୍ଥାନ କଲେ।
Verse 18
दैवं हि प्रज्ञां मुष्णाति चक्षुस्तेज इवापतत् । धातुश्च वशमन्वेति पाशैरिव नर: सितः,जैसे उत्कृष्ट तेज सामने आनेपर आँखकी ज्योतिको हर लेता है, उसी प्रकार दैव मनुष्यकी बुद्धिको हर लेता है। दैवसे ही प्रेरित होकर मनुष्य रस्सीमें बँधे हुएकी भाँति विधाताके वशमें घूमता रहता है
ଯେପରି ହଠାତ୍ ପଡ଼ିଥିବା ପ୍ରଚଣ୍ଡ ତେଜ ଚକ୍ଷୁର ଦର୍ଶନଶକ୍ତିକୁ ହରିନେଇଥାଏ, ସେପରି ଦୈବ ମନୁଷ୍ୟର ବିବେକବୁଦ୍ଧିକୁ ହରିନେଇଥାଏ। ସେଇ ଦୈବର ପ୍ରେରଣାରେ ମନୁଷ୍ୟ ଦୋରିରେ ବାନ୍ଧା ଲୋକ ପରି ବିଧାତାଙ୍କ ବଶରେ ଘୁରିବାକୁ ବାଧ୍ୟ ହୁଏ।
Verse 19
इत्युक्त्वा प्रययौ राजा सह क्षत्रा युधिष्ठिर: । अमृष्यमाणस्तस्यथाथ समाह्दवानमरिंदम:,ऐसा कहकर शत्रुदमन राजा युधिष्ठिर जूएके लिये राजा धृतराष्ट्रके उस बुलावेको सहन न करते हुए भी विदुरजीके साथ वहाँ जानेको उद्यत हो गये
ଏପରି କହି ଶତ୍ରୁଦମନ ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିର ବିଦୁରଙ୍କ ସହ ଯାତ୍ରା କଲେ। ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ଦ୍ୟୂତ-ଆହ୍ୱାନକୁ ସେ ମନରେ ସହି ପାରୁନଥିଲେ, ତଥାପି ରାଜାଜ୍ଞାକୁ ମାନି ଯିବାକୁ ଉଦ୍ୟତ ହେଲେ।
Verse 20
बाह्लीकेन रथं यत्तमास्थाय परवीरहा । परिच्छन्नो ययौ पार्थों भ्रातृभि: सह पाण्डव:,बाह्लीकद्वारा जोते हुए रथपर बैठकर शत्रुसूदन पाण्डुकुमार युधिष्ठटिरने अपने भाइयोंके साथ हस्तिनापुरकी यात्रा प्रारम्भ की
ବାହ୍ଲୀକ ଯୋତିଥିବା ରଥରେ ଆରୋହଣ କରି, ଯାତ୍ରା ପାଇଁ ସୁସଜ୍ଜିତ ପରବୀରହା ପାଣ୍ଡବ (ଯୁଧିଷ୍ଠିର) ଭାଇମାନଙ୍କ ସହ ଯାତ୍ରା କଲେ। ଏପରି ପାଣ୍ଡୁପୁତ୍ର ହସ୍ତିନାପୁର ଦିଗକୁ ଯାତ୍ରା ଆରମ୍ଭ କଲେ।
Verse 21
(संदिदेश ततः प्रेष्यान् नागाह्नयगतिं प्रति । ततस्ते नरशार्टूलाश्षक्रुर्वै नूपशासनम् ।। सबसे पहले राजा युधिष्ठिरने अपने सेवकोंको हस्तिनापुरकी ओर चलनेका आदेश दिया। वे नरश्रेष्ठ राजसेवक महाराजकी आज्ञाका पालन करनेमें तत्पर हो गये। ततो राजा महातेजा: सधौम्य: सपरिच्छद: । ब्राह्मणै: स्वस्ति वाच्यैव निर्दयौ मन्दिराद् बहि: ।। तत्पश्चात् महातेजस्वी राजा युधिष्ठिर समस्त सामग्रियोंसे सुसज्जित हो ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर पुरोहित धौम्यके साथ राजभवनसे बाहर निकले। ब्राह्मणेभ्यो धनं दत्त्वा गत्यर्थ स यथाविधि । अन्येभ्य: स तु दत्त्वार्थ गन्तुमेवोपचक्रमे ।। यात्राकी सफलताके लिये उन्होंने ब्राह्मणोंको विधिपूर्वक धन देकर और दूसरोंको भी मनोवांछित वस्तुएँ अर्पित करके यात्रा प्रारम्भ की। सर्वलक्षणसम्पन्नं राजाह सपरिच्छदम् | तमारुहा[ महाराजो गजेन्द्रं षष्टिहायनम् ।। निषसाद गजस्कन्धे काञ्चने परमासने । हारी किरीटी हेमा भ: सर्वाभरणभूषित: ।। रराज राजन् पार्थो वै परया नृपशोभया । रुक्मवेदिगतः प्राज्यो ज्वलन्निव हुताशन: ।। राजाके बैठनेयोग्य एक साठ वर्षका गजराज सब आवश्यक सामग्रियोंसे सुसज्जित करके लाया गया। वह समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न था। उसकी पीठपर सोनेका सुन्दर हौदा कसा गया था। महाराज युधिष्छिर (पूर्वोक्त रथसे उतर कर) उस गजराजपर आखूढ़ हो हौदेमें बैठे। उस समय वे हार, किरीट तथा अन्य सभी आभूषणोंसे विभूषित हो अपनी स्वर्णगौर-कान्ति तथा उत्कृष्ट राजोचित शोभासे सुशोभित हो रहे थे। उन्हें देखकर ऐसा जान पड़ता था, मानो सोनेकी वेदीपर स्थापित अग्निदेव घीकी आहुतिसे प्रज्वलित हो रहे हों। ततो जगाम राजा स प्रहृष्टनरवाहन: । रथघोषेण महता पूरयन् वै नभ:स्थलम् ।। संस्तूयमान: स्तुतिभि: सूतमागधवन्दिभि: । महासैन्येन संवीतो यथा5<दित्य: स्वरश्मिभि: ।। तदनन्तर हर्षमें भरे हुए मनुष्यों तथा वाहनोंके साथ राजा युधिष्ठिर वहाँसे चल पड़े। वे (राजपरिवारके लोगोंसे भरे हुए पूर्वोक्त) रथके महान् घोषसे समस्त आकाशमण्डलको गुँजाते जा रहे थे। सूत, मागध और बन्दीजन नाना प्रकारकी स्तुतियोंद्वारा उनके गुण गाते थे। उस समय विशाल सेनासे घिरे हुए राजा युधिष्ठिर अपनी किरणोंसे आवृत हुए सूर्यदेवकी भाँति शोभा पा रहे थे। पाण्डुरेणातपत्रेण प्रियमाणेन मूर्थनि । बभौ युधिष्ठिरो राजा पौर्णमास्यामिवोडुराट् ।। उनके मस्तकपर श्वेत छत्र तना हुआ था, जिससे राजा युधिष्ठिर पूर्णिमाके चन्द्रमाकी भाँति शोभा पाते थे। चामरैहेमदण्डैश्व धूयमान: समन्ततः । जयाशिष: प्रह्ृष्टाणां नराणां पथि पाण्डव: ।। प्रत्यगृह्नाद् यथान्यायं यथावद् भरतर्षभ । उनके चारों ओर स्वर्णदण्डविभूषित चँवर डुलाये जाते थे। भरतश्रेष्ठ! पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरको मार्ममें बहुतेरे मनुष्य हर्षोल्लासमें भरकर “महाराजकी जय हो” कहते हुए शुभाशीर्वाद देते थे और वे यथोचितरूपसे सिर झुकाकर उन सबको स्वीकार करते थे। अपरे कुरुराजानं पथि यान्तं समाहिता: ।। स्तुवन्ति सततं सौख्यान्मृगपक्षिस्वनैर्नरा: । उस मार्ममें दूसरे बहुत-से मनुष्य एकाग्रचित्त हो मृगों और पक्षियोंकी-सी आवाजमें निरन्तर सुखपूर्वक कुरुराज युधिष्ठिरकी स्तुति करते थे। तथैव सैनिका राजन् राजानमनुयान्ति ये ।। तेषां हलहलाशब्दो दिवं स्तब्ध्वा प्रतिष्ठित: । जनमेजय! इसी प्रकार जो सैनिक राजा युधिष्ठिरके पीछे-पीछे जा रहे थे, उनका कोलाहल भी समूचे आकाशमण्डलको स्तब्ध करके गूँज रहा था। नृपस्याग्रे ययौ भीमो गजस्कन्धगतो बली ।। उभौ पार्श्वगतौ राज्ञ: सदश्वौ वै सुकल्पितौ । अधिरूढौ यमौ चापि जम्मतुर्भरतर्षभ ।। शोभयन्तौ महासैन्यं तावुभौ रूपशालिनौ | हाथीकी पीठपर बैठे हुए बलवान् भीमसेन राजाके आगे-आगे जा रहे थे। उनके दोनों ओर सजे-सजाये दो श्रेष्ठ अश्व थे, जिनपर नकुल और सहदेव बैठे थे। भरतश्रेष्ठ! वे दोनों भाई स्वयं तो अपने रूप-सौन्दर्यसे सुशोभित थे ही, उस विशाल सेनाकी भी शोभा बढ़ा रहे थे। पृष्ठतो$नुययौ धीमान् पार्थ: शस्त्रभृतां वर: ।। श्वेताश्वो गाण्डिवं गृह अग्निदत्तं रथं गतः । शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ परम बुद्धिमान् श्वेतवाहन अर्जुन अग्निदेवके दिये हुए रथपर बैठकर गाण्डीव धनुष धारण किये महाराजके पीछे-पीछे जा रहे थे। सैन्यमध्ये ययौ राजन् कुरुराजो युधिष्ठिर: ।। द्रौपदीप्रमुखा नार्य: सानुगा: सपरिच्छदा: । आरुह्दु ता विचित्राणि शिबिकानां शतानि च ।। महत्या सेनया राजन्नग्रे राज्ञो ययुस्तदा । राजन! कुरुराज युधिष्ठिर सेनाके बीचमें चल रहे थे। द्रौपदी आदि स्त्रियाँ अपनी सेविकाओं तथा आवश्यक सामग्रियोंके साथ सैकड़ों विचित्र शिबिकाओं (पालकियों)-पर आरूढ़ हो बड़ी भारी सेनाके साथ महाराजके आगे-आगे जा रही थीं। समृद्धनरनागाश्वं सपताकरथध्वजम् ।। समृद्धरथनिस्त्रिंशं पत्तिभिर्घोषितस्वनम् । पाण्डवोंकी वह सेना हाथी-घोड़ों तथा पैदल सैनिकोंसे भरी-पूरी थी। उसमें बहुत-से रथ भी थे, जिनकी ध्वजाओंपर पताकाएँ फहरा रही थीं। उन सभी रथोंमें खड़ग आदि अस्त्र-शस्त्र संगृहीत थे। पैदल सैनिकोंका कोलाहल सब ओर फैल रहा था। शड्खदुन्दुभितालानां वेणुवीणानुनादितम् ।। शुशुभे पाण्डवं सैन्यं प्रयातं तत् तदा नृप । राजन! शंख, दुन्दुभि, ताल, वेणु और वीणा आदि वाद्योंकी तुमुल ध्वनि वहाँ गूँज रही थी। उस समय हस्तिनापुरकी ओर जाती हुई पाण्डवोंकी उस सेनाकी बड़ी शोभा हो रही थी। स सरांसि नदीश्वैव वनान्युपवनानि च ।। अत्यक्रामन्महाराज पुरी चाभ्यवपद्यत । हस्तीपुरसमीपे तु कुरुराजो युधिष्िर: ।। जनमेजय! कुरुराज युधिष्ठिर अनेक सरोवर, नदी, वन और उपवनोंको लाँघते हुए हस्तिनापुरके समीप जा पहुँचे। चक्रे निवेशनं तत्र ततः स सहसैनिक: । शिवे देशे समे चैव न्यवसत् पाण्डवस्तदा ।। वहाँ उन्होंने एक सुखद एवं समतल प्रदेशमें सैनिकोंसहित पड़ाव डाल दिया। उसी छावनीमें पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर स्वयं भी ठहर गये। ततो राजन् समाहूय शोकविह्नललया गिरा । एतद् वाक््यं च सर्वस्वं धृतराष्ट्रचिकीर्षितम् । आचचतक्षे यथावृत्तं विदुरोडथ तपस्य ह ।।) राजन्! तदनन्तर विदुरजीने शोकाकुल वाणीमें महाराज युधिष्ठिरको वहाँका सारा वृत्तान्त ठीक-ठीक बता दिया कि धृतराष्ट्र क्या करना चाहते हैं और इस द्यूतक्रीडाके पीछे क्या रहस्य है? धृतराष्ट्रेण चाहूत: कालस्य समयेन च,तब धुृतराष्ट्रके द्वारा बुलाये हुए कालके समयानुसार धर्मात्मा पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर हस्तिनापुरमें पहुँचकर धृतराष्ट्रके भवनमें गये और उनसे मिले
ତାପରେ ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିର ନାଗାହ୍ୱୟ (ହସ୍ତିନାପୁର) ଦିଗକୁ ଯିବା ପାଇଁ ନିଜ ସେବକମାନଙ୍କୁ ଆଦେଶ ଦେଲେ। ସେଇ ନରଶାର୍ଦୂଳ ସେବକମାନେ ରାଜାଜ୍ଞା ପାଳନରେ ତତ୍ପର ହେଲେ।
Verse 22
स हास्तिनपुरं गत्वा धृतराष्ट्रगृहं ययौ । समियाय च धर्मात्मा धृतराष्ट्रेण पाण्डव:,तब धुृतराष्ट्रके द्वारा बुलाये हुए कालके समयानुसार धर्मात्मा पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर हस्तिनापुरमें पहुँचकर धृतराष्ट्रके भवनमें गये और उनसे मिले
ହସ୍ତିନାପୁରକୁ ଯାଇ ଧର୍ମାତ୍ମା ପାଣ୍ଡବ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ଗୃହକୁ ପ୍ରବେଶ କଲେ ଏବଂ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ସହ ସାକ୍ଷାତ କଲେ।
Verse 23
तथा भीष्मेण द्रोणेन कर्णेन च कृपेण च । समियाय यथान्यायं द्रौणिना च विभु: सह,इसी प्रकार महाराज युधिष्ठिर, भीष्म, द्रोण, कर्ण, कृपाचार्य और अश्वत्थामाके साथ भी यथायोग्य मिले
ସେହିପରି ମହାବଳୀ ରାଜା ଭୀଷ୍ମ, ଦ୍ରୋଣ, କର୍ଣ୍ଣ ଓ କୃପଙ୍କ ସହ, ଏବଂ ଦ୍ରୋଣପୁତ୍ର ଅଶ୍ୱତ୍ଥାମାଙ୍କ ସହିତ ମଧ୍ୟ ଯଥାନ୍ୟାୟ ଓ ଯଥୋଚିତ ମର୍ଯ୍ୟାଦାରେ ସାକ୍ଷାତ କଲେ।
Verse 24
समेत्य च महाबाहु: सोमदत्तेन चैव ह | दुर्योधनेन शल्येन सौबलेन च वीर्यवान्
ତାପରେ ସେ ମହାବାହୁ ବୀର ସୋମଦତ୍ତଙ୍କ ସହ, ଏବଂ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ, ଶଲ୍ୟ ଓ ସୌବଲ (ଶକୁନି)ଙ୍କ ସହିତ ମଧ୍ୟ ଏକତ୍ର ହେଲେ।
Verse 25
ये चान्ये तत्र राजान: पूर्वमेव समागता: । दुःशासनेन वीरेण सर्वैर्ग्रतृभिरेव च
ଏବଂ ସେଠାରେ ପୂର୍ବରୁ ଯେ ଅନ୍ୟ ରାଜାମାନେ ସମାଗତ ହୋଇଥିଲେ—ସେମାନେ ସମସ୍ତେ ବୀର ଦୁଃଶାସନ ଓ ତାଙ୍କ ସମସ୍ତ ଭ୍ରାତାମାନଙ୍କ ସହିତ ଉପସ୍ଥିତ ଥିଲେ।
Verse 26
जयद्रथेन च तथा कुरुभिश्चापि सर्वश: । ततः सर्वर्महाबाहुर्भ्रतृ भि: परिवारित:
ସେହିପରି ଜୟଦ୍ରଥ ଓ ସମସ୍ତ ଦିଗରୁ କୁରୁମାନେ ତାଙ୍କୁ ଘେରିଲେ; ତାପରେ ସେ ମହାବାହୁ ନିଜ ଭ୍ରାତାମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ପରିବେଷ୍ଟିତ ହୋଇ ରହିଲେ।
Verse 27
प्रविवेश गृहं राज्ञो धृतराष्ट्रस्य धीमत: । ददर्श तत्र गान्धारीं देवीं पतिमनुव्रताम्
ତାପରେ ସେ ଧୀମାନ ରାଜା ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ଗୃହରେ ପ୍ରବେଶ କଲେ। ସେଠାରେ ସେ ପତିମନୁବ୍ରତା, ପତିବ୍ରତା ଦେବୀ ଗାନ୍ଧାରୀଙ୍କୁ ଦେଖିଲେ।
Verse 28
स््नुषाभि: संवृतां शश्वत् ताराभिरिव रोहिणीम् । अभिवाद्य स गान्धारीं तया च प्रतिनन्दित:
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ସଦା ପୁତ୍ରବଧୂମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ପରିବୃତା, ତାରାମଣ୍ଡଳରେ ଘେରା ରୋହିଣୀ ପରି ଦୀପ୍ତିମତୀ ଗାନ୍ଧାରୀଙ୍କୁ ସେ ପ୍ରଣାମ କଲା; ଗାନ୍ଧାରୀ ମଧ୍ୟ ସନ୍ତୋଷରେ ତାକୁ ସ୍ନେହପୂର୍ବକ ସ୍ୱୀକାର କଲେ।
Verse 29
तत्पश्चात् पराक्रमी महाबाहु युधिष्ठिर सोमदत्तसे मिलकर दुर्योधन, शल्य, शकुनि तथा जो राजा वहाँ पहलेसे ही आये हुए थे, उन सबसे मिले। फिर वीर दुःशासन, उसके समस्त भाई, राजा जयद्रथ तथा सम्पूर्ण कौरवोंसे मिल करके भाइयोंसहित महाबाहु युधिष्ठिरने बुद्धिमान् राजा धृतराष्ट्रके भवनमें प्रवेश किया और वहाँ सदा ताराओंसे घिरी रहनेवाली रोहिणीदेवीके समान पुत्रवधुओंके साथ बैठी हुई पतिव्रता गान्धारीदेवीको देखा। युधिष्ठिरने गान्धारीको प्रणाम किया और गान्धारीने भी उन्हें आशीर्वाद देकर प्रसन्न किया || २४-- २८ ।। ददर्श पितरं वृद्धं प्रज्ञाचक्षुषमी श्वरम्,तत्पश्चात् उन्होंने अपने बूढ़े चाचा प्रज्ञाचक्षु राजा धृतराष्ट्रका पुनः दर्शन किया
ତା’ପରେ ପରାକ୍ରମୀ ମହାବାହୁ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ସୋମଦତ୍ତଙ୍କୁ ଭେଟିଲେ; ଏବଂ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ, ଶଲ୍ୟ, ଶକୁନି ଓ ସେଠାରେ ପୂର୍ବରୁ ଆସିଥିବା ଅନ୍ୟ ରାଜାମାନଙ୍କ ସହିତ ମଧ୍ୟ ମିଶିଲେ। ପରେ ବୀର ଦୁଃଶାସନ, ତାଙ୍କ ସମସ୍ତ ଭ୍ରାତା, ରାଜା ଜୟଦ୍ରଥ ଓ ସମଗ୍ର କୌରବସମୂହକୁ ଅଭିବାଦନ କରି, ଭାଇମାନଙ୍କ ସହିତ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ପ୍ରାଜ୍ଞ ରାଜା ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ଭବନରେ ପ୍ରବେଶ କଲେ। ସେଠାରେ ପୁତ୍ରବଧୂମାନଙ୍କ ସହ ଉପବିଷ୍ଟ ପତିବ୍ରତା ଗାନ୍ଧାରୀଙ୍କୁ ଦେଖିଲେ—ତାରାବେଷ୍ଟିତ ରୋହିଣୀ ପରି ଦୀପ୍ତିମତୀ। ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଗାନ୍ଧାରୀଙ୍କୁ ପ୍ରଣାମ କଲେ, ଗାନ୍ଧାରୀ ପ୍ରସନ୍ନ ହୋଇ ଆଶୀର୍ବାଦ ଦେଲେ। ତା’ପରେ ସେ ପୁନର୍ବାର ନିଜ ବୃଦ୍ଧ ପିତୃବ୍ୟ, ପ୍ରଜ୍ଞାଚକ୍ଷୁ ରାଜା ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କୁ ଦର୍ଶନ କଲେ।
Verse 30
राज्ञा मूर्थन्युपाप्रातास्ते च कौरवनन्दना: । चत्वार: पाण्डवा राजन् भीमसेनपुरोगमा:
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସେହି କୌରବନନ୍ଦନମାନେ ଓ ଭୀମସେନ ଅଗ୍ରଣୀ ଥିବା ଚାରି ପାଣ୍ଡବ ରାଜାଙ୍କ ନିକଟକୁ ଆସି, ମସ୍ତକ ନମାଇ ତାଙ୍କ ସମ୍ମୁଖରେ ଦଣ୍ଡାୟମାନ ହେଲେ।
Verse 31
राजा धृतराष्ट्रने कुरुकुलको आनन्दित करनेवाले युधिष्ठिर तथा भीमसेन आदि अन्य चारों पाण्डवोंका मस्तक सूँघा ।। ततो हर्ष: समभवत् कौरवाणां विशाम्पते । तान् दष्टवा पुरुषव्याप्रान् पाण्डवान् प्रियदर्शनान्,जनमेजय! उन पुरुषश्रेष्ठ प्रियदर्शन पाण्डवोंको आये देख कौरवोंको बड़ा हर्ष हुआ
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—କୁରୁକୁଳକୁ ଆନନ୍ଦିତ କରୁଥିବା ରାଜା ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ସ୍ନେହବଶେ ଯୁଧିଷ୍ଠିର, ଭୀମସେନ ଓ ଅନ୍ୟ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ମସ୍ତକ ଘ୍ରାଣ କରି ସ୍ନେହ ପ୍ରକାଶ କଲେ। ହେ ଜନମେଜୟ! ସେହି ପୁରୁଷବ୍ୟାଘ୍ର, ପ୍ରିୟଦର୍ଶନ ପାଣ୍ଡବମାନେ ଆସିଥିବା ଦେଖି କୌରବମାନଙ୍କୁ ମହା ହର୍ଷ ହେଲା।
Verse 32
विविशुस्ते5भ्यनुज्ञाता रत्नवन्ति गृहाणि च । ददृशुश्नोपयातांस्तान् दुःशलाप्रमुखा: स्त्रिय:,तत्पश्चात् धृतराष्ट्रकी आज्ञा ले पाण्डवोंने रत्नमय गृहोंमें प्रवेश किया। दुःशला आदि स्त्रियोंने वहाँ आये हुए उन सबको देखा। ट्रपदकुमारीकी प्रज्वलित अग्निके समान उत्तम समृद्धि देखकर धृतराष्ट्रकी पुत्रवधुएँ अधिक प्रसन्न नहीं हुईं
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଅନୁମତି ପାଇ ସେମାନେ ରତ୍ନଶୋଭିତ ଗୃହମାନଙ୍କୁ ପ୍ରବେଶ କଲେ। ସେଠାରେ ଦୁଃଶଲା ପ୍ରମୁଖ ସ୍ତ୍ରୀମାନେ ସେମାନଙ୍କ ଆଗମନ ଦେଖିଲେ।
Verse 33
याज्ञसेन्या: परामृद्धि दृष्टवा प्रजवयलितामिव । स्नुषास्ता धृतराष्ट्रस्य नातिप्रमनसो5भवन्,तत्पश्चात् धृतराष्ट्रकी आज्ञा ले पाण्डवोंने रत्नमय गृहोंमें प्रवेश किया। दुःशला आदि स्त्रियोंने वहाँ आये हुए उन सबको देखा। ट्रपदकुमारीकी प्रज्वलित अग्निके समान उत्तम समृद्धि देखकर धृतराष्ट्रकी पुत्रवधुएँ अधिक प्रसन्न नहीं हुईं
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଯାଜ୍ଞସେନୀ (ଦ୍ରୌପଦୀ)ଙ୍କ ଜ୍ୱଳନ୍ତ ଅଗ୍ନି ସମ ଅପରିମିତ ସମୃଦ୍ଧି ଦେଖି ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ପୁତ୍ରବଧୂମାନେ ବହୁତ ପ୍ରସନ୍ନ ହେଲେ ନାହିଁ।
Verse 34
ततस्ते पुरुषव्याप्रा गत्वा स्त्रीभिस्तु संविदम् । कृत्वा व्यायामपूर्वाणि कृत्यानि प्रतिकर्म च,मनोज्ञमशनं भुक्त्वा विविशु: शरणान्यथ । तदनन्तर वे नरश्रेष्ठ पाण्डव द्रौपदी आदि अपनी स्त्रियोंसे बातचीत करके पहले व्यायाम एवं केश-प्रसाधन आदि कार्य किया। तदनन्तर नित्यकर्म करके सबने अपनेको दिव्य चन्दन आदिसे विभूषित किया। तत्पश्चात् मनमें कल्याणकी भावना रखनेवाले पाण्डव ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर मनो$नुकूल भोजन करनेके पश्चात् शयनगृहमें गये
ତାପରେ ସେହି କାର୍ଯ୍ୟତତ୍ପର ପୁରୁଷମାନେ ସ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କ ସହ କଥାବାର୍ତ୍ତା କରି, ପ୍ରଥମେ ବ୍ୟାୟାମ ଓ ଶୃଙ୍ଗାରାଦି କର୍ତ୍ତବ୍ୟ, ନିତ୍ୟକର୍ମ ସମାପ୍ତ କରି; ମନୋହର ଭୋଜନ କରି ପରେ ନିଜ ନିଜ ନିବାସସ୍ଥାନକୁ ପ୍ରବେଶ କଲେ।
Verse 35
ततः कृताह्विका: सर्वे दिव्यचन्दनभूषिता: । कल्याणमनसश्रवैव ब्राह्मणान् स्वस्ति वाच्य च
ତାପରେ ଆହ୍ୱାନିତ ହୋଇ ସମବେତ ସମସ୍ତେ ଦିବ୍ୟ ଚନ୍ଦନରେ ଭୂଷିତ ହୋଇ, କଲ୍ୟାଣ-ମନସ୍କ ହୋଇ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ସ୍ୱସ୍ତିବାଚନ କରାଇଲେ।
Verse 36
उपगीयमाना नारीभिरस्वपन् कुरुपुज़रवा:,वहाँ स्त्रियोंद्वारा अपने सुयशका गान सुनते हुए वे कुरुकुलके श्रेष्ठ पुरुष सो गये
ସ୍ତ୍ରୀମାନେ ତାଙ୍କ ସୁଯଶ ଗାନ କରୁଥିବାବେଳେ କୁରୁବଂଶର ଶ୍ରେଷ୍ଠ ପୁରୁଷମାନେ ନିଦ୍ରାଗତ ହେଲେ।
Verse 37
जगाम तेषां सा रात्रि: पुण्या रतिविहारिणाम् । स्तूयमानाश्व विश्रान्ता: काले निद्रामथात्यजन्,उनकी वह पुण्यमयी रात्रि रति-विलासपूर्वक समाप्त हुई। प्रातःकाल बन्दीजनोंके द्वारा स्तुति सुनते हुए पूर्ण विश्रामके पश्चात् उन्होंने निद्राका त्याग किया
ରତି-ବିହାରରେ ଲୀନ ଥିବା ସେମାନଙ୍କର ସେହି ପୁଣ୍ୟମୟ ରାତ୍ରି ଅତିବାହିତ ହେଲା। ପ୍ରଭାତେ ବନ୍ଦୀଜନଙ୍କ ସ୍ତୁତି ଶୁଣି, ପୂର୍ଣ୍ଣ ବିଶ୍ରାମ ପରେ ଯଥାକାଳେ ସେମାନେ ନିଦ୍ରା ତ୍ୟାଗ କଲେ।
Verse 38
सुखोषितास्ते रजनीं प्रात: सर्वे कृताह्िका: । सभां रम्यां प्रविविशु: कितवैरभिनन्दिता:
ସେମାନେ ସୁଖରେ ରାତି କାଟି, ପ୍ରଭାତେ ସମସ୍ତେ ନିତ୍ୟକର୍ମ ସମାପ୍ତ କରି, ସେଇ ରମଣୀୟ ସଭାଗୃହକୁ ପ୍ରବେଶ କଲେ। ସେଠାରେ ଜୁଆଡ଼ିମାନେ ତାଙ୍କୁ ଅଭିନନ୍ଦନ କଲେ।
Verse 57
इस प्रकार श्रीमह्ाभारत सभापव॑के अन्तर्गत झ्टूतपर्वमें युधिष्ठिरके बुलानेसे सम्बन्ध रखनेवाला सत्तावनवाँ अध्याय पूरा हुआ
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ସଭାପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ଦ୍ୟୂତପର୍ବରେ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ ଡାକିବା ସମ୍ବନ୍ଧୀୟ ସତ୍ତାବନତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।
Verse 58
इस प्रकार सुखपूर्वक रात बिताकर वे प्रातःकाल उठे और संध्योपासनादि नित्यकर्म करनेके अनन्तर उस रमणीय सभामें गये। वहाँ जुआरियोंने उनका अभिनन्दन किया ।। इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि युधिष्ठिरसभागमने<ष्टपञ्चाशत्तमो 5 ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्या भारत सभापव॑के अन्तर्गत ट्यूतपर्वमें युधिष्चिरसभागमनविषयक अद्डावनवाँ अध्याय पूरा हुआ
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସେମାନେ ସୁଖରେ ରାତି କାଟି ପ୍ରଭାତେ ଉଠି, ସନ୍ଧ୍ୟୋପାସନା ଆଦି ନିତ୍ୟକର୍ମ ସମାପ୍ତ କରି, ସେଇ ରମଣୀୟ ସଭାଗୃହକୁ ଗଲେ। ସେଠାରେ ଜୁଆଡ଼ିମାନେ ତାଙ୍କୁ ଔପଚାରିକ ଭାବେ ଅଭିନନ୍ଦନ କଲେ। ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ସଭାପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ଦ୍ୟୂତପର୍ବରେ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ସଭାଗମନ-ବିଷୟକ ଅଠାଉନତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।
Verse 356
मनोज्ञमशनं भुक्त्वा विविशु: शरणान्यथ । तदनन्तर वे नरश्रेष्ठ पाण्डव द्रौपदी आदि अपनी स्त्रियोंसे बातचीत करके पहले व्यायाम एवं केश-प्रसाधन आदि कार्य किया। तदनन्तर नित्यकर्म करके सबने अपनेको दिव्य चन्दन आदिसे विभूषित किया। तत्पश्चात् मनमें कल्याणकी भावना रखनेवाले पाण्डव ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर मनो$नुकूल भोजन करनेके पश्चात् शयनगृहमें गये
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ମନୋଜ୍ଞ ଭୋଜନ କରି ସେମାନେ ନିଜ ନିଜ ନିବାସରେ ପ୍ରବେଶ କଲେ। ତାପରେ, ହେ ନରଶ୍ରେଷ୍ଠ, ପାଣ୍ଡବମାନେ ଦ୍ରୌପଦୀ ଆଦି ନିଜ ସ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କ ସହ କଥାବାର୍ତ୍ତା କରି, ପ୍ରଥମେ ବ୍ୟାୟାମ ଓ କେଶ-ପ୍ରସାଧନ ଆଦି କାର୍ଯ୍ୟ କଲେ। ପରେ ନିତ୍ୟକର୍ମ ସମାପ୍ତ କରି ସମସ୍ତେ ଦିବ୍ୟ ଚନ୍ଦନ ଆଦି ସୁଗନ୍ଧ ଦ୍ରବ୍ୟରେ ନିଜକୁ ବିଭୂଷିତ କଲେ। ତଦନନ୍ତରେ କଲ୍ୟାଣଭାବ ଧାରଣ କରିଥିବା ପାଣ୍ଡବମାନେ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ସ୍ୱସ୍ତିବାଚନ କରାଇ, ମନୋନୁକୂଳ ଭୋଜନ କରି, ଶୟନଗୃହକୁ ଗଲେ।
Verse 2036
राजश्रिया दीप्यमानो ययीौ ब्रह्मपुर:सर: । वे अपनी राजलक्ष्मीसे देदीप्यमान हो रहे थे। उन्होंने ब्राह्मगको आगे करके प्रस्थान किया
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ରାଜଶ୍ରୀରେ ଦୀପ୍ତିମାନ ହୋଇ ସେ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କୁ ଅଗ୍ରେ ରଖି ପ୍ରସ୍ଥାନ କଲା।
The dilemma is whether formal participation in a court-sanctioned wager can justify staking persons—especially kin and spouse—when the game is driven by manipulation, compromised agency, and escalating loss.
The chapter illustrates that dharma cannot be reduced to ritual correctness; when intention, fairness, and consent collapse, procedure becomes an ethical trap, and silence by witnesses can amplify institutional wrongdoing.
No explicit phalaśruti appears here; the meta-commentary is narrative—Vaiśaṃpāyana’s recurring note that Śakuni is 'nikṛtiṃ samupāśritaḥ' (relying on deceit) frames the episode as ethically diagnosed rather than ritually rewarded.