अक्षविजय-प्रसङ्गः
Escalation of Wagers and Shakuni’s Repeated Declarations of Victory
युधिष्ठिर उवाच महाभया: कितवा: संनिविष्टा मायोपधा देवितारोअत्र सन्ति । धात्रा तु दिष्टस्य वशे किलेदं सर्व जगत् तिष्ठति न स्वतन्त्रम्,युधिष्ठिर बोले--तब तो वहाँ बड़े भयंकर, कपटी और धूर्त जुआरी जुटे हुए हैं। विधाताका रचा हुआ यह सम्पूर्ण जगत् दैवके ही अधीन है; स्वतन्त्र नहीं है
Yudhiṣṭhira uvāca—mahābhayāḥ kitavāḥ sanniviṣṭā māyopadhā devitāro ’tra santi | dhātrā tu diṣṭasya vaśe kiledaṃ sarvaṃ jagat tiṣṭhati na svatantram ||
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ତେବେ ସେଠାରେ ମହାଭୟଙ୍କର ଜୁଆରି—ମାୟା ଓ କପଟରେ ପୂର୍ଣ୍ଣ ଧୂର୍ତ୍ତ—ଏକତ୍ର ହୋଇଛନ୍ତି। କିନ୍ତୁ ଏହି ସମଗ୍ର ଜଗତ ବିଧାତାଙ୍କ ନିର୍ଦ୍ଧାରିତ ଭାଗ୍ୟର ଅଧୀନରେ ଅଛି; ସ୍ୱାଧୀନ ନୁହେଁ।
युधिष्ठिर उवाच