
Adhyāya 90: Babhruvāhana’s Reception and the Commencement of Yudhiṣṭhira’s Aśvamedha
Upa-parva: Aśvamedha-dīkṣā and Kratu-pravṛtti (Ritual Initiation and Commencement Episode)
Vaiśaṃpāyana reports the formal reception of Babhruvāhana and accompanying royal women within the Pāṇḍava residence, emphasizing protocol (yathā-nyāyam), respectful greetings, and reciprocal gifting by Kuntī, Draupadī, Subhadrā, and other Kuru women. Babhruvāhana pays due respects to Dhṛtarāṣṭra, Yudhiṣṭhira, and the Pāṇḍavas, and is honored with embraces and substantial wealth. Kṛṣṇa, approached with deference, bestows an exceptional chariot with golden fittings and divine horses. On the third day, Vyāsa (son of Satyavatī) instructs Yudhiṣṭhira that the proper sacrificial time has arrived; he prescribes an Aśvamedha variant noted for abundant gold (bahusuvarṇaka) and urges a triple-scale dakṣiṇā. Yudhiṣṭhira undertakes dīkṣā and the great rite begins. The officiants perform the sequence without procedural fault—pravargya, abhiṣava, and the ordered savanas—while the administration ensures social welfare: Bhīma, by royal command, distributes food daily so that none are left destitute or hungry. The chapter details construction and ornamentation of yūpas (including devadāru and śleṣmātaka), golden decorative posts, golden bricks for the altar, and the garuḍa-shaped arrangement of the fire-structure. Assigned animals are arranged according to śāstra. The rite is depicted as cosmically attended—ṛṣis, gandharvas, siddhas, and expert musicians (e.g., Nārada, Tumburu) enhance the ceremonial atmosphere during ritual intervals.
Chapter Arc: युधिष्ठिर का अश्वमेध यज्ञ विधिपूर्वक सम्पन्न होता है—ब्राह्मण तृप्त, बन्धु-स्वजन संतुष्ट, दीन-दुःखी भी दान से तृप्त; तभी एक अद्भुत दृश्य उपस्थित होता है: यज्ञ-शाला में एक नेवला आता है, जिसका आधा शरीर सुवर्णमय है। → नेवला राजाओं और ऋत्विजों के सामने यज्ञ की महिमा पर प्रश्नचिह्न रख देता है—वह कहता है कि यह महान् अश्वमेध भी कुरुक्षेत्र-निवासी एक उज्छवृत्तिधारी (कण-बीनकर जीविका चलाने वाले) ब्राह्मण के ‘सेरभर सत्तू-दान’ के तुल्य नहीं। सभा में विस्मय और असहजता फैलती है; यज्ञ-विधि की पूर्णता (यथागम, यथान्याय) बताकर भी नेवले का दावा खंडित नहीं हो पाता। → नेवला अपना रहस्य खोलता है: एक समय अकाल/कृच्छ्र-काल में उस गरीब ब्राह्मण-परिवार ने अतिथि को अपने प्राणों के समान प्रिय सत्तू दान कर दिए; उन्हीं सत्तू के कुछ कणों के प्रभाव से नेवले का आधा शरीर सुवर्ण हो गया—पर युधिष्ठिर के अश्वमेध में लोटने पर भी शेष शरीर स्वर्ण नहीं हुआ। यह तुलना सभा के गर्व को तोड़ देती है और दान के ‘भाव’ को कर्मकाण्ड से ऊँचा स्थापित करती है। → कथा के भीतर कथा के रूप में उस ब्राह्मण-गृहस्थ का आदर्श उभरता है: भूख, कष्ट और पारिवारिक दारिद्र्य के बीच भी अतिथि-सत्कार और दान; ‘कृच्छूकाले’ शुद्ध हृदय से किया गया दान स्वर्ग-विजय का कारण बनता है। युधिष्ठिर के यज्ञ की विधि निर्दोष होते हुए भी नेवला संकेत देता है कि महत्ता का माप बाह्य वैभव नहीं, त्याग की तीव्रता और निष्कामता है।
Verse 1
नशा (0) आफजअन+- नवतितमो< ध्याय: युधिछिरके यज्ञमें एक नेवलेका उछ्छवृत्तिधारी ब्राह्मणके द्वारा किये गये सेरभर सत्तूदानकी महिमा उस अश्वमेधयज्ञसे भी बढ़कर बतलाना जनमेजय उवाच पितामहस्य मे यज्ञे धर्मराजस्य धीमत: । यदाश्चर्यमभूत् किंचित् तद् भवान् वक्तुमहति,जनमेजयने पूछा--ब्रह्मन! मेरे प्रपितामह बुद्धिमान् धर्मराज युथधिष्ठिरके यज्ञमें यदि कोई आश्चर्यजनक घटना हुई हो तो आप उसे बतानेकी कृपा करें
ଜନମେଜୟ କହିଲେ—ହେ ବ୍ରାହ୍ମଣ! ମୋ ପ୍ରପିତାମହ, ବୁଦ୍ଧିମାନ ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ଯଜ୍ଞରେ ଯଦି କିଛି ଅଦ୍ଭୁତ କିମ୍ବା ଆଶ୍ଚର୍ଯ୍ୟଜନକ ଘଟଣା ଘଟିଥାଏ, ଦୟାକରି ତାହା କହନ୍ତୁ।
Verse 2
वैशग्पायन उवाच श्रूयतां राजशार्दूल महदाश्चर्यमुत्तमम् । अश्वमेधे महायज्ञे निवृत्ते यदभूत् प्रभो,वैशम्पायनजीने कहा--नृपश्रेष्ठ! प्रभो! युधिष्ठिरका वह महान् अश्वमेध-यज्ञ जब पूरा हुआ, उसी समय एक बड़ी उत्तम किंतु महान् आश्वर्यमें डालनेवाली घटना घटित हुई, उसे बतलाता हूँ; सुनो
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ରାଜଶାର୍ଦୂଳ! ପ୍ରଭୋ, ଶୁଣନ୍ତୁ; ମୁଁ ଏକ ପରମ ଉତ୍ତମ ମହା ଆଶ୍ଚର୍ଯ୍ୟ କଥା କହୁଛି। ମହା ଅଶ୍ୱମେଧ ଯଜ୍ଞ ବିଧିପୂର୍ବକ ସମାପ୍ତ ହେବା ସହିତସହିତ ସେଇ ଅଦ୍ଭୁତ ଘଟଣା ଘଟିଲା।
Verse 3
तर्पितिषु द्विजाग्रयेषु ज्ञातिसम्बन्धिबन्धुषु । दीनान्धकृपणे वापि तदा भरतसत्तम,भरतश्रेष्ठ] भारत! उस यज्ञमें श्रेष्ठ ब्राह्मणों, जातिवालों, सम्बन्धियों, बन्धु-बान्धवों, अन्धों तथा दीन-दरिद्रोंके तृप्त हो जानेपर जब युधिष्ठिरके महान् दानका चारों ओर शोर हो गया और धर्मराजके मस्तकपर फूलोंकी वर्षा होने लगी उसी समय वहाँ एक नेवला आया। अनघ! उसकी आँखें नीली थीं और उसके शरीरके एक ओरका भाग सोनेका था। पृथ्वीनाथ! उसने आते ही एक बार वज्रके समान भयंकर गर्जना की
ଯେତେବେଳେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ, ଜ୍ଞାତି-ସମ୍ବନ୍ଧୀ-ବାନ୍ଧବମାନେ, ଏବଂ ଦୀନ, ଅନ୍ଧ ଓ କୃପଣମାନେ ମଧ୍ୟ ତୃପ୍ତ ହୋଇଗଲେ, ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ! ସେଇ ସମୟରେ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ମହାଦାନର କୀର୍ତ୍ତି ସମସ୍ତ ଦିଗରେ ପ୍ରସାରିତ ହେଲା ଏବଂ ଧର୍ମରାଜଙ୍କ ମସ୍ତକ ଉପରେ ପୁଷ୍ପବୃଷ୍ଟି ହେବାକୁ ଲାଗିଲା। ତେବେ ତାହା ସହସା ସେଠାକୁ ଗୋଟିଏ ନେଉଳ ଆସିଲା। ହେ ଅନଘ! ତାହାର ଆଖି ନୀଳ ଥିଲା ଏବଂ ଶରୀରର ଗୋଟିଏ ପାର୍ଶ୍ୱ ସୁବର୍ଣ୍ଣମୟ ଥିଲା। ହେ ପୃଥ୍ୱୀନାଥ! ଆସିବା ସହିତସହିତ ସେ ବଜ୍ରସମ ଭୟଙ୍କର ଗୋଟିଏ ଗର୍ଜନା କଲା।
Verse 4
घुष्यमाणे महादाने दिक्षु सर्वासु भारत । पतत्सु पुष्पवर्षेषु धर्मराजस्य मूर्थनि,भरतश्रेष्ठ] भारत! उस यज्ञमें श्रेष्ठ ब्राह्मणों, जातिवालों, सम्बन्धियों, बन्धु-बान्धवों, अन्धों तथा दीन-दरिद्रोंके तृप्त हो जानेपर जब युधिष्ठिरके महान् दानका चारों ओर शोर हो गया और धर्मराजके मस्तकपर फूलोंकी वर्षा होने लगी उसी समय वहाँ एक नेवला आया। अनघ! उसकी आँखें नीली थीं और उसके शरीरके एक ओरका भाग सोनेका था। पृथ्वीनाथ! उसने आते ही एक बार वज्रके समान भयंकर गर्जना की
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଭାରତ! ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ମହାଦାନର ଘୋଷଣା ସମସ୍ତ ଦିଗରେ ହେଉଥିବାବେଳେ ଏବଂ ତାଙ୍କ ମସ୍ତକ ଉପରେ ପୁଷ୍ପବର୍ଷା ପଡୁଥିବାବେଳେ, ସେହି ସମୟରେ ସେଠାକୁ ଗୋଟିଏ ନେଉଳ ଆସିଲା। ଅନଘ! ତାହାର ଆଖି ନୀଳ ଥିଲା ଏବଂ ଦେହର ଗୋଟିଏ ପାର୍ଶ୍ୱ ସୁବର୍ଣ୍ଣବର୍ଣ୍ଣ ଥିଲା। ପୃଥିବୀନାଥ! ଆସିମାତ୍ରେ ସେ ବଜ୍ରସମ ଭୟଙ୍କର ଗର୍ଜନା ଏକଥର କଲା।
Verse 5
नीलाक्षस्तत्र नकुलो रुक्मपार्श्वस्तदानघ । वज्जाशनिसमं नादममुज्चद् वसुधाधिप,भरतश्रेष्ठ] भारत! उस यज्ञमें श्रेष्ठ ब्राह्मणों, जातिवालों, सम्बन्धियों, बन्धु-बान्धवों, अन्धों तथा दीन-दरिद्रोंके तृप्त हो जानेपर जब युधिष्ठिरके महान् दानका चारों ओर शोर हो गया और धर्मराजके मस्तकपर फूलोंकी वर्षा होने लगी उसी समय वहाँ एक नेवला आया। अनघ! उसकी आँखें नीली थीं और उसके शरीरके एक ओरका भाग सोनेका था। पृथ्वीनाथ! उसने आते ही एक बार वज्रके समान भयंकर गर्जना की ५ 0७0 + 722 0नलम आह औँ! ज ७७० + न ++ (४ कि जे 4
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ତାପରେ, ଅନଘ! ନୀଳାକ୍ଷ ଏବଂ ଦେହର ଗୋଟିଏ ପାର୍ଶ୍ୱ ସୁବର୍ଣ୍ଣବର୍ଣ୍ଣ ଥିବା ସେ ନେଉଳ ଯଜ୍ଞସ୍ଥଳରେ ପ୍ରକଟ ହେଲା। ବସୁଧାଧିପ! ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ମହାଦାନର କୀର୍ତ୍ତି ସମସ୍ତ ଦିଗରେ ପ୍ରସାରିତ ହେଉଥିବା ସମୟରେ, ଆସିମାତ୍ରେ ସେ ବଜ୍ରାଶନି ସମ ଭୟଙ୍କର ନାଦ ଏକଥର କଲା।
Verse 6
सकृदुत्सृज्य तन्नादं त्रासयानो मृगद्धिजान् । मानुषं वचन प्राह धृष्टो बिलशयो महान्,बिलनिवासी उस धृष्ट एवं महान् नेवलेने एक बार वैसी गर्जना करके समस्त मृगों और पक्षियोंको भयभीत कर दिया और फिर मनुष्यकी भाषामें कहा--
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସେ ନାଦ ଏକଥର କରି, ବିଲନିବାସୀ ଧୃଷ୍ଟ ଓ ମହାନ୍ ସେ ନେଉଳ ସମସ୍ତ ମୃଗ ଓ ପକ୍ଷୀମାନଙ୍କୁ ଭୟଭୀତ କଲା; ପରେ ମାନବ ବାଣୀରେ କହିଲା।
Verse 7
सक्तुप्रस्थेन वो नायं यज्ञस्तुल्यो नराधिपा: । उज्छवृत्तेर्वदान्यस्य कुरुक्षेत्रनिवासिन:,“राजाओ! तुम्हारा यह यज्ञ कुरुक्षेत्रनिवासी एक उज्छवृत्तिधारी उदार ब्राह्मणके सेरभर सत्तू दान करनेके बराबर भी नहीं हुआ है”
ନେଉଳ କହିଲା—ହେ ନରାଧିପମାନେ! ତୁମମାନଙ୍କର ଏହି ଯଜ୍ଞ କୁରୁକ୍ଷେତ୍ରନିବାସୀ, ଉଞ୍ଛବୃତ୍ତିରେ ଜୀବନ ଧାରଣ କରୁଥିବା ଦାନଶୀଳ ବ୍ରାହ୍ମଣଙ୍କ ଗୋଟିଏ ପ୍ରସ୍ଥ ସକ୍ତୁ-ଦାନ ସହିତ ମଧ୍ୟ ସମାନ ନୁହେଁ।
Verse 8
तस्य तद् वचन श्रुत्वा नकुलस्य विशाम्पते । विस्मयं परमं जम्मु: सर्वे ते ब्राह्मणर्षभा:,प्रजानाथ! नेवलेकी वह बात सुनकर समस्त श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको बड़ा आश्चर्य हुआ
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ପ୍ରଜାନାଥ! ନକୁଳ (ନେଉଳ)ର ସେହି କଥା ଶୁଣି ସେ ସମସ୍ତ ବ୍ରାହ୍ମଣଶ୍ରେଷ୍ଠମାନେ ପରମ ଆଶ୍ଚର୍ଯ୍ୟରେ ପଡିଗଲେ।
Verse 9
ततः समेत्य नकुलं॑ पर्यपृच्छन्त ते द्विजा: । कुतस्त्वं समनुप्राप्तो यज्ञं साधुसमागमम्,तब वे सब ब्राह्मण उस नेवलेके पास जाकर उसे चारों ओरसे घेरकर पूछने लगे --“नकुल! इस यज्ञमें तो साधु पुरुषोंका ही समागम हुआ है, तुम कहाँसे आ गये?”
ତେବେ ସେଇ ଦ୍ୱିଜମାନେ ଏକତ୍ର ହୋଇ ନକୁଳଙ୍କ ପାଖକୁ ଆସି ତାଙ୍କୁ ଚାରିଦିଗରୁ ଘେରି ପଚାରିଲେ—“ହେ ନକୁଳ! ଏହି ଯଜ୍ଞ ତ ସାଧୁପୁରୁଷମାନଙ୍କର ସମାଗମ; ତୁମେ କେଉଁଠୁ ଏଠାକୁ ଆସିଲ?”
Verse 10
ई है पक $ ; न्् “बट है हे '्ि तार छः ०... ॥7! ऐ कद 7 सल्कष्ा- अल - | ५ पश्नन० | 2 (०० ! ५ 9 कि बल॑ परमं तुभ्यं कि श्रुत॑ किं परायणम् । कथं भवन्तं विद्याम यो नो यज्ञ विगर्हसे,“तुममें कौन-सा बल और कितना शास्त्रज्ञान है? तुम किसके सहारे रहते हो? हमें किस तरह तुम्हारा परिचय प्राप्त होगा? तुम कौन हो, जो हमारे इस यज्ञकी निन्दा करते हो?
“ତୁମର ପରମ ବଳ କ’ଣ? ତୁମର ଶ୍ରୁତି-ଜ୍ଞାନ କେତେ? ତୁମେ କାହାର ଆଶ୍ରୟ ନେଉଛ? ଆମେ କିପରି ତୁମ ପରିଚୟ ଜାଣିବୁ—ଆମ ଏହି ଯଜ୍ଞକୁ ନିନ୍ଦା କରୁଥିବା ତୁମେ କିଏ?”
Verse 11
अविलुप्यागमं कृत्स्नं विविधैर्यज्ञियै: कृतम् । यथागमं यथान्यायं कर्तव्यं च तथा कृतम्,“हमने नाना प्रकारकी यज्ञ-सामग्री एकत्रित करके शास्त्रीय विधिकी अवहेलना न करते हुए इस यज्ञको पूर्ण किया है। इसमें शास्त्रसंगत और न्याययुक्त प्रत्येक कर्तव्य-कर्मका यथोचित पालन किया गया है
“ଆଗମବିଧିକୁ କିଛିମାତ୍ର ଉଲ୍ଲଂଘନ ନ କରି, ନାନାପ୍ରକାର ଯଜ୍ଞୀୟ ସାମଗ୍ରୀଦ୍ୱାରା ଆମେ ଏହି ଯଜ୍ଞକୁ ସମ୍ପନ୍ନ କରିଛୁ। ଶାସ୍ତ୍ରାନୁସାରେ ଓ ନ୍ୟାୟାନୁସାରେ ଯେଉଁ କର୍ତ୍ତବ୍ୟ ଥିଲା, ସେସବୁ ଯଥୋଚିତ ଭାବେ କରାଯାଇଛି।”
Verse 12
पूजा: पूजिताश्चात्र विधिवच्छास्त्रदर्शनात् । मन्त्राहुतिहुतश्वान्निर्दत्त देयममत्सरम्,“इसमें शास्त्रीय दृष्टिसे पूजनीय पुरुषोंकी विधिवत् पूजा की गयी है। अग्निमें मन्त्र पढ़कर आहुति दी गयी है और देनेयोग्य वस्तुओंका ईर्ष्यारहित होकर दान किया गया है
“ଏଠାରେ ଶାସ୍ତ୍ରଦୃଷ୍ଟିରେ ପୂଜନୀୟ ଲୋକମାନଙ୍କୁ ବିଧିବତ୍ ପୂଜା କରାଯାଇଛି। ମନ୍ତ୍ରସହିତ ଅଗ୍ନିରେ ଆହୁତି ଦିଆଯାଇଛି, ଏବଂ ଯାହା ଦେୟ ଥିଲା ତାହା ଇର୍ଷ୍ୟାରହିତ ଭାବେ ଦାନ କରାଯାଇଛି।”
Verse 13
तुष्टा द्विजातयश्चात्र दानैर्बहुविधैरपि । क्षत्रियाश्व सुयुद्धेन श्राद्धैश्षापि पितामहा:,'यहाँ नाना प्रकारके दानोंसे ब्राह्मणोंको, उत्तम युद्धके द्वारा क्षत्रियोंको, श्राद्धके द्वारा पितामहोंको, रक्षाके द्वारा वैश्योंको, सम्पूर्ण कामनाओंकी पूर्ति करके उत्तम स्त्रियोंको, दयासे शूद्रोंको, दानसे बची हुई वस्तुएँ देकर अन्य मनुष्योंको तथा राजाके शुद्ध बर्तावसे ज्ञाति एवं सम्बन्धियोंको संतुष्ट किया गया है। इसी प्रकार पवित्र हविष्यके द्वारा देवताओंको और रक्षाका भार लेकर शरणागतोंको प्रसन्न किया गया है
“ଏଠାରେ ନାନାପ୍ରକାର ଦାନଦ୍ୱାରା ଦ୍ୱିଜମାନେ ସନ୍ତୁଷ୍ଟ ହୋଇଛନ୍ତି; ଉତ୍ତମ ଯୁଦ୍ଧଦ୍ୱାରା କ୍ଷତ୍ରିୟମାନେ ତୃପ୍ତ ହୋଇଛନ୍ତି; ଏବଂ ଶ୍ରାଦ୍ଧକର୍ମଦ୍ୱାରା ପିତାମହମାନେ (ପୂର୍ବଜ) ମଧ୍ୟ ପ୍ରସନ୍ନ ହୋଇଛନ୍ତି।”
Verse 14
पालनेन विशस्तुष्टा: कामैस्तुष्टा वरस्त्रिय: | अनुक्रोशैस्तथा शूद्रा दानशेषै: पृथग्जना:,'यहाँ नाना प्रकारके दानोंसे ब्राह्मणोंको, उत्तम युद्धके द्वारा क्षत्रियोंको, श्राद्धके द्वारा पितामहोंको, रक्षाके द्वारा वैश्योंको, सम्पूर्ण कामनाओंकी पूर्ति करके उत्तम स्त्रियोंको, दयासे शूद्रोंको, दानसे बची हुई वस्तुएँ देकर अन्य मनुष्योंको तथा राजाके शुद्ध बर्तावसे ज्ञाति एवं सम्बन्धियोंको संतुष्ट किया गया है। इसी प्रकार पवित्र हविष्यके द्वारा देवताओंको और रक्षाका भार लेकर शरणागतोंको प्रसन्न किया गया है
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— “ରକ୍ଷା ଓ ସୁଶାସନରେ ବିଶିଷ୍ଟ ଲୋକେ ସନ୍ତୁଷ୍ଟ ହେଲେ; କାମନା ପୂରଣରେ ଉତ୍ତମ ସ୍ତ୍ରୀମାନେ ସନ୍ତୁଷ୍ଟ ହେଲେ; କରୁଣାରେ ଶୂଦ୍ରମାନେ ସନ୍ତୁଷ୍ଟ ହେଲେ; ଏବଂ ଦାନର ଅବଶେଷରେ ସାଧାରଣ ଜନତା ସନ୍ତୁଷ୍ଟ ହେଲା।”
Verse 15
ज्ञातिसम्बन्धिनस्तुष्टा: शौचेन च तृपस्य नः । देवा हविर्भि: पुण्यैश्व रक्षणै: शरणागता:,'यहाँ नाना प्रकारके दानोंसे ब्राह्मणोंको, उत्तम युद्धके द्वारा क्षत्रियोंको, श्राद्धके द्वारा पितामहोंको, रक्षाके द्वारा वैश्योंको, सम्पूर्ण कामनाओंकी पूर्ति करके उत्तम स्त्रियोंको, दयासे शूद्रोंको, दानसे बची हुई वस्तुएँ देकर अन्य मनुष्योंको तथा राजाके शुद्ध बर्तावसे ज्ञाति एवं सम्बन्धियोंको संतुष्ट किया गया है। इसी प्रकार पवित्र हविष्यके द्वारा देवताओंको और रक्षाका भार लेकर शरणागतोंको प्रसन्न किया गया है
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— “ଆମ ଜ୍ଞାତି ଓ ସମ୍ବନ୍ଧୀମାନେ ଶୁଚି ଆଚରଣରେ ସନ୍ତୁଷ୍ଟ ହେଲେ; ଦେବତାମାନେ ପବିତ୍ର ହବିରେ; ଏବଂ ଶରଣାଗତମାନେ ଦିଆଯାଇଥିବା ରକ୍ଷାରେ ସନ୍ତୁଷ୍ଟ ହେଲେ।”
Verse 16
यदत्र तथ्यं तद् ब्रूहि सत्यं सत्यं द्विजातिषु । यथाश्रुतं यथादृष्ट॑ पृष्टो ब्राह्मणकाम्पया,“यह सब होनेपर भी तुमने क्या देखा या सुना है, जिससे इस यज्ञपर आक्षेप करते हो? इन ब्राह्मणोंके निकट इनके इच्छानुसार पूछे जानेपर तुम सच-सच बताओ; क्योंकि तुम्हारी बातें विश्वासके योग्य जान पड़ती हैं। तुम स्वयं भी बुद्धिमान् दिखायी देते और दिव्यरूप धारण किये हुए हो। इस समय तुम्हारा ब्राह्मणोंक साथ समागम हुआ है, इसलिये तुम्हें हमारे प्रश्नका उत्तर अवश्य देना चाहिये”
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— “ଏଠାରେ ଯାହା ତଥ୍ୟ, ସେହି କହ—ସତ୍ୟ, ସତ୍ୟ—ଏହି ଦ୍ୱିଜମାନଙ୍କ ସମ୍ମୁଖରେ। ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କ ଇଚ୍ଛାନୁସାରେ ପ୍ରଶ୍ନ କରାଗଲେ, ଯେପରି ଶୁଣିଛ ଓ ଯେପରି ଦେଖିଛ, ସେପରି କହ।”
Verse 17
श्रद्धेयवाक्य: प्राज्ञस्त्वं दिव्यं रूपं बिभर्षि च | समागततश्न विप्रैस्त्वं तद् भवान् वक्तुमहति,“यह सब होनेपर भी तुमने क्या देखा या सुना है, जिससे इस यज्ञपर आक्षेप करते हो? इन ब्राह्मणोंके निकट इनके इच्छानुसार पूछे जानेपर तुम सच-सच बताओ; क्योंकि तुम्हारी बातें विश्वासके योग्य जान पड़ती हैं। तुम स्वयं भी बुद्धिमान् दिखायी देते और दिव्यरूप धारण किये हुए हो। इस समय तुम्हारा ब्राह्मणोंक साथ समागम हुआ है, इसलिये तुम्हें हमारे प्रश्नका उत्तर अवश्य देना चाहिये”
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— “ତୁମ ବାକ୍ୟ ଶ୍ରଦ୍ଧେୟ; ତୁମେ ପ୍ରାଜ୍ଞ, ଦିବ୍ୟ ରୂପ ଧାରଣ କରିଛ। ଏବେ ତୁମେ ଏହି ବିପ୍ରମାନଙ୍କ ସମାଗମକୁ ଆସିଛ; ତେଣୁ କହିବା ତୁମର ଉଚିତ। ତଥାପି, ଏହି ଯଜ୍ଞକୁ ଦୋଷ ଦେବା ପାଇଁ ତୁମେ କ’ଣ ଦେଖିଛ, କ’ଣ ଶୁଣିଛ? ଏହି ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କ ଇଚ୍ଛାନୁସାରେ ପ୍ରଶ୍ନ କରାଗଲେ, ସ୍ପଷ୍ଟ ସତ୍ୟ କହ।”
Verse 18
इति पृष्टो द्विजैस्तै: स प्रहसन् नकुलो<ब्रवीत् । नैषा मृषा मया वाणी प्रोक्ता दर्पेण वा द्विजा:,उन ब्राह्मणोंके इस प्रकार पूछनेपर नेवलेने हँसकर कहा--“विप्रवृन्द! मैंने आपलोगोंसे मिथ्या अथवा घमंडमें आकर कोई बात नहीं कही है
ସେହି ଦ୍ୱିଜମାନେ ଏପରି ପ୍ରଶ୍ନ କରିବାରେ, ନକୁଳ (ନେଉଳ) ହସି କହିଲା— “ହେ ବିପ୍ରମାନେ! ମୁଁ କହିଥିବା ବାଣୀ ନ ମିଥ୍ୟା, ନ ଅହଙ୍କାରରୁ କହାଯାଇଛି।”
Verse 19
यन्मयोक्तमिदं वाक््यं युष्माभिश्नाप्युपश्रुतम् । सन्तुप्रस्थेन वो नाय॑ यज्ञस्तुल्यो द्विजर्षभा:,“मैंने जो कहा है कि 'द्विजवरो! आपलोगोंका यह यज्ञ उख्छवृत्तिवाले ब्राह्मणोंके द्वारा किये हुए सेरभर सत्तूदानके बराबर भी नहीं है” इसे आपने ठीक-ठीक सुना है
ହେ ଦ୍ୱିଜଶ୍ରେଷ୍ଠମାନେ! ମୁଁ ଯେ କହିଥିଲି—‘ଉଚ୍ଛବୃତ୍ତିଧାରୀ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା କୃତ ଗୋଟିଏ ସେର ସତ୍ତୁଦାନ ସହିତ ମଧ୍ୟ ତୁମମାନଙ୍କ ଏହି ଯଜ୍ଞ ସମାନ ନୁହେଁ’—ସେ କଥା ତୁମେ ଠିକ୍ଠିକ୍ ଶୁଣିଛ।
Verse 20
इत्यवश्यं मयैतद् वो वक्तव्यं द्विजसत्तमा: । शृणुताव्यग्रमनस: शंसतो मे यथातथम्,'श्रेष्ठ ब्राह्णो! इसका कारण अवश्य आपलोगोंको बताने योग्य है। अब मैं यथार्थरूपसे जो कुछ कहता हूँ, उसे आप लोग शान्तचित्त होकर सुनें
ହେ ଦ୍ୱିଜସତ୍ତମମାନେ! ଏହାର କାରଣ ତୁମମାନଙ୍କୁ କହିବା ମୋ ପାଇଁ ନିଶ୍ଚୟ ଆବଶ୍ୟକ। ଏବେ ମୁଁ ଯଥାତଥ୍ୟ ଭାବେ ଯାହା କହୁଛି, ତାହାକୁ ଅବିକ୍ଷିପ୍ତ ମନରେ ଶୁଣ।
Verse 21
अनुभूतं च दृष्टं च यन्मयाद्भुतमुत्तमम् | उज्छवृत्तेवदान्यस्य कुरुक्षेत्रनिवासिन:,“कुरक्षेत्रनिवासी उज्छवृत्तिधारी दानी ब्राह्मणके सम्बन्धमें मैंने जो कुछ देखा और अनुभव किया है, वह बड़ा ही उत्तम एवं अदभुत है”
କୁରୁକ୍ଷେତ୍ରନିବାସୀ ଉଚ୍ଛବୃତ୍ତିଧାରୀ ଦାନଶୀଳ ବ୍ରାହ୍ମଣ ସମ୍ବନ୍ଧରେ ମୁଁ ଯାହା ଦେଖିଛି ଓ ଅନୁଭବ କରିଛି—ସେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଉତ୍ତମ ଓ ଅଦ୍ଭୁତ।
Verse 22
स्वर्ग येन द्विजा: प्राप्त: सभार्य: ससुतस्नुष: । यथा चार्थ शरीरस्य ममेदं काउ्चनीकृतम्,“ब्राह्मणो! उस दानके प्रभावसे पत्नी, पुत्र और पुत्रवधूसहित उन द्विजश्रेष्ठने जिस प्रकार स्वर्गलोकपर अधिकार पा लिया और वहाँ जिस तरह उन्होंने मेरा यह आधा शरीर सुवर्णमय कर दिया, वह प्रसंग बता रहा हूँ!
ହେ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ! ସେହି ଦାନର ପ୍ରଭାବରେ ପତ୍ନୀ, ପୁତ୍ର ଓ ପୁତ୍ରବଧୂସହିତ ସେ ଦ୍ୱିଜଶ୍ରେଷ୍ଠମାନେ ଯେପରି ସ୍ୱର୍ଗଲୋକରେ ଅଧିକାର ପାଇଲେ ଏବଂ ସେଠାରେ ଯେପରି ମୋର ଏହି ଅର୍ଧଶରୀରକୁ ସୁବର୍ଣ୍ଣମୟ କରିଦେଲେ—ସେ ପ୍ରସଙ୍ଗ ମୁଁ କହୁଛି।
Verse 23
नकुल उवाच हन्त वो वर्तयिष्यामि दानस्य फलमुत्तमम् । न्यायलब्धस्य सूक्ष्मस्य विप्रदत्तस्य यद् द्विजा:,नकुल बोला--ब्राह्मणो! कुरुक्षेत्रनिवासी द्विजके द्वारा दिये गये न्यायोपार्जित थोड़े-से अन्नके दानका जो उत्तम फल देखनेमें आया है, उसे मैं आपलोगोंको बतलाता हूँ
ନକୁଳ କହିଲେ—ହେ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ! କୁରୁକ୍ଷେତ୍ରନିବାସୀ ଜଣେ ଦ୍ୱିଜ ନ୍ୟାୟରେ ଅର୍ଜିତ ଅଳ୍ପ ଅନ୍ନ ଦାନ କରିଥିଲେ; ତାହାର ଯେ ଉତ୍ତମ ଫଳ ଦେଖାଗଲା, ସେଥି ମୁଁ ତୁମମାନଙ୍କୁ କହୁଛି।
Verse 24
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्र धर्मज्ञैर्बहुभिव॒ते | उज्छवृत्तिद्विज: कश्चित् कापोतिरभवत् तदा,कुछ दिनों पहलेकी बात है, धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्रमें, जहाँ बहुत-से धर्मज्ञ महात्मा रहा करते हैं, कोई ब्राह्मण रहते थे। वे उज्छवृत्तिसे अपना जीवन-निर्वाह करते थे। कबूतरके समान अन्नका दाना चुनकर लाते और उसीसे कुटुम्बका पालन करते थे
ନକୁଳ କହିଲେ—ଧର୍ମକ୍ଷେତ୍ର କୁରୁକ୍ଷେତ୍ରରେ, ଯେଉଁଠାରେ ଅନେକ ଧର୍ମଜ୍ଞ ମହାତ୍ମା ରହୁଥିଲେ, ସେଠାରେ ଏକ ବ୍ରାହ୍ମଣ ବସୁଥିଲେ। ସେ ଉଞ୍ଛବୃତ୍ତିରେ ଜୀବନ ନିର୍ବାହ କରୁଥିଲେ; କପୋତ ପରି ଅବଶିଷ୍ଟ ଧାନ୍ୟକଣ ଚୟନ କରି ଆଣି, ସେଇ ଅଳ୍ପ ଆହାରରେ ପରିବାର ପାଳନ କରୁଥିଲେ।
Verse 25
सभार्य: सह पुत्रेण सस्नुषस्तपसि स्थित: । बभूव शुक््लवृत्त: स धर्मात्मा नियतेन्द्रिय:,वे अपनी स्त्री, पुत्र और पुत्रवधूके साथ रहकर तपस्यामें संलग्न थे। ब्राह्मणदेवता शुद्ध आचार-विचारसे रहनेवाले धर्मात्मा और जितेन्द्रिय थे
ସେ ନିଜ ସ୍ତ୍ରୀ, ପୁତ୍ର ଓ ପୁତ୍ରବଧୂ ସହ ରହି ତପସ୍ୟାରେ ନିମଗ୍ନ ଥିଲେ। ସେଇ ବ୍ରାହ୍ମଣ ଶୁଦ୍ଧ ଆଚାରବାନ, ଧର୍ମାତ୍ମା ଓ ଇନ୍ଦ୍ରିୟ-ନିଗ୍ରହୀ ଥିଲେ।
Verse 26
षष्ठे काले सदा विप्रो भुड्धक्ते तैः सह सुव्रत: । षष्ठे काले कदाचित् तु तस्याहारो न विद्यते
ନକୁଳ କହିଲେ—ସୁବ୍ରତୀ ସେ ବ୍ରାହ୍ମଣ ସଦା ଷଷ୍ଠ ନିୟତ ସମୟରେ ଦାସମାନଙ୍କ ପାଇଁ ରଖାଯାଇଥିବା ଭୋଜନ ସେମାନଙ୍କ ସହିତ ଗ୍ରହଣ କରୁଥିଲେ। କିନ୍ତୁ ଏକଥର ସେଇ ଷଷ୍ଠ ସମୟ ଆସିଲାବେଳେ, ତାଙ୍କ ପାଇଁ କିଛିମାତ୍ର ଆହାର ଥିଲା ନାହିଁ।
Verse 27
कदाचिद् धर्मिणस्तस्य दुर्भिक्षे सति दारुणे,ब्राह्मणो! सुनो। एक समय वहाँ बड़ा भयंकर अकाल पड़ा। उन दिनों उन धर्मात्मा ब्राह्मणके पास अन्नका संग्रह तो था नहीं, खेतोंका अन्न भी सूख गया था। अतः वे सर्वथा निर्धन हो गये थे
ନକୁଳ କହିଲେ—ଏକଥର ସେଠାରେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଭୟଙ୍କର ଦୁର୍ଭିକ୍ଷ ପଡ଼ିଲା। ସେତେବେଳେ ସେଇ ଧର୍ମନିଷ୍ଠ ବ୍ରାହ୍ମଣଙ୍କ ପାଖରେ ଅନ୍ନର ସଞ୍ଚୟ ନଥିଲା; କ୍ଷେତର ଫସଲ ଶୁଷ୍କ ହୋଇଗଲା, ଔଷଧିମାନେ ମଧ୍ୟ କ୍ଷୀଣ ହେଲେ। ତେଣୁ ସେ ଦ୍ୱିଜଶ୍ରେଷ୍ଠ ସର୍ବଥା ନିର୍ଧନ ହୋଇ ଭୟଙ୍କର ଦୁଃଖରେ ପଡ଼ିଲେ।
Verse 28
नाविद्यत तदा विप्रा: संचयस्तन्निबोधत । क्षीणौषधिसमावेशे द्रव्यहीनो5भवत् तदा,ब्राह्मणो! सुनो। एक समय वहाँ बड़ा भयंकर अकाल पड़ा। उन दिनों उन धर्मात्मा ब्राह्मणके पास अन्नका संग्रह तो था नहीं, खेतोंका अन्न भी सूख गया था। अतः वे सर्वथा निर्धन हो गये थे
ନକୁଳ କହିଲେ—ହେ ବିପ୍ରମାନେ, ଏହା ଜାଣ: ସେତେବେଳେ କାହା ପାଖରେ ମଧ୍ୟ ସଞ୍ଚୟ ଥିଲା ନାହିଁ। ଔଷଧି ଓ ଫସଲ କ୍ଷୀଣ ହେବା ସହିତ, ସେ ବ୍ରାହ୍ମଣ ଦ୍ରବ୍ୟହୀନ ହୋଇଗଲେ।
Verse 29
काले काले<स्य सम्प्राप्ते नैव विद्येत भोजनम् | क्षुधापरिगता: सर्वे प्रातिष्ठन्त तदा तु ते
ନକୁଳ କହିଲେ— ନିର୍ଦ୍ଧାରିତ ସମୟ ପୁନଃପୁନଃ ଆସିଲେ ମଧ୍ୟ ଭୋଜନ କେଉଁଠି ମିଳିଲା ନାହିଁ। ତେବେ ସମସ୍ତେ କ୍ଷୁଧାରେ ପୀଡିତ ହୋଇ, ଅନିବାର୍ୟ ଆବଶ୍ୟକତାରେ ପ୍ରେରିତ ହୋଇ, ସେଠାରୁ ପ୍ରସ୍ଥାନ କଲେ।
Verse 30
उष्णार्तश्न क्षुधार्तश्न विप्रस्तपसि संस्थित:,क्षपयामास तं काल कृच्छ॒प्राणो द्विजोत्तम: । तपस्यामें लगे हुए वे ब्राह्मणदेवता गर्मी और भूख दोनोंसे कष्ट पा रहे थे। भूख और परिश्रमसे पीड़ित होनेपर भी वे उज्छ न पा सके। उन्हें अन्नका एक दाना भी नहीं मिला; अतः परिवारके सभी लोगोंके साथ उसी तरह भूखसे पीड़ित रहकर ही उन्होंने वह समय काटा। वे श्रेष्ठ ब्राह्मण बड़े कष्टसे अपने प्राणोंकी रक्षा करते थे
ନକୁଳ କହିଲେ— ତପସ୍ୟାରେ ନିଷ୍ଠିତ ସେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ବ୍ରାହ୍ମଣ ଉଷ୍ଣତା ଓ କ୍ଷୁଧା—ଦୁହିଁରେ ପୀଡିତ ଥିଲେ। ପ୍ରାଣ ଧାରଣ ମହାକଷ୍ଟ ହେଲେ ମଧ୍ୟ ସେ ସେଇ ସମୟକୁ ସହି କାଟିଲେ ଏବଂ ନିଜ ନିୟମ-ନିଷ୍ଠା ଛାଡ଼ିଲେ ନାହିଁ।
Verse 31
उज्छमप्राप्तवानेव ब्राह्मण: क्षुच्छूमान्वित: । स तथैव क्षुधाविष्ट: सार्ध परिजनेन ह,क्षपयामास तं काल कृच्छ॒प्राणो द्विजोत्तम: । तपस्यामें लगे हुए वे ब्राह्मणदेवता गर्मी और भूख दोनोंसे कष्ट पा रहे थे। भूख और परिश्रमसे पीड़ित होनेपर भी वे उज्छ न पा सके। उन्हें अन्नका एक दाना भी नहीं मिला; अतः परिवारके सभी लोगोंके साथ उसी तरह भूखसे पीड़ित रहकर ही उन्होंने वह समय काटा। वे श्रेष्ठ ब्राह्मण बड़े कष्टसे अपने प्राणोंकी रक्षा करते थे
ନକୁଳ କହିଲେ— କ୍ଷୁଧାରେ ପୀଡିତ ହେଲେ ମଧ୍ୟ ସେ ବ୍ରାହ୍ମଣ ଉଚ୍ଛ (ଅନ୍ନାବଶେଷ) ମଧ୍ୟ ପାଇଲେ ନାହିଁ। ଗୋଟିଏ ଦାଣା ମଧ୍ୟ ମିଳିଲା ନାହିଁ; ତେଣୁ ପରିଜନ ସହିତ ସେ ସେଇ କ୍ଷୁଧିତ ଅବସ୍ଥାରେ ହିଁ ସମୟ କାଟିଲେ। ସେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଦ୍ୱିଜ ମହାକଷ୍ଟରେ ପ୍ରାଣ ରକ୍ଷା କଲେ।
Verse 32
।। अथ ष७्े गते काले यवप्रस्थमुपार्जयन्
ତାପରେ ଷଷ୍ଠ କାଳ ଗତ ହେଲାପରେ ସେ ଯବପ୍ରସ୍ଥ—ଧାନ୍ୟସାମଗ୍ରୀ—ଉପାର୍ଜନ କରିବାକୁ ଲାଗିଲେ।
Verse 33
यवप्रस्थं तु त॑ं सक्तूनकुर्वन्त तपस्विन: । कृतजप्याद्विकास्ते तु हुत्वा चाग्निंयथाविधि
ନକୁଳ କହିଲେ— ସେ ତପସ୍ବୀମାନେ ସେଇ ଯବପ୍ରସ୍ଥରୁ ସକ୍ତୁ (ସତ୍ତୁ) ପ୍ରସ୍ତୁତ କରୁଥିଲେ; ଏବଂ ଜପ ଆଦି ନିୟତ କର୍ମ ସମାପ୍ତ କରି, ବିଧିଅନୁସାରେ ଅଗ୍ନିରେ ଆହୁତି ଦେଉଥିଲେ।
Verse 34
कुडवं कुडवं सर्वे व्यभजन्त तपस्विन: । तदनन्तर एक दिन पुनः छठा काल आनेतक उन्होंने सेरभर जौका उपार्जन किया। उन तपस्वी ब्राह्मणोंने उस जौका सत्तू तैयार किया और जप तथा नैत्यिक नियम पूर्ण करके अग्निमें विधिपूर्वक आहुति देनेके पश्चात् वे सब लोग एक-एक कुडव अर्थात् एक-एक पाव सत्तू बाँटकर खानेके लिये उद्यत हुए ।। ३२-३३ $ ।। अथागच्छद् द्विज: कश्चिदतिथिभर्भुज्जतां तदा,वे भोजनके लिये अभी बैठे ही थे कि कोई ब्राह्मण अतिथि उनके यहाँ आ पहुँचा। उस अतिथिको आया देख वे मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुए। उस अतिथिको प्रणाम करके उन्होंने उससे कुशल-मंगल पूछा
ନକୁଳ କହିଲେ—ସେହି ତପସ୍ବୀ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ ନିଜ ଅଳ୍ପ ଆହାରକୁ କୁଡ଼ବ କୁଡ଼ବ କରି ବାଣ୍ଟି ନେଉଥିଲେ। ପରେ କିଛି ସମୟ ଗଲାପରେ, ଅନ୍ୟ ଦିନ ସେମାନେ କେବଳ ଗୋଟିଏ ସେର ପରିମାଣ ଯବ ମାତ୍ର ଉପାର୍ଜନ କଲେ। ସେହି ଯବରୁ ସେମାନେ ସତ୍ତୁ ପ୍ରସ୍ତୁତ କଲେ। ଜପ ଓ ନିତ୍ୟକର୍ମ ସମାପ୍ତ କରି, ବିଧିପୂର୍ବକ ଅଗ୍ନିରେ ଆହୁତି ଦେଇ, ପ୍ରତ୍ୟେକେ ନିଜ ଏକ କୁଡ଼ବ ସତ୍ତୁ ଖାଇବାକୁ ବସିଥିବାବେଳେ, ଏତିକିରେ ଗୋଟିଏ ବ୍ରାହ୍ମଣ ଅତିଥି ସେମାନଙ୍କ ଆଶ୍ରମକୁ ଆସି ପହଞ୍ଚିଲେ। ଅତିଥିକୁ ଦେଖି ସେମାନେ ମନେମନେ ଆନନ୍ଦିତ ହେଲେ; ତାଙ୍କୁ ପ୍ରଣାମ କରି କୁଶଳମଙ୍ଗଳ ପଚାରିଲେ।
Verse 35
ते त॑ दृष्टवातिर्थि प्राप्तं प्रहष्टमनसो 5भन् । तेडभिवाद्य सुखप्रश्न॑ पृष्टया तमतिर्थिं तदा,वे भोजनके लिये अभी बैठे ही थे कि कोई ब्राह्मण अतिथि उनके यहाँ आ पहुँचा। उस अतिथिको आया देख वे मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुए। उस अतिथिको प्रणाम करके उन्होंने उससे कुशल-मंगल पूछा
ଅତିଥି ଆସିଥିବାକୁ ଦେଖି ସେମାନେ ମନେମନେ ଆନନ୍ଦିତ ହେଲେ। ସେମାନେ ତାଙ୍କୁ ଆଦରରେ ଅଭିବାଦନ କରି କୁଶଳମଙ୍ଗଳ ପଚାରିଲେ ଏବଂ ଧର୍ମାନୁସାରେ ଅତିଥି-ସତ୍କାର କଲେ—ନିଜ ଭୋଜନ ଓ ସୁଖରୁ ପୂର୍ବେ ଅତିଥିଧର୍ମକୁ ଅଗ୍ରସ୍ଥାନ ଦେଲେ।
Verse 36
विशुद्धमनसो दान्ता: श्रद्धादमसमन्विता: । अनसूयवो विक्रोधा: साधवो वीतमत्सरा:
ସେମାନେ ବିଶୁଦ୍ଧ ମନର, ଦମିତ ଇନ୍ଦ୍ରିୟର; ଶ୍ରଦ୍ଧା ଓ ସଂଯମରେ ଯୁକ୍ତ। ଦୋଷଦୃଷ୍ଟିହୀନ, କ୍ରୋଧରହିତ, ସାଧୁ ଏବଂ ଈର୍ଷ୍ୟାମୁକ୍ତ ଥିଲେ।
Verse 37
त्यक्तमानमदक्रोधा धर्मज्ञा द्विजसत्तमा: | स ब्रह्म॒चर्य गोत्र ते तस्य ख्यात्वा परस्परम्
ସେହି ଦ୍ୱିଜଶ୍ରେଷ୍ଠମାନେ ମାନ, ମଦ ଓ କ୍ରୋଧକୁ ତ୍ୟାଗ କରି ଧର୍ମଜ୍ଞ ଥିଲେ। ବ୍ରହ୍ମଚର୍ଯ୍ୟ-ନିୟମ ଓ ଗୋତ୍ର ପରିଚୟରେ ସେମାନେ ପରସ୍ପରକୁ ଚିହ୍ନି ପରିଚିତ ହେଲେ।
Verse 38
कुटीं प्रवेशयामासु: क्षुधार्तमतिथिं तदा । ब्राह्मण-परिवारके सब लोग विशुद्धचित्त, जितेन्द्रिय, श्रद्धालु, मनको वशमें रखनेवाले, दोषदृष्टिसे रहित, क्रोधहीन, सज्जन, ईर्ष्यारहित और धर्मज्ञ थे। जन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंने अभिमान, मद और क्रोधको सर्वथा त्याग दिया था। क्षुधासे कष्ट पाते हुए उस अतिथि ब्राह्मणको अपने ब्रह्मचर्य और गोत्रका परस्पर परिचय देते हुए वे कुटीमें ले गये || ३६-३७ ई || इदमर्घ्य च पाद्यं च बूसी चेयं तवानघ,तत्पश्चात् वहाँ उज्छवृत्तिवाले ब्राह्मणने कहा--'भगवन्! अनघ! आपके लिये ये अर्घ्य, पाद्य और आसन मौजूद हैं तथा न्यायपूर्वक उपार्जित किये हुए ये परम पवित्र सत्तू आपकी सेवामें प्रस्तुत हैं। द्विजश्रेष्ठ! मैंने प्रसन्नतापूर्वक इन्हें आपको अर्पण किया है। आप स्वीकार करें!
ତାପରେ ସେମାନେ କ୍ଷୁଧାର୍ତ୍ତ ଅତିଥିଙ୍କୁ କୁଟୀଭିତରକୁ ନେଇଗଲେ। କହିଲେ—“ହେ ଅନଘ! ଏହା ଆପଣଙ୍କ ପାଇଁ ଅର୍ଘ୍ୟ, ଏହା ପାଦ୍ୟ, ଏବଂ ଏହି ଆସନ। ତଥା ନ୍ୟାୟପୂର୍ବକ ଉପାର୍ଜିତ ଏହି ପରମ ପବିତ୍ର ସତ୍ତୁ ଆପଣଙ୍କ ସେବାରେ ସମର୍ପିତ। ହେ ଦ୍ୱିଜଶ୍ରେଷ୍ଠ! ପ୍ରସନ୍ନଚିତ୍ତରେ ମୁଁ ଏହା ଅର୍ପଣ କରୁଛି; ଗ୍ରହଣ କରନ୍ତୁ।”
Verse 39
शुचय: सक्तवश्चेमे नियमोपार्जिता: प्रभो । प्रतिगृह्लीष्व भद्रं ते मया दत्ता द्विजर्षभ,तत्पश्चात् वहाँ उज्छवृत्तिवाले ब्राह्मणने कहा--'भगवन्! अनघ! आपके लिये ये अर्घ्य, पाद्य और आसन मौजूद हैं तथा न्यायपूर्वक उपार्जित किये हुए ये परम पवित्र सत्तू आपकी सेवामें प्रस्तुत हैं। द्विजश्रेष्ठ! मैंने प्रसन्नतापूर्वक इन्हें आपको अर्पण किया है। आप स्वीकार करें!
ନକୁଳ କହିଲେ—ହେ ପ୍ରଭୁ! ଏହି ସତ୍ତୁ ଶୁଚି; ନିୟମାଚରଣରେ ନ୍ୟାୟପୂର୍ବକ ଉପାର୍ଜିତ। ଦ୍ୱିଜର୍ଷଭ! ମୁଁ ଅର୍ପଣ କରିଛି; ଗ୍ରହଣ କର—ତୁମର ମଙ୍ଗଳ ହେଉ।
Verse 40
इत्युक्त: प्रतिगृह्याथ सक्तूनां कुडवं द्विज: । भक्षयामास राजेन्द्र न च तुष्टिं जगाम स:,राजेन्द्र! ब्राह्यणके ऐसा कहनेपर अतिथिने एक पाव सत्तू लेकर खा लिया; परंतु उतनेसे वह तृप्त नहीं हुआ
ଏପରି କହିବା ପରେ ସେ ଦ୍ୱିଜ ଅତିଥି ସତ୍ତୁର ଗୋଟିଏ କୁଡବ ପରିମାଣ ଗ୍ରହଣ କରି ଭକ୍ଷଣ କଲେ; କିନ୍ତୁ, ହେ ରାଜେନ୍ଦ୍ର, ସେ ତଥାପି ତୃପ୍ତ ହେଲେ ନାହିଁ।
Verse 41
स उज्छवृत्तिस्तं प्रेक्ष्य क्षुधरापरिगतं द्विजम् । आहारं चिन्तयामास कथं तुष्टो भवेदिति,उस उज्छतवृत्तिवाले द्विजने देखा कि ब्राह्मण अतिथि तो अब भी भूखे ही रह गये हैं। तब वे उसके लिये आहारका चिन्तन करने लगे कि यह ब्राह्मण कैसे संतुष्ट हो?
ଉଚ୍ଛବୃତ୍ତିରେ ଜୀବନ ଯାପନ କରୁଥିବା ସେ ବ୍ୟକ୍ତି ଦେଖିଲେ ଯେ ଦ୍ୱିଜ ଅତିଥି ଏପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଭୁଖ-ତୃଷ୍ଣାରେ ପୀଡ଼ିତ; ତେଣୁ ସେ ଚିନ୍ତା କଲେ—‘କିପରି ଆହାର ମିଳିବ, ଯାହାରେ ଏହି ବ୍ରାହ୍ମଣ ତୃପ୍ତ ହେବ?’
Verse 42
तस्य भार्यत्रवीद् वाक्य मद्भागो दीयतामिति । गच्छत्वेष यथाकामं परितुष्टो द्विजोत्तम:,तब ब्राह्णकी पत्नीने कहा--'नाथ! यह मेरा भाग इन्हें दे दीजिये, जिससे ये ब्राह्मणदेवता इच्छानुसार तृप्तिलाभ करके यहाँसे पधारें'
ତେବେ ତାଙ୍କର ଭାର୍ଯ୍ୟା କହିଲେ—“ନାଥ! ମୋର ଭାଗ ତାଙ୍କୁ ଦିଅନ୍ତୁ। ଏହି ଦ୍ୱିଜୋତ୍ତମ ଯଥାକାମ ପୂର୍ଣ୍ଣ ତୃପ୍ତି ପାଇ ଏଠାରୁ ପ୍ରସ୍ଥାନ କରୁନ୍ତୁ।”
Verse 43
इति ब्रुवन्ती तां साध्वीं भार्या स द्विजसत्तम: । क्षुधापरिगतां ज्ञात्वा तान् सक्तून् नाभ्यनन्दत,अपनी पतिव्रता पत्नीकी यह बात सुनकर जन द्विजश्रेष्ठने उसे भूखी जानकर उसके दिये हुए सत्तूको लेनेकी इच्छा नहीं की
ସାଧ୍ୱୀ ପତିବ୍ରତା ଭାର୍ଯ୍ୟା ଏପରି କହୁଥିବାବେଳେ, ସେ ଦ୍ୱିଜସତ୍ତମ ତାଙ୍କୁ ଭୁଖରେ ପୀଡ଼ିତା ଜାଣି, ତାଙ୍କ ଦିଆ ସତ୍ତୁ ଗ୍ରହଣ କରିବାକୁ ମନ ଦେଲେ ନାହିଁ।
Verse 44
आत्मानुमानतो विद्वान् स तु विप्रर्षभस्तदा । जानन वृद्धां क्षुधार्ता च श्रान्तां ग्लानां तपस्विनीम्
ନକୁଳ କହିଲେ—ସେହି ବିଦ୍ୱାନ, ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ, ନିଜ ଅନୁଭବରୁ ଅନୁମାନ କରି ସେତେବେଳେ ସେଇ ତପସ୍ୱିନୀକୁ ଚିହ୍ନିଲେ—ବୃଦ୍ଧା, କ୍ଷୁଧାର୍ତ୍ତ, ଶ୍ରାନ୍ତ ଓ ଗ୍ଲାନ। ତାଙ୍କ ଅବସ୍ଥା ଦେଖି ସେ ତାଙ୍କ ଦୁଃଖ ବୁଝିଲେ ଏବଂ କରୁଣା ସହ ଧର୍ମୋଚିତ କର୍ତ୍ତବ୍ୟ ପାଳନର ତତ୍କାଳ ଆବଶ୍ୟକତା ଜାଣିଲେ।
Verse 45
अपि कीटपतड़ानां मृगाणां चैव शोभने
ନକୁଳ କହିଲେ—ହେ ଶୋଭନେ! କୀଟପତଙ୍ଗମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ମଧ୍ୟ, ପକ୍ଷୀମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ମଧ୍ୟ, ଏବଂ ସେହିପରି ବନ୍ୟ ମୃଗମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ମଧ୍ୟ…
Verse 46
अनुकम्प्यो नर: पत्न्या पुष्टो रक्षित एव च,“जो पुरुष होकर भी स्त्रीके द्वारा अपना पालन-पोषण और संरक्षण करता है, वह मनुष्य दयाका पात्र है
ନକୁଳ କହିଲେ—ଯେ ପୁରୁଷ ପତ୍ନୀ ଦ୍ୱାରା ପୋଷିତ ଓ ରକ୍ଷିତ ହୁଏ, ସେ ନିଶ୍ଚୟ ଦୟାର ପାତ୍ର।
Verse 47
प्रपतेद् यशसो दीप्तात् स च लोकान् न चाप्नुयात् धर्मकामार्थकार्याणि शुश्रूषा कुलसंतति:
ସେ ଦୀପ୍ତ ଯଶରୁ ପତିତ ହେବ ଏବଂ ଶୁଭ ଲୋକମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ପାଇବ ନାହିଁ। ଧର୍ମ, କାମ ଓ ଅର୍ଥର କାର୍ଯ୍ୟଗୁଡ଼ିକ ନିଷ୍ଠାପୂର୍ଣ୍ଣ ସେବା ଓ କୁଳସନ୍ତତିର ଅବିଚ୍ଛିନ୍ନତାରେ ହିଁ ଧାରିତ ରହେ।
Verse 48
नवेत्ति कर्मतो भायरिक्षणे यो5क्षम: पुमान्
ନକୁଳ କହିଲେ—କର୍ମର କାରଣ-ପରିଣାମ ଦୃଷ୍ଟିରେ ଭୟକୁ ପରୀକ୍ଷା କରିବାରେ ଯେ ପୁରୁଷ ଅକ୍ଷମ, ସେ ଭୟକୁ ସତ୍ୟରେ ଜାଣେ ନାହିଁ।
Verse 49
इत्युक्ता सा ततः प्राह धर्मार्थो नौ समौ द्विज
ଏପରି କୁହାଯାଇଲେ ସେ କହିଲା—“ହେ ଦ୍ୱିଜ! ଆମ ପାଇଁ ଧର୍ମ ଓ ଅର୍ଥ ସମାନ।”
Verse 50
सत्यं रतिश्न धर्मश्न स्वर्गश्न॒ गुणनिर्जित:,सस्त्रीणां पतिसमाधीन कांक्षितं च द्विजर्षभ । द्विजश्रेष्ठ! स्त्रियोंका सत्य, धर्म, रति, अपने गुणोंसे मिला हुआ स्वर्ग तथा उनकी सारी अभिलाषा पतिके ही अधीन है
ନକୁଳ କହିଲେ—“ହେ ଦ୍ୱିଜର୍ଷଭ! ସ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କ ପାଇଁ ସତ୍ୟ, ରତି, ଧର୍ମ, ନିଜ ଗୁଣରେ ଲଭ୍ୟ ସ୍ୱର୍ଗ ଓ ସେମାନଙ୍କ ସମସ୍ତ କାମନା—ସବୁ ପତିଙ୍କ ଅଧୀନ ବୋଲି ବୁଝାଯାଏ।”
Verse 51
।। ऋतुर्मातुः पितुर्बीजं दैवतं परमं पति:
ନକୁଳ କହିଲେ—“ମାତାଙ୍କ ଋତୁ, ପିତାଙ୍କ ବୀଜ, ଏବଂ ପତି—ଯିଏ ତାଙ୍କ ପାଇଁ ପରମ ଦେବତା—ସନ୍ତାନୋତ୍ପତ୍ତିରେ ନିର୍ଣ୍ଣାୟକ।”
Verse 52
पालनाद्धि पतिस्त्वं मे भर्तासि भरणाच्च मे
ନକୁଳ କହିଲେ—“ମୋତେ ପାଳନ କରିବାରୁ ତୁମେ ମୋର ପତି; ମୋତେ ଭରଣ କରିବାରୁ ତୁମେ ମୋର ଭର୍ତ୍ତା।”
Verse 53
जरापरिगतो वृद्ध: क्षुधार्तो दुर्बलो भूशम्
ନକୁଳ କହିଲେ—“ଜରାରେ ଆବୃତ ଏକ ବୃଦ୍ଧ, ଭୁଖରେ ପୀଡିତ ଓ ଦୁର୍ବଳ—ଭୂମିରେ ପଡ଼ି ରହେ।”
Verse 54
इत्युक्त: स तया सक्तून् प्रगृहोदं वचो5ब्रवीत्
ତାଙ୍କ କଥା ଶୁଣି ସେ ସକ୍ତୁ-ଅର୍ଘ୍ୟ ଉଠାଇଲେ; ସମ୍ମାନର ସ୍ୱାଗତ-ଭଙ୍ଗୀରେ ନମ୍ର ଶବ୍ଦରେ ପ୍ରତିଉତ୍ତର ଦେଲେ—ଦୁଃଖରେ ମଧ୍ୟ ଧର୍ମଗୃହର ଶିଷ୍ଟାଚାର ଓ ସଂଯମ ରକ୍ଷା କରି।
Verse 55
द्विज सक्तूनिमान् भूय: प्रतिगृह्लीष्व सत्तम । पत्नीके ऐसा कहनेपर ब्राह्मणने सत्तू लेकर अतिथिसे कहा--'साधुपुरुषोंमें श्रेष्ठ ब्राह्मण! आप यह सत्तू भी पुनः ग्रहण कीजिये” ।। ५४ ई ।। स तान् प्रगृह भुक्त्वा च न तुष्टिमगमद् द्विज: । तमुञ्छवृत्तिरालक्ष्य ततश्चिन्तापरो5भवत्,अतिथि ब्राह्मण उस सत्तूको भी लेकर खा गया; किंतु संतुष्ट नहीं हुआ। यह देखकर उज्छवृत्तिवाले ब्राह्मणको बड़ी चिन्ता हुई
ପତ୍ନୀର କଥା ଅନୁସାରେ ଗୃହସ୍ଥ କହିଲେ—“ହେ ଦ୍ୱିଜଶ୍ରେଷ୍ଠ, ଏହି ସକ୍ତୁମାନେ ମଧ୍ୟ ପୁନଃ ଗ୍ରହଣ କର।” ସେ ବ୍ରାହ୍ମଣ ତାହା ନେଇ ଭୋଜନ କଲେ, ତଥାପି ତୃପ୍ତ ହେଲେ ନାହିଁ। ଏହା ଦେଖି ଉଞ୍ଛବୃତ୍ତିରେ ଜୀବନ କରୁଥିବା ଗୃହସ୍ଥ ଗଭୀର ଚିନ୍ତାରେ ପଡ଼ିଲେ।
Verse 56
पुत्र उवाच सक्तूनिमान् प्रगृह्य त्वं देहि विप्राय सत्तम । इत्येव सुकृतं मन्ये तस्मादेतत् करोम्यहम्,तब उनके पुत्रने कहा--सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ पिताजी! आप मेरे हिस्सेका यह सत्तू लेकर ब्राह्मणको दे दीजिये। मैं इसीमें पुण्य मानता हूँ, इसलिये ऐसा कर रहा हूँ
ତେବେ ପୁତ୍ର କହିଲା—“ହେ ସତ୍ତମ ପିତା, ମୋ ଭାଗର ଏହି ସକ୍ତୁ ନେଇ ବିପ୍ରଙ୍କୁ ଦିଅ। ଏହିକୁ ମୁଁ ସୁକୃତ ମନେ କରେ; ତେଣୁ ଏହା କରୁଛି।”
Verse 57
भवान् हि परिपाल्यो मे सर्वदैव प्रयत्नतः । साधूनां काड्क्षितं यस्मात् पितुर्वद्धस्य पालनम्,मुझे सदा यत्नपूर्वक आपका पालन करना चाहिये; क्योंकि साधु पुरुष सदा इस बातकी अभिलाषा रखते हैं कि मैं अपने बूढ़े पिताका पालन-पोषण करूँ
ମୋତେ ସଦା ଯତ୍ନପୂର୍ବକ ଆପଣଙ୍କ ପାଳନ କରିବା ଉଚିତ; କାରଣ ସାଧୁଜନଙ୍କ ଆକାଙ୍କ୍ଷା—ମୁଁ ମୋ ବୃଦ୍ଧ ପିତାଙ୍କ ସେବା ଓ ରକ୍ଷା କରିବି।
Verse 58
पुत्रार्थो विहितो होष वार्धके परिपालनम् | श्रुतिरेषा हि विप्रषें त्रिषु लोकेषु शाश्वती,पुत्र होनेका यही फल है कि वह वृद्धावस्थामें पिताकी रक्षा करे। ब्रह्मर्षे! तीनों लोकोंमें यह सनातन श्रुति प्रसिद्ध है
“ହେ ବିପ୍ରର୍ଷେ! ପୁତ୍ରର ନିର୍ଦ୍ଦିଷ୍ଟ ଫଳ ଏହି—ବାର୍ଧକ୍ୟରେ ପିତାଙ୍କ ପାଳନ। ଏହି ଶାଶ୍ୱତ ଶ୍ରୁତି ତ୍ରିଲୋକରେ ପ୍ରସିଦ୍ଧ।”
Verse 59
प्राणधारणमात्रेण शकक्यं कर्तु तपस्त्वया । प्राणो हि परमो धर्म: स्थितो देहेषु देहिनाम्,प्राणधारणमात्रसे आप तप कर सकते हैं। देहधारियोंके शरीरोंमें स्थित हुआ प्राण ही परम धर्म है
ପୁତ୍ର କହିଲା—କେବଳ ପ୍ରାଣଧାରଣମାତ୍ରେ ଆପଣ ତପ କରିପାରିବେ; କାରଣ ଦେହଧାରୀମାନଙ୍କ ଦେହରେ ଅବସ୍ଥିତ ପ୍ରାଣ ହିଁ ପରମ ଧର୍ମ।
Verse 60
पितोवाच अपि वर्षसहस्त्री त्वं बाल एव मतो मम । उत्पाद्य पुत्र हि पिता कृतकृत्यो भवेत् सुतात्,पिताने कहा--बेटा! तुम हजार वर्षके हो जाओ तो भी हमारे लिये बालक ही हो। पिता पुत्रको जन्म देकर ही उससे अपनेको कृतकृत्य मानता है
ପିତା କହିଲେ—ପୁତ୍ର, ତୁମେ ହଜାର ବର୍ଷ ବଞ୍ଚିଲେ ମଧ୍ୟ ମୋ ପାଇଁ ତୁମେ ଶିଶୁ ହିଁ। ପୁତ୍ରକୁ ଜନ୍ମ ଦେଇ ପିତା ନିଜକୁ କୃତକୃତ୍ୟ ମାନେ।
Verse 61
बालानां क्षुद् बलवती जानाम्येतदहं प्रभो । वृद्धो5हं धारयिष्यामि त्वं बली भव पुत्रक,सामर्थ्यशाली पुत्र! मैं इस बातको अच्छी तरह जानता हूँ कि बच्चोंकी भूख बड़ी प्रबल होती है। मैं तो बूढ़ा हूँ। भूखे रहकर भी प्राण धारण कर सकता हूँ। तुम यह सत्तू खाकर बलवान् होओ--अपने प्राणोंकी रक्षा करो
ପୁତ୍ର କହିଲା—ପ୍ରଭୋ, ଶିଶୁମାନଙ୍କର ଭୁଖ ବହୁତ ପ୍ରବଳ ବୋଲି ମୁଁ ଭଲଭାବେ ଜାଣେ। ମୁଁ ବୃଦ୍ଧ; ଉପବାସ କରି ମଧ୍ୟ ପ୍ରାଣ ଧାରଣ କରିପାରିବି। ତୁମେ ଏହି ସତ୍ତୁ ଖାଇ ବଳବାନ ହେଉ—ପ୍ରାଣର ରକ୍ଷା କର।
Verse 62
जीर्णेन वयसा पुत्र न मां क्षुद् बाधतेडपि च । दीर्घकालं तपस्तप्तं न मे मरणतो भयम्,बेटा! जीर्ण अवस्था हो जानेके कारण मुझे भूख अधिक कष्ट नहीं देती है। इसके सिवा मैं दीर्घकालतक तपस्या कर चुका हूँ; इसलिये अब मुझे मरनेका भय नहीं है
ପୁତ୍ର କହିଲା—ପୁତ୍ର, ଜୀର୍ଣ୍ଣ ବୟସ ହେତୁ ଭୁଖ ମୋତେ ଅଧିକ କଷ୍ଟ ଦିଏ ନାହିଁ। ତଦୁପରି ମୁଁ ଦୀର୍ଘକାଳ ତପ କରିଛି; ତେଣୁ ମୋତେ ମୃତ୍ୟୁଭୟ ନାହିଁ।
Verse 63
पुत्र बवाच अपत्यमस्मि ते पुंसस्त्राणात् पुत्र इति स्मृत: । आत्मा पुत्र: स्मृतस्तस्मात् त्राह्मात्मानमिहात्मना,पुत्र बोला--तात! मैं आपका पुत्र हूँ, पुरुषका त्राण करनेके कारण ही संतानको पुत्र कहा गया है। इसके सिवा पुत्र पिताका अपना ही आत्मा माना गया है; अतः आप अपने आत्मभूत पुत्रके द्वारा अपनी रक्षा कीजिये
ପୁତ୍ର କହିଲା—ତାତ, ମୁଁ ଆପଣଙ୍କର ସନ୍ତାନ, ଆପଣଙ୍କ ପୁତ୍ର। ପୁରୁଷକୁ ତ୍ରାଣ (ରକ୍ଷା) କରେ ବୋଲି ସନ୍ତାନ ‘ପୁତ୍ର’ ନାମେ ସ୍ମୃତ। ତଦୁପରି ପୁତ୍ରକୁ ପିତାଙ୍କ ନିଜ ଆତ୍ମା ବୋଲି ମନାଯାଇଛି; ତେଣୁ ଏଠାରେ, ଏହି ମୁହୂର୍ତ୍ତରେ, ଆପଣଙ୍କ ଆତ୍ମରୂପ ପୁତ୍ର ମୋ ଦ୍ୱାରା ନିଜକୁ ରକ୍ଷା କରନ୍ତୁ।
Verse 64
पितोवाच रूपेण सदृशस्त्वं मे शीलेन च दमेन च | परीक्षितश्न बहुधा सक्तूनादझि ते सुत,पिताने कहा--बेटा! तुम रूप, शील (सदाचार और सद्भाव) तथा इन्द्रियसंयमके द्वारा मेरे ही समान हो। तुम्हारे इन गुणोंकी मैंने अनेक बार परीक्षा कर ली है, अतः मैं तुम्हारा सत्तू लेता हूँ
ପିତା କହିଲେ—ପୁତ୍ର, ରୂପରେ ତୁମେ ମୋ ପରି; ଶୀଳ ଓ ଇନ୍ଦ୍ରିୟ-ସଂଯମରେ ମଧ୍ୟ ସେହିପରି। ମୁଁ ତୁମକୁ ଅନେକ ପ୍ରକାରେ ପରୀକ୍ଷା କରିଛି; ତେଣୁ ଆଜି ମୁଁ ତୁମ ସତ୍ତୁ ଗ୍ରହଣ କରୁଛି।
Verse 65
इत्युक्त्वा55दाय तान् सक्तून् प्रीतात्मा द्विजसत्तम: । प्रहसन्निव विप्राय स तस्मै प्रददौ तदा,यों कहकर श्रेष्ठ ब्राह्मणने प्रसन्नतापूर्वक वह सत्तू ले लिया और हँसते हुए-से उस ब्राह्मण अतिथिको परोस दिया
ଏହିପରି କହି ଦ୍ୱିଜଶ୍ରେଷ୍ଠ ଆନନ୍ଦିତ ହୃଦୟରେ ସେ ସତ୍ତୁ ନେଲେ ଏବଂ ମାନୋ ହସୁଥିବା ପରି ସେହି ବ୍ରାହ୍ମଣ ଅତିଥିଙ୍କୁ ସେତେବେଳେ ପରିବେଶନ କଲେ।
Verse 66
भुक्त्वा तानपि सक्तून् स नैव तुष्टो बभूव ह । उज्छवृत्तिस्तु धर्मात्मा बत्रीडामनुजगाम ह,वह सत्तू खाकर भी ब्राह्मण देवताका पेट न भरा। यह देखकर उज्छवृत्तिधारी धर्मात्मा ब्राह्मण बड़े संकोचमें पड़ गये
ସେ ସତ୍ତୁ ଖାଇଲେ ମଧ୍ୟ ସେ ବ୍ରାହ୍ମଣ ତୃପ୍ତ ହେଲେ ନାହିଁ। ଏହା ଦେଖି ଉଚ୍ଛବୃତ୍ତିରେ ଜୀବନ ଚାଲାଉଥିବା ଧର୍ମାତ୍ମା ବ୍ରାହ୍ମଣ ଲଜ୍ଜା ଓ ଚିନ୍ତାରେ ପଡ଼ିଲେ।
Verse 67
त॑ं वै वधू: स्थिता साध्वी ब्राह्मणप्रियकाम्यया । सक्तूनादाय संदहृष्टा श्वशुरं वाक्यमब्रवीत्,उनकी पुत्रवधू भी बड़ी सुशीला थी। वह ब्राह्मणका प्रिय करनेकी इच्छासे उनके पास जा बड़ी प्रसन्नताके साथ अपने उन श्वशुरदेवसे बोली--
ତେବେ ସେହି ସାଧ୍ବୀ ପୁତ୍ରବଧୂ ବ୍ରାହ୍ମଣଙ୍କୁ ପ୍ରୀତ କରିବା ଇଚ୍ଛାରେ ଦାଁଡ଼ିଲେ। ସତ୍ତୁ ନେଇ ହର୍ଷିତ ହୋଇ ସେ ଶ୍ୱଶୁରଙ୍କୁ ଆଦରରେ କହିଲେ।
Verse 68
संतानात् तव संतान मम विप्र भविष्यति । सक्तूनिमानतिथये गृहीत्वा सम्प्रयच्छ मे,“विप्रवर! आपकी संतानसे मुझे संतान प्राप्त होगी; अतः आप मेरे परम पूज्य हैं। मेरे हिस्सेका यह सत्तू लेकर आप अतिथि देवताको अर्पित कीजिये
ସେ କହିଲେ—ହେ ବିପ୍ରବର! ଆପଣଙ୍କ ସନ୍ତାନ ଦ୍ୱାରା ମୋତେ ମଧ୍ୟ ସନ୍ତାନ ଲଭିବ; ତେଣୁ ଆପଣ ମୋ ପାଇଁ ପରମ ପୂଜ୍ୟ। ମୋ ଭାଗର ଏହି ସତ୍ତୁ ନେଇ ଅତିଥି-ଦେବଙ୍କୁ ଅର୍ପଣ କରନ୍ତୁ।
Verse 69
तव प्रसादान्निर्वृत्ता मम लोका: किलाक्षया: । पुत्रेण तानवाप्रोति यत्र गत्वा न शोचति,“आपकी कृपासे मुझे अक्षय लोक प्राप्त हो गये। पुत्रके द्वारा मनुष्य उन लोकोंमें जाते हैं, जहाँ जाकर वह कभी शोकमें नहीं पड़ता
ପୁତ୍ର କହିଲା—ଆପଣଙ୍କ କୃପାରୁ ମୁଁ ନିଶ୍ଚୟ ଅକ୍ଷୟ ଲୋକ ପ୍ରାପ୍ତ କରିଛି। ପୁତ୍ର ଦ୍ୱାରା ମନୁଷ୍ୟ ସେହି ଲୋକମାନଙ୍କୁ ପହଞ୍ଚେ; ସେଠାକୁ ଯାଇ ସେ କେବେ ଶୋକରେ ପଡ଼େ ନାହିଁ।
Verse 70
धर्मद्या हि यथा त्रेता वल्नित्रेता तथैव च | तथैव पुत्रपौत्राणां स्वर्गस्त्रेता किलाक्षय:,'जैसे धर्म तथा उससे संयुक्त अर्थ और काम--ये तीनों स्वर्गके प्राप्ति करानेवाले हैं तथा जैसे आहवनीय, गार्हपत्य और दक्षिणाग्नि--ये तीनों स्वर्गके साधन हैं, उसी प्रकार पुत्र, पौत्र और प्रपौत्र--ये त्रिविध संतानें अक्षय स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाली हैं
ପୁତ୍ର କହିଲା—ଧର୍ମ ସହ ଅର୍ଥ ଓ କାମ—ଏହି ତ୍ରୟ ଯେପରି ସ୍ୱର୍ଗ-ପ୍ରାପ୍ତିର ତ୍ରିବିଧ ସାଧନ, ଏବଂ ଆହବନୀୟ, ଗାର୍ହପତ୍ୟ, ଦକ୍ଷିଣାଗ୍ନି—ଏହି ତିନି ଅଗ୍ନି ଯେପରି ସ୍ୱର୍ଗସାଧନ, ସେହିପରି ପୁତ୍ର, ପୌତ୍ର ଓ ପ୍ରପୌତ୍ର—ଏହି ତ୍ରିବିଧ ସନ୍ତତି ଅକ୍ଷୟ ସ୍ୱର୍ଗ ଦେଇଥାଏ ବୋଲି କୁହାଯାଏ।
Verse 71
पितृन् ऋणात् तारयति पुत्र इत्यनुशुश्रुम । पुत्रपौत्रैश्न नियतं साधुलोकानुपाश्षुते,“हमने सुना है कि पुत्र पिताको पितृ-ऋणसे छुटकारा दिला देता है। पुत्रों और पौत्रोंके द्वारा मनुष्य निश्चय ही श्रेष्ठ लोकोंमें जाते हैं!
ପୁତ୍ର କହିଲା—ପୁତ୍ର ପିତୃମାନଙ୍କୁ ପିତୃ-ଋଣରୁ ତାରେ ବୋଲି ଆମେ ଶୁଣିଛୁ। ନିଶ୍ଚୟ ଭାବେ ପୁତ୍ର ଓ ପୌତ୍ର ଦ୍ୱାରା ମନୁଷ୍ୟ ସାଧୁ-ଲୋକକୁ ପ୍ରାପ୍ତ କରେ।
Verse 72
श्षशुर उवाच वातातपविशीर्णाज्ीं त्वां विवर्णा निरीक्ष्य वै । कर्षितों सुव्रताचारे क्षुधाविद्वलचेतसम्,श्वशुरने कहा--बेटी! हवा और धूपके मारे तुम्हारा सारा शरीर सूख रहा है--शिथिल होता जा रहा है। तुम्हारी कान्ति फीकी पड़ गयी है। उत्तम व्रत और आचारका पालन करनेवाली पुत्री! तुम बहुत दुर्बल हो गयी हो। क्षुधाके कष्टसे तुम्हारा चित्त अत्यन्त व्याकुल है। तुम्हें ऐसी अवस्थामें देखकर भी तुम्हारे हिस्सेका सत्तू कैसे ले लूँ। ऐसा करनेसे तो मैं धर्मकी हानि करनेवाला हो जाऊँगा। अत: कल्याणमय आचरण करनेवाली कल्याणि! तुम्हें ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये
ଶ୍ୱଶୁର କହିଲେ—କନ୍ୟେ! ପବନ ଓ ଧୂପରେ ତୁମ ଅଙ୍ଗପ୍ରତ୍ୟଙ୍ଗ କ୍ଷୀଣ ହୋଇଯାଇଛି; ବର୍ଣ୍ଣ ମଲିନ ହୋଇଛି। ଉତ୍ତମ ବ୍ରତ ଓ ଆଚାର ପାଳନକାରିଣୀ ହୋଇ ମଧ୍ୟ ତୁମେ କୃଶ ହୋଇପଡ଼ିଛ; ଭୁଖର କଷ୍ଟରେ ତୁମ ଚିତ୍ତ ଅତ୍ୟନ୍ତ ବ୍ୟାକୁଳ। ଏମିତି ଅବସ୍ଥାରେ ତୁମ ଭାଗର ସତ୍ତୁ ମୁଁ କିପରି ନେବି? ଏମିତି କଲେ ମୁଁ ଧର୍ମକୁ ଆଘାତ କରୁଥିବା ହେବି। ତେଣୁ କଲ୍ୟାଣବୃତ୍ତି କଲ୍ୟାଣି, ତୁମେ ଏପରି କଥା କହିବା ଉଚିତ ନୁହେଁ।
Verse 73
कथं सक्तून् ग्रहीष्यामि भूत्वा धर्मोपघातक: । कल्याणवृत्ते कल्याणि नैवं त्वं वक्तुमहसि,श्वशुरने कहा--बेटी! हवा और धूपके मारे तुम्हारा सारा शरीर सूख रहा है--शिथिल होता जा रहा है। तुम्हारी कान्ति फीकी पड़ गयी है। उत्तम व्रत और आचारका पालन करनेवाली पुत्री! तुम बहुत दुर्बल हो गयी हो। क्षुधाके कष्टसे तुम्हारा चित्त अत्यन्त व्याकुल है। तुम्हें ऐसी अवस्थामें देखकर भी तुम्हारे हिस्सेका सत्तू कैसे ले लूँ। ऐसा करनेसे तो मैं धर्मकी हानि करनेवाला हो जाऊँगा। अत: कल्याणमय आचरण करनेवाली कल्याणि! तुम्हें ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये
ଶ୍ୱଶୁର କହିଲେ—ଧର୍ମକୁ ଆଘାତ କରୁଥିବା ହୋଇ ମୁଁ ସତ୍ତୁ କିପରି ଗ୍ରହଣ କରିବି? କଲ୍ୟାଣବୃତ୍ତି କଲ୍ୟାଣି, ତୁମେ ଏପରି କହିବା ଉଚିତ ନୁହେଁ।
Verse 74
षष्ठे काले व्रतवतीं शौचशीलतपो<न्विताम् । कृच्छ्वृत्तिं निराहारां द्रक्ष्यामि त्वां कथं शुभे,तुम प्रतिदिन शौच, सदाचार और तपस्यामें संलग्न रहकर छठे कालमें भोजन करनेका व्रत लिये हुए हो। शुभे! बड़ी कठिनाईसे तुम्हारी जीविका चलती है। आज सत्तू लेकर तुम्हें निराहार कैसे देख सकूँगा
ଶ୍ୱଶୁର କହିଲେ—ହେ ଶୁଭେ! ତୁମେ ଶୌଚ, ସଦାଚାର ଓ ତପସ୍ୟାରେ ନିଷ୍ଠାବାନ୍ ହୋଇ ଷଷ୍ଠ କାଳରେ ମାତ୍ର ଭୋଜନ କରିବାର ବ୍ରତ ଧାରଣ କରିଛ। ଅତ୍ୟନ୍ତ କଷ୍ଟରେ ତୁମ ଜୀବିକା ଚାଲେ। ଆଜି ହାତରେ ସତ୍ତୁ ନେଇ ତୁମକୁ ନିରାହାର ଦେଖି ମୁଁ କିପରି ସହିବି?
Verse 75
बाला क्षुधार्ता नारी च रक्ष्या त्वं सततं मया | उपवासपरिश्रान्ता त्वं हि बान्धवनन्दिनी,एक तो तुम अभी बालिका हो, दूसरे भूखसे पीड़ित हो रही हो, तीसरे नारी हो और चौथे उपवास करते-करते अत्यन्त दुबली हो गयी हो; अतः मुझे सदा तुम्हारी रक्षा करनी चाहिये; क्योंकि तुम अपनी सेवाओंद्वारा बान्धवजनोंको आनन्दित करनेवाली हो
ତୁମେ ଏଯାବତ୍ ବାଳିକା, କ୍ଷୁଧାର୍ତ୍ତ, ନାରୀ, ଏବଂ ଉପବାସ କରି କରି ଅତ୍ୟନ୍ତ କ୍ଷୀଣ ହୋଇପଡ଼ିଛ। ତେଣୁ ସଦା ତୁମର ରକ୍ଷା କରିବା ମୋର କର୍ତ୍ତବ୍ୟ; କାରଣ ତୁମେ ନିଜ ସେବାଦ୍ୱାରା ବାନ୍ଧବମାନଙ୍କୁ ଆନନ୍ଦିତ କରୁଛ।
Verse 76
स्नुषोवाच गुरोर्मम गुरुस्त्वं वै यतो दैवतदैवतम् । देवातिदेवस्तस्मात् त्वं सक्तूनादत्स्व मे प्रभो,पुत्रवधू बोली--भगवन्! आप मेरे गुरुके भी गुरु, देवताओंके भी देवता और सामान्य देवताकी अपेक्षा भी अतिशय उत्कृष्ट देवता हैं, अतः मेरा दिया हुआ यह सत्तू स्वीकार कीजिये
ପୁତ୍ରବଧୂ କହିଲେ—ଭଗବନ୍! ଆପଣ ମୋ ଗୁରୁଙ୍କର ମଧ୍ୟ ଗୁରୁ, ଦେବତାମାନଙ୍କର ମଧ୍ୟ ଦେବତା; ଦେବମାନଙ୍କୁ ଅତିକ୍ରମ କରିଥିବା ପରମଦେବ ଆପଣ। ତେଣୁ, ପ୍ରଭୁ, ମୋର ଦିଆ ଏହି ସତ୍ତୁ ଗ୍ରହଣ କରନ୍ତୁ।
Verse 77
देह: प्राणश्न धर्मश्न शुश्रूषार्थमिदं गुरो: । तव विप्र प्रसादेन लोकान् प्राप्स्यामहे शुभान्,मेरा यह शरीर, प्राण और धर्म--सब कुछ बड़ोंकी सेवाके लिये ही है। विप्रवर! आपके प्रसादसे मुझे उत्तम लोकोंकी प्राप्ति हो सकती है
ମୋର ଏହି ଦେହ, ପ୍ରାଣ ଓ ଧର୍ମ—ସବୁ ବଡ଼ମାନେ ଓ ଗୁରୁଜନଙ୍କ ସେବା ପାଇଁ। ହେ ବିପ୍ରଶ୍ରେଷ୍ଠ! ଆପଣଙ୍କ ପ୍ରସାଦରେ ଆମେ ଶୁଭ ଲୋକ ପ୍ରାପ୍ତ କରିବୁ।
Verse 78
अवेक्ष्या इति कृत्वाहं दृढ्भक्तेति वा द्विज । चिन्त्या ममेयमिति वा सक्तूनादातुमहसि,अतः आप मुझे अपना दृढ़ भक्त, रक्षणीय और विचारणीय मानकर अतिथिको देनेके लिये यह सत्तू स्वीकार कीजिये
ଅତଃ ହେ ଦ୍ୱିଜ! ଆପଣ ମୋତେ ଆଶ୍ରିତା ବୋଲି ଭାବନ୍ତୁ, କିମ୍ବା ଦୃଢ଼ ଭକ୍ତା ବୋଲି ଜାଣନ୍ତୁ, ଅଥବା ଆପଣଙ୍କ ବିଚାର ଓ ରକ୍ଷାର ଯୋଗ୍ୟା ବୋଲି ଗଣନ୍ତୁ—ଅତିଥି-ସେବା ପାଇଁ ଏହି ସତ୍ତୁ ଗ୍ରହଣ କରନ୍ତୁ।
Verse 79
श्षशुर उवाच अनेन नित्यं साध्वी त्वं शीलवृत्तेन शोभसे । या त्वं धर्मव्रतोपेता गुरुवृत्तिमवेक्षसे,श्वशुरने कहा--बेटी! तुम सती-साथ्वी नारी हो और सदा ऐसे ही शील एवं सदाचारका पालन करनेसे तुम्हारी शोभा है। तुम धर्म तथा व्रतके आचरणमें संलग्न होकर सर्वदा गुरुजनोंकी सेवापर ही दृष्टि रखती हो; इसलिये बहू! मैं तुम्हें पुण्यसे वंचित न होने दूँगा। धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ महाभागे! पुण्यात्माओंमें तुम्हारी गिनती करके मैं तुम्हारा दिया हुआ सत्तू अवश्य स्वीकार करूँगा
ଶ୍ୱଶୁର କହିଲେ—କନ୍ୟେ! ଏହି ଆଚରଣରେ ତୁମେ ସଦା ଶୀଳ ଓ ସଦାଚାରରେ ଶୋଭିତ ସାଧ୍ବୀ ନାରୀ ଭାବେ ଦୀପ୍ତିମାନ। ଧର୍ମ ଓ ବ୍ରତରେ ନିବିଷ୍ଟ ହୋଇ ଗୁରୁଜନଙ୍କ ସେବା-ସମ୍ମାନରେ ଦୃଷ୍ଟି ରଖୁଛ; ତେଣୁ ବହୁ! ମୁଁ ତୁମକୁ ପୁଣ୍ୟରୁ ବଞ୍ଚିତ ହେବାକୁ ଦେବି ନାହିଁ। ମହାଭାଗେ, ଧର୍ମାତ୍ମାମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠେ! ପୁଣ୍ୟାତ୍ମାମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ତୁମକୁ ଗଣି, ତୁମେ ଦିଆ ସତ୍ତୁ ମୁଁ ନିଶ୍ଚୟ ଗ୍ରହଣ କରିବି।
Verse 80
तस्मात् सक्तून् ग्रहीष्यामि वधु नाहसि वज्चनाम् | गणयित्वा महाभागे त्वां हि धर्मभूतां वरे,श्वशुरने कहा--बेटी! तुम सती-साथ्वी नारी हो और सदा ऐसे ही शील एवं सदाचारका पालन करनेसे तुम्हारी शोभा है। तुम धर्म तथा व्रतके आचरणमें संलग्न होकर सर्वदा गुरुजनोंकी सेवापर ही दृष्टि रखती हो; इसलिये बहू! मैं तुम्हें पुण्यसे वंचित न होने दूँगा। धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ महाभागे! पुण्यात्माओंमें तुम्हारी गिनती करके मैं तुम्हारा दिया हुआ सत्तू अवश्य स्वीकार करूँगा
ଶ୍ୱଶୁର କହିଲେ—ଏହେତୁ ବହୁ! ଏହି ସତ୍ତୁ ମୁଁ ଗ୍ରହଣ କରିବି। ତୁମେ ବଞ୍ଚନାର ଯୋଗ୍ୟ ନୁହଁ। ମହାଭାଗେ! ତୁମକୁ ଧର୍ମମୟୀ ଶ୍ରେଷ୍ଠା ନାରୀ ଭାବେ ଗଣି, ତୁମ ଦାନକୁ ମୁଁ ଗ୍ରହଣ କରୁଛି—ଯେପରି ତୁମ ପୁଣ୍ୟ ନଷ୍ଟ ନ ହେଉ।
Verse 81
इत्युक्त्वा तानुपादाय सक्तून् प्रादाद् द्विजातये । ततस्तुष्टो5भवद् विप्रस्तस्य साधोर्महात्मन:,ऐसा कहकर ब्राह्मणने उसके हिस्सेका भी सत्तू लेकर अतिथिको दे दिया। इससे वह ब्राह्मण उन उज्छवृत्तिधारी साधु महात्मापर बहुत संतुष्ट हुआ
ଏପରି କହି ସେ ସତ୍ତୁଗୁଡ଼ିକୁ ଉଠାଇ ଦ୍ୱିଜ ଅତିଥିଙ୍କୁ ଦେଲା। ତାପରେ ସେ ବ୍ରାହ୍ମଣ ସେହି ସାଧୁ ମହାତ୍ମାଙ୍କ ଉପରେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ପ୍ରସନ୍ନ ହେଲା।
Verse 82
प्रीतात्मा स तु तं वाक्यमिदमाह द्विजर्ष भम् । वाग्मी तदा द्विजश्रेष्ठो धर्म: पुरुषविग्रह:
ତାପରେ ପ୍ରୀତଚିତ୍ତ ହୋଇ ସେ ଦ୍ୱିଜମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ, ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ବୃଷଭ ସଦୃଶ ସେହି ଅତିଥିଙ୍କୁ ଏହି ବଚନ କହିଲା। ସେ ସମୟରେ ବାଗ୍ମୀ ଦ୍ୱିଜଶ୍ରେଷ୍ଠ—ମାନବରୂପଧାରୀ ସାକ୍ଷାତ୍ ଧର୍ମ—ତାକୁ ସମ୍ବୋଧନ କଲେ।
Verse 83
वास्तवमें उस श्रेष्ठ द्विजके रूपमें मानव-विग्रहधारी साक्षात् धर्म ही वहाँ उपस्थित थे। वे प्रवचनकुशल धर्म संतुष्टचित्त होकर उन उज्छवृत्तिधारी श्रेष्ठ ब्राह्मणसे इस प्रकार बोले -- ८२ ॥। शुद्धेन तव दानेन न्यायोपात्तेन धर्मत: । यथाशक्ति विसूष्टेन प्रीतो5स्मि द्विजसत्तम । अहो दान घुष्यते ते स्वर्गे स्वर्गनिवासिभि:,द्विजश्रेष्ठी तुमने अपनी शक्तिके अनुसार धर्मपूर्वक जो न्यायोपार्जित शुद्ध अन्नका दान दिया है, इससे तुम्हारे ऊपर मैं बहुत प्रसन्न हूँ। अहो! स्वर्गलोकमें निवास करनेवाले देवता भी वहाँ तुम्हारे दानकी घोषणा करते हैं
ହେ ଦ୍ୱିଜସତ୍ତମ! ତୁମେ ନିଜ ଶକ୍ତି ଅନୁସାରେ ଧର୍ମପୂର୍ବକ, ନ୍ୟାୟରେ ଅର୍ଜିତ ଶୁଦ୍ଧ ଅନ୍ନର ଯେ ଦାନ କରିଛ, ତାହାରେ ମୁଁ ଅତ୍ୟନ୍ତ ପ୍ରୀତ। ଅହୋ! ସ୍ୱର୍ଗଲୋକରେ ବସୁଥିବା ଦେବତାମାନେ ମଧ୍ୟ ସେଠାରେ ତୁମ ଦାନର ଘୋଷଣା କରୁଛନ୍ତି।
Verse 84
गगनात् पुष्पवर्ष च पश्येदं पतितं भुवि । सुर्िंदेवगन्धर्वा ये च देवपुर:सरा:
ଦେଖ—ଆକାଶରୁ ପୁଷ୍ପବର୍ଷା ହୋଇ ଏହା ପୃଥିବୀରେ ପଡ଼ିଛି। ଦେବମାନେ, ଦିବ୍ୟ ଗନ୍ଧର୍ବମାନେ ଏବଂ ଦେବମାନଙ୍କର ଅଗ୍ରଗାମୀ (ସେବକ ଓ ଘୋଷକ) ସମସ୍ତେ ଏଠାରେ ଉପସ୍ଥିତ ହୋଇ ଏହି କ୍ଷଣକୁ ସମ୍ମାନ କରୁଛନ୍ତି।
Verse 85
ब्रह्मर्षयो विमानस्था ब्रह्मलोकचराश्न ये
ବିମାନରେ ଆସୀନ ସେଇ ବ୍ରହ୍ମର୍ଷିମାନେ, ଏବଂ ଯେମାନେ ବ୍ରହ୍ମଲୋକରେ ସ୍ୱେଚ୍ଛାରେ ବିଚରଣ କରନ୍ତି—ସେମାନେ ମଧ୍ୟ ଏଠାରେ ଆସିଛନ୍ତି।
Verse 86
पितृलोकगता: सर्वे तारिता: पितरस्त्वया
ପିତୃଲୋକକୁ ଯାଇଥିବା ସମସ୍ତ ପିତୃମାନେ ତୁମ ଦ୍ୱାରା ତାରିତ ହୋଇଛନ୍ତି।
Verse 87
ब्रह्मचर्येण दानेन यज्ञेन तपसा तथा
ବ୍ରହ୍ମଚର୍ଯ୍ୟରେ, ଦାନରେ, ଯଜ୍ଞରେ, ଏବଂ ସେହିପରି ତପସ୍ୟାରେ…
Verse 88
श्रद्धया परया यस्त्वं तपश्चरसि सुव्रत
ଶ୍ୱଶୁର କହିଲେ: “ହେ ସୁବ୍ରତ! ତୁମେ ପରମ ଶ୍ରଦ୍ଧାରେ ତପସ୍ୟା ଆଚରଣ କରୁଛ; ତେଣୁ…”
Verse 89
इस प्रकार श्रीमह्याभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वर्ें अश्वमेधकी समाप्तिविषयक नवासीवाँ अध्याय पूरा हुआ,सर्वमेतद्धि यस्मात् ते दत्त शुद्धेन चेतसा
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଆଶ୍ୱମେଧିକ ପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ଅନୁଗୀତାପର୍ବରେ ଆଶ୍ୱମେଧ-ସମାପ୍ତିବିଷୟକ ଅଣନବ୍ବେଁ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା। ଶୁଦ୍ଧ ଓ ନିଷ୍କପଟ ଚିତ୍ତରେ ତୁମକୁ ଏହି ସମସ୍ତ ଦିଆଯାଇଥିବାରୁ ଏହା ଉପଦେଶିତ ହେଲା।
Verse 90
क्षुधा निर्णुदति प्रज्ञां धर्मबुद्धि व्यपोहति,“भूख मनुष्यकी बुद्धिको चौपट कर देती है। धार्मिक विचारको मिटा देती है। क्षुधासे ज्ञान लुप्त हो जानेके कारण मनुष्य धीरज खो देता है। जो भूखको जीत लेता है, वह निश्चय ही स्वर्गपर विजय पाता है इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि नकुलाख्याने नवतितमो<ध्याय:
କ୍ଷୁଧା ପ୍ରଜ୍ଞାକୁ ତାଡ଼ିଦିଏ ଏବଂ ଧର୍ମବୁଦ୍ଧିକୁ ଲୋପ କରେ। କ୍ଷୁଧାରେ ଜ୍ଞାନ ଆବୃତ ହେଲେ ମନୁଷ୍ୟ ଧୈର୍ଯ୍ୟ ଓ ଆତ୍ମସଂଯମ ହରାଏ। ତେଣୁ ଯେ ଭୁଖର ତୃଷ୍ଣାକୁ ଜୟ କରେ, ସେ ନିଶ୍ଚୟ ପୁଣ୍ୟ ଲାଭ କରି ସ୍ୱର୍ଗଲକ୍ଷ୍ୟରେ ବିଜୟୀ ହୁଏ। ଇତି ଶ୍ରୀମହାଭାରତେ ଆଶ୍ୱମେଧିକପର୍ବଣି ଅନୁଗୀତାପର୍ବଣି ନକୁଲାଖ୍ୟାନେ ନବତିତମୋऽଧ୍ୟାୟଃ।
Verse 91
क्षुधापरिगतज्ञानो धृतिं त्यजति चैव ह । बुभुक्षां जयते यस्तु स स्वर्ग जयते ध्रुवम्,“भूख मनुष्यकी बुद्धिको चौपट कर देती है। धार्मिक विचारको मिटा देती है। क्षुधासे ज्ञान लुप्त हो जानेके कारण मनुष्य धीरज खो देता है। जो भूखको जीत लेता है, वह निश्चय ही स्वर्गपर विजय पाता है
କ୍ଷୁଧାରେ ଆବୃତ ଜ୍ଞାନ ଥିବା ମନୁଷ୍ୟ ମଧ୍ୟ ଧୈର୍ଯ୍ୟ ତ୍ୟାଗ କରେ। କିନ୍ତୁ ଯେ ଭୁଖର ତୃଷ୍ଣାକୁ ଜୟ କରେ, ସେ ନିଶ୍ଚୟ ସ୍ୱର୍ଗକୁ ଜୟ କରେ।
Verse 92
यदा दानरुचि: स्याद् वै तदा धर्मो न सीदति । अनवेक्ष्य सुतस्नेहं कलत्रस्नेहमेव च
ଯେତେବେଳେ ଦାନର ରୁଚି ଜାଗେ, ସେତେବେଳେ ଧର୍ମ ଅବନତ ହୁଏ ନାହିଁ। ପୁତ୍ରସ୍ନେହ ଓ ପତ୍ନୀସ୍ନେହକୁ ମଧ୍ୟ ଦେଖିନାହିଁ—ଅର୍ଥାତ୍ ଆସକ୍ତିରେ ବନ୍ଧିତ ନ ହୋଇ—ଦାନ କରିବା ଉଚିତ।
Verse 93
द्रव्यागमो नृणां सूक्ष्म: पात्रे दानं ततः परम्,“मनुष्यके लिये सबसे पहले न्यायपूर्वक धनकी प्राप्तिका उपाय जानना ही सूक्ष्म विषय है। उस धनको सत्पात्रकी सेवामें अर्पण करना उससे भी श्रेष्ठ है। साधारण समयमें दान देनेकी अपेक्षा उत्तम समयपर दान देना और भी अच्छा है; किंतु श्रद्धाका महत्त्व कालसे भी बढ़कर है। स्वर्गका दरवाजा अत्यन्त सूक्ष्म है। मनुष्य मोहवश उसे देख नहीं पाते हैं
ଶ୍ୱଶୁର କହିଲେ—“ମନୁଷ୍ୟ ପାଇଁ ନ୍ୟାୟପୂର୍ବକ ଧନ ଲାଭ କରିବାର ଉପାୟ ବୁଝିବା ଅତ୍ୟନ୍ତ ସୂକ୍ଷ୍ମ ବିଷୟ; କିନ୍ତୁ ତାହାଠାରୁ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ହେଉଛି ସେଇ ଧନକୁ ସତ୍ପାତ୍ରର ସେବାରେ ଅର୍ପଣ କରିବା। ସାଧାରଣ କାଳରେ ଦାନ କରିବାଠାରୁ ଉତ୍ତମ କାଳରେ ଦାନ କରିବା ଅଧିକ ଶ୍ରେୟସ୍କର ବୋଲି କୁହାଯାଏ; କିନ୍ତୁ କାଳଠାରୁ ମଧ୍ୟ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ହେଉଛି ଶ୍ରଦ୍ଧା। ସ୍ୱର୍ଗର ଦ୍ୱାର ଅତ୍ୟନ୍ତ ସୂକ୍ଷ୍ମ—ମୋହବଶତଃ ମନୁଷ୍ୟମାନେ ତାହାକୁ ଦେଖି ପାରନ୍ତି ନାହିଁ।”
Verse 94
काल: परतरो दानाच्छुद्धा चैव ततः परा । स्वर्गद्वारं सुसूक्ष्मं हि नरै्मोहान्न दृश्यते,“मनुष्यके लिये सबसे पहले न्यायपूर्वक धनकी प्राप्तिका उपाय जानना ही सूक्ष्म विषय है। उस धनको सत्पात्रकी सेवामें अर्पण करना उससे भी श्रेष्ठ है। साधारण समयमें दान देनेकी अपेक्षा उत्तम समयपर दान देना और भी अच्छा है; किंतु श्रद्धाका महत्त्व कालसे भी बढ़कर है। स्वर्गका दरवाजा अत्यन्त सूक्ष्म है। मनुष्य मोहवश उसे देख नहीं पाते हैं
ଦାନଠାରୁ ମଧ୍ୟ ସମୟୋଚିତତା ଶ୍ରେଷ୍ଠ, ତାହାଠାରୁ ମଧ୍ୟ ଶୁଦ୍ଧତା ଉଚ୍ଚତର। ସ୍ୱର୍ଗର ଦ୍ୱାର ଅତ୍ୟନ୍ତ ସୂକ୍ଷ୍ମ; ମୋହାନ୍ଧ ମନୁଷ୍ୟମାନେ ତାହା ଦେଖି ପାରନ୍ତି ନାହିଁ।
Verse 95
स्वर्गार्गलं लोभबीजं रागगुप्तं दुरासदम् । त॑ तु पश्यन्ति पुरुषा जितक्रोधा जितेन्द्रिया:
ଏହା ସ୍ୱର୍ଗମାର୍ଗକୁ ଅଟକାଇଥିବା କବାଟ—ଲୋଭର ବୀଜ, ରାଗରେ ଗୁପ୍ତ, ଜୟ କରିବା ଦୁର୍ଲଭ। କିନ୍ତୁ ଯେମାନେ କ୍ରୋଧକୁ ଜୟ କରିଛନ୍ତି ଓ ଇନ୍ଦ୍ରିୟକୁ ନିୟନ୍ତ୍ରଣ କରିଛନ୍ତି, ସେମାନେ ତାହାକୁ ସ୍ପଷ୍ଟ ଦେଖନ୍ତି।
Verse 96
सहस्रशक्तिश्न शतं शतशक्तिर्दशापि च
ସହସ୍ର-ଶକ୍ତି, ପରେ ଶତ, ଶତ-ଶକ୍ତି, ଏବଂ ଦଶ ମଧ୍ୟ—ଏପରି ଶକ୍ତିର ପ୍ରମାଣ ଗଣାଯାଏ।
Verse 97
रन्तिदेवो हि नृपतिरप: प्रादादकिंचन:
ରାଜା ରନ୍ତିଦେବ ନିଜେ ଅକିଞ୍ଚନ ହୋଇ ସୁଦ୍ଧା ଜଳ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଦାନ କରିଥିଲେ।
Verse 98
न धर्म: प्रीयते तात दानैर्दत्तैमहाफलै:
ତାତ, ମହାଫଳଦାୟକ ଦାନ ଦେଲେ ମାତ୍ରେ ଧର୍ମ ପ୍ରସନ୍ନ ହୁଏ ନାହିଁ।
Verse 99
न्यायलब्धैर्यथा सूक्ष्मै: श्रद्धापूते: स तुष्यति । “तात! अन्यायपूर्वक प्राप्त हुए द्रव्यके द्वारा महान् फल देनेवाले बड़े-बड़े दान करनेसे धर्मको उतनी प्रसन्नता नहीं होती, जितनी न्यायोपार्जित थोड़े-से अन्नका भी श्रद्धापूर्वक दान करनेसे उन्हें प्रसन्नता होती है ।। ९८ $ ।। गोप्रदानसहस्राणि द्विजेभ्यो5दान्नगो नृप:
ଶ୍ୱଶୁର କହିଲେ— “ବତ୍ସ! ଅନ୍ୟାୟରେ ଲାଭିତ ଧନରେ ମହାଫଳଦାୟକ ବଡ଼ ବଡ଼ ଦାନ କଲେ ମଧ୍ୟ ଧର୍ମ ତେତେ ପ୍ରସନ୍ନ ହୁଏନାହିଁ; ଯେତେ ନ୍ୟାୟରେ ଅର୍ଜିତ ଅଳ୍ପ ଅନ୍ନକୁ ମଧ୍ୟ ଶ୍ରଦ୍ଧାପୂର୍ବକ ଦାନ କଲେ ପ୍ରସନ୍ନ ହୁଏ। ଦାନର ପରିମାଣ ନୁହେଁ, ଉପାୟଶୁଦ୍ଧି ଓ ଶ୍ରଦ୍ଧା ମୁଖ୍ୟ।”
Verse 100
एकां दत्त्वा स पारक््यां नरकं॑ समपद्यत । “राजा नृगने ब्राह्मणोंको हजारों गौएँ दान की थीं; किंतु एक ही गौ दूसरेकी दान कर दी, जिससे अन्यायत: प्राप्त द्रव्यका दान करनेके कारण उन्हें नरकमें जाना पड़ा ।। ९९६ || आत्ममांसप्रदानेन शिबिरौशीनरो नूप:
ଅନ୍ୟର ଗୋଟିଏ ଗାଈ ଦାନ କରିଦେବାରୁ ସେ ନରକକୁ ପତିତ ହେଲା। ରାଜା ନୃଗ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କୁ ହଜାର ହଜାର ଗାଈ ଦାନ କରିଥିଲେ; କିନ୍ତୁ ଭୁଲରେ ନିଜର ନୁହେଁ ଏମିତି ଗୋଟିଏ ଗାଈ ଦାନ ହୋଇଗଲା। ପରଧନ ଦାନର ଦୋଷରୁ ସେ ନରକଗତି ପାଇଲେ—ଏହା ଦାନରେ ସ୍ୱାମିତ୍ୱଶୁଦ୍ଧି ଓ ନ୍ୟାୟର ଆବଶ୍ୟକତା ଦର୍ଶାଏ।
Verse 101
प्राप्प पुण्यकृताँललोकान् मोदते दिवि सुब्रत: । “उशीनरके पुत्र उत्तम व्रतका पालन करनेवाले राजा शिबि श्रद्धापूर्वक अपने शरीरका मांस देकर भी पुण्यात्माओंके लोकोंमें अर्थात् स्वर्गमें आनन्द भोगते हैं | १०० $ ।। विभवो न नृणां पुण्यं स्वशकक््त्या स्वर्जितं सताम्
ଉତ୍ତମ ବ୍ରତଧାରୀ ସେ ପୁରୁଷ ପୁଣ୍ୟବାନଙ୍କ ଲୋକ ପ୍ରାପ୍ତ କରି ସ୍ୱର୍ଗରେ ଆନନ୍ଦ କରେ। ଉଶୀନର ଦେଶରେ ରାଜା ଶିବି ଶ୍ରଦ୍ଧାପୂର୍ବକ ନିଜ ଶରୀରର ମାଂସ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଦାନ କରିଥିଲେ; ତଥାପି ସେ ପୁଣ୍ୟାତ୍ମାଙ୍କ ଲୋକରେ, ଅର୍ଥାତ୍ ସ୍ୱର୍ଗରେ, ସୁଖ ଭୋଗ କରନ୍ତି। କାରଣ ଧନ-ବିଭବ ମାତ୍ରେ ମନୁଷ୍ୟର ପୁଣ୍ୟ ନୁହେଁ; ସତ୍ପୁରୁଷ ନିଜ ଶକ୍ତି ଓ ତ୍ୟାଗରେ ଯାହା ଅର୍ଜନ କରନ୍ତି, ସେଇ ହେଉଛି ସତ୍ୟ ପୁଣ୍ୟ।
Verse 102
न यज्ञैविविधैर्विप्र यथान्यायेन संचितै: । “विप्रवर! मनुष्योंके लिये धन ही पुण्यका हेतु नहीं है। साधु पुरुष अपनी शक्तिके अनुसार सुगमतापूर्वक पुण्यका अर्जन कर लेते हैं। न्यायपूर्वक संचित किये हुए अन्नके दानसे जैसा उत्तम फल प्राप्त होता है, वैसा नाना प्रकारके यज्ञोंका अनुष्ठान करनेसे भी नहीं सुलभ होता ।। १०१ ह || क्रोधाद् दानफलं हन्ति लोभात् स्वर्ग न गच्छति
ଶ୍ୱଶୁର କହିଲେ— “ବିପ୍ରବର! ମନୁଷ୍ୟଙ୍କ ପାଇଁ ଧନ ମାତ୍ରେ ପୁଣ୍ୟର କାରଣ ନୁହେଁ। ସାଧୁଜନ ନିଜ ଶକ୍ତିଅନୁସାରେ ସହଜରେ ପୁଣ୍ୟ ଅର୍ଜନ କରନ୍ତି। ନ୍ୟାୟରେ ସଞ୍ଚିତ ଅନ୍ନ ଦାନ କଲେ ଯେ ଉତ୍ତମ ଫଳ ମିଳେ, ତାହା ନାନାପ୍ରକାର ଯଜ୍ଞ କଲେ ମଧ୍ୟ ଏତେ ସହଜରେ ମିଳେନାହିଁ। ତଦୁପରି କ୍ରୋଧ ଦାନଫଳକୁ ନଷ୍ଟ କରେ, ଏବଂ ଲୋଭରୁ ସ୍ୱର୍ଗଗତି ହୁଏନାହିଁ।”
Verse 103
न राजसूयैर्बहुभिरिष्टवा विपुलदक्षिणै:,“तुमने जो यह दानजनित फल प्राप्त किया है, इसकी समता प्रचुर दक्षिणावाले बहुसंख्यक राजसूय और अनेक अभश्वमेध-यज्ञोंद्वारा भी नहीं हो सकती। तुमने सेरभर सत्तूका दान करके अक्षय ब्रह्मलोकको जीत लिया है
ଶ୍ୱଶୁର କହିଲେ— “ତୁମେ ଦାନରୁ ଯେ ଫଳ ପାଇଛ, ତାହାର ସମତା ବିପୁଳ ଦକ୍ଷିଣାସହ ଅନେକ ରାଜସୂୟ ଯଜ୍ଞ କଲେ ମଧ୍ୟ ହୁଏନାହିଁ; ଅନେକ ଅଶ୍ୱମେଧ କଲେ ମଧ୍ୟ ନୁହେଁ। ତୁମେ ତ ସେରଭର ସତ୍ତୁ ଦାନ କରି ଅକ୍ଷୟ ବ୍ରହ୍ମଲୋକକୁ ଜିତିଛ।”
Verse 104
नचाश्वमेधैर्बहुभि: फलं सममिदं तव । सक्तुप्रस्थेन विजितो ब्रह्मलोकस्त्वयाक्षय:,“तुमने जो यह दानजनित फल प्राप्त किया है, इसकी समता प्रचुर दक्षिणावाले बहुसंख्यक राजसूय और अनेक अभश्वमेध-यज्ञोंद्वारा भी नहीं हो सकती। तुमने सेरभर सत्तूका दान करके अक्षय ब्रह्मलोकको जीत लिया है
ଶ୍ୱଶୁର କହିଲେ—“ଏହି ଦାନରୁ ତୁମେ ଯେ ପୁଣ୍ୟଫଳ ପାଇଛ, ତାହାର ସମତା ଅନେକ ଅଶ୍ୱମେଧ ଯଜ୍ଞ କଲେ ମଧ୍ୟ ହେବ ନାହିଁ। କେବଳ ଏକ ପ୍ରସ୍ଥ ସତ୍ତୁ ଦାନ କରି ତୁମେ ଅକ୍ଷୟ ବ୍ରହ୍ମଲୋକ ଜିତିଛ।”
Verse 105
विरजो ब्रह्मसदनं गच्छ विप्र यथासुखम् | सर्वेषां वो द्विजश्रेष्ठ दिव्यं यानमुपस्थितम्,“विप्रवर! अब तुम सुखपूर्वक रजोगुणरहित ब्रह्मलोकमें जाओ। द्विजश्रेष्ठी तुम सब लोगोंके लिये यह दिव्य विमान उपस्थित है
ଶ୍ୱଶୁର କହିଲେ—“ହେ ବିପ୍ର, ଏବେ ତୁମେ ସୁଖପୂର୍ବକ ରଜୋମଲରହିତ ବ୍ରହ୍ମସଦନକୁ ଯାଅ। ହେ ଦ୍ୱିଜଶ୍ରେଷ୍ଠ, ତୁମମାନଙ୍କ ସମସ୍ତଙ୍କ ପାଇଁ ଏହି ଦିବ୍ୟ ବିମାନ ପ୍ରସ୍ତୁତ।”
Verse 106
आरोहत यथाकामं धर्मोडस्मि द्विज पश्य माम् | तारितो हि त्वया देहो लोके कीर्ति: स्थिरा च ते
“ହେ ଦ୍ୱିଜ, ଇଚ୍ଛାମତେ ଆରୋହଣ କର—ମୋତେ ଦେଖ; ମୁଁ ଧର୍ମ। ତୁମ ଦ୍ୱାରା ଏହି ଦେହ ଉଦ୍ଧାର ପାଇଛି, ଏବଂ ଲୋକରେ ତୁମ କୀର୍ତ୍ତି ମଧ୍ୟ ସ୍ଥିର ରହିବ।”
Verse 107
इत्युक्तवाक्ये धर्मे तु यानमारुह्ु स द्विज:
ଧର୍ମ ଏପରି କହିବା ପରେ ସେ ଦ୍ୱିଜ ସେହି ବିମାନରେ ଆରୋହଣ କଲା।
Verse 108
तस्मिन् विप्रे गते स्वर्ग ससुते सस्नुषे तदा
ସେହି ବିପ୍ର ସ୍ୱର୍ଗକୁ ଗଲା ପରେ, ସେତେବେଳେ—ପୁଅ ଓ ପୁଅବୋହୂ ସହିତ—(ପରବର୍ତ୍ତୀ ଘଟଣା ଘଟିଲା)।
Verse 109
ततस्तु सक्तुगन्धेन क्लेदेन सलिलस्य च,तदनन्तर सत्तूकी गन्ध सूँघने, वहाँ गिरे हुए जलकी कीचसे सम्पर्क होने, वहाँ गिरे हुए दिव्य पुष्पोंको रौंदने और उन महात्मा ब्राह्मणके दान करते समय गिरे हुए अन्नके कणोंमें मन लगानेसे तथा उन उज्छवृत्तिधारी ब्राह्मणकी तपस्याके प्रभावसे मेरा मस्तक सोनेका हो गया
ତାପରେ ସତ୍ତୁର ସୁଗନ୍ଧ, ଜଳର ଆର୍ଦ୍ରତା, ସେହି ଗନ୍ଧକୁ ଶୁଘିବା, ସେଠାରେ ପଡ଼ିଥିବା ଜଳରୁ ହୋଇଥିବା କାଦୁଆର ସ୍ପର୍ଶ, ସେଠାରେ ପଡ଼ିଥିବା ଦିବ୍ୟ ପୁଷ୍ପମାନଙ୍କୁ ପାଦରେ ଦଳିବା, ଏବଂ ସେହି ମହାତ୍ମା ବ୍ରାହ୍ମଣ ଦାନ କରୁଥିବାବେଳେ ପଡ଼ିଥିବା ଅନ୍ନକଣାରେ ମନ ଲଗାଇବା—ଏ ସବୁ ସହ ଉଞ୍ଛବୃତ୍ତିଧାରୀ ସେହି ବ୍ରାହ୍ମଣଙ୍କ ତପସ୍ୟାର ପ୍ରଭାବରୁ ମୋର ମସ୍ତକ ସୁବର୍ଣ୍ଣମୟ ହୋଇଗଲା।
Verse 110
दिव्यपुष्पविमर्दाश्व॒ साधोर्दानलवैश्व तै: । विप्रस्थ तपसा तस्य शिरो मे काउ्चनीकृतम्,तदनन्तर सत्तूकी गन्ध सूँघने, वहाँ गिरे हुए जलकी कीचसे सम्पर्क होने, वहाँ गिरे हुए दिव्य पुष्पोंको रौंदने और उन महात्मा ब्राह्मणके दान करते समय गिरे हुए अन्नके कणोंमें मन लगानेसे तथा उन उज्छवृत्तिधारी ब्राह्मणकी तपस्याके प्रभावसे मेरा मस्तक सोनेका हो गया
ସେହି ସାଧୁ ବ୍ରାହ୍ମଣ ଦାନ କରୁଥିବାବେଳେ ପଡ଼ିଥିବା ଅନ୍ନକଣାରେ ମନ ଲଗାଇ, ପଡ଼ିଥିବା ଦିବ୍ୟ ପୁଷ୍ପମାନଙ୍କୁ ଦଳି, ଏବଂ ସେହି ବିପ୍ରଙ୍କ ତପସ୍ୟାର ପ୍ରଭାବରୁ—ମୋର ମସ୍ତକ ସୁବର୍ଣ୍ଣମୟ ହୋଇଗଲା।
Verse 111
तस्य सत्याभिसंधस्य सक्तुदानेन चैव ह । शरीरार्थ च मे विप्रा: शातकुम्भमयं कृतम्,विप्रवरो! उन सत्यप्रतिज्ञ ब्राह्मणके सत्तूदानसे मेरा यह आधा शरीर भी सुवर्णमय हो गया
ହେ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ! ସେହି ସତ୍ୟସଙ୍କଳ୍ପ ପୁରୁଷଙ୍କ ସତ୍ୟନିଷ୍ଠାର ପ୍ରଭାବରୁ ଏବଂ ତାଙ୍କ ସତ୍ତୁ-ଦାନରୁ, ମୋର ଏହି ଅର୍ଧ ଶରୀର ମଧ୍ୟ ଶୁଦ୍ଧ ସୁବର୍ଣ୍ଣମୟ ହୋଇଗଲା।
Verse 112
पश्यतेमं सुविपुलं तपसा तस्य धीमत: । कथमेवंविध॑ स्याद् वै पार्श्रमन्न्यदिति द्विजा:,उन बुद्धिमान ब्राह्मणकी तपस्यासे मुझे जो यह महान् फल प्राप्त हुआ है, इसे आपलोग अपनी आँखों देख लीजिये। ब्राह्मणो! अब मैं इस चिन्तामें पड़ा कि मेरे शरीरका दूसरा पार्श्व भी कैसे ऐसा ही हो सकता है?
ସେହି ଧୀମାନଙ୍କ ତପସ୍ୟାରୁ ମୋତେ ଯେ ଏହି ଅତ୍ୟନ୍ତ ବିଶାଳ ଫଳ ମିଳିଛି, ତାହାକୁ ତୁମେ ନିଜ ଆଖିରେ ଦେଖ। ହେ ଦ୍ୱିଜମାନେ! ଏବେ ମୁଁ ଏହି ଚିନ୍ତାରେ ପଡ଼ିଛି—ମୋ ଶରୀରର ଅନ୍ୟ ପାର୍ଶ୍ୱ ମଧ୍ୟ ଏମିତି କିପରି ହେବ?
Verse 113
तपोवनानि यज्ञांश्व॒ हृष्टो5भ्येमि पुन: पुनः । यज्ञ त्वहमिमं श्रुत्वा कुरुराजस्य धीमत:
ମୁଁ ହର୍ଷିତ ହୋଇ ପୁନଃପୁନଃ ତପୋବନ ଓ ଯଜ୍ଞକର୍ମକୁ ଯାଏ। ଧୀମାନ କୁରୁରାଜଙ୍କ ଏହି ଯଜ୍ଞର କଥା ଶୁଣି ମୁଁ ମଧ୍ୟ ଏହି ଯଜ୍ଞକୁ ଆସିଛି।
Verse 114
ततो मयोक्तं तद् वाक््यं प्रहस्य ब्राह्मणर्षभा:
ତେବେ, ହେ ବ୍ରାହ୍ମଣଶ୍ରେଷ୍ଠମାନେ! ମୋର କହିଥିବା ସେଇ ବାକ୍ୟ ଶୁଣି ସେମାନେ ହସି ପଡ଼ିଲେ ଏବଂ ଉତ୍ତର ଦେଲେ—ଗମ୍ଭୀର ଭାବେ ଗ୍ରହଣ ନକରି, ହାସ୍ୟମିଶ୍ରିତ ଅବହେଳାରେ ତାହାକୁ ତ୍ୟାଜିଦେଲେ।
Verse 115
सक्तुप्रस्थलवैस्तैरहि तदाहं काड्चनीकृत:
ସେଇ ସକ୍ତୁର ମୁଠିମୁଠି ଦାନ ଓ ଅଳ୍ପ ଅନ୍ନମାପରେ ମୁଁ ସେତେବେଳେ ଯେନ ସୁବର୍ଣ୍ଣମୟ ହୋଇଗଲି—ଦୀପ୍ତିମାନ ଓ ପୁଣ୍ୟରେ ଧନ୍ୟ।
Verse 116
वैशम्पायन उवाच इत्युक्त्वा नकुल: सर्वान् यज्ञे द्विजवरांस्तदा,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! यज्ञस्थलमें उन समस्त श्रेष्ठ ब्राह्मणोंसे ऐसा कहकर वह नेवला वहाँसे गायब हो गया और वे ब्राह्मण भी अपने-अपने घर चले गये
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଜନମେଜୟ! ଏପରି କହି ନକୁଳ ସେଇ ଯଜ୍ଞରେ ଉପସ୍ଥିତ ସମସ୍ତ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କୁ ସମ୍ବୋଧନ କଲା; ତାପରେ ସେଇ ଅଦ୍ଭୁତ ପ୍ରାଣୀ ସେଠାରୁ ଅଦୃଶ୍ୟ ହୋଇଗଲା।
Verse 117
जगामादर्शन तेषां विप्रास्ते च ययुर्गृहान्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! यज्ञस्थलमें उन समस्त श्रेष्ठ ब्राह्मणोंसे ऐसा कहकर वह नेवला वहाँसे गायब हो गया और वे ब्राह्मण भी अपने-अपने घर चले गये
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଜନମେଜୟ! ଯଜ୍ଞସ୍ଥଳରେ ସେଇ ସମସ୍ତ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କ ସମ୍ମୁଖରେ ଏପରି କହି ସେଇ ନେଉଳ ତାଙ୍କ ଦୃଷ୍ଟିରୁ ଅଦୃଶ୍ୟ ହୋଇଗଲା; ଏବଂ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ ମଧ୍ୟ ନିଜ-ନିଜ ଘରକୁ ଚାଲିଗଲେ।
Verse 118
एतत् ते सर्वमाख्यातं मया परपुरंजय । यदाश्चर्यमभूत् तत्र वाजिमेथे महाक्रतो,शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले जनमेजय! वहाँ अश्वमेध नामक महायज्ञमें जो आश्चर्यजनक घटना घटित हुई थी, वह सारा प्रसंग मैंने तुम्हें बता दिया
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ପରପୁରଞ୍ଜୟ ଜନମେଜୟ! ସେଇ ମହାକ୍ରତୁ ଅଶ୍ୱମେଧ ଯଜ୍ଞରେ ଯେ ଆଶ୍ଚର୍ଯ୍ୟ ଘଟଣା ଘଟିଥିଲା, ସେ ସମସ୍ତ ବୃତ୍ତାନ୍ତ ମୁଁ ତୁମକୁ କହିଦେଲି।
Verse 119
न विस्मयस्ते नृपते यज्ञे कार्य: कथंचन । ऋषिकोटिसहस्त्राणि तपोभियें दिवं गता:,नरेश्वर! उस यज्ञके सम्बन्धमें ऐसी घटना सुनकर तुम्हें किसी प्रकार विस्मय नहीं करना चाहिये। सहस्रों कोटि ऐसे ऋषि हो गये हैं, जो यज्ञ न करके केवल तपस्याके ही बलसे दिव्य लोकको प्राप्त हो चुके हैं
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ୍, ଏହି ଯଜ୍ଞ ସମ୍ବନ୍ଧରେ ତୁମେ କେବେ ମଧ୍ୟ ଆଶ୍ଚର୍ଯ୍ୟ କରିବା ଉଚିତ୍ ନୁହେଁ। ଅସଂଖ୍ୟ ଋଷି କେବଳ ତପସ୍ୟାର ବଳରେ—ଯଜ୍ଞ ନ କରି ମଧ୍ୟ—ଦିବ୍ୟ ଲୋକକୁ ପ୍ରାପ୍ତ ହୋଇଛନ୍ତି।
Verse 120
अद्रोह: सर्वभूतेषु संतोष: शीलमार्जवम् | तपो दमश्न सत्यं च प्रदानं चेति सम्मितम्,किसी भी प्राणीसे द्रोह न करना, मनमें संतोष रखना, शील और सदाचारका पालन करना, सबके प्रति सरलतापूर्ण बर्ताव करना, तपस्या करना, मन और इन्द्रियोंको संयममें रखना, सत्य बोलना और न्यायोपार्जित वस्तुका श्रद्धापूर्वक दान करना--इनमेंसे एक-एक गुण बड़े-बड़े यज्ञोंके समान हैं
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସମସ୍ତ ପ୍ରାଣୀ ପ୍ରତି ଅଦ୍ରୋହ, ସନ୍ତୋଷ, ଶୀଳ-ଆର୍ଜବ, ତପ, ଦମ (ମନ-ଇନ୍ଦ୍ରିୟ ସଂଯମ), ସତ୍ୟ, ଏବଂ ନ୍ୟାୟାର୍ଜିତ ବସ୍ତୁର ଶ୍ରଦ୍ଧାପୂର୍ବକ ଦାନ—ଏହି ପ୍ରତ୍ୟେକ ଗୁଣକୁ ମହାଯଜ୍ଞ ସମାନ ପୁଣ୍ୟଦାୟକ ବୋଲି ମନାଯାଏ।
Verse 263
भुदुक्तेडन्यस्मिन् कदाचित् स ष्े काले द्विजोत्तम: | वे उत्तम व्रतधारी द्विज सदा छठे कालमें अर्थात् तीन-तीन दिनपर ही स्त्री-पुत्र आदिके साथ भोजन किया करते थे। यदि किसी दिन उस समय भोजन न मिला तो दूसरा छठा काल आनेपर ही वे द्विजश्रेष्ठ अन्न ग्रहण करते थे
ନକୁଳ କହିଲେ—ଏକ ସମୟରେ ଜଣେ ଦ୍ୱିଜଶ୍ରେଷ୍ଠ ଥିଲେ, ଯିଏ ଉତ୍ତମ ଓ କଠୋର ବ୍ରତଧାରୀ। ତାଙ୍କର ନିୟମ ଥିଲା—‘ଷଷ୍ଠ କାଳ’ରେ, ଅର୍ଥାତ୍ ତିନି ତିନି ଦିନ ପରେ—ସ୍ତ୍ରୀ, ପୁତ୍ର ଓ ଆଶ୍ରିତମାନଙ୍କ ସହ ଏକାସାଥି ଭୋଜନ କରିବା। ସେହି ନିୟତ ସମୟରେ ଅନ୍ନ ନ ମିଳିଲେ, ସେ ଅଧୀର ହୋଇ ପୂର୍ବରୁ ଖାଉନଥିଲେ; ପରବର୍ତ୍ତୀ ଷଷ୍ଠ କାଳ ଆସିଲେ ତେବେ ମାତ୍ର ଅନ୍ନ ଗ୍ରହଣ କରୁଥିଲେ।
Verse 296
उज्छं तदा शुक्लपक्षे मध्यं तपति भास्करे । बारंबार छठा काल आता; किंतु उन्हें भोजन नहीं मिलता था। अतः वे सब-के-सब भूखे ही रह जाते थे। एक दिन ज्येष्ठके शुक्लपक्षमें दोपहरीके समय उस परिवारके सब लोग उज्छ लानेके लिये चले
ନକୁଳ କହିଲେ—ସେ ସମୟରେ ଶୁକ୍ଲପକ୍ଷରେ, ମଧ୍ୟାହ୍ନେ ସୂର୍ଯ୍ୟ ପ୍ରଚଣ୍ଡ ତପୁଥିବାବେଳେ, ଷଷ୍ଠ କାଳ ପୁନଃପୁନଃ ଆସୁଥିଲା; କିନ୍ତୁ ସେମାନଙ୍କୁ ଭୋଜନ ମିଳୁନଥିଲା। ତେଣୁ ସେମାନେ ସମସ୍ତେ ଭୁଖା ରହିଯାଉଥିଲେ। ଏକ ଦିନ ଜ୍ୟେଷ୍ଠ ମାସର ଶୁକ୍ଲପକ୍ଷରେ, ମଧ୍ୟାହ୍ନ ସମୟରେ, ସେ ପରିବାରର ସମସ୍ତେ ‘ଉଜ୍ଝ’ ଆଣିବାକୁ ବାହାରିଲେ।
Verse 443
त्वगस्थिभूतां वेपन्ती ततो भारयामुवाच ह । उन दिद्वान् ब्राह्मणशिरोमणिने अपने ही अनुमानसे यह जान लिया कि यह मेरी वृद्धा स्त्री स्वयं भी क्षुधासे कष्ट पा रही है, थकी है और अत्यन्त दुर्बल हो गयी है। इस तपस्विनीके शरीरमें चमड़ेसे ढकी हुई हड्डियोंका ढाँचामात्र रह गया है और यह काँप रही है। उसकी अवस्थापर दृष्टिपात करके उन्होंने पत्नीसे कहा--
ସ୍ତ୍ରୀ ଚର୍ମ-ଅସ୍ଥିମାତ୍ର ହୋଇ, କ୍ଷୁଧାର କଷ୍ଟରେ କାପୁଥିବାକୁ ଦେଖି, ସେ ବିଦ୍ୱାନ୍ ବ୍ରାହ୍ମଣଶିରୋମଣି ନିଜ ଅନୁମାନରେ ଜାଣିଲେ—“ମୋର ବୃଦ୍ଧା ପତ୍ନୀ ମଧ୍ୟ ଭୁଖରେ ପୀଡିତ, କ୍ଲାନ୍ତ ଏବଂ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଦୁର୍ବଳ ହୋଇପଡ଼ିଛି।” ତାଙ୍କର ଅବସ୍ଥା ଦେଖି ସେ ପତ୍ନୀଙ୍କୁ କହିଲେ—
Verse 473
दारेष्वधीनो धर्मश्न॒ पितृणामात्मनस्तथा | “वह उज्ज्वल कीर्तिसे भ्रष्ट हो जाता है और उसे उत्तम लोकोंकी प्राप्ति नहीं होती। धर्म, काम और अर्थ-सम्बन्धी कार्य, सेवा-शुश्रूषा तथा वंशपरम्पराकी रक्षा--ये सब स्त्रीके ही अधीन हैं। पितरोंका तथा अपना धर्म भी पत्नीके ही आश्रित है
ନକୁଳ କହିଲେ—ପୁରୁଷର ଧର୍ମ ସ୍ତ୍ରୀ ଉପରେ ନିର୍ଭର କରେ। ଗୃହରେ ସେବା-ଶୁଶ୍ରୂଷା, ବଂଶପରମ୍ପରାର ଅବିରତତା ଓ ରକ୍ଷା, ଏବଂ ଧର୍ମ-କାମ-ଅର୍ଥ ସମ୍ବନ୍ଧୀୟ କାର୍ଯ୍ୟର ସୁସଂଗଠିତ ପାଳନ—ଏ ସବୁ ସ୍ତ୍ରୀର ଆଶ୍ରୟରେ ରହେ। ପିତୃକର୍ତ୍ତବ୍ୟ ଓ ନିଜ ଧର୍ମ ମଧ୍ୟ ପତ୍ନୀର ସହାୟତାରେ ଦୃଢ଼ ହୁଏ। ଯେ ଏହି ନିର୍ଭରତାକୁ ସମ୍ମାନ ନକରେ, ସେ ଉଜ୍ଜ୍ୱଳ କୀର୍ତ୍ତିରୁ ଭ୍ରଷ୍ଟ ହୁଏ ଓ ଉତ୍ତମ ଲୋକ ପାଉନାହିଁ।
Verse 486
अयशो महदाप्रोति नरकांश्रैव गच्छति । “जो पुरुष स्त्रीकी रक्षा करना अपना कर्तव्य नहीं मानता अथवा जो स्त्रीकी रक्षा करनेमें असमर्थ है, वह संसारमें महान् अपयशका भागी होता है और परलोकमें जानेपर उसे नरकोंमें गिरना पड़ता है”
ନକୁଳ କହିଲେ—ଯେ ପୁରୁଷ ସ୍ତ୍ରୀରକ୍ଷାକୁ ନିଜ ଧର୍ମ ଭାବେ ମାନେନାହିଁ, କିମ୍ବା ଯେ ସ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କୁ ରକ୍ଷା କରିବାରେ ଅସମର୍ଥ, ସେ ଏହି ଲୋକରେ ମହା ଅପଯଶ ପାଏ; ମୃତ୍ୟୁ ପରେ ନରକମାନଙ୍କୁ ପତିତ ହୁଏ।
Verse 493
सक्तुप्रस्थचतुर्भागं गृहाणेमं प्रसीद मे । पतिके ऐसा कहनेपर ब्राह्मणी बोली--'ब्रह्मन! हम दोनोंके धर्म और अर्थ समान हैं, अतः आप मुझपर प्रसन्न हों और मेरे हिस्सेका यह पावभर सत्तू ले लें (और लेकर इसे अतिथिको दे दें)
ନକୁଳ କହିଲେ—“ଏହି ସତ୍ତୁର ପ୍ରସ୍ଥର ଚତୁର୍ଥାଂଶ ଗ୍ରହଣ କରନ୍ତୁ; ମୋ ପ୍ରତି ପ୍ରସନ୍ନ ହୁଅନ୍ତୁ।” ପତି ଏପରି କହିବା ପରେ ବ୍ରାହ୍ମଣୀ କହିଲା—“ବ୍ରହ୍ମନ୍! ଆମ ଦୁହେଁର ଧର୍ମ ଓ ଅର୍ଥ ସମାନ; ତେଣୁ ମୋ ପ୍ରତି ପ୍ରସନ୍ନ ହୋଇ, ମୋ ଭାଗର ଏହି ପାଦ-ପ୍ରସ୍ଥ ସତ୍ତୁ ନେଇ, ଅତିଥିଙ୍କୁ ଅର୍ପଣ କରନ୍ତୁ।”
Verse 513
भर्तुः प्रसादान्नारीणां रतिपुत्रफलं तथा । “माताका रज और पिताका वीर्य--इन दोनोंके मिलनेसे ही वंशपरम्परा चलती है। सत्रीके लिये पति ही सबसे बड़ा देवता है। नारियोंको जो रति और पुत्ररूप फलकी प्राप्ति होती है, वह पतिका ही प्रसाद है
ନକୁଳ କହିଲେ—ମାତାର ରଜ ଓ ପିତାର ବୀର୍ଯ୍ୟ—ଏ ଦୁହିଁର ସଂଯୋଗରୁ ହିଁ ବଂଶପରମ୍ପରା ଚାଲିଥାଏ। ତେଣୁ ସ୍ତ୍ରୀ ପାଇଁ ପତିକୁ ପରମ ଦେବତା ବୋଲି ମନାଯାଏ। ନାରୀମାନଙ୍କୁ ଯେ ରତି ଓ ପୁତ୍ରରୂପ ଫଳ ମିଳେ, ସେ ସବୁ ପତିଙ୍କ ପ୍ରସାଦରୁ ହୁଏ।
Verse 526
पुत्रप्रदानाद् वरदस्तस्मात् सक्तून् प्रयच्छ मे । आप पालन करनेके कारण मेरे पति, भरण-पोषण करनेसे भर्ता और पुत्र प्रदान करनेके कारण वरदाता हैं, इसलिये मेरे हिस्सेका सत्तू अतिथिदेवताको अर्पण कीजिये
ନକୁଳ କହିଲେ—ପାଳନ କରିବାରୁ ସେ ମୋ ପତି, ଭରଣ-ପୋଷଣ କରିବାରୁ ଭର୍ତ୍ତା, ଏବଂ ପୁତ୍ର ପ୍ରଦାନ କରିବାରୁ ବରଦାତା; ତେଣୁ ମୋ ଭାଗର ସତ୍ତୁ ମୋତେ ଦିଅ, ଯାହାକୁ ଅତିଥିଦେବତାଙ୍କୁ ଅର୍ପଣ କରାଯାଉ।
Verse 533
उपवासपरिश्रान्तो यदा त्वमपि कर्शित: । “आप भी तो जराजीर्ण, वृद्ध, क्षुधातुर, अत्यन्त दुर्बल, उपवाससे थके हुए और क्षीणकाय हो रहे हैं। (फिर आप जिस तरह भूखका कष्ट सहन करते हैं, उसी प्रकार मैं भी सह लूँगी)'
ଯେତେବେଳେ ଆପଣ ମଧ୍ୟ ଉପବାସରେ କ୍ଳାନ୍ତ ହୋଇ କୃଶ ହୋଇପଡ଼ିଛନ୍ତି, ସେତେବେଳେ ସ୍ପଷ୍ଟ ଯେ ଆପଣ ଜରାଜୀର୍ଣ୍ଣ, ବୃଦ୍ଧ, କ୍ଷୁଧାତୁର ଓ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଦୁର୍ବଳ। ତେଣୁ ଆପଣ ଯେପରି ଭୁଖର କଷ୍ଟ ସହନ କରନ୍ତି, ସେପରି ମୁଁ ମଧ୍ୟ ସହିବି।
Verse 843
स्तुवन्तो देवदूताश्न स्थिता दानेन विस्मिता: । “देखो, आकाशसे भूतलपर यह फूलोंकी वर्षा हो रही है। देवर्षि, देवता, गन्धर्व तथा और भी जो देवताओंके अग्रणी पुरुष हैं, वे और देवदूतगण तुम्हारे दानसे विस्मित हो तुम्हारी स्तुति करते हुए खड़े हैं
ତୁମ ଦାନରେ ବିସ୍ମିତ ହୋଇ ଦେବଦୂତମାନେ ସ୍ତୁତି କରି କରି ଦଣ୍ଡାୟମାନ। ଦେଖ—ଆକାଶରୁ ପୃଥିବୀ ଉପରେ ପୁଷ୍ପବୃଷ୍ଟି ହେଉଛି। ଦେବର୍ଷି, ଦେବତା, ଗନ୍ଧର୍ବ ଏବଂ ଦେବତାମାନଙ୍କ ଅଗ୍ରଣୀ ଅନ୍ୟ ଦିବ୍ୟ ପୁରୁଷମାନେ ମଧ୍ୟ ଦେବଦୂତମାନଙ୍କ ସହ ତୁମ ଉଦାରତାରେ ଆଶ୍ଚର୍ୟଚକିତ ହୋଇ ଉପସ୍ଥିତ ରହି ସ୍ତବ କରୁଛନ୍ତି।
Verse 856
काडुशक्षन्ते दर्शन तुभ्यं दिवं ब्रज द्विजर्षभ । द्विजश्रेष्ठ! ब्रह्मलोकमें विचरनेवाले जो ब्रह्मर्षिगण विमानोंमें रहते हैं, वे भी तुम्हारे दर्शनकी इच्छा रखते हैं; इसलिये तुम स्वर्गलोकमें चलो
ହେ ଦ୍ୱିଜର୍ଷଭ! ତୁମେ ସ୍ୱର୍ଗଲୋକକୁ ଯାଅ। ହେ ଦ୍ୱିଜଶ୍ରେଷ୍ଠ! ବ୍ରହ୍ମଲୋକରେ ବିଚରଣ କରୁଥିବା, ବିମାନରେ ବସୁଥିବା ବ୍ରହ୍ମର୍ଷିମାନେ ମଧ୍ୟ ତୁମ ଦର୍ଶନ ଆକାଂକ୍ଷା କରନ୍ତି; ତେଣୁ ତୁମେ ସ୍ୱର୍ଗକୁ ପ୍ରସ୍ଥାନ କର।
Verse 863
अनागताश्च बहव: सुबहूनि युगान्युत । “तुमने पितृलोकमें गये हुए अपने समस्त पितरोंका उद्धार कर दिया। अनेक युगोंतक भविष्यमें होनेवाली जो संतानें हैं, वे भी तुम्हारे पुण्य-प्रतापसे तर जायँगी”
ଏଯାବତ୍ ଅନେକ ଯୁଗ ଆସିବାକୁ ବାକି ଅଛି। ପିତୃଲୋକକୁ ଯାଇଥିବା ତୁମ ସମସ୍ତ ପିତୃମାନଙ୍କୁ ତୁମେ ଉଦ୍ଧାର କରିଦେଇଛ। ଭବିଷ୍ୟତ ଯୁଗମାନେ ଯେ ସନ୍ତତି ଜନ୍ମିବ, ସେମାନେ ମଧ୍ୟ ତୁମ ପୁଣ୍ୟ-ତେଜର ପ୍ରଭାବରେ ତରିଯିବେ।
Verse 873
असंकरेण धर्मेण तस्माद् गच्छ दिवं द्विज । “अतः ब्रह्मन! तुम अपने ब्रह्मचर्य, दान, यज्ञ, तप तथा संकरतारहित धर्मके प्रभावसे स्वर्गलोकमें चलो
ଅତଏବ, ହେ ଦ୍ୱିଜ! ଅସଂକର, ଅକଳୁଷ ଧର୍ମର ପ୍ରଭାବରେ ସ୍ୱର୍ଗଲୋକକୁ ଯାଅ—ବ୍ରହ୍ମଚର୍ଯ୍ୟ, ଦାନ, ଯଜ୍ଞ ଓ ତପରେ ଦୀପ୍ତ ସେଇ ଶୁଦ୍ଧ ଧର୍ମବଳରେ।
Verse 883
तस्माद देवाश्न दानेन प्रीता ब्राह्मणसत्तम । “उत्तम व्रतका पालन करनेवाले ब्राह्मणशिरोमणे! तुम उत्तम श्रद्धाके साथ तपस्या करते हो; इसलिये देवता तुम्हारे दानसे अत्यन्त संतुष्ट हैं
ଏହିହେତୁ, ହେ ବ୍ରାହ୍ମଣସତ୍ତମ! ତୁମ ଦାନରେ ଦେବତାମାନେ ପ୍ରସନ୍ନ। ହେ ବ୍ରାହ୍ମଣଶିରୋମଣି, ଉତ୍ତମ ବ୍ରତପାଳକ! ତୁମେ ପରମ ଶ୍ରଦ୍ଧାରେ ତପ କରୁଛ; ତେଣୁ ତୁମ ଉଦାରତାରେ ଦେବତାମାନେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ସନ୍ତୁଷ୍ଟ।
Verse 923
धर्ममेव गुरु ज्ञात्वा तृष्णा न गणिता त्वया । “जब मनुष्यमें दानविषयक रुचि जाग्रत् होती है, तब उसके धर्मका हास नहीं होता। तुमने पत्नीके प्रेम और पुत्रके स्नेहपर भी दृष्टिपात न करके धर्मको ही श्रेष्ठ माना है और उसके सामने भूख-प्यासको भी कुछ नहीं गिना है
ଧର୍ମକୁ ହିଁ ଗୁରୁ ଜାଣି ତୁମେ ତୃଷ୍ଣାକୁ ମଧ୍ୟ କିଛି ଗଣିଲ ନାହିଁ। ଯେତେବେଳେ ମନୁଷ୍ୟରେ ଦାନପ୍ରବୃତ୍ତି ଜାଗେ, ସେତେବେଳେ ତାହାର ଧର୍ମ ହ୍ରାସ ପାଏ ନାହିଁ। ତୁମେ ପତ୍ନୀପ୍ରେମ ଓ ପୁତ୍ରସ୍ନେହକୁ ମଧ୍ୟ ଅନଦେଖା କରି ଧର୍ମକୁ ହିଁ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ମାନିଛ; ତାହା ପାଇଁ ଭୁଖ-ତିର୍ଷ୍ଣାକୁ ମଧ୍ୟ ତୁଚ୍ଛ କରିଛ।
Verse 956
ब्राह्मणास्तपसा युक्ता यथाशक्ति प्रदायिन: । “उस स्वर्गद्वारकी जो अर्गला (किल्ली) है, वह लोभरूपी बीजसे बनी हुई है। वह द्वार रागके द्वारा गुप्त है, इसीलिये उसके भीतर प्रवेश करना बहुत ही कठिन है। जो लोग क्रोधको जीत चुके हैं, इन्द्रियोंको वशमें कर चुके हैं, वे यथाशक्ति दान देनेवाले तपस्वी ब्राह्मण ही उस द्वारको देख पाते हैं
ତପରେ ଯୁକ୍ତ ଓ ଯଥାଶକ୍ତି ଦାନଦାତା ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ ହିଁ ସତ୍ୟରେ ‘ସ୍ୱର୍ଗଦ୍ୱାର’ ଦେଖିପାରନ୍ତି। ସେଇ ଦ୍ୱାରର ଅର୍ଗଳା (କିଳି) ଲୋଭରୂପ ବୀଜରୁ ଗଢ଼ା, ଏବଂ ଦ୍ୱାରଟି ରାଗରେ ଗୁପ୍ତ; ତେଣୁ ଭିତରକୁ ପ୍ରବେଶ ଅତ୍ୟନ୍ତ କଠିନ। ଯେମାନେ କ୍ରୋଧକୁ ଜିତିଛନ୍ତି, ଇନ୍ଦ୍ରିୟକୁ ବଶ କରିଛନ୍ତି, ଯଥାଶକ୍ତି ଦାନ କରନ୍ତି—ସେଇ ତପସ୍ବୀ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ ହିଁ ସେ ଦ୍ୱାରକୁ ଦେଖିପାରନ୍ତି।
Verse 966
दद्यादपश्च यः शक््त्या सर्वे तुल्यफला: स्मृता: । “श्रद्धापूर्वक दान देनेवाले मनुष्यमें यदि एक हजार देनेकी शक्ति हो तो वह सौका दान करे, सौ देनेकी शक्तिवाला दसका दान करे तथा जिसके पास कुछ न हो, वह यदि अपनी शक्तिके अनुसार जल ही दान कर दे तो इन सबका फल बराबर माना गया है
ଶ୍ରଦ୍ଧାପୂର୍ବକ ଦାନ କରୁଥିବା ମନୁଷ୍ୟରେ ଯଦି ହଜାର ଦେବାର ଶକ୍ତି ଥାଏ, ସେ ଶତ ଦାନ କରୁ; ଶତ ଦେବାର ଶକ୍ତିଥିବା ଦଶ ଦାନ କରୁ; ଯାହା ପାଖରେ କିଛି ନାହିଁ, ସେ ମଧ୍ୟ ନିଜ ଶକ୍ତିଅନୁସାରେ କେବଳ ଜଳ ଦାନ କରିଦେଲେ—ଏ ସମସ୍ତଙ୍କର ଫଳ ସମାନ ବୋଲି ସ୍ମୃତ।
Verse 973
शुद्धेन मनसा विप्र नाकपृष्ठं ततो गत: । “विप्रवर! कहते हैं, राजा रन्तिदेवके पास जब कुछ भी नहीं रह गया, तब उन्होंने शुद्ध हृदयसे केवल जलका दान किया था। इससे वे स्वर्गलोकमें गये थे
ହେ ବିପ୍ରବର! ଶୁଦ୍ଧ ମନରେ ସେ ତାପରେ ସ୍ୱର୍ଗର ଶିଖରକୁ ପ୍ରାପ୍ତ ହେଲା। ଶୁଣାଯାଏ, ରାଜା ରନ୍ତିଦେବଙ୍କ ପାଖରେ ଯେତେବେଳେ କିଛି ମଧ୍ୟ ଅବଶିଷ୍ଟ ରହିଲା ନାହିଁ, ସେତେବେଳେ ସେ ଶୁଦ୍ଧ ହୃଦୟରେ କେବଳ ଜଳ ଦାନ କରିଥିଲେ; ସେଇ ଦାନର ସତ୍ୟତାରେ ସେ ସ୍ୱର୍ଗଲୋକକୁ ଗଲେ।
Verse 1023
न्यायवृत्तिहि तपसा दानवित् स्वर्गमश्रुते । “मनुष्य क्रोधसे अपने दानके फलको नष्ट कर देता है। लोभके कारण वह स्वर्गमें नहीं जाने पाता। न्यायोपार्जित धनसे जीवन-निर्वाह करनेवाला और दानके महत्त्वको जाननेवाला पुरुष दान एवं तपस्याके द्वारा स्वर्गलोक प्राप्त कर लेता है
ଯେ ନ୍ୟାୟସମ୍ମତ ଉପାୟରେ ଅର୍ଜିତ ଧନରେ ଜୀବନ ଚାଲାଏ, ତପ କରେ ଏବଂ ଦାନର ସତ୍ୟ ମହତ୍ତ୍ୱ ଜାଣେ, ସେ ଦାନ ଓ ତପସ୍ୟା ଦ୍ୱାରା ସ୍ୱର୍ଗଲୋକ ପାଏ। କ୍ରୋଧ ଦାନରେ ଅର୍ଜିତ ପୁଣ୍ୟକୁ ନଷ୍ଟ କରେ, ଲୋଭ ସ୍ୱର୍ଗଗତିକୁ ଅଟକାଏ।
Verse 1066
सभार्य: सहपुत्रश्न सस्नुषश्न दिवं व्रज । “ब्रह्म! मेरी ओर देखो, मैं धर्म हूँ। तुम सब लोग अपनी इच्छाके अनुसार इस विमानपर चढ़ो। तुमने अपने इस शरीरका उद्धार कर दिया और लोकमें भी तुम्हारी अविचल कीर्ति बनी रहेगी। तुम पत्नी, पुत्र और पुत्रवधूके साथ स्वर्गलोकको जाओ'
ଶ୍ୱଶୁର କହିଲେ—“ଭାର୍ଯ୍ୟା, ପୁତ୍ର ଓ ପୁତ୍ରବଧୂ ସହିତ ସ୍ୱର୍ଗକୁ ଯାଅ। ହେ ବ୍ରାହ୍ମଣ, ମୋ ଦିଗକୁ ଦେଖ—ମୁଁ ଧର୍ମ। ତୁମେ ସମସ୍ତେ ଇଚ୍ଛାମତେ ଏହି ଦିବ୍ୟ ବିମାନରେ ଆରୋହଣ କର। ଧର୍ମାଚରଣରେ ତୁମେ ଏହି ଦେହକୁ ଉଦ୍ଧାର କରିଛ; ଲୋକରେ ତୁମ ଅଚଳ କୀର୍ତ୍ତି ରହିବ। ଭାର୍ଯ୍ୟା, ପୁତ୍ର ଓ ପୁତ୍ରବଧୂ ସହ ସ୍ୱର୍ଗଲୋକକୁ ଯାଅ।”
Verse 1073
सदार: ससुतश्रैव सस्नुषश्न दिवं गत: । धर्मके ऐसा कहनेपर वे उज्छवृत्तिवाले ब्राह्मण देवता अपनी पत्नी, पुत्र और पुत्रवधूके साथ विमानपर आरूढ़ हो स्वर्गलोकको चले गये
ଧର୍ମ ଏପରି କହିବା ସହିତ ସେହି ବ୍ରାହ୍ମଣ-ଦେବତାମାନେ ଭାର୍ଯ୍ୟା, ପୁତ୍ର ଓ ପୁତ୍ରବଧୂ ସହ ବିମାନରେ ଆରୋହଣ କରି ସ୍ୱର୍ଗଲୋକକୁ ଚାଲିଗଲେ। ଯାହାଙ୍କ ଆଚରଣ ଲୋକେ ପତିତ ବୋଲି ମାନୁଥିଲେ, ସେମାନେ ମଧ୍ୟ ଧର୍ମବଚନର ସ୍ୱୀକୃତିରେ ଦେବଲୋକ ପାଇଲେ।
Verse 1083
भार्याचतुर्थे धर्मज्ञे ततो5हं नि:सृतो बिलात् । 'स्त्री, पुत्र और पुत्रवधूके साथ वे धर्मज्ञ ब्राह्मण जब स्वर्गलोकको चले गये, तब मैं अपनी बिलसे बाहर निकला
ସେ ଧର୍ମଜ୍ଞ ବ୍ରାହ୍ମଣ ଭାର୍ଯ୍ୟାକୁ ଚତୁର୍ଥ ସଦସ୍ୟ କରି (ପୁତ୍ର ଓ ପୁତ୍ରବଧୂ ସହ) ସ୍ୱର୍ଗଲୋକକୁ ଚାଲିଗଲେ; ତାପରେ ମୁଁ ମୋ ବିଲରୁ ବାହାରିଲି।
Verse 1133
आशया परया प्राप्तो न चाहं काज्चनीकृतः । इसी उद्देश्यसे मैं बड़े हर्ष और उत्साहके साथ बारंबार अनेकानेक तपोवनों और यज्ञस्थलोंमें जाया-आया करता हूँ। परम बुद्धिमान् कुरुराज युधिष्ठिरके इस यज्ञका बड़ा भारी शोर सुनकर मैं बड़ी आशा लगाये यहाँ आया था; किंतु मेरा शरीर यहाँ सोनेका न हो सका
ମୁଁ ପରମ ଆଶା ନେଇ ଏଠାକୁ ଆସିଥିଲି; କିନ୍ତୁ ମୋ ଦେହ ସୁନା ହୋଇପାରିଲା ନାହିଁ। ଏହି ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟରେ ମୁଁ ହର୍ଷ ଓ ଉତ୍ସାହ ସହ ବାରମ୍ବାର ଅନେକ ତପୋବନ ଓ ଯଜ୍ଞସ୍ଥଳକୁ ଯାଇ-ଆସୁଥିଲି। ପରମ ବୁଦ୍ଧିମାନ କୁରୁରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ଏହି ଯଜ୍ଞର ମହାଖ୍ୟାତି ଶୁଣି ମୁଁ ବଡ଼ ଆଶା ଧରି ଏଠାକୁ ଆସିଥିଲି; କିନ୍ତୁ ମୋର ଆଶା ପୂରଣ ହେଲା ନାହିଁ।
Verse 1146
सक्तुप्रस्थेन यज्ञोडयं सम्मितो नेति सर्वथा । ब्राह्मणशिरोमणियो! इसीसे मैंने हँ।कर कहा था कि यह यज्ञ ब्राह्मणके दिये हुए सेरभर सत्तूके बराबर भी नहीं है। सर्वथा ऐसी ही बात है
ଶ୍ୱଶୁର କହିଲେ—ଏହି ଯଜ୍ଞ କୌଣସି ପ୍ରକାରେ ମଧ୍ୟ ଭଜା ଯବ ଚୁଣା (ସତ୍ତୁ)ର ଗୋଟିଏ ପ୍ରସ୍ଥ ସମାନ ମାପାଯାଇପାରେ ନାହିଁ। ହେ ବ୍ରାହ୍ମଣଶିରୋମଣି! ସେହିପାଇଁ ମୁଁ ଦୃଢ଼ ନିଶ୍ଚୟରେ କହିଥିଲି—ଏହି ମହାଯଜ୍ଞ ମଧ୍ୟ ବ୍ରାହ୍ମଣ ଦେଇଥିବା ଗୋଟିଏ ସେର ସତ୍ତୁ ସମାନ ମଧ୍ୟ ନୁହେଁ। ଏହା ସର୍ବଥା ସତ୍ୟ।
Verse 1153
नहि यज्ञों महानेष सदृशस्तैर्मतो मम । क्योंकि उस समय सेरभर सत्तूमेंसे गिरे हुए कुछ कणोंके प्रभावसे मेरा आधा शरीर सुवर्णमय हो गया था; परंतु यह महान् यज्ञ भी मुझे वैसा न बना सका; अतः मेरे मतमें यह यज्ञ उन सेरभर सत्तूके कणोंके समान भी नहीं है
ଶ୍ୱଶୁର କହିଲେ—ମୋ ମତରେ ଏହି ମହାଯଜ୍ଞ ସେମାନଙ୍କ ସମାନ ମଧ୍ୟ ନୁହେଁ। କାରଣ ଗୋଟିଏ ସେର ସତ୍ତୁରୁ ଝରିପଡ଼ିଥିବା କିଛି କଣାର ପ୍ରଭାବରେ ମୋ ଶରୀରର ଅର୍ଧାଂଶ ସୁବର୍ଣ୍ଣମୟ ହୋଇଥିଲା; କିନ୍ତୁ ଏହି ମହାଯଜ୍ଞ ମଧ୍ୟ ମୋତେ ସେପରି କରିପାରିଲା ନାହିଁ। ତେଣୁ ମୋ ଦୃଷ୍ଟିରେ ଏହି ଯଜ୍ଞ ସେଇ ସୂକ୍ଷ୍ମ କଣାମାନଙ୍କ ସମାନ ମଧ୍ୟ ନୁହେଁ।
Verse 4536
स्त्रियो रक्ष्याश्न पोष्याश्न न त्वेवं वक्तुमहसि । 'शोभने! अपनी स्त्रीकी रक्षा और पालन-पोषण करना कीट-पतंग और पशुओंका भी कर्तव्य है; अतः तुम्हें ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये
ନକୁଳ କହିଲେ—ସ୍ତ୍ରୀମାନେ ରକ୍ଷାଯୋଗ୍ୟ ଓ ପୋଷଣୀୟ; ତୁମେ ଏଭଳି କଥା କହିବା ଉଚିତ୍ ନୁହେଁ। ହେ ଶୋଭନେ! ନିଜ ସ୍ତ୍ରୀର ରକ୍ଷା ଓ ପାଳନ-ପୋଷଣ କରିବା କୀଟ-ପତଙ୍ଗ ଓ ପଶୁମାନଙ୍କର ମଧ୍ୟ କର୍ତ୍ତବ୍ୟ; ତେଣୁ ତୁମେ ଏଭଳି କହନି।
Verse 8936
कृच्छूकाले ततः स्वर्गो विजित: कर्मणा त्वया । “इस प्राण-संकटके समय भी यह सब सत्तू तुमने शुद्ध हृदयसे दान किया है; इसलिये तुमने उस पुण्यकर्मके प्रभावसे स्वर्गलोकपर विजय प्राप्त कर ली है
ଶ୍ୱଶୁର କହିଲେ—ଏହି ପ୍ରାଣସଙ୍କଟ ସମୟରେ ମଧ୍ୟ ତୁମେ ଶୁଦ୍ଧ ହୃଦୟରେ ଏହି ସମସ୍ତ ସତ୍ତୁ ଦାନ କରିଛ। ସେହି ପୁଣ୍ୟକର୍ମର ପ୍ରଭାବରେ ତୁମେ ସ୍ୱର୍ଗଲୋକକୁ ମଧ୍ୟ ଜୟ କରିଛ।
The chapter frames post-war legitimacy as contingent on correct procedure and generosity: Yudhiṣṭhira must pursue purification and state renewal through a publicly accountable rite, ensuring gifts (dakṣiṇā) and welfare are not neglected amid political consolidation.
Timeliness and scale matter in dharmic governance: the rite should begin at the proper muhūrta, be executed by competent specialists, and be supported by ample dakṣiṇā—linking royal authority to disciplined obligation rather than personal preference.
While not a formal phalaśruti stanza, Vyāsa explicitly states the intended efficacy: completing multiple Aśvamedhas with abundant dakṣiṇā is presented as a means to diminish the moral residue of kin-slaying and to attain the purificatory completion (avabhṛtha) of the rite.