
Sāttvika-vṛtta-kathana (Brahmā on the Conduct of Sattva) — Chapter 38
Upa-parva: Guṇa–Vṛtta Upadeśa (Sāttvika Conduct Discourse) — within Āśvamedhika Parva
Brahmā enumerates the ‘third and highest guṇa’ as a practical ethic beneficial to all beings (sarvabhūtahita) and praised as the blameless dharma of the good (satām). The chapter catalogues sattva-markers spanning affect (ānanda, prīti, harṣa), social-ethical restraints (ahiṃsā, akrodha, anasūyā, apaiśunam), and disciplines of character (śauca, tyāga, atandritā, vinaya). A central evaluative claim is repeated: knowledge, conduct, service, exertion, giving, sacrifice, study, vows, and even tapas become ‘mudhā’ (ineffectual) if not integrated with yuktadharma—aligned ethical practice. The discourse defines the stable posture of the sāttvika person as nirmamatva (non-possessiveness), nirahaṃkāra (non-egoism), nirāśīḥ (non-expectation), and sarvataḥ-samatā (equanimity). It then describes the post-mortem fruition for such persons—freedom from sorrow, attainment of heaven, and capacities likened to divine powers—before closing with an epistemic thesis: one who understands the guṇas ‘enjoys the guṇas’ rather than being consumed by them.
Chapter Arc: ब्रह्मा गुरु-स्वर में शिष्य-समूह को संबोधित करते हैं: अब मैं ‘तृतीय’—उत्तम सत्त्वगुण—का वर्णन करूँगा, जो लोक में सर्वभूतहितकारी है। → सत्त्व के लक्षण एक-एक कर उजागर होते हैं—आनन्द, प्रीति, प्रकाश, सुख, अकार्पण्य, असंरम्भ, संतोष, श्रद्धा; फिर क्षमा, धृति, अहिंसा, समता, सत्य, आर्जव, अक्रोध, अनसूया, शौच, दाक्ष्य, पराक्रम; और आगे विनय, साधुवृत्ति, शान्तिकर्म, शुद्धि, शुभबुद्धि—मानो मनुष्य के भीतर का युद्ध अब गुणों के स्तर पर लड़ा जा रहा हो। → गुरु निर्णायक रूप से ‘सात्त्विक वृत्त’ का फल बताते हैं: जो इस आचरण को विधिवत जानकर धारण करता है, वह इच्छित फल प्राप्त करता है; और सत्त्वसम्पन्न महात्मा ‘ऊर्ध्वस्रोतस्’ देवतुल्य वैकारिक माने जाते हैं—ईशित्व, वशित्व, लघिमा आदि मानसिक सिद्धियों की ओर संकेत होता है। → सत्त्व-आधारित जीवन को ब्राह्मण-धर्म, यज्ञ, अध्ययन, व्रत, तप और साधु-दृष्टि से जोड़ा जाता है; अध्याय यह स्थापित करता है कि शुद्ध आचरण ही उन्नति का द्वार है, पर सिद्धि/स्वर्ग के भोग-संस्कार चित्त को विकृत भी कर सकते हैं। → स्वर्ग-प्राप्ति के बाद भोगजनित संस्कारों से चित्त-विकृति का संकेत आगे के विवेचन का द्वार खोलता है—क्या सिद्धि और भोग साधक को बाँध देंगे या मुक्त करेंगे?
Verse 1
अफ-्#-रात अष्टात्रिशो5 ध्याय: सत्त्वगुणके कार्यका वर्णन और उसके जाननेका फल ब्रह्मोवाच अतः: पर प्रवक्ष्यामि तृतीयं गुणमुत्तमम् । सर्वभूतहितं लोके सतां धर्ममनिन्दितम्,ब्रह्माजीने कहा--महर्षियो! अब मैं तीसरे उत्तम गुण (सत्त्वगुण)-का वर्णन करूँगा, जो जगत्में सम्पूर्ण प्राणियोंका हितकारी और श्रेष्ठ पुरुषोंका प्रशंसनीय धर्म है
ବ୍ରହ୍ମା କହିଲେ—ହେ ମହର୍ଷିମାନେ! ଏବେ ମୁଁ ତୃତୀୟ ଓ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଗୁଣ—ସତ୍ତ୍ୱଗୁଣ—ବିଷୟରେ କହିବି। ଏହା ଲୋକରେ ସମସ୍ତ ପ୍ରାଣୀଙ୍କ ହିତକର, ସଜ୍ଜନମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ପ୍ରଶଂସିତ ଏବଂ ଆଚରଣରେ ନିନ୍ଦାରହିତ ଧର୍ମ।
Verse 2
आनन्द: प्रीतिरुद्रेक: प्राकाश्यं सुखमेव च । अकार्पण्यमसंरम्भ: सन्तोष: श्रद्धधानता,आनन्द, प्रसन्नता, उन्नति, प्रकाश, सुख, कृपणताका अभाव, निर्भयता, संतोष, श्रद्धा, क्षमा, धैर्य, अहिंसा, समता, सत्य, सरलता, क्रोधका अभाव, किसीके दोष न देखना, पवित्रता, चतुरता और पराक्रम--ये सत्त्वगुणके कार्य हैं
ବାୟୁଦେବ କହିଲେ—ଆନନ୍ଦ, ପ୍ରୀତି, ହର୍ଷର ଉଦ୍ରେକ, ଅନ୍ତଃକରଣର ପ୍ରକାଶ ଓ ସୁଖ; କୃପଣତାର ଅଭାବ, ଅସଂରମ୍ଭ (ଉଦ୍ବେଗରହିତ ଶାନ୍ତ ସ୍ୱଭାବ), ସନ୍ତୋଷ ଓ ଦୃଢ଼ ଶ୍ରଦ୍ଧା—ଏହିସବୁ ସତ୍ତ୍ୱଗୁଣର ଲକ୍ଷଣରୂପ କାର୍ଯ୍ୟ।
Verse 3
क्षमा धृतिरहिंसा च समता सत्यमार्जवम् | अक्रोधश्वानसूया च शौचं दाक्ष्यं पराक्रम:,आनन्द, प्रसन्नता, उन्नति, प्रकाश, सुख, कृपणताका अभाव, निर्भयता, संतोष, श्रद्धा, क्षमा, धैर्य, अहिंसा, समता, सत्य, सरलता, क्रोधका अभाव, किसीके दोष न देखना, पवित्रता, चतुरता और पराक्रम--ये सत्त्वगुणके कार्य हैं
ବାୟୁଦେବ କହିଲେ— କ୍ଷମା, ଧୈର୍ଯ୍ୟ, ଅହିଂସା, ସମତା, ସତ୍ୟ, ସରଳତା, କ୍ରୋଧର ଅଭାବ, ପରଦୋଷ ନ ଦେଖିବା, ପବିତ୍ରତା, ଦକ୍ଷତା ଓ ପରାକ୍ରମ— ଏହିସବୁ ସତ୍ତ୍ୱଗୁଣର ଲକ୍ଷଣ ଓ କାର୍ଯ୍ୟ।
Verse 4
मुधा ज्ञानं मुधा वृत्तं मुधा सेवा मुधा श्रम: । एवं यो युक्तधर्म: स्यात् सोअमुत्रात्यन्तमश्षुते,नाना प्रकारकी सांसारिक जानकारी, सकाम व्यवहार, सेवा और श्रम व्यर्थ है--ऐसा समझकर जो कल्याणके साधनमें लग जाता है, वह परलोकमें अक्षय सुखका भागी होता है
ବାୟୁ କହିଲେ— ସାଂସାରିକ ଜ୍ଞାନ ବ୍ୟର୍ଥ, ସାଂସାରିକ ଆଚରଣ ବ୍ୟର୍ଥ; ଏବଂ କେବଳ ଇହଲୋକୀୟ ଫଳ ପାଇଁ କରାଯାଇଥିବା ସେବା ଓ ଶ୍ରମ ମଧ୍ୟ ବ୍ୟର୍ଥ। ଏହା ବୁଝି ଯେ ଯୁକ୍ତଧର୍ମରେ—କଲ୍ୟାଣର ସତ୍ୟ ସାଧନରେ—ଲଗିଥାଏ, ସେ ପରଲୋକରେ ଅକ୍ଷୟ, ଅନୁତ୍ତମ ସୁଖ ପାଏ।
Verse 5
निर्ममो निरहड़कारो निराशी: सर्वतः सम: । अकामभूत इत्येव सतां धर्म: सनातन:,ममता, अहंकार और आशासे रहित होकर सर्वत्र समदृष्टि रखना और सर्वथा निष्काम हो जाना ही श्रेष्ठ पुरुषोंका सनातन धर्म है
ବାୟୁଦେବ କହିଲେ— ମମତାରହିତ, ଅହଂକାରରହିତ, ଆଶା-ତୃଷ୍ଣାରହିତ; ସର୍ବତ୍ର ସମଦୃଷ୍ଟି ଧାରଣ କରୁଥିବା; ଏବଂ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ନିଷ୍କାମ ହୋଇଯିବା—ଏହିଏ ସତ୍ପୁରୁଷମାନଙ୍କର ସନାତନ ଧର୍ମ ବୋଲି କୁହାଯାଇଛି।
Verse 6
विश्रम्भो द्वीस्तितिक्षा च त्याग शौचमतन्द्रिता । आनृशंस्यमसम्मोहो दया भूतेष्वपैशुनम्,विश्वास, लज्जा, तितिक्षा, त्याग, पवित्रता, आलस्यरहित होना, कोमलता, मोहका अभाव, प्राणियोंपर दया करना, चुगली न खाना, हर्ष, संतोष, गर्वहीनता, विनय, सद्बर्ताव, शान्तिकर्ममें शुद्धभावसे प्रवृत्ति, उत्तम बुद्धि, आसक्तिसे छूटना, जगत्के भोगोंसे उदासीनता, ब्रह्मचर्य, सब प्रकारका त्याग, निर्ममता, फलकी कामना न करना तथा धर्मका निरन्तर पालन करते रहना--ये सब सत्त्वगुणके कार्य हैं
ବାୟୁଦେବ କହିଲେ— ବିଶ୍ୱାସ, ଲଜ୍ଜା, ତିତିକ୍ଷା, ତ୍ୟାଗ, ପବିତ୍ରତା, ଆଳସ୍ୟର ଅଭାବ; କୋମଳତା, ମୋହର ଅଭାବ, ସମସ୍ତ ପ୍ରାଣୀଙ୍କ ପ୍ରତି ଦୟା ଏବଂ ପରନିନ୍ଦା/ଚୁଗୁଲି ନ କରିବା—ଏହିସବୁ ସାତ୍ତ୍ୱିକ ଭାବର ଚିହ୍ନ, ଯାହା ଅନ୍ତଃଶୁଦ୍ଧି ଓ ସଂଯମରେ ଧର୍ମକୁ ଧାରଣ କରେ।
Verse 7
हर्षस्तुष्टिविस्मयश्व विनय: साधुवृत्तिता । शान्तिकर्मणि शुद्धिश्व शुभा बुद्धिर्विमोचनम्,विश्वास, लज्जा, तितिक्षा, त्याग, पवित्रता, आलस्यरहित होना, कोमलता, मोहका अभाव, प्राणियोंपर दया करना, चुगली न खाना, हर्ष, संतोष, गर्वहीनता, विनय, सद्बर्ताव, शान्तिकर्ममें शुद्धभावसे प्रवृत्ति, उत्तम बुद्धि, आसक्तिसे छूटना, जगत्के भोगोंसे उदासीनता, ब्रह्मचर्य, सब प्रकारका त्याग, निर्ममता, फलकी कामना न करना तथा धर्मका निरन्तर पालन करते रहना--ये सब सत्त्वगुणके कार्य हैं
ବାୟୁ କହିଲେ— ହର୍ଷ, ସନ୍ତୋଷ, ବିସ୍ମୟ, ବିନୟ ଓ ସାଧୁ-ଆଚରଣ; ଶାନ୍ତିକର୍ମରେ ଶୁଦ୍ଧତା; ଶୁଭ ଓ ବିବେକୀ ବୁଦ୍ଧି, ଏବଂ ବିମୋଚନ—ଏହାସହ ବିଶ୍ୱାସ, ଲଜ୍ଜା, ତିତିକ୍ଷା, ତ୍ୟାଗ, ପବିତ୍ରତା, ଆଳସ୍ୟର ଅଭାବ, କୋମଳତା, ମୋହର ଅଭାବ, ସମସ୍ତ ପ୍ରାଣୀଙ୍କ ପ୍ରତି ଦୟା, ପରନିନ୍ଦା/ଚୁଗୁଲିରୁ ବିରତି; ପୁନଃ ପ୍ରସନ୍ନତା, ତୃପ୍ତି, ଗର୍ବହୀନତା, ସଦ୍ବ୍ୟବହାର, ଶୁଦ୍ଧ ସଙ୍କଳ୍ପରେ ଶାନ୍ତିଧର୍ମର କର୍ତ୍ତବ୍ୟରେ ପ୍ରବୃତ୍ତି, ଉତ୍ତମ ବୋଧ, ଆସକ୍ତିରୁ ମୁକ୍ତି, ଭୋଗରେ ବୈରାଗ୍ୟ, ବ୍ରହ୍ମଚର୍ଯ୍ୟ, ସର୍ବତ୍ୟାଗ, ନିର୍ମମତା, ଫଳାକାଙ୍କ୍ଷା ନ କରିବା ଓ ଧର୍ମର ନିରନ୍ତର ପାଳନ—ଏହି ସବୁ ସତ୍ତ୍ୱଗୁଣର ଫଳ ଓ ପ୍ରକାଶ।
Verse 8
उपेक्षा ब्रह्मचर्य च परित्यागश्न सर्वश: | निर्ममत्वमनाशीष्ट्वमपरिक्षतधर्मता,विश्वास, लज्जा, तितिक्षा, त्याग, पवित्रता, आलस्यरहित होना, कोमलता, मोहका अभाव, प्राणियोंपर दया करना, चुगली न खाना, हर्ष, संतोष, गर्वहीनता, विनय, सद्बर्ताव, शान्तिकर्ममें शुद्धभावसे प्रवृत्ति, उत्तम बुद्धि, आसक्तिसे छूटना, जगत्के भोगोंसे उदासीनता, ब्रह्मचर्य, सब प्रकारका त्याग, निर्ममता, फलकी कामना न करना तथा धर्मका निरन्तर पालन करते रहना--ये सब सत्त्वगुणके कार्य हैं
ବାୟୁଦେବ କହିଲେ—ଉପେକ୍ଷା, ବ୍ରହ୍ମଚର୍ଯ୍ୟ ଓ ସର୍ବଥା ତ୍ୟାଗ; ନିର୍ମମତା, ଫଳାକାଙ୍କ୍ଷାର ଅଭାବ ଓ ଧର୍ମରେ ଅଚଳ ଧୃତି; ବିଶ୍ୱାସ, ଲଜ୍ଜା, ତିତିକ୍ଷା, ଦାନଶୀଳତା, ପବିତ୍ରତା, ଆଳସ୍ୟରହିତତା, କୋମଳତା, ମୋହରହିତତା; ପ୍ରାଣୀମାତ୍ର ପ୍ରତି ଦୟା, ପରନିନ୍ଦା/ଚୁଗୁଲି ତ୍ୟାଗ, ହର୍ଷ, ସନ୍ତୋଷ; ଗର୍ବହୀନ ବିନୟ, ଶିଷ୍ଟାଚାର, ସଦ୍ବ୍ୟବହାର; ଶାନ୍ତିକର୍ମରେ ଶୁଦ୍ଧ ଭାବରେ ପ୍ରବୃତ୍ତି, ଉତ୍ତମ ବୁଦ୍ଧି, ଆସକ୍ତିମୁକ୍ତି, ଜଗତ୍ଭୋଗ ପ୍ରତି ଉଦାସୀନତା; ସଂଯମ, ସର୍ବତ୍ୟାଗ, ଅପରିଗ୍ରହ, ନିଷ୍କାମତା ଓ ଧର୍ମର ନିରନ୍ତର ପାଳନ—ଏସବୁ ସତ୍ତ୍ୱଗୁଣର ଲକ୍ଷଣ ଓ କାର୍ଯ୍ୟ।
Verse 9
मुधा दानं मुधा यज्ञो मुधा5धीतं मुधा व्रतम् । मुधा प्रतिग्रहश्वैव मुधा धर्मो मुधा तप:,सकाम दान, यज्ञ, अध्ययन, व्रत, परिग्रह, धर्म और तप--ये सब व्यर्थ हैं--ऐसा समझकर जो उपर्युक्त बर्तावका पालन करते हुए इस जगत्में सत्यका आश्रय लेते हैं और वेदकी उत्पत्तिके स्थानभूत परब्रह्म परमात्मामें निष्ठा रखते हैं, वे ब्राह्मण ही धीर और साधुदर्शी माने गये हैं
ବାୟୁଦେବ କହିଲେ—ସକାମଭାବରେ କରା ଦାନ ବ୍ୟର୍ଥ, ଯଜ୍ଞ ବ୍ୟର୍ଥ, ଅଧ୍ୟୟନ ବ୍ୟର୍ଥ ଓ ବ୍ରତ ମଧ୍ୟ ବ୍ୟର୍ଥ; ପ୍ରତିଗ୍ରହ ମଧ୍ୟ ବ୍ୟର୍ଥ; ଏହିପରି କାମନାପ୍ରେରିତ ‘ଧର୍ମ’ ଓ ତପ ମଧ୍ୟ ବ୍ୟର୍ଥ। ଏହା ଜାଣି, ଯେମାନେ ପୂର୍ବୋକ୍ତ ସଦାଚାର ପାଳନ କରି ଏହି ଲୋକରେ ସତ୍ୟକୁ ଆଶ୍ରୟ କରନ୍ତି ଓ ବେଦୋତ୍ପତ୍ତି-ସ୍ଥାନଭୂତ ପରବ୍ରହ୍ମ ପରମାତ୍ମାରେ ଅଚଳ ନିଷ୍ଠା ରଖନ୍ତି, ସେମାନେ ହିଁ ଧୀର ଓ ସାଧୁଦର୍ଶୀ ବ୍ରାହ୍ମଣ ଭାବେ ଗଣ୍ୟ।
Verse 10
एवंवृत्तास्तु ये केचिल्लोके5स्मिन् सत्त्वसंश्रया: | ब्राह्मणा ब्रह्म॒योनिस्थास्ते धीरा: साधुदर्शिन:,सकाम दान, यज्ञ, अध्ययन, व्रत, परिग्रह, धर्म और तप--ये सब व्यर्थ हैं--ऐसा समझकर जो उपर्युक्त बर्तावका पालन करते हुए इस जगत्में सत्यका आश्रय लेते हैं और वेदकी उत्पत्तिके स्थानभूत परब्रह्म परमात्मामें निष्ठा रखते हैं, वे ब्राह्मण ही धीर और साधुदर्शी माने गये हैं
ବାୟୁ କହିଲେ—ଏହି ଲୋକରେ ଯେ କେହି ଏପରି ଆଚରଣ କରି ସତ୍ତ୍ୱକୁ ଆଶ୍ରୟ କରନ୍ତି, ଏବଂ ବ୍ରାହ୍ମଣ ହୋଇ ବ୍ରହ୍ମୟୋନି—ପରବ୍ରହ୍ମରେ ଦୃଢ଼ ଭାବେ ସ୍ଥିତ ରହନ୍ତି, ସେମାନେ ହିଁ ଧୀର ଓ ସାଧୁଦର୍ଶୀ। କାମନାସହିତ କରା ଦାନ, ଯଜ୍ଞ, ଅଧ୍ୟୟନ, ବ୍ରତ, ପରିଗ୍ରହ, (ରୂଢ଼) ଧର୍ମ ଓ ତପ—ଇହା ସବୁ ଆସକ୍ତିରେ କରାଗଲେ ନିଷ୍ଫଳ ବୋଲି ଜାଣି, ସେମାନେ ସତ୍ୟ ଓ ବ୍ରହ୍ମନିଷ୍ଠାରେ ଭିତ୍ତିକୃତ ଉଚ୍ଚ ଆଚରଣକୁ ଧାରଣ କରନ୍ତି।
Verse 11
हित्वा सर्वाणि पापानि नि:शोका हाथ मानवा: । दिवं प्राप्प तु ते धीरा: कुर्वते वै ततस्तनू:,वे धीर मनुष्य सब पापोंका त्याग करके शोकसे रहित हो जाते हैं और स्वर्गलोकमें जाकर वहाँके भोग भोगनेके लिये अनेक शरीर धारण कर लेते हैं
ବାୟୁ କହିଲେ—ସମସ୍ତ ପାପ ତ୍ୟାଗ କରି ମନୁଷ୍ୟ ଶୋକରହିତ ହୁଅନ୍ତି। ସ୍ୱର୍ଗ ପ୍ରାପ୍ତ କରି ସେହି ଧୀରଜନ ତାହାଁର ଭୋଗ ଅନୁଭବ ପାଇଁ ପୁନଃ ଦେହ ଧାରଣ କରନ୍ତି।
Verse 12
ईशित्वं च वशित्वं च लघुत्व॑ं मनसश्न ते । विकुर्वते महात्मानो देवास्त्रिदिवगा इव
ବାୟୁ କହିଲେ—ଈଶିତ୍ୱ, ବଶିତ୍ୱ ଓ ମନର ଲଘୁତ୍ୱ—ଏହି ଉତ୍କୃଷ୍ଟ ସାମର୍ଥ୍ୟ ମହାତ୍ମାମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ତ୍ରିଦିବବାସୀ ଦେବମାନଙ୍କ ପରି ଉଦ୍ଭବ ହୁଏ।
Verse 13
विकुर्वन्त: प्रकृत्या वै दिवं प्राप्तास्ततस्तत:
ବାୟୁ କହିଲେ—ନିଜ-ନିଜ ସ୍ୱଭାବ ଅନୁସାରେ ଆଚରଣ କରି ସେମାନେ ଯଥାକ୍ରମେ, ଯଥାକାଳେ, ସ୍ୱର୍ଗକୁ ପ୍ରାପ୍ତ ହେଲେ।
Verse 14
इत्येतत् सात्त्विकं वृत्तं कथित वो द्विजर्षभा: । एतद् विज्ञाय लभते विधिवद् यद् यदिच्छति,श्रेष्ठ ब्राह्मणों! इस प्रकार मैंने तुमलोगोंसे सत्त्वगुणके कार्योंका वर्णन किया। जो इस विषयको अच्छी तरह जानता है, वह जिस-जिस वस्तुकी इच्छा करता है, उसीको पा लेता है
ହେ ଦ୍ୱିଜଶ୍ରେଷ୍ଠମାନେ! ଏହିପରି ମୁଁ ତୁମମାନଙ୍କୁ ସତ୍ତ୍ୱଗୁଣର ବୃତ୍ତାନ୍ତ କହିଲି। ଯେ ଏହାକୁ ବିଧିପୂର୍ବକ ଜାଣେ, ସେ ଯାହା-ଯାହା ଇଚ୍ଛା କରେ, ତାହା-ତାହା ପାଏ।
Verse 15
प्रकीर्तिता: सत्त्वगुणा विशेषतो यथाददुक्तं गुणवृत्तमेव च । नरस्तु यो वेद गुणानिमान् सदा गुणान् स भुड्धक्ते न गुणैः स युज्यते,यह सत्त्वगगुणका विशेषरूपसे वर्णन किया गया तथा सत्त्वगुणका कार्य भी बताया गया। जो मनुष्य इन गुणोंको जानता है, वह सदा गुणोंको भोगता है, किंतु उनसे बँधता नहीं
ବାୟୁ କହିଲେ—ସତ୍ତ୍ୱଗୁଣମାନଙ୍କୁ ବିଶେଷ ଭାବେ ପ୍ରକାଶ କରାଯାଇଛି ଏବଂ ଗୁଣମାନଙ୍କର ବୃତ୍ତି ମଧ୍ୟ ଯଥାବତ୍ କୁହାଯାଇଛି। କିନ୍ତୁ ଯେ ନର ଏହି ଗୁଣମାନଙ୍କୁ ସଦା ଯଥାର୍ଥ ଭାବେ ଜାଣେ, ସେ ଗୁଣଫଳ ଭୋଗ କରେ, ତଥାପି ଗୁଣଦ୍ୱାରା ବନ୍ଧିତ ହୁଏ ନାହିଁ; ଗୁଣକୁ ଭୋଗ କରେ, କିନ୍ତୁ ଗୁଣରେ ଯୁକ୍ତ ହୁଏ ନାହିଁ।
Verse 37
इस प्रकार श्रीमह्याभारत आश्वमेधिकपव॑के अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें गुरु-शिष्य- संवादविषयक सैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଅଶ୍ୱମେଧିକପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ଅନୁଗୀତାପର୍ବରେ ଗୁରୁ-ଶିଷ୍ୟ ସମ୍ବାଦବିଷୟକ ସଇଁତିଶତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।
Verse 38
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि गुरुशिष्यसंवादेडष्टत्रिंशो 5ध्याय:
ଇତି ଶ୍ରୀମହାଭାରତେ ଅଶ୍ୱମେଧିକପର୍ବେ ଅନୁଗୀତାପର୍ବେ ଗୁରୁ-ଶିଷ୍ୟ ସମ୍ବାଦେ ଅଷ୍ଟତ୍ରିଂଶ ଅଧ୍ୟାୟ।
Verse 126
ऊर्ध्वस्रोतस इत्येते देवा वैकारिका: स्मृता: । सत्त्वगुणसम्पन्न महात्मा स्वर्गवासी देवताओंकी भाँति ईशित्व, वशित्व और लघिमा आदि मानसिक सिद्धियोंको प्राप्त करते हैं। वे ऊर्ध्वत्रोता और वैकारिक देवता माने गये हैं
ବାୟୁ କହିଲେ— ଯେମାନଙ୍କୁ ‘ଊର୍ଧ୍ୱସ୍ରୋତସ’ କୁହାଯାଏ, ସେମାନେ ‘ବୈକାରିକ’ ଦେବତା ବୋଲି ସ୍ମୃତ। ସତ୍ତ୍ୱଗୁଣସମ୍ପନ୍ନ, ସ୍ୱର୍ଗବାସୀ ମହାତ୍ମା ଦେବତାମାନଙ୍କ ପରି ଈଶିତ୍ୱ, ବଶିତ୍ୱ ଓ ଲଘିମା ଆଦି ମାନସିକ ସିଦ୍ଧି ପ୍ରାପ୍ତ କରେ। ଏପରି ବ୍ୟକ୍ତି ‘ଊର୍ଧ୍ୱସ୍ରୋତସ’ ଓ ‘ବୈକାରିକ ଦେବ’ ଭାବେ ଗଣ୍ୟ।
Verse 136
यद् यदिच्छन्ति तत् सर्व भजन्ते विभजन्ति च । (योगबलसे) स्वर्गको प्राप्त होनेपर उनका चित्त उन-उन भोगजनित संस्कारोंसे विकृत होता है। उस समय वे जो-जो चाहते हैं, उस-उस वस्तुको पाते और बाँटते हैं
ବାୟୁ କହିଲେ— ସେମାନେ ଯାହା-ଯାହା ଇଚ୍ଛା କରନ୍ତି, ସେ ସବୁକୁ ପୂର୍ଣ୍ଣରୂପେ ପାଆନ୍ତି; ଏବଂ ପାଇ ସେହିକୁ ବଣ୍ଟନ-ବିତରଣ ମଧ୍ୟ କରନ୍ତି। ସ୍ୱର୍ଗଭୋଗ ପ୍ରାପ୍ତ ହେଲେ ଭୋଗଜନିତ ସଂସ୍କାର ସେମାନଙ୍କ ଚିତ୍ତକୁ ବିକୃତ କରେ; ତେବେ ଇଚ୍ଛା ହିଁ ପ୍ରାପ୍ତି ଓ ବଣ୍ଟନର ନିୟନ୍ତା ହୁଏ।
The dilemma is the reliability of external religiosity: whether acts like dāna, yajña, study, vows, and tapas have value when the agent lacks sattvika conduct; the chapter answers by making ethical alignment the prerequisite for efficacy.
Sattva is expressed as verifiable conduct—compassion, truth, purity, restraint, equanimity—and the person who understands the guṇas can engage life without being dominated by reactive qualities.
Yes: the chapter claims that those established in sattva abandon sins, become free from grief, attain heaven, and gain extraordinary capacities; it further states that knowing the guṇas enables mastery over them (‘enjoys the guṇas, not enjoyed by the guṇas’).