Adhyaya 25
Anushasana ParvaAdhyaya 2541 Verses

Adhyaya 25

अहिंसयित्वा ब्रह्महत्याविधानम् / Brahmahatyā incurred without physical violence

Upa-parva: Brahmahatyā-anuśāsana (Discourse on ‘Brahmin-slaying’ by non-violent means)

Yudhiṣṭhira asks Bhīṣma to explain, in principled terms, how brahmahatyā can occur ‘without harming’ (ahiṃsayitvā). Bhīṣma replies that he previously posed the same question to Vyāsa and now transmits Vyāsa’s definitive categories. The chapter enumerates non-violent acts that are treated as brahmahatyā because they effectively destroy a Brahmin’s survival, dignity, or the continuity of sacred knowledge: (1) inviting a poor Brahmin for alms and then refusing by saying ‘there is none’; (2) depriving an uninvolved/neutral learned Brahmin of his means of livelihood; (3) creating obstacles to water access for a thirsty cattle-community; (4) disparaging śruti or authoritative śāstra without understanding; (5) withholding a well-suited marriage for one’s accomplished daughter; (6) causing deep, penetrating grief to twice-born persons through falsehood and adharmic conduct; (7) seizing the entire property of a blind, lame, or incapacitated Brahmin; and (8) abandoning the sacred fire through negligence in āśrama, forest, village, or city. The discourse reframes ‘killing’ as structural harm: deprivation, obstruction, and corrosive speech that dismantle dharmic infrastructure.

Chapter Arc: शरशय्या पर पड़े पितामह के पास युधिष्ठिर का प्रश्न उठता है—प्राचीन ब्राह्मण किसे दान का श्रेष्ठ पात्र मानते हैं: दण्ड-कमण्डलु धारण करने वाला ब्रह्मचारी, या वह जो जीवन-रक्षा हेतु वर्णाश्रमोचित वृत्ति अपनाए? → भीष्म पात्रता को बाह्य चिह्नों से नहीं, आचरण-धर्म से जोड़ते हैं; युधिष्ठिर फिर शंका करते हैं—यदि दाता की श्रद्धा शुद्ध हो तो क्या हव्य-कव्य-दान में दोष रह जाता है? इस पर चर्चा ‘श्रद्धा बनाम पात्रता’ के सूक्ष्म द्वंद्व में प्रवेश करती है। → कश्यप-वचन और भीष्म-निर्णय से शिखर आता है—वेद, षडङ्ग, सांख्य, पुराण, कुल-गौरव—ये सब शील-रहित द्विज को गति नहीं देते; और धर्म-लक्षण के रूप में अहिंसा, सत्य, अक्रोध, आनृशंस्य, दम, आर्जव तथा ब्रह्मचर्य, मद्य-मांस-त्याग, शम आदि को निर्णायक बताया जाता है। → भीष्म निष्कर्ष देते हैं कि जिन ब्राह्मणों में ये गुण हों, उन्हें दिया दान महान फल देता है; ऐसे पात्र को गाय, घोड़ा, अन्न, धन आदि देने से दाता परलोक में शोक नहीं करता, और एक भी उत्तम द्विज कुल का उद्धार कर सकता है—अतः गुणोपेत ब्राह्मण को दूर से भी खोजकर सत्कारपूर्वक दान देना चाहिए।

Shlokas

Verse 1

युधिष्ठिरने पूछा--भरतश्रेष्ठ! प्राचीन ब्राह्मण किसको दानका श्रेष्ठ पात्र बताते हैं? दण्ड-कमण्डलु आदि चिह्न धारण करनेवाले ब्रह्मचारी ब्राह्मणको अथवा चिह्नरहित गृहस्थ ब्राह्मगको?,सत्पुरुषोंद्वारा सम्मानित गुणवान्‌ ब्राह्मण यदि कहीं दूर भी सुनायी पड़े तो उसको वहाँसे अपने यहाँ बुलाकर उसका हर प्रकारसे पूजन और सत्कार करना चाहिये ।। इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि बहुप्राश्निके द्वाविंशो5ध्याय: ।। २२ ।। इस प्रकार श्रीमह्याभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें बहुत-से प्रश्नोंका निर्णयविषयक बाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ २२ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४६ श्लोक मिलाकर कुल ८७ श्लोक हैं) - श्राद्धमें भोजन करने योग्य ब्राह्मणोंके विषयमें स्मृतियोंमें इस प्रकार उल्लेख मिलता है--कर्मनिष्ठास्तपोनिष्ठा: पजञ्चान्निब्रह्मचारिण: । पितृमातृपराश्रैव ब्राह्मणा: श्राद्धसम्पद: ।। तथा--'व्रतस्थमपि दौत्ित्र श्राद्धे यत्नेन भोजयेत्‌ ।' तात्पर्य यह है कि क्रियानिष्ठ, तपस्वी, पञ्चाग्निका सेवन करनेवाले, ब्रह्मचारी तथा पिता-माताके भक्त--े पाँच प्रकारके ब्राह्मण श्राद्धकी सम्पत्ति हैं। इन्हें भोजन करानेसे श्राद्धकर्मका पूर्णतया सम्पादन होता है।” तथा “अपनी कन्याका बेटा ब्रह्मचारी हो तो भी यत्नपूर्वक उसे श्राद्धमें भोजन कराना चाहिये।” ऐसा करनेसे श्राद्धकर्ता पुण्यका भागी होता है। केवल श्राद्धमें ही ऐसी छूट दी गयी है। श्राद्धके अतिरिक्त और किसी कर्ममें ब्रह्मचारीको लोभ आदि दिखाकर जो उसके व्रतको भंग करता है, उसे दोषका भागी होना पड़ता है और अपने किये हुए दानका भी पूरा-पूरा फल नहीं मिलता। इसीलिये शास्त्रमें लिखा है कि “मनसा पात्रमुद्दिश्य जलमध्ये जल क्षिपेत्‌ । दाता तत्फलमाप्रोति प्रतिग्राही न दोषभाक्‌ ॥। * अर्थात्‌ “यदि किसी सुपात्र (ब्रह्मचारी आदि)-को दान देना हो तो उसका मनमें ध्यान करे और उसे दान देनेके उद्देश्यसे हाथमें संकल्पका जल लेकर उसे जलहीमें छोड़ दे। इससे दाताको दानका फल मिल जाता है और दान लेनेवालेको दोषका भागी नहीं होना पड़ता।” यह बात सत्पात्रका आदर करनेके लिये बतायी गयी है। (नीलकण्ठी) त्रयोविशो<् ध्याय: देवता और पिततरोंके कार्यमें निमन्त्रण देने योग्य पात्रों तथा नरकगामी और स्वर्गगामी मनुष्योंके लक्षणोंका वर्णन युधिछिर उवाच श्राद्धकाले च दैवे च पित्रयेषपि च पितामह । इच्छामीह त्वया55ख्यातं विहित॑ यत्‌ सुरषिभि:

युधिष्ठिर म्हणाला— हे भरतश्रेष्ठ! प्राचीन ब्राह्मण दानासाठी सर्वश्रेष्ठ पात्र कोणाला मानतात—दंड-कमंडलू इत्यादी चिन्हे धारण करणाऱ्या ब्रह्मचारी ब्राह्मणाला, की बाह्यचिन्हरहित गृहस्थ ब्राह्मणाला? आणि सत्पुरुषांनी मान दिलेला एखादा गुणवान ब्राह्मण दूरवरही ऐकू आला, तर त्याला तेथून बोलावून आपल्या घरी सर्व प्रकारे पूजन-सत्कार करावा.

Verse 2

भीष्म उवाच स्ववृत्तिमभिपन्नाय लिज़्िने चेतराय च । देयमाहुर्महाराज उभावेतौ तपस्विनौ,भीष्मजीने कहा--महाराज! जीवन-रक्षाके लिये अपनी वर्णाश्रमोचित वृत्तिका आश्रय लेनेवाले चिह्नधारी या चिह्लरहित किसी भी ब्राह्मणको दान दिया जाना उचित बताया गया है; क्योंकि स्वधर्मका आश्रय लेनेवाले ये दोनों ही तपस्वी एवं दानपात्र हैं

भीष्म म्हणाले— महाराज! जीवनरक्षणासाठी आपल्या वर्णाश्रमोचित वृत्तीचा आश्रय घेणारा ब्राह्मण—तो चिन्हधारी असो वा चिन्हरहित—दोघांनाही दान द्यावे असे सांगितले आहे; कारण स्वधर्मात स्थित हे दोघेही तपस्वी व दानपात्र आहेत.

Verse 3

युधिछिर उवाच श्रद्धया परया पूतो यः प्रयच्छेद्‌ द्विजातये । हव्यं कव्यं तथा दानं को दोष: स्यात्‌ पितामह,युधिष्ठिरने पूछा--पितामह! जो केवल उत्कृष्ट श्रद्धासे ही पवित्र होकर ब्राह्मणको हव्य-कव्य तथा अन्य वस्तुका दान देता है, उसे अन्य प्रकारकी पवित्रता न होनेके कारण किस दोषकी प्राप्ति होती है?

युधिष्ठिर म्हणाला— पितामह! जो मनुष्य केवळ परम श्रद्धेनेच पवित्र होऊन द्विज (ब्राह्मण) याला हव्य, कव्य तसेच इतर दान देतो, तर इतर प्रकारची शुद्धता नसल्यामुळे त्याला कोणता दोष लागतो?

Verse 4

भीष्म उवाच श्रद्धापूतो नरस्तात दुर्दान्तोी5पि न संशय: । पूतो भवति सर्वत्र किमुत त्वं महाद्युते,भीष्मजीने कहा--तात! मनुष्य जितेन्द्रिय न होनेपर भी केवल श्रद्धामात्रसे पवित्र हो जाता है--इसमें संशय नहीं है। महातेजस्वी नरेश! श्रद्धापूत मनुष्य सर्वत्र पवित्र होता है, फिर तुम-जैसे धर्मात्माके पवित्र होनेमें तो संदेह ही क्या है?

भीष्म म्हणाले—तात! दुर्दम्य मनुष्यही केवळ श्रद्धेमुळे पवित्र होतो—यात संशय नाही. श्रद्धेने शुद्ध झालेला पुरुष सर्वत्र शुद्ध मानला जातो; मग, महातेजस्वी राजन्, धर्मनिष्ठ तुझ्या पवित्रतेबद्दल शंका कशी राहील?

Verse 5

युधिछिर उवाच न ब्राह्मणं परीक्षेत दैवेषु सततं नर: । कव्यप्रदाने तु बुधा: परीक्ष्यं ब्राह्मणं विदु:,युधिष्ठिरने पूछा--पितामह! विद्वानोंका कहना है कि देवकार्यमें कभी ब्राह्मणकी परीक्षा न करे, किंतु श्राद्धमें अवश्य उसकी परीक्षा करे; इसका क्या कारण है?

युधिष्ठिर म्हणाला—पितामह! विद्वान म्हणतात की देवकार्यांत मनुष्याने कधीही ब्राह्मणाची परीक्षा करू नये; परंतु श्राद्धात कव्य-प्रदानाच्या वेळी ब्राह्मणाची परीक्षा करावी असे मानतात—याचे कारण काय?

Verse 6

भीष्म उवाच न ब्राह्मण: साधयते हव्यं दैवात्‌ प्रसिद्ध्यति । देवप्रसादादिज्यन्ते यजमानैर्न संशय:,भीष्मजीने कहा--बेटा! यज्ञ-होम आदि देवकार्यकी सिद्धि ब्राह्मणके अधीन नहीं है, वह दैवसे सिद्ध होता है। देवताओंकी कृपासे ही यजमान यज्ञ करते हैं। इसमें संशय नहीं है

भीष्म म्हणाले—बाळा! यज्ञ-होम इत्यादी देवकार्याची सिद्धी ब्राह्मणाच्या अधीन नाही; ती दैवानेच सिद्ध होते. देवतांच्या प्रसादानेच यजमान यज्ञ करतात—यात संशय नाही.

Verse 7

ब्राह्मणान्‌ भरतश्रेष्ठ सततं ब्रह्म॒ुवादिन: । मार्कण्डेय: पुरा प्राह इति लोकेषु बुद्धिमान्‌ ७ ।। भरतमश्रेष्ठ! बुद्धिमान मार्कण्डेयजीने बहुत पहलेसे ही यह बता रखा है कि श्राद्धमें सदा वेदवेत्ता ब्राह्मणोंको ही निमन्त्रित करना चाहिये (क्योंकि उसकी सिद्धि सुपात्र ब्राह्मणके ही अधीन है)

भीष्म म्हणाले—भरतश्रेष्ठ! श्राद्धात नेहमी ब्रह्मवादि, वेदज्ञ ब्राह्मणांनाच निमंत्रित करावे. ही गोष्ट बुद्धिमान मार्कण्डेयांनी प्राचीन काळी सांगितली असून लोकांत मान्य आहे.

Verse 8

युधिछिर उवाच अपूर्वोजप्यथवा विद्वान्‌ सम्बन्धी वा यथा भवेत्‌ । तपस्वी यज्ञशीलो वा कथं पात्र भवेत्‌ तु सः,युधिष्ठिरने पूछा--जो अपरिचित, विद्वान, सम्बन्धी, तपस्वी अथवा यज्ञशील हों, इनमेंसे कौन किस प्रकारके गुणोंसे सम्पन्न होनेपर श्राद्ध एवं दानका उत्तम पात्र हो सकता है?

युधिष्ठिर म्हणाला—जो अपरिचित असेल, किंवा विद्वान असेल, किंवा प्रसंगानुसार नातेवाईक असेल; तपस्वी असेल किंवा यज्ञशील असेल—असा पुरुष कोणत्या गुणांनी युक्त झाल्यावर श्राद्ध व दानाचा उत्तम पात्र ठरतो?

Verse 9

भीष्म उवाच कुलीन: कर्मकृद्‌ वैद्यस्तथैवाप्यानृशंस्यवान्‌ | ह्वीमानृजु: सत्यवादी पात्र पूर्वे च ये त्रय:,भीष्मजीने कहा--कुलीन, कर्मठ, वेदोंके विद्वान, दयालु, सलज्ज, सरल और सत्यवादी--इन सात प्रकारके गुणवाले जो पूर्वोक्त तीन (अपरिचित विद्वान, सम्बन्धी और तपस्वी) ब्राह्मण हैं, वे उत्तम पात्र माने गये हैं

भीष्म म्हणाले—जो सुकुलोत्पन्न, धर्मकर्मात तत्पर, वेदविद् व दयाळू; तसेच लज्जाशील, सरळ आणि सत्यवादी—तो दानाचा उत्तम पात्र होय. आणि पूर्वी सांगितलेले ते तीन—अपरिचित विद्वान ब्राह्मण, नातेवाईक व तपस्वी—हेही श्रेष्ठ पात्र मानले जातात.

Verse 10

तत्रेमं शृणु मे पार्थ चतुर्णा तेजसां मतम्‌ | पृथिव्या: काश्यपस्याग्नेर्मार्कण्डेयस्य चैव हि,कुन्तीनन्दन! इस विषयमें तुम मुझसे पृथ्वी, काश्यप, अग्नि और मार्कण्डेय--इन चार तेजस्वी व्यक्तियोंका मत सुनो

कुंतीनंदन पार्था! आता या विषयात माझ्याकडून चार तेजस्वी महात्म्यांचे मत ऐक—पृथ्वी, काश्यप, अग्नि आणि महर्षी मार्कंडेय. धर्म व अनुभव यांच्या आधारावर त्यांचे वचन हा विषय स्पष्ट करील.

Verse 11

पृथिव्युवाच यथा महाणेवि क्षिप्त: क्षिप्रं लेष्टविनश्यति । तथा दुश्नरितं सर्व त्रिवृत्यां च निमज्जति,पृथ्वी कहती है--जिस प्रकार महासागरमें फेंका हुआ ढेला तुरंत गलकर नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार याजन, अध्यापन और प्रतिग्रह--इन तीन वृत्तियोंसे जीविका चलानेवाले ब्राह्मणमें सारे दुष्कर्मोका लय हो जाता है

पृथ्वी म्हणाली—जसा महासागरात फेकलेला मातीचा ढेकूळ लवकरच विरघळून नाहीसा होतो, तसा याजन, अध्यापन आणि प्रतिग्रह—या त्रिवृत्तीने उपजीविका करणाऱ्या ब्राह्मणात सर्व दुष्कर्म बुडून नष्ट होतात.

Verse 12

काश्यप उवाच सर्वे च वेदा: सह षड्भिरज्जैः सांख्यं पुराणं च कुले च जन्म । नैतानि सर्वाणि गतिर्भवन्ति शीलव्यपेतस्य नृप द्विजस्य,काश्यप कहते हैं--नरेश्वर! जो ब्राह्मण शीलसे रहित हैं, उसे छहों अंगोंसहित वेद, सांख्य और पुराणका ज्ञान तथा उत्तम कुलमें जन्म--ये सब मिलकर भी उत्तम गति नहीं प्रदान कर सकते

काश्यप म्हणाले—हे नरेश्वर! जो ब्राह्मण शीलहीन आहे, त्याला सहा अंगांसह वेदांचे ज्ञान, सांख्य व पुराणांचे बोध आणि उत्तम कुळात जन्म—हे सर्व मिळूनही श्रेष्ठ गती देऊ शकत नाही.

Verse 13

अग्निर॒ुवाच अधीयान: पण्डितं मन्यमानो यो विद्यया हन्ति यश: परेषाम्‌ | प्रभ्रश्यतेडसौ चरते न सत्यं लोकास्तस्य हारान्तवन्तो भवन्ति,अग्नि कहते हैं--जो ब्राह्मण अध्ययन करके अपनेको बहुत बड़ा पण्डित मानता और अपनी दिद्वत्तापर गर्व करने लगता है तथा जो अपनी विद्याके बलसे दूसरोंके यशका नाश करता है, वह धर्मसे भ्रष्ट होकर सत्यका पालन नहीं करता; अतः उसे नाशवान्‌ लोकोंकी प्राप्ति होती है

अग्नि म्हणाले—जो अध्ययन करून स्वतःला मोठा पंडित समजून विद्येचा गर्व धरतो, आणि त्या विद्येच्या बळावर दुसऱ्यांचे यश नष्ट करतो—तो धर्मापासून भ्रष्ट होतो, सत्यमार्गाने चालत नाही; म्हणून त्याला नाशवंत लोक प्राप्त होतात, ज्यांचा शेवट हानीत होतो.

Verse 14

मार्कण्डेय उवाच अश्वमेधसहस्रं च सत्यं च तुलया धृतम्‌ । नाभिजानामि यद्यस्य सत्यस्यार्धमवाप्तरुयात्‌,मार्कण्डेयजी कहते हैं--यदि तराजूके एक पलड़ेमें एक हजार अश्वमेध-यज्ञको और दूसरेमें सत्यको रखकर तौला जाय तो भी न जाने वे सारे अश्वमेध-यज्ञ इस सत्यके आधेके बराबर भी होंगे या नहीं?

मार्कण्डेय म्हणाले—जर तराजूच्या एका पारड्यात हजार अश्वमेधयज्ञ आणि दुसऱ्या पारड्यात सत्य ठेवून तोलले, तरीही ते सर्व यज्ञ सत्याच्या अर्ध्याइतकेही ठरतील की नाही, हे मी सांगू शकत नाही. सत्याचे मोल अमाप आहे.

Verse 15

भीष्म उवाच इत्युक्त्वा ते जग्मुराशु चत्वारोडमिततेजस: । पृथिवी काश्यपो<ग्निश्च प्रकृष्टायुश्व भार्गव:,भीष्मजी कहते हैं-युधिष्ठि!! इस प्रकार अपना मत प्रकट करके वे चारों अमिततेजस्वी व्यक्ति--पृथ्वी, काश्यप, अग्नि और मार्कण्डेय शीघ्र ही चले गये

भीष्म म्हणाले—युधिष्ठिरा! असे आपले मत सांगून ते चारही अमिततेजस्वी—पृथ्वी, काश्यप, अग्नी आणि दीर्घायुषी भार्गव (मार्कण्डेय)—क्षणात तेथून निघून गेले.

Verse 16

युधिषछ्िर उवाच यदि ते ब्राह्मणा लोके व्रतिनो भुञ्जते हवि: । दत्तं ब्राह्गकामाय कथं तत्‌ सुकृतं भवेत्‌,युधिष्ठिरने पूछा--पितामह! यदि ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करनेवाले ब्राह्मण श्राद्धमें हविष्यान्नका भोजन करते हैं तो श्रेष्ठ ब्राह्यणकी कामनासे उन्हें दिया हुआ दान कैसे सफल हो सकता है?

युधिष्ठिर म्हणाला—पितामह! या लोकी व्रत पाळणारे ब्राह्मण जर श्राद्धात हविष्यान्न भोजन करतात, तर ‘ब्राह्म’ (श्रेष्ठ) फलाची इच्छा ठेवून दिलेले दान कसे खरे पुण्यकर्म ठरेल?

Verse 17

भीष्म उवाच आदिष्टिनो ये राजेन्द्र ब्राह्मणा वेदपारगा: । भुज्जते ब्रह्म॒कामाय व्रतलुप्ता भवन्ति ते,भीष्मजीने कहा--राजेन्द्र! (जिन्हें गुरुने नियत वर्षोंतक ब्रह्मचर्य-व्रत पालन करनेका आदेश दे रखा है वे आदिष्टी कहलाते हैं।) ऐसे वेदके पारड़त आदिष्टी ब्राह्मण यदि यजमानकी ब्राह्मणको दान देनेकी इच्छापूर्तिके लिये श्राद्धमें भोजन करते हैं तो उनका अपना ही व्रत नष्ट हो जाता है (इससे दाताका दान दूषित नहीं होता है)-

भीष्म म्हणाले—राजेन्द्र! जे ‘आदिष्टी’ ब्राह्मण वेदपारंगत असून गुरूच्या आज्ञेने ठरावीक काळ ब्रह्मचर्य-व्रतात बांधलेले असतात, ते जर यजमानाची ब्राह्मणांना दान देण्याची इच्छा पूर्ण व्हावी म्हणून श्राद्धात भोजन करतात, तर त्यांचे स्वतःचे व्रत भंग पावते; दोष भोगणाऱ्याचा, दात्याच्या दानाचा नाही.

Verse 18

युधिछिर उवाच अनेकान्तं बहुद्वारं धर्ममाहुर्मनीषिण: । किंनिमित्तं भवेदत्र तन्मे ब्रूहि पितामह,युधिष्ठिरने पूछा--पितामह! विद्वानोंका कहना है कि धर्मके साधन और फल अनेक प्रकारके हैं। पात्रके कौन-से गुण उसकी दानपात्रतामें कारण होते हैं? यह मुझे बताइये

युधिष्ठिर म्हणाला—पितामह! मनीषी म्हणतात की धर्म अनेकांगी आहे आणि अनेक द्वारांनी प्राप्त होतो. या विषयात निर्णायक कारण काय? ते मला सांगा.

Verse 19

भीष्म उवाच अहिंसा सत्यमक्रोध आनृशंस्यं दमस्तथा । आर्जवं चैव राजेन्द्र निश्चितं धर्मलक्षणम्‌,भीष्मजीने कहा--राजेन्द्र! अहिंसा, सत्य, अक्रोध, कोमलता, इन्द्रियसंयम और सरलता--ये धर्मके निश्चित लक्षण हैं

भीष्म म्हणाले—राजेंद्र! अहिंसा, सत्य, अक्रोध, करुणा, इंद्रियसंयम आणि सरळपणा—हीच धर्माची निश्चित लक्षणे आहेत.

Verse 20

ये तु धर्म प्रशंसन्तश्नरन्ति पृथिवीमिमाम्‌ | अनाचरन्तस्तद्‌ धर्म संकरेडभिरता: प्रभो,प्रभो! जो लोग इस पृथ्वीपर धर्मकी प्रशंसा करते हुए घूमते-फिरते हैं; परंतु स्वयं उस धर्मका आचरण नहीं करते, वे ढोंगी हैं और धर्मसंकरता फैलानेमें लगे हैं

भीष्म म्हणाले—प्रभो! जे या पृथ्वीवर धर्माची स्तुती करीत फिरतात, पण स्वतः तोच धर्म आचरत नाहीत—ते ढोंगी; आणि धर्माच्या नावाने संकर पसरवण्यातच रत असतात.

Verse 21

तेभ्यो हिरण्यं रत्नं वा गामश्चं वा ददाति यः । दश वर्षाणि विष्ठां स भुड्क्ते निरयमास्थित:,ऐसे लोगोंको जो सुवर्ण, रत्न, गौ अथवा अश्व आदि वस्तुओंका दान करता है वह नरकमें पड़कर दस वर्षोंतक विष्ठा खाता है

भीष्म म्हणाले—जो अशा लोकांना सुवर्ण, रत्ने, गायी, घोडे किंवा इतर मौल्यवान वस्तू दान देतो, तो नरकात पडून दहा वर्षे विष्ठा भोगतो.

Verse 22

मेदानां पुल्कसानां च तथैवान्तेवसायिनाम्‌ । कृतं कर्माकृतं वापि रागमोहेन जल्पताम्‌,जो उच्चवर्णके लोग राग और मोहके वशीभूत हो अपने किये अथवा बिना किये शुभ कर्मका जनसमुदायमें वर्णन करते हैं वे मेद, पुल्कस तथा अन्त्यजोंके तुल्य माने जाते हैं

भीष्म म्हणाले—जे उच्चवर्णीय लोक राग-मोहाच्या अधीन होऊन आपण केलेल्या किंवा न केलेल्या पुण्यकर्माचा लोकांत गाजावाजा करतात, ते मेद, पुल्कस व अंत्यज यांच्यासमान मानले जातात.

Verse 23

वैश्वदेवं च ये मूढा विप्राय ब्रह्मचारिणे । ददते नेह राजेन्द्र ते लोकान्‌ भुज्जतेडशुभान्‌,राजेन्द्र! जो मूढ़ मानव ब्रह्मचारी ब्राह्मणको बलि-वैश्वदेवसम्बन्धी अन्न (अतिथियोंको देनेयोग्य हन्तकार) नहीं देते हैं, वे अशुभ लोकोंका उपभोग करते हैं

भीष्म म्हणाले—राजेंद्र! जे मूढ लोक या जगात ब्रह्मचारी ब्राह्मणाला वैश्वदेव-संबंधी अन्न देत नाहीत, ते अशुभ लोकांचा भोग करतात.

Verse 24

युधिछिर उवाच कि परं ब्रह्मचर्य च कि परं धर्मलक्षणम्‌ | किं च श्रेष्ठतमं शौचं तन्मे ब्रूहि पितामह,युधिष्ठिरने पूछा--पितामह! उत्तम ब्रह्मचर्य क्या है? धर्मका सबसे श्रेष्ठ लक्षण क्‍या है? तथा सर्वोत्तम पवित्रता किसे कहते हैं? यह मुझे बताइये

युधिष्ठिर म्हणाला— पितामह, परम ब्रह्मचर्य काय? धर्माचे सर्वोच्च लक्षण कोणते? आणि श्रेष्ठतम शौच (पवित्रता) कोणती? ते मला सांगा।

Verse 25

भीष्म उवाच ब्रह्मचर्यात्‌ परं तात मधुमांसस्य वर्जनम्‌ | मयदियां स्थितो धर्म: शमश्वैवास्य लक्षणम्‌,भीष्मजीने कहा--तात! मांस और मदिराका त्याग ब्रह्मचर्यसे भी श्रेष्ठ है--वही उत्तम ब्रह्मचर्य है। वेदोक्त मर्यादामें स्थित रहना सबसे श्रेष्ठ धर्म है तथा मन और इन्द्रियोंको संयममें रखना ही सर्वोत्तम पवित्रता है

भीष्म म्हणाला— तात, ब्रह्मचर्यापेक्षाही श्रेष्ठ मधु/मद्य आणि मांस यांचा त्याग आहे। वेदोक्त मर्यादेत स्थिर राहणे हाच धर्म; त्याचे लक्षण शम—म्हणजे मन व इंद्रियांचा संयम—आहे. हेच श्रेष्ठतम शौच।

Verse 26

युधिछिर उवाच कस्मिन्‌ काले चरेद्‌ धर्म कस्मिन्‌ काले<र्थमाचरेत्‌ । कस्मिन्‌ काले सुखी च स्यात्‌ तन्मे ब्रूहि पितामह

युधिष्ठिर म्हणाला— पितामह, कोणत्या वेळी धर्माचे आचरण करावे? कोणत्या वेळी अर्थसाधना करावी? आणि कोणत्या वेळी सुखी व्हावे? मला सांगा।

Verse 27

युधिष्ठिने पूछा-पितामह! मनुष्य किस समय धर्मका आचरण करे? कब अर्थोपार्जनमें लगे तथा किस समय सुखभोगमें प्रवृत्त हो? यह मुझे बताइये ।। भीष्म उवाच कल्यमर्थ निषेवेत ततो धर्ममनन्तरम्‌ | पश्चात्‌ काम॑ निषेवेत न च गच्छेत्‌ प्रसड्भिताम्‌,भीष्मजीने कहा--राजन! पूर्वाह्नमें धनका उपार्जन करे, तदनन्तर धर्मका और उसके बाद कामका सेवन करे; परंतु काममें आसक्त न हो

भीष्म म्हणाला— राजन्, प्रथम योग्य वेळी अर्थसाधना करावी; त्यानंतर विलंब न करता धर्माचे आचरण करावे; आणि मगच काम (सुख) उपभोगावे. पण कामात आसक्त होऊन अति-भोगात पडू नये।

Verse 28

ब्राह्मणांश्वैव मन्येत गुरूंश्वाप्पभिपूजयेत्‌ । सर्वभूतानुलोमश्न मृदुशील: प्रियंवद:,ब्राह्मणोंका सम्मान करे। गुरुजनोंकी सेवा-पूजामें संलग्न रहे। सब प्राणियोंके अनुकूल रहे। नम्रताका बर्ताव करे और सबसे मीठे वचन बोले

ब्राह्मणांचा मान ठेवावा आणि गुरुजनांची यथोचित सेवा-पूजा करावी। सर्व प्राण्यांशी अनुकूल राहावे, स्वभावाने मृदू असावे, आणि प्रिय वचन बोलावे।

Verse 29

अधिकारे यदनृतं यच्च राजसु पैशुनम्‌ । गुरोश्वालीककरणं तुल्य॑ तद्‌ ब्रह्म॒हत्यया,न्यायका अधिकार पाकर झूठा फैसला देना अथवा न्यायालयमें जाकर झूठ बोलना, राजाओंके पास किसीकी चुगली करना और गुरुके साथ कपटपूर्ण बर्ताव करना--ये तीन ब्रह्महत्याके समान पाप हैं

भीष्म म्हणाले—अधिकारी कर्तव्यात, विशेषतः न्यायनिर्णयात असत्य बोलणे; राजांसमोर पैशुन्य/चुगली करणे; आणि गुरूशी कपटाने वागणे—ही तीनही पापे ब्रह्महत्येसमान मानली जातात।

Verse 30

प्रहरेन्न नरेन्द्रेषु न हन्याद्‌ गां तथैव च । भ्रूणहत्यासमं चैव उभयं यो निषेवते,राजाओं पर प्रहार न करे और गायको न मारे। जो राजा और गौपर प्रहाररूप द्विविध दुष्कर्मका सेवन करता है, उसे भ्रूणहत्याके समान पाप लगता है

भीष्म म्हणाले—राजांवर प्रहार करू नये आणि त्याचप्रमाणे गायीचा वध करू नये। जो या दोन्हींपैकी कोणतेही दुष्कर्म करतो—राजहिंसा किंवा गोहत्या—त्याला भ्रूणहत्येसमान पाप लागते।

Verse 31

नाग्निं परित्यजेज्जातु न च वेदान्‌ परित्यजेत्‌ । नच ब्राह्मणमाक्रोशेत्‌ सम॑ तद्‌ ब्रह्महत्यया,अग्निहोत्रका कभी त्याग न करे। वेदोंका स्वाध्याय न छोड़े तथा ब्राह्मणकी निन्दा न करे; क्योंकि ये तीनों दोष ब्रह्महत्याके समान हैं

भीष्म म्हणाले—कधीही पवित्र अग्नीचा त्याग करू नये, वेदांचा स्वाध्याय सोडू नये, आणि ब्राह्मणाची निंदा करू नये; कारण हे तिन्ही दोष ब्रह्महत्येसमान आहेत।

Verse 32

युधिछिर उवाच कीदृशा: साधवो वितप्रा: केभ्यो दत्त महाफलम्‌ | कीदृशानां च भोक्तव्यं तन्मे ब्रूहि पितामह,युधिष्ठिरने पूछा--पितामह! कैसे ब्राह्मणोंको श्रेष्ठ समझना चाहिये? किनको दिया हुआ दान महान्‌ फल देनेवाला होता है? तथा कैसे ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये? यह मुझे बताइये

युधिष्ठिर म्हणाला—पितामह! कोणत्या प्रकारचे ब्राह्मण साधू व श्रेष्ठ मानले जातात? कोणाला दिलेले दान महाफल देते? आणि कोणत्या ब्राह्मणांना भोजन घालावे? हे मला सांगा।

Verse 33

भीष्म उवाच अक्रोधना धर्मपरा: सत्यनित्या दमे रता: | तादृशा: साधवो वित्रास्तेभ्यो दत्त महाफलम्‌,भीष्मजीने कहा--राजन्‌! जो क्रोधरहित, धर्मपरायण, सत्यनिष्ठ और इन्द्रियसंयममें तत्पर हैं, ऐसे ब्राह्मणोंको श्रेष्ठ समझना चाहिये और उन्हींको दान देनेसे महान्‌ फलकी प्राप्ति होती है (अतः उन्हींको श्राद्धमें भोजन कराना चाहिये)

भीष्म म्हणाले—राजन्! जे क्रोधरहित, धर्मपरायण, सत्यनिष्ठ आणि इंद्रियसंयमात रत आहेत, असे ब्राह्मण साधू व श्रेष्ठ होत. त्यांना दिलेले दान महाफल देते (म्हणून श्राद्धादि कर्मात त्यांनाच भोजन घालावे)।

Verse 34

अमानिन: सर्वसहा दृढार्था विजितेन्द्रिया: । सर्वभूतहिता मैत्रास्ते भ्यो दत्त महाफलम्‌

भीष्म म्हणाले—जे अभिमानरहित, सर्व कष्ट सहन करणारे, निश्चयाने दृढ, इंद्रियजयी, आणि सर्व प्राणिमात्रांच्या हितासाठी तत्पर व मैत्रीभावयुक्त आहेत—अशांना दिलेले दान महाफलदायी ठरते।

Verse 35

जिनमें अभिमानका नाम नहीं है, जो सब कुछ सह लेते हैं, जिनका विचार दृढ़ है, जो जितेन्द्रिय, सम्पूर्ण प्राणियोंक हितकारी तथा सबके प्रति मैत्रीभाव रखनेवाले हैं, उनको दिया हुआ दान महान्‌ फल देनेवाला है ।। अलुब्धा: शुचयो वैद्या ह्वीमन्‍त: सत्यवादिन: । स्वकर्मनिरता ये च तेभ्यो दत्त महाफलम्‌,जो निर्लोभ, पवित्र, विद्वान, संकोची, सत्यवादी और अपने कर्तव्यका पालन करनेवाले हैं, उनको दिया हुआ दान भी महान्‌ फलदायक होता है

भीष्म म्हणाले—जे निर्लोभ, शुद्ध, विद्वान, लज्जाशील, सत्यवादी आणि स्वधर्मकर्मात निरत आहेत—अशांना दिलेले दानही महाफलदायी होते।

Verse 36

साड़ांश्व चतुरो वेदानधीते यो द्विजर्षभ: । षड्भ्य: प्रवृत्त: कर्मभ्यस्तं पात्रमृषयो विदु:,जो श्रेष्ठ ब्राह्मण अंगोंसहित चारों वेदोंका अध्ययन करता और ब्राह्मणोचित छ: कर्मों (अध्ययन-अध्यापन, यजन-याजन और दान-प्रतिग्रह) में प्रवृत्त रहता है, उसे ऋषिलोग दानका उत्तम पात्र समझते हैं

भीष्म म्हणाले—जो द्विजश्रेष्ठ वेदांगांसह चारही वेदांचे अध्ययन करतो आणि ब्राह्मणोचित सहा कर्मांत—अध्ययन-अध्यापन, यजन-याजन, दान-प्रतिग्रह—प्रवृत्त असतो, त्याला ऋषिजन दानाचा उत्तम पात्र मानतात।

Verse 37

ये त्वेवंगुणजातीयास्तेभ्यो दत्त महाफलम्‌ | सहस्रगुणमाप्रोति गुणाहाय प्रदायक:

भीष्म म्हणाले—जे खरोखरच अशा गुणांनी युक्त आहेत, त्यांना दिलेले दान महाफल देते। गुण ओळखून दान करणारा दाता सहस्रगुण फल प्राप्त करतो।

Verse 38

जो ब्राह्मण ऊपर बताये हुए गुणोंसे युक्त होते हैं, उन्हें दिया हुआ दान महान्‌ फल देनेवाला है। गुणवान्‌ एवं सुयोग्य पात्रको दान देनेवाला दाता सहसख्रगुना फल पाता है ।। प्रज्ञाश्रुताभ्यां वृत्तेन शीलेन च समन्वित: । तारयेत कुल॑ सर्वमेको<5पीह द्विजर्षभ:,यदि उत्तम बुद्धि, शास्त्रकी विद्वत्ता, सदाचार और सुशीलता आदि उत्तम गुणोंसे सम्पन्न एक श्रेष्ठ ब्राह्मण भी दान स्वीकार कर ले तो वह दाताके सम्पूर्ण कुलका उद्धार कर देता है

भीष्म म्हणतात—पूर्वोक्त गुणांनी युक्त ब्राह्मणाला दिलेले दान महाफलदायी आहे; आणि गुणवान व योग्य पात्राला दान करणारा दाता सहस्रगुण फल पावतो। उत्तम प्रज्ञा, शास्त्रश्रवणजन्य विद्वत्ता, सदाचार व सुशीलता यांनी संपन्न असा एकही द्विजश्रेष्ठ येथे दान स्वीकारला, तर तो दात्याच्या संपूर्ण कुलाचा उद्धार करतो।

Verse 39

गामश्चृ वित्तमन्नं वा तद्विधे प्रतिपादयेत्‌ । द्रव्याणि चान्यानि तथा प्रेत्यभावे न शोचति,अतः ऐसे गुणवान्‌ पुरुषको ही गाय, घोड़ा, अन्न, धन तथा दूसरे पदार्थ देने चाहिये। ऐसा करनेसे दाताको मरनेके बाद पश्चात्ताप नहीं करना पड़ता

भीष्म म्हणाले—योग्य पात्राला गाय, घोडा, धन, अन्न तसेच इतर द्रव्ये द्यावीत. अशा रीतीने केलेले दान दात्याला मृत्यूनंतर पश्चात्तापात टाकत नाही; सुपात्राला दिलेले दान परलोकातील शोकापासून रक्षण करते आणि धर्माची प्रतिष्ठा वाढवते.

Verse 40

तारयेत कुलं सर्वमेको5पीह द्विजोत्तम: । किमज़ पुनरेवैते तस्मात्‌ पात्रं समाचरेत्‌,(तृप्ते तृप्ता: सर्व देवा: पितरो मुनयो5पि च ।) एक भी उत्तम ब्राह्मण श्राद्धकर्ताके समस्त कुलको तार सकता है। यदि उपर्युक्त बहुत- से ब्राह्मण तार दें इसमें तो कहना ही क्या है। अतः सुपात्रकी खोज करनी चाहिये। उससे तृप्त होनेपर सम्पूर्ण देवता, पितर और ऋषि भी तृप्त हो जाते हैं

भीष्म म्हणाले—इथे एकही उत्तम ब्राह्मण संपूर्ण कुलाचा उद्धार करू शकतो; मग असे अनेक असतील तर काय सांगावे! म्हणून सुपात्र शोधून त्याचा यथोचित सत्कार करावा. तो तृप्त झाला की सर्व देव, पितर आणि ऋषीही तृप्त मानले जातात.

Verse 41

निशम्य च गुणोपेतं ब्राह्म॒णं साधुसम्मतम्‌ । दूरादानाय्य सत्कृत्य सर्वतश्नचापि पूजयेत्‌

भीष्म म्हणाले—गुणसंपन्न आणि सज्जनांनी मान्य केलेल्या ब्राह्मणाविषयी ऐकून त्याला दूरवरूनही बोलावून आणावे, यथोचित सत्कार करावा आणि सर्व प्रकारे पूजन-आदर करावा.

Frequently Asked Questions

How an agent can incur brahmahatyā without literal killing—resolved by redefining ‘slaying’ as actions that dismantle life-support systems (alms, livelihood, water, dignity, and knowledge transmission).

Non-violence is not merely abstention from physical harm; it includes safeguarding access to essentials, truthful dealing with dependents, and restraint in speech that targets scripture or vulnerable persons.

No explicit phalaśruti appears in this excerpt; the chapter functions as a definitional/legal-ethical taxonomy, emphasizing consequence through classification rather than promised merit.