
Āstīka-stuti at Janamejaya’s Sacrifice (आस्तीकस्तुतिः / यज्ञप्रशंसा)
Upa-parva: Āstīka-parva (Serpent-Sacrifice Episode)
This chapter presents Āstīka’s formal address within Janamejaya’s sacrificial assembly. He compares the king’s yajña to paradigmatic sacrifices associated with deities (Soma, Varuṇa, Prajāpati, Śakra/Indra, Yama) and exemplary royal patrons (e.g., Rantideva, Gaya, Śaśabindu, Nṛga, and others), repeatedly concluding with an auspicious refrain wishing well-being to the king and his dear ones. The rhetoric then shifts from comparative praise to institutional validation: Āstīka asserts the unmatched status of the officiants, especially Dvaipāyana (Vyāsa), and notes the competence and wide presence of his disciples. The chapter further sacralizes the rite by describing Agni (Hutabhuj) as splendid and properly receiving the oblations. Finally, the praise is redirected to Janamejaya’s qualities as protector and householder of the sacrifice, likening his guardianship and radiance to exemplary figures. The Sūta concludes that the king, priests, and fire are pleased; observing their favorable dispositions, King Janamejaya then speaks—marking a narrative hinge toward the next procedural step.
Chapter Arc: श्रृंगी—महातेजस्वी, तिग्मवीर्य और अतिकोपी—अपने आचार्य के आश्रम से आज्ञा लेकर लौटता है; उधर कुरुवंश के राजा परीक्षित् के भाग्य पर अदृश्य सर्प-छाया घिरने लगती है। → शमीक ऋषि के पुत्र श्रृंगी द्वारा दिए गए शाप का वृत्तान्त फैलता है; राजा की रक्षा हेतु कश्यप वैद्य-ब्राह्मण ‘सद्यः अपज्वर’ करने और सर्प-विष को निष्फल करने निकलता है, पर मार्ग में तक्षक उसे लोभ देकर रोकने का षड्यन्त्र रचता है। → तक्षक कश्यप को धन-लोभ में फँसाकर लौटा देता है—और छल से परीक्षित् को डँसकर मृत्यु देता है; धर्म-रक्षा का अवसर हाथ से निकल जाता है और राजवंश पर शोक का वज्रपात होता है। → पिता की मृत्यु का वृत्तान्त सुनकर जनमेजय प्रतिकार का संकल्प करता है: तक्षक का ‘महानतिक्रम’—ब्राह्मण को द्रव्य देकर राजा को न बचाने देना—राजधर्म और लोकधर्म दोनों पर आघात है; वह उत्तंक को प्रिय करने और पितृ-अपचित्ति हेतु आगे बढ़ता है। → जनमेजय का प्रतिशोध किस रूप में फूटेगा—और तक्षक के विरुद्ध कौन-सा यज्ञ-प्रचण्ड विधान उठेगा?
Verse 1
नऔहा-<> ड-ऑ का पज्चाशत्तमो<्ध्याय: शृंगी ऋषिका परीक्षित्को शाप, तक्षकका काश्यपको लौटाकर छलसे परीक्षित्को डँसना और पिताकी मृत्युका वृत्तान्त सुनकर जनमेजयकी तक्षकसे बदला लेनेकी प्रतिज्ञा मन्त्रिण ऊचु. ततः स राजा राजेन्द्र स्कन्धे तस्य भुजड़मम् | मुने: क्षुतक्षाम आसज्य स्वपुरं पुनराययौ,मन्त्री बोले--राजेन्द्र! उस समय राजा परीक्षित् भूखसे पीड़ित हो शमीक मुनिके कंधेपर मृतक सर्प डालकर पुनः अपनी राजधानीमें लौट आये
ജനമേജയൻ പറഞ്ഞു—അനന്തരം ആ രാജാവ്, ഹേ രാജേന്ദ്ര, ക്ഷുധയാൽ ക്ഷീണിച്ച്, മുനിയുടെ തോളിൽ ഒരു മരിച്ച സർപ്പത്തെ വെച്ച്, വീണ്ടും തന്റെ നഗരത്തിലേക്ക് മടങ്ങി. മന്ത്രിമാർ പറഞ്ഞു—രാജേന്ദ്രാ! അന്ന് രാജാവ് പരീക്ഷിത് ക്ഷുധാപീഡിതനായി ശമീകമുനിയുടെ തോളിൽ മരിച്ച സർപ്പത്തെ വെച്ച് വീണ്ടും തന്റെ തലസ്ഥാനത്തിലേക്ക് പോയി.
Verse 2
था |] ऋषेस्तस्य तु पुत्रो5भूद् गवि जातो महायशा: । शृज्जी नाम महातेजास्तिग्मवीर्योडतिकोपन:,उन महर्षिके शृंगी नामक एक महातेजस्वी पुत्र था, जिसका जन्म गायके पेटसे हुआ वह महान् यशस्वी, तीव्र शक्तिशाली और अत्यन्त क्रोधी था
ആ ഋഷിക്ക് ഒരു പുത്രനുണ്ടായിരുന്നു; അവൻ പശുവിന്റെ ഗർഭത്തിൽ നിന്നു ജനിച്ച മഹായശസ്സുള്ളവൻ. അവന്റെ പേര് ശൃംഗി—മഹാതേജസ്സുള്ളവൻ, തീക്ഷ്ണവീര്യൻ, അത്യന്തം കോപപ്രവണൻ।
Verse 3
ब्रह्माणं समुपागम्य मुनि: पूजां चकार ह | सोअ&नुज्ञातस्ततस्तत्र शृद्धी शुश्राव तं तदा,एक दिन उसने आचार्यदेवके समीप जाकर पूजा की और उनकी आज्ञा ले वह घरको लौटा। उसी समय शृंगी ऋषिने अपने एक सहपाठी मित्रके मुखसे तुम्हारे पिताद्वारा अपने पिताके तिरस्कृत होनेकी बात सुनी। राजसिंह! शृंगीको यह मालूम हुआ कि मेरे पिता काठकी भाँति चुपचाप बैठे थे और उनके कंधेपर मृतक साँप डाल दिया गया। वे अब भी उस सर्पको अपने कंधेपर रखे हुए हैं। यद्यपि उन्होंने कोई अपराध नहीं किया था। वे मुनिश्रेष्ठ तपस्वी, जितेन्द्रिय, विशुद्धात्मा, कर्मनिष्ठ, अद्भुत शक्तिशाली, तपस्याद्वारा कान्तिमान् शरीरवाले, अपने अंगोंको संयममें रखनेवाले, सदाचारी, शुभवक्ता, निश्चल भावसे स्थित, लोभरहित, क्षुद्रताशून्य (गम्भीर), दोषदृष्टिसे रहित, वृद्ध, मौनव्रतावलम्बी तथा सम्पूर्ण प्राणियोंको आश्रय देनेवाले थे, तो भी आपके पिता परीक्षित्ने उनका तिरस्कार किया
ജനമേജയൻ പറഞ്ഞു—ഒരു ദിവസം അവൻ (ശൃംഗി) ആചാര്യദേവന്റെ സമീപം ചെന്നു പൂജ ചെയ്തു; അവിടെ അനുമതി ലഭിച്ച ഉടൻ തന്നെ, നിന്റെ പിതാവ് അവന്റെ പിതാവിനെ അപമാനിച്ചുവെന്ന വാർത്ത അപ്പോൾ തന്നെ അവൻ കേട്ടു. കുറ്റമറ്റ, മൗനവ്രതത്തിൽ നിലകൊണ്ട തപസ്വിയെ അവഗണിച്ച ആ പ്രവൃത്തിയാണ് പിന്നീടുള്ള മഹാവിപത്തിന്റേ വിത്തായത്।
Verse 4
सख्यु: सकाशात् पितरं पित्रा ते धर्षितं पुरा । मृतं सर्प समासक्तं स्थाणुभूतस्य तस्य तम्,एक दिन उसने आचार्यदेवके समीप जाकर पूजा की और उनकी आज्ञा ले वह घरको लौटा। उसी समय शृंगी ऋषिने अपने एक सहपाठी मित्रके मुखसे तुम्हारे पिताद्वारा अपने पिताके तिरस्कृत होनेकी बात सुनी। राजसिंह! शृंगीको यह मालूम हुआ कि मेरे पिता काठकी भाँति चुपचाप बैठे थे और उनके कंधेपर मृतक साँप डाल दिया गया। वे अब भी उस सर्पको अपने कंधेपर रखे हुए हैं। यद्यपि उन्होंने कोई अपराध नहीं किया था। वे मुनिश्रेष्ठ तपस्वी, जितेन्द्रिय, विशुद्धात्मा, कर्मनिष्ठ, अद्भुत शक्तिशाली, तपस्याद्वारा कान्तिमान् शरीरवाले, अपने अंगोंको संयममें रखनेवाले, सदाचारी, शुभवक्ता, निश्चल भावसे स्थित, लोभरहित, क्षुद्रताशून्य (गम्भीर), दोषदृष्टिसे रहित, वृद्ध, मौनव्रतावलम्बी तथा सम्पूर्ण प्राणियोंको आश्रय देनेवाले थे, तो भी आपके पिता परीक्षित्ने उनका तिरस्कार किया
ജനമേജയൻ പറഞ്ഞു—സഹപാഠിയായ സുഹൃത്തിൽ നിന്ന് ശൃംഗി കേട്ടു: പണ്ടേ നിന്റെ പിതാവ് അവന്റെ പിതാവിനെ അപമാനിച്ചിരുന്നു; കൂടാതെ ആ മുനി തൂണുപോലെ അനങ്ങാതെ ഇരിക്കുമ്പോൾ, അവന്റെ തോളിൽ ഒരു മരിച്ച സർപ്പത്തെ വെച്ചിരുന്നു—അവൻ യാതൊരു കുറ്റവും ചെയ്തിട്ടില്ലെങ്കിലും।
Verse 5
वहन्तं राजशार्दूल स्कन्धेनानपकारिणम् | तपस्विनमतीवाथ त॑ मुनिप्रवरं नूप,एक दिन उसने आचार्यदेवके समीप जाकर पूजा की और उनकी आज्ञा ले वह घरको लौटा। उसी समय शृंगी ऋषिने अपने एक सहपाठी मित्रके मुखसे तुम्हारे पिताद्वारा अपने पिताके तिरस्कृत होनेकी बात सुनी। राजसिंह! शृंगीको यह मालूम हुआ कि मेरे पिता काठकी भाँति चुपचाप बैठे थे और उनके कंधेपर मृतक साँप डाल दिया गया। वे अब भी उस सर्पको अपने कंधेपर रखे हुए हैं। यद्यपि उन्होंने कोई अपराध नहीं किया था। वे मुनिश्रेष्ठ तपस्वी, जितेन्द्रिय, विशुद्धात्मा, कर्मनिष्ठ, अद्भुत शक्तिशाली, तपस्याद्वारा कान्तिमान् शरीरवाले, अपने अंगोंको संयममें रखनेवाले, सदाचारी, शुभवक्ता, निश्चल भावसे स्थित, लोभरहित, क्षुद्रताशून्य (गम्भीर), दोषदृष्टिसे रहित, वृद्ध, मौनव्रतावलम्बी तथा सम्पूर्ण प्राणियोंको आश्रय देनेवाले थे, तो भी आपके पिता परीक्षित्ने उनका तिरस्कार किया
ജനമേജയൻ പറഞ്ഞു—രാജശാർദൂലാ, രാജേന്ദ്രാ! ആ മുനിപ്രവരൻ കുറ്റമില്ലാതെയും തോളിൽ ഹാനിയില്ലാത്ത ഒരു ജീവിയെ വഹിച്ചുകൊണ്ടിരിക്കെ, മൗന-സമാധിയിൽ നിലകൊണ്ടിരുന്ന ആ മുനിശ്രേഷ്ഠ തപസ്വിയെ നിന്റെ പിതാവ് പരീക്ശിത് അപമാനിച്ചു; അവന്റെ തോളിൽ ഒരു മരിച്ച പാമ്പിനെ വെച്ചു.
Verse 6
जितेन्द्रियं विशुद्धं च स्थितं कर्मण्यथाद्भुतम् । तपसा द्योतितात्मान स्वेष्वड्रेषु यतं तदा,एक दिन उसने आचार्यदेवके समीप जाकर पूजा की और उनकी आज्ञा ले वह घरको लौटा। उसी समय शृंगी ऋषिने अपने एक सहपाठी मित्रके मुखसे तुम्हारे पिताद्वारा अपने पिताके तिरस्कृत होनेकी बात सुनी। राजसिंह! शृंगीको यह मालूम हुआ कि मेरे पिता काठकी भाँति चुपचाप बैठे थे और उनके कंधेपर मृतक साँप डाल दिया गया। वे अब भी उस सर्पको अपने कंधेपर रखे हुए हैं। यद्यपि उन्होंने कोई अपराध नहीं किया था। वे मुनिश्रेष्ठ तपस्वी, जितेन्द्रिय, विशुद्धात्मा, कर्मनिष्ठ, अद्भुत शक्तिशाली, तपस्याद्वारा कान्तिमान् शरीरवाले, अपने अंगोंको संयममें रखनेवाले, सदाचारी, शुभवक्ता, निश्चल भावसे स्थित, लोभरहित, क्षुद्रताशून्य (गम्भीर), दोषदृष्टिसे रहित, वृद्ध, मौनव्रतावलम्बी तथा सम्पूर्ण प्राणियोंको आश्रय देनेवाले थे, तो भी आपके पिता परीक्षित्ने उनका तिरस्कार किया
അപ്പോൾ അദ്ദേഹം ജിതേന്ദ്രിയനും വിശുദ്ധനും ആയിരുന്നു; നിയതകർമ്മത്തിൽ അചഞ്ചലനായി, അത്ഭുത തേജസ്സോടെ നിലകൊണ്ടു. തപസ്സാൽ അദ്ദേഹത്തിന്റെ അന്തഃസത്ത ദീപ്തമായിരുന്നു; അവയവങ്ങൾ ശാസന-സംയമത്തിൽ അധീനമായിരുന്നു.
Verse 7
शुभाचारं शुभकथं सुस्थितं तमलोलुपम् । अक्षुद्रमनसूयं च वृद्ध मौनव्रते स्थितम् । शरण्यं सर्वभूतानां पित्रा विनिकृतं तव,एक दिन उसने आचार्यदेवके समीप जाकर पूजा की और उनकी आज्ञा ले वह घरको लौटा। उसी समय शृंगी ऋषिने अपने एक सहपाठी मित्रके मुखसे तुम्हारे पिताद्वारा अपने पिताके तिरस्कृत होनेकी बात सुनी। राजसिंह! शृंगीको यह मालूम हुआ कि मेरे पिता काठकी भाँति चुपचाप बैठे थे और उनके कंधेपर मृतक साँप डाल दिया गया। वे अब भी उस सर्पको अपने कंधेपर रखे हुए हैं। यद्यपि उन्होंने कोई अपराध नहीं किया था। वे मुनिश्रेष्ठ तपस्वी, जितेन्द्रिय, विशुद्धात्मा, कर्मनिष्ठ, अद्भुत शक्तिशाली, तपस्याद्वारा कान्तिमान् शरीरवाले, अपने अंगोंको संयममें रखनेवाले, सदाचारी, शुभवक्ता, निश्चल भावसे स्थित, लोभरहित, क्षुद्रताशून्य (गम्भीर), दोषदृष्टिसे रहित, वृद्ध, मौनव्रतावलम्बी तथा सम्पूर्ण प्राणियोंको आश्रय देनेवाले थे, तो भी आपके पिता परीक्षित्ने उनका तिरस्कार किया
അദ്ദേഹം ശുഭാചാരനും ശുഭവക്താവും, ആത്മസ്ഥൈര്യത്തിൽ ഉറച്ചവനും ലാഭലോഭരഹിതനും ആയിരുന്നു; ക്ഷുദ്രതയില്ലാത്തവനും ദോഷാന്വേഷണമില്ലാത്തവനും അസൂയാരഹിതനും; വൃദ്ധനായി മൗനവ്രതത്തിൽ സ്ഥാപിതനും; സർവ്വഭൂതങ്ങൾക്കും ശരണ്യനും—എന്നിട്ടും നിന്റെ പിതാവ് അദ്ദേഹത്തോട് അന്യായം ചെയ്തു.
Verse 8
शशापाथ महातेजा: पितरं ते रुषान्वित: । ऋषे: पुत्रो महातेजा बालोडपि स्थविरण्युति:,यह सब जानकर वह बाल्यावस्थामें भी वृद्धोंका-सा तेज धारण करनेवाला महातेजस्वी ऋषिकुमार क्रोधसे आगबबूला हो उठा और उसने तुम्हारे पिताको शाप दे दिया
ഇതെല്ലാം അറിഞ്ഞപ്പോൾ മഹാതേജസ്സുള്ള ഋഷിപുത്രൻ ക്രോധത്തിൽ ജ്വലിച്ചു; ബാലനായിരുന്നാലും വൃദ്ധന്റെ ദ്യുതിയുള്ള ആ ഋഷികുമാരൻ നിന്റെ പിതാവിനെ ശപിച്ചു.
Verse 9
स क्षिप्रमुदकं स्पृष्टवा रोषादिदमुवाच ह । पितरं तेडभिसंधाय तेजसा प्रज्वलन्निव
അവൻ ഉടൻ ജലം സ്പർശിച്ച് (വിധിപ്രകാരം) ക്രോധത്തോടെ ഈ വാക്കുകൾ പറഞ്ഞു. നിന്റെ പിതാവിനെ ലക്ഷ്യമാക്കി, തേജസ്സാൽ അഗ്നിപോലെ ജ്വലിക്കുന്നവനായി തോന്നി.
Verse 10
अनागसि गुरौ यो मे मृतं सर्पमवासृजत् । त॑ नागस्तक्षकः क्रुद्धस्तेजसा प्रदहिष्यति
ജനമേജയൻ പറഞ്ഞു— “നിരപരാധിയായിട്ടും എന്റെ പൂജ്യഗുരുവിന്റെ മേൽ മരിച്ച പാമ്പിനെ എറിഞ്ഞവനെ, ക്രുദ്ധനായ തക്ഷകനാഗൻ തന്റെ ദഹനതേജസ്സാൽ ചാരമാക്കും.”
Verse 11
आशीविषस्तिग्मतेजा मद्वाक्यबलचोदित: । सप्तरात्रादित: पापं पश्य मे तपसो बलम्
ജനമേജയൻ പറഞ്ഞു— “മൂർച്ചയുള്ള തേജസ്സുള്ള ആ വിഷസർപ്പം എന്റെ വാക്കിന്റെ ബലത്തിൽ പ്രേരിതനായി ഏഴ് രാത്രികൾക്കകം ആ പാപിയെ ഇവിടെ എത്തിക്കും. കാണുക—എന്റെ തപസ്സിന്റെ ശക്തി!”
Verse 12
शंंगी तेजसे प्रज्यलित-सा हो रहा था। उसने शीघ्र ही हाथमें जल लेकर तुम्हारे पिताको लक्ष्य करके रोषपूर्वक यह बात कही--'जिसने मेरे निरपराध पितापर मरा साँप डाल दिया है, उस पापीको आजसे सात रातके बाद मेरी वाक॒शक्तिसे प्रेरित प्रचण्ड तेजस्वी विषधर तक्षक नाग कुपित हो अपनी विषाग्निसे जला देगा। देखो, मेरी तपस्याका बल” || ९-- ११ || इत्युक्त्वा प्रययौ तत्र पिता यत्रास्य सो5भवत् | दृष्टवा च पितरं तस्मै तं शापं प्रत्यवेदयत्,ऐसा कहकर वह बालक उस स्थानपर गया, जहाँ उसके पिता बैठे थे। पिताको देखकर उसने राजाको शाप देनेकी बात बतायी
ഇങ്ങനെ പറഞ്ഞിട്ട് ആ ബാലൻ വേഗത്തിൽ തന്റെ പിതാവ് ഇരുന്ന സ്ഥലത്തേക്ക് പോയി. പിതാവിനെ കണ്ട ഉടൻ, രാജാവിനോട് താൻ ഉച്ചരിച്ച ശാപം അറിയിച്ചു—എന്റെ വാക്കിന്റെ ബലത്തിൽ പ്രേരിതനായി, ക്രുദ്ധനും പ്രഖരതേജസ്സുള്ളവനുമായ വിഷധരൻ തക്ഷകനാഗൻ ഏഴ് രാത്രികൾക്കുശേഷം രാജാവിനെ വിഷാഗ്നിയാൽ ദഹിപ്പിക്കും എന്ന്; കൂടാതെ തന്റെ തപസ്സിന്റെ ശക്തിയും അവൻ പ്രസ്താവിച്ചു.
Verse 13
स चापि मुनिशार्दूल: प्रेषषामास ते पितु: । शिष्यं गौरमुखं नाम शीलवन्तं गुणान्वितम्,तब मुनिश्रेष्ठ शमीकने तुम्हारे पिताके पास अपने शिष्य गौरमुखको भेजा, जो सुशील और गुणवान् था। उसने विश्राम कर लेनेपर राजासे सब बातें बतायीं और महर्षिका संदेश इस प्रकार सुनाया--“'भूपाल! मेरे पुत्रने तुम्हें शाप दे दिया है; अतः सावधान हो जाओ
ആ മുനിശാർദൂലനും നിങ്ങളുടെ പിതാവിന്റെ അടുക്കൽ ‘ഗൗരമുഖൻ’ എന്ന പേരുള്ള തന്റെ ശിഷ്യനെ അയച്ചു—ശീലവാനും ഗുണസമ്പന്നനുമായവനെ.
Verse 14
आचख्यौ स च विश्रान्तो राज्ञ: सर्वमशेषत: । शप्तोडसि मम पुत्रेण यत्तो भव महीपते,तब मुनिश्रेष्ठ शमीकने तुम्हारे पिताके पास अपने शिष्य गौरमुखको भेजा, जो सुशील और गुणवान् था। उसने विश्राम कर लेनेपर राजासे सब बातें बतायीं और महर्षिका संदेश इस प्रकार सुनाया--“'भूपाल! मेरे पुत्रने तुम्हें शाप दे दिया है; अतः सावधान हो जाओ
വിശ്രമിച്ച ശേഷം അവൻ രാജാവിനോട് എല്ലാം പൂർണ്ണമായി അറിയിച്ചു; പിന്നെ മുനിയുടെ സന്ദേശം പറഞ്ഞു—“ഹേ മഹീപതേ! എന്റെ പുത്രൻ നിങ്ങളെ ശപിച്ചിരിക്കുന്നു; അതിനാൽ സംയമത്തോടെ ജാഗ്രത പാലിക്കൂ.”
Verse 15
तक्षकस्त्वां महाराज तेजसासौ दहिष्यति । श्रुत्वा च तद् वचो घोरं पिता ते जनमेजय,“महाराज! (सात दिनके बाद) तक्षक नाग तुम्हें अपने तेजसे जला देगा।” जनमेजय! यह भयंकर बात सुनकर तुम्हारे पिता नागश्रेष्ठ तक्षकसे अत्यन्त भयभीत हो सतत सावधान रहने लगे। तदनन्तर जब सातवाँ दिन उपस्थित हुआ, तब उस दिन ब्रह्मर्षि काश्यपने राजाके समीप जानेका विचार किया। मार्गमें नागराज तक्षकने उस समय काश्यपको देखा
“മഹാരാജാ! തക്ഷകൻ തന്റെ തേജസ്സാൽ നിന്നെ ദഹിപ്പിക്കും.” ഈ ഭയാനക വാക്കുകൾ കേട്ടപ്പോൾ, ജനമേജയാ, നിന്റെ പിതാവ് നാഗശ്രേഷ്ഠനായ തക്ഷകനെ അത്യന്തം ഭയപ്പെട്ടു നിരന്തരം ജാഗ്രത പാലിച്ചു. തുടർന്ന് ഏഴാം ദിവസം എത്തിയപ്പോൾ, ആ ദിവസം ബ്രഹ്മർഷി കാശ്യപൻ രാജാവിന്റെ അടുക്കൽ പോകാൻ തീരുമാനിച്ചു; വഴിയിൽ അന്നേരം നാഗരാജൻ തക്ഷകൻ കാശ്യപനെ കണ്ടു.
Verse 16
यत्तो5भवत् परित्रस्तस्तक्षकात् पन्नगोत्तमात् | ततस्तस्मिंस्तु दिवसे सप्तमे समुपस्थिते,“महाराज! (सात दिनके बाद) तक्षक नाग तुम्हें अपने तेजसे जला देगा।” जनमेजय! यह भयंकर बात सुनकर तुम्हारे पिता नागश्रेष्ठ तक्षकसे अत्यन्त भयभीत हो सतत सावधान रहने लगे। तदनन्तर जब सातवाँ दिन उपस्थित हुआ, तब उस दिन ब्रह्मर्षि काश्यपने राजाके समीप जानेका विचार किया। मार्गमें नागराज तक्षकने उस समय काश्यपको देखा
ജനമേജയൻ പറഞ്ഞു—നാഗശ്രേഷ്ഠനായ തക്ഷകനെ ഭയന്ന് അവൻ വിറച്ച നിമിഷം മുതൽ തന്നെ അവൻ നിരന്തരം ജാഗ്രതയിൽ ആയിരുന്നു. തുടർന്ന് ഏഴാം ദിവസം എത്തിയപ്പോൾ—തക്ഷകന്റെ തേജസ്സാൽ ദഹിച്ച് മരണം സംഭവിക്കുമെന്നു മുൻകൂട്ടി പറഞ്ഞിരുന്ന അതേ ദിവസം—സംഭവങ്ങൾ വിധിയുടെ പര്യവസാനത്തിലേക്ക് നീങ്ങിത്തുടങ്ങി.
Verse 17
राज्ञ: समीप ब्रद्यर्षि: काश्यपो गन्तुमैच्छत । त॑ ददर्शाथ नागेन्द्रस्तक्षक: काश्यपं तदा,“महाराज! (सात दिनके बाद) तक्षक नाग तुम्हें अपने तेजसे जला देगा।” जनमेजय! यह भयंकर बात सुनकर तुम्हारे पिता नागश्रेष्ठ तक्षकसे अत्यन्त भयभीत हो सतत सावधान रहने लगे। तदनन्तर जब सातवाँ दिन उपस्थित हुआ, तब उस दिन ब्रह्मर्षि काश्यपने राजाके समीप जानेका विचार किया। मार्गमें नागराज तक्षकने उस समय काश्यपको देखा
ജനമേജയൻ പറഞ്ഞു—ബ്രഹ്മർഷി കാശ്യപൻ രാജാവിന്റെ സന്നിധിയിലേക്കു പോകാൻ ആഗ്രഹിച്ചു. അപ്പോൾ വഴിയിൽ നാഗേന്ദ്രൻ തക്ഷകൻ ആ സമയത്ത് കാശ്യപനെ കണ്ടു. (ഇതിനിടയിൽ പരിഷ്കിത് രാജാവ് ഭയാനക പ്രവചനമറിഞ്ഞ് നിരന്തരം ജാഗ്രത പാലിച്ചു; ഏഴാം ദിവസം കാശ്യപൻ രക്ഷാർത്ഥം പുറപ്പെട്ടപ്പോൾ തക്ഷകൻ ഇടയിൽ തടഞ്ഞു.)
Verse 18
तमब्रवीत् पन्नगेन्द्र: काश्यपं त्वरितं द्विजम् । क्व भवांस्त्वरितो याति कि च कार्य चिकीर्षति १८ ।। विप्रवर काश्यप बड़ी उतावलीसे पैर बढ़ा रहे थे। उन्हें देखकर नागराजने (ब्राह्मणका वेष धारण करके) इस प्रकार पूछा--'द्विजश्रेष्ठ आप कहाँ इतनी तीव्र गतिसे जा रहे हैं और कौन-सा कार्य करना चाहते हैं?”
വേഗത്തിൽ മുന്നേറുന്ന ദ്വിജശ്രേഷ്ഠൻ കാശ്യപനെ കണ്ട നാഗരാജൻ പറഞ്ഞു—“ഭവാൻ ഇത്ര വേഗത്തിൽ എവിടേക്കാണ് പോകുന്നത്? ഏതു കാര്യം ചെയ്യുവാൻ ഉദ്ദേശിക്കുന്നു?”
Verse 19
काश्यप उवाच यत्र राजा कुरुश्रेष्ठ: परिक्षिन्नाम वै द्विज । तक्षकेण भुजड़्ेन धक्ष्यते किल सोउद्य वै,काश्यपने कहा--ब्रह्मन! मैं वहाँ जाता हूँ जहाँ कुरुकुलके श्रेष्ठ राजा परीक्षित् रहते हैं। सुना है कि आज ही तक्षक नाग उन्हें डँसेगा। अतः मैं तत्काल ही उन्हें नीरोग करनेके लिये जल्दी-जल्दी वहाँ जा रहा हूँ। मेरे द्वारा सुरक्षित नरेशको वह सर्प नष्ट नहीं कर सकेगा
കാശ്യപൻ പറഞ്ഞു—“ഹേ ബ്രാഹ്മണാ, കുരുശ്രേഷ്ഠനായ രാജാവ് പരിഷ്കിത് വസിക്കുന്നിടത്തേക്കാണ് ഞാൻ പോകുന്നത്. ഇന്ന് തന്നെ തക്ഷക സർപ്പം അവനെ ദംശിക്കുമെന്നു കേട്ടിരിക്കുന്നു. അതുകൊണ്ട് അവനെ നിരാമയനാക്കാൻ ഞാൻ ഉടൻ അവിടേക്ക് വേഗം പോകുന്നു; എന്റെ സംരക്ഷണത്തിൽ ഉള്ള നൃപതിയെ ആ സർപ്പം നശിപ്പിക്കാൻ കഴിയുകയില്ല.”
Verse 20
गच्छाम्यहं तं त्वरित: सद्य: कर्तुमपज्वरम् । मयाभिपन्नं तं चापि न सर्पो धर्षयिष्यति,काश्यपने कहा--ब्रह्मन! मैं वहाँ जाता हूँ जहाँ कुरुकुलके श्रेष्ठ राजा परीक्षित् रहते हैं। सुना है कि आज ही तक्षक नाग उन्हें डँसेगा। अतः मैं तत्काल ही उन्हें नीरोग करनेके लिये जल्दी-जल्दी वहाँ जा रहा हूँ। मेरे द्वारा सुरक्षित नरेशको वह सर्प नष्ट नहीं कर सकेगा
കാശ്യപൻ പറഞ്ഞു—“ഞാൻ ഉടൻ തന്നെ അതിവേഗം അവന്റെ അടുക്കൽ ചെന്നു, വിഷജ്വരത്തിൽ നിന്ന് അവനെ ക്ഷണത്തിൽ മോചിപ്പിക്കും. അവൻ എന്റെ സംരക്ഷണത്തിൽ വന്നാൽ, ഒരു സർപ്പത്തിനും അവനെ കീഴടക്കാൻ കഴിയില്ല.”
Verse 21
तक्षक उवाच किमर्थ तं मया दष्टं संजीवयितुमिच्छसि । अहं स तक्षको ब्रह्मन् पश्य मे वीर्यमद्भुतम्,तक्षकने कहा--ब्रह्मन! मेरे डँसे हुए मनुष्यको जिलानेकी इच्छा आप कैसे रखते हैं। मैं ही वह तक्षक हूँ। मेरी अद्भुत शक्ति देखिये। मेरे डँस लेनेपर उस राजाको आप जीवित नहीं कर सकते। ऐसा कहकर तक्षकने एक वृक्षको डँस लिया
തക്ഷകൻ പറഞ്ഞു—“ബ്രാഹ്മണാ! ഞാൻ കടിച്ച മനുഷ്യനെ ജീവിപ്പിക്കാൻ നീ എന്തിന് ആഗ്രഹിക്കുന്നു? ഞാൻ തന്നെയാണ് തക്ഷകൻ—എന്റെ അത്ഭുതശക്തി കാണുക.”
Verse 22
न शक्तस्त्वं मया दष्ट॑ त॑ं संजीवयितुं नृपम् । इत्युक्त्वा तक्षकस्तत्र सोडदशद् वै वनस्पतिम्,तक्षकने कहा--ब्रह्मन! मेरे डँसे हुए मनुष्यको जिलानेकी इच्छा आप कैसे रखते हैं। मैं ही वह तक्षक हूँ। मेरी अद्भुत शक्ति देखिये। मेरे डँस लेनेपर उस राजाको आप जीवित नहीं कर सकते। ऐसा कहकर तक्षकने एक वृक्षको डँस लिया
തക്ഷകൻ പറഞ്ഞു—“ഞാൻ കടിച്ച ആ രാജാവിനെ നീ ജീവിപ്പിക്കാൻ കഴിയില്ല.” ഇങ്ങനെ പറഞ്ഞിട്ട് തക്ഷകൻ അവിടെത്തന്നെ ഒരു വൃക്ഷത്തെ കടിച്ചു.
Verse 23
स दष्टमात्रो नागेन भस्मी भूतो 5 भवन्नग: । काश्यपश्च ततो राजन्नजीवयत त॑ नगम्,नागके डँसते ही वह वृक्ष जलकर भस्म हो गया। राजन! तदनन्तर काश्यपने (अपनी मन्त्र-विद्याके बलसे) उस वृक्षको पूर्ववत् जीवित (हरा-भरा) कर दिया
സർപ്പം കടിച്ച മാത്രയിൽ ആ വൃക്ഷം കത്തിപ്പൊള്ളി ചാരമായി. പിന്നെ, രാജാവേ, കാശ്യപൻ മന്ത്രവിദ്യയുടെ ബലത്തോടെ അതേ വൃക്ഷത്തെ വീണ്ടും ജീവിപ്പിച്ചു.
Verse 24
ततस्तं लोभयामास काम ब्रूहीति तक्षक: । स एवमुक्तस्तं प्राह काश्यपस्तक्षकं पुन:,अब तक्षक काश्यपको प्रलोभन देने लगा। उसने कहा--'तुम्हारी जो इच्छा हो, मुझसे माँग लो।” तक्षकके ऐसा कहनेपर काश्यपने उससे कहा--'मैं तो वहाँ धनकी इच्छासे जा रहा हूँ! उनके ऐसा कहनेपर तक्षकने महात्मा काश्यपसे मधुर वाणीमें कहा --
അപ്പോൾ തക്ഷകൻ അവനെ പ്രലോഭിപ്പിച്ചു: “നിനക്കിഷ്ടമുള്ളത് പറയുക.” ഇങ്ങനെ പറഞ്ഞപ്പോൾ കാശ്യപൻ തക്ഷകനോട് വീണ്ടും മറുപടി പറഞ്ഞു.
Verse 25
धनलिप्सुरहं तत्र यामीत्युक्तश्व तेन सः । तमुवाच महात्मानं तक्षक: श्लक्षणया गिरा,अब तक्षक काश्यपको प्रलोभन देने लगा। उसने कहा--'तुम्हारी जो इच्छा हो, मुझसे माँग लो।” तक्षकके ऐसा कहनेपर काश्यपने उससे कहा--'मैं तो वहाँ धनकी इच्छासे जा रहा हूँ! उनके ऐसा कहनेपर तक्षकने महात्मा काश्यपसे मधुर वाणीमें कहा --
കാശ്യപൻ പറഞ്ഞു—“ധനലാഭത്തിന്റെ ആഗ്രഹത്താൽ ഞാൻ അവിടേക്ക് പോകുന്നു.” അത് കേട്ട് തക്ഷകൻ മഹാത്മാവായ കാശ്യപനോട് മൃദുവും മധുരവുമായ വാക്കുകളാൽ പ്രലോഭിപ്പിച്ച്—“നിനക്കിഷ്ടമുള്ളത് എനിക്കോട് ചോദിക്ക” എന്നു പറഞ്ഞു.
Verse 26
यावद्धनं प्रार्थयसे राज्ञस्तस्मात् ततो5धिकम् । गृहाण मत्त एव त्वं संनिवर्तस्व चानघ,“अनघ! तुम राजासे जितना धन पाना चाहते हो, उससे भी अधिक मुझसे ही ले लो और लौट जाओ'
“അനഘാ! രാജാവിൽ നിന്ന് നീ എത്ര ധനം ആഗ്രഹിക്കുന്നുവോ, അതിലും അധികം എനിക്കിൽ നിന്നുതന്നെ സ്വീകരിക്ക; എനിക്കിൽ നിന്നുമാത്രം വാങ്ങി മടങ്ങിപ്പോ.”
Verse 27
स एवमुक्तो नागेन काश्यपो द्विपदां वर: | लब्ध्वा वित्त निववृते तक्षकाद् यावदीप्सितम्,तक्षक नागकी यह बात सुनकर मनुष्योंमें श्रेष्ठ काश्यप उससे इच्छानुसार धन लेकर लौट गये
നാഗൻ ഇങ്ങനെ പറഞ്ഞപ്പോൾ, ദ്വിപദങ്ങളിൽ ശ്രേഷ്ഠനായ കാശ്യപൻ തക്ഷകനിൽ നിന്ന് തനിക്കിഷ്ടമായത്ര ധനം നേടി മടങ്ങി.
Verse 28
तस्मिन् प्रतिगते विप्रे छद्मनोपेत्य तक्षक: । त॑ नृपं नृपतिश्रेष्ठ पितरं धार्मिक तव,ब्राह्मणके चले जानेपर तक्षकने छलसे भूपालोंमें श्रेष्ठ तुम्हारे धर्मात्मा पिता राजा परीक्षितके पास पहुँचकर, यद्यपि वे महलमें सावधानीके साथ रहते थे, तो भी उन्हें अपनी विषाग्निसे भस्म कर दिया। नरश्रेष्ठ] तदनन्तर विजयकी प्राप्तिके लिये तुम्हारा राजाके पदपर अभिषेक किया गया
ബ്രാഹ്മണൻ മടങ്ങിപ്പോയ ശേഷം, തക്ഷകൻ വേഷം മാറി വന്ന്, നൃപതികളിൽ ശ്രേഷ്ഠനും ധർമ്മനിഷ്ഠനുമായ നിന്റെ പിതാവ് പരീക്ഷിത് രാജാവിന്റെ അടുക്കൽ എത്തി, വഞ്ചനയാൽ തന്റെ വിഷാഗ്നിയാൽ അവനെ ഭസ്മമാക്കി.
Verse 29
प्रासादस्थं यत्तमपि दग्धवान् विषवद्लिना । ततस्त्वं पुरुषव्याप्र विजयायाभिषेचित:,ब्राह्मणके चले जानेपर तक्षकने छलसे भूपालोंमें श्रेष्ठ तुम्हारे धर्मात्मा पिता राजा परीक्षितके पास पहुँचकर, यद्यपि वे महलमें सावधानीके साथ रहते थे, तो भी उन्हें अपनी विषाग्निसे भस्म कर दिया। नरश्रेष्ठ] तदनन्तर विजयकी प्राप्तिके लिये तुम्हारा राजाके पदपर अभिषेक किया गया
“അവൻ പ്രാസാദത്തിനകത്ത് കാവലോടെ ഇരുന്നിട്ടും, ഞാൻ എന്റെ വിഷാഗ്നിയാൽ അവനെ ഭസ്മമാക്കി. പിന്നെ, പുരുഷവ്യാഘ്രാ, വിജയംയും രാജ്യസ്ഥൈര്യവും ലഭിക്കേണ്ടതിന് നിന്നെ രാജപദത്തിൽ അഭിഷേകം ചെയ്തു.”
Verse 30
एतद् दृष्ट श्रुतं चापि यथावन्नपसत्तम । अस्माभिननिखिलं सर्व कथितं तेडतिदारुणम्,नृपश्रेष्ठ! यद्यपि यह प्रसंग बड़ा ही निछ्ठर और दुःखदायक है, तथापि तुम्हारे पूछनेसे हमने सब बातें तुमसे कही हैं। यह सब कुछ हमने अपनी आँखों देखा और कानोंसे भी ठीक-ठीक सुना है
നൃപശ്രേഷ്ഠാ! ഈ വൃത്താന്തം അത്യന്തം കഠിനവും ദുഃഖകരവും ആണെങ്കിലും, നീ ചോദിച്ചതിനാൽ ഞങ്ങൾ ഒന്നും മറച്ചുവെക്കാതെ എല്ലാം യഥാവത്തായി പറഞ്ഞു—ഞങ്ങൾ കണ്ണാൽ കണ്ടതും ചെവിയാൽ ശരിയായി കേട്ടതും മുഴുവനായി।
Verse 31
श्र॒ुत्वा चैनं नरश्रेष्ठ पार्थिवस्थ पराभवम् | अस्य चर्षेरुतंकस्य विधत्स्व यदनन्तरम्,महाराज! इस प्रकार तक्षकने तुम्हारे पिता राजा परीक्षित्का तिरस्कार किया है। इन महर्षि उत्तंकको भी उसने बहुत तंग किया है। यह सब तुमने सुन लिया, अब तुम जैसा उचित समझो, करो
മഹാരാജാ, നരശ്രേഷ്ഠാ! ഭൂമിയിൽ ഉണ്ടായിരിക്കെ നിന്റെ പിതാവായ രാജാ പരീക്ഷിത്തിന് സംഭവിച്ച ഈ അപമാനവും, മഹർഷി ഉതങ്കനോട് ചെയ്ത പീഡനവും നീ കേട്ടറിഞ്ഞു. ഇനി എന്താണ് യുക്തവും ധർമ്മ്യവും എന്ന് നിശ്ചയിച്ച് അതനുസരിച്ച് പ്രവർത്തിക്കു।
Verse 32
सौतिरु्वाच एतस्मिन्नेव काले तु स राजा जनमेजय: । उवाच मन्त्रिण: सर्वानिदं वाक्यमरिन्दम:,उग्रश्रवाजी कहते हैं--शौनक! उस समय शत्रुओंका दमन करनेवाले राजा जनमेजय अपने सम्पूर्ण मन्त्रियोंसे इस प्रकार बोले
സൗതി പറഞ്ഞു—ശൗനകാ! അതേ സമയത്ത് ശത്രുദമനനായി പ്രസിദ്ധനായ രാജാ ജനമേജയൻ തന്റെ എല്ലാ മന്ത്രിമാരോടും ഇങ്ങനെ പറഞ്ഞു।
Verse 33
जनमेजय उवाच अथ तत् कथितं केन यद् वृत्तं तद् वनस्पतौ | आश्चर्यभूतं लोकस्य भस्मराशीकृतं तदा,जनमेजयने कहा--उस वृक्षके डँसे जाने और फिर हरे होनेकी बात आपलोगोंसे किसने कही? उस समय तक्षकके काटनेसे जो वृक्ष राखका ढेर बन गया था, उसे काश्यपने पुनः जिलाकर हरा-भरा कर दिया। यह सब लोगोंके लिये बड़े आश्वर्यकी बात है। यदि काश्यपके आ जानेसे उनके मन्त्रोंद्वारा तक्षकका विष नष्ट कर दिया जाता तो निश्चय ही मेरे पिताजी बच जाते
ജനമേജയൻ പറഞ്ഞു—തക്ഷകന്റെ ദംശത്തിൽ അന്ന് ചാരക്കൂമ്പാരമായ ആ വൃക്ഷത്തെ കാശ്യപൻ വീണ്ടും ജീവിപ്പിച്ച് പച്ചപ്പാക്കി എന്ന ഈ അത്ഭുതവൃത്താന്തം നിങ്ങളോട് ആരാണ് പറഞ്ഞത്? കാശ്യപൻ സമയത്ത് എത്തി തന്റെ മന്ത്രങ്ങളാൽ തക്ഷകവിഷം നശിപ്പിച്ചിരുന്നെങ്കിൽ, തീർച്ചയായും എന്റെ പിതാവ് മരിക്കുമായിരുന്നില്ല।
Verse 34
यद् वृक्षं जीवयामास काश्यपस्तक्षकेण वै | नूनं मन्त्रहतविषो न प्रणश्येत काश्यपात्,जनमेजयने कहा--उस वृक्षके डँसे जाने और फिर हरे होनेकी बात आपलोगोंसे किसने कही? उस समय तक्षकके काटनेसे जो वृक्ष राखका ढेर बन गया था, उसे काश्यपने पुनः जिलाकर हरा-भरा कर दिया। यह सब लोगोंके लिये बड़े आश्वर्यकी बात है। यदि काश्यपके आ जानेसे उनके मन्त्रोंद्वारा तक्षकका विष नष्ट कर दिया जाता तो निश्चय ही मेरे पिताजी बच जाते
ജനമേജയൻ പറഞ്ഞു—തക്ഷകന്റെ ദംശത്തിൽ ചാരമായ വൃക്ഷത്തെ കാശ്യപൻ ജീവിപ്പിച്ചു; അതിനാൽ കാശ്യപന്റെ മന്ത്രങ്ങളാൽ തക്ഷകവിഷം തീർച്ചയായും നശിപ്പിക്കാമായിരുന്നു. അദ്ദേഹം സമയത്ത് എത്തിയിരുന്നെങ്കിൽ, എന്റെ പിതാവ് നശിക്കുമായിരുന്നില്ല।
Verse 35
चिन्तयामास पापात्मा मनसा पन्नगाधम: । दष्टं यदि मया विप्र: पार्थिवं जीवयिष्यति,परंतु उस पापात्मा नीच सर्पने अपने मनमें यह सोचा होगा--“यदि मेरे डँसे हुए राजाको ब्राह्मण जिला देंगे तो लोग कहेंगे कि तक्षकका विष भी नष्ट हो गया। इस प्रकार तक्षक लोकमें उपहासका पात्र बन जायगा।” अवश्य ही ऐसा सोचकर उसने ब्राह्मणको धनके द्वारा संतुष्ट किया था
ജനമേജയൻ പറഞ്ഞു—ആ പാപാത്മാവായ നീച സർപ്പം മനസ്സിൽ ഇങ്ങനെ ചിന്തിച്ചു—“ഞാൻ കടിച്ച രാജാവിനെ ഈ ബ്രാഹ്മണൻ ജീവിപ്പിച്ചാൽ, ജനങ്ങൾ ‘തക്ഷകന്റെ വിഷവും നിർവീര്യമായി’ എന്നു പറയും; അപ്പോൾ തക്ഷകൻ ലോകത്തിൽ പരിഹാസപാത്രമാകും.” എന്ന് കരുതി, ധർമ്മത്തേക്കാൾ മാന-പ്രതിഷ്ഠയെ വലുതാക്കി, ധനംകൊണ്ട് ബ്രാഹ്മണനെ തൃപ്തിപ്പെടുത്തി.
Verse 36
तक्षकः संहतविषो लोके यास्यति हास्यताम् | विचिन्त्यैवं कृता तेन ध्रुवं तुश्टिरद्धिजस्य वै,परंतु उस पापात्मा नीच सर्पने अपने मनमें यह सोचा होगा--“यदि मेरे डँसे हुए राजाको ब्राह्मण जिला देंगे तो लोग कहेंगे कि तक्षकका विष भी नष्ट हो गया। इस प्रकार तक्षक लोकमें उपहासका पात्र बन जायगा।” अवश्य ही ऐसा सोचकर उसने ब्राह्मणको धनके द्वारा संतुष्ट किया था
ജനമേജയൻ പറഞ്ഞു—“തക്ഷകന്റെ വിഷം നിർവീര്യമാകുകയാണെങ്കിൽ, അവൻ ലോകത്തിൽ പരിഹാസപാത്രമാകും.” എന്ന് ചിന്തിച്ച്, അവൻ ധനംകൊണ്ട് തന്നെ ആ ബ്രാഹ്മണനെ തീർച്ചയായും തൃപ്തിപ്പെടുത്തി.
Verse 37
480 पक यस्य दास्यामि यातनाम् | एकं तु 4 तद् वृत्तं निर्जने वने,अच्छा, भविष्यमें प्रयत्नपूर्वक कोई-न-कोई उपाय करके तक्षकको इसके लिये दण्ड दूँगा। परंतु एक बात मैं सुनना चाहता हूँ। नागराज तक्षक और काश्यप ब्राह्मणका वह संवाद तो निर्जन वनमें हुआ होगा। यह सब वृत्तान्त किसने देखा और सुना था? आपलोगोंतक यह बात कैसे आयी? यह सब सुनकर मैं सर्पोके नाशका विचार करूँगा
ജനമേജയൻ പറഞ്ഞു—ഭാവിയിൽ ഞാൻ പരിശ്രമപൂർവം ഏതെങ്കിലും മാർഗം കണ്ടെത്തി തക്ഷകനെ തീർച്ചയായും ശിക്ഷിക്കും. എന്നാൽ ഒരു കാര്യം കേൾക്കണം—നിർജന വനത്തിൽ തക്ഷകനും കാശ്യപ ബ്രാഹ്മണനും നടത്തിയ സംഭാഷണം ആരാണ് കണ്ടതും കേട്ടതും? ആ വൃത്താന്തം നിങ്ങളിലേക്കെങ്ങനെ എത്തി? ഇതു കേട്ടശേഷം മാത്രമേ ഞാൻ സർപ്പനാശത്തെക്കുറിച്ച് തീരുമാനിക്കൂ.
Verse 38
संवादं पन्नगेन्द्रस्य काश्यपस्य च कस्तदा | श्रुतवान् दृष्टवांश्वापि भवत्सु कथमागतम् | श्रुत्वा तस्य विधास्ये5हं पन्नगान्तकरीं मतिम्,अच्छा, भविष्यमें प्रयत्नपूर्वक कोई-न-कोई उपाय करके तक्षकको इसके लिये दण्ड दूँगा। परंतु एक बात मैं सुनना चाहता हूँ। नागराज तक्षक और काश्यप ब्राह्मणका वह संवाद तो निर्जन वनमें हुआ होगा। यह सब वृत्तान्त किसने देखा और सुना था? आपलोगोंतक यह बात कैसे आयी? यह सब सुनकर मैं सर्पोके नाशका विचार करूँगा
ജനമേജയൻ പറഞ്ഞു—അന്ന് പന്നഗേന്ദ്രനായ തക്ഷകനും കാശ്യപ ബ്രാഹ്മണനും നടത്തിയ സംഭാഷണം ആരാണ് കേട്ടതോ കണ്ടതോ? ആ വൃത്താന്തം നിങ്ങളിലേക്കെങ്ങനെ എത്തി? അത് കേട്ടശേഷം ഞാൻ ഇവിടെ സർപ്പനാശത്തിലേക്കുള്ള തീരുമാനം എടുക്കും.
Verse 39
मन्त्रिण ऊचु. शृणु राजन् यथास्माकं येन तत् कथितं पुरा । समागतं द्विजेन्द्रस्य पन्नगेन्द्रस्य चाध्वनि,मन्त्री बोले--राजन्! सुनो, विप्रवर काश्यप और नागराज तक्षकका मार्गमें एक- दूसरेके साथ जो समागम हुआ था, उसका समाचार जिसने और जिस प्रकार हमारे सामने बताया था, उसका वर्णन करते हैं। भूपाल! उस वृक्षपर पहलेसे ही कोई मनुष्य लकड़ी लेनेके लिये सूखी डाली खोजता हुआ चढ़ गया था
മന്ത്രിമാർ പറഞ്ഞു—രാജാവേ, കേൾക്കുക; മുമ്പ് ഞങ്ങളോട് ആരോ പറഞ്ഞതുപോലെ തന്നെയാണ് പറയുന്നത്—വഴിയിൽ ദ്വിജേന്ദ്രനായ കാശ്യപനും പന്നഗേന്ദ്രനായ തക്ഷകനും മുഖാമുഖം കണ്ടുമുട്ടി.
Verse 40
तस्मिन् वृक्षे नर: कश्चिदिन्धनार्थाय पार्थिव । विचिन्वन् पूर्वमारूढ: शुष्कशाखां वनस्पतौ,मन्त्री बोले--राजन्! सुनो, विप्रवर काश्यप और नागराज तक्षकका मार्गमें एक- दूसरेके साथ जो समागम हुआ था, उसका समाचार जिसने और जिस प्रकार हमारे सामने बताया था, उसका वर्णन करते हैं। भूपाल! उस वृक्षपर पहलेसे ही कोई मनुष्य लकड़ी लेनेके लिये सूखी डाली खोजता हुआ चढ़ गया था
ഹേ രാജാവേ! ആ വൃക്ഷത്തിൽ ഒരാൾ മുമ്പേ കയറി, ഇന്ധനത്തിനായി ഉണങ്ങിയ കൊമ്പുകൾ തേടുകയായിരുന്നു।
Verse 41
न बुध्येतामुभौ तौ च नगस्थं पन्नगद्वधिजौ । सह तेनैव वृक्षेण भस्मी भूतो5 भवन्नूप,तक्षक नाग और ब्राह्मण--दोनों ही नहीं जानते थे कि इस वृक्षपर कोई दूसरा मनुष्य भी है। राजन्! तक्षकके काटनेपर उस वृक्षके साथ ही वह मनुष्य भी जलकर भस्म हो गया था
ഹേ രാജാവേ! തക്ഷകനായ സർപ്പവും സർപ്പവധത്തിൽ തൽപരനായ ബ്രാഹ്മണനും—ഇരുവരും ആ വൃക്ഷത്തിൽ മറ്റൊരു മനുഷ്യൻ ഇരിക്കുന്നുവെന്ന് അറിഞ്ഞില്ല. തക്ഷകൻ ദംശിച്ചപ്പോൾ ആ മനുഷ്യനും അതേ വൃക്ഷത്തോടൊപ്പം കത്തിപ്പൊള്ളി ഭസ്മമായി।
Verse 42
द्विजप्रभावादू राजेन्द्र व्यजीवत् सवनस्पति: । तेनागम्य नरश्रेष्ठ पुंसास्मासु निवेदितम्,परंतु राजेन्द्र! ब्राह्मणके प्रभावसे वह भी उस वृक्षके साथ जी उठा। नरश्रेष्ठ! उसी मनुष्यने आकर हमलोगोंसे तक्षक और ब्राह्मणकी जो घटना थी, वह सुनायी
ഹേ രാജേന്ദ്രാ! ആ ബ്രാഹ്മണന്റെ പ്രഭാവത്താൽ ആ വൃക്ഷവും വീണ്ടും ജീവിച്ചു. പിന്നെ ആ നരശ്രേഷ്ഠൻ വന്ന് തക്ഷകനെയും ബ്രാഹ്മണനെയും സംബന്ധിച്ച മുഴുവൻ സംഭവവും ഞങ്ങളോട് അറിയിച്ചു।
Verse 43
यथावृत्त॑ तु तत् सर्व तक्षकस्य द्विजस्थ च । एतत् ते कथितं राजन् यथा दृष्टं श्रुतं च यत् श्रुत्वा च नृपशार्दूल विधत्स्व यदनन्तरम्,राजन! इस प्रकार हमने जो कुछ सुना और देखा है, वह सब तुम्हें कह सुनाया। भूपालशिरोमणे! यह सुनकर अब तुम्हें जैसा उचित जान पड़े, वह करो
ഹേ രാജാവേ! തക്ഷകനെയും ബ്രാഹ്മണനെയും സംബന്ധിച്ച് സംഭവിച്ചതെല്ലാം—ഞങ്ങൾ കണ്ടതും കേട്ടതും പോലെ—നിനക്കു പറഞ്ഞു. ഹേ നൃപശാർദൂലാ! ഇത് കേട്ട ശേഷം ഇനി യുക്തമെന്നു തോന്നുന്നതു ചെയ്യുക।
Verse 44
सौतिर्वाच मन्त्रिणां तु वच: श्रुव्वा स राजा जनमेजय: । पर्यतप्यत दुःखार्त: प्रत्यपिंषघत् करं करे,उग्रश्रवाजी कहते हैं--मन्त्रियोंकी बात सुनकर राजा जनमेजय दुःखसे आतुर हो संतप्त हो उठे और कुपित होकर हाथसे हाथ मलने लगे
സൗതി പറഞ്ഞു—മന്ത്രിമാരുടെ വാക്കുകൾ കേട്ട രാജാവ് ജനമേജയൻ ദുഃഖത്തിൽ വ്യാകുലനായി അത്യന്തം വിഷണ്ണനായി; ക്രോധാവേശത്തോടെ കൈകൊണ്ട് കൈ ഉരയ്ക്കാൻ തുടങ്ങി।
Verse 45
निः:श्वासमुष्णमसकृद् दीर्घ राजीवलोचन: । मुमोचाश्रूणि च तदा नेत्राभ्यां प्ररुदन् नृप:,वे बारम्बार लम्बी और गरम साँस छोड़ने लगे। कमलके समान नेत्रोंवाले राजा जनमेजय उस समय नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए फ़ूट-फ़ूटकर रोने लगे
പദ്മനേത്രനായ രാജാവ് വീണ്ടും വീണ്ടും ദീർഘവും ഉഷ്ണവുമായ നിശ്വാസങ്ങൾ വിട്ടു. പിന്നെ ദുഃഖം മൂടിയപ്പോൾ ഇരുകണ്ണുകളിൽ നിന്നുമാശ്രു ഒഴുകിച്ച് ഉച്ചത്തിൽ കരഞ്ഞു.
Verse 46
उवाच च महीपालो दुःखशोकसमन्वित: । दुर्धरं वाष्पमुत्सृज्य स्पृष्टवा चापो यथाविधि,राजाने दो घड़ीतक ध्यान करके मन-ही-मन कुछ निश्चय किया, फिर दुःख-शोक और अमर्षमें डूबे हुए नरेश न थमनेवाले आँसुओंकी अविच्छिन्न धारा बहाते हुए विधिपूर्वक जलका स्पर्श करके सम्पूर्ण मन्त्रियोंसे इस प्रकार बोले--
അപ്പോൾ ദുഃഖശോകങ്ങളിൽ മുങ്ങിയ മഹീപാലൻ അടക്കാനാവാത്ത കണ്ണീർ ഒഴുക്കി, വിധിപ്രകാരം ജലം സ്പർശിച്ച് സംസാരിക്കാൻ തുടങ്ങി.
Verse 47
मुहूर्तमिव च ध्यात्वा निश्चित्य मनसा नृप: । अमर्षी मन्त्रिण: सर्वानिदं वचनमब्रवीत्,राजाने दो घड़ीतक ध्यान करके मन-ही-मन कुछ निश्चय किया, फिर दुःख-शोक और अमर्षमें डूबे हुए नरेश न थमनेवाले आँसुओंकी अविच्छिन्न धारा बहाते हुए विधिपूर्वक जलका स्पर्श करके सम्पूर्ण मन्त्रियोंसे इस प्रकार बोले--
രാജാവ് അല്പനേരം ധ്യാനിച്ച് മനസ്സിൽ തീരുമാനം ഉറപ്പിച്ചു. പിന്നെ അമർഷത്തിൽ ജ്വലിച്ച് എല്ലാ മന്ത്രിമാരോടും ഇങ്ങനെ പറഞ്ഞു.
Verse 48
जनमेजय उवाच श्रुत्वैतद् भवतां वाक्यं पितुर्मे स्वर्गतिं प्रति । निश्चितेयं मम मतिर्या च तां मे निबोधत । अनन्तरं च मन्ये5हं तक्षकाय दुरात्मने,जनमेजयने कहा--मन्त्रियो! मेरे पिताके स्वर्गलोकगमनके विषयमें आपलोगोंका यह वचन सुनकर मैंने अपनी बुद्धिद्वारा जो कर्तव्य निश्चित किया है, उसे आप सुन लें। मेरा विचार है, उस दुरात्मा तक्षकसे तुरंत बदला लेना चाहिये, जिसने शृंगी ऋषिको निमित्तमात्र बनाकर स्वयं ही मेरे पिता महाराजको अपनी विषाग्निसे दग्ध करके मारा है
ജനമേജയൻ പറഞ്ഞു—“മന്ത്രിമാരേ! എന്റെ പിതാവിന്റെ സ്വർഗ്ഗഗമനം സംബന്ധിച്ച നിങ്ങളുടെ വാക്കുകൾ കേട്ട ശേഷം ഞാൻ ചെയ്യേണ്ട കര്ത്തവ്യം ഉറപ്പിച്ചു; അത് കേൾക്കുക. ആ ദുരാത്മാവായ തക്ഷകനെതിരെ ഉടൻ പ്രതികാരം നടത്തണം എന്നാണ് എന്റെ അഭിപ്രായം.”
Verse 49
प्रतिकर्तव्यमित्येवं येन मे हिंसित: पिता । शज्धिणं हेतुमात्रं यः कृत्वा दग्ध्वा च पार्थिवम्,जनमेजयने कहा--मन्त्रियो! मेरे पिताके स्वर्गलोकगमनके विषयमें आपलोगोंका यह वचन सुनकर मैंने अपनी बुद्धिद्वारा जो कर्तव्य निश्चित किया है, उसे आप सुन लें। मेरा विचार है, उस दुरात्मा तक्षकसे तुरंत बदला लेना चाहिये, जिसने शृंगी ऋषिको निमित्तमात्र बनाकर स्वयं ही मेरे पिता महाराजको अपनी विषाग्निसे दग्ध करके मारा है
“എന്റെ പിതാവിനെ ഹാനിപ്പെടുത്തിയവനോട് പ്രതികാരം നിർബന്ധമാണ്—ശൃംഗി ഋഷിയെ വെറും നിമിത്തമാക്കി, അവൻ തന്നേ ആ പാർത്ഥിവനെ ദഹിപ്പിച്ച് കൊന്നുകളഞ്ഞു.”
Verse 50
इयं दुरात्मता तस्य काश्यपं यो न्यवर्तयत् । यदा55गच्छेत् स वै विप्रो ननु जीवेत् पिता मम,उसकी सबसे बड़ी दुष्टता यह है कि उसने काश्यपको लौटा दिया। यदि वे ब्राह्मणदेवता आ जाते तो मेरे पिता निश्चय ही जीवित हो सकते थे इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि पारिक्षिन्मन्त्रिसंवादे पज्चाशत्तमोडध्याय:
ജനമേജയൻ പറഞ്ഞു—അവന്റെ ഏറ്റവും വലിയ ദുഷ്ടത ഇതാണ്: കാശ്യപനെ അവൻ തിരികെ അയച്ചു. ആ ബ്രാഹ്മണൻ എത്തിയിരുന്നെങ്കിൽ, എന്റെ പിതാവ് തീർച്ചയായും ജീവിച്ചിരിക്കും.
Verse 51
परिहीयेत कि तस्य यदि जीवेत् स पार्थिव: । काश्यपस्य प्रसादेन मन्त्रिणां विनयेन च,यदि मन्त्रियोंके विनय और काश्यपके कृपाप्रसादसे महाराज जीवित हो जाते तो इसमें उस दुष्टकी क्या हानि हो जाती?
ജനമേജയൻ പറഞ്ഞു—കാശ്യപന്റെ പ്രസാദത്താലും മന്ത്രിമാരുടെ വിനയത്താലും രാജാവ് ജീവിച്ചിരുന്നെങ്കിൽ, ആ ദുഷ്ടന് എന്ത് നഷ്ടമുണ്ടാകുമായിരുന്നു?
Verse 52
स तु वारितवान् मोहात् काश्यपं द्विजसत्तमम् | संजिजीवयिषुं प्राप्त राजानमपराजितम्,जो कहीं भी परास्त न होते थे, ऐसे मेरे पिता राजा परीक्षित्को जीवित करनेकी इच्छासे द्विजश्रेष्ठ काश्यप आ पहुँचे थे, किंतु तक्षकने मोहवश उन्हें रोक दिया
എവിടെയും പരാജയപ്പെടാത്ത എന്റെ പിതാവ് രാജാവ് പരീക്ഷിതനെ ജീവിപ്പിക്കുവാൻ ആഗ്രഹിച്ചു ദ്വിജശ്രേഷ്ഠനായ കാശ്യപൻ എത്തിയിരുന്നു; എന്നാൽ തക്ഷകൻ മോഹവശാൽ അവനെ തടഞ്ഞു.
Verse 53
महानतिक्रमो होष तक्षकस्य दुरात्मन: । द्विजस्य योडददद् द्रव्यं मा नृपं जीवयेदिति,दुरात्मा तक्षकका यह सबसे बड़ा अपराध है कि उसने ब्राह्मणदेवको इसलिये धन दिया कि वे महाराजको जिला न दें
ജനമേജയൻ പറഞ്ഞു—ദുരാത്മനായ തക്ഷകന്റെ മഹാ അതിക്രമം ഇതാണ്: ‘രാജാവിനെ ജീവിപ്പിക്കരുത്’ എന്ന ഉദ്ദേശത്തോടെ അവൻ ഒരു ബ്രാഹ്മണന് ധനം നൽകി.
Verse 54
उत्तड़कस्य प्रियं कर्तुमात्मनश्न महत् प्रियम् । भवतां चैव सर्वेषां गच्छाम्यपचितिं पितु:,इसलिये मैं महर्षि उत्तंकका, अपना तथा आप सब लोगोंका अत्यन्त प्रिय करनेके लिये पिताके वैरका अवश्य बदला लूँगा
അതുകൊണ്ട് മഹർഷി ഉത്തങ്കനെ പ്രീതിപ്പെടുത്താനും, എന്റെ പരമഹിതം നേടാനും, നിങ്ങളെല്ലാവരെയും സന്തോഷിപ്പിക്കാനും—ഞാൻ പിതാവിനോടുള്ള കടമ നിറവേറ്റാൻ പോകുന്നു; പിതൃവൈരത്തിന് പ്രതികാരം ചെയ്യും.
Rather than an explicit dilemma, the chapter frames an ethical pressure point: how royal power expressed through ritual should be bounded by auspicious intent, learned oversight, and public legitimacy—preparing the setting for consequential decisions.
The chapter models how speech and precedent regulate authority: praise is not merely decorative but a normative tool that aligns kingship with dharma through ritual correctness, qualified expertise, and welfare-oriented intentions.
No explicit phalaśruti is stated; the closest meta-commentary is the narrative note that all parties (king, priests, and fire) become pleased, signaling that correct ritual speech and procedure are treated as efficacious and socially stabilizing.