
ब्राह्मणपूजा-राजधर्मः | Royal Duty of Honoring Learned Brahmins
Upa-parva: Rājadharmānuśāsana (Kingship and Governance Instructions)
Yudhiṣṭhira asks Bhīṣma what is the foremost duty of an anointed king and what conduct enables attainment of welfare in both worlds. Bhīṣma answers that the king’s highest recurring obligation is the continual honoring and protection of reputable, learned, and senior brāhmaṇas—especially śrotriyas—through respectful attention, material support, and formal salutations. He frames this as a practical instrument of state stability: when such figures are at peace, the realm “shines,” and the public’s functioning is sustained through them. The chapter then expands into a cautionary register: brāhmaṇas are depicted as difficult to oppose, capable (when angered) of overwhelming consequences; their capacities are described as varied and sometimes concealed, with diverse livelihoods and conduct in society. The discourse warns against listening to or participating in disparagement of dvijas; the advised protocol is silent withdrawal. Finally, it asserts that antagonism toward brāhmaṇas is incompatible with secure prosperity, using analogies to emphasize their social and moral “invincibility” within the chapter’s normative worldview.
Chapter Arc: युधिष्ठिर पितामह से पूछते हैं—यदि ब्राह्मणत्व अत्यन्त दुर्लभ है, तो विश्वामित्र जैसे क्षत्रिय ने उसी देह से ब्राह्मण्य कैसे पाया? इसी जिज्ञासा के उत्तर में वंश-गाथा और रूपान्तरण की कथा खुलती है। → भीष्म हैहय-वंश और शर्याति-वंश की कड़ियाँ जोड़ते हुए वीतहव्य के पुत्रों और काशी-नरेशों के बीच घोर वैर का वर्णन करते हैं। युद्ध देवासुर-संग्राम-सा उग्र होता है; हैहय राजकुमार विविध शस्त्रों से राजा पर वर्षा करते हैं, मानो हिमालय पर मेघ जल बरसा रहे हों। → प्रतर्दन कवच धारण कर धनुष उठाता है; स्तुतियों के बीच उदित सूर्य-सा दीप्त होकर रण में प्रवेश करता है और निर्णायक पराक्रम से काशी-नरेशों का संहार कर देता है। इसके बाद वीतहव्य का भाग्य-परिवर्तन आता है—भृगुवंशी महर्षि के वचन मात्र से वह क्षत्रिय-जाति का त्याग कर ब्रह्मर्षि/ब्रह्मवादी हो जाता है। → महर्षि भृगु (भृगुवंशी) अपने तप-प्रभाव से ‘जाति’ और ‘अधिकार’ के प्रश्न को वचन-बल द्वारा सुलझाते हैं—वीतहव्य ब्राह्मणत्व प्राप्त करता है; प्रतर्दन महर्षि की आज्ञा लेकर यथावत लौटता है, जैसे सर्प विष छोड़ दे। कथा आगे गृत्समद आदि वंश-प्रसंगों की ओर संकेत करती है। → वीतहव्य से आगे की संतति-परम्परा (गृत्समद आदि) और ‘ब्राह्मणत्व’ के दुर्लभ होने पर उठे प्रश्न का व्यापक निष्कर्ष अगले प्रसंगों में फैलता है।
Verse 1
ऑपनआक्राा बछ। अकाल त्रिशो&्थ्याय: वीतहव्यके पुत्रोंसे काशी-नरेशोंका घोर युद्ध, प्रतर्दनद्वारा उनका वध और राजा वीतहव्यको भूगुके कथनसे ब्राह्मणत्व प्राप्त होनेकी कथा युधिछिर उवाच श्रुतं मे महदाख्यानमेतत् कुरुकुलोद्वह । सुदुष्प्रापं यद् ब्रवीषि ब्राह्म॒ण्यं वदतां वर,युधिष्ठिरने पूछा--कुरुकुलमें उत्पन्न! वक्ताओंमें श्रेष्ठ पितामह! आपके मुखसे यह महान् उपाख्यान मैंने सुन लिया। आप कह रहे हैं कि अन्य वर्णोके लिये इसी शरीरसे ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति बहुत ही कठिन है
ຢຸທິສຖິຣະ ກ່າວວ່າ: «ໂອ ຜູ້ຍົກຍ້ອງວົງກຸຣຸ, ໂອ ປິຕາມະຫາ ຜູ້ເປັນເລີດໃນບັນດາຜູ້ກ່າວຄຳ, ຂ້າພະເຈົ້າໄດ້ຟັງອຸປາຄະຍານອັນຍິ່ງໃຫຍ່ນີ້ຈາກພຣະໂອດຂອງທ່ານແລ້ວ. ແຕ່ສິ່ງທີ່ທ່ານກ່າວ—ວ່າການໄດ້ຮັບຄວາມເປັນພຣາຫມະນະ (ພຣາຫມະນະພາບ) ໃນຮ່າງກາຍນີ້ ສຳລັບຜູ້ຢູ່ໃນວັນນະອື່ນໆ ນັ້ນຍາກຢ່າງຫຼາຍ—ມັນດູຮາວກັບຈະເປັນສິ່ງທີ່ບັນລຸບໍ່ໄດ້».
Verse 2
विश्वामित्रेण च पुरा ब्राह्म॒ण्यं प्राप्तमित्युत । श्रूयते वदसे तच्च दुष्प्रापमिति सत्तम
ຢຸທິສຖິຣະ ກ່າວວ່າ: «ກໍໄດ້ຍິນກັນວ່າ ໃນການກ່ອນ ວິສະວາມິດຕະ ໄດ້ບັນລຸຄວາມເປັນພຣາຫມະນະ. ແຕ່ທ່ານກໍກ່າວອີກວ່າ ການບັນລຸເຊັ່ນນັ້ນຍາກຢ່າງຫຼາຍ, ໂອ ຜູ້ປະເສີດໃນບັນດາຜູ້ມີຄຸນທຳ. ພວກເຮົາຄວນເຂົ້າໃຈຢ່າງໃດ?»
Verse 3
सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ पितामह! परंतु सुना जाता है कि पूर्वकालमें विश्वामित्रजीने इसी शरीरसे ब्राह्मणत्व प्राप्त कर लिया था और आप जो उसे सर्वथा दुर्लभ बता रहे हैं (ये दोनों बातें परस्पर विरुद्ध-सी जान पड़ती हैं) ।। वीतहव्यश्व नृपति: श्रुतो मे विप्रतां गत: । तदेव तावद् गाड़ेय श्रोतुमिच्छाम्यहं विभो,मेरे सुननेमें यह भी आया है कि राजा वीतहत्य क्षत्रियसे ब्राह्मण हो गये थे। गड़ानन्दन प्रभो! अब मैं पहले उसी प्रसड़को सुनना चाहता हूँ
ຢຸທິສຖິຣະ ກ່າວວ່າ: «ຂ້າແຕ່ປິຕາມະຫະ ຜູ້ປະເສີດສຸດໃນຫມູ່ສັດບຸລຸດ! ແຕ່ໄດ້ຍິນວ່າໃນການກ່ອນ ວິສວາມິຕຣະ ໄດ້ບັນລຸພາວະພຣາຫມັນໃນກາຍນີ້ເອງ; ແຕ່ທ່ານກ່າວວ່າມັນເປັນສິ່ງຫາຍາກຢ່າງຍິ່ງ—ສອງຄໍານີ້ດູຄືຈະຂັດແຍ້ງກັນ. ຂ້າພະເຈົ້າຍັງໄດ້ຍິນວ່າ ກະສັດ ວີຕະຫະວະຍະ ແມ່ນແມ່ນກະສັດຊັ້ນກະສັດຕຣິຍະ ແຕ່ກໍໄດ້ກາຍເປັນພຣາຫມັນ. ໂອ ຜູ້ສືບສາຍຂອງ ກາທິ ຜູ້ມີລິດເດດ—ຂໍໃຫ້ເລົ່າເລື່ອງນັ້ນໃຫ້ຟັງກ່ອນ»។
Verse 4
स केन कर्मणा प्राप्तो ब्राह्म॒ण्यं राजसत्तम: । वरेण तपसा वापि तन््मे व्याख्यातुमरहसि,वे नृपशिरोमणि वीतहव्य किस कर्मसे, किस वर अथवा तपस्यासे ब्राह्मणत्वको प्राप्त हुए? यह मुझे विस्तारपूर्वक बतानेकी कृपा करें
ຢຸທິສຖິຣະ ກ່າວວ່າ: «ໂອ ກະສັດຜູ້ປະເສີດສຸດ, ດ້ວຍກຳກະທຳໃດທ່ານຈຶ່ງໄດ້ພາວະພຣາຫມັນ? ໄດ້ມາດ້ວຍພອນ ຫຼືດ້ວຍຕະປະສະ? ໂອ ມຸກກະດຂອງຜູ້ປົກຄອງ, ຂໍໃຫ້ອະທິບາຍໃຫ້ຂ້າພະເຈົ້າຢ່າງລະອຽດ»។
Verse 5
भीष्म उवाच शृणु राजन् यथा राजा वीतहव्यो महायशा: । राजर्षिर्दिलभ प्राप्तो ब्राह्मण्यं लोकसत्कृतम्,भीष्मजीने कहा--राजन्! महायशस्वी राजर्षि राजा वीतहव्यने जिस प्रकार लोकसम्मानित दुर्लभ ब्राह्मणत्व प्राप्त किया था, उसे बताता हूँ, सुनो
ພີສະມະ ກ່າວວ່າ: «ໂອ ກະສັດ, ຈົ່ງຟັງ. ຂ້າພະເຈົ້າຈະເລົ່າວ່າ ກະສັດຣາຊະຣິສິ ວີຕະຫະວະຍະ ຜູ້ມີກຽດຍິ່ງ ໄດ້ບັນລຸພາວະພຣາຫມັນອັນຫາຍາກ ແລະເປັນທີ່ນັບຖືໃນໂລກ ແນວໃດ»។
Verse 6
मनोर्महात्मनस्तात प्रजा धर्मेण शासत: । बभूव पुत्रो धर्मात्मा शर्यातिरिति विश्रुत:,तात! पूर्वकालमें धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करनेवाले महामनस्वी राजा मनुके एक धर्मात्मा पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसका नाम था शर्याति
ພີສະມະ ກ່າວວ່າ: «ລູກເອີຍ, ແກ່ ມະນຸ ຜູ້ມີຈິດໃຫຍ່ ຜູ້ປົກຄອງປະຊາຊົນດ້ວຍທຳມະ, ໄດ້ມີບຸດຜູ້ທຳມະ ຜູ້ໂດ່ງດັງນາມວ່າ ສາຣະຍາຕິ»។
Verse 7
तस्यान्ववाये द्वौ राजन् राजानौ सम्बभूवतु: । हैहयस्तालजंघश्न वत्सस्य जयतां वर,विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ नरेश! राजा शर्यातिके वंशमें दो राजा बड़े विख्यात हुए--हैहय और तालजंघ। ये दोनों ही राजा वत्सके पुत्र थे
ພີສະມະ ກ່າວວ່າ: «ໂອ ກະສັດ, ໃນສາຍສືບຂອງລາວ ໄດ້ມີກະສັດສອງອົງອັນໂດ່ງດັງເກີດຂຶ້ນ—ໄຫຫະຍະ ແລະ ຕາລະຈັງຄະ. ໂອ ຜູ້ຊະນະໃນຫມູ່ວີຣະຊົນ, ກະສັດທັງສອງນັ້ນເປັນບຸດຂອງ ວັດສະ»។
Verse 8
हैहयस्य तु राजेन्द्र दशसु स्त्रीषु भारत । शतं बभूव पुत्राणां शूराणामनिवर्तिनाम्,भरतवंशी राजेन्द्र! उन दोनोंमें हैहपके (जिसका दूसरा नाम वीतहव्य भी था) दस स्त्रियाँ थीं। उन स्त्रियोंके गर्भसे सौ शूरवीर पुत्र उत्पन्न हुए जो युद्धसे पीछे हटनेवाले नहीं थे
ພີດສະມະ ກ່າວວ່າ: «ໂອ ພະຣາຊາ, ໂອ ຜູ້ສືບສາຍພາຣະຕະ! ກະສັດແຫ່ງວົງໄຮຫະຍະ ມີມະເຫສີ 10 ອົງ. ຈາກນາງເຫຼົ່ານັ້ນ ເກີດບຸດ 100 ອົງ—ເປັນວີຣະບຸລຸດຜູ້ບໍ່ເຄີຍຖອຍຫຼັງຈາກສົງຄາມ»។
Verse 9
तुल्यरूपप्रभावाणां बलिनां युद्धशालिनाम् । धनुर्वेदे च वेदे च सर्वत्रैव कृतश्रमा:
ພີດສະມະ ກ່າວວ່າ: «ພວກເຂົາມີຮູບຮ່າງແລະອຳນາດກ້າຫານເທົ່າກັນ—ເປັນຊາຍແຂງແຮງ ຊ່ຽວຊານໃນສິລະປະແຫ່ງສົງຄາມ—ແລະໄດ້ພາກພຽນໃນທຸກສາຂາ, ທັງວິຊາທະນູ ແລະ ວິຊາເວດະ»។
Verse 10
उन सबके रूप और प्रभाव एक समान थे, वे सभी बलवान् तथा युद्धमें शोभा पानेवाले थे। उन्होंने धनुर्वेद और वेदके सभी विषयोंमें परिश्रम किया था ।। काशिष्वपि नूपो राजन् दिवोदासपितामह: । हर्यश्व इति विख्यातो बभूव जयतां वर:,उन्हीं दिनों काशी प्रान्तमें हर्यश्व नामके राजा राज्य करते थे, जो दिवोदासके पितामह थे। वे विजयशील वीरोंमें श्रेष्ठ समझे जाते थे
ພີດສະມະ ກ່າວວ່າ: «ພວກເຂົາທັງໝົດມີຮູບຮ່າງແລະອຳນາດກ້າຫານເທົ່າກັນ—ແຂງແຮງ ເໝາະທີ່ຈະໂດດເດັ່ນໃນສົງຄາມ. ພວກເຂົາໄດ້ພາກພຽນໃນວິຊາທະນູ ແລະໃນທຸກສາຂາແຫ່ງຄວາມຮູ້ວິດະ. ໃນວັນເວລານັ້ນເອງ, ໂອ ພະຣາຊາ, ທີ່ກາສີ ມີກະສັດຜູ້ໂດງດັງນາມ ຮະຣະຍັດສະວະ (Haryaśva), ຜູ້ເປັນປູ່ຂອງ ດິໂວດາສະ (Divodāsa); ພຣະອົງຖືກນັບຖືວ່າເປັນຜູ້ຍິ່ງໃຫຍ່ທີ່ສຸດໃນບັນດາວີຣະບຸລຸດຜູ້ຊະນະ»។
Verse 11
स वीतहव्यदायादैरागत्य पुरुषर्षभ । गड्भायमुनयोर्मध्ये संग्रामे विनिपातित:,पुरुषप्रवर! वीतहव्यके पुत्रोंने हर्यश्वके राज्यपर चढ़ाई की उन्हें गंगा-यमुनाके बीच युद्धमें मार गिराया
ພີດສະມະ ກ່າວວ່າ: «ໂອ ຜູ້ເປັນຍອດໃນບັນດາບຸລຸດ! ພຣະອົງຖືກທາຍາດຂອງ ວີຕະຫະວະຍະ (Vītahavya) ມາປະຈັນໜ້າ; ແລະໃນສົງຄາມທີ່ຮົບກັນລະຫວ່າງແມ່ນ້ຳຄັງຄາ ແລະ ຢະມຸນາ, ພຣະອົງຖືກຟັນລົງສິ້ນຊີວິດ»។
Verse 12
त॑ तु हत्वा नरपतिं हैहयास्ते महारथा: । प्रतिजग्मु: पुरी रम्यां वत्सानामकुतो भया:,राजा हर्यश्वको मारकर वे महारथी हैहय-राजकुमार निर्भय हो वत्सवंशी राजाओंकी सुरम्य पुरीको लौट गये
ພີດສະມະ ກ່າວວ່າ: «ເມື່ອຂ້າກະສັດນັ້ນແລ້ວ, ນັກຮົບລົດສົງຄາມຜູ້ຍິ່ງໃຫຍ່ແຫ່ງວົງໄຮຫະຍະ ກໍກັບຄືນໄປຍັງນະຄອນອັນງາມຂອງກະສັດວັດສະ (Vatsa) ດ້ວຍໃຈທີ່ບໍ່ມີຄວາມຢ້ານກົວ»។
Verse 13
हर्यश्व॒स्य च दायाद: काशिराजो< भ्यषिच्यत । सुदेवो देवसंकाश: साक्षाद् धर्म इवापर:
ພີສະມະ ກ່າວວ່າ: «ແລະທາຍາດຂອງ ຫະຣິຍະສະວະ—ກະສັດແຫ່ງ ກາສີ—ໄດ້ຮັບການອະພິເສກຢ່າງຖືກຕ້ອງຕາມພິທີ. ສຸເທວະນັ້ນ ສ່ອງສະຫວ່າງດັ່ງເທວະ ແລະປານດັ່ງ ທັມມະ ເອງໃນອີກຮູບໜຶ່ງ».
Verse 14
हर्यश्वके पुत्र सुदेव जो देवताके तुल्य तेजस्वी और साक्षात् दूसरे धर्मराजके समान न्यायशील थे, पिताके बाद काशिराजके पदपर अभिषिक्त किये गये ।। स पालयामास महीं धर्मात्मा काशिनन्दन: । तैर्वीतहव्यैरागत्य युधि सर्वर्विनिर्जित:,धर्मात्मा काशिनन्दन सुदेव धर्मपूर्वक पृथ्वीका पालन करने लगे। इसी बीचमें वीतहव्यके सभी पुत्रोंने आक्रमण करके युद्धमें उन्हें भी परास्त कर दिया
ພີສະມະ ກ່າວວ່າ: «ສຸເທວະ ຜູ້ເປັນລູກແທ້ແຫ່ງກາສີ ແລະເປັນຜູ້ທຳມະຈິດ ໄດ້ປົກຄອງແຜ່ນດິນຕາມທັມມະ. ແຕ່ຕໍ່ມາ ບຸດທັງຫຼາຍຂອງ ວີຕະຫະວະຍະ ໄດ້ບຸກໂຈມ ແລະໃນສົງຄາມ ລາວຖືກພວກເຂົາທັງໝົດປະລາຍ».
Verse 15
तमथाजोौ विनिर्जित्य प्रतिजग्मुर्यथागतम् । सौदेवस्त्वथ काशीशो दिवोदासो5भ्यषिच्यत,समराज्रणमें सुदेवको धराशायी करके वे हैहय-राजकुमार जैसे आये थे वैसे लौट गये। तत्पश्चात् सुदेवके पुत्र दिवोदासका काशिराजके पदपर अभिषेक किया गया
ພີສະມະ ກ່າວວ່າ: «ເມື່ອໄດ້ຊະນະ ອະຊະ ໃນສົງຄາມແລ້ວ ພວກເຂົາກໍກັບໄປດັ່ງທີ່ມາ. ຕໍ່ມາ ທິໂວທາສະ ບຸດຂອງ ສໍເທວະ ໄດ້ຮັບການອະພິເສກເປັນກະສັດແຫ່ງ ກາສີ».
Verse 16
दिवोदासस्तु विज्ञाय वीर्य तेषां यतात्मनाम् । वाराणसीं महातेजा निर्ममे शक्रशासनात्,दिवोदास बड़े तेजस्वी राजा थे। उन्होंने जब मनको वशमें रखनेवाले हैहयराजकुमारोंके पराक्रमपर विचार किया तब इन्द्रकी आज्ञासे वाराणसी नामवाली नगरी बसायी
ພີສະມະ ກ່າວວ່າ: «ກະສັດທິໂວທາສະ ຜູ້ມີເດດສະຫງ່າອັນໃຫຍ່ ເມື່ອຮູ້ເຖິງພະລັງກຳລັງຂອງເຈົ້າຊາຍສາຍໄຫຫະຍະ ຜູ້ຝຶກຈິດໄດ້ແລ້ວ ກໍສ້າງເມືອງຊື່ ວາຣານະສີ ຕາມພຣະບັນຊາຂອງ ສັກຣະ (ອິນທຣະ)».
Verse 17
विप्रक्षत्रियसम्बाधां वैश्यशूद्रसमाकुलाम् । नैकद्रव्योच्चयवर्ती समृद्धविपणापणाम्,वह पुरी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्रोंसे भरी हुई थी। नाना प्रकारके द्रव्योंके संग्रहसे सम्पन्न थी; तथा उसके बाजार-हाट और दूकानें धन-वैभवसे भरपूर थीं
ພີສະມະ ກ່າວວ່າ: «ເມືອງນັ້ນໜາແໜ້ນໄປດ້ວຍພຣາຫມະນະ ແລະ ກະສັດຕະຣິຍະ ທັງຍັງຄຶກຄື້ນດ້ວຍ ໄວຊະຍະ ແລະ ຊູດຣະ. ມັນຮຸ່ງເຮືອງດ້ວຍການສະສົມສິນຄ້າຫຼາຍປະເພດ ແລະຕະຫຼາດ ບາຊາ ຮ້ານຄ້າຕ່າງໆ ກໍເຕັມໄປດ້ວຍຂອງດີ ອຸດົມສົມບູນ ແລະຄຶກຄື້ນ».
Verse 18
गड्जाया उत्तरे कूले वप्रान्ते राजसत्तम । गोमत्या दक्षिणे कूले शक्रस्येवामरावतीम्,नृपश्रेष्ठट उस नगरीके घेरेका एक छोर गंगाजीके उत्तर तटतक दूसरा छोर गोमतीके दक्षिण किनारेतक फैला हुआ था। वह नगरी इन्द्रकी अमरावतीपुरीके समान जान पड़ती थी
ພີດສະມະກ່າວວ່າ: «ໂອ ກະສັດຜູ້ປະເສີດທີ່ສຸດ, ເມືອງນັ້ນຕັ້ງຢູ່ຕາມຝັ່ງເໜືອຂອງແມ່ນ້ຳຄົງຄາ ຈົນເຖິງຂອບກຳແພງ; ແລະຍັງແຜ່ກວ້າງໄປຈົນເຖິງຝັ່ງໃຕ້ຂອງແມ່ນ້ຳໂກມະຕີ. ໃນຄວາມສະຫງ່າງາມ ມັນປານດັ່ງອະມະຣາວະຕີ—ນະຄອນສະຫວັນຂອງພຣະອິນ»។
Verse 19
तत्र तं राजशार्दूलं निवसन्तं महीपतिम् । आगत्य हैहया भूय: पर्यधावन्त भारत
ໃນທີ່ນັ້ນ ໂອ ພາຣະຕະ, ພວກໄຫຫະຍະໄດ້ກັບມາອີກຄັ້ງ ຍັງສະຖານທີ່ທີ່ “ເສືອໃນບັນດາກະສັດ” ຄືພຣະມະຫາກະສັດນັ້ນພຳນັກຢູ່; ແລະພວກເຂົາໄດ້ລ້ອມຮອບພຣະອົງທຸກດ້ານ ບີບຄັ້ນເຂົ້າມາອີກເທື່ອໜຶ່ງ.
Verse 20
भारत! उस नगरीमें निवास करते हुए राजसिंह भूपाल दिवोदासपर पुनः हैहयराजकुमारोंने धावा किया ।। स निष्क्रम्य ददौ युद्ध तेभ्यो राजा महाबल: । देवासुरसमं घोरं दिवोदासो महाद्युति:
ໂອ ພາຣະຕະ, ໃນຂະນະທີ່ພຣະຣາຊາດິໂວດາສ—ສິງໃນບັນດາຜູ້ປົກຄອງ—ພຳນັກຢູ່ໃນເມືອງນັ້ນ, ບັນດາເຈົ້າຊາຍແຫ່ງວົງໄຫຫະຍະໄດ້ບຸກໂຈມພຣະອົງອີກຄັ້ງ. ດິໂວດາສ ຜູ້ມີກຳລັງຍິ່ງໃຫຍ່ ແລະສະຫວ່າງໄສ, ໄດ້ອອກໄປປະຈັນໜ້າພວກເຂົາ ແລະປະທານສົງຄາມ—ນ່າຢ້ານ ແລະກວ້າງໃຫຍ່—ດັ່ງສົງຄາມລະຫວ່າງເທວະກັບອະສຸຣະ.
Verse 21
महातेजस्वी महाबली राजा दिवोदासने पुरीसे बाहर निकलकर उन राजकुमारोंके साथ युद्ध किया। उनका वह युद्ध देवासुर-संग्रामके समान भयंकर था ।। स तु युद्धे महाराज दिनानां दशतीर्दश । हतवाहनभूयिष्ठस्ततो दैन्यमुपागमत्,महाराज! काशिनरेशने एक हजार दिन (दो वर्ष नौ महीने दस दिन)-तक शत्रुओंके साथ युद्ध किया। इस युद्धमें दिवोदासके बहुत-से सिपाही और हाथी, घोड़े आदि वाहन मारे गये। उनका खजाना खाली हो गया और वे बड़ी दयनीय दशामें पड़ गये। अन्तमें अपनी राजधानी छोड़कर भाग निकले
ພີດສະມະກ່າວວ່າ: ກະສັດດິໂວດາສ ຜູ້ມີຣັດສະມີຍິ່ງໃຫຍ່ ແລະກຳລັງຫນັກແນ່ນ, ອອກຈາກເມືອງໄປສູ້ຮົບກັບເຈົ້າຊາຍເຫຼົ່ານັ້ນ. ການຮົບນັ້ນນ່າຢ້ານ ດັ່ງສົງຄາມເທວະ-ອະສຸຣະ. ໂອ ມະຫາຣາຊາ, ພຣະອົງສູ້ຮົບຕໍ່ເນື່ອງເປັນເວລາຍາວນານ; ແຕ່ເມື່ອພາຫະນະແລະພາຫະພາຫະຫຼາຍສ່ວນຖືກທຳລາຍ ພຣະອົງກໍຕົກຢູ່ໃນຄວາມທຸກຍາກ. ທະຫານ, ຊ້າງສົງຄາມ ແລະມ້າຈຳນວນຫຼາຍຖືກສັງຫານ, ຊັບສິນຖືກໃຊ້ຈົນໝົດ, ແລະທ້າຍທີ່ສຸດພຣະອົງລະທິ້ງນະຄອນຫຼວງ ແລ້ວຫລົບໜີ.
Verse 22
हतयोधस्ततो राजन् क्षीणकोशश्व भूमिप: । दिवोदास: पुरी त्यक्त्वा पलायनपरो5भवत्,महाराज! काशिनरेशने एक हजार दिन (दो वर्ष नौ महीने दस दिन)-तक शत्रुओंके साथ युद्ध किया। इस युद्धमें दिवोदासके बहुत-से सिपाही और हाथी, घोड़े आदि वाहन मारे गये। उनका खजाना खाली हो गया और वे बड़ी दयनीय दशामें पड़ गये। अन्तमें अपनी राजधानी छोड़कर भाग निकले
ພີດສະມະກ່າວວ່າ: «ແລ້ວຕໍ່ມາ ໂອ ກະສັດ, ຜູ້ປົກຄອງນັ້ນ—ທະຫານຖືກສັງຫານ ແລະຄັງຊັບຖືກໃຊ້ຈົນໝົດ—ດິໂວດາສໄດ້ລະທິ້ງເມືອງຂອງພຣະອົງ ແລະມຸ່ງໜ້າແຕ່ການຫລົບໜີ»។
Verse 23
गत्वा55श्रमपदं रम्यं भरद्वाजस्य धीमत: । जगाम शरणं राजा कृताञज्जलिररिंदम,शत्रुदमन नरेश! बुद्धिमान् भरद्वाजके रमणीय आश्रमपर जाकर राजा दिवोदास हाथ जोड़े हुए वहाँ मुनिकी शरणमें गये
ພີສະມະກ່າວວ່າ: ພະຣາຊາ—ຜູ້ປາບສັດຕູ—ໄດ້ໄປຮອດອາສຣົມອັນງາມຮື່ນຂອງພຣະຣິສີພະຣະດວາຊະ ຜູ້ມີປັນຍາ ແລ້ວເຂົ້າໄປຂໍພຶ່ງພາ ດ້ວຍການປະນົມມືຢ່າງເຄົາລົບ.
Verse 24
तमुवाच भरद्वाजो ज्येष्ठ: पुत्रो बृहस्पते: । पुरोधा: शीलसम्पन्नो दिवोदासं महीपतिम्,बृहस्पतिके ज्येष्ठ पुत्र भरद्वाजजी बड़े शीलवान् और दिवोदासके पुरोहित थे। उन्होंने राजाको उपस्थित देखकर पूछा--“नरेश्वर! तुम्हें यहाँ आनेकी क्या आवश्यकता पड़ी? मुझे अपना सब समाचार बता दो। तुम्हारा जो भी प्रिय कार्य होगा उसे मैं करूँगा। इसके लिये मेरे मनमें कोई अन्यथा विचार नहीं होगा”
ພຣະຣິສີພະຣະດວາຊະ—ບຸດອາວຸໂສຂອງພຣະບຣິຫັດສະປະຕິ ແລະເປັນປຸໂຣຫິດຜູ້ມີສິນ—ໄດ້ກ່າວກັບພະຣາຊາດິໂວດາສ. ເມື່ອເຫັນພະຣາຊາມາຮອດ ທ່ານຖາມດ້ວຍຄວາມເຄົາລົບວ່າ: “ໂອ້ ນະເຣສະວອນ, ທ່ານມາທີ່ນີ້ເພາະຫຍັງ? ຈົ່ງເລົ່າຂ່າວທັງປວງໃຫ້ຂ້າພະເຈົ້າຟັງ; ສິ່ງໃດທີ່ທ່ານປາຖະໜາເພື່ອຄວາມສຸກສະຫວັດດີ ຂ້າພະເຈົ້າຈະກະທຳໃຫ້ ໂດຍບໍ່ມີໃຈອື່ນແອບແຝງ.”
Verse 25
किमागमनकृत्य ते सर्व प्रब्रूहि मे नूप । यत् ते प्रियं तत् करिष्ये न मे5त्रास्ति विचारणा,बृहस्पतिके ज्येष्ठ पुत्र भरद्वाजजी बड़े शीलवान् और दिवोदासके पुरोहित थे। उन्होंने राजाको उपस्थित देखकर पूछा--“नरेश्वर! तुम्हें यहाँ आनेकी क्या आवश्यकता पड़ी? मुझे अपना सब समाचार बता दो। तुम्हारा जो भी प्रिय कार्य होगा उसे मैं करूँगा। इसके लिये मेरे मनमें कोई अन्यथा विचार नहीं होगा”
ພີສະມະກ່າວວ່າ: “ໂອ້ ພະຣາຊາ, ຈົ່ງບອກຂ້າພະເຈົ້າໃຫ້ຄົບຖ້ວນວ່າ ທ່ານມາທີ່ນີ້ເພື່ອການໃດ. ຈົ່ງເວົ້າລາຍລະອຽດທັງປວງ. ສິ່ງໃດທີ່ທ່ານຮັກແພງ—ວຽກໃດທີ່ທ່ານປາຖະໜາ—ຂ້າພະເຈົ້າຈະກະທຳໃຫ້. ໃນເລື່ອງນີ້ ໃຈຂ້າພະເຈົ້າບໍ່ມີຄວາມລັງເລ.”
Verse 26
राजोवाच भगवन् वैतहत्यैमें युद्धे वंश: प्रणाशित: । अहमेकः: परिद्यूनो भवन्तं शरणं गत:,राजाने कहा--भगवन! संग्राममें वीतहव्यके पुत्रोंने मेरे कुलका विनाश कर डाला। मैं अकेला ही अत्यन्त संतप्त हो आपकी शरणमें आया हूँ
ພະຣາຊາກ່າວວ່າ: “ໂອ້ ພຣະອົງຜູ້ເປັນສິ່ງຄວນບູຊາ, ໃນສົງຄາມນີ້ ບຸດທັງຫຼາຍຂອງວີຕະຫະວະຍະ ໄດ້ທຳລາຍວົງສາຂອງຂ້າພະເຈົ້າ. ຂ້າພະເຈົ້າເຫຼືອຢູ່ພຽງຜູ້ດຽວ ຖືກຄວາມໂສກເຜົາໃຈ ແລະໄດ້ມາຂໍພຶ່ງພາທ່ານ.”
Verse 27
शिष्यस्नेहेन भगवंस्त्वं मां रक्षितुमर्हसि । एकशेष: कृतो वंशो मम तै: पापकर्मभि:,भगवन्! मैं आपका शिष्य हूँ और आप मेरे गुरु हैं। शिष्यके प्रति गुरुका जो सहज स्नेह होता है उसीके द्वारा आप मेरी रक्षा कीजिये। उन पापकर्मियोंने मेरे कुलमें केवल मुझ एक ही व्यक्तिको शेष छोड़ा है
ພີສະມະກ່າວວ່າ: “ໂອ້ ທ່ານຜູ້ນ່າເຄົາລົບ, ດ້ວຍຄວາມເມດຕາຕາມທຳມະຊາດທີ່ອາຈານມີຕໍ່ສິດ ທ່ານຄວນປົກປ້ອງຂ້າພະເຈົ້າ. ຄົນຜູ້ກະທຳບາບເຫຼົ່ານັ້ນ ໄດ້ເຮັດໃຫ້ວົງສາຂອງຂ້າພະເຈົ້າເຫຼືອພຽງຜູ້ດຽວ—ຄືຂ້າພະເຈົ້າ.”
Verse 28
तमुवाच महाभागो भरद्वाज: प्रतापवान् । न भेतव्यं न भेतव्यं सौदेव व्येतु ते भयम्,यह सुनकर प्रतापी महर्षि महाभाग भरद्वाजने कहा--'सुदेवनन्दन! तुम न डरो, न डरो। तुम्हारा भय दूर हो जाना चाहिये
ໃນເວລານັ້ນ ພຣະລິສີຜູ້ມີບຸນຍາທິການ ແລະມີອານຸພາບ ຄື ພາຣະດວາຊ ໄດ້ກ່າວກັບເຂົາວ່າ: «ຢ່າຢ້ານ, ຢ່າຢ້ານເລີຍ ໂອ ບຸດແຫ່ງສຸເທວະ. ຂໍໃຫ້ຄວາມຢ້ານຂອງເຈົ້າຈົ່ງສະຫງົບຫາຍໄປ»។
Verse 29
इस प्रकार श्रीमह्ा भारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें इन्द्र और मतज्ञका संवादविषयक उनतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ,अहमिष्टिं करिष्यामि पुत्रार्थ ते विशाम्पते | वीतहव्यसहस््राणि येन त्वं प्रहरिष्यसि “प्रजानाथ! मैं तुम्हारी पुत्र-प्राप्तिके लिये एक यज्ञ करूँगा जिसकी सहायतासे तुम हजारों वीतहव्य-पुत्रोंकी मार गिराओगे”
ສັກຣະ (ອິນທຣະ) ກ່າວວ່າ: «ໂອ ຈອມເຈົ້າແຫ່ງປະຊາຊົນ, ເພື່ອໃຫ້ເຈົ້າໄດ້ບຸດ ຂ້າພະເຈົ້າຈະປະກອບພິທີບູຊາ (ອິດຖິ) ໃຫ້ເຈົ້າ. ດ້ວຍອານຸພາບແຫ່ງພິທີນັ້ນ ເຈົ້າຈະສາມາດຟັນລົງບຸດຂອງວີຕະຫະວະ ໄດ້ນັບພັນ»។
Verse 30
तत इष्टिं चकारर्षिस्तस्य वै पुत्रकामिकीम् । अथास्य तनयो जज्ञे प्रतर्दन इति श्रुतः,तब ऋषिने राजासे पुत्रेष्टि यज्ञ कराया। इससे उनके प्रतर्दन नामसे विख्यात पुत्र हुआ महाराज! इसी तरह मैंने गृत्समदके वंशका भी विस्तारपूर्वक वर्णन किया है। अब और क्या पूछ रहे हो? ।। इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि वीतहव्योपाख्यानं नाम त्रिंशोडध्याय:
ພີດສະມະ ກ່າວວ່າ: «ແລ້ວພຣະລິສີໄດ້ປະກອບພິທີອິດຖິເພື່ອໃຫ້ເຂົາໄດ້ບຸດ. ຕໍ່ມາບຸດຄົນໜຶ່ງໄດ້ເກີດຂຶ້ນ ເປັນທີ່ຮູ້ຈັກດ້ວຍນາມ ‘ປຣະຕັດດະນ’. ດັ່ງນັ້ນ ຂ້າພະເຈົ້າໄດ້ບັນຍາຍການຂະຫຍາຍວົງສານຂອງ ກຣິດສະມະດະ ຢ່າງລະອຽດແລ້ວ. ເຈົ້າຍັງຈະຖາມຫຍັງອີກ?»
Verse 31
स जातमात्रो ववृधे समा: सद्यस्त्रयोदश । वेदं चापि जगौ कृत्स्नं धनुर्वेदे च भारत,भारत! वह पैदा होते ही इतना बढ़ गया कि तुरंत तेरह वर्षकी अवस्थाका-सा दिखायी देने लगा। उसी समय उसने अपने मुखसे सम्पूर्ण वेद और धनुर्वेदका गान किया
ພີດສະມະ ກ່າວວ່າ: «ເດັກນ້ອຍນັ້ນ ເກີດມາປຸບກໍເຕີບໃຫຍ່ທັນທີ ປານກັບວ່າມີອາຍຸສິບສາມປີ. ໃນຂະນະນັ້ນເອງ ເຂົາຍັງຂັບຂານພຣະເວດທັງມວນ ແລະ ທະນຸເວດ—ວິຊາການຍິງທະນູ ໂອ ພາຣະຕະ»។
Verse 32
योगेन च समाविष्टो भरद्वाजेन धीमता । तेजो लोक्यं स संगृहा तस्मिन् देशे समाविशत्,बुद्धिमान् भरद्वाजमुनिने उसे योगशक्तिसे सम्पन्न कर दिया और उसके शरीरमें सम्पूर्ण जगत्का तेज भर दिया
ພີດສະມະ ກ່າວວ່າ: «ໂດຍການເຂົ້າສູ່ສະມາທິໂຍຄະ ທີ່ພຣະລິສີພາຣະດວາຊຜູ້ສະຫລາດໄດ້ປະທານໃຫ້, ເຂົາໄດ້ຮວບຮວມລັດສະມີອັນແຜ່ຊຶມທົ່ວໂລກ ແລະເຂົ້າສູ່ທີ່ນັ້ນເອງ ດ້ວຍຄວາມສະຫວ່າງໄສອັນສາກົນເຕັມປຽມ»។
Verse 33
ततः स कवची धन््वी स्तूयमान: सुरभि: । वन्दिभिर्वन्द्यमानश्न बभौ सूर्य इवोदित:,तदनन्तर राजकुमार प्रतर्दनने अपने शरीरपर कवच धारण किया और हाथमें धनुष ले लिया। उस समय देवर्षिगण उसका यश गाने लगे। वन्दीजनोंसे वन्दित हो वह नवोदित सूर्यके समान प्रकाशित होने लगा
ຕໍ່ມາ ພຣະຣາຊະກຸມານັ້ນ ສວມເກາະ ແລະຖືຄັນທະນູ ກ້າວໄປຂ້າງໜ້າທ່າມກາງສຽງສັນລະເສີນ. ເມື່ອພວກລະສີເທວະຈາກສະຫວັນຮ້ອງສັນລະເສີນກຽດຊື່ຂອງພຣະອົງ ແລະພວກນັກຂັບຮ້ອງວັນດີຖວາຍຄວາມນົບນ້ອມ ພຣະອົງກໍສ່ອງສະຫວ່າງດັ່ງຕາເວັນທີ່ພຶ່ງຂຶ້ນ—ເປັນພາບຂອງວິລະກຳທີ່ຖືກປະກາດຕໍ່ສາທາລະນະ ແລະຄວາມຕັ້ງໃຈອັນຊອບທຳທີ່ປາກົດແຈ້ງ.
Verse 34
स रथी बद्धनिस्त्रिंशो बभौ दीप्त इवानल: । प्रययौ स धनुर्धुन्चन् खड्गी चर्मी शरासनी,वह रथपर बैठ गया और कमरमें तलवार बाँधकर प्रज्वलित अग्निके समान उद्धासित होने लगा। ढाल, तलवार और धनुषसे सम्पन्न हो वह धनुषकी टंकार करता हुआ आगे बढ़ा
ພີດສະມະກ່າວວ່າ: ພຣະອົງຂຶ້ນນັ່ງເທິງລົດຮົບ ແລະຄາດດາບໄວ້ທີ່ແອວ ກໍສ່ອງສະຫວ່າງດັ່ງໄຟທີ່ລຸກໂຊນ. ພ້ອມດ້ວຍດາບແລະໂລ່ ຖືຄັນທະນູ ພຣະອົງກ້າວໄປຂ້າງໜ້າ ໃຫ້ສຽງຄັນທະນູກັງວານ—ເຄື່ອນໄປດ້ວຍຄວາມມຸ່ງໝັ້ນອັນດຸເດືອດຂອງນັກຮົບ ຜູ້ພ້ອມປະຕິບັດຕາມທຳທີ່ຕົນເລືອກ.
Verse 35
त॑ दृष्टवा परमं हर्ष सुदेवतनयो ययौ । मेने च मनसा दग्धान् वैतहव्यान् स पार्थिव:,उसे देखकर सुदेव-पुत्र राजा दिवोदासको बड़ा हर्ष हुआ। उन्होंने मन-ही-मन वीतहव्यके पुत्रोंको अपने पुत्रके तेजसे दग्ध हुआ ही समझा
ເມື່ອເຫັນເຊັ່ນນັ້ນ ພຣະຣາຊາດິໂວດາສ ພຣະຣາຊະບຸດຂອງສຸເທວະ ກໍເກີດຄວາມປິຕິຍິນດີຢ່າງຍິ່ງ ແລະອອກເດີນທາງໄປດ້ວຍໃຈທີ່ສູງສົ່ງ. ໃນໃຈຂອງພຣະອົງ ພຣະອົງເຫັນວ່າ ບຸດຂອງວີຕະຫະວະຍາ ຖືກຄວາມສ່ອງສະຫວ່າງແລະພະລັງຂອງບຸດຕົນ ເຜົາຜານຈົນສິ້ນແລ້ວ.
Verse 36
ततो5सौ यौवराज्ये च स्थापयित्वा प्रतर्दनम् कृतकृत्यं तदा55त्मानं स राजा अभ्यनन्दत,तत्पश्चात् राजा दिवोदासने प्रतर्दनको युवराजके पदपर स्थापित करके अपने आपको कृतकृत्य माना और बड़े आनन्दका अनुभव किया
ຕໍ່ມາ ພຣະຣາຊານັ້ນໄດ້ສະຖາປະນາປຣະຕາດະນະເປັນອຸປະຣາຊາ ແລະຮູ້ສຶກວ່າພຣະອົງໄດ້ກະທຳພາລະກິດສຳເລັດແລ້ວ. ພຣະອົງຊື່ນບານໃນໃຈ—ພໍໃຈທີ່ໄດ້ຮັບປະກັນການສືບທອດອຳນາດອັນຊອບທຳ ແລະຄວາມໝັ້ນຄົງຂອງແຜ່ນດິນ.
Verse 37
ततस्तु वैतहव्यानां वधाय स महीपति: । पुत्र प्रस्थापयामास प्रतर्दनमरिंदमम्,इसके बाद राजाने अपने पुत्र शत्रुदमन प्रतर्दनको वीतहव्यके पुत्रोंका वध करनेके लिये भेजा
ຕໍ່ມາ ພຣະຣາຊານັ້ນມຸ່ງໝັ້ນຈະສັງຫານພວກໄວຕະຫະວະຍາ ຈຶ່ງສົ່ງພຣະຣາຊະບຸດປຣະຕາດະນະ—ຜູ້ປາບສັດຕູ—ໄປເພື່ອທຳລາຍພວກເຂົາ. ເຫດການນີ້ຊີ້ໃຫ້ເຫັນວ່າ ນະໂຍບາຍຂອງກະສັດອາດກາຍເປັນຄວາມຮຸນແຮງທີ່ສືບທອດກັນໄດ້—ເມື່ອພໍ່ອະນຸຍາດໃຫ້ລູກຊາຍນຳການແກ້ແຄ້ນເປັນສົງຄາມ.
Verse 38
सरथ: स तु संतीर्य गज्जामाशु पराक्रमी । प्रययौ वीतहव्यानां पुरी परपुरज्जय:
ພີດສະມະກ່າວວ່າ: ວິລະບຸລຸດຜູ້ກ້າຫານ ຜູ້ພິຊິດນະຄອນຂອງສັດຕູ ໄດ້ຂັບລົດສົງຄາມຂ້າມແມ່ນ້ຳ «ກັດຈາ» ຢ່າງວ່ອງໄວ ແລ້ວອອກເດີນທາງໄປຫານະຄອນຂອງວີຕະຫວະຍາ.
Verse 39
पिताकी आज्ञा पाकर वह शत्रुनगरीपर विजय पानेवाला पराक्रमी वीर शीघ्र ही रथसहित गंगापार करके वीतहतव्यपुत्रोंकी राजधानीकी ओर चल दिया ।। वैतहव्यास्तु संश्रुत्य रथघोष॑ समुद्धतम् । निर्ययुर्नगराकारै रथै: पररथारुजै:,उसके रथकी घोर घरघराहट सुनकर विचित्र ढंगसे युद्ध करनेवाले पुरुषसिंह हैहयराजकुमार कवचसे सुसज्जित होकर शत्रुओंके रथको तोड़ डालनेवाले नगराकार विशाल रथोंपर बैठे हुए पुरीसे बाहर निकले और धनुष उठाये बाणोंकी वर्षा करते हुए प्रतर्दनपर चढ़ आये
ພີດສະມະກ່າວວ່າ: ເມື່ອໄດ້ຍິນສຽງຄຳຮ້ອງຄືຟ້າຮ້ອງຂອງລົດສົງຄາມຂອງເຂົາ ເຈົ້າຊາຍວາຍຕະຫວະຍາ—ນັກຮົບດຸດັນດັ່ງສິງ ຊ່ຽວຊານການຮົບແບບແປກ—ສວມເກາະຄົບຄັນ ຂຶ້ນລົດໃຫຍ່ດັ່ງນະຄອນ ທີ່ສາມາດທຳລາຍລົດຂອງສັດຕູ ແລ້ວອອກຈາກເມືອງ. ພວກເຂົາຊູລູກທະນູ ແລະບຸກເຂົ້າຫາປະຕັດທະນະ ພ້ອມຝົນລູກສອນທີ່ສາດລົງມາ.
Verse 40
निष्क्रम्य ते नरव्याप्रा दंशिताश्रित्रयोधिन: । प्रतर्दन॑ समाजग्मु: शरवर्षैरुदायुधा:,उसके रथकी घोर घरघराहट सुनकर विचित्र ढंगसे युद्ध करनेवाले पुरुषसिंह हैहयराजकुमार कवचसे सुसज्जित होकर शत्रुओंके रथको तोड़ डालनेवाले नगराकार विशाल रथोंपर बैठे हुए पुरीसे बाहर निकले और धनुष उठाये बाणोंकी वर्षा करते हुए प्रतर्दनपर चढ़ आये
ພີດສະມະກ່າວວ່າ: ເມື່ອອອກມາແລ້ວ ຊາຍເຫຼົ່ານັ້ນ—ຜູ້ຂະຫຍັນໃນສົງຄາມ ສວມເກາະແນ່ນຫນາ ແລະຊ່ຽວຊານການຮົບຈາກລົດ—ໄດ້ບຸກເຂົ້າຫາປະຕັດທະນະ. ພວກເຂົາຊູອາວຸດ ແລະຈູ່ໂຈມດ້ວຍຝົນລູກສອນ.
Verse 41
शस्त्रैश्न विविधाकारै रथौचैश्व युधिष्ठिर । अभ्यवर्षन्त राजानं हिमवन्तमिवाम्बुदा:,युधिष्ठि!! जैसे बादल हिमालयपर जल बरसाते हैं, उसी प्रकार हैहयराजकुमारोंने रथसमूहोंद्वारा आकर राजा प्रतर्दनपर नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षा प्रारम्भ कर दी
ພີດສະມະກ່າວວ່າ: “ໂອ ຢຸດທິສຖິຣະ, ດ້ວຍອາວຸດຫຼາຍຊະນິດ ແລະດ້ວຍກອງລົດຈຳນວນຫຼາຍ ພວກເຂົາໄດ້ສາດອາວຸດໃສ່ພະຣາຊາ ດັ່ງເມກຝົນທີ່ທົ່ມຝົນລົງເທິງຮິມະວານ (ຫິມາໄລ).”
Verse 42
अस्त्रैरस्त्राणि संवार्य तेषां राजा प्रतर्दन: । जघान तान् महातेजा वज्जानलसमै: शरै:,तब महा तेजस्वी राजा प्रतर्दनने अपने अस्त्रोंद्वारा शत्रुओंके अस्त्रोंका निवारण करके वज्र और अग्निके समान तेजस्वी बाणोंसे उन सबको मार डाला
ພີດສະມະກ່າວວ່າ: ພະຣາຊາປະຕັດທະນະ ຜູ້ມີຣັດສະໝີອັນຍິ່ງໃຫຍ່ ໄດ້ໃຊ້ອາວຸດຂອງຕົນສະກັດກັ້ນອາວຸດຂອງສັດຕູ; ແລ້ວຈຶ່ງຍິງລູກສອນທີ່ລຸກໂຊດດັ່ງສາຍຟ້າແລະໄຟ ຟັນຟາດພວກເຂົາໃຫ້ລົ້ມລົງ.
Verse 43
कृत्तोत्तमाड़ास्ते राजन् भल्लै: शतसहस्रशः । अपततन् रुधिरार्द्राज़ा निकृत्ता इव किंशुका:,राजन! भल्लोंकी मारसे उनके मस्तकोंके सैकड़ों और हजारों टुकड़े हो गये थे। उनके सारे अंग खूनसे लथपथ हो गये और वे कटे हुए पलाशके वृक्षकी भाँति धरतीपर गिर पड़े
Bhishma said: “O King, struck by broad-headed arrows, their heads were hewn into hundreds and thousands of pieces. With limbs drenched in blood, they fell to the earth like kiṃśuka (palāśa) trees cut down.”
Verse 44
हतेषु तेषु सर्वेषु वीतहव्य: सुतेष्वथ । प्राद्रवन्नगरं हित्वा भूगोराश्रममप्युत,उन सब पुत्रोंके मारे जानेपर राजा वीतहव्य अपना नगर छोड़कर महर्षि भृगुके आश्रममें भाग गये
Bhishma said: When all those sons had been slain, King Vītahavya—overwhelmed by the destruction of his lineage—abandoned his city and fled to the hermitage of the sage Bhṛgu. The episode underscores how the collapse of worldly supports drives a ruler to seek refuge in ascetic sanctuaries, turning from royal power toward spiritual protection and counsel.
Verse 45
ययौ भृगुं च शरणं वीतहव्यो नराधिप: । अभयं च ददौ तस्मै राजे राजन् भगुस्तदा,राजन! वहाँ नरेश्वर वीतहव्यने महर्षि भूगुकी शरण ली। तब भूगुने राजाको अभयदान दे दिया
Bhīṣma said: King Vītahavya sought refuge with the sage Bhṛgu. Then Bhṛgu granted the king fearlessness (protection), O King—affirming the ethical duty to shelter one who has surrendered, even when he is a ruler in distress.
Verse 46
अथानुपदमेवाशु तत्रागच्छत् प्रतर्दन: । स प्राप्य चाश्रमपदं दिवोदासात्मजो<ब्रवीत्,इतनेहीमें उनके पीछे लगा हुआ दिवोदासकुमार प्रतर्दन भी शीघ्र ही वहाँ पहुँचा। आश्रममें पहुँचकर उसने इस प्रकार कहा--
Bhishma said: Then, close on their heels, Pratardana quickly arrived there. Reaching the hermitage, the son of Divodasa spoke as follows—setting the stage for the next exchange in which conduct, restraint, and right action are to be clarified.
Verse 47
भो भो: केजत्राश्रमे सन्ति भूगो: शिष्या महात्मन: । द्रष्टमिच्छे मुनिमहं तस्याचक्षत मामिति,भाइयो! इस आश्रममें महात्मा भृगुके शिष्य कौन-कौन हैं? मैं महर्षिका दर्शन करना चाहता हूँ। आपलोग उन्हें मेरे आगमनकी सूचना दे दें
Bhishma said: “Ho there, ho there! Who among you are the disciples of the great-souled Bhrigu in this hermitage? I wish to see the sage. Please inform him of my arrival.”
Verse 48
सतं विदित्वा तु भगुर्निश्चक्रामाश्रमात् तदा । पूजयामास च ततो विधिना नृपसत्तमम्
ພີດສະມະກ່າວວ່າ: ເມື່ອພະຄຸ (Bhagu) ຮູ້ແຈ້ງວ່າທ່ານນັ້ນເປັນຄົນມີຄຸນທຳແທ້ ກໍອອກຈາກອາສຣົມ. ຕໍ່ຈາກນັ້ນ ຕາມພິທີກຳແລະມາລະຍາດອັນຖືກຕ້ອງ ທ່ານໄດ້ຖວາຍການນັບຖືຢ່າງສົມຄວນແກ່ກະສັດຜູ້ປະເສີດ ຊີ້ໃຫ້ເຫັນວ່າ ທຳມະບໍ່ແມ່ນຢູ່ແຕ່ໃນຕະປະສະຍາ ແຕ່ຢູ່ໃນການປະພຶດຄາລະວະຕໍ່ຜູ້ຄວນຄາລະວະດ້ວຍ.
Verse 49
प्रतर्दनको आया जान भृगुजी आश्रमसे निकले। उन्होंने नृपश्रेष्ठ प्रतर्दनका विधिपूर्वक स्वागत-सत्कार किया ।। उवाच चैन राजेन्द्र कि कार्य ब्रूहि पार्थिव | स चोवाच नृपस्तस्मै यदागमनकारणम्,और इस प्रकार पूछा--'राजेन्द्र! पृथ्वीनाथ! मुझसे आपका क्या काम है, बताइये।' तब राजाने उनसे अपने आगमनका जो कारण था, उसे इस प्रकार बताया
ເມື່ອພຣຶກຸ (Bhṛgu) ຮູ້ວ່າກະສັດປຣະຕັດດະນະ (Pratardana) ມາຮອດແລ້ວ ທ່ານກໍອອກຈາກອາສຣົມ. ທ່ານໄດ້ຕ້ອນຮັບ ແລະຖວາຍການນັບຖືແກ່ກະສັດຜູ້ປະເສີດນັ້ນຕາມພິທີ. ແລ້ວພຣຶກຸກ່າວວ່າ: “ໂອ ຈອມກະສັດ, ໂອ ຜູ້ປົກຄອງແຜ່ນດິນ, ທ່ານມານີ້ເພາະການໃດ?” ເມື່ອນັ້ນ ກະສັດຈຶ່ງບອກເຫດຜົນແຫ່ງການມາຂອງພຣະອົງໃຫ້ທ່ານຟັງ.
Verse 50
राजोवाच अयं ब्रह्मन्नितो राजा वीतहव्यो विसर्ज्यताम् । तस्य पुन्रैहि मे कृत्स्नो ब्रह्मन् वंश: प्रणाशित:,राजाने कहा--ब्रह्मन! राजा वीतहव्यको आप यहाँसे बाहर निकाल दीजिये। विप्रवर! इनके पुत्रोंने मेरे सम्पूर्ण कुलका विनाश कर डाला है
ກະສັດກ່າວວ່າ: “ໂອ ພຣາຫມັນ, ຂໍໃຫ້ສົ່ງກະສັດວີຕະຫະວະ (Vītahavya) ຜູ້ນີ້ອອກໄປຈາກທີ່ນີ້. ໂອ ພຣາຫມັນຜູ້ປະເສີດ, ບຸດຂອງເຂົາໄດ້ນຳພາການພິນາດມາໃຫ້ແກ່ວົງຕະກູນຂອງຂ້າພະເຈົ້າທັງໝົດ.”
Verse 51
उत्सादितश्न विषय: काशीनां रत्नसंचय: । एतस्य वीर्यदृप्तस्य हतं पुत्रशतं मया
ພີດສະມະກ່າວວ່າ: “ຂ້າພະເຈົ້າໄດ້ທຳລາຍອານາເຂດຂອງເຂົາ ແລະຍຶດເອົາຂຸມຊັບຮວບຮວມຂອງຊາວກາສີ (Kāśī) ທັງຫມົດ. ແລະຊາຍຜູ້ນີ້ຜູ້ເມົາມົນດ້ວຍພະລັງຂອງຕົນ ຂ້າພະເຈົ້າໄດ້ສັງຫານບຸດຂອງເຂົາໄປໜຶ່ງຮ້ອຍຄົນ.”
Verse 52
तमुवाच कृपाविष्टो भृगुर्थर्मभूतां वर:
ດ້ວຍໃຈທີ່ເຕັມໄປດ້ວຍຄວາມເມດຕາ, ິສີພຣຶກຸ—ຜູ້ເປັນເລີດໃນບັນດາຜູ້ຕັ້ງຢູ່ໃນທຳມະ—ໄດ້ກ່າວກັບເຂົາ, ເພື່ອວາງນ້ຳໜັກແຫ່ງຈັນຍາບັນສຳລັບສິ່ງທີ່ຈະຕາມມາ.
Verse 53
एतत् तु वचन श्रुत्वा भगोस्तथ्यं प्रतर्दन:,महर्षि भूगुका यह यथार्थ वचन सुनकर प्रतर्दन बहुत प्रसन्न हुआ और धीरेसे उनके दोनों चरण छूकर बोला--“भगवन्! यदि ऐसी बात है तो मैं कृतकृत्य हो गया, इसमें संशय नहीं है
ພີດສະມະກ່າວວ່າ: ເມື່ອພຣະຣາຊາປຣະຕາຣະດະນະໄດ້ຟັງຖ້ອຍຄໍາທີ່ເປັນຄວາມຈິງນັ້ນ ກໍເກີດຄວາມຍິນດີຢ່າງຫຼາຍ. ດ້ວຍຄວາມເຄົາລົບ ລາວໄດ້ແຕະພຣະບາດຂອງມະຫາຣິສີຢ່າງອ່ອນໂຍນ ແລ້ວກ່າວວ່າ: «ໂອ ຜູ້ມີພຣະພອນ! ຖ້າເປັນຢ່າງນີ້ແທ້ ກໍເທົ່າກັບວ່າຂ້າພະເຈົ້າສໍາເລັດຈຸດປະສົງແລ້ວ—ບໍ່ມີຄວາມສົງໄສ».
Verse 54
पादावुपस्मृश्य शनै: प्रह्ृष्टो वाक््यमब्रवीत् | एवमप्यस्मि भगवन् कृतकृत्यो न संशय:,महर्षि भूगुका यह यथार्थ वचन सुनकर प्रतर्दन बहुत प्रसन्न हुआ और धीरेसे उनके दोनों चरण छूकर बोला--“भगवन्! यदि ऐसी बात है तो मैं कृतकृत्य हो गया, इसमें संशय नहीं है
ເມື່ອໄດ້ແຕະພຣະບາດ (ຂອງລະດັບພຣະຣິສີ) ຢ່າງອ່ອນໂຍນ ແລະເຕັມໄປດ້ວຍຄວາມຍິນດີ ລາວຈຶ່ງກ່າວວ່າ: «ໂອ ຜູ້ມີພຣະພອນ! ຖ້າເປັນຢ່າງນີ້ແທ້ ຂ້າພະເຈົ້າກໍໄດ້ສໍາເລັດສິ່ງທີ່ຄວນສໍາເລັດແລ້ວ—ບໍ່ມີຄວາມສົງໄສ».
Verse 55
य एष राजा वीर्येण स्वजातिं त्याजितो मया । अनुजानीहि मां ब्रह्मन् ध्यायस्व च शिवेन माम्,“क्योंकि इन राजाको मैंने अपने पराक्रमसे अपनी जाति त्याग देनेके लिये विवश कर दिया। ब्रह्मन! मुझे जानेकी आज्ञा दीजिये और मेरा कल्याण-चिन्तन कीजिये
ພີດສະມະກ່າວວ່າ: «ພຣະຣາຊາຜູ້ນີ້ ຖືກຂ້າພະເຈົ້າບັງຄັບດ້ວຍພະລັງວິລະກໍາ ໃຫ້ລະທິ້ງສະຖານະແລະສາຍສະກຸນອັນຄວນໄດ້ຂອງລາວ. ໂອ ພຣາຫມັນ, ຂໍຈົ່ງອະນຸຍາດໃຫ້ຂ້າພະເຈົ້າໄປ ແລະຈົ່ງຄິດຄໍານຶງເຖິງຄວາມສຸກສະຫວັດດີຂອງຂ້າພະເຈົ້າ—ຈົ່ງລະນຶກຂ້າພະເຈົ້າດ້ວຍມົງຄຸນ».
Verse 56
त्याजितो हि मया जातिमेष राजा भृगूद्धह | ततस्तेनाभ्यनुज्ञातो ययौ राजा प्रतर्दन:
ພີດສະມະກ່າວວ່າ: «ແທ້ຈິງ ຂ້າພະເຈົ້າໄດ້ບັງຄັບພຣະຣາຊາຜູ້ນີ້—ປຣະຕາຣະດະນະ ຜູ້ເປັນຜູ້ເດັ່ນໃນຫມູ່ພຣະຕະກູນພຣຶກຸ—ໃຫ້ລະທິ້ງອັດຕະລັກວັນນະຂອງລາວ. ຫຼັງຈາກນັ້ນ ເມື່ອໄດ້ຮັບອະນຸຍາດຈາກທ່ານ ພຣະຣາຊາປຣະຕາຣະດະນະກໍເດີນທາງຈາກໄປ».
Verse 57
भूगोर्वचनमात्रेण स च ब्रह्मर्षितां गत:
ພີດສະມະກ່າວວ່າ: «ດ້ວຍການນ້ອມນໍາປະຕິບັດຕາມຖ້ອຍຄໍາຂອງພຣຶກຸເທົ່ານັ້ນ ລາວກໍໄດ້ບັນລຸສະຖານະເປັນ ພຣະພຣາຫມະຣິສີ (Brahmarṣi) ເຊັ່ນກັນ».
Verse 58
तस्य गृत्समद: पुत्रो रूपेणेन्द्र इवापर:
ພີສະມະ ກ່າວວ່າ: «ບຸດຂອງລາວ ຊື່ ກຣິດສະມາດ ມີຮູບງາມດັ່ງອິນທຣະອີກອົງໜຶ່ງ—ສະຫວ່າງໄສ ແລະ ສົດສະໃສໃນຮູບພັນ»។
Verse 59
ऋग्गवेदे वर्तते चाग्रया श्रुतिर्यस्थ महात्मन:,ऋग्वेदमें महामना गृत्समदकी श्रेष्ठ श्रुति विद्यमान है। राजन! वहाँ ब्राह्मणलोग गृत्सममदका बड़ा सम्मान करते हैं। ब्रह्मर्षि गृत्समद बड़े तेजस्वी और ब्रह्मचारी थे
ພີສະມະ ກ່າວວ່າ: «ໃນຣິກເວດ (Rigveda) ມີສຣຸຕິ (śruti) ອັນສູງສຸດ ແລະ ໂດດເດັ່ນ ທີ່ສືບເນື່ອງກັບມະຫາວິນຍານນັ້ນ. ໂອ ພະຣາຊາ! ທີ່ນັ້ນ ພວກພຣາຫມະນະຍົກຍ້ອງ ຣິຊິ ກຣິດສະມາດ ຢ່າງສູງສຸດ; ພຣະຫມະຣິຊິ ກຣິດສະມາດ ສະຫວ່າງໄສດ້ວຍພະລັງທາງຈິດ ແລະ ໝັ້ນຄົງໃນວິນັຍພຣະຫມະຈາຣິ (ພຣະຫມະຈັນທະ)»។
Verse 60
यत्र गृत्समदो राजन ब्राह्मणैः स महीयते । स ब्रह्मचारी विप्रर्षि: श्रीमान् गृत्समदो5भवत्,ऋग्वेदमें महामना गृत्समदकी श्रेष्ठ श्रुति विद्यमान है। राजन! वहाँ ब्राह्मणलोग गृत्सममदका बड़ा सम्मान करते हैं। ब्रह्मर्षि गृत्समद बड़े तेजस्वी और ब्रह्मचारी थे
ພີສະມະ ກ່າວວ່າ: «ໂອ ພະຣາຊາ! ບ່ອນໃດທີ່ພວກພຣາຫມະນະຍົກຍ້ອງ ກຣິດສະມາດ, ທີ່ນັ້ນ ກຣິດສະມາດ ເປັນພຣາຫມະຈາຣິ ແລະ ເປັນວິປຣະຣິຊິ (viprarṣi) ຜູ້ມີສິຣີສົດໃສ.»
Verse 61
पुत्रो गृत्समदस्यापि सुचेता अभवद् द्विज: । वर्चा: सुचेतस: पुत्रो विहव्यस्तस्य चात्मज:,गृत्समदके पुत्र सुचेता नामके ब्राह्मण हुए। सुचेताके पुत्र वर्चा और वचकि पुत्र विह॒व्य हुए
ພີສະມະ ກ່າວວ່າ: «ກຣິດສະມາດ ກໍມີບຸດຄົນໜຶ່ງ ເປັນທະວິຊະ (dvija) ຊື່ ສຸເຈຕາ (Sucetā). ບຸດຂອງສຸເຈຕາ ຄື ວັຣຈາ (Varcā) ແລະ ບຸດຂອງວັຣຈາ ຄື ວິຫະວະຍະ (Vihavya).»
Verse 62
विहव्यस्य तु पुत्रस्तु वितत्यस्तस्य चात्मज: । वितत्यस्य सुतः सत्य: संतः सत्यस्य चात्मज:,विहव्यके पुत्रका नाम वितत्य था। वितत्यके पुत्र सत्य और सत्यके पुत्र सन्त हुए
ພີສະມະ ກ່າວວ່າ: «ວິຫະວະຍະ (Vihavya) ມີບຸດຊື່ ວິຕະຕະຍະ (Vitatya). ວິຕະຕະຍະ ມີບຸດຊື່ ສັດຕະຍະ (Satya). ແລະ ສັດຕະຍະ ມີບຸດຊື່ ສັນຕະ (Santa). ດັ່ງນີ້ ສາຍສະກຸນຖືກເລົ່າຕາມລຳດັບ ເພື່ອຮັກສາຄວາມຊົງຈຳແຫ່ງການສືບທອດອັນຊອບທຳ ແລະ ຄວາມຕໍ່ເນື່ອງຂອງບັນພະບຸລຸດ.»
Verse 63
श्रवास्तस्य सुतश्चर्षि: श्रवसश्चा भवत् तम: । तमसश्न प्रकाशो5भूत् तनयो द्विजसत्तम: । प्रकाशस्य च वागिन्द्रो बभूव जयतां वर:,सन्तके पुत्र महर्षि श्रवा, श्रवाके तम और तमके पुत्र द्विजश्रेष्ठ प्रकाश हुए। प्रकाशका पुत्र विजयशीलोंमें श्रेष्ठ वागिन्द्र था
ພີສະມະກ່າວວ່າ: «ຈາກທ່ານນັ້ນເກີດຣິຊິນາມ ສຣາວາ; ຈາກສຣາວາເກີດ ຕະມະ. ຈາກຕະມະເກີດ ປຣະກາສະ ພຣາຫມັນຜູ້ປະເສີດຍິ່ງ. ແລະຈາກປຣະກາສະເກີດ ວາຄິນທຣະ ຜູ້ເປັນເລີດໃນຫມູ່ຜູ້ມີໄຊ».
Verse 64
तस्यात्मजश्न प्रमितिर्वेदवेदाड़पारग: । घृताच्यां तस्य पुत्रस्तु रुरुर्नामोदपद्यत,वागिन्द्रके पुत्र प्रमेति हुए जो वेदों और वेदांगोंके पारंगत विद्वान् थे। प्रमितिके घृताची अप्सरासे रुरुनामक पुत्र हुआ
ພີສະມະກ່າວວ່າ: «ບຸດຂອງທ່ານນັ້ນຊື່ ປຣະມິຕິ ເປັນນັກຮູ້ຜູ້ຊໍານານວິທະຍາເວດ ແລະ ເວດາງຄະ. ຈາກປຣະມິຕິ ແລະ ອັບສະຣາ ຄຣຶຕາຈີ (Ghṛtācī) ເກີດບຸດຊື່ ຣຸຣຸ».
Verse 65
प्रमद्वरायां तु रुरो: पुत्र: समुदपद्यत । शुनको नाम विदप्रर्षियस्य पुत्रो5थ शौनक:,रुससे प्रमद्वराके गर्भसे ब्रह्मर्षि शुनकका जन्म हुआ, जिनके पुत्र शौनक मुनि हैं
ພີສະມະກ່າວວ່າ: «ຈາກ ປຣະມັດວະຣາ (Pramadvarā) ຣຸຣຸ ໄດ້ມີບຸດຊື່ ຊຸນະກະ (Śunaka). ແລະຈາກຣິຊິ ຊຸນະກະ ນັ້ນ ກໍເກີດ ຊໍານະກະ (Śaunaka) ຜູ້ສືບສາຍ.»
Verse 66
एवं विप्रत्वमगमद् वीतहव्यो नराधिप: । भृगो: प्रसादादू राजेन्द्र क्षत्रिय: क्षत्रियर्षभ,राजेन्द्र! क्षत्रियशिरोमणे! इस प्रकार राजा वीतहव्य क्षत्रिय होकर भी भृगुके प्रसादसे ब्राह्मण हो गये
ພີສະມະກ່າວວ່າ: «ດັ່ງນັ້ນ ພຣະຣາຊາ ວີຕະຫະວະ (Vītahavya) ໄດ້ບັນລຸສະຖານະເປັນພຣາຫມັນ. ໂອ ພຣະຣາຊາຜູ້ປະເສີດ! ແມ່ນແທ້ວ່າທ່ານເປັນກະສັດຊັ້ນກະສັດ (kṣatriya)—ເປັນດັ່ງພະຍຸງໃນຫມູ່ກະສັດ—ແຕ່ໂດຍພຣະກະລຸນາແລະພອນຂອງ ພຣຶກຸ (Bhṛgu) ທ່ານກໍກາຍເປັນພຣາຫມັນ.»
Verse 67
तथैव कथितो वंशो मया गार्त्समदस्तव | विस्तरेण महाराज किमन्यदनुपृच्छसि
ພີສະມະກ່າວວ່າ: «ດັ່ງນັ້ນ ໂອ ຜູ້ສືບສາຍຈາກ ກາຣຕສະມະດະ (Gārtsamada), ໂອ ມະຫາຣາຊາ, ຂ້າໄດ້ເລົ່າວົງສາຂອງທ່ານໂດຍລະອຽດແລ້ວ. ທ່ານຍັງປາດຖະນາຈະຖາມອັນໃດອີກ?»
Verse 513
अस्येदानीं वधादद्य भविष्याम्यनृण: पितु: । इतना ही नहीं, उनके पुत्रोंने काशिप्रान्तका सारा राज्य उजाड़ डाला और रत्नोंका संग्रह लूट लिया है। बलके घमंडमें भरे हुए इन राजाके सौ पुत्रोंको तो मैंने मार डाला; अब केवल ये ही रह गये हैं। इस समय इनका भी वध करके मैं पिताके ऋणसे उऋण हो जाऊँगा?
ພີສະມະກ່າວວ່າ: «ຖ້າຂ້າພະເຈົ້າຂ້າເຂົາໃນມື້ນີ້ ຂ້າພະເຈົ້າຈະພົ້ນຈາກໜີ້ບຸນຄຸນຕໍ່ບິດາໃນທີ່ສຸດ. ບໍ່ແຕ່ນັ້ນ—ລູກຊາຍຂອງເຂົາໄດ້ທຳລາຍອານາຈັກທັງໝົດໃນແດນກາສີ ແລະປົ້ນເອົາຄັງຮັບຮອງຮັດຖະສົມບັດ. ດ້ວຍຄວາມຈອງຫອງ ຂ້າພະເຈົ້າໄດ້ຂ້າລູກຊາຍຂອງກະສັດນັ້ນຮ້ອຍຄົນແລ້ວ; ບັດນີ້ເຫຼືອແຕ່ພວກນີ້. ຖ້າຂ້າພະເຈົ້າຂ້າພວກນີ້ອີກ ຈະພົ້ນຈາກພັນທະຕໍ່ບິດາຫຼືບໍ?»
Verse 523
नेहास्ति क्षत्रिय: कश्रित् सर्वे हीमे द्विजातय: । तब धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ भूगुने दयासे द्रवित होकर उनसे कहा--'राजन्! यहाँ कोई क्षत्रिय नहीं है। ये सब-के-सब ब्राह्मण हैं
ພີສະມະກ່າວວ່າ: «ຂໍພຣະອົງກະສັດ, ທີ່ນີ້ບໍ່ມີກະສັດນັກຮົບ (ກະສັດຕຣິຍະ) ເລີຍ. ຜູ້ທີ່ຢູ່ນີ້ທັງໝົດແມ່ນດວິຊະ—ພຣາຫມັນທັງນັ້ນ».
Verse 563
यथागतं महाराज मुक््त्वा विषमिवोरग: । भृगुवंशी महर्षे! मैंने इन राजासे अपनी जातिका त्याग करवा दिया।” महाराज! तदनन्तर महर्षिकी आज्ञा लेकर राजा प्रतर्दन जैसे साँप अपने विषको त्याग देता है, उसी प्रकार क्रोध छोड़कर जैसे आया था वैसे लौट गया
ພີສະມະກ່າວວ່າ: «ຂໍພຣະອົງມະຫາກະສັດ, ຫຼັງຈາກໄດ້ຮັບອະນຸຍາດຈາກມະຫາລິສີ ກະສັດປະຕັດດະນະກໍກັບໄປດັ່ງທີ່ມາ—ປ່ອຍວາງຄວາມໂກດ ເຫມືອນງູທີ່ສະລັດພິດຂອງຕົນ. ໂອ ມະຫາລິສີແຫ່ງວົງສາບຣິກຸ, ຂ້າພະເຈົ້າໄດ້ເຮັດໃຫ້ກະສັດນີ້ລະທິ້ງຄວາມຈອງຫອງໃນຊາດກຳເນີດຂອງຕົນ».
Verse 573
वीतहव्यो महाराज ब्रह्म॒वादित्वमेव च । नरेश्वर! इस प्रकार राजा वीतहव्य भृूगुजीके कथनमात्रसे ब्रह्मर्षि एवं ब्रह्मवादी हो गये
ພີສະມະກ່າວວ່າ: «ຂໍພຣະອົງມະຫາກະສັດ, ດັ່ງນັ້ນ ກະສັດວີຕະຫະວະ ໄດ້ບັນລຸສະຖານະເປັນບຣະຫມະຣິສີ ແລະເປັນຜູ້ປະກາດບຣະຫມັນຢ່າງແທ້ຈິງ ໂດຍເພີງຄຳກ່າວຂອງພຣະມຸນີບຣິກຸ».
Verse 586
शक्रस्त्वमिति यो दैत्यैर्निंगृहीत: किलाभवत् | उनके पुत्रो गृत्समद हुए जो रूपमें दूसरे इन्द्रके समान थे। कहते हैं, किसी समय दैत्योंने उन्हें यह कहते हुए पकड़ लिया था कि “तुम इन्द्र हो"
ພີສະມະກ່າວວ່າ: «ເຂົາເລົ່າກັນວ່າ ຄັ້ງໜຶ່ງ ພວກດານະວະ (ໄດຕະຍະ) ໄດ້ຈັບຕົວເຂົາ ໂດຍກ່າວຫາວ່າ ‘ເຈົ້າແມ່ນສັກຣະ (ອິນທຣະ)’».
He asks which royal duty is greatest among all obligations and what conduct allows a king to secure welfare in both this world and the next.
To regularly honor reputable and senior learned brāhmaṇas—especially śrotriyas—through respectful engagement, appropriate material support, salutations, and protective governance, treating their well-being as integral to the realm’s stability.
Yes. It advises that disparagement of dvijas should not be listened to; one should remain silent and withdraw, emphasizing disciplined speech and avoidance of factional hostility as part of ethical state maintenance.