Adhyaya 285
Vana ParvaAdhyaya 28556 Versesयुद्ध आरम्भ नहीं; यह लंका-युद्ध की निर्णायक तैयारी और पारगमन-चरण है—रणनीतिक बढ़त राम-पक्ष की ओर।

Adhyaya 285

सूर्य–कर्णोपदेशः (Sūrya’s Counsel to Karṇa on Kīrti and the Kuṇḍala)

Upa-parva: Karna–Indra–Sūrya Saṃvāda (Kundala-dāna Pratiṣedha Episode)

Sūrya addresses Karṇa, affirming his prior beneficence toward self, friends, family, and parents, then reframes the pursuit of lasting fame (kīrti) as incompatible with actions that destroy life (prāṇa-virodha). He argues that meaningful work and social obligations belong to the living—parents, children, kin, and rulers act only while life remains—and that fame is valuable chiefly for one who can experience and operationalize it. The discourse introduces a guarded divine secret (deva-guhya), withheld until the proper time, and pivots to a concrete injunction: Karṇa should not give his radiant kuṇḍala to a mendicant who is in fact Vajrapāṇi (Indra). Sūrya underscores the ornaments’ protective and symbolic power, asserts that Arjuna cannot defeat Karṇa while he retains them (even if Indra’s own force were weaponized), and advises rhetorical strategies to repeatedly and plausibly deflect Indra’s request. The chapter thus integrates moral reasoning (fame versus life), devotion-based admonition, and strategic foresight oriented toward an impending martial encounter.

Chapter Arc: समुद्र-तट पर राम के चारों ओर वानर-सेना का महासंगठन होता है—कोटि-कोटि तरस्वी यूथपति, सुषेण, गज, गवय आदि अपने-अपने दलों सहित उपस्थित होकर लंका-गमन की घड़ी को विराट बना देते हैं। → समुद्र अजेय बाधा बनकर सामने खड़ा है। राम उपाय से पहले विनय चुनते हैं—समुद्र की आराधना और उपवास का संकल्प; पर भीतर-ही-भीतर यह भी स्पष्ट कर देते हैं कि यदि मार्ग न मिला तो वे अप्रतिहत महास्त्रों से समुद्र को दग्ध कर देंगे। → राम का निर्णायक संकल्प—‘मार्ग न दिखा तो दहन’—प्रकृति के सामने धर्म-बल और राज-बल का चरम उद्घोष बनता है; इसी निर्णायक क्षण से समाधान का द्वार खुलता है और सेतु-निर्माण की दिशा निश्चित होती है। → विभीषण की सम्मति के अनुसार सेतु के द्वारा राम एक मास में समस्त सेना सहित महासागर को पार करते हैं। मार्ग बन जाता है, अभियान को ठोस आधार मिलता है, और लंका के द्वार पर युद्ध की भूमिका तैयार हो जाती है। → लंका-समक्ष पहुँचकर राक्षस-दूत अपने वास्तविक रूप में प्रकट होते हैं; राम उन्हें अपनी सेना का दर्शन कराकर छोड़ देते हैं—अब अगला चरण सीधे लंका-युद्ध की देहरी पर है।

Shlokas

Verse 1

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका ३ श्लोक मिलाकर कुल ७१ ६ “लोक हैं) 3 “+(>9) #2<# # 5-7 त्रयशीर्त्याधिकद्विशततमो< ध्याय: वानर-सेनाका संगठन, है का का निर्माण, विभीषणका अभिषेक और लंकाकी सेनाका प्रवेश तथा अंगदको रावणके पास दूत बनाकर भेजना मार्कण्डेय उवाच ततस्तत्रैव रामस्य समासीनस्य तै: सह । समाजग्मु: कपिश्रेष्ठा: सुग्रीववचनात्‌ तदा,मार्कण्डेयजी कहते हैं--युधिष्ठिर! तदनन्तर सुग्रीवकी आज्ञाके अनुसार बड़े-बड़े वानरवीर माल्यवान्‌ पर्वतपर लक्ष्मण आदिके साथ बैठे हुए भगवान्‌ श्रीरामके पास पहुँचने लगे

មារកណ្ឌេយៈបានមានព្រះវាចា៖ បន្ទាប់មក នៅទីនោះឯង ពេលព្រះរាមអង្គុយជាមួយព្រះលក្ខ្មណ និងពួកគេ កំពូលវីរបុរសវានរទាំងឡាយ ក៏ប្រមូលផ្តុំគ្នា ហើយមកដល់ក្បែរព្រះអង្គ តាមព្រះបញ្ជារបស់សុគ្រីវនៅពេលនោះ។

Verse 2

वृत: कोटिसहस्रेण वानराणां तरस्विनाम्‌ । श्वशुरो वालिन: श्रीमान्‌ सुषेणो राममभ्ययात्‌,सबसे पहले वालीके श्वशुर श्रीमान्‌ सुषेण श्रीरामचन्द्रजीकी सेवामें उपस्थित हुए। उनके साथ वेगशाली वानरोंकी सहस्र कोटि (दस अरब) सेना थी

មារកណ្ឌេយៈបានមានព្រះវាចា៖ សុសេណ អ្នកមានកិត្តិយស ជាឪពុកក្មេករបស់វាលី បានចូលទៅជិតព្រះរាម ដោយមានវានរវីរបុរសលឿនរហ័ស និងខ្លាំងក្លា រាប់ពាន់កោដិព័ទ្ធជុំវិញ។

Verse 3

कोटीशतवृतो वापि गजो गवय एव च । वानरेन्द्रौ महावीर्यों पृथक्‌ पृथगदृश्यताम्‌,फिर महापराक्रमी वानरराज “गज” और “गवय' पृथक्‌-पृथक्‌ एक-एक अरब सेनाके साथ आते दिखायी दिये

មារកណ្ឌេយៈបានមានព្រះវាចា៖ បន្ទាប់មក ក្សត្រវានរវីរបុរសពីរអង្គ—«គជ» និង «គវយ»—បានបង្ហាញខ្លួនមក ដោយម្នាក់ៗមកដាច់ដោយឡែក ហើយម្នាក់ៗមានកងពលរាប់រយកោដិព័ទ្ធជុំវិញ។

Verse 4

षष्टिकोटिसहस्राणि प्रकर्षन्‌ प्रत्यदृश्यत । गोलाड्गूलो महाराज गवाक्षो भीमदर्शन:,महाराज! गोलांगूल (लंगूर) जातिका वानर गवाक्ष, जो देखनेमें बड़ा भयंकर था, साठ सहस्र कोटि (छ: खरब) वानर-सेना साथ लिये दृष्टिगोचर हुआ

មារកណ្ឌេយៈបានមានព្រះវាចា៖ ឱ មហារាជ! បន្ទាប់មក «គវាក្ស» វានរប្រភេទគោលាង្គូល (លងួរ) ដែលមើលទៅគួរឱ្យភ័យខ្លាច បានដើរមកមុខ ដោយនាំមកជាមួយកងទ័ពដ៏មហិមា ចំនួនហុកសិបពាន់កោដិ។

Verse 5

गन्धमादनवासी तु प्रथितो गन्धमादन: । कोटीशतसहस््राणि हरीणां समकर्षत,गन्धमादन पर्वतपर रहनेवाला गन्धमादन नामसे विख्यात वानर वानरोंकी दस खरब सेना साथ लेकर आया

មារកណ្ឌេយៈបានមានព្រះវាចាថា៖ មានវានរមួយឈ្មោះ គន្ធមាទនៈ ដែលល្បីល្បាញណាស់ ស្នាក់នៅលើភ្នំគន្ធមាទនៈ។ គាត់បានប្រមូលផ្តុំ និងនាំមកនូវកងទ័ពវានរច្រើនរាប់មិនអស់—រាប់ជារយកោដិ និងរាប់ពាន់—ធ្វើឲ្យកម្លាំងវានររីកធំឡើងយ៉ាងខ្លាំង។

Verse 6

पनसो नाम मेधावी वानर: सुमहाबल: । कोटीर्दश द्वादश च त्रिंशत्‌ पञ्च प्रकर्षति,पनस नामक बुद्धिमान्‌ तथा महाबली वानर सत्तावन करोड़ सेना साथ लेकर आया

មារកណ្ឌេយៈបានមានព្រះវាចាថា៖ មានមេវានរមួយឈ្មោះ បនសៈ ជាបុគ្គលមានប្រាជ្ញា និងមានកម្លាំងអស្ចារ្យ។ គាត់បានប្រមូល និងនាំមកនូវកងទ័ពដ៏ធំមហិមា រាប់បានដប់កោដិ ទ្វារដប់កោដិ និងសាមសិបប្រាំកោដិ។

Verse 7

श्रीमान्‌ दधिमुखो नाम हरिवृद्धो5तिवीर्यवान्‌ । प्रचकर्ष महासैन्यं हरीणां भीमतेजसाम्‌,वानरोंमें वृद्ध तथा अत्यन्त पराक्रमी श्रीमान्‌ दधिमुख भयंकर तेजसे सम्पन्न वानरोंकी विशाल सेना साथ लेकर आये

មារកណ្ឌេយៈបានមានព្រះវាចាថា៖ មានវានរវ័យចាស់មួយឈ្មោះ ទធិមុខៈ មានកិត្តិយស និងមានអំណាចវីរភាពលើសលប់។ គាត់បានប្រមូលផ្តុំ និងដឹកនាំកងទ័ពវានរដ៏ធំមហិមា ដែលសុទ្ធតែមានពន្លឺកម្លាំងគួរឲ្យភ័យខ្លាច។

Verse 8

कृष्णानां मुखपुण्ड्राणामृक्षाणां भीमकर्मणाम्‌ | कोटीशतसहस्रेण जाम्बवानू्‌ प्रत्यदृश्यत,जिनके मुख (ललाट)-पर तिलकका चिह्न शोभा पा रहा था तथा जो भयंकर पराक्रम करनेवाले थे, ऐसे काले रंगके शतकोटि सहस्र (दस खरब) रीछोंकी सेनाके साथ वहाँ जाम्बवान्‌ दिखायी दिये

កងរីឆខ្មៅៗ ដែលមានសញ្ញាទិលកលើលលាដ៍មុខ និងធ្វើកិច្ចការគួរឲ្យភ័យខ្លាច បានមកជាមួយចំនួនរាប់ជារយកោដិ និងរាប់ពាន់; នៅទីនោះ យើងបានឃើញ ជាំបវាន (Jāmbavān) លេចឡើងជាមួយកងទ័ពដ៏មហិមានោះ។

Verse 9

एते चान्ये च बहवो हरियूथपयूथपा: । असंख्येया महाराज समीयू रामकारणात्‌,महाराज! ये तथा और भी बहुत-से वानर-यूथपतियोंके भी यूथपति, जिनकी कोई संख्या नहीं थी, श्रीरामचन्द्रजीके कार्यसे वहाँ एकत्र हुए

មហារាជ! ពួកនេះ និងអ្នកដទៃទៀតជាច្រើន—មេកងវានរ និងមេកងលើមេកង—ដែលរាប់មិនអស់ បានមកប្រមូលផ្តុំគ្នានៅទីនោះ ដោយសារកិច្ចការរបស់ព្រះរាម។

Verse 10

गिरिकूटनिभाड़ानां सिंहानामिव गर्जताम्‌ | श्रूयते तुमुल: शब्दस्तत्र तत्र प्रधावताम्‌,उनके अंग पर्वतोंके शिखरके सदृश जान पड़ते थे। वे सबके सब सिंहोंके समान गरजते और इधर-उधर दौड़ते थे। उन सबका सम्मिलित शब्द बड़ा भयंकर प्रतीत होता था

មារកណ្ឌេយៈបានមានព្រះវាចាថា៖ «អវយវៈរបស់ពួកគេហាក់ដូចកំពូលភ្នំ។ ពួកគេគ្រហឹមដូចសិង្ហ ហើយរត់ប្រញាប់ទៅមកគ្រប់ទិស។ ដូច្នេះនៅទីនោះៗបានឮសំឡេងរំភើបរំខានដ៏ធំ—សំឡេងរួមគ្នាដ៏គួរឱ្យភ័យខ្លាច កើតពីចលនារបស់ពួកគេទាំងអស់»។

Verse 11

गिरिकूटनिभा: केचित्‌ केचिन्महिषसंनिभा: । शरदशभ्रप्रतीकाशा: केचिद्धिड्डुलकानना:,कोई पर्वत-शिखरके समान ऊँचे थे तो कोई भैंसोंके सदूश मोटे और काले। कितने ही वानर शरद-ऋतुके बादलोंकी तरह सफेद दिखायी देते थे, कितनोंके ही मुख सिन्दूरके समान लाल रंगके थे

មារកណ្ឌេយៈបានមានព្រះវាចាថា៖ «ខ្លះខ្ពស់ដូចកំពូលភ្នំ; ខ្លះទៀតក្រាស់ធំ និងងងឹតដូចក្របី។ វានរខ្លះសដូចពពករដូវស្លឹកឈើជ្រុះ ខណៈដែលខ្លះទៀតមានមុខក្រហមដូចសិន្ទូរ (វើមីល្យុង)»។

Verse 12

उत्पतन्तः पतन्तश्न प्लवमानाश्न वानरा: । उद्धुन्वन्तो 5परे रेणून्‌ समाजग्मु: समन्ततः,वे वानर सैनिक उछलते, गिरते-पड़ते, कूदते-फाँदते और धूल उड़ाते हुए चारों ओरसे एकत्र हो रहे थे

មារកណ្ឌេយៈបានមានព្រះវាចាថា៖ «ពួកវានរ—លោតឡើង ធ្លាក់ចុះ ក៏លោតឆ្លងទៅមុខ—បានមកប្រមូលផ្តុំគ្នាពីគ្រប់ទិស។ ខ្លះទៀតក៏ក្រឡុករាងកាយ ហើយបោះបង់ធូលីឲ្យហោះឡើងជាពពក»។

Verse 13

स वानरमहासैन्य: पूर्णसागरसंनिभ: । निवेशमकरोत तत्र सुग्रीवानुमते तदा,वानरोंकी वह विशाल सेना भरे-पूरे महासागरके समान दिखायी देती थी। सुग्रीवकी आज्ञासे उस समय माल्यवान्‌ पर्वतके आस-पास ही उस समस्त सेनाका पड़ाव पड़ गया

មារកណ្ឌេយៈបានមានព្រះវាចាថា៖ «កងទ័ពវានរដ៏មហិមានោះ មើលទៅដូចមហាសមុទ្រដែលពេញលេញ និងកំពុងហើមឡើង។ បន្ទាប់មក ពួកគេបានតាំងជំរុំនៅទីនោះ តាមការយល់ព្រមរបស់សុគ្រីវ»។

Verse 14

ततस्तेषु हरीन्द्रेषु समावृत्तेषु सर्वश: । तिथौ प्रशस्ते नक्षत्रे मुहूर्ते चाभिपूजिते,तदनन्तर उन समस्त श्रेष्ठ वानरोंक सब ओरसे एकत्र हो जानेपर सुग्रीवसहित भगवान्‌ श्रीरामने एक दिन शुभ तिथि, उत्तम नक्षत्र और शुभ मुहूर्तमें युद्धके लिये प्रस्थान किया। उस समय ऐसा जान पड़ता था, मानो वे उस व्यूहरचनायुक्त सेनाके द्वारा सम्पूर्ण लोकोंका संहार करने जा रहे हैं

បន្ទាប់មក ពេលដែលវានរអធិរាជទាំងនោះបានប្រមូលផ្តុំគ្នាពីគ្រប់ទិសរួចហើយ ហើយបានដល់ថ្ងៃតិថីសុភមង្គល នក្ខត្រល្អ និងមុហូរតដ៏បានគោរពជាសុភមង្គល ព្រះរាម—ជាមួយសុគ្រីវ—បានចេញដំណើរទៅសង្គ្រាម។ នៅពេលនោះ ទិដ្ឋភាពហាក់ដូចជាពួកគេ ដោយកងទ័ពដែលរៀបចំជាវ្យូហៈនោះ កំពុងត្រៀមនាំមហាវិនាសមកលើលោកទាំងអស់។

Verse 15

तेन व्यूढेन सैन्येन लोकानुद्)र्तयन्निव । प्रययौ राघव: श्रीमान्‌ सुग्रीवसहितस्तदा,तदनन्तर उन समस्त श्रेष्ठ वानरोंक सब ओरसे एकत्र हो जानेपर सुग्रीवसहित भगवान्‌ श्रीरामने एक दिन शुभ तिथि, उत्तम नक्षत्र और शुभ मुहूर्तमें युद्धके लिये प्रस्थान किया। उस समय ऐसा जान पड़ता था, मानो वे उस व्यूहरचनायुक्त सेनाके द्वारा सम्पूर्ण लोकोंका संहार करने जा रहे हैं

មារកណ្ឌេយៈបាននិយាយថា៖ ដោយកងទ័ពដែលរៀបចំជាវ្យូហៈយ៉ាងរឹងមាំនោះ ព្រះរាឃវៈដ៏រុងរឿង បានចេញដំណើរនៅពេលនោះជាមួយសុគ្រីវៈ ដូចជាអ្នកដែលដោយកម្លាំងកងទ័ពដែលមានរបៀបរៀបចំនោះ នឹងបំផ្លាញ និងបោសសំអាតពិភពលោកទាំងមូល។

Verse 16

मुखमासीत्‌ तु सैन्यस्य हनूमान्‌ मारुतात्मज: । जघनं पालयामास सौमित्रिरकुतोभय:,उस सेनाके मुहानेपर वायुपुत्र हनुमानजी विद्यमान थे। किसीसे भी भय न माननेवाले सुमित्रानन्दन लक्ष्मण उसके पृष्ठभागकी रक्षा कर रहे थे

មារកណ្ឌេយៈបាននិយាយថា៖ នៅមុខកងទ័ព ព្រះហនុមាន់ កូននៃទេវតាខ្យល់ បានឈរជាមុខសព្វថ្ងៃ។ ខាងក្រោយវិញ សោមិត្រី (លក្ខ្មណៈ) អ្នកមិនខ្លាចអ្វីឡើយ បានការពារផ្នែកខាងក្រោយ ឲ្យកងទ័ពមានសុវត្ថិភាពគ្រប់ទិស។

Verse 17

बद्धगोधाडुलित्राणौ राघवौ तत्र जम्मतुः । वृतौ हरिमहामात्रै श्वन्द्रसूर्यों ग्रहैरिव,दोनों रघुवंशी वीर श्रीराम और लक्ष्मण हाथोंमें गोहके चमड़ेके बने हुए दस्ताने पहने हुए थे। वे ग्रहोंसे घिरे हुए चन्द्रमा और सूर्यकी भाँति वानरजातीय मन्त्रियोंके बीचमें होकर चल रहे थे

មារកណ្ឌេយៈបាននិយាយថា៖ នៅទីនោះ វីរបុរសទាំងពីរនៃវង្សរាឃុ—ព្រះរាម និងលក្ខ្មណៈ—បានដំណើរទៅមុខ ដោយពាក់ស្រោមដៃធ្វើពីស្បែកកណ្ដូបធំ (អ៊ីហ្គ្វាណា)។ ពួកគេត្រូវបានព័ទ្ធជុំវិញដោយមហាមន្ត្រីនៃពួកវានរ ដូចព្រះចន្ទ និងព្រះអាទិត្យដែលមានភពផ្កាយបម្រើព័ទ្ធជុំវិញ។

Verse 18

प्रबभौ हरिसैन्यं तत्‌ सालतालशिलायुधम्‌ | सुमहच्छालिभवनं यथा सूर्योदयं प्रति

មារកណ្ឌេយៈបាននិយាយថា៖ កងទ័ពវានរ (ហរិ) នោះភ្លឺរលោង—កាន់ដើមសាល និងដើមតាលជាអាវុធ ព្រមទាំងថ្មធំៗ—ដូចទីក្រុងព្រះរាជវាំងដ៏អស្ចារ្យធំមួយ ដែលរលោងចែងចាំងនៅមុខព្រះអាទិត្យរះ។

Verse 19

श्रीरामचन्द्रजीके सम्मुख साल, ताल और शिलारूपी आयुध लिये वे समस्त वानर सैनिक सूर्योदयके समय पके हुए धानके विशाल खेतोंके समान जान पड़ते थे ।। नलनीलाड्डदक्राथमैन्दद्धिविदपालिता । ययौ सुमहती सेना राघवस्यार्थसिद्धये,नल, नील, अंगद, क्राथ, मैन्द तथा द्विविदके द्वारा सुरक्षित हुई वह विशाल वानरसेना श्रीरामचन्द्रजीका कार्य सिद्ध करनेके लिये आगे बढ़ती चली जा रही थी

មារកណ្ឌេយៈបាននិយាយថា៖ នៅមុខព្រះរាមចន្ទ្រៈ កងទ័ពវានរទាំងមូល ដែលកាន់ដើមសាល ដើមតាល និងថ្មធំៗជាអាវុធ នៅពេលព្រះអាទិត្យរះ មើលទៅដូចវាលស្រូវទុំដ៏ធំទូលាយ។ កងទ័ពដ៏មហិមានោះ ត្រូវបានការពារ និងដឹកនាំដោយ នលៈ នីលៈ អង្គទៈ ក្រាថៈ ម៉ៃន្ទៈ និងទ្វិវិទៈ ហើយបានដំណើរទៅមុខ ដើម្បីសម្រេចបេសកកម្មរបស់រាឃវៈ។

Verse 20

विविधेषु प्रशस्तेषु बहुमूलफलेषु च । प्रभूतमधुमूलेषु वारिमत्सु शिवेषु च,जहाँ फल-मूलकी बहुतायत होती, मधु और कन्द-मूल प्रचुरमात्रामें उपलब्ध होते तथा जलकी अधिक सुविधा होती, ऐसे कल्याणकारी और उत्तम विविध पर्वतीय शिखरोंपर डेरा डालती हुई वह वानरसेना बिना किसी विघ्न-बाधाके खारे पानीवाले समुद्रके निकट जा पहुँची

មារកណ្ឌេយៈបានមានព្រះវាចា៖ ដោយធ្វើដំណើរពីទីកន្លែងមង្គលមួយទៅទីកន្លែងមង្គលមួយ—លើកំពូលភ្នំដ៏ល្បីល្បាញដែលសម្បូរផ្លែឈើ និងឫសគល់ មានទឹកឃ្មុំ និងមើមបរិភោគបានច្រើន ហើយមានទឹកប្រើប្រាស់គ្រប់គ្រាន់—កងវានរ​បានបោះជំរំដោយគ្មានឧបសគ្គ ហើយចុងក្រោយបានខិតជិតដល់សមុទ្រទឹកប្រៃ។

Verse 21

निवसन्ती निराबाधा तथैव गिरिसानुषु । उपायाद्धरिसेना सा क्षारोदमथ सागरम्‌,जहाँ फल-मूलकी बहुतायत होती, मधु और कन्द-मूल प्रचुरमात्रामें उपलब्ध होते तथा जलकी अधिक सुविधा होती, ऐसे कल्याणकारी और उत्तम विविध पर्वतीय शिखरोंपर डेरा डालती हुई वह वानरसेना बिना किसी विघ्न-बाधाके खारे पानीवाले समुद्रके निकट जा पहुँची

មារកណ្ឌេយៈបានមានព្រះវាចា៖ ដោយស្នាក់នៅដោយគ្មានឧបសគ្គលើជម្រាល និងខ្នងភ្នំទាំងឡាយ កងទ័ពហរិ (កងវានរ) បានបន្តដំណើរ ហើយចុងក្រោយបានទៅដល់សមុទ្រទឹកប្រៃ។

Verse 22

द्वितीयसागरनिभं तद्‌ बल॑ बहुलध्वजम्‌ | वेलावनं समासाद्य निवासमकरोत्‌ तदा,असंख्य ध्वजा-पताकाओंसे सुशोभित वह विशाल वाहिनी दूसरे महासागरके समान जान पड़ती थी। सागरके तटवर्ती वनमें पहुँचकर उसने अपना पड़ाव डाला

មារកណ្ឌេយៈបានមានព្រះវាចា៖ កងទ័ពដ៏ធំនោះ ដែលពោរពេញដោយទង់ជាច្រើន មើលទៅដូចជាសមុទ្រទីពីរ។ ពេលទៅដល់ព្រៃជាប់ឆ្នេរសមុទ្រ នោះវាបានបោះជំរំនៅទីនោះ។

Verse 23

ततो दाशरथि: श्रीमान्‌ सुग्रीव॑ प्रत्यभाषत । मध्ये वानरमुख्यानां प्राप्तकालमिदं वच:,तत्पश्चात्‌ मुख्य-मुख्य वानरोंके बीचमें बैठे हुए दशरथनन्दन भगवान्‌ श्रीरामने सुग्रीवसे यह समयोचित बात कही--

បន្ទាប់មក ព្រះរាម ព្រះរាជបុត្រដ៏រុងរឿងនៃទសរថ បានមានព្រះវាចាទៅកាន់សុគ្រីវៈ។ ព្រះអង្គអង្គុយនៅកណ្ដាលមេដឹកនាំវានរដ៏ឆ្នើមៗ ហើយបានមានព្រះវាចាដែលសមស្របនឹងកាលៈទេសៈ។

Verse 24

उपाय: को नु भवतां मतः सागरलड्घने । इयं हि महती सेना सागरश्नातिदुस्तर:,“मित्रो! हमारी यह सेना बहुत बड़ी है और सामने अत्यन्त दुस्तर महासागर लहरें ले रहा है। ऐशी दशामें आपलोग समुद्रके पार जानेके लिये कौन-सा उपाय ठीक समझते हैं?

មារកណ្ឌេយៈបានមានព្រះវាចា៖ «តាមយោបល់របស់អ្នកទាំងឡាយ តើយុទ្ធវិធីអ្វីគួរប្រើ ដើម្បីឆ្លងសមុទ្រ? ព្រោះកងទ័ពនេះធំមហិមា ហើយសមុទ្រនៅមុខយើងវិញ ឆ្លងកាត់បានយ៉ាងលំបាកណាស់»។

Verse 25

तत्रान्ये व्याहरन्ति सम वानरा बहुमानिन: । समर्था लड्घने सिन्धोर्न तु तत्‌ कृत्स्नकारकम्‌,तब वहाँ बहुत-से दूसरे-दूसरे वानर, जो बड़े अभिमानी थे, कहने लगे--“'हम तो समुद्रको लाँघ जानेमें समर्थ हैं, परंतु सब नहीं लाँध सकते”

នៅទីនោះ ស្វាផ្សេងៗជាច្រើន ដែលមានមោទនភាព និងទុកចិត្តលើខ្លួនឯង បាននិយាយឡើងថា៖ «យើងអាចលោតឆ្លងសមុទ្រ​បាន ប៉ុន្តែមិនអាចបំពេញភារកិច្ចទាំងមូលឲ្យសម្រេចគ្រប់ប្រការបានទេ»។

Verse 26

केचिन्नौभिव्यवस्यन्ति केचिच्च विविधै: प्लवै: । नेति रामस्तु तान्‌ सर्वान्‌ सान्त्वयन्‌ प्रत्यभाषत,कुछ वानर बड़ी-बड़ी नावोंके द्वारा समुद्रके पार जानेका निश्चय प्रकट करने लगे। कुछने नाव-डोंगी आदि विविध साधनोंद्वारा पार जानेकी बात बतायी। परंतु श्रीरामचन्द्रजीने उनकी यह सलाह माननेसे इनकार कर दिया और सबको सान्त्वना देते हुए कहा--

មួយចំនួនសម្រេចចិត្តថា នឹងឆ្លងសមុទ្រដោយនាវាធំៗ; មួយចំនួនទៀតបានណែនាំអំពីក្បូន និងឧបករណ៍អណ្ដែតទឹកជាច្រើនប្រភេទ។ ប៉ុន្តែ ព្រះរាមបានបដិសេធយោបល់ទាំងនោះ ហើយបានលួងលោមពួកគេទាំងអស់ រួចមានព្រះបន្ទូលដោយពាក្យសមរម្យ។

Verse 27

शतयोजन विस्तारं न शक्ता: सर्ववानरा: । क्रान्तुं तोयनिधिं वीरा नैषा वो नैप्ठेकी मति:,“वीरो! सभी वानरोंमें इतनी शक्ति नहीं है कि वे सौ योजन विस्तृत समुद्रको लाँघ सकें; अतः तुम लोगोंका यह निर्णय सर्वमान्य सिद्धान्तके रूपमें ग्राह्म नहीं है

«ឱ វីរបុរសទាំងឡាយ! មិនមែនស្វាទាំងអស់មានកម្លាំងគ្រប់គ្រាន់ ដើម្បីលោតឆ្លងសមុទ្រដែលទូលាយមួយរយយោជន៍បានទេ។ ដូច្នេះ ការសម្រេចចិត្តរបស់អ្នកទាំងឡាយ មិនអាចទទួលយកជាគោលការណ៍ដែលគួរជឿទុកចិត្តសម្រាប់ទាំងអស់បានឡើយ»។

Verse 28

नावो न सन्ति सेनाया बह्वदयस्तारयितुं तथा । वणिजामुपघातं च कथमस्मद्विधश्चरेत्‌,“इतनी बड़ी सेनाको पार उतारनेके लिये हमलोगोंके पास अधिक नौकाएँ भी नहीं हैं। (यदि कहें, व्यापारियोंके जहाजोंसे काम लिया जाय, तो) मेरे-जैसा पुरुष अपने स्वार्थके लिये व्यापारियोंके व्यवसायको हानि कैसे पहुँचा सकता है?

«សម្រាប់នាំកងទ័ពដ៏ធំនេះឲ្យឆ្លងទៅ មិនមាននាវាច្រើនគ្រប់គ្រាន់នៅក្នុងកងទ័ពយើងទេ។ ហើយបើគេនិយាយថា យកនាវារបស់ពាណិជ្ជករមកប្រើ—បុរសដូចខ្ញុំ នឹងធ្វើដូចម្តេចបាន ដើម្បីប្រយោជន៍ខ្លួនឯង ហើយបំផ្លាញជីវភាព និងការរកស៊ីរបស់ពួកពាណិជ្ជករ?»

Verse 29

विस्तीर्ण चैव नः सैन्यं हन्याच्छिद्रेण वै पर: । प्लवोडुपप्रतारश्न नैवात्र मम रोचते,“इसके सिवा नौका आदिसे यात्रा करनेपर हमारी सेना छिट-फुट होकर बहुत दूरतक फैल जायगी। उस दशामें अवसर पाकर शत्रु इसका नाश भी कर सकता है। इसीलिये डोंगी और नाव आदिपर बैठकर पार उतरनेकी बात मुझे ठीक नहीं जँचती है

«ម្យ៉ាងទៀត បើយើងឆ្លងដោយទូកតូចៗ និងក្បូន កងទ័ពយើងនឹងបែកខ្ចាត់ខ្ចាយ ហើយលាតសន្ធឹងឆ្ងាយ។ នៅពេលនោះ សត្រូវអាចឃើញចន្លោះ ហើយវាយប្រហារបំផ្លាញបាន។ ដូច្នេះ ផែនការឆ្លងដោយអង្គុយលើទូក និងនាវា មិនសមនឹងចិត្តខ្ញុំឡើយ»។

Verse 30

अहं त्विमं जलनिर्धि समारप्स्याम्युपायतः । प्रतिशेष्याम्युपवसन्‌ दर्शयिष्यति मां ततः,“मैं तो किसी उपायसे इस समुद्रकी ही आराधना आरम्भ करूँगा। इसके तटपर अन्न- जल छोड़कर धरना दूँगा। इससे यह अवश्य मुझे दर्शन देगा तथा कोई मार्ग दिखायेगा

មារកណ្ឌេយៈបាននិយាយថា៖ «ខ្ញុំនឹងចាប់ផ្តើមបូជាប្រណិបាតសមុទ្រនេះដោយវិធីណាមួយ។ ខ្ញុំនឹងអង្គុយធ្វើវ្រតៈអត់អាហារ និងអត់ទឹក នៅលើឆ្នេររបស់វា ដោយស្ថិតក្នុងការតាំងចិត្តមាំមួន។ បន្ទាប់មក វានឹងប្រាកដជាបង្ហាញទិវ្យទស្សនៈដល់ខ្ញុំ ហើយនឹងបង្ហាញផ្លូវទៅមុខ។»

Verse 31

न चेद्‌ दर्शयिता मार्ग धक्ष्याम्पेनमहं ततः । महास्त्रैरप्रतिहतैरत्यग्निपवनोज्ज्वलै:,“यदि यह स्वयं प्रकट होकर कोई मार्ग नहीं दिखायेगा तो मैं अग्नि और वायुसे भी अधिक तेजस्वी तथा कभी न चूकनेवाले महान दिव्यास्त्रोंद्रारा इसे जलाकर भस्म कर डालूँगा'

«បើវាមិនបង្ហាញខ្លួន និងមិនបង្ហាញផ្លូវទេ នោះខ្ញុំនឹងដុតវាឲ្យក្លាយជាផេះ ដោយអាវុធទិវ្យដ៏មហិមា ដែលមិនអាចទប់ស្កាត់បាន មុតមាំភ្លឺចែងចាំងលើសទាំងភ្លើង និងខ្យល់!»

Verse 32

इत्युक्त्वा सह सौमित्रिरुपस्पृश्याथ राघव: । प्रतिशिश्ये जलनिधिं विधिवत्‌ कुशसंस्तरे,ऐसा कहकर लक्ष्मणसहित श्रीरामचन्द्रजीने आचमन करके समुद्रके तटपर कुशकी चटाई बिछाकर उसपर लेटकर विधिपूर्वक धरना दे दिया

និយាយដូច្នោះហើយ ព្រះរាឃវៈ (ស្រីរាម) ជាមួយសោមិត្រី (លក្ខ្មណៈ) បានធ្វើអាចមនៈតាមពិធី ដើម្បីសម្អាតខ្លួន។ បន្ទាប់មក នៅលើឆ្នេរសមុទ្រ ព្រះអង្គបានប铺កន្ទេលស្មៅកុសៈ ហើយដេកលើវា ដោយធ្វើធរណា (ការតាំងចិត្តវ្រតៈ) តាមវិធីព្រះធម៌។

Verse 33

सागरस्तु ततः स्वप्ने दर्शयामास राघवम्‌ | देवो नदनदीभर्ता श्रीमान्‌ यादोगणैर्वृत:,तब नदों और नदियोंके स्वामी श्रीमान्‌ समुद्रदेवने जल-जन्तुओंके साथ प्रकट होकर स्वप्नमें श्रीरामचन्द्रजीको दर्शन दिया

បន្ទាប់មក ក្នុងសុបិន សមុទ្របានបង្ហាញខ្លួនដល់រាឃវៈ។ ព្រះសមុទ្រដ៏រុងរឿង—ម្ចាស់នៃទន្លេ និងស្ទឹងទាំងឡាយ—បានលេចមក ព័ទ្ធជុំវិញដោយហ្វូងសត្វទឹកជាច្រើន ហើយបានប្រទានទិវ្យទស្សនៈដល់ព្រះរាម។

Verse 34

कौसल्यामातरित्येवमाभाष्य मधुरं वच: । इदमित्याह रत्नानामाकरै: शतशो वृत:,वह सैकड़ों रत्नके आकरोंसे घिरा हुआ था। उसने “कौसल्यानन्दन” कहकर श्रीरामको सम्बोधित किया और मधुर वाणीमें इस प्रकार कहा--

ព្រះសមុទ្រនោះ ព័ទ្ធជុំវិញដោយអណ្តូងរ៉ែ និងប្រភពរត្នៈរាប់រយ។ ព្រះអង្គបានហៅព្រះរាមដោយពាក្យផ្អែមល្ហែមថា «ឱ កូនកៅសល្យា» ហើយបាននិយាយដោយសំឡេងទន់ភ្លន់ថា៖ «នេះហើយ»។

Verse 35

ब्रृहि कि ते करोम्यत्र साहाय्यं पुरुषर्षभ । ऐक्ष्वाको हास्मि ते ज्ञातिरिति रामस्तमब्रवीत्‌,“नरश्रेष्ठ! कहो, मैं यहाँ तुम्हारी क्या सहायता करूँ? सगरपुत्रोंसे संवर्धित होनेके कारण मैं भी इक्ष्वाकुवंशीय तथा तुम्हारा भाई-बन्धु हूँ"। यह सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने उससे कहा --

ព្រះរាមមានព្រះបន្ទូលទៅកាន់គាត់ថា៖ «ឱ បុរសប្រសើរ! ចូរប្រាប់មកថា នៅទីនេះ ខ្ញុំគួរជួយអ្វីដល់អ្នក? ខ្ញុំជាវង្សអិក្ស្វាគុ ហើយជាញាតិរបស់អ្នក ដូច្នេះចូរនិយាយដោយមិនស្ទាក់ស្ទើរ»។ ដោយពាក្យនេះ ព្រះរាមបានដាក់ការជួយជាកាតព្វកិច្ចនៃសាច់ញាតិ និងសេចក្តីធម៌ មិនមែនជាការអនុគ្រោះទេ។

Verse 36

मार्गमिच्छामि सैन्यस्य दत्तं नदनदीपते । येन गत्वा दशग्रीवं हन्यां पौलस्त्यपांसनम्‌,“नद-नदीश्वर! मैं अपनी सेनाके लिये तुम्हारे द्वारा दिया हुआ मार्ग चाहता हूँ, जिससे जाकर पुलस्त्यकुलांगार दशमुख रावणको मार सकूँ

មារកណ្ឌេយៈបាននិយាយថា៖ «ឱ ព្រះអម្ចាស់នៃទន្លេនិងស្ទឹងទាំងឡាយ! ខ្ញុំសូមផ្លូវដែលអ្នកបានប្រទានសម្រាប់កងទ័ពរបស់ខ្ញុំ ដើម្បីឲ្យខ្ញុំទៅតាមផ្លូវនោះ ហើយសម្លាប់ទសគ្រីវ (រាវណ) អ្នកបំផ្លាញវង្សពុលស្ត្យ»។

Verse 37

यद्येवं याचतो मार्ग न प्रदास्यति मे भवान्‌ | शरैस्त्वां शोषयिष्यामि दिव्यास्त्रप्रतिमन्त्रितै:,“यदि इस प्रकार याचना करनेपर तुम मुझे मार्ग न दोगे तो मैं दिव्यास्त्रोंसे अभिमन्त्रित बाणोंद्वारा तुम्हें सुखा दूँगा”

មារកណ្ឌេយៈបាននិយាយថា៖ «បើទោះខ្ញុំសុំយ៉ាងនេះហើយ អ្នកមិនប្រទានផ្លូវឲ្យខ្ញុំទេ នោះខ្ញុំនឹងប្រើព្រួញដែលបានអភិសេកដោយអាវុធទេវ និងបានចងមន្តប្រឆាំង ដើម្បីធ្វើឲ្យអ្នកស្ងួតហួត»។

Verse 38

इत्येवं ब्रुवत: श्रुत्वा रामस्य वरुणालय: । उवाच व्यथितो वाक्यमिति बद्धाञ्जलि: स्थित:,श्रीरामचन्द्रजीका यह वचन सुनकर वरुणालय समुद्र व्यथित हो उठा और खड़े हुए हाथ जोड़कर बोला--

មារកណ្ឌេយៈបាននិយាយថា៖ ពេលស្តាប់ព្រះបន្ទូលរបស់ព្រះរាមដូច្នោះ សមុទ្រ—ទីស្ថានរបស់វរុណ—បានរងការភ័យរន្ធត់។ ហើយឈរដោយប្រណម្យដៃ ប្រាប់ព្រះរាមដោយពាក្យទាំងនេះ—

Verse 39

नेच्छामि प्रतिघातं ते नास्मि विघ्नकरस्तव । शृणु चेदं वचो राम श्रुत्वा कर्तव्यमाचर,“श्रीराम! मैं तुम्हारा सामना करना नहीं चाहता और न मैं तुम्हारे मार्गमें विघ्न डालनेकी ही इच्छा रखता हूँ। मेरी यह बात सुनो और सुनकर जो कर्तव्य हो, उसे करो

មារកណ្ឌេយៈបាននិយាយថា៖ «ឱ ព្រះរាម! ខ្ញុំមិនប្រាថ្នាចង់ប្រឆាំងនឹងអ្នកទេ ហើយក៏មិនចង់ធ្វើជាឧបសគ្គក្នុងផ្លូវរបស់អ្នកដែរ។ ចូរស្តាប់ពាក្យរបស់ខ្ញុំនេះ; ស្តាប់ហើយ ចូរធ្វើអ្វីដែលជាកាតព្វកិច្ចតាមធម៌»។

Verse 40

यदि दास्यामि ते मार्ग सैन्यस्य व्रजतो55ज्ञया । अन्ये>प्याज्ञापयिष्यन्ति मामेवं धनुषो बलात्‌,“यदि मैं इस समय तुम्हारी आज्ञासे तुम्हें और लंका जाती हुई तुम्हारी सेनाको मार्ग दे दूँगा तो दूसरे लोग भी इसी प्रकार धनुषके बलसे मुझपर हुक्म चलाया करेंगे

មារកណ្ឌេយៈបានមានព្រះវាចា៖ «បើតាមព្រះបញ្ជារបស់អ្នក ខ្ញុំបង្ហាញផ្លូវឲ្យកងទ័ពរបស់អ្នកដើរទៅ នោះអ្នកដទៃក៏នឹងចាប់ផ្តើមបញ្ជាខ្ញុំដូចគ្នា ដោយអំណាចធ្នូតែប៉ុណ្ណោះ។ ការយល់ព្រមម្តងចំពោះការបង្ខំ គឺបើកទ្វារឲ្យពិភពលោកដែលកម្លាំងជំនួសយុត្តិធម៌»។

Verse 41

अस्ति त्वत्र नलो नाम वानर: शिल्पिसम्मत: । त्वष्टदेंवस्य तनयो बलवान विश्वकर्मण:,“तुम्हारी सेनामें एक नल नामक वानर है जो शिल्पियोंके लिये भी आदरणीय है। बलवान्‌ नल देवशिल्पी विश्वकर्माका पुत्र है

មារកណ្ឌេយៈបានមានព្រះវាចា៖ «នៅក្នុងកងទ័ពរបស់អ្នក មានវានរ​ម្នាក់ឈ្មោះ នល ដែលសូម្បីតែចៅហ្វាយសិប្បករទាំងឡាយក៏គោរពរាប់អាន។ នលមានកម្លាំងខ្លាំង ជាបុត្ររបស់វិශ්វកರ್ಮា សិប្បករទេវៈ កើតពីទ្វଷ្ដ្រ»។

Verse 42

स यत्‌ काष्ठ तृणं वापि शिलां वा क्षेप्स्यते मयि । सर्व तद्‌ धारयिष्यामि स ते सेतुर्भविष्यति,“वह अपने हाथसे उठाकर जो भी काठ, तिनका या पत्थर मेरे भीतर डाल देगा, वह सब मैं जलके ऊपर-धारण किये रहूँगा। वही तुम्हारे लिये पुल हो जायगा”

មារកណ្ឌេយៈបានមានព្រះវាចា៖ «អ្វីៗក៏ដោយ—ឈើ ស្មៅស្តើង ឬថ្ម—ដែលគេនឹងបោះចូលមកក្នុងខ្ញុំ ខ្ញុំនឹងទ្រទ្រង់វាទាំងអស់លើផ្ទៃទឹក។ ហើយមហាសំណុំវានោះឯង នឹងក្លាយជាស្ពានសម្រាប់អ្នក»។

Verse 43

इत्युक्त्वान्तरहिते तस्मिन्‌ रामो नलमुवाच ह । कुरु सेतु समुद्रे त्वं शक्तो हसि मतो मम,ऐसा कहकर समुद्र अन्तर्धान हो गया। तत्पश्चात्‌ श्रीयीमने उठकर नलसे कहा--“तुम समुद्रपर एक पुल तैयार करो। मैं जानता हूँ, तुममें यह कार्य करनेकी शक्ति है”

ពេលនិយាយដូច្នេះហើយ សមុទ្រក៏លាក់ខ្លួនបាត់ទៅ។ បន្ទាប់មក រាមៈបានហៅនលមក ហើយមានព្រះវាចា៖ «ចូរសង់ស្ពានឆ្លងសមុទ្រ។ តាមការវិនិច្ឆ័យរបស់ខ្ញុំ អ្នកមានកម្លាំង និងជំនាញអាចសម្រេចការងារនេះបាន»។

Verse 44

तेनोपायेन काकुत्स्थ: सेतुबन्धमकारयत्‌ । दशयोजनविस्तारमायतं शतयोजनम्‌,उसी उपायसे रघुनाथजीने समुद्रपर सौ योजन लंबा और दस योजन चौड़ा पुल तैयार कराया

មារកណ្ឌេយៈបានមានព្រះវាចា៖ «ដោយវិធីនោះឯង កាកុត្ស្ថៈ (រាមៈ) បានបញ្ជាឲ្យសង់ស្ពានលើសមុទ្រ—ប្រវែងមួយរយយោជន៍ ទទឹងដប់យោជន៍»។

Verse 45

नलसेतुरिति ख्यातो योडद्यापि प्रथितो भुवि | रामस्थाज्ञां पुरस्कृत्य निर्यातो गिरिसंनिभ:,वह आज भी भूमण्डलमें “नलसेतु” के नामसे विख्यात है। श्रीरामजीकी आज्ञा मानकर समुद्रने उस पर्वताकार पुलको अपने ऊपर धारण किया

ស្ពាននោះត្រូវបានគេស្គាល់ថា «នលសេតុ» ហើយនៅលើផែនដីក៏នៅតែមានកេរ្តិ៍ឈ្មោះរហូតមកដល់សព្វថ្ងៃ។ ដោយគោរពតាមព្រះបន្ទូលរបស់ព្រះរាម មហាសមុទ្របានទ្រទ្រង់ស្ពានដ៏ដូចភ្នំនោះលើខ្លួនវា។

Verse 46

तत्रस्थं स तु धर्मात्मा समागच्छद्‌ विभीषण: । भ्राता वै राक्षसेन्द्रस्य चतुर्भि: सचिवै: सह,श्रीरामचन्द्रजी अभी समुद्रके किनारे ही थे कि राक्षसराज रावणके भाई धर्मात्मा विभीषण अपने चार मन्सत्रियोंक साथ उनसे मिलनेके लिये आये

នៅពេលនោះ ព្រះរាម—អ្នកមានធម៌—កំពុងស្នាក់នៅក្បែរឆ្នេរសមុទ្រ ទើបវិភីษណៈ អ្នកមានចិត្តសុចរិត ជាប្អូនរបស់ស្តេចរាក្សស (រាវណៈ) បានមកជួបព្រះអង្គ ដោយមានមន្ត្រីបួននាក់អមមកជាមួយ។

Verse 47

7 जन ] ४! । (/9,|।। #//7+7) ९३४४ ।। प्रतिजग्राह समस्तं स्वागतेन महामना: । सुग्रीवस्य तु शड्काभूत्‌ प्रणिधि: स्यादिति सम ह,महामना श्रीरामने स्वागतपूर्वक उन्हें अपनाया। उस समय सुग्रीवके मनमें यह शंका हुई कि “कहीं यह शत्रुका कोई गुप्तचर न हो”

ព្រះរាម—អ្នកមានចិត្តធំ—បានទទួលពួកគេទាំងអស់ដោយពាក្យស្វាគមន៍យ៉ាងសមគួរ។ ប៉ុន្តែក្នុងចិត្តសុគ្រីវៈ ក៏កើតសង្ស័យថា «តើមិនមែនជាចារកម្មសម្ងាត់របស់សត្រូវទេឬ?»

Verse 48

राघव: सत्यचेष्टाभि: सम्यक्‌ च चरितेज्डितै: । यदा तत्त्वेन तुष्टो$भूत्‌ तत एनमपूजयत्‌,परंतु श्रीरामचन्द्रजीने उनकी सत्य चेष्टाओं, उत्तम आचरणों और मुख-नेत्र आदिके संकेतोंसे सूचित होनेवाले मनोभावोंकी सम्यक्‌ समीक्षा करके जब अच्छी तरह संतोष प्राप्त कर लिया, तब विभीषणका बहुत आदर किया

រាឃវៈ (ព្រះរាម) បានពិនិត្យយ៉ាងម៉ត់ចត់ពីការខិតខំដោយសេចក្តីពិត ការប្រព្រឹត្តត្រឹមត្រូវ និងភាពស្មោះត្រង់ដែលបង្ហាញតាមកាយវិការ និងទឹកមុខរបស់វិភីษណៈ។ ពេលព្រះអង្គពេញចិត្តច្បាស់លាស់ចំពោះចេតនាពិតរបស់គាត់ហើយ ទើបបានគោរពកិត្តិយសគាត់យ៉ាងសមគួរ។

Verse 49

सर्वराक्षसराज्ये चाप्यभ्यषिज्चद्‌ विभीषणम्‌ । चक्रे च मन्त्रसचिवं सुहृदं लक्ष्मणस्थ च

មារកណ្ឌេយៈបាននិយាយថា៖ «ហើយព្រះអង្គបានអភិសេកវិភីษណៈឲ្យគ្រប់គ្រងលើនគររាក្សសទាំងមូល។ ព្រះអង្គក៏បានតែងតាំងលក្ខ្មណៈ—មិត្តស្មោះរបស់ព្រះអង្គ—ឲ្យជាមន្ត្រី និងអ្នកប្រឹក្សា។ ដូច្នេះ បន្ទាប់ពីជ័យជម្នះ ការគ្រប់គ្រងត្រូវបានបង្កើតឡើង មិនមែនដោយកម្លាំងប៉ុណ្ណោះទេ ប៉ុន្តែដោយការតាំងសិទ្ធិត្រឹមត្រូវ ការប្រឹក្សា និងមិត្តភាពស្មោះត្រង់»។

Verse 50

विभीषणमते चैव सोउत्यक्रामन्महार्णवम्‌ । ससैन्य: सेतुना तेन मासेनैव नराधिप,नरेश्वरर विभीषणकी सलाहसे श्रीरामचन्द्रजीने उसी सेतुद्वारा एक ही महीनेमें सेनासहित महासागरको पार कर लिया

មារកណ្ឌេយៈបានមានព្រះវាចា៖ «ដោយធ្វើតាមយោបល់របស់វិភីෂណៈ ព្រះអង្គបានឆ្លងកាត់មហាសមុទ្រដ៏ធំល្វឹងល្វើយ។ ឱ ព្រះមហាក្សត្រ ដោយសេតុនោះ ព្រះអង្គបាននាំទ័ពទាំងមូលឆ្លងទៅបានក្នុងរយៈពេលតែមួយខែ»។

Verse 51

ततो गत्वा समासाद्य लड़कोद्यानान्यनेकश: । भेदयामास कपिभिर्महान्ति च बहूनि च,तत्पश्चात्‌ उन्होंने लंकाकी सीमामें पहुँचकर वानरोंद्वारा वहाँके बहुत-से बड़े-बड़े उद्यानोंको छिन्न-भिन्न करा दिया

បន្ទាប់មក ព្រះអង្គបានទៅដល់ ហើយចូលទៅកាន់ឧទ្យានកម្សាន្តជាច្រើននៃលង្កា ហើយបានបញ្ជាឲ្យពួកវានរ បំផ្លាញឧទ្យានធំៗជាច្រើននោះឲ្យខ្ទេចខ្ទី។

Verse 52

ततस्तौ रावणामात्यौ मन्त्रिणौ शुकसारणौ । चरौ वानररूपेण तौ जग्राह विभीषण:,उस सेनामें वानरोंका रूप घारण करके रावणके दो मन्त्री शुक और सारण गुप्तचरका काम करनेके लिये घुस आये थे। विभीषणने उन दोनोंको पहचानकर कैद कर लिया

បន្ទាប់មក រដ្ឋមន្ត្រីពីររបស់រាវណៈ គឺ សុក និង សារណៈ បានចូលមកជាចារកម្ម ដោយបំលែងខ្លួនជារូបវានរ។ វិភីෂណៈបានស្គាល់ពួកគេ ហើយចាប់ខ្លួនទាំងពីរ។

Verse 53

प्रतिपन्नौ यदा रूप॑ राक्षसं तौ निशाचरौ । दर्शयित्वा तत: सैन्यं राम: पश्चादवासृजत्‌

មារកណ្ឌេយៈបានមានព្រះវាចា៖ «នៅពេលដែលសត្វរាត្រីទាំងពីរនោះ បានត្រឡប់ទៅជារូបរាក្សស ព្រះរាមបានបង្ហាញកងទ័ពឲ្យពួកគេឃើញជាមុនសិន ហើយបន្ទាប់មកទើបលែងឲ្យទៅ»។

Verse 54

जब वे दोनों निशाचर अपने राक्षसरूपमें प्रकट हुए, तब श्रीरामने उन्हें अपनी सेनाका दर्शन कराकर छोड़ दिया ।। निवेश्योपवने सैन्यं तत्‌ पुर: प्राज्ञवानरम्‌ । प्रेषयामास दौत्येन रावणस्य ततो$5ज्भदम्‌,लंकापुरीके उपवनमें वानरसेनाको ठहराकर श्रीरघुनाथजीने बुद्धिमान्‌ वानर अंगदको दूतके रूपमें रावणके यहाँ भेजा

នៅពេលដែលសត្វរាត្រីទាំងពីរនោះ បង្ហាញខ្លួនជារូបរាក្សស ព្រះរាមបានឲ្យពួកគេឃើញកងទ័ពរបស់ព្រះអង្គ ហើយទើបលែងឲ្យទៅ។ បន្ទាប់មក ព្រះអង្គបានដាក់កងវានរ​ឲ្យស្នាក់នៅក្នុងឧទ្យានជិតក្រុងលង្កា ហើយដោយប្រាជ្ញា បានផ្ញើវានរអង្គទៈដ៏ឆ្លាតវៃ ជាទូតទៅកាន់រាវណៈ។

Verse 59

साथ ही उन्हें समस्त राक्षसोंके राज्यपर अभिषिक्त कर दिया और लक्ष्मणका सुहृद्‌ तथा अपना सलाहकार बना लिया

មារកណ្ឌេយៈបាននិយាយថា៖ ជាមួយនឹងនេះផងដែរ ព្រះអង្គបានធ្វើពិធីអភិសេកប្រគល់អធិបតេយ្យលើរាជ្យទាំងមូលនៃពួករាក្សសឲ្យពួកគេ ហើយបានតាំងលក្ខ្មណៈជាមិត្តជិតស្និទ្ធ និងជាទីប្រឹក្សាផ្ទាល់របស់ព្រះអង្គ ដើម្បីបង្រួបបង្រួមអំណាចដោយការតែងតាំងត្រឹមត្រូវ និងការណែនាំដោយប្រាជ្ញា។

Verse 283

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि रामोपाख्यानपर्वणि सेतुबन्धने त्रयशीत्यधिकद्धिशततमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्ााभारत वनपर्वके अन्तर्गत रामोपाख्यानपर्वमें सेतुबन्धविषयक दो सौ तिरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ

ដូច្នេះ ក្នុង «មហាភារត» ដ៏បរិសុទ្ធ នៅក្នុង «វនបර්វ» ក្នុងផ្នែកដែលហៅថា «រាមោបាខ្យាន» ជំពូកស្តីពីការសង់ស្ពាន (ទៅកាន់លង្កា) បានបញ្ចប់—នេះជាជំពូកទីពីររយប៉ែតសិបបី។ កថាបញ្ចប់នេះបញ្ជាក់ការបញ្ចប់នៃឯកតានិទាននេះ ហើយរំលេចសេចក្តីតាំងចិត្តត្រឹមត្រូវ និងការខិតខំប្រកបដោយវិន័យ ដែលធ្វើឲ្យបុព្វហេតុយុត្តិធម៌រីកចម្រើនដោយសហការរួម និងភាពដឹកនាំមាំមួន។

Frequently Asked Questions

Whether the pursuit of enduring fame justifies self-harm or avoidable loss of life; Sūrya argues that fame sought through prāṇa-virodha is self-defeating and ethically unsound.

Reputation is ethically meaningful when aligned with the preservation of life and the capacity to fulfill duties; prudence and self-protection can be dharmic when they sustain one’s responsibilities.

No explicit phalaśruti is stated; the meta-level emphasis is practical: dharma is evaluated through lived consequence—only the living can enact duty and meaningfully receive the fruits of fame.