Adhyaya 271
Vana ParvaAdhyaya 27124 Verses

Adhyaya 271

कुम्भकर्णवधः — Kumbhakarṇa’s Fall and the Renewal of the Engagement

Upa-parva: Mārkaṇḍeya-upākhyāna (Markandeya’s Embedded Narrative Cycle)

Mārkaṇḍeya recounts Kumbhakarṇa emerging from the city and encountering the vānaras, who surround and strike him with uprooted trees and claws, engaging through varied tactical approaches. Despite being assaulted, Kumbhakarṇa laughs and consumes prominent vānaras (Panasa, Gavākṣa, Vajrabāhu), causing alarm among leaders such as Tārā. Sugrīva charges without retreat and strikes Kumbhakarṇa with a śāla tree; the blow breaks but does not incapacitate the rākṣasa, who seizes and carries Sugrīva away. Lakṣmaṇa (Saumitri) advances and releases a powerful arrow that pierces Kumbhakarṇa, described as rending the earth and being blood-wet, forcing Kumbhakarṇa to release Sugrīva. Kumbhakarṇa then attacks Lakṣmaṇa with a massive rock; Lakṣmaṇa severs the raised arms with sharp arrows, repeatedly cutting down the rock-bearing limbs. As Kumbhakarṇa manifests an even more formidable form, Lakṣmaṇa employs the Brahmāstra, burning him down; Kumbhakarṇa falls like a lightning-burnt tree. Seeing him dead, the rākṣasas flee. Two rākṣasa warriors (identified as Dūṣaṇa’s younger brothers) then rush Lakṣmaṇa; a fierce exchange ensues until Hanūmān kills Vajravega with a mountain peak and Nīla crushes Pramāthin with a great boulder. The broader battle between Rāma’s and Rāvaṇa’s forces resumes with heavy rākṣasa losses described as predominant.

Chapter Arc: वन में अचानक घोर कोलाहल उठता है; ध्वजों की छाया और रथों की गड़गड़ाहट से संकेत मिलता है कि पाण्डव निकट हैं, और जयद्रथ के हृदय में भय-गर्व का द्वंद्व जागता है। → जयद्रथ रथ पर स्थित याज्ञसेनी (द्रौपदी) से पाण्डवों के विषय में पूछता है—ये पाँच विशाल रथ कौन-से हैं? द्रौपदी, जो सब जानती है, एक-एक कर पाण्डवों के पराक्रम, स्वभाव और प्रतिशोध-धर्म का वर्णन करती है, और चेतावनी देती है कि उनका वैर कभी शान्त नहीं होता जब तक उसका अन्त न कर दें। → द्रौपदी का वचन तीक्ष्ण शिखर पर पहुँचता है—वह जयद्रथ को ‘मोह’ में पाण्डवों का तिरस्कार करने वाला बताकर भविष्यवाणी-सी चेतावनी देती है कि यदि वह उनके हाथों से बच भी गया तो भी अपमानित देह के साथ जीवित रहकर पुनर्जन्म का फल पाएगा; साथ ही वह पाण्डवों की अजेयता को रूपक-भाषा में चित्रित करती है कि उसकी सेना पाण्डवों द्वारा विक्षुब्ध और नष्टप्राय हो जाएगी। → अध्याय का निष्कर्ष द्रौपदी के ‘पराक्रम-वर्णन’ और ‘वैर-समाप्ति’ के सिद्धान्त पर टिकता है—पाण्डव क्षमा नहीं करेंगे; जयद्रथ के लिए अब मार्ग केवल भय, पलायन या अनिवार्य दण्ड की ओर जाता है। → पाण्डवों के रथ निकट हैं; द्रौपदी की चेतावनी के बाद अगला क्षण यह तय करेगा कि जयद्रथ सामना करेगा या भागेगा—और किस प्रकार उसका अपराध दण्डित होगा।

Shlokas

Verse 1

हि >> मो न (0) हि २ 7 सप्तत्यधिकद्विशततमो< ध्याय: द्रौपदीद्वारा जयद्रथके सामने पाण्डवोंके पराक्रमका वर्णन वैशम्पायन उवाच ततो घोरतर: शब्दो वने समभवत्‌ तदा | भीमसेनार्जुनौ दृष्ट्वा क्षत्रियाणाममर्षिणाम्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर उस वनमें भीमसेन और अर्जुनको देखकर अमर्षमें भरे हुए क्षत्रियोंका अत्यन्त घोर कोलाहल सुनायी देने लगा

Vaiśampāyana berkata: “Kemudian, pada saat itu, di hutan timbul kegemparan yang lebih mengerikan, ketika para kṣatriya yang diliputi amarah melihat Bhīmasena dan Arjuna.”

Verse 2

तेषां ध्वजाग्राण्यभिवी क्ष्य राजा स्वयं दुरात्मा नरपुज्गवानाम्‌ | जयद्रथो याज्ञसेनीमुवाच रथे स्थितां भानुमतीं हतौजा:,उन नरश्रेष्ठ वीरोंकी ध्वजाओंके अग्रभागोंको देखकर हतोत्साह हुए दुरात्मा राजा जयद्रथने अपने रथपर बैठी हुई तेजस्विनी द्रौपदीसे स्वयं कहा--

Melihat puncak-puncak panji para kesatria unggul itu, Raja Jayadratha yang berhati gelap pun kehilangan semangat; lalu ia sendiri berkata kepada Yājñasenī (Draupadī) yang bersinar, yang duduk di atas keretanya—

Verse 3

आयान्तीमे पञ्च रथा महान्तो मन्ये च कृष्णे पतयस्तवैते । सा जानती ख्यापय न: सुकेशि परं पर पाण्डवानां रथस्थम्‌,'सुन्दर केशोंवाली कृष्णे! ये पाँच विशाल रथ आ रहे हैं। जान पड़ता है, इनमें तुम्हारे पति ही बैठे हैं। तुम तो सबको जानती ही हो। मुझे रथपर बैठे हुए इन पाण्डवोंमेंसे एक- एकका उत्तरोत्तर परिचय दो”

Waiśampāyana berkata: “Wahai Kṛṣṇā yang berambut indah, lima kereta perang besar sedang mendekat. Aku kira yang duduk di atasnya adalah para suamimu. Engkau mengenal mereka dengan baik—maka sebutkanlah kepada kami, satu demi satu, siapakah masing-masing Pāṇḍava yang berada di atas keretanya.”

Verse 4

द्रौपहुुवाच कि ते ज्ञातैर्मूढड महा धनुर्थरै- रनायुष्यं कर्म कृत्वातिघोरम्‌ । एते वीरा: पतयो मे समेता न व: शेष: कश्िदिहास्ति युद्धे,द्रौपदी बोली--अरे मूढ़! आयुका नाश करनेवाला वह अत्यन्त भयंकर नीच कर्म करके अब तू इन महाधनुर्धर पाण्डव वीरोंका परिचय जानकर क्या करेगा? ये मेरे सभी वीर पति जुट गये हैं। इनके साथ जो युद्ध होनेवाला है, उसमें तेरे पक्षका कोई भी मनुष्य जीवित नहीं बचेगा

Draupadī berkata: “Hai bodoh! Setelah melakukan perbuatan hina dan amat mengerikan yang menghancurkan umur dan keberuntungan, apa gunanya bagimu mengenali para pemanah perkasa Pāṇḍava ini? Semua suamiku yang gagah telah berkumpul di sini. Dalam pertempuran yang akan datang, tak seorang pun dari pihakmu akan tersisa hidup.”

Verse 5

आखूयाततव्यं त्वेव सर्व मुमूर्षो- मैया तुभ्यं पृष्टया धर्म एष: । न मे व्यथा विद्यते त्वद्‌भयं वा सम्पश्यन्त्या: सानुजं धर्मराजम्‌,मैं भाइयोंसहित धर्मराज युधिष्ठिरको सामने देख रही हूँ; अतः अब न मुझे दुःख है और न तेरा डर ही है। अब तू शीघ्र ही मरना चाहता है; अतः ऐसे समयमें तूने मुझसे जो कुछ पूछा है, उसका उत्तर तुझे दे देना उचित है; यही धर्म है। (अतः मैं अपने पतियोंका परिचय देती हूँ)

Waiśampāyana berkata: “Ya, aku memang harus menjelaskan semuanya. Engkau ingin segera mati dan bertanya kepadaku pada saat seperti ini; maka sesuai dharma, patutlah aku menjawab. Melihat Dharmarāja Yudhiṣṭhira di hadapanku bersama saudara-saudaranya, aku tak merasakan duka maupun takut kepadamu. Karena itu kini akan kusebutkan identitas para suamiku.”

Verse 6

यस्य ध्वजाग्रे नदतो मृदड़ौ नन्दोपनन्दौ मधुरौ युक्तरूपौ | एत॑ स्वधर्मार्थविनिश्चयज्ञं सदा जना: कृत्यवन्तो$नुयान्ति,जिनकी ध्वजाके सिरेपर बँधे हुए नन्द और उपनन्द नामक दो सुन्दर मृदंग मधुर स्वरमें बज रहे हैं, जिनका शरीर जाम्बूनद सुवर्णके समान विशुद्ध गौरवर्णका है, जिनकी नासिका ऊँची और नेत्र बड़े-बड़े हैं, जो देखनेमें दुबले-पतले हैं, कुरुकुलके इन श्रेष्ठतम पुरुषको ही धर्मनन्दन युधिष्ठिर कहते हैं। ये मेरे पति हैं। ये अपने धर्म और अर्थके सिद्धान्तको अच्छी तरह जानते हैं; अतः आवश्यकता पड़नेपर लोग इनका सदा अनुसरण करते हैं

Waiśampāyana berkata: “Dia yang pada ujung panjinya dua genderang—Nanda dan Upananda—berkumandang manis, selaras, dan elok rupanya; dialah yang paham menetapkan apa yang benar (dharma) dan apa yang bermanfaat (artha). Maka ketika kewajiban memanggil, orang-orang cakap senantiasa mengikutinya.”

Verse 7

य एष जाम्बूनदशुद्धगौर: प्रचण्डघोणस्तनुरायताक्ष: । एतं कुरुश्रेष्ठतमं वदन्ति युधिष्ठिरं धर्मसुतं पतिं मे,जिनकी ध्वजाके सिरेपर बँधे हुए नन्द और उपनन्द नामक दो सुन्दर मृदंग मधुर स्वरमें बज रहे हैं, जिनका शरीर जाम्बूनद सुवर्णके समान विशुद्ध गौरवर्णका है, जिनकी नासिका ऊँची और नेत्र बड़े-बड़े हैं, जो देखनेमें दुबले-पतले हैं, कुरुकुलके इन श्रेष्ठतम पुरुषको ही धर्मनन्दन युधिष्ठिर कहते हैं। ये मेरे पति हैं। ये अपने धर्म और अर्थके सिद्धान्तको अच्छी तरह जानते हैं; अतः आवश्यकता पड़नेपर लोग इनका सदा अनुसरण करते हैं

Waiśampāyana berkata: “Dia yang di sana—cerah laksana emas Jāmbūnada yang dimurnikan, berhidung tegas, bertubuh ramping, dan bermata panjang serta lebar—oleh orang-orang disebut yang utama di antara Kuru: Yudhiṣṭhira, putra Dharma. Dialah suamiku.”

Verse 8

अप्येष शत्रो: शरणागतस्य दद्यात्‌ प्राणान्‌ धर्मचारी नृवीर: । परेहोनं मूढ जवेन भूतये त्वमात्मन: प्राउजलिि्न्यस्तशस्त्र:,ये धर्मात्मा नरवीर अपनी शरणमें आये हुए शत्रुको भी प्राणदान दे देते हैं। अरे मूर्ख! यदि तू अपनी भलाई चाहता है तो हथियार नीचे डाल दे और हाथ जोड़कर शीघ्र इनकी शरणमें जा

Waiśampāyana berkata: “Bahkan kesatria saleh yang teguh pada dharma ini akan menganugerahkan hidup kepada musuh yang datang memohon perlindungan. Maka, hai bodoh, jika engkau menginginkan keselamatanmu, segeralah letakkan senjata, satukan kedua tangan, dan berlindunglah padanya.”

Verse 9

अथाप्येनं पश्यसि यं रथस्थं महाभुजं शालमिव प्रवृद्धम्‌ । संदष्टौष्ठ॑ भ्रुकुटीसंहत भरुवं वृकोदरो नाम पतिममैष:,ये जो शाल (साखू)-के वृक्षकी तरह ऊँचे और विशाल भुजाओंसे सुशोभित वीर पुरुष तुझे रथमें बैठे दिखायी देते हैं, जो क्रोधके मारे भौंहें टेढ़ी करके दाँतोंसे अपने ओंठ चबा रहे हैं, ये मेरे दूसरे पति वृकोदर हैं। बड़े बलवान, सुशिक्षित और शक्तिशाली आजानेय नामक अश्व इन शूरशिरोमणिके रथको खींचते हैं। इनके सभी कर्म प्राय: ऐसे होते हैं, जिन्हें मानवजगत्‌ नहीं कर सकता। ये अपने भयंकर पराक्रमके कारण इस भूतलपर भीमके नामसे विख्यात हैं

Waiśampāyana berkata: “Dan sekarang, apakah engkau melihat pahlawan yang duduk di atas kereta itu—berlengan perkasa, menjulang laksana pohon śāla yang telah dewasa? Dengan bibir tergigit karena murka dan alis mengerut tajam, dialah suamiku bernama Vṛkodara; oleh kedahsyatan dayanya ia termasyhur di bumi sebagai ‘Bhīma’.”

Verse 10

आजानेया बलिन: साधु दान्ता महाबला: शूरमुदावहन्ति । एतस्य कर्माण्यतिमानुषाणि भीमेति शब्दोडस्य गत: पृथिव्याम्‌,ये जो शाल (साखू)-के वृक्षकी तरह ऊँचे और विशाल भुजाओंसे सुशोभित वीर पुरुष तुझे रथमें बैठे दिखायी देते हैं, जो क्रोधके मारे भौंहें टेढ़ी करके दाँतोंसे अपने ओंठ चबा रहे हैं, ये मेरे दूसरे पति वृकोदर हैं। बड़े बलवान, सुशिक्षित और शक्तिशाली आजानेय नामक अश्व इन शूरशिरोमणिके रथको खींचते हैं। इनके सभी कर्म प्राय: ऐसे होते हैं, जिन्हें मानवजगत्‌ नहीं कर सकता। ये अपने भयंकर पराक्रमके कारण इस भूतलपर भीमके नामसे विख्यात हैं

Waiśampāyana berkata: “Kuda-kuda Ājāneya yang kuat, terlatih baik, dan sangat perkasa menarik kereta sang kesatria. Perbuatannya melampaui ukuran manusia biasa; dan karena kedahsyatan keberaniannya, nama ‘Bhīma’ termasyhur di seluruh bumi.”

Verse 11

इनके अपराधी कभी जीवित नहीं रह सकते। ये वैरको कभी नहीं भूलते हैं और वैरका बदला लेकर ही रहते हैं। बदला लेनेके बाद भी अच्छी तरह शान्त नहीं हो पाते

Waiśampāyana berkata: “Mereka yang bersalah atas pelanggaran semacam itu takkan dibiarkan hidup. Ia tak pernah melupakan permusuhan; ia tak berhenti sebelum menuntut balas. Dan bahkan setelah pembalasan ditunaikan, ia pun tidak sungguh-sungguh menjadi tenang.”

Verse 12

धनुर्धराग्रयो धृतिमान्‌ यशस्वी जितेन्द्रियो वृद्धसेवी नृवीर: । भ्राता च शिष्यश्व युधिष्ठिरस्य धनंजयो नाम पतिर्ममैष:,ये जो तीसरे वीर पुरुष दिखायी दे रहे हैं, वे मेरे पति धनंजय हैं। इन्हें समस्त धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ माना गया है। ये धैर्यवान, यशस्वी, जितेन्द्रिय, वृद्धपुरुषोंक सेवक तथा महाराज युधिष्ठिरके भाई और शिष्य हैं। अर्जुन कभी काम, भय अथवा लोभवश न तो अपना धर्म छोड़ सकते हैं और न कोई निष्ठुरतापूर्ण कार्य ही कर सकते हैं। इनका तेज अग्निके समान है। ये कुन्तीनन्दन धनंजय समस्त शत्रुओंका सामना करनेमें समर्थ और सभी दुष्टोंका दमन करनेमें दक्ष हैं

Waiśampāyana berkata: “Dialah yang terdepan di antara para pemanah—teguh, termasyhur, menaklukkan indria, dan setia melayani para sesepuh—seorang kesatria sejati. Ia adalah saudara sekaligus murid Yudhiṣṭhira. Dialah suamiku, bernama Dhanaṃjaya.”

Verse 13

नास्यापराद्धा: शेषमवाप्रुवन्ति नायं वैरं विस्मरते कदाचित्‌ | वैरस्यान्तं संविधायोपयाति पश्चाच्छान्तिं न च गच्छत्यतीव,यो वै न कामान्न भयान्न लोभात्‌ त्यजेद्‌ धर्म न नृशंसं च कुर्यात्‌ । स एष वैश्वानरतुल्यतेजा: कुन्तीसुत: शत्रुसह: प्रमाथी ये जो तीसरे वीर पुरुष दिखायी दे रहे हैं, वे मेरे पति धनंजय हैं। इन्हें समस्त धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ माना गया है। ये धैर्यवान, यशस्वी, जितेन्द्रिय, वृद्धपुरुषोंक सेवक तथा महाराज युधिष्ठिरके भाई और शिष्य हैं। अर्जुन कभी काम, भय अथवा लोभवश न तो अपना धर्म छोड़ सकते हैं और न कोई निष्ठुरतापूर्ण कार्य ही कर सकते हैं। इनका तेज अग्निके समान है। ये कुन्तीनन्दन धनंजय समस्त शत्रुओंका सामना करनेमें समर्थ और सभी दुष्टोंका दमन करनेमें दक्ष हैं

Vaiśampāyana berkata: “Mereka yang telah berbuat salah kepadanya tidak mudah memperoleh sisa keselamatan; ia tak pernah melupakan permusuhan. Ia maju hanya setelah menata akhir dari permusuhan itu, dan bahkan sesudahnya pun ia tidak lekas menetap dalam damai. Namun ia tidak akan meninggalkan dharma demi hasrat, takut, atau loba, dan ia tidak akan melakukan perbuatan kejam. Putra Kuntī itu—Dhanañjaya, berkilau laksana api, sanggup menghadapi musuh dan menghancurkan yang jahat—dialah Arjuna.”

Verse 14

यः सर्वरधर्मार्थविनि श्षयज्ञो भयार्तानां भयहर्ता मनीषी । यस्योत्तमं रूपमाहु: पृथिव्यां यं पाण्डवा: परिरक्षन्ति सर्वे

Vaiśampāyana berkata: “Ia yang arif dalam penetapan akhir segala dharma dan tujuan duniawi (artha), sang bijak yang melenyapkan takut dari mereka yang dilanda takut—yang wujudnya dipuji sebagai yang paling utama di bumi—dialah yang dijaga bersama oleh semua Pāṇḍava.”

Verse 15

य: खड्गयोधी लघुचित्रहस्तो महांश्व धीमान्‌ सहदेवोडद्धितीय:,जो खड्गद्वारा युद्ध करनेकी कलामें कुशल हैं, जिनका हाथ बड़ी फुर्तीसे अदभुत पैंतरे दिखाता हुआ चलता है, जो परम बुद्धिमान्‌ और अद्वितीय वीर हैं, वे सहदेव मेरे पाँचवें पति हैं। ओ मूढ़ प्राणी! जैसे दैत्योंकी सेनामें देवराज इन्द्रका पराक्रम प्रकट होता है, उसी प्रकार युद्धमें तू आज सहदेवका महान्‌ पौरुष देखेगा। वे शौर्यसम्पन्न, अस्त्रविद्याके विशेषज्ञ, बुद्धिमान, मनस्वी तथा धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरका प्रिय करनेवाले हैं

Vaiśampāyana berkata: “Sahadeva—tiada banding dan kedua bagi siapa pun—adalah pendekar pedang; tangannya cepat dan cekatan, menampakkan tipu-gerak yang menakjubkan. Mahir dalam perang dengan pedang, amat cerdas, dan pahlawan yang tak tertandingi—dialah suamiku yang kelima. Wahai makhluk yang tersesat! Seperti kedahsyatan Śatakratu (Indra) tampak di tengah bala tentara Daitya, demikian pula hari ini di medan laga engkau akan menyaksikan keperkasaan Sahadeva. Ia berani, ahli ilmu senjata, bijaksana dan berjiwa besar, serta senantiasa mengupayakan apa yang menyenangkan Raja Yudhiṣṭhira, putra Dharma.”

Verse 16

यस्याद्य कर्म द्रक्ष्यसे मूढसत्त्व शतक्रतोर्वा दैत्यसेनासु संख्ये । शूर: कृतास्त्रो मतिमान्‌ मनस्वी प्रियड्करो धर्मसुतस्य राज्ञ:,जो खड्गद्वारा युद्ध करनेकी कलामें कुशल हैं, जिनका हाथ बड़ी फुर्तीसे अदभुत पैंतरे दिखाता हुआ चलता है, जो परम बुद्धिमान्‌ और अद्वितीय वीर हैं, वे सहदेव मेरे पाँचवें पति हैं। ओ मूढ़ प्राणी! जैसे दैत्योंकी सेनामें देवराज इन्द्रका पराक्रम प्रकट होता है, उसी प्रकार युद्धमें तू आज सहदेवका महान्‌ पौरुष देखेगा। वे शौर्यसम्पन्न, अस्त्रविद्याके विशेषज्ञ, बुद्धिमान, मनस्वी तथा धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरका प्रिय करनेवाले हैं

Vaiśampāyana berkata: “Wahai yang tersesat, hari ini engkau akan menyaksikan perbuatan dan kegagahan pahlawan itu—seperti kedahsyatan Śatakratu (Indra) yang tampak di tengah barisan bala Daitya dalam pertempuran. Ia seorang kesatria gagah, terlatih sempurna dalam senjata, cerdas dan berjiwa besar, serta selalu mengupayakan yang dicintai dan bermanfaat bagi Raja Yudhiṣṭhira, putra Dharma.”

Verse 17

य एष चन्द्रार्कसमानतेजा जघन्यज: पाण्डवानां प्रियश्न । बुद्धया समो यस्य नरो न विद्यते वक्ता तथा सत्सु विनिश्चयज्ञ:,इनका तेज चन्द्रमा और सूर्यके समान है। ये पाण्डवोंमें सबसे छोटे और सबके प्रिय हैं। बुद्धिमें इनकी समानता करनेवाला दूसरा कोई नहीं है। ये अच्छे वक्ता और सत्पुरुषोंकी सभामें सिद्धान्तके ज्ञाता माने गये हैं

Vaiśampāyana berkata: “Ia bersinar dengan cahaya laksana bulan dan matahari. Walau termuda di antara para Pāṇḍava, ia dicintai semua. Tiada seorang pun yang menyamai kecerdasannya. Ia pun seorang penutur ulung, dan dalam majelis orang-orang saleh ia dipandang sebagai sosok yang tahu menegakkan kesimpulan yang mantap dan benar.”

Verse 18

स एष शूरो नित्यममर्षणश्न धीमान्‌ प्राज्ञ: सहदेव: पतिर्मे त्यजेत्‌ प्राणान्‌ प्रविशेद्धव्यवाहं न त्वेवैष व्याहरेद्‌ धर्मबाहमम्‌

Waiśampāyana berkata: “Orang ini seorang pahlawan—tak pernah menoleransi kehinaan, teguh jiwanya, cerdas dan bijaksana. Sahadeva, tuanku, lebih rela melepaskan nyawa dan masuk ke api kurban daripada mengucapkan sepatah kata pun yang melanggar dharma.”

Verse 19

सदा मनस्वी क्षत्रधर्मे रतश्न कुन्त्या: प्राणैरिष्टतमो नृवीर: । मेरे पति सहदेव शूरवीर, सदा ईर्ष्यारहित, बुद्धिमान्‌ और दिद्वान्‌ हैं। ये अपने प्राण छोड़ सकते हैं, प्रजजलित आगमें प्रवेश कर सकते हैं, परंतु धर्मके विरुद्ध कोई बात नहीं बोल सकते। नरवीर सहदेव सदा क्षत्रियधर्मके पालनमें तत्पर रहनेवाले और मनस्वी हैं। आर्या कुन्तीको ये प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय हैं ।। १८ ई ।। विशीर्यन्ती नावमिवार्णवान्ते रत्नाभिपूर्णा मकरस्य पृष्ठे

Waiśampāyana berkata: “Pahlawan itu selalu berjiwa luhur, teguh berpegang pada dharma kṣatriya, dan bagi Kuntī ia lebih berharga daripada nyawa. Suamiku Sahadeva, sang kesatria, dapat melepaskan napas terakhir atau masuk ke api yang menyala-nyala, tetapi takkan mengucapkan satu kata pun yang bertentangan dengan dharma.”

Verse 20

इत्येते वै कथिता: पाण्डुपुत्रा यांस्त्वं मोहादवमन्य प्रवृत्त: । यद्येतेभ्यो मुच्यसे<रिष्टदेह: पुनर्जन्म प्राप्स्पसे जीव एव,इस प्रकार मैंने तुझे इन पाण्डवोंका परिचय दिया है, जिनका अपमान करके तू मोहवश इस नीच कर्ममें प्रवृत्त हुआ है। यदि आज तू इनके हाथोंसे जीवित बच जाय और तेरे शरीरपर कोई आँच नहीं आये, तो तुझे जीते-जी यह दूसरा जन्म प्राप्त हो

Waiśampāyana berkata: “Demikianlah telah kujelaskan kepadamu putra-putra Pāṇḍu—mereka yang kauhinakan karena delusi hingga menempuh jalan hina ini. Jika hari ini engkau lolos dari tangan mereka dengan tubuh tak terluka dan nyawa masih utuh, maka selagi hidup pun engkau akan mengalami ‘kelahiran kedua’—sebuah perubahan paksa yang timbul dari akibat perbuatan salahmu.”

Verse 21

वैशम्पायन उवाच ततः पार्था: पञ्च पउ्चेन्द्रकल्पा- स्त्यवत्वा त्रस्तान्‌ प्राउ्जलींस्तान्‌ पदातीन्‌ । रथानीकं शरवर्षान्धकारं चक्कुः क्रुद्धा: सर्वत: संनिगृहर्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! द्रौपदी यह बात कह ही रही थी कि पाँच इन्द्रोंके समान पराक्रमी पाँचों पाण्डव भयभीत होकर हाथ जोड़नेवाले पैदल सैनिकोंको छोड़कर कुपित हो रथ, हाथी और घोड़ोंसे युक्त अवशिष्ट सेनाको सब ओरसे घेरकर खड़े हो गये और बाणोंकी ऐसी घनघोर वर्षा करने लगे कि चारों ओर अन्धकार छा गया

Waiśampāyana berkata: “Kemudian kelima Pārtha—para pahlawan yang sebanding dengan Indra—meninggalkan para prajurit pejalan kaki yang ketakutan dan memohon dengan tangan terkatup. Dengan murka mereka mengepung sisa pasukan kereta dan bala lainnya dari segala arah, lalu menghujani mereka dengan panah begitu rapat hingga seakan-akan kegelapan menyelimuti segala penjuru.”

Verse 146

प्राणैर्गरीयांसमनुव्रतं वै स एष वीरो नकुलः पतिर्मे | जो समस्त धर्म और अर्थके निश्चयको जानते हैं, भयसे पीड़ित मनुष्योंका भय दूर करते हैं, जो परम बुद्धिमान्‌ हैं, इस भूमण्डलमें जिनका रूप सबसे सुन्दर बताया जाता है, जो अपने बड़े भाइयोंकी सेवामें तत्पर रहनेवाले और उन्हें प्राणोंसे भी अधिक प्रिय हैं, समस्त पाण्डव जिनकी रक्षा करते हैं, वे ही ये मेरे वीर पति नकुल हैं

Waiśampāyana berkata: “Inilah suamiku, sang pahlawan Nakula—kesetiaan dalam pengabdiannya lebih berharga daripada nyawa. Ia mantap menapaki jalan benar, paham keputusan tentang dharma dan kesejahteraan (artha), menyingkirkan ketakutan orang-orang yang dilanda gentar, sangat cerdas, dan termasyhur sebagai yang paling elok rupa di bumi. Ia tekun melayani para kakaknya dan dicintai mereka melebihi hidup; sebab itu semua Pāṇḍava melindunginya.”

Verse 193

सेनां तवेमां हतसर्वयोधां विक्षोभितां द्रक्ष्यसि पाण्डुपुत्रै: । (अरे मूढ!) रत्नोंसे लदी हुई नाव जैसे समुद्रके बीचमें जाकर किसी मगरमच्छकी पीठसे टकराकर टूट जाती है, उसी प्रकार पाण्डवलोग आज तेरे समस्त सैनिकोंका संहार करके तेरी इस सारी सेनाको छिलन्न-भिन्न कर डालेंगे और तू अपनी आँखोंसे यह सब कुछ देखेगा

Engkau akan menyaksikan bala tentaramu ini—seluruh prajuritnya telah tewas—terguncang dan porak-poranda oleh putra-putra Pāṇḍu. Seperti perahu sarat permata yang, ketika mencapai tengah samudra, menghantam punggung buaya lalu pecah berkeping-keping, demikianlah para Pāṇḍava hari ini akan membinasakan semua serdadumu, mencabik seluruh pasukanmu, dan engkau akan melihatnya dengan mata kepalamu sendiri.

Verse 270

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि द्रौपदीहरणपर्वणि द्रौपदीवाक्ये सप्तत्यधिकद्धिशततमो<ध्याय:

Demikian berakhir bab ke-270 dalam Vana Parva dari Śrī Mahābhārata, pada bagian tentang penculikan Draupadī, dalam penggalan yang memuat ucapan-ucapan Draupadī.

Frequently Asked Questions

The immediate ethical pressure is protective duty under crisis: leaders must decide how to prevent an ally’s abduction and wider panic while avoiding disorganized retaliation, requiring rapid but proportionate escalation.

Brute strength and mass assault are insufficient without command clarity and precision; disciplined leadership and accurate, context-appropriate means (including astric measures) restore stability when conventional tactics fail.

No explicit phalaśruti appears in the supplied verses; the meta-function is structural—embedding a paradigmatic legend within Mārkaṇḍeya’s discourse to exemplify crisis-management, alliance-protection, and controlled escalation.