
Brāhmaṇa-pūjā, Haviḥ-dāna, and the Vāsudeva–Pṛthivī Saṃvāda (Chapter 34)
Upa-parva: Dāna–Śrāddha–Brāhmaṇa-sevā Anuśāsana (Ethical discourse on honoring Brahmins and ritual giving)
Bhīṣma instructs that rulers should continually honor Brahmins with respect, protection, and material support, presenting them as pivotal agents in the moral economy of happiness and suffering. He links rāṣṭra-śānti (state tranquility) to the consistent veneration of Brahmins, analogizing their role to stabilizing divine governance. The discourse asserts that offerings given to Brahmins are accepted through them by deities and ancestors, and that neglect or hostility toward Brahmins disrupts ritual reciprocity, harming the patron’s post-mortem prospects. The chapter then introduces an old exemplum: Vāsudeva questions Earth (Pṛthivī) on how a householder removes sin; she answers that service to Brahmins is the highest purifier, generating prosperity, fame, and discernment, while Brahmin-disapproval leads to rapid decline. The unit concludes with an exhortation to the listener (addressed as Pārtha) to persistently honor eminent Brahmins to attain well-being (śreyas).
Chapter Arc: युधिष्ठिर के प्रश्न के उत्तर में भीष्म एक प्राचीन इतिवृत्त का द्वार खोलते हैं—देवर्षि नारद और वासुदेव कृष्ण का संवाद, जिसमें ‘पूजनीय पुरुष’ की पहचान और पूजन का फल बताया जाता है। → कृष्ण नारद को हाथ जोड़कर श्रेष्ठ द्विजों को नमस्कार करते देख पूछते हैं—‘भगवन्, आप किन्हें नमस्कार करते हैं?’ प्रश्न के साथ ही मान-प्रतिष्ठा का मर्म उठता है: कौन वास्तव में लोक-पूज्य है—जन्म से, ज्ञान से, या आचरण से? → नारद का निर्णायक कथन—वे उन ऋषियों/ब्राह्मणों को नित्य नमस्कार करते हैं जो ‘लोककर’ हैं, ‘तमोघ्न’ हैं, और जिनका जीवन शम, अनसूया, नित्य स्वाध्याय, शिष्टाचार तथा माता-पिता-गुरु के प्रति सम्यक् वृत्ति से प्रकाशित है; ऐसे मान्य पुरुष इहलोक-परलोक दोनों में सुखप्रदा होते हैं। → नारद कृष्ण को उपदेश देते हैं कि वे भी देव, पितृ, द्विज और अतिथि का नित्य सम्यक् पूजन करें—यही इष्ट गति का साधन है; पूजन का फल केवल पुण्य नहीं, समाज-धर्म की स्थिरता और आत्मशुद्धि भी है।
Verse 1
ऑपन--माज बछ। जि एकत्रिशो< ध्याय: नारदजीके द्वारा पूजनीय पुरुषोंके लक्षण तथा उनके आदर-सत्कार और पूजनसे प्राप्त होनेवाले लाभका वर्णन युधिछिर उवाच के पूज्या वै त्रिलोकेडस्मिन् मानवा भरतर्षभ । विस्तरेण तदाचक्ष्व न हि तृप्पामि कथ्यत:,युधिष्ठिरने पूछा--भरतश्रेष्ठ! इन तीनों लोकोंमें कौन-कौन-से मनुष्य पूज्य होते हैं? यह विस्तार-पूर्वक बताइये। आपकी बातें सुनते-सुनते मुझे तृप्ति नहीं होती है
Yudhiṣṭhira berkata: “Wahai yang termulia di antara keturunan Bharata, manusia macam apakah di tiga dunia ini yang sungguh layak dihormati? Jelaskanlah dengan rinci, sebab mendengar uraian tentangnya pun tak pernah membuatku puas.”
Verse 2
भीष्म उवाच अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् | नारदस्य च संवाद वासुदेवस्य चोभयो:,भीष्मजीने कहा--युधिष्ठिर! इस विषयमें विज्ञ पुरुष देवर्षि नारद और भगवान् श्रीकृष्णके संवादरूप इस इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं
Bhishma berkata: “Dalam perkara ini pun, orang bijak mengutip sebuah kisah suci yang sangat kuno sebagai teladan—yakni dialog antara resi ilahi Nārada dan Vāsudeva (Śrī Kṛṣṇa), yang diucapkan oleh keduanya.”
Verse 3
नारदं प्राउ्जलिं दृष्टवा पूजयान द्विजर्षभान् । केशव: परिपप्रच्छ भगवन् कान् नमस्यसि,एक समयकी बात है, देवर्षि नारदजी हाथ जोड़कर उत्तम ब्राह्मणोंकी पूजा कर रहे थे। यह देखकर भगवान् श्रीकृष्णने पूछा--“भगवन्! आप किनको नमस्कार कर रहे हैं?
Bhishma berkata: “Pada suatu ketika, melihat resi ilahi Nārada dengan tangan terkatup, sedang memuliakan para Brahmana yang utama, Keshava (Kṛṣṇa) bertanya, ‘Wahai yang mulia, kepada siapakah engkau mempersembahkan salam hormat?’”
Verse 4
बहुमानपरस्तेषु भगवन् यान् नमस्यसि । शव्यं चेच्छोतुमस्माभिर््रह्वेतद् धर्मवित्तम,'प्रभो! धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ नारदजी! आपके हृदयमें जिनके प्रति बहुत बड़ा आदर है तथा आप भी जिनके सामने मस्तक झुकाते हैं, वे कौन हैं? यदि हमें सुनाना उचित समझें तो आप उन पूज्य पुरुषोंका परिचय दीजिये”
Bhishma berkata: “Wahai yang mulia, kepada siapakah engkau menaruh hormat yang begitu besar—mereka yang kepadanya engkau sendiri menundukkan kepala? Jika engkau memandang patut bagi kami untuk mendengarnya, wahai pengenal dharma, ungkapkan perkara yang mendalam ini dan perkenalkan orang-orang yang layak dimuliakan itu.”
Verse 5
नारद उवाच शृणु गोविन्द यानेतान् पूजयाम्यरिमर्दन । त्वत्तोडन्य: कः पुमॉल्लोके श्रोतुमेतदिहाहति,नारदजीने कहा--शत्रुमर्दन गोविन्द! मैं जिनका पूजन करता हूँ उनका परिचय सुननेके लिये इस संसारमें आपसे बढ़कर दूसरा कौन पुरुष अधिकारी है?
Nārada berkata: “Dengarkanlah, wahai Govinda, wahai penghancur musuh; akan kuuraikan mereka yang kupuja. Sebab di dunia ini, selain engkau, siapakah yang pantas mendengar kisah ini di sini?”
Verse 6
वरुणं वायुमादित्यं पर्जन्यं जातवेदसम् | स्थाणुं स्कन्दं तथा लक्ष्मी विष्णु ब्रह्माणमेव च
Narada berkata: “Hendaknya orang memuliakan Varuṇa, Vāyu, Āditya (Surya), Parjanya, Jātavedas (Agni), Sthāṇu (Śiva), Skanda, serta Lakṣmī—juga Viṣṇu dan Brahmā.”
Verse 7
वाचस्पतिं चन्द्रमसमप: पृथ्वीं सरस्वतीम् | सततं ये नमस्यन्ति तान् नमस्याम्यहं विभो
Narada berkata: “Wahai Tuan, aku bersujud kepada mereka yang senantiasa memberi hormat kepada Vācaspati, Sang Bulan, Air, Bumi, dan Sarasvatī.”
Verse 8
जो लोग वरुण, वायु, आदित्य, पर्जन्य, अग्नि, रुद्र, स्वामी कार्तिकेय, लक्ष्मी, विष्णु, ब्रह्मा, बृहस्पति, चन्द्रमा, जल, पृथ्वी और सरस्वतीको सदा प्रणाम करते हैं, प्रभो! मैं उन्हीं पूज्य पुरुषोंको मस्तक झुकाता हूँ ।। तपोधनान् वेदविदो नित्यं वेदपरायणान् | महाहनि् वृष्णिशार्दूल सदा सम्पूजयाम्यहम्,वृष्णिसिंह! तपस्या ही जिनका धन है, जो वेदोंके ज्ञाता तथा वेदोक्त धर्मका ही आश्रय लेनेवाले हैं, उन परम पूजनीय पुरुषोंकी ही मैं सदा पूजा करता रहता हूँ
Narada berkata: “Mereka yang senantiasa bersujud kepada Varuṇa, Vāyu, Āditya, Parjanya, Agni, Rudra, Skanda (Kārtikeya), Lakṣmī, Viṣṇu, Brahmā, Bṛhaspati, Sang Bulan, Air, Bumi, dan Sarasvatī—wahai Tuan, kepada merekalah aku menundukkan kepala. Wahai Harimau kaum Vṛṣṇi, wahai berlengan perkasa! Para pertapa yang kekayaannya adalah tapa, yang mengetahui Weda dan teguh berpegang pada dharma Weda—merekalah yang senantiasa ku muliakan dan ku puja.”
Verse 9
अभुकक्त्वा देवकार्याणि कुर्वते येडविकत्थना: । संतुष्ट श्च क्षमायुक्तास्तान् नमस्याम्यहं विभो,प्रभो! जो भोजनसे पहले देवताओंकी पूजा करते, अपनी झूठी बड़ाई नहीं करते, संतुष्ट रहते और क्षमाशील होते हैं, उनको मैं प्रणाम करता हूँ
Narada berkata: “Wahai Tuan, aku bersujud kepada mereka yang sebelum makan terlebih dahulu menunaikan kewajiban kepada para dewa; yang tidak membanggakan diri; yang hidup dalam rasa cukup; dan yang berhati pemaaf.”
Verse 10
सम्यग् यजन्ति ये चेष्टी: क्षान्ता दान्ता जितेन्द्रिया: । सत्यं धर्म क्षितिं गाश्न॒ तान् नमस्यामि यादव,यदुनन्दन! जो विधिपूर्वक यज्ञोंका अनुष्ठान करते हैं, जो क्षमाशील, जितेन्द्रिय और मनको वशमें करनेवाले हैं और सत्य, धर्म, पृथ्वी तथा गौओंकी पूजा करते हैं, उन्हींको मैं प्रणाम करता हूँ
Narada berkata: “Wahai Yādava, aku bersujud kepada mereka yang melaksanakan yajña dan upacara suci dengan tata cara yang benar; yang sabar, terkendali, menaklukkan indria; serta memuliakan kebenaran, dharma, bumi, dan sapi.”
Verse 11
ये वै तपसि वर्तन्ते वने मूलफलाशना: । असंचया: क्रियावन्तस्तान् नमस्यामि यादव
Wahai Yadawa! Aku bersujud hormat kepada mereka yang menempuh tapa—tinggal di rimba, hidup dari akar dan buah, tanpa menimbun persediaan, dan teguh dalam laku kewajiban yang ditetapkan.
Verse 12
यादव! जो लोग वनमें फल-मूल खाकर तपस्यामें लगे रहते हैं, किसी प्रकारका संग्रह नहीं रखते और क्रियानिष्ठ होते हैं, उन्हींको मैं मस्तक झुकाता हूँ ।। ये भृत्यभरणे शक्ता: सततं चातिथिव्रता: । भुज्जते देवशेषाणि तान् नमस्यामि यादव,जो माता-पिता, कुटुम्बीजन एवं सेवक आदि भरण-पोषणके योग्य व्यक्तियोंका पालन करनेमें समर्थ हैं, जिन्होंने सदा अतिथिसेवाका व्रत ले रखा है तथा जो देवयज्ञसे बचे हुए अन्नको ही भोजन करते हैं, मैं उन्हींके सामने नतमस्तक होता हूँ
Wahai Yadawa! Aku menundukkan kepala kepada mereka yang tinggal di rimba, hidup dari buah dan akar, tekun bertapa, tanpa menimbun simpanan, dan teguh dalam laku suci. Dan aku pun bersujud hormat kepada mereka yang sanggup memelihara orang tua, keluarga, serta para pelayan yang bergantung; yang senantiasa berkaul memuliakan tamu; dan yang makan hanya sisa persembahan setelah yajña bagi para dewa.
Verse 13
ये वेदं प्राप्य दुर्धर्षा वाम्मिनो ब्रह्म॒चारिण: । याजनाध्यापने युक्ता नित्यं तान् पूजयाम्यहम्,जो वेदका अध्ययन करके दुर्धर्ष और बोलनेमें कुशल हो गये हैं, ब्रह्मचर्यका पालन करते हैं और यज्ञ कराने तथा वेद पढ़ानेमें लगे रहते हैं उनकी मैं सदा पूजा किया करता हूँ
Mereka yang, setelah meraih pengetahuan Weda, menjadi tak gentar dan fasih bertutur; yang memelihara brahmacarya; serta senantiasa tekun memimpin yajña dan mengajarkan Weda—merekalah yang selalu kupersembahi hormat dan pemujaan.
Verse 14
प्रसन्नहृददया श्चैव सर्वसत्त्वेषु नित्यश: । आपूृष्ठतापात् स्वाध्याये युक्तास्तान् पूजयाम्पहम्,जो नित्य-निरन्तर समस्त प्राणियोंपर प्रसन्नचित्त रहते और सबेरेसे दोपहरतक वेदोंके स्वाध्यायमें संलग्न रहते हैं, उनका मैं पूजन करता हूँ
Aku menghormati mereka yang hatinya senantiasa jernih dan penuh welas kepada semua makhluk, serta tekun dalam swādhyāya Weda dari pagi hingga tengah hari.
Verse 15
गुरुप्रसादे स्वाध्याये यतन्तो ये स्थिरव्रता: । शुश्रूषवो5नसूयन्तस्तान् नमस्यामि यादव,यदुकुलतिलक! जो गुरुको प्रसन्न रखने और स्वाध्याय करनेके लिये सदा यत्नशील रहते हैं, जिनका व्रत कभी भंग नहीं होने पाता, जो गुरुजनोंकी सेवा करते और किसीके भी दोष नहीं देखते उनको मैं प्रणाम करता हूँ
Wahai permata wangsa Yadu! Aku bersujud hormat kepada mereka yang teguh dalam kaul—yang senantiasa berusaha meraih keridaan guru dan menekuni swādhyāya; yang melayani para sesepuh dan para guru dengan bakti; serta tidak mencari-cari cela orang lain.
Verse 16
सुव्रता मुनयो ये च ब्राह्मणा: सत्यसंगरा: । वोढारो हव्यकव्यानां तान् नमस्यामि यादव,यदुनन्दन! जो उत्तम व्रतका पालन करनेवाले, मननशील, सत्यप्रतिज्ञ तथा हव्य- कव्यको नियमित-रूपसे चलानेवाले ब्राह्मण हैं उनको मैं मस्तक झुकाता हूँ
Nārada berkata: “Wahai Yādava, wahai kebanggaan wangsa Yadu! Aku menundukkan kepala kepada para brāhmaṇa yang teguh dalam laku tapa dan brata yang luhur, para resi yang senantiasa merenung, kukuh dalam satya serta ikrar-janji, dan yang menegakkan persembahan havya dan kavya—upacara bagi para dewa dan bagi para leluhur—dengan semestinya.”
Verse 17
भैक्ष्यचर्यासु निरता: कृशा गुरुकुलाश्रया: । निः:सुखा निर्धना ये तु तान् नमस्यामि यादव,यदुकुलभूषण! जो गुरुकुलमें रहकर भिक्षासे जीवन निर्वाह करते हैं, तपस्यासे जिनका शरीर दुर्बल हो गया है और जो कभी धन तथा सुखकी चिन्ता नहीं करते हैं उनको मैं प्रणाम करता हूँ
Nārada berkata: “Wahai Yādava, perhiasan wangsa Yadu! Aku bersujud kepada mereka yang tinggal di gurukula, tekun menjalani disiplin hidup dari sedekah; tubuhnya menjadi kurus oleh tapa; dan yang bebas dari kegelisahan akan harta maupun kenyamanan duniawi.”
Verse 18
निर्ममा निष्प्रतिद्वन्द्धा नि्ींका निष्प्रयोजना: । ये वेदं प्राप्य दुर्धर्षा वाग्मिनो ब्रह्मवादिन:
Nārada berkata: “Mereka tanpa kemelekatan, tanpa tandingan, tanpa rasa takut, dan tanpa maksud tersembunyi. Setelah meraih Veda, mereka menjadi tak tergoyahkan—fasih bertutur dan teguh mewartakan Brahman, kebenaran tertinggi.”
Verse 19
अहिंसानिरता ये च ये च सत्यव्रता नरा: । दान्ता: शमपराश्वैव तान् नमस्यामि केशव
Nārada berkata: “Wahai Keśava, aku bersujud kepada orang-orang yang tekun dalam ahiṃsā, berkaul satya, menundukkan indria, dan sepenuhnya berpegang pada śama—ketenangan batin.”
Verse 20
केशव! जिनके मनमें ममता नहीं है, जो प्रति-द्वन्ध्रियोंसे रहित, लज्जासे ऊपर उठे हुए तथा कहीं भी कोई प्रयोजन न रखनेवाले हैं, जो वेदोंके ज्ञानका बल पाकर दुर्धर्ष हो गये हैं, प्रवचन-कुशल और ब्रह्मवादी हैं, जिन्होंने अहिंसामें तत्पर रहकर सदा सत्य बोलनेका व्रत ले रखा है तथा जो इन्द्रियसंयम एवं मनोनिग्रहके साधनमें संलग्न रहते हैं उनको मैं नमस्कार करता हूँ ।। देवतातिथिपूजायां युक्ता ये गृहमेधिन: । कपोततवृत्तयो नित्यं तान् नमस्यामि यादव,यादव! जो गृहस्थ ब्राह्मण सदा कपोतवृत्तिसे रहते हुए देवता और अतिथियोंकी पूजामें संलग्न रहते हैं, उनको मैं मस्तक झुकाता हूँ
Nārada berkata: “Wahai Keśava, aku bersujud kepada mereka yang telah memadamkan rasa memiliki—melampaui pasangan-pasangan pertentangan, tanpa takut, dan tanpa pamrih. Diteguhkan oleh daya pengetahuan Veda, mereka menjadi tak tertandingi; mahir memberi ajaran, mereka menuturkan Brahman. Tekun dalam ahiṃsā, mereka memegang kaul satya seumur hidup, dan senantiasa menempuh disiplin pengendalian indria serta penaklukan batin. Dan, wahai Yādava, aku pun menundukkan kepala kepada para perumah-tangga yang hidup dengan ‘cara merpati’—cukup dengan sedikit—seraya tekun memuja para dewa dan memuliakan para tamu.”
Verse 21
जिनके कार्योमें धर्म, अर्थ और काम तीनोंका निर्वाह होता है, किसी एककी भी हानि नहीं होने पाती तथा जो सदा शिष्टाचारमें ही संलग्न रहते हैं, उनको मैं नमस्कार करता हूँ
Aku bersujud hormat kepada mereka yang dalam setiap usaha menegakkan tiga tujuan hidup—dharma, artha, dan kama—tanpa merugikan atau mengabaikan salah satunya, dan yang senantiasa teguh dalam tata susila serta laku mulia para bijak.
Verse 22
ब्राह्मणा: श्रुतसम्पन्ना ये त्रिवर्गमनुछिता: । अलोलुपा: पुण्यशीलास्तान् नमस्यामि केशव,केशव! जो ब्राह्मण वेद-शास्त्रोंके ज्ञानसे सम्पन्न, धर्म, अर्थ और कामका सेवन करनेवाले, लोलुपतासे रहित और स्वभावत:ः पुण्यात्मा हैं उन्हें मैं नमस्कार करता हूँ
Wahai Keśava, aku bersujud hormat kepada para brāhmaṇa yang kaya akan pengetahuan suci (śruti), yang menempuh tiga tujuan hidup—dharma, artha, dan kama—secara patut tanpa berlebih-lebihan, yang bebas dari ketamakan, dan yang tabiatnya memang bajik.
Verse 23
अब्भक्षा वायुभक्षाश्न सुधाभक्षाश्न ये सदा । व्रतैश्न विविधैर्युक्तास्तान्ू नमस्यामि माधव,माधव! जो नाना प्रकारके व्रतोंका पालन करते हुए केवल पानी या हवा पीकर ही रह जाते हैं तथा जो सदा यज्ञशेष अन्नका ही भोजन करते हैं उनके चरणोंमें मैं प्रणाम करता हूँ
Wahai Mādhava, aku bersujud di kaki para pertapa yang teguh dalam beraneka laku tapa dan kaul, yang hidup hanya dengan air atau bahkan dengan udara, serta mereka yang senantiasa makan hanya sisa persembahan kurban (yajña-śeṣa).
Verse 24
अयोनीन ग्नियोनींश्र ब्रह्मयोनींस्तथैव च । सर्वभूतात्मयोनींश्व॒ तान् नमस्याम्यहं सदा,जो स्त्री नहीं रखते अर्थात् ब्रह्मचर्यका पालन करते हैं, जो अग्निहोत्रसे युक्त हैं तथा जो वेदोंको धारण करनेवाले हैं और समस्त प्राणियोंके आत्मस्वरूप परमात्माको ही सबका कारण माननेवाले हैं उनकी मैं सदा वन्दना करता हूँ
Aku senantiasa bersujud kepada mereka yang menjaga brahmacarya (tanpa bersandar pada kenikmatan rahim/nafsu), yang tekun dalam agnihotra, yang memegang teguh Weda, dan yang memandang Paramātman—Diri Tertinggi, jiwa dari segala makhluk—sebagai sebab utama segala sesuatu.
Verse 25
नित्यमेतान् नमस्यामि कृष्ण लोककरानृषीन् । लोकज्येष्ठान् कुलज्येष्ठांस्तमोघ्नाललोकभास्करान्,श्रीकृष्ण! जो लोकोंकी सृष्टि करनेवाले, संसारमें सबसे श्रेष्ठ, उत्तम कुलमें उत्पन्न, अज्ञानान्धकारका नाश करनेवाले तथा सूर्यके समान जगत्को ज्ञानालोक प्रदान करनेवाले हैं उन ऋषियोंको मैं सदा मस्तक झुकाता हूँ
Wahai Śrī Kṛṣṇa, aku senantiasa menundukkan kepala kepada para ṛṣi yang membentuk dan menopang tatanan dunia; yang paling utama di antara para sesepuh dunia, yang termulia dalam garis luhur; yang melenyapkan gelapnya kebodohan dan, laksana matahari, mencurahkan cahaya pengetahuan kepada segenap makhluk.
Verse 26
तस्मात् त्वमपि वार्ष्णेय द्विजान् पूजय नित्यदा । पूजिता: पूजनार्हा हि सुखं दास्यन्ति तेडनघ,वार्ष्णय! अतः आप भी सदा ब्राह्मणोंका पूजन करें। निष्पाप श्रीकृष्ण! वे पूजनीय ब्राह्मण पूजित होनेपर आपको अपने आशीर्वादसे सुख प्रदान करेंगे
Karena itu, wahai Vārṣṇeya, hormatilah para dwija (brahmana) setiap waktu. Sebab mereka yang sungguh layak dipuja, bila dipuja, akan menganugerahkan kebahagiaan kepadamu melalui berkat mereka, wahai yang tanpa noda dosa.
Verse 27
अस्मिल्लोंके सदा होते परत्र च सुखप्रदा: । चरन्ते मान्यमाना वै प्रदास्यन्ति सुखं तव,ये ब्राह्मण सदा इहलोक और परलोकमें भी सुख प्रदान करते हुए विचरते हैं। ये सम्मानित होनेपर आपको अवश्य ही सुख प्रदान करेंगे
Narada berkata: “Di dunia ini dan juga di alam seberang, ada insan-insan yang senantiasa berkelana sebagai pemberi kebahagiaan. Bila mereka dihormati sebagaimana mestinya, mereka pasti akan menganugerahkan kebahagiaan kepadamu.”
Verse 28
ये सर्वातिथयो नित्यं गोषु च ब्राह्मणेषु च । नित्यं सत्ये चाभिरता दुर्गाण्यतितरन्ति ते,जो सबका अतिथि सत्कार करते तथा गौ-ब्राह्मण और सत्यपर प्रेम रखते हैं वे बड़े- बड़े संकटसे पार हो जाते हैं
Narada berkata: Mereka yang senantiasa memuliakan setiap tamu, yang selalu menunjukkan bakti dan pemeliharaan kepada sapi serta para brahmana, dan yang teguh berpegang pada kebenaran—mereka menyeberangi bahkan bahaya dan krisis yang besar.
Verse 29
नित्यं शमपरा ये च तथा ये चानसूयका: । नित्यस्वाध्यायिनो ये च दुर्गाण्यतितरन्ति ते,जो सदा मनको वशमें रखते, किसीके दोषपर दृष्टि नहीं डालते और प्रतिदिन स्वाध्यायमें संलग्न रहते हैं वे दुर्गण संकटसे पार हो जाते हैं
Narada berkata: Mereka yang senantiasa berpegang pada ketenangan batin, yang bebas dari mencela dan iri hati, dan yang setiap hari tekun dalam svādhyāya (telaah ajaran suci)—mereka menyeberangi masa-masa genting dan lolos dari bahaya.
Verse 30
इस प्रकार श्रीमह्याभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें वीतहव्यका उपाख्याननागमक तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ,सर्वान् देवान् नमस्यन्ति ये चैक वेदमाश्रिता: । श्रद्धधानाश्ष दान्ताश्न दुर्गाण्यतितरन्ति ते
Bhīṣma berkata: Mereka yang bersujud hormat kepada semua dewa, dan berlindung pada satu Veda—dengan śraddhā (iman) serta pengendalian diri—menyeberangi jalan-jalan yang sukar dan rintangan yang berbahaya.
Verse 31
जो सब देवताओंको प्रणाम करते हैं, एकमात्र वेदका आश्रय लेते, श्रद्धा रखते और इन्द्रियोंको वशमें रखते हैं वे भी दुस्तर संकटसे छुटकारा पा जाते हैं ।। तथैव विप्रप्रवरान् नमस्कृत्य यतव्रता: । भवन्ति ये दानरता दुर्गाण्यतितरन्ति ते,इसी प्रकार जो नियमपूर्वक व्रतोंका पालन करते हैं और श्रेष्ठ ब्राह्मगोंको नमस्कार करके उन्हें दान देते हैं वे दुस्तर विपत्ति लाँघ जाते हैं इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि कृष्णनारदसंवादे एकत्रिंशो5ध्याय:
Nārada berkata: Mereka yang bersujud kepada semua dewa, berlindung pada Weda yang satu, memelihara śraddhā, dan mengekang indria—mereka pun terbebas dari malapetaka yang sukar diseberangi. Demikian pula, mereka yang teguh dalam laku brata, memberi hormat kepada para brāhmaṇa utama dan bersuka dalam memberi dāna kepada mereka, akan menyeberangi bahaya yang paling berat sekalipun.
Verse 32
तपस्विनश्न ये नित्यं कौमारब्रह्मचारिण: । तपसा भावितात्मानो दुर्गाण्यतितरन्ति ते,जो तपस्वी, आबालब्रह्मचारी और तपस्यासे शुद्ध अन्तःकरणवाले हैं वे दुर्गमण संकटसे पार हो जाते हैं
Nārada berkata: Para pertapa yang senantiasa hidup dalam brahmacarya sejak masa muda, dan yang batinnya ditempa oleh tapas, mampu menyeberangi bahaya yang paling sukar sekalipun.
Verse 33
देवतातिथि भृत्यानां पितृणां चार्चने रता: । शिष्टान्नभोजिनो ये च दुर्गाण्यतितरन्ति ते,जो देवता, अतिथि, पोष्यवर्ग तथा पितरोंके पूजनमें तत्पर रहते हैं और यज्ञशिष्ट अन्नका भोजन करते हैं वे भी दुर्गम संकटसे पार हो जाते हैं
Nārada berkata: Mereka yang tekun memuliakan para dewa, menyambut tamu, memelihara para tanggungan dan pelayan, serta memuja para leluhur—dan yang makan hanya anna-śiṣṭa, sisa suci dari yajña—mereka menyeberangi krisis yang sulit sekalipun.
Verse 34
अग्निमाधाय विधिवत् प्रणता धारयन्ति ये । प्राप्ता: सोमाहुतिं चैव दुर्गाण्यतितरन्ति ते,जो विधिपूर्वक अग्निकी स्थापना करके सदा अग्निदेवकी उपासना और वन्दना करते हुए सर्वदा उस अग्निकी रक्षा करते हैं; तथा उसमें सोमरसकी आहुति देते हैं वे दुस्तर विपत्तिसे पार हो जाते हैं
Nārada berkata: Mereka yang menurut tata-ritus menegakkan api suci, menunduk dalam hormat, terus memelihara dan menjaganya—serta mempersembahkan soma sebagai āhuti ke dalamnya—mereka melampaui malapetaka yang sukar diseberangi.
Verse 35
मातापित्रोर्गुरुषु च सम्यग् वर्तन्ति ये सदा । यथा त्वं वृष्णिशार्दटूलेत्युक्त्वैवे विरराम सः,वृष्णिसिंह! जो आपकी ही भाँति माता-पिता और गुरुके प्रति पूर्णतः न्याययुक्त बर्ताव करते हैं वे भी संकटसे पार हो जाते हैं--ऐसा कहकर नारदजी चुप हो गये
Nārada berkata: “Wahai harimau di antara kaum Vṛṣṇi! Mereka yang senantiasa berlaku benar terhadap ibu dan ayah, serta terhadap para guru, juga menyeberangi masa-masa genting—sebagaimana engkau.” Setelah berkata demikian, Nārada pun terdiam.
Verse 36
तस्मात् त्वमपि कौन्तेय पितृदेवद्धिजातिथीन् । सम्यक् पूजयसे नित्यं गतिमिष्टामवाप्स्यसि,अतः कुन्तीनन्दन! यदि तुम भी सदा देवताओं, पितरों, ब्राह्मणों और अतिथियोंका भलीभाँति पूजन एवं सत्कार करते रहोगे तो अभीष्ट गति प्राप्त कर लोगे
Karena itu, wahai putra Kuntī, bila engkau pun senantiasa menghormati dan memuja dengan semestinya para dewa, para leluhur, kaum dwija (brahmana), serta para tamu, niscaya engkau akan mencapai tujuan yang diidamkan.
Verse 231
येषां त्रिवर्ग: कृत्येषु वर्तते नोपहीयते । शिष्टाचारप्रवृत्ताश्न॒ तान् नमस्याम्यहं सदा
Nārada berkata: “Aku senantiasa bersujud hormat kepada mereka yang dalam kewajiban-kewajibannya menegakkan tiga tujuan hidup—dharma, artha, dan kāma—secara semestinya tanpa pernah merosot, serta berperilaku menurut tata laku para bijak.”
The chapter instructs sustained honoring, protection, and support of Brahmins as a stabilizing norm for rulers and householders, linking this practice to ritual efficacy (deva/pitṛ satisfaction), public peace, and favorable long-term outcomes.
It presents Brahmins as the ritual conduit: offerings given to them are described as being received by deities and ancestors, while neglecting to feed or honor Brahmins is framed as breaking the reciprocity that sustains pitṛ-prīti and divine favor.
Yes: the text explicitly associates Brāhmaṇa-sevā with purification of sin for householders, growth in prosperity and reputation, avoidance of decline, and attainment of śreyas and an elevated post-mortem destination (paramā gati).