
Vānaprastha-dharma and Tapas: Śiva–Umā Saṃvāda (Forest-Stage Discipline and Austerity)
Upa-parva: Āśrama-dharma Anuśāsana (Vānaprastha-dharma discourse)
Umā describes ascetics residing in pleasant regions—mountain springs, groves, and forest gardens—and asks Śaṅkara to state the “pious method” (vidhi) of vānaprasthas who live by their own bodies’ resources. Maheśvara enumerates a regulated program: thrice-daily ablution, worship of ancestors and deities, agnihotra and iṣṭi-homa procedures, gathering nīvāra grains, subsisting on fruits and roots, and using oils such as iṅguda and eraṇḍa for necessary unction. He adds yogic conduct and moral restraint—abandoning desire and anger—along with austerities like pañcatapa in summer, maṇḍūka-yoga discipline, vīrāsana, sleeping on bare ground, and practices termed śīta-yoga and agni-yoga. Dietary restraints range from water-only and air-only regimens to limited foods (algae, fallen leaves), with travel and dwelling prescribed “according to time, dharma, and rule.” The text integrates ritual obligations: pañca-yajña, nāga-pañcamī observance, aṣṭamī rites, cāturmāsya, and full-moon offerings; it frames forest renunciants as detached from household entanglements and oriented to higher worlds (Brahmaloka, Somaloka). Umā then asks about “siddhi-vāda” forest-dwellers who may be married; Śiva explains their discipline, emphasizing that sexuality is permitted only as rule-governed (ṛtu-kāla) and not by impulse. The discourse culminates in a virtue-ethical emphasis: granting “abhaya-dakṣiṇā” (assurance of safety), compassion, and especially ārjava (straightforwardness) as dharma’s core, contrasted with crookedness as adharma. Finally, Śiva lists outcome-claims (phalāni): specific vows and austerities are said to yield posthumous enjoyments in Gandharva, Nāga, Yakṣa, Varuṇa, Agni, Śakra, or “vīra” realms, and in some cases worldly sovereignty after prolonged discipline, thereby presenting a traditional motivational taxonomy for tapas.
Chapter Arc: युधिष्ठिर के प्रश्न से अध्याय खुलता है—‘दानों में सर्वोत्तम दान कौन-सा है, किस वस्तु को किस विधि से देना चाहिए?’ और भीष्म, गंगानन्दन, श्राद्ध-धर्म के गूढ़ रहस्य की ओर संकेत करते हैं। → वैशम्पायन के वचन से संवाद का भार बढ़ता है: भीष्म ‘धर्माणां परमं गुह्यम्’ बताने लगते हैं—पिण्ड, तर्पण, पितृगति, और विधि-भ्रंश से होने वाले दोषों का सूक्ष्म विवेचन; साथ ही यह जिज्ञासा उभरती है कि पिण्ड को जल में डालने जैसी क्रियाएँ वास्तव में किस देवता को तृप्त करती हैं और पितरों का उद्धार कैसे करती हैं। → पिण्डेषु त्रिषु या गति—तीन पिण्डों के फल और पितृलोक-गमन का निर्णायक कथन; तथा विशिष्ट कर्मों (वृषोत्सर्ग, वर्षा-ऋतु में दीपदान, अमावस्या को तिलोदक-तर्पण) के प्रत्यक्ष फल का उद्घोष—‘पितर सोमलोक को जाते हैं’ और ‘दीपदान से नरक का तम नष्ट होता है’। → भीष्म श्राद्ध को दान-धर्म का शिखर बताकर विधि, श्रद्धा, और उद्देश्य (पितृ-तृप्ति व कुल-रक्षा) को स्थिर करते हैं—संतानोत्पत्ति सहित पितृश्रद्धा को भी ‘दुर्गम नरक से प्रपितामहों के उद्धार’ का साधन कहा जाता है। → पिण्ड-क्रिया की सूक्ष्मता पर प्रश्न बना रहता है—‘कं वा प्रीणयते देवम्, कथं तारयते पितृन्’—अगले उपदेश में विधि के निर्णायक तर्क और अपवादों की अपेक्षा जगती है।
Verse 1
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २८६ श्लोक मिलाकर कुल ६७३ श्लोक हैं) # जी श्यु 8 पजञ्चविशर्त्याधिकशततमो< ध्याय: श्राद्धके विषयमें देवदूत और पितरोंका, पापोंसे छूटनेके विषयमें महर्षि विद्युत्प्रभ और इन्द्रका, धर्मके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका तथा वृषोत्सर्ग आदिके विषयमें देवताओं, ऋषियों और पितरोंका संवाद युधिछिर उवाच जन्म मानुष्यकं प्राप्य कर्मक्षेत्रं सुदुर्लभम् । श्रेयोडर्थिना दरिद्रेण कि कर्तव्यं पितामह,युधिष्ठिरने पूछा--पितामह! मनुष्यकुलमें जन्म और परम दुर्लभ कर्मक्षेत्र पाकर अपना कल्याण चाहनेवाले दरिद्र पुरुषको क्या करना चाहिये?
Yudhiṣṭhira berkata: “Wahai Kakek, setelah memperoleh kelahiran sebagai manusia—ladang tindakan yang amat langka ini—apa yang harus dilakukan oleh seorang miskin bila ia menghendaki kebaikan tertinggi?”
Verse 2
दानानामुत्तमं यच्च देयं यच्च यथा यथा । मान्यान् पूज्यांश्व गाड़ेय रहस्यं वक्तुमहसि,गंगानन्दन! सब दानोंमें जो उत्तम दान है, जिस वस्तुका जिस-जिस प्रकारसे दान करना उचित है तथा जो माननीय और पूजनीय हैं--इन सब रहस्यमय (गोपनीय) विषयोंका वर्णन कीजिये
Yudhiṣṭhira berkata: “Wahai Gāṅgeya, ajarkan kepadaku rahasia ini: apakah yang tertinggi di antara pemberian, apa yang patut diberikan dan dengan cara bagaimana; serta siapa yang sungguh layak dihormati dan dipuja.”
Verse 3
वैशम्पायन उवाच एवं पृष्टो नरेन्द्रेण पाण्डवेन यशस्विना । धर्माणां परम॑ गुह्ां भीष्म: प्रोवाच पार्थिवम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! यशस्वी पाण्डुपुत्र महाराज युधिष्ठिरके इस प्रकार पूछनेपर भीष्मजीने उनसे धर्मका परम गुह्य रहस्य बताना आरम्भ किया
Vaiśampāyana berkata: Demikian ditanya oleh raja Pāṇḍava yang termasyhur itu, Bhīṣma pun mulai menyampaikan kepada sang penguasa inti dharma yang paling luhur dan paling rahasia.
Verse 4
भीष्म उवाच शृणुष्वावहितो राजन् धर्मगुह्दानि भारत । यथा हि भगवान् व्यास: पुरा कथितवान् मयि,भीष्मजीने कहा--राजन्! भरतनन्दन! पूर्वकालमें भगवान् वेदव्यासने मुझे धर्मके जो गूढ़ रहस्य बताये थे, उनका वर्णन करता हूँ, सावधान होकर सुनो
Bhīṣma berkata: “Wahai Raja, wahai keturunan Bharata, dengarkan dengan saksama. Akan kuuraikan rahasia-rahasia dharma, sebagaimana dahulu Bhagavān Vyāsa menuturkannya kepadaku.”
Verse 5
देवगुह्ामिदं राजन् यमेनाक्लिष्टकर्मणा । नियमस्थेन युक्तेन तपसो महतः फलम्,राजन्! अनायास ही महान् कर्म करनेवाले यमने नियमपरायण और योगयुक्त होकर महान् तपके फलस्वरूप इस देवगुह्य रहस्यको प्राप्त किया था
Bhishma berkata: “Wahai Raja, ini adalah ajaran ilahi yang rahasia. Yama—yang tindakannya murni dan tak ternoda—dengan teguh bersemayam dalam pengendalian diri serta terdisiplin dalam yoga, memperolehnya sebagai buah agung dari tapa yang mendalam.”
Verse 6
येन यः प्रीयते देव: प्रीयन्ते पितरस्तथा । ऋषय: प्रमथा: श्रीक्ष चित्रगुप्तो दिशां गजा:,जिससे देवता, पितर, ऋषि, प्रमथगण, लक्ष्मी, चित्रगुप्त और दिग्गज प्रसन्न होते हैं
Bhishma berkata: “Dengan perbuatan apa pun suatu dewa berkenan, dengan perbuatan yang sama para Pitri pun berkenan; demikian pula para Rsi, para Pramatha, Sri (Lakshmi), Citragupta, dan gajah-gajah penjuru arah menjadi puas.”
Verse 7
ऋषिधर्म: स्मृतो यत्र सरहस्यो महाफल: । महादानफल चैव सर्वयज्ञफलं तथा,जिसमें महान् फल देनेवाले ऋषिधर्मका रहस्यसहित समावेश हुआ है तथा जिसके अनुष्ठानसे बड़े-बड़े दानों और सम्पूर्ण यज्ञोंका फल मिलता है
Bhishma berkata: “Ajaran itu dikenang sebagai Dharma para resi—lengkap dengan rahasia batinnya—dan berbuah besar. Dengan menjalankannya, seseorang memperoleh pahala derma agung dan juga buah dari segala yajña.”
Verse 8
यश्चैतदेवं जानीयाज्ज्ञात्वा वा कुरुतेडनघ । सदोषो<दोषवांश्रेह तैर्गुणै: सह युज्यते,निष्पाप नरेश! जो उस धर्मको इस प्रकार जानता और जानकर इसके अनुसार आचरण करता है, वह सदोष (पापी) रहा हो भी तो उस दोषसे मुक्त होकर उन सदगुणोंसे सम्पन्न हो जाता है
Bhishma berkata: “Wahai yang tak bernoda, siapa pun yang memahami ajaran ini dengan cara demikian—dan setelah memahaminya hidup sesuai dengannya—meski pernah ternoda oleh cela, akan terbebas dari cela itu. Ia pun dipersatukan dengan kebajikan-kebajikan itu dan tegak dalam keutamaan.”
Verse 9
दशसूनासमं चक्रं दशचक्रसमो ध्वज: । दशध्वजसमा वेश्या दशवेश्यासमो नृप:,दस कसाइयोंके समान एक तेली, दस तेलियोंके समान एक कलवार, दस कलवारोंके समान एक वेश्या और दस वेश्याओंके समान एक राजा है
Bhishma berkata: “Seorang pemeras minyak dipandang setara dengan sepuluh penyembelih; seorang penyuling/penjual minuman keras setara dengan sepuluh pemeras minyak; seorang pelacur setara dengan sepuluh penyuling; dan seorang raja setara dengan sepuluh pelacur.”
Verse 10
अर्धेनैतानि सर्वाणि नृपति: कथ्यतेडधिक: । त्रिवर्गसहितं शास्त्र पवित्र पुण्यलक्षणम्,राजा इन सबकी अपेक्षा अधिक दोषयुक्त बताया जाता है, इसलिये ये सब पाप राजाके आधेसे भी कम हैं। (अत: राजाका दान लेना निषिद्ध है।) धर्म, अर्थ और कामका प्रतिपादन करनेवाला जो शास्त्र है, वह पवित्र एवं पुण्यका परिचय करानेवाला है
Bhishma berkata: “Seorang raja disebut menanggung bagian kesalahan yang lebih besar; karena itu dosa-dosa ini bahkan tidak seberat setengah dari kesalahan sang raja. Maka, menerima pemberian raja adalah terlarang. Ajaran suci yang menguraikan tiga tujuan hidup—dharma, artha, dan kāma—bersifat menyucikan dan menyingkap tanda-tanda kebajikan.”
Verse 11
धर्मव्याकरणं पुण्यं रहस्यश्रवर्ण महत् । श्रोतव्यं धर्मसंयुक्त विहितं त्रिदशै: स्वयम्,उसमें धर्म और उसके रहस्योंकी व्याख्या है वह परम पवित्र, महान् रहस्यमय तत्त्वका श्रवण करानेवाला, धर्मयुक्त और साक्षात् देवताओंद्वारा निर्मित है। उसका श्रवण करना चाहिये
Ajaran yang menguraikan dharma ini penuh kebajikan dan menghadirkan pendengaran atas rahasia agung. Ia selaras dengan dharma dan ditetapkan oleh para dewa sendiri; karena itu patut didengarkan.
Verse 12
पितृणां यत्र गुह्यानि प्रोच्यन्ते श्राद्धकर्मणि । देवतानां च सर्वेषां रहस्यं कथ्यतेडखिलम्,जिसमें पितरोंके श्राद्धके विषयमें गूढ़ बातें बतायी गयी हैं, जहाँ सम्पूर्ण देवताओंके रहस्यका पूरा-पूरा वर्णन है तथा जिसमें रहस्यसहित महान् फलदायी ऋषि-धर्मका एवं बड़े-बड़े यज्ञों और सम्पूर्ण दानोंके फलका प्रतिपादन किया गया है
Di dalamnya diungkapkan prinsip-prinsip tersembunyi mengenai upacara śrāddha bagi para leluhur; dan di sana pula dijelaskan sepenuhnya rahasia batin semua para dewa.
Verse 13
ऋषिधर्म: स्मृतो यत्र सरहस्यो महाफल: । महायज्ञफलं चैव सर्वदानफलं तथा,जिसमें पितरोंके श्राद्धके विषयमें गूढ़ बातें बतायी गयी हैं, जहाँ सम्पूर्ण देवताओंके रहस्यका पूरा-पूरा वर्णन है तथा जिसमें रहस्यसहित महान् फलदायी ऋषि-धर्मका एवं बड़े-बड़े यज्ञों और सम्पूर्ण दानोंके फलका प्रतिपादन किया गया है
Di dalamnya diingat dharma para resi—mendalam, disertai rahasia batin, dan berbuah ganjaran besar; dan di sana pula dijelaskan hasil dari yajña-yajña agung serta hasil dari segala macam dana (pemberian).
Verse 14
ये पठन्ति सदा मर्त्या येषां चैवोपतिष्ठति । श्रुत्वा च फलमाचचष्टे स्वयं नारायण: प्रभु:,जो मनुष्य उस शास्त्रको सदा पढ़ते हैं, जिन्हें उसका तत्त्व हृदयंगम हो जाता है तथा जो उसका फल सुनकर दूसरोंके सामने व्याख्या करते हैं, वे साक्षात् भगवान् नारायणस्वरूप हो जाते हैं
Mereka yang senantiasa membaca ajaran itu, yang maknanya bersemayam dalam hati, dan yang setelah mendengar buahnya lalu menjelaskannya di hadapan orang lain—mereka menjadi laksana Narayana, Sang Penguasa, sendiri.
Verse 15
गवां फलं तीर्थफलं यज्ञानां चैव यत् फलम् | एतत् फलमवाप्रोति यो नरोडतिथिपूजक:,जो मानव अतिथियोंकी पूजा करता है, वह गोदान, तीर्थस्थान और यज्ञानुष्ठानका फल पा लेता है
Pahala yang diperoleh dari sedekah sapi, pahala dari mengunjungi tirtha (tempat suci), dan pahala dari melaksanakan yajña—semua itu juga diraih oleh orang yang memuliakan serta memuja tamu.
Verse 16
श्रोतार: श्रद्धधानाश्न येषां शुद्धं च मानसम् । तेषां व्यक्त जिता लोका: श्रद्धधानेन साधुना,जो श्रद्धापूर्वक धर्मशास्त्रका श्रवण करते हैं तथा जिनका हृदय शुद्ध हो गया है, वे श्रद्धालु एवं श्रेष्ठ मनके द्वारा अवश्य ही पुण्यलोकपर विजय प्राप्त कर लेते हैं
Mereka yang mendengarkan dharmaśāstra dengan penuh śraddhā dan yang batinnya telah suci—orang-orang saleh yang beriman demikian sungguh menaklukkan alam-alam kebajikan.
Verse 17
मुच्यते किल्बिषाच्चैव न स पापेन लिप्यते । धर्म च लभते नित्यं प्रेत्य लोकगतो नर:,शुद्धचित्त पुरुष श्रद्धापूर्वक शास्त्र-श्रवण करनेसे पूर्व पापसे मुक्त हो जाता है तथा वह भविष्यमें भी पापसे लिप्त नहीं होता है। नित्य-प्रति धर्मका अनुष्ठान करता है और मरनेके बाद उसे उत्तम लोककी प्राप्ति होती है
Ia terbebas dari dosa dan setelah itu tidak lagi ternoda oleh keburukan. Ia senantiasa memperoleh serta menjalankan dharma, dan setelah wafat ia mencapai alam yang lebih luhur.
Verse 18
कस्यचित् त्वथ कालस्य देवदूतो यदृच्छया । स्थितो हाुन्त्हितो भूत्वा पर्यईभाषत वासवम्,एक समयकी बात है, एक देवदूतने अकस्मात् पहुँचकर आकाशमें स्थित हो इन्द्रसे कहा--
Pada suatu ketika, seorang utusan dewa datang tanpa diduga. Berdiri di angkasa, ia pun berbicara kepada Vāsava (Indra) demikian—
Verse 19
यौ तौ कामगुणोपेतावद्चिनौ भिषजां वरौ । आज्ञयाहं तयो: प्राप्त: सनरान् पितृदैवतान्,“वे जो कमनीय गुणोंसे सम्पन्न वैद्यप्रवर अश्विनीकुमार हैं, उन दोनोंकी आज्ञासे मैं यहाँ देवताओं, पितरों और मनुष्योंके पास आया हूँ
Kedua Aśvin—yang berhias sifat-sifat menawan dan yang utama di antara para tabib—atas perintah merekalah aku datang ke sini, kepada para dewa, para Pitṛ, dan umat manusia.
Verse 20
कस्माद्धि मैथुन श्राद्धे दातुर्भोक्तुश्च वर्जितम् । किमर्थ च त्रय: पिण्डा: प्रविभक्ता: पृथक् पृथक्,“मेरे मनमें यह जिज्ञासा हुई है कि श्राद्धके दिन श्राद्ध-कर्ता और श्राद्धात्न भोजन करनेवाले ब्राह्मणके लिये जो मैथुनका निषेध किया गया है, उसका क्या कारण है? तथा श्राद्धमें पूथक्ू-पृथक् तीन पिण्ड किसलिये दिये जाते हैं?
Bhishma berkata: “Mengapa pada hari śrāddha hubungan suami-istri dilarang, baik bagi orang yang mempersembahkan śrāddha maupun bagi brahmana yang menyantap jamuan ritual? Dan untuk tujuan apa tiga persembahan piṇḍa dibagikan terpisah, satu demi satu?”
Verse 21
प्रथम: कस्य दातव्यो मध्यम: क्व च गच्छति । उत्तरश्न स्मृत: कस्य एतदिच्छामि वेदितुम्
“Kepada siapa bagian pertama harus diberikan? Ke mana bagian tengah pergi? Dan siapa yang dianggap sebagai ‘yang makan terakhir’? Inilah yang ingin kuketahui.”
Verse 22
"प्रथम पिण्ड किसे देना चाहिये? दूसरा पिण्ड किसे प्राप्त होता तथा तीसरे पिण्डपर किसका अधिकार माना गया है? यह सब कुछ मैं जानना चाहता हूँ” ।। श्रद्दधानेन दूतेन भाषितं धर्मसंहितम् । पूर्वस्थास्त्रिदशा: सर्वे पितर: पूज्य खेचरम्,उस श्रद्धालु देवदूतके इस प्रकार धर्मयुक्त भाषण करनेपर पूर्वदिशामें स्थित हुए सभी देवताओं और पितरोंने उस आकाशचारी पुरुषकी प्रशंसा करते हुए कहा
“Kepada siapa piṇḍa pertama harus dipersembahkan? Siapa menerima yang kedua, dan hak siapa diakui atas yang ketiga? Semua ini ingin kuketahui.” Setelah utusan yang penuh श्रद्धा itu mengucapkan kata-kata yang selaras dengan dharma, para dewa dan para Pitṛ yang berada di penjuru timur—layak dipuja—memuji sang pengelana langit itu lalu menjawab.
Verse 23
पितर ऊचुः स्वागत ते<स्तु भद्रे ते श्रूयतां खेचरोत्तम । गूढार्थ: परम: प्रश्नो भवता समुदीरित:,पितर बोले--आकाशचारियोंमें श्रेष्ठ देवदूत! तुम्हारा स्वागत है। तुम कल्याणके भागी होओ। तुमने गूढ़ अभिप्रायसे युक्त बहुत उत्तम प्रश्न उपस्थित किया है। इसका उत्तर सुनो
Para Pitṛ berkata: “Selamat datang bagimu; semoga sejahtera menyertaimu, wahai yang terbaik di antara para pengelana langit. Pertanyaan yang engkau ajukan amat luhur dan sarat makna tersembunyi; dengarkan jawabannya.”
Verse 24
भ्राद्धं दत्त्वा च भुक्त्वा च पुरुषो यः स्त्रियं ब्रजेत् । पितरस्तस्य तं॑ मासं तस्मिन् रेतसि शेरते,जो पुरुष श्राद्धका दान और भोजन करके स्त्रीके साथ समागम करता है, उसके पितर उस महीनेभर उसी वीर्यमें शयन करते हैं
Jika seorang lelaki, setelah mempersembahkan śrāddha dan sesudah menyantapnya, mendatangi seorang perempuan (untuk bersetubuh), maka para Pitṛ-nya dikatakan berbaring sepanjang bulan itu di dalam semen yang sama.
Verse 25
प्रविभागं तु पिण्डानां प्रवक्ष्याम्यनुपूर्वश: । पिण्डो हाथस्ताद् गच्छंस्तु अप आविश्य भावयेत्,अब मैं पिण्डोंका क्रमश: विभाग बताऊँगा। श्राद्धमें जो तीन पिण्डोंका विधान है, उनमें पहला पिण्ड जलमें डाल देना चाहिये। मध्यम पिण्ड केवल श्राद्धकर्ताकी पत्नीको भोजन करना चाहिये और उनमें जो तीसरा पिण्ड है, उसे आगमें डाल देना चाहिये
Bhīṣma berkata: “Kini akan kujelaskan, menurut urutannya, pembagian piṇḍa (bola nasi persembahan) yang semestinya. Dalam upacara śrāddha yang menetapkan tiga piṇḍa, piṇḍa pertama harus diserahkan kepada air; piṇḍa yang di tengah hanya boleh dimakan oleh istri pelaksana; dan piṇḍa ketiga harus dipersembahkan ke dalam api.”
Verse 26
पिण्डं तु मध्यमं तत्र पत्नी त्वेका समश्षुते । पिण्डस्तृतीयो यस्तेषां तै दद्याज्जातवेदसि,अब मैं पिण्डोंका क्रमश: विभाग बताऊँगा। श्राद्धमें जो तीन पिण्डोंका विधान है, उनमें पहला पिण्ड जलमें डाल देना चाहिये। मध्यम पिण्ड केवल श्राद्धकर्ताकी पत्नीको भोजन करना चाहिये और उनमें जो तीसरा पिण्ड है, उसे आगमें डाल देना चाहिये
Bhīṣma berkata: “Di sana, piṇḍa yang di tengah hanya istri yang boleh memakannya. Dan piṇḍa yang ketiga dari persembahan itu hendaknya diserahkan kepada Jātavedas, yakni api suci.”
Verse 27
एष श्राद्धविधि: प्रोक्तो यथा धर्मो न लुप्यते । पितरस्तस्य तुष्यन्ति प्रहष्टटनस: सदा
Bhīṣma berkata: “Demikianlah tata cara śrāddha dinyatakan, agar dharma tidak berkurang atau lenyap. Para Pitṛ (leluhur) senantiasa berkenan kepada orang yang melaksanakannya, dengan hati yang gembira.”
Verse 28
देवदूत उवाच आनुपूर्व्येण पिण्डानां प्रविभाग: पृथक् पृथक्
Utusan ilahi berkata: “Bagian-bagian piṇḍa dibagikan secara terpisah, masing-masing menurut urutannya yang tepat.”
Verse 29
एक: समुद्धृतः पिण्डो हाधस्तात् कस्य गच्छति
Utusan ilahi berkata: “Satu piṇḍa telah diangkat—aduh, kepada siapakah ia jatuh di bawah?”
Verse 30
मध्यमं तु तदा पत्नी भुद्धक्तेडनुज्ञातमेव हि
Maka, istri yang berkedudukan menengah pun benar-benar diberi izin setelah persetujuan yang semestinya—agar yang patut dapat berlangsung menurut tatanan dan kerelaan yang telah ditetapkan.
Verse 31
अत्र यस्त्वन्तिम: पिण्डो गच्छते जातवेदसम्
Di sini, piṇḍa yang terakhir disampaikan kepada Jātavedas—Agni; dengan itu upacara terakhir menjadi sempurna, dan arwah diserahkan ke dalam tatanan dharma.
Verse 32
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं पिण्डेषु त्रिषु या गति:
Aku ingin mendengar ini: bagaimana nasib yang menimpa dalam tiga macam piṇḍa?
Verse 33
पितर ऊचु. सुमहानेष प्रश्नो वै यस्त्वया समुदीरित:,पितरोंने कहा--आकाशचारी देवदूत! तुमने यह महान प्रश्न उपस्थित किया है और हमलोगोंसे अद्भुत रहस्यकी बात पूछी है। देवता और मुनि भी इस पितृकर्मकी प्रशंसा करते हैं
Para Pitṛ berkata: “Wahai utusan ilahi yang mengembara di angkasa, pertanyaan yang kau ajukan sungguh amat besar. Engkau menanyakan kepada kami suatu rahasia yang menakjubkan dan halus. Bahkan para dewa dan para resi memuji pitṛ-karman ini.”
Verse 34
रहस्यमद्भुतं चापि पृष्टा: सम गगनेचर । एतदेव प्रशंसन्ति देवाश्न मुन॒यस्तथा,पितरोंने कहा--आकाशचारी देवदूत! तुमने यह महान प्रश्न उपस्थित किया है और हमलोगोंसे अद्भुत रहस्यकी बात पूछी है। देवता और मुनि भी इस पितृकर्मकी प्रशंसा करते हैं
Wahai pengembara angkasa, kepada kami telah ditanyakan perkara yang menakjubkan lagi rahasia; ajaran inilah yang dipuji oleh para dewa dan para resi pula.
Verse 35
तेडप्येवं नाभिजानन्ति पितृकार्यविनिश्चयम् । वर्जयित्वा महात्मानं चिरजीविनमुत्तमम्
Bahkan mereka pun, dengan cara demikian, tidak sungguh memahami penetapan yang tepat tentang kewajiban bagi para Pitṛ (leluhur)—kecuali Sang Mahātman yang tertinggi, yang utama dan panjang umur; hanya dialah yang tak boleh dikecualikan dari pemahaman ini.
Verse 36
त्रयाणामपि पिण्डानां श्रुत्वा भगवतो गतिम्,उन्होंने भगवान् विष्णुसे तीनों पिण्डोंकी गति सुनकर श्राद्धका रहस्य जान लिया है। देवदूत! तुमने जो श्राद्धविधिका निर्णय पूछा है, उसके अनुसार तीनों पिण्डोंकी गति बतायी जा रही है। सावधान होकर मुझसे सुनो
Setelah mendengar dari Bhagavān Viṣṇu tentang perjalanan yang ditetapkan bagi ketiga piṇḍa, ia memahami rahasia batin upacara śrāddha. “Wahai utusan para dewa, karena engkau meminta penetapan yang jelas tentang tata cara śrāddha, kini akan dijelaskan hasil masing-masing dari tiga piṇḍa itu. Dengarkan aku dengan saksama.”
Verse 37
देवदूतेन यः पृष्ट: श्राद्धस्य विधिनिश्चय: । गतिं त्रयाणां पिण्डानां शृणुष्वावहितो मम,उन्होंने भगवान् विष्णुसे तीनों पिण्डोंकी गति सुनकर श्राद्धका रहस्य जान लिया है। देवदूत! तुमने जो श्राद्धविधिका निर्णय पूछा है, उसके अनुसार तीनों पिण्डोंकी गति बतायी जा रही है। सावधान होकर मुझसे सुनो
Sang utusan para dewa berkata: “Engkau telah menanyakan kepadaku penetapan aturan yang tepat mengenai tata cara śrāddha. Maka sekarang, dengarkan dengan saksama ketika kujelaskan perjalanan ketiga persembahan piṇḍa itu.”
Verse 38
अपो गच्छति यो ह्वात्र शशिनं होष प्रीणयेत् । शशी प्रीणयते देवान् पितृश्चैव महामते
Sang utusan para dewa berkata: “Wahai orang bijaksana, siapa pun di sini yang mempersembahkan air dan dengan itu menyenangkan Śaśin (Bulan)—ketahuilah—ia pun menyenangkan para dewa dan para Pitṛ.”
Verse 39
महामते! इस श्राद्धमें जो पहला पिण्ड पानीके भीतर चला जाता है, वह चन्द्रमाको तृप्त करता है और चन्द्रमा स्वयं देवता तथा पितरोंको तृप्त करते हैं ।। भुडक्ते तु पत्नी यं चैषामनुज्ञाता तु मध्यमम् । पुत्रकामाय पुत्र तु प्रयच्छन्ति पितामहा:,इसी प्रकार श्राद्धकर्ताकी पत्नी गुरुजनोंकी आज्ञासे जो मध्यम पिण्डका भक्षण करती है, उससे प्रसन्न हुए पितामह पुत्रकी कामनावाले पुरुषको पुत्र प्रदान करते हैं
Sang utusan para dewa berkata: “Wahai orang bijaksana, dalam śrāddha ini, piṇḍa pertama yang masuk ke dalam air menenteramkan Bulan; dan Bulan pada gilirannya menenteramkan para dewa serta para Pitṛ. Demikian pula, ketika istri pelaksana śrāddha—dengan izin para sesepuh—memakan piṇḍa yang di tengah, para leluhur yang berkenan oleh perbuatan itu menganugerahkan seorang putra kepada pria yang mendambakan keturunan.”
Verse 40
हव्यवाहे तु यः पिण्डो दीयते तन्निबोध मे । पितरस्तेन तृप्यन्ति प्रीता:ः कामान् दिशन्ति च,अग्निमें जो पिण्ड डाला जाता है, उसके विषयमें भी मुझसे समझ लो। उससे पितर तृप्त होते हैं और तृप्त होकर वे मनुष्यकी सब कामनाएँ पूर्ण करते हैं
Sang utusan ilahi berkata: “Pahamilah dariku tentang piṇḍa—persembahan makanan—yang diletakkan ke dalam api. Dengan persembahan itu para Pitṛ (roh leluhur) menjadi puas; dan ketika berkenan, mereka menganugerahkan tujuan-tujuan yang diinginkan seseorang.”
Verse 41
एतत् ते कथित सर्व त्रिषु पिण्डेषु या गति: । ऋत्विग्यो यजमानस्य पितृत्वमनुगच्छति,इस प्रकार तुम्हें यह सब कुछ बताया गया। तीनों पिण्डोंकी जो गति होती है, उसका भी प्रतिपादन किया गया। श्राद्धमें भोजनके लिये निमन्त्रित हुआ ब्राह्मण उस दिनके लिये यजमानके पितृभावको प्राप्त हो जाता है; अत: उस दिन उसके लिये मैथुनको त्याज्य मानते हैं। आकाशचारियोंमें श्रेष्ठ देवदूत! ब्राह्मणको स्नान आदिसे पवित्र होकर सदा श्राद्धमें भोजन करना चाहिये
“Semua ini telah dijelaskan kepadamu, termasuk perjalanan dan hasil yang terkait dengan tiga persembahan piṇḍa. Imam pelaksana (ṛtvij) yang diundang untuk menyantap hidangan śrāddha, pada hari itu mengambil kedudukan sebagai ayah sang yajamāna.”
Verse 42
तस्मिन्नहनि मन्यन्ते परिहार्य हि मैथुनम् । शुचिना तु सदा श्राद्धं भोक्तव्यं खेचरोत्तम,इस प्रकार तुम्हें यह सब कुछ बताया गया। तीनों पिण्डोंकी जो गति होती है, उसका भी प्रतिपादन किया गया। श्राद्धमें भोजनके लिये निमन्त्रित हुआ ब्राह्मण उस दिनके लिये यजमानके पितृभावको प्राप्त हो जाता है; अत: उस दिन उसके लिये मैथुनको त्याज्य मानते हैं। आकाशचारियोंमें श्रेष्ठ देवदूत! ब्राह्मणको स्नान आदिसे पवित्र होकर सदा श्राद्धमें भोजन करना चाहिये
“Karena itu, pada hari tersebut hubungan seksual dipandang harus dihindari. Dan orang yang telah disucikan (dengan mandi dan sebagainya) hendaknya senantiasa menyantap hidangan śrāddha. Wahai yang terbaik di antara para pengembara langit!”
Verse 43
ये मया कथिता दोषास्ते तथा स्युर्न चान्यथा । तस्मात् स्नात:ः शुचि: क्षान्तः श्राद्ध भुञज्जीत वै द्विज:
“Kesalahan-kesalahan yang telah kujelaskan akan terjadi tepat demikian, tidak selainnya. Karena itu, setelah mandi, dalam keadaan suci dan menahan diri, seorang dvija hendaknya menyantap hidangan śrāddha.”
Verse 44
मैंने जो दोष बताये हैं, वे वैसे ही प्राप्त होते हैं। इसमें कोई परिवर्तन नहीं होता; अतः ब्राह्मण स्नान करके पवित्र एवं क्षमाशील हो श्राद्धमें भोजन करे ।। प्रजा विवर्धते चास्य यश्नैवं सम्प्रयच्छति । ततो विद्युत्प्रभो नाम ऋषिराह महातपा:,जो इस प्रकार श्राद्धका दान देता है, उसकी संतति बढ़ती है। पितरोंके इस प्रकार कहनेके बाद विद्युत्प्रभ नामवाले एक महातपस्वी महर्षिने अपना प्रश्न उपस्थित किया
“Bagi orang yang mempersembahkan anugerah śrāddha dengan cara demikian, keturunan bertambah dan kemasyhuran pun dianugerahkan.” Setelah para Pitṛ berkata demikian, resi agung bertapa bernama Vidyutprabha kemudian mengajukan pertanyaannya.
Verse 45
आदित्यतेजसा तस्य तुल्यं रूप॑ प्रकाशते | स च धर्मरहस्यानि श्रुत्वा शक्रमथाब्रवीत्
Oleh sinar Aditya (Surya), wujudnya memancar dengan kemilau yang setara. Setelah mendengar rahasia-rahasia dharma, ia pun kemudian menyapa Śakra (Indra).
Verse 46
उनका रूप सूर्यके समान तेजसे प्रकाशित हो रहा था। उन्होंने धर्मके रहस्योंको सुनकर इन्द्रसे पूछा-- ।। तिर्यग्योनिगतान् सत्त्वान् मर्त्या हिंसन्ति मोहिता: । कीटान् पिपीलिकान् सर्पान् मेषान् समृगपक्षिण:
Manusia yang diliputi kebodohan melakukan kekerasan terhadap makhluk yang lahir dalam rahim non-manusia—membunuh serangga, semut, ular, domba, juga binatang dan burung. Setelah mendengar rahasia halus dharma, aku bertanya kepada Indra: mengapa para fana, dikuasai ketidaktahuan, menyakiti makhluk-makhluk yang rapuh ini?
Verse 47
ततो देवगणा: सर्वे ऋषयश्न॒ तपोधना:
Maka seluruh rombongan para dewa, bersama para resi yang kaya akan harta tapa, pun hadir berkumpul.
Verse 48
पितरश्न महाभागा: पूजयन्ति सम तं मुनिम् । उनका यह प्रश्न सुनकर सम्पूर्ण देवता, तपोधन ऋषि तथा महाभाग पितर विद्युत्प्रभ मुनिकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे ।। ४७ $ ।। शक्र उवाच कुरुक्षेत्र गयां गड़ां प्रभासं पुष्कराणि च
Para Pitṛ yang mulia menghormati resi itu dengan pemujaan. Lalu Śakra berkata: “Kurukṣetra, Gayā, Gaṅgā, Prabhāsa, dan Puṣkara.”
Verse 49
एतानि मनसा ध्यात्वा अवगाहेत् ततो जलम् । तथा मुच्यति पापेन राहुणा चन्द्रमा यथा
Dengan merenungkan semuanya itu dalam batin, hendaklah ia kemudian menyelam ke dalam air; demikian ia terbebas dari dosa—sebagaimana Bulan terbebas dari cengkeraman Rāhu.
Verse 50
इन्द्र बोले--मुने! मनुष्यको चाहिये कि कुरुक्षेत्र, गया, गंगा, प्रभास और पुष्करक्षेत्रका मन-ही-मन चिन्तन करके जलमें स्नान करे। ऐसा करनेसे वह पापसे उसी प्रकार मुक्त हो जाता है, जैसे चन्द्रमा राहुके ग्रहणसे ।। त्र्यहं स्नात: स भवति निराहारक्ष वर्तते | स्पृशते यो गवां पृष्ठ बालर्धि च नमस्यति
Indra bersabda: “Wahai resi, hendaknya seseorang mandi di air sambil dalam batin merenungkan tanah-tanah suci Kurukṣetra, Gayā, Gaṅgā, Prabhāsa, dan Puṣkara. Dengan demikian ia terbebas dari dosa, sebagaimana bulan terlepas dari gerhana Rāhu. Ia menjadi laksana orang yang telah mandi selama tiga hari, hidup tanpa makan; dan siapa menyentuh punggung sapi serta bersujud hormat kepada ekornya, memperoleh pahala yang telah disebutkan.”
Verse 51
जो मनुष्य गायकी पीठ छूता और उसकी पूँछको नमस्कार करता है, वह मानो उपर्युक्त तीर्थोमें तीन दिनतक उपवासपूर्वक रहकर स्नान कर लेता है ।। ततो विद्युत्प्रभो वाक्यम भ्यभाषत वासवम् | अयं सूक्ष्मतरो धर्मस्तं निबोध शतक्रतो
Indra menyatakan: “Seseorang yang menyentuh tempat berbaring/beristirahatnya sapi dan bersujud kepada ekornya memperoleh pahala seakan-akan ia berpuasa tiga hari dan mandi di tirtha-tirtha yang telah disebutkan.” Lalu Vidyutprabha berkata kepada Vāsava (Indra): “Inilah dharma yang lebih halus; pahamilah baik-baik, wahai Śatakratu.”
Verse 52
तदनन्तर विद्युत्प्रभने इन्द्रसे कहा--“शतक्रतो! यह सूक्ष्मतर धर्म मैं बता रहा हूँ। इसे ध्यानपूर्वक सुनिये ।। घृष्टो वटकषायेण अनुलिप्त: प्रियंगुणा । क्षीरेण षष्टिकान् भुक््त्वा सर्वपापै: प्रमुच्यते
Kemudian Vidyutprabha berkata kepada Indra: “Wahai Śatakratu, akan kusampaikan dharma yang lebih halus; dengarkan dengan saksama. Barangsiapa menggosok tubuhnya dengan rebusan kulit beringin, mengoleskan priyaṅgu, lalu menyantap beras ṣaṣṭika bersama susu, ia terbebas dari segala dosa.”
Verse 53
“बरगदकी जटासे अपने शरीरको रगड़े, राईका उबटन लगाये और दूधके साथ साठीके चावलोंकी खीर बनाकर भोजन करे तो मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है ।। श्रूयतां चापरं गुहां रहस्यमृषिचिन्तितम् । श्रुत मे भाषमाणस्य स्थाणो: स्थाने बृहस्पते:
Barangsiapa menggosok tubuhnya dengan jalinan akar gantung beringin, mengoleskan lulur dari biji sesawi, lalu menyantap bubur manis (pāyasa) dari beras ṣaṣṭika dengan susu, ia terbebas dari segala dosa. Dengarkan pula rahasia lain, ajaran esoteris yang direnungkan para resi. Aku mendengarnya dari mulut Bṛhaspati ketika ia berbicara di hadapan Sthāṇu (Śiva).
Verse 54
रुद्रेण सह देवेश तन्निबोध शचीपते । “एक दूसरा गूढ़ रहस्य, जिसका ऋषियोंने चिन्तन किया है, सुनिये। इसे मैंने भगवान् शंकरके स्थानमें भाषण करते हुए बृहस्पतिजीके मुखसे भगवान् रुद्रके साथ ही सुना था। देवेश! शचीपते! उसे ध्यानपूर्वक सुनिये ।। पर्वतारोहणं कृत्वा एकपादो विभावसुम्,“जो पर्वतपर चढ़कर भोजनसे पूर्व एक पैरसे खड़ा हो दोनों भुजाएँ ऊपर उठाये हाथ जोड़े वहाँ अग्निदिवकी ओर देखता है, वह महान् तपस्यासे युक्त होकर उपवास करनेका फल पाता है
Indra bersabda: “Wahai Devendra, wahai Śacīpati, pahamilah ini bersama Rudra. Dengarkan rahasia lain yang dalam, yang direnungkan para resi. Aku mendengarnya dari mulut Bṛhaspati, di tempat Sang Śaṅkara, di hadapan Dewa Rudra. Wahai Devendra, wahai Śacīpati—dengarkan dengan saksama. Barangsiapa mendaki gunung dan sebelum makan berdiri dengan satu kaki, mengangkat kedua lengan, merapatkan telapak tangan dalam sembah, serta memandang ke arah api dan langit—ia, berhias tapa yang agung, memperoleh pahala sebagaimana berpuasa.”
Verse 55
निरीक्षेत निराहार ऊर्ध्वबाहुः कृताज्जलि: । तपसा महता युक्त उपवासफलं लभेत्,“जो पर्वतपर चढ़कर भोजनसे पूर्व एक पैरसे खड़ा हो दोनों भुजाएँ ऊपर उठाये हाथ जोड़े वहाँ अग्निदिवकी ओर देखता है, वह महान् तपस्यासे युक्त होकर उपवास करनेका फल पाता है
Barangsiapa tanpa makan, berdiri dengan kedua lengan terangkat dan tangan terkatup dalam sembah, serta meneguhkan pandangan dalam ketekunan—ia, berbekal tapa yang agung, memperoleh pahala upavāsa (puasa).
Verse 56
रश्मिभिस्तापितो<र्कस्य सर्वपापमपोहति । ग्रीष्मकाले5थ वा शीते एवं पापमपोहति,'जो ग्रीष्म अथवा शीतकालमें सूर्यकी किरणोंसे तापित होता है, वह अपने सारे पापोंको नाश कर देता है। इस प्रकार मनुष्य पापमुक्त हो जाता है। पापसे मुक्त हुए पुरुषको सनातन कान्ति प्राप्त होती है। वह अपने तेजसे सूर्यके समान देदीप्यमान और चन्द्रमाके समान प्रकाशित होता है”
Siapa yang menghangatkan diri oleh sinar Matahari, menyingkirkan segala dosa. Baik pada musim panas maupun musim dingin—demikianlah dosa tersapu.
Verse 57
ततः पापात् प्रमुक्तस्य द्युतिर्भवति शाश्वती । तेजसा सूर्यवद् दीप्तो भ्राजते सोमवत् पुन:,'जो ग्रीष्म अथवा शीतकालमें सूर्यकी किरणोंसे तापित होता है, वह अपने सारे पापोंको नाश कर देता है। इस प्रकार मनुष्य पापमुक्त हो जाता है। पापसे मुक्त हुए पुरुषको सनातन कान्ति प्राप्त होती है। वह अपने तेजसे सूर्यके समान देदीप्यमान और चन्द्रमाके समान प्रकाशित होता है”
Kemudian, bagi dia yang telah terbebas dari dosa, muncullah sinar yang abadi. Dengan tejasnya ia menyala laksana Matahari, dan kembali bersinar laksana Bulan.
Verse 58
मध्ये त्रिदशवर्गस्य देवराज: शतक्रतुः । उवाच मधुरं वाक्यं बृहस्पतिमनुत्तमम्
Di tengah perhimpunan para dewa, Śakra—Indra, raja para deva yang masyhur karena seratus yajña—berbicara dengan kata-kata lembut nan manis kepada Bṛhaspati yang tiada tara.
Verse 59
तत्पश्चात् देवराज शतक्रतु इन्द्रने देवमण्डलीके बीचमें अपने सर्वश्रेष्ठ गुरु बृहस्पतिजीसे मधुर वाणीमें कहा-- ।। धर्मगुहां तु भगवन् मानुषाणां सुखावहम् । सरहस्याश्न ये दोषास्तान् यथावदुदीरय,'भगवन्! मनुष्योंको सुख देनेवाले धर्मके गूढ़-स्वरूपका तथा रहस्योंसहित जो दोष हैं, उनका भी यथावत््रूपसे वर्णन कीजिये”
Wahai Bhagavan, jelaskanlah dengan tertib guha terdalam dharma yang membawa kebahagiaan bagi manusia, dan juga cela-cela yang muncul beserta rahasia-rahasianya.
Verse 60
ब॒हस्पतिर्वाच प्रतिमेहन्ति ये सूर्यमनिलं द्विषते च ये । हव्यवाहे प्रदीप्ते च समिधं ये न जुह्नति
Bṛhaspati bersabda: Mereka yang memukul arca, yang mencela Surya dan Dewa Angin, dan yang—meski api kurban (Havyavāha) menyala—tidak mempersembahkan kayu samidhā; orang-orang demikian bersikap memusuhi tatanan dharma yang suci.
Verse 61
बालवसत्सां च ये धेनुं दुहन्ति क्षीरकारणात् । तेषां दोषान् प्रवक्ष्यामि तान् निबोध शचीपते
Śakra bersabda: Mereka yang memerah sapi yang masih memiliki anak lembu yang kecil, semata-mata demi memperoleh susu—kesalahan mereka akan kujelaskan. Dengarkanlah dengan saksama, wahai Śacīpati.
Verse 62
बृहस्पतिजीने कहा--शचीपते! जो सूर्यकी ओर मुँह करके मूत्र त्याग करते हैं, वायुदेवसे द्वेष रखते हैं अर्थात् वायुके सम्मुख मूत्र त्याग करते हैं, जो प्रज्वलित अम्निमें समिधाकी आहुति नहीं देते तथा जो दूधके लोभसे बहुत छोटे बछड़ेवाली धेनुको भी दुह लेते हैं, उन सबके दोषोंका वर्णन करता हूँ। ध्यानपूर्वक सुनो ।। भानुमाननिलश्चैव हव्यवाहश्न वासव । लोकानां मातरश्नैव गाव: सृष्टा: स्वयम्भुवा,वासव! साक्षात् ब्रह्माजीने सूर्य, वायु, अग्नि तथा लोकमाता गौओंकी सृष्टि की है
Śakra (Indra) bersabda: “Wahai Śacīpati! Mereka yang buang air kecil menghadap Surya, yang memusuhi Dewa Angin—yakni melakukannya berhadapan dengan hembusan Vāyu—yang tidak mempersembahkan samidhā ke dalam api kurban (Havyavāha) yang sedang menyala, dan yang karena loba akan susu memerah sapi meski anak lembunya masih sangat kecil; atas semua itu akan kuuraikan kesalahannya. Dengarkanlah dengan saksama. Wahai Vāsava! Surya, Vāyu, api Havyavāha, dan para sapi—ibu bagi dunia—semuanya diciptakan oleh Svayambhū Brahmā.”
Verse 63
लोकांस्तारयितुं शक्ता मर्त्येंष्वेतेषु देवता: । सर्वे भवन्त: शृण्वन्तु एकैकं धर्मनिश्चयम्,ये मर्त्यलोकके देवता हैं तथा सम्पूर्ण जगत्का उद्धार करनेकी शक्ति रखते हैं। आप सब लोग सुनें, मैं एक-एक धर्मका निश्चय बता रहा हूँ
Para dewa ini, meski berada di alam manusia, sanggup menyelamatkan segenap dunia. Dengarkanlah kalian semua; akan kujelaskan penetapan dharma satu demi satu.
Verse 64
वर्षाणि षडशीतिं तु दुर्वत्ता: कुलपांसना: । स्त्रिय: सर्वा्न दुर्वत्ता: प्रतिमेहन्ति या रविम्
Śakra bersabda: Selama delapan puluh enam tahun, para perempuan itu—berkelakuan jahat, noda bagi garis keturunannya—semuanya hidup dalam kebejatan; bahkan mereka melakukan penghinaan dengan buang air kecil menghadap Surya.
Verse 65
हव्यवाहस्य दीप्तस्य समिध॑ ये न जुह्नति
Śakra berkata: “Mereka yang, meski api kurban—Havyavāha (Agni)—menyala terang, tidak mempersembahkan kayu bakar suci ke dalamnya—”
Verse 66
क्षीर॑ तु बालवत्सानां ये पिबन्तीह मानवा:,जो मानव छोटे बछड़ेवाली गौओंके दूध दुहकर पी जाते हैं, उनके वंशमें दूध पीनेवाले और कुलकी वृद्धि करनेवाले कोई बालक नहीं उत्पन्न होते हैं। उनकी संतान नष्ट हो जाती है तथा उनके कुल एवं वंशका क्षय हो जाता है
Śakra berkata: “Orang-orang di dunia ini yang meminum susu dengan memerah sapi yang masih memiliki anak lembu yang sangat muda—”
Verse 67
न तेषां क्षीरपा: केचिज्जायन्ते कुलवर्धना: । प्रजाक्षयेण युज्यन्ते कुलवंशक्षयेण च,जो मानव छोटे बछड़ेवाली गौओंके दूध दुहकर पी जाते हैं, उनके वंशमें दूध पीनेवाले और कुलकी वृद्धि करनेवाले कोई बालक नहीं उत्पन्न होते हैं। उनकी संतान नष्ट हो जाती है तथा उनके कुल एवं वंशका क्षय हो जाता है
Tidak ada seorang pun dari keturunan mereka yang lahir sebagai ‘peminum susu’—anak yang sehat dan menjadi penambah kemuliaan keluarga. Mereka tertimpa musnahnya keturunan, dan klan serta garis nasab pun merosot.
Verse 68
एवमेतत् पुरा दृष्टं कुलवृद्धैर्द्धिजातिभि: । तस्माद् वर्ज्यानि वर्ज्यानि कार्य कार्य च नित्यश:
Demikianlah hal itu dahulu disaksikan oleh para sesepuh dari garis mulia di antara kaum dwija. Maka, yang patut dihindari hendaklah dihindari, dan yang wajib dilakukan hendaklah dilakukan—senantiasa.
Verse 69
ततः सर्वा महाभाग देवता: समरुद्गणा:
Kemudian semua dewa yang mulia—bersama rombongan Marut—berkumpul.
Verse 70
पितर: केन तुष्यन्ति मर्त्यानामल्पचेतसाम्
Śakra bertanya: “Dengan cara apakah para Pitṛ (roh leluhur) menjadi puas, terutama pada manusia yang pemahamannya terbatas?”
Verse 71
अक्षयं च कथं दानं भवेच्चैवोर्ध्वदेहिकम् । आनृण्यं वा कथं मर्त्या गच्छेयु: केन कर्मणा
Śakra berkata: “Bagaimana suatu pemberian dapat menjadi tak binasa, dan bagaimana ia berbuah bagi seseorang setelah kematian? Dan dengan tindakan apakah manusia dapat mencapai kebebasan dari utang (pembebasan dari yang terutang kepada leluhur)?”
Verse 72
एतदिच्छामहे श्रोतुं परं कौतूहलं हि न: । “मनुष्योंकी बुद्धि थोड़ी होती है; अतः वे कौन-सा कर्म करें, जिससे आप सम्पूर्ण पितर उनके ऊपर संतुष्ट होंगे? श्राद्धमें दिया हुआ दान किस प्रकार अक्षय हो सकता है? अथवा मनुष्य किस कर्मसे किस प्रकार पितरोंके ऋणसे छुटकारा पा सकते हैं? हम यह सुनना चाहते हैं। यह सब सुननेके लिये हमारे मनमें बड़ी उत्कण्ठा है” || ७०-७१ $ ।। पितर ऊचु. न्यायतो वै महाभागा: संशय: समुदाह्ृत:
Śakra berkata: “Kami ingin mendengarnya; rasa ingin tahu kami sangat besar. Pemahaman manusia terbatas; maka tindakan apa yang harus mereka lakukan agar semua Pitṛ menjadi puas kepada mereka? Bagaimana pemberian dalam śrāddha menjadi tak binasa? Atau dengan perbuatan apa, dan dengan cara bagaimana, manusia dapat dilepaskan dari utang kepada leluhur? Kami ingin mendengar semuanya; batin kami sangat rindu mengetahui.” Para Pitṛ menjawab: “Pertanyaanmu, wahai yang beruntung, telah diajukan dengan tepat dan sesuai dharma.”
Verse 73
' नीलषण्डप्रमोक्षेण अमावास्यां तिलोदकै:ः
“Dengan melepaskan nīlaṣaṇḍa (lembu jantan berwarna biru/gelap) dan pada hari Amāvāsyā mempersembahkan tarpaṇa berupa air bercampur wijen…”
Verse 74
वर्षासु दीपकैश्वैव 3438 36 णामनृणो भवेत् | नीले रंगके साँड़ छोड़नेसे, अमावास्याको तिलमिश्रित जलद्दारा तर्पण करनेसे और वर्षा-ऋतुमें पितरोंके लिये दीप देनेसे मनुष्य उनके ऋणसे मुक्त हो सकता है ।। अक्षयं निर्व्पलीकं॑ च दानमेतन्महाफलम्
“Dengan mempersembahkan pelita bagi para Pitṛ pada musim hujan, seseorang menjadi bebas dari utang kepada leluhur. Pemberian ini tak binasa pahalanya, tulus tanpa tipu daya, dan berbuah besar.”
Verse 75
अस्माकं परितोषश्न अक्षय: परिकीरत्त्यते | इस तरह निष्कपट भावसे किया हुआ दान अक्षय एवं महान् फलदायक होता है और उससे हमें भी अक्षय संतोष प्राप्त होता है--ऐसा शास्त्रका कथन है ।। श्रद्दधानाश्ष ये मर्त्या आहरिष्यन्ति संततिम्
Śakra berkata: “Dinyatakan bahwa kepuasan kami pun tak berkesudahan. Karena itu, dana yang diberikan dengan hati jernih tanpa tipu daya menjadi tak binasa dan berbuah besar; olehnya kami pun memperoleh ketenteraman yang tiada akhir—demikian ajaran śāstra. Dan manusia fana yang memberi dengan śraddhā akan memperoleh garis keturunan yang lestari.”
Verse 76
दुर्गात् ते तारयिष्यन्ति नरकात् प्रपितामहान् । जो मनुष्य पितरोंमें श्रद्धा रखकर संतान उत्पन्न करेंगे, वे अपने प्रपितामहोंका दुर्गम नरकसे उद्धार कर देंगे ।। पितृणां भाषितं श्रुत्वा हृष्टरोेमा तपोधन:
Śakra berkata: “Mereka akan menyeberangkan para buyutmu dari bahaya dan dari neraka. Orang-orang yang, dengan śraddhā kepada para Pitṛ, memperanakkan keturunan, akan menyelamatkan para buyut mereka dari neraka yang sukar dilampaui.” Mendengar sabda tentang para Pitṛ itu, sang pertapa yang kaya tapa pun merinding, bulu kuduknya berdiri.
Verse 77
के गुणा नीलषण्डस्य प्रमुक्तस्य तपोधना:
Śakra berkata: “Wahai engkau yang kaya tapa, kebajikan apakah yang dimiliki Nīlaṣaṇḍa, kini setelah ia dibebaskan?”
Verse 78
पितर ऊचु. नीलषण्डस्य लाडूगूलं तोयमभ्युद्धरेद् यदि
Para Pitṛ berkata: “Jika seseorang menarik ke atas (mengangkat) air dari ‘lāḍūgūla’ milik Nīlaṣaṇḍa…”
Verse 79
षष्टिं वर्षमहस्राणि पितरस्तेन तर्पिता: । पितरोंने कहा--मुने! छोड़े हुए नीले रंगके साँड़की पूँछ यदि नदी आदिके जलमें भीगकर उस जलको ऊपर उछालती है तो जिसने उस साँड़को छोड़ा है उसके पितर साठ हजार वर्षोतक उस जलसे तृप्त रहते हैं ।। यस्तु शूज्जगतं पड़कं॑ कूलादुद्धृत्य तिष्ठतति
Para Pitṛ berkata: “Selama enam puluh ribu tahun para Pitṛ dipuaskan oleh perbuatan itu. Dan siapa pun yang menolong makhluk yang ditelantarkan, terjerumus dalam bahaya di tepi sungai, lalu menjaganya tetap selamat—pahala perlindungan penuh welas asih itu menjadi persembahan bagi leluhurnya, laksana piṇḍa dan air tarpaṇa, yang mengenyangkan mereka untuk masa yang amat panjang.”
Verse 80
वर्षासु दीपदानेन शशिवच्छो भते नर:
Dengan mempersembahkan pelita pada musim hujan, seseorang bersinar laksana bulan—menjadi sumber cahaya dan penuntun yang tampak di tengah gelap dan kesukaran.
Verse 81
अमावास्यां तु ये मर्त्या: प्रयच्छन्ति तिलोदकम्,तपोधन! जो मनुष्य अमावास्याके दिन ताँबेके पात्रमें मधु एवं तिलसे मिश्रित जल लेकर उसके द्वारा पितरोंका तर्पण करते हैं, उनके द्वारा रहस्यसहित श्राद्धकर्म यथार्थरूपसे सम्पादित हो जाता है
Śakra bersabda: “Wahai pertapa yang kaya tapa! Mereka yang pada hari bulan baru mempersembahkan air bercampur wijen—dalam bejana tembaga, dicampur madu dan wijen, lalu dipersembahkan sebagai tarpaṇa bagi para Pitṛ—maka upacara śrāddha mereka terlaksana dengan benar, lengkap dengan tata laku sucinya.”
Verse 82
पात्रमौदुम्बरं गृह मधुमिश्र॑ तपोधन । कृतं भवति तै: श्राद्धं सरहस्यं यथार्थवत्,तपोधन! जो मनुष्य अमावास्याके दिन ताँबेके पात्रमें मधु एवं तिलसे मिश्रित जल लेकर उसके द्वारा पितरोंका तर्पण करते हैं, उनके द्वारा रहस्यसहित श्राद्धकर्म यथार्थरूपसे सम्पादित हो जाता है
Wahai tapodhana! Dengan mengambil bejana dari kayu udumbara dan memakai air wijen yang bercampur madu untuk tarpaṇa bagi para Pitṛ, maka śrāddha itu terlaksana dengan benar, lengkap dengan rahasya (tata laku batin)nya.
Verse 83
हृष्टपुष्टमनास्तेषां प्रजा भवति नित्यदा । कुलवंशस्य वृद्धिस्तु पिण्डदस्य फलं भवेत् । श्रद्दधानस्तु यः कुर्यात् पितृणामनृणो भवेत्,उनकी प्रजा सदा हृष्ट-पुष्ट मनवाली होती है। कुल और वंश-परम्पराकी वृद्धि श्राद्धका फल है। पिण्डदान करनेवालेको यह फल सुलभ होता है। जो श्रद्धापूर्वक पितरोंका श्राद्ध करता है, वह उनके ऋणसे छुटकारा पा जाता है
Śakra bersabda: “Bagi mereka yang menunaikan upacara leluhur itu, rakyat dan keturunannya senantiasa gembira, sehat, dan tenteram. Bertambah dan lestarinya keluarga serta garis keturunan adalah buah śrāddha; buah ini mudah diraih oleh pemberi piṇḍa. Dan siapa yang melaksanakan śrāddha bagi para Pitṛ dengan penuh śraddhā, terbebaslah ia dari hutang kepada mereka.”
Verse 84
एवमेव समुद्दिष्ट: श्राद्धकालक्रमस्तथा । विधि: पात्र फलं चैव यथावदनुकीर्तितम्
Śakra bersabda: “Demikianlah telah ditetapkan urutan waktu pelaksanaan śrāddha; dan tata cara, penerima yang layak, serta buahnya pun telah diuraikan dengan semestinya.”
Verse 124
इस प्रकार श्रीमह्याभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें दुर्बल और पाण्डुवर्णके राक्षमका आख्यानविषयक एक सौ चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
Demikianlah berakhir bab ke-124 dalam Anuśāsana Parva dari Mahābhārata yang suci, di bagian Dāna-dharma (dharma pemberian), yang mengisahkan rākṣasa yang lemah dan berkulit pucat.
Verse 125
इस प्रकार यह श्राद्धके काल, क्रम, विधि, पात्र और फलका यथावतरूपसे वर्णन किया गया है ।। इति श्रीमहा भारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि पितृरहस्यं नाम पज्चविंशत्यधिकशततमो<ध्याय:
Śakra berkata: “Demikianlah telah diuraikan dengan semestinya tentang śrāddha—waktu yang tepat, urutannya, tata caranya, penerima yang layak, serta buah yang diberikannya.” Dengan ini, dalam Mahābhārata yang suci, pada Anuśāsana Parva, di bagian Dāna-dharma, berakhirlah bab bernama “Rahasia Para Leluhur”, bab ke-125.
Verse 276
प्रजा विवर्धते चास्य अक्षयं चोपतिष्ठति । यही श्राद्धकी विधि बतायी गयी है, जिसके अनुसार चलनेपर धर्मका लोप नहीं होता। जो इस धर्मका पालन करता है, उसके पितर सदा प्रसन्नचित्त एवं संतुष्ट रहते हैं। उसकी संतति बढ़ती है और कभी क्षीण नहीं होती
Bhīṣma berkata: Dengan mengikuti tata śrāddha yang ditetapkan ini, keturunan seseorang berkembang dan kemakmuran yang tak berkurang senantiasa menyertainya. Ketaatan demikian mencegah merosotnya dharma; para leluhur selalu berkenan dan puas, dan garis keturunannya bertambah tanpa susut.
Verse 286
पितृणां त्रिषु सर्वेषां निरुक्त कथितं त्वया । देवदूतने पूछा--पितृगण! आपलोगोंने क्रमश: पिण्डोंका विभाग बतलाया और तीनों लोकोंमें जो समस्त पितर हैं, उनको पिण्डदान करनेका शास्त्रोक्त प्रकार भी बतला दिया
Utusan ilahi berkata: “Kalian telah menjelaskan dengan terang ketentuan yang ditetapkan mengenai semua Pitṛ di tiga dunia.” Dalam rangkaian ajaran itu, ia mengakui bahwa pembagian piṇḍa secara berurutan serta tata piṇḍa-dāna menurut śāstra telah diterangkan.
Verse 296
कं वा प्रीणयते देव॑ कथं तारयते पितृन् | किंतु पहले पिण्डको उठाकर जो नीचे जलमें डाल देनेकी बात कही गयी है, उसके अनुसार यदि वह जलमें डाला जाय तो वह किसको प्राप्त होता है? किस देवताको तृप्त करता है? और किस प्रकार पितरोंको तारता है?
Utusan ilahi bertanya: “Wahai dewa, persembahan ini sesungguhnya memuaskan siapa, dan bagaimana ia menyeberangkan para leluhur? Tadi dikatakan bahwa piṇḍa diangkat lalu dijatuhkan ke dalam air; bila ia dilemparkan ke air sebagaimana diajarkan, kepada siapa ia sampai, dewa mana yang dipuaskan, dan dengan cara apa para Pitṛ diselamatkan?”
Verse 306
किमर्थ पितरस्तस्य कव्यमेव च भुड्जते । इसी प्रकार यदि गुरुजनोंकी आज्ञाके अनुसार मध्यम पिण्ड पत्नी ही खाती है तो उसके पितर किस प्रकार उस पिण्डका उपभोग करते हैं?
Utusan ilahi berkata: “Mengapa para Pitṛ (leluhur) orang itu hanya menyantap persembahan śrāddha (kavya) saja? Dan demikian pula, bila—menurut perintah para sesepuh—piṇḍa yang di tengah dimakan oleh sang istri sendiri, dengan cara bagaimana para leluhurnya memperoleh kenikmatan dari piṇḍa itu?”
Verse 313
भवते का गतिस्तस्य क॑ वा समनुगच्छति । तथा अन्तिम पिण्ड जब अग्निमें डाल दिया जाता है, तब उसकी क्या गति होती है? वह किस देवताको प्राप्त होता है?
Utusan ilahi bertanya: “Ketika piṇḍa terakhir dilemparkan ke dalam api, bagaimana nasibnya? Siapa yang menyertainya? Dan kepada dewa manakah ia kemudian mencapai?”
Verse 326
फल वृत्तिं च मार्ग च यश्चैनं प्रतिपद्यते । यह सब मैं सुनना चाहता हूँ। तीनों पिण्डोंकी जो गति होती है, उसका जो फल, वृत्ति और मार्ग है तथा जो देवता उस पिण्डको पाता है, उन सबपर प्रकाश डालिये
Utusan ilahi berkata: “Aku ingin mendengar semuanya— bagaimana gati (kelanjutan nasib) dari tiga piṇḍa itu, apa buahnya, bagaimana tata-cara/ketentuannya (vṛtti), dan jalan yang ditempuh; serta siapa yang memperoleh piṇḍa itu, dewa mana yang menjadi penerimanya— jelaskanlah dengan terang.”
Verse 356
पितृभक्तस्तु यो विप्रो वरलब्धो महायशा: । परन्तु वे भी इस प्रकार पितृकार्यके रहस्यको निश्चित रूपसे नहीं जानते हैं। जो पिताके भक्त हैं और जिन महायशस्वी ब्राह्मणको वर प्राप्त हुआ है, उन सर्वश्रेष्ठ चिरजीवी महात्मा मार्कण्डेयको छोड़कर और किसीको उसका पता नहीं है
Bahkan para brāhmaṇa yang berbakti kepada para Pitṛ, yang telah memperoleh anugerah dan termasyhur, tidak mengetahui dengan pasti rahasia pitr̥kārya (tata-ritus bagi leluhur). Selain Mahātmā Mārkaṇḍeya, sang ciranjīvi yang paling utama, tiada seorang pun memahami hakikatnya.
Verse 466
किल्बिषं सुबह प्राप्ता: किंस्विदेषां प्रतिक्रिया । “देवराज! मनुष्य मोहवश जो तिर्यग्योनिमें पड़े हुए प्राणियों, मृग, पक्षी और भेड़ आदिको तथा कीड़ों, चींटे-चींटियों एवं सर्पोंकी हिंसा करते हैं, इससे वे बहुत-सा पाप बटोर लेते हैं। उनके लिये इन पापोंसे छूटनेका क्या उपाय है?”
Utusan ilahi berkata: “Mereka telah menanggung dosa besar—apakah penebusannya (prāyaścitta) bagi mereka? Wahai Raja para dewa! Manusia karena delusi menyakiti makhluk yang lahir dalam tiriyaṅ-yoni—binatang liar, burung, domba dan sejenisnya—juga cacing, semut, dan ular; dengan itu mereka menimbun banyak dosa. Dengan cara apa mereka dapat dibebaskan dari dosa-dosa itu?”
Verse 643
अनिलद्ठेषिण: शक्र गर्भस्था च्यवते प्रजा । इन्द्र! जो दुराचारी और कुलांगार पुरुष तथा जो समस्त दुराचारिणी स्त्रियाँ सूर्यकी ओर मुँह करके पेशाब करती हैं और जो लोग वायुसे द्वेष रखते अर्थात् वायुके सम्मुख मूत्रत्याग करते हैं उन सबकी छियासी वर्षोतक गर्भमें आयी हुई संतान गिर जाती है
Śakra berkata: “Wahai Indra! Mereka yang membenci angin menyebabkan janin yang telah berada di dalam kandungan gugur. Para lelaki berkelakuan bejat yang mencemarkan garis keturunan, dan para perempuan yang sepenuhnya bejat yang buang air kecil menghadap matahari, serta orang-orang yang menghina angin dengan buang air melawannya—semua itu, dikatakan, mengalami gugurnya anak yang telah masuk ke rahim, bahkan setelah masa yang panjang.”
Verse 653
अग्निकार्येषु वै तेषां हव्यं नाश्नाति पावक: । जो प्रज्वलित यज्ञाग्निमें समिधाकी आहुति नहीं देते, उनके अग्निहोत्रमें अग्निदेव हविष्य ग्रहण नहीं करते हैं (अतः अग्नि प्रज्वलित किये बिना उसे आहुति नहीं देनी चाहिये)
Śakra berkata: “Bagi mereka yang mengabaikan kewajiban-kewajiban terkait api suci, Pāvaka (Agni) tidak menerima persembahan mereka. Mereka yang tidak mempersembahkan samidhā (kayu bakar suci) ke dalam api yajña yang telah menyala, dalam agnihotra mereka Agni tidak menerima havis; karena itu, api harus dinyalakan dengan semestinya barulah persembahan diberikan.”
Verse 683
भूतिकामेन मर्त्येन सत्यमेतद् ब्रवीमि ते । इस प्रकार उत्तम कुलमें उत्पन्न हुए ब्राह्मणोंने पूर्वकालमें यह प्रत्यक्ष देखा और अनुभव किया है; अत: अपना कल्याण चाहनेवाले मनुष्योंको शास्त्रमें जिन्हें त्याज्य बतलाया है, उन कर्मोको त्याग देना चाहिये और जो कर्तव्य कर्म है, उसका सदा अनुष्ठान करते रहना चाहिये। यह मैं तुम्हें सच्ची बात बता रहा हूँ
Śakra berkata: “Kepada manusia fana yang menginginkan kemakmuran dan kesejahteraan, kukatakan ini sebagai kebenaran. Pada masa lampau, para Brahmana yang lahir dari garis keturunan mulia telah melihatnya secara langsung dan membuktikannya lewat pengalaman. Karena itu, siapa yang menghendaki kebaikannya sendiri hendaknya meninggalkan perbuatan yang dinyatakan śāstra sebagai patut ditinggalkan, dan senantiasa melaksanakan kewajiban yang diperintahkan. Inilah nasihat benar yang kuberikan kepadamu.”
Verse 693
ऋषयश्च महाभागा: पृच्छन्ति सम पितृंस्ततः । तब मरुदगणोंसहित सम्पूर्ण महाभाग देवता और परम सौभाग्यशाली ऋषियोंने पितरोंसे पूछा--
Kemudian, bersama rombongan para Marut, para dewa yang amat mulia serta para resi yang sangat berbahagia itu menanyai para Pitṛ (leluhur).
Verse 723
श्रूयतां येन तुष्यामो मर्त्याना साधुकर्मणाम् । पितरोंने कहा--महाभाग देवताओ! आपने न्यायत:ः अपना संदेह उपस्थित किया है। उत्तम कर्म करनेवाले मनुष्योंके जिस कार्यसे हम संतुष्ट होते हैं, उसको सुनिये
Para Pitṛ berkata: “Wahai para dewa yang mulia! Kalian telah mengajukan keraguan itu dengan adil dan patut. Sekarang dengarkan—perilaku dan perbuatan apakah dari manusia yang berbuat kebajikan yang membuat kami, para Pitṛ, berkenan.”
Verse 763
वृद्धगार्ग्यों महातेजास्तानेवं वाक्यमब्रवीत् । पितरोंका यह भाषण सुनकर तपस्याके धनी महातेजस्वी वृद्धगार्ग्यके शरीरमें रोमांच हो आया और उनसे इस प्रकार पूछा--
Vṛddha Gārgya, sang pertapa agung yang bercahaya oleh daya tapa, berkata kepada mereka demikian. Mendengar sabda para Pitṛ (leluhur), Vṛddha Gārgya yang kaya tapa itu diliputi getar hormat hingga bulu kuduknya berdiri, lalu ia menanyai mereka dengan cara berikut.
Verse 776
वर्षासु दीपदानेन तथैव च तिलोदकैः । “तपोधनो! नीले रंगके साँड़ छोड़ने, वर्षा-ऋतुमें दीप देने और अमावास्याको तिलमिश्रित जलद्वारा तर्पण करनेसे क्या लाभ होते हैं?”
“Wahai tapodhana (yang kaya tapa)! Apa buah kebajikan dari melepaskan lembu jantan berwarna biru (vṛṣotsarga), mempersembahkan pelita pada musim hujan, dan melakukan tarpaṇa pada hari amāvasyā dengan air bercampur wijen (tilodaka)?”
Verse 796
पितरस्तेन गच्छन्ति सोमलोकमसंशयम् | जो नदी या तालाबके तटसे अपने सींगोंद्वारा कीचड़ उछालकर खड़ा होता है, उससे वृषोत्सर्ग करनेवालेके पितर निस्संदेह चन्द्रलोकमें जाते हैं
“Dengan perbuatan itu para Pitṛ pergi ke Soma-loka tanpa ragu. Lembu jantan yang di tepi sungai atau telaga berdiri sambil mengibaskan lumpur dengan tanduknya—bagi orang yang melakukan vṛṣotsarga atas lembu demikian, para leluhurnya niscaya mencapai Candra-loka.”
Verse 806
तमोरूपं न तस्यास्ति दीपकं य: प्रयच्छति । वर्षा-ऋतुमें दीपदान करनेसे मनुष्य चन्द्रमाके समान शोभा पाता है। जो दीपदान करता है, उसके लिये नरकका अन्धकार है ही नहीं
Bagi orang yang menganugerahkan pelita, tidak ada kegelapan—yakni kegelapan neraka—baginya. Terutama dengan memberi pelita pada musim hujan, ia memperoleh keelokan laksana bulan.
Beyond listing rites and austerities, it asserts that dharma is fundamentally grounded in non-violence, truthfulness, compassion, and especially ārjava (straightforwardness), while condemning crookedness (jihmatā) as adharma.
Trikāla abhiṣeka, pitṛ-deva worship, agnihotra and homa, pañca-yajña, regulated forest diet (nīvāra, fruits/roots; in extremes water/air-based restraints), sthaṇḍila sleeping, vīrāsana, pañcatapa, and śīta/agni-yoga as disciplined austerities.
Yes. It attributes differentiated results (e.g., enjoyment in Gandharva/Nāga/Yakṣa/Varuṇa/Agni/Śakra or vīra realms, and some claims of worldly kingship after long discipline) as a traditional motivational taxonomy linking tapas and niyama to cosmological reward models.