Adhyaya 103
Anushasana ParvaAdhyaya 10349 Verses

Adhyaya 103

नहुषोपाख्यानम्—दीपदान-धूप-बलीकर्म-प्रशंसा (Nahūṣa Episode and the Commendation of Lamp-Gifting and Household Offerings)

Upa-parva: Dīpa–Dhūpa–Bali-vidhi (Household Offerings and the Nahūṣa Episode)

Yudhiṣṭhira asks Bhīṣma to explain how Nahūṣa became fallen, why he was cast to earth, and how he lost Indra-status. Bhīṣma recounts that Nahūṣa initially flourished through comprehensive observance of divine and human rites: lamp-gifts, incense offerings, salutations, water-based acts, and bali portions offered within the household space—practices described as ‘sadācāra’ recognized in both deva- and human realms and as especially beneficial for householders. When fortune waned, Nahūṣa neglected these disciplines; his ritual sphere became disturbed, and he summoned Agastya as a conveyance. A hidden Bhṛgu enters Agastya’s matted locks; Nahūṣa, acting in anger, strikes Agastya’s head with his foot. Bhṛgu curses Nahūṣa to fall to earth as a serpent; later, through austerities and supplication, a mitigation is granted: a future king named Yudhiṣṭhira will release him from the curse. The chapter closes with a phala-oriented commendation of dīpa-dāna: householders should give lamps at evening; the giver is said to gain ‘divine sight’ after death, and worldly qualities such as attractiveness and wealth are linked to the duration of a lamp’s burning.

Chapter Arc: भीष्म युधिष्ठिर से कहते हैं कि अगस्त्य–भृगु के संवाद के बीच उस महात्मा के आश्रम में दिव्य और मानुष—दोनों प्रकार के यज्ञ-उपचार, बलिकर्म और दान-क्रियाएँ स्वतः प्रवर्तित होने लगीं; और इसी प्रसंग से दीपदान का महात्म्य प्रकट होता है। → कथा नहुष के अपराध की ओर मुड़ती है—राजा का अहंकार ऋषि-तेज से टकराता है। भृगु के तेजस्वी क्रोध और नहुष की अविनय-पराकाष्ठा से शाप का भय घनीभूत होता है; साथ ही गृहस्थ-धर्म में संध्या-समय दीपदान की अनिवार्यता का विधान उभरता है। → भृगु का शाप नहुष पर गिरता है—‘सर्प बनकर शीघ्र पृथ्वी पर जा’; पतन का क्षण ही अध्याय का शिखर है, जहाँ राज-वैभव क्षण में धूल हो जाता है और ऋषि-धर्म की अजेयता स्थापित होती है। → पतन के बाद भी नहुष स्मृतिमान रहता है और भृगु से शाप-शान्ति की याचना करता है; आगे पुण्यकर्मों—विशेषतः दीपदान—के प्रभाव से क्रमशः सिद्धि और पुनरुत्थान का मार्ग दिखाया जाता है, और इन्द्र (शतक्रतु) ब्रह्मा के अभिषेक से पूर्ववत् शोभा पाते हैं। → नहुष के लिए शापान्ति/उद्धार की शर्तें और दीपदानादि पुण्यकर्मों का फल आगे के उपदेश-क्रम में विस्तार से खुलने का संकेत छोड़ता है।

Shlokas

Verse 1

इस प्रकार श्रीमह्ाभारत अनुशासनपर्वके अंतर्गत दानधर्मपर्वमें अगस्त्य और भ्रगुका संवादनामक निन्‍यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ९९ ॥। ऑपन--माजल छा अफ<-जआकऋा-ज शततमो< ध्याय: नहुषका पतन, शतक्रतुका इन्द्रपदपर पुन: अभिषेक तथा दीपदानकी महिमा युधिछिर उवाच कथं वै स विपन्नश्न कथं वै पातितो भुवि । कथं चानिन्द्रतां प्राप्तस्तद्‌ भवान्‌ वक्तुमरहति,युधिष्ठिरने पूछा--पितामह! राजा नहुषपर कैसे विपत्ति आयी? वे कैसे पृथ्वीपर गिराये गये और किस तरह वे इन्द्रपदसे वंचित हो गये? इसे आप बतानेकी कृपा करें

Yudhiṣṭhira berkata: “Wahai Pitāmaha, bagaimana Nahusha jatuh ke dalam malapetaka? Bagaimana ia dijatuhkan ke bumi? Dan bagaimana ia kehilangan kedudukan Indra? Mohon jelaskan hal itu kepadaku.”

Verse 2

भीष्म उवाच एवं तयो: संवदतो: क्रियास्तस्य महात्मन: । सर्वा एव प्रवर्तन्ते या दिव्या याश्व मानुषी:,भीष्मजीने कहा--राजन्‌! जब महर्षि भूगु और अगस्त्य उपर्युक्त वार्तालाप कर रहे थे। उस समय महामना नहुषके घरमें दैवी और मानुषी सभी क्रियाएँ चल रही थीं

Bhīṣma berkata: “Wahai Raja, ketika para resi Bhṛgu dan Agastya bercakap-cakap demikian, pada saat itu di kediaman Nahusha yang berhati luhur, segala macam kegiatan tengah berlangsung—baik upacara ilahi maupun tata laku manusiawi.”

Verse 3

तथैव दीपदानानि सर्वोपकरणानि वै | बलिकर्म च यच्चान्यदुत्सेका श्व पृथग्विधा:

Demikian pula, persembahan lampu (dīpa-dāna) dilakukan beserta segala perlengkapan yang diperlukan; dan upacara bali, serta bentuk-bentuk laku bhakti lainnya yang beraneka ragam, dijalankan menurut tata cara masing-masing.

Verse 4

सर्वे तस्य समुत्पन्ना देवेन्द्रस्य महात्मन: । देवलोके नृलोके च सदाचारा बुधै: स्मृता:

Bhīṣma berkata: “Semua yang lahir dari Deva-Indra yang berhati luhur itu dikenang oleh para bijak sebagai teladan tata susila—baik di alam para dewa maupun di dunia manusia.”

Verse 5

दीपदान, समस्त उपकरणोंसहित अन्नदान, बलिकर्म एवं नाना प्रकारके स्नान- अभिषेक आदि पूर्ववत्‌ चालू थे। देवलोक तथा मनुष्यलोकमें विद्वानोंने जो सदाचार बताये हैं, वे सब महामना देवराज नहुषके यहाँ होते रहते थे ।। ते चेद्‌ भवन्ति राजेन्द्र ऋद्ध्यन्ते गृहमेधिन: । धूपप्रदानैर्दीपैश्न नमस्कारैस्तथैव च,राजेन्द्र! गृहस्थके घर यदि उन सदाचारोंका पालन हो तो वे गृहस्थ सर्वथा उन्नतिशील होते हैं, धूपदान, दीपदान तथा देवताओंको किये गये नमस्कार आदिसे भी गृहस्थोंकी ऋद्धि-सिद्धि बढ़ती है

Bhishma berkata: Persembahan pelita, sedekah makanan lengkap dengan segala perlengkapannya, upacara bali (sajian persembahan), serta berbagai mandi suci dan abhiseka berlangsung seperti sediakala. Segala tata laku mulia yang diajarkan para bijak di alam para dewa maupun di alam manusia, semuanya senantiasa dijalankan di kediaman raja luhur Nahusha. Wahai raja terbaik, bila kebajikan-kebajikan itu hadir di sebuah rumah, para perumah tangga akan maju dan makmur dalam segala hal; dan melalui persembahan dupa, pelita, serta sembah-hormat kepada para dewa, kemakmuran dan keberhasilan mereka kian bertambah.

Verse 6

यथा सिद्धस्य चान्नस्य ग्रहायाग्रं प्रदीयते | बलयश्न गृहोद्देशे अतः प्रीयन्ति देवता:,जैसे तैयार हुई रसोईमेंसे पहले अतिथिको भोजन दिया जाता है, उसी प्रकार घरमें देवताओंके लिये अन्नकी बलि दी जाती है। जिससे देवते प्रसन्न होते हैं

Sebagaimana dari makanan yang telah matang bagian pertama diberikan kepada tamu, demikian pula di rumah tangga disisihkan terlebih dahulu sajian makanan (bali) bagi para dewa. Dengan persembahan yang didahulukan ini, para dewa menjadi berkenan.

Verse 7

यथा च गृहिणस्तोषो भवेद्‌ वै बलिकर्मणि । तथा शतगुणा प्रीतिर्देवतानां प्रजायते,बलिकर्म करनेपर गृहस्थको जितना संतोष होता है, उससे सौगुनी प्रीति देवताओंको होती है

Sebesar kepuasan yang dirasakan seorang perumah tangga ketika melaksanakan bali sebagai kewajiban, seratus kali lipat lebih besar kegembiraan para dewa atas perbuatan itu.

Verse 8

एवं धूपप्रदानं च दीपदानं च साधव: । प्रयच्छन्ति नमस्कारैर्युक्तमात्मगुणावहम्‌,इस प्रकार श्रेष्ठ पुरुष अपने लिये लाभदायक समझकर देवताओंको नमस्कारसहित धूपदान और दीपदान करते हैं

Demikianlah orang-orang berbudi, memahami perbuatan itu membawa kebaikan bagi diri, mempersembahkan dupa dan pelita disertai sembah-hormat kepada para dewa.

Verse 9

स्‍्नानेनाद्धिश्न यत्‌ कर्म क्रियते वै विपश्चिता । नमस्कारप्रयुक्तेन तेन प्रीयन्ति देवता:,विद्वान्‌ पुरुष जलसे स्नान करके देवता आदिके लिये नमस्कारपूर्वक जो तर्पण आदि कर्म करते हैं, उससे देवता, महाभाग पितर तथा तपोधन ऋषि संतुष्ट होते हैं तथा विधिपूर्वक पूजित होकर घरके सम्पूर्ण देवता प्रसन्न होते हैं

Apa pun upacara yang dilakukan orang bijak setelah mandi suci, bila disertai sembah-hormat, membuat para dewa berkenan. Tindakan seperti persembahan air dan laku sejenisnya, bila dijalankan dengan tata cara yang benar dan penuh hormat, menghadirkan kerukunan serta keberkahan dalam pemujaan rumah tangga.

Verse 10

पितरश्न महाभागा ऋषयश्न तपोधना: । गृह्माश्व देवता: सर्वाः प्रीयन्ते विधिनार्चिता:,विद्वान्‌ पुरुष जलसे स्नान करके देवता आदिके लिये नमस्कारपूर्वक जो तर्पण आदि कर्म करते हैं, उससे देवता, महाभाग पितर तथा तपोधन ऋषि संतुष्ट होते हैं तथा विधिपूर्वक पूजित होकर घरके सम्पूर्ण देवता प्रसन्न होते हैं

Bhishma berkata: Para Pitṛ yang mulia, para resi yang kaya tapa, dan seluruh dewa penjaga rumah tangga menjadi berkenan bila dipuja menurut tata yang benar. Karena itu, seorang bijak setelah mandi menyampaikan penghormatan dengan takzim dan melaksanakan upacara seperti tarpaṇa bagi para dewa dan lainnya; dengan demikian para penerima suci itu dipuaskan dan tatanan dharma di dalam rumah terpelihara.

Verse 11

इत्येतां बुद्धिमास्थाय नहुष: स नरेश्वरः । सुरेन्द्रत्वं महत्‌ प्राप्प कृतवानेतददभूतम्‌,इसी विचारधाराका आश्रय लेकर राजा नहुषने महान देवेन्द्रपद पाकर यह अदभुत पुण्यकर्म सदा चालू रखा था

Bhishma berkata: Dengan berpegang pada pemahaman itu, raja Nahuṣa—setelah meraih kedudukan agung sebagai Indra—menjalankan laku kebajikan yang menakjubkan ini dan terus memeliharanya tanpa putus.

Verse 12

कस्यचित्‌ त्वथ कालस्य भाग्यक्षय उपस्थिते । सर्वमेतदवज्ञाय कृतवानिदमीदृशम्‌,किंतु कुछ कालके पश्चात्‌ जब उनके सौभाग्य-नाशका अवसर उपस्थित हुआ, तब उन्होंने इन सब बातोंकी अवहेलना करके ऐसा पापकर्म आरम्भ कर दिया

Namun setelah beberapa waktu, ketika saat habisnya keberuntungan itu tiba, ia mengabaikan semua pertimbangan tersebut dan mulai menempuh laku yang berdosa.

Verse 13

ततः स परिहीणो<भूत्‌ सुरेन्द्रो बलदर्पत: । धूपदीपोदकविधधि न यथावच्चकार ह,बलके घमण्डमें आकर देवराज नहुष उन सत्कर्मोंसे भ्रष्ट हो गये। उन्होंने धूपदान, दीपदान और जलदानकी विधिका यथावत्‌्रूपसे पालन करना छोड़ दिया

Bhishma berkata: Setelah itu, sang raja para dewa jatuh dari keadaan yang semestinya, mabuk oleh kesombongan atas kekuatan. Ia tidak lagi melaksanakan, sebagaimana ditetapkan, tata cara persembahan dupa, pelita, dan air.

Verse 14

ततो<स्य यज्ञविषयो रक्षोभ्रि: पर्यबध्यत । अथागस्त्यमृषिश्रेष्ठ वाहनायाजुहाव ह,उसका फल यह हुआ कि उनके यज्ञस्थलमें राक्षसोंने डेरा डाल दिया। उन्हींसे प्रभावित होकर महाबली नहुषने मुसकराते हुए-से मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यको सरस्वतीतटसे तुरंत अपना रथ ढोनेके लिये बुलाया। तब महातेजस्वी भृगुने मित्रावरुणकुमार अगस्त्यजीसे कहा --

Kemudian tempat yajña-nya dikepung dan dihalangi oleh para rākṣasa. Lalu ia memanggil resi utama Agastya untuk menjadi pembawanya (mengangkat/mengusungnya), sehingga tampak bagaimana kuasa yang disalahgunakan mengubah laku suci menjadi panggung pemaksaan, bukan dharma.

Verse 15

द्रुतं सरस्वतीकूलात्‌ स्मयन्निव महाबल: । ततो भृगुर्महातेजा मैत्रावरुणिमब्रवीत्‌,उसका फल यह हुआ कि उनके यज्ञस्थलमें राक्षसोंने डेरा डाल दिया। उन्हींसे प्रभावित होकर महाबली नहुषने मुसकराते हुए-से मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यको सरस्वतीतटसे तुरंत अपना रथ ढोनेके लिये बुलाया। तब महातेजस्वी भृगुने मित्रावरुणकुमार अगस्त्यजीसे कहा --

Maka sang perkasa (Nahusha), seolah tersenyum, bergegas meninggalkan tepi Sungai Sarasvatī. Lalu resi Bhṛgu yang bercahaya agung berbicara kepada Maitrāvaruṇi (Agastya).

Verse 16

निमीलय स्वनयने जटां यावद्‌ विशामि ते । स्थाणुभूतस्य तस्याथ जटां प्राविशदच्युत:,“मुने! आप अपनी आँखें मूँद लें, मैं आपकी जटामें प्रवेश करता हूँ।” महर्षि अगस्त्य आँखें मूँदकर काष्ठकी तरह स्थिर हो गये। अपनी मर्यादासे च्युत न होनेवाले महातेजस्वी भृगुने राजाको स्वर्गसे नीचे गिरानेके लिये अगस्त्यजीकी जटामें प्रवेश किया। इतनेहीमें देवराज नहुष ऋषिको अपना वाहन बनानेके लिये उनके पास पहुँचे

Bhṛgu berkata, “Wahai resi, pejamkan matamu sampai aku masuk ke dalam rambut gimbalm u.” Sang resi Agastya pun memejamkan mata dan berdiri tak bergerak laksana tiang; lalu Bhṛgu yang tak menyimpang dari tata-krama memasuki gimbal rambutnya.

Verse 17

भगुः स सुमहातेजा: पातनाय नृपस्य च । ततः स देवराट प्राप्तस्तमृषिं वाहनाय वै,“मुने! आप अपनी आँखें मूँद लें, मैं आपकी जटामें प्रवेश करता हूँ।” महर्षि अगस्त्य आँखें मूँदकर काष्ठकी तरह स्थिर हो गये। अपनी मर्यादासे च्युत न होनेवाले महातेजस्वी भृगुने राजाको स्वर्गसे नीचे गिरानेके लिये अगस्त्यजीकी जटामें प्रवेश किया। इतनेहीमें देवराज नहुष ऋषिको अपना वाहन बनानेके लिये उनके पास पहुँचे

Bhṛgu yang amat bercahaya bertindak dengan maksud menjatuhkan sang raja. Pada saat itu juga Raja Nahusha, laksana penguasa para dewa, mendatangi resi itu untuk menjadikannya sebagai pembawa (penarik) keretanya.

Verse 18

ततोडगस्त्य: सुरपतिं वाक्यमाह विशाम्पते | योजयस्वेति मां क्षिप्रं कं च देशं वहामि ते,प्रजानाथ! तब अगस्त्यने देवराजसे कहा--“राजन्‌! मुझे शीघ्र रथमें जोतिये और बताइये मैं आपको किस स्थानपर ले चलूँ। देवेश्वरर! आप जहाँ कहेंगे, वहीं आपको ले चलूँगा।” उनके ऐसा कहनेपर नहुषने मुनिको रथमें जोत दिया

Lalu Agastya berkata kepada penguasa para dewa, “Wahai pelindung rakyat, pasangkan aku segera pada kereta, dan katakan ke negeri mana harus kubawa engkau. Ke mana pun engkau memerintah, ke sanalah akan kuantar.”

Verse 19

यत्र वक्ष्यसि तत्र त्वां नयिष्यामि सुराधिप । इत्युक्तो नहुषस्तेन योजयामास त॑ मुनिम्‌,प्रजानाथ! तब अगस्त्यने देवराजसे कहा--“राजन्‌! मुझे शीघ्र रथमें जोतिये और बताइये मैं आपको किस स्थानपर ले चलूँ। देवेश्वरर! आप जहाँ कहेंगे, वहीं आपको ले चलूँगा।” उनके ऐसा कहनेपर नहुषने मुनिको रथमें जोत दिया

Agastya berkata, “Wahai penguasa para dewa, ke mana pun engkau berkata, ke sanalah akan kubawa engkau.” Mendengar itu, Nahusha pun memasangkan sang resi pada kereta.

Verse 20

भगुस्तस्य जटान्तस्थो बभूव हृषितो भृशम्‌ | न चापि दर्शनं तस्य चकार स भृगुस्तदा,यह देख उनकी जटाके भीतर बैठे हुए भृगु बहुत प्रसन्न हुए। उस समय भृगुने नहुषका साक्षात्कार नहीं किया

Bhṛgu, yang duduk tersembunyi di dalam gimbal rambutnya, menjadi amat bersukacita; namun pada saat itu Bhṛgu tidak menampakkan diri kepada Nahuṣa—ia tidak memberinya audiensi langsung.

Verse 21

वरदानप्रभावज्ञों नहुषस्य महात्मन: । न चुकोप तदागस्त्यो युक्तोडपि नहुषेण वै,अगस्त्यमुनि महामना नहुषको मिले हुए वरदानका प्रभाव जानते थे, इसलिये उसके द्वारा रथमें जोते जानेपर भी वे कुपित नहीं हुए

Agastya, sang maharsi, memahami daya anugerah yang diterima Nahuṣa yang mulia. Karena itu, meski Nahuṣa memasangnya sebagai penarik kereta, Agastya tidak murka—ia menahan diri, sadar akan kekuatan anugerah itu.

Verse 22

तं तु राजा प्रतोदेन चोदयामास भारत । न चुकोप स धर्मात्मा ततः पादेन देवराट्‌

Wahai keturunan Bharata, sang raja mendorongnya dengan cemeti penuntun. Namun ia yang berhati dharma tidak murka; kemudian sang raja para dewa menendang dengan kakinya.

Verse 23

तस्मिन्‌ शिरस्यभिहते स जटान्तर्गतो भगुः

Ketika kepala itu dipukul, Bhagu—yang tersembunyi di dalam gimbal rambut—pun tersingkap dari dalamnya.

Verse 24

शशाप बलवत्क़ुद्धो नहुषं पापचेतसम्‌ | यस्मात्‌ पदा55हत: क्रोधाच्छिरसीमं महामुनिम्‌

Maka sang maharsi, dengan murka yang dahsyat, menjatuhkan kutuk kepada Nahuṣa yang berhati dosa; sebab dalam amarahnya Nahuṣa telah menghantam kepala sang maharsi dengan kakinya.

Verse 25

तस्मादाशु महीं गच्छ सर्पों भूत्वा सुदुर्मते । उनके मस्तकपर चोट होते ही जटाके भीतर बैठे हुए महर्षि भूगु अत्यन्त कुपित हो उठे और उन्होंने पापात्मा नहुषको इस प्रकार शाप दिया--'ओ दुर्मते! तुमने इन महामुनिके मस्तकमें क्रोधपूर्वक लात मारी है, इसलिये तू शीघ्र ही सर्प होकर पृथ्वीपर चला जा” ।। इत्युक्त: स तदा तेन सर्पो भूत्वा पपात ह

Bhishma berkata, “Karena itu, wahai yang berhati jahat, segeralah pergi ke bumi dengan menjadi seekor ular.” Setelah demikian ditegur, Nahusha—terkutuk karena kekerasan congkaknya terhadap seorang resi agung—seketika berubah menjadi ular dan jatuh tersungkur.

Verse 26

भूगुं हि यदि सोडद्रक्ष्यन्नहुष: पृथिवीपते

Bhishma berkata, “Wahai penguasa bumi, jika Nahusha—dalam melindungi rakyatnya—bersedia menanggung bahkan (murka/kutuk) Bhrigu, maka…”

Verse 27

स तु तैस्तै: प्रदानैश्व तपोभिर्नियमैस्तथा

Bhishma berkata, “Namun ia, melalui berbagai pemberian itu, dan juga melalui tapa serta laku disiplin, (bertambah dalam kebajikan dan pencapaian rohani).”

Verse 28

पतितो5पि महाराज भूतले स्मृतिमानभूत्‌ । प्रसादयामास भृगुं शापान्तो मे भवेदिति

Bhishma berkata, “Wahai Raja Agung, meski telah jatuh ke tanah, ia tetap sadar dan ingat. Dengan pikiran, ‘Semoga kutukku berakhir,’ ia berusaha menenangkan resi Bhrigu.”

Verse 29

महाराज! नहुषने जो भिन्न-भिन्न प्रकारके दान किये थे, तप और नियमोंका अनुष्ठान किया था, उनके प्रभावसे वे पृथ्वीपर गिरकर भी पूर्वजन्मकी स्मृतिसे वंचित नहीं हुए। उन्होंने भूगुको प्रसन्न करते हुए कहा--'प्रभो! मुझको मिले हुए शापका अंत होना चाहिये” ।। ततोडगस्त्य: कृपाविष्ट: प्रासादयत त॑ भृगुम्‌ । शापान्तार्थ महाराज स च प्रादात्‌ कृपान्वित:,महाराज! तब अगस्त्यने दयासे द्रवित होकर उनके शापका अंत करनेके लिये भृगुको प्रसन्न किया। तब कृपायुक्त हुए भृूगुने उस शापका अंत इस प्रकार निश्चित किया

Bhishma berkata, “Wahai Raja, karena Nahusha telah melakukan berbagai dana, tapa, dan laku disiplin, maka meski jatuh ke bumi ia tidak kehilangan ingatan akan kelahiran sebelumnya. Ia menenangkan resi Bhrigu dan berkata, ‘Tuan, semoga kutuk yang menimpaku berakhir.’ Lalu Agastya, tergerak oleh belas kasih, mendekati Bhrigu demi mengakhiri kutuk itu; dan Bhrigu, luluh oleh kemurahan hati, menetapkan bagaimana kutuk itu akan berakhir.”

Verse 30

भूगुरुवाच राजा युधिष्ठिरो नाम भविष्यति कुलोद्वह: । सत्वां मोक्षयिता शापादित्युक्त्वान्तरधीयत,भगुने कहा--राजन! तुम्हारे कुलमें सर्वश्रेष्ठ युधिष्ठिर नामसे प्रसिद्ध एक राजा होंगे, जो तुम्हें इस शापसे मुक्त करेंगे--ऐसा कहकर भृगुजी अंतर्धान हो गये

Bhṛgu berkata: “Wahai Raja, dalam garis keturunanmu akan lahir seorang raja bernama Yudhiṣṭhira, penopang utama wangsa itu. Dialah yang akan membebaskanmu dari kutukan ini.” Setelah berkata demikian, Bhṛgu pun lenyap dari pandangan.

Verse 31

अगस्त्योडपि महातेजा: कृत्वा कार्य शतक्रतो: । स्वमाश्रमपदं प्रायात्‌ पूज्यमानो द्विजातिभि:,महातेजस्वी अगस्त्य भी शतक्रतु इन्द्रका कार्य सिद्ध करके द्विजातियोंसे पूजित होकर अपने आश्रमको चले गये

Sang resi Agastya yang berdaya cahaya agung pun, setelah menuntaskan tugas Śatakratu (Indra), kembali ke pertapaannya sendiri—dihormati oleh para dwija.

Verse 32

नहुषो<पि त्वया राजंस्तस्माच्छापात्‌ समुद्धृतः । जगाम ब्रह्मभवनं पश्यतस्ते जनाधिप,राजन! तुमने भी नहुषका उस शापसे उद्धार कर दिया। नरेश्वर! वे तुम्हारे देखते-देखते ब्रह्मतोकको चले गये

Wahai Raja, engkau pun telah menyelamatkan Nahuṣa dari kutukan itu. Dan di hadapanmu sendiri, wahai penguasa manusia, ia berangkat menuju kediaman Brahmā.

Verse 33

तदा स पातयित्वा त॑ नहुषं भूतले भगुः । जगाम ब्रद्म॒भवनं ब्रह्मणे च न्यवेदयत्‌,भूगु उस समय नहुषको पृथ्वीपर गिराकर ब्रह्माजीके धाममें गये और उनसे उन्होंने यह सब समाचार निवेदन किया

Saat itu Bhṛgu, setelah menjatuhkan Nahuṣa ke bumi, pergi ke kediaman Brahmā dan melaporkan seluruh peristiwa itu kepada Brahmā.

Verse 34

तत: शक्रं समानाय्य देवानाह पितामह: । वरदानान्मम सुरा नहुषो राज्यमाप्तवान्‌

Kemudian Sang Pitāmaha (Brahmā) memanggil Śakra (Indra) dan berkata kepada para dewa: “Wahai para sura, berkat anugerah yang telah Kuberikan, Nahuṣa memperoleh kedaulatan.”

Verse 35

स चागस्त्येन क्रुद्धेन भ्रंशितो भूतलं गत: । तब पितामह ब्रह्माने इन्द्र तथा अन्य देवताओंको बुलवाकर उनसे कहा--'देवगण! मेरे वरदानसे नहुषने राज्य प्राप्त किया था। परंतु कुपित हुए अगस्त्यने उन्हें स्वर्गसे नीचे गिरा दिया। अब वे पृथ्वीपर चले गये ।। न च शकक्‍्यं विना राज्ञा सुरा वर्तयितुं क्वचित्‌

Bhishma berkata: “Ia dijatuhkan oleh murka resi Agastya dan terhempas ke bumi. Lalu Pitamaha Brahma memanggil Indra beserta para dewa lainnya dan berkata: ‘Wahai para dewa! Dengan anugerahku Nahusha pernah memperoleh kerajaan; namun Agastya yang murka menjatuhkannya dari surga, dan kini ia telah pergi ke bumi. Tanpa seorang raja, para dewa pun tak dapat menegakkan tatanan di mana pun.’”

Verse 36

एवं सम्भाषमाणं तु देवा: पार्थ पितामहम्‌

Wahai Partha, ketika Pitamaha berbicara demikian, para dewa menyimak dan menghadiri sabdanya dengan penuh hormat.

Verse 37

सो5भिषिक्तो भगवता देवराज्ये च वासव:

Demikianlah Vāsava (Indra), setelah ditahbiskan melalui upacara suci oleh Sang Bhagavan, ditegakkan dalam kedaulatan para dewa.

Verse 38

एवमेतत्‌ पुरावृत्तं नहुषस्य व्यतिक्रमात्‌

Demikianlah peristiwa purba itu terjadi—bermula dari pelanggaran batas oleh Nahusha.

Verse 39

तस्माद्‌ दीपा: प्रदातव्या: सायं वै गृहमेधिभि:

Karena itu, para perumah tangga hendaknya memberikan pelita pada waktu senja.

Verse 40

पूर्णचन्द्रप्रतिकाशा दीपदाश्व॒ भवन्त्युत,दीपदान करनेवाले मनुष्य निश्चय ही पूर्ण चन्द्रमाके समान कान्तिमान्‌ होते हैं। जितने पलकोंके गिरनेतक दीपक जलते हैं, उतने वर्षोतक दीपदान करनेवाला मनुष्य रूपवान्‌ और बलवान होता है

Bhīṣma berkata: Para pemberi pelita menjadi bercahaya laksana bulan purnama. Sungguh, orang yang melakukan dāna berupa pelita memperoleh sinar bak rembulan. Selama pelita itu menyala—sebatas sekejap kedipan mata—selama itu pula, dalam hitungan tahun, sang dermawan dianugerahi keelokan rupa dan kekuatan.

Verse 41

यावदक्षिनिमेषाणि ज्वलन्ते तावती: समा: । रूपवान्‌ बलवांश्वापि नरो भवति दीपद:,दीपदान करनेवाले मनुष्य निश्चय ही पूर्ण चन्द्रमाके समान कान्तिमान्‌ होते हैं। जितने पलकोंके गिरनेतक दीपक जलते हैं, उतने वर्षोतक दीपदान करनेवाला मनुष्य रूपवान्‌ और बलवान होता है

Selama pelita menyala sebatas sekejap kedipan mata, selama itu pula—dalam hitungan tahun—pemberi pelita menjadi elok rupanya dan kuat tenaganya.

Verse 100

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि अगस्त्य भूगुसंवादो नाम शततमो<ध्याय:

Demikianlah, dalam Śrī Mahābhārata, pada Anuśāsana Parva—bagian Dāna-dharma Parva—berakhirlah bab ke-seratus yang berjudul “Dialog Agastya dan Bhṛgu.”

Verse 226

अगस्त्यस्य तदा क्रुद्धो वामेनाभ्यहनच्छिर: । भारत! राजा नहुषने चाबुक मारकर हाँकना आरम्भ किया तो भी उन धर्मात्मा मुनिको क्रोध नहीं आया। तब कुपित हुए देवराजने महात्मा अगस्त्यके सिरपर बायें पैरसे प्रहार किया

Bhīṣma berkata: Maka, karena murka, ia menghantam kepala Mahātmā Agastya dengan kaki kirinya. Wahai keturunan Bharata! Ketika Raja Nahusha mulai menggiring para resi yang saleh dengan cambuk, para pertapa suci itu tetap tidak tersulut amarah; namun sang raja para dewa, tersinggung dan naik murka, menendang kepala Agastya dengan kaki kiri.

Verse 253

अदृष्टेनाथ भुगुणा भूतले भरतर्षभ । भरतश्रेष्ठ! भूगु नहुषको दिखायी नहीं दे रहे थे। उनके इस प्रकार शाप देनेपर नहुष सर्प होकर पृथ्वीपर गिरने लगे,तस्मादयं पुन: शक्रो देवराज्येडभिषिच्यताम्‌ । “देवताओ! बिना राजाके कहीं भी रहना असंभव है। अतः अपने पूर्व इन्द्रको पुनः देवराजके पदपर अभिषिक्त करो”

Bhīṣma berkata: Wahai yang utama di antara keturunan Bharata! Ketika resi Bhṛgu tak lagi tampak di muka bumi, dan karena kutuknya Nahusha jatuh ke tanah menjadi seekor ular, maka (para dewa berkata): “Karena itu, Śakra hendaklah kembali ditahbiskan atas kerajaan para dewa. Sebab tanpa raja, tatanan hidup tak dapat tegak di mana pun; maka pulihkan Indra yang dahulu ke jabatan penguasa para dewa.”

Verse 263

न च शक्तो5भविष्यद्‌ वै पातने तस्य तेजसा । पृथ्वीनाथ! यदि नहुष भूगुको देख लेते तो उनके तेजसे प्रतिहत होकर वे उन्हें स्वर्गसे नीचे गिरानेमें समर्थ न होते

Bhīṣma berkata—Wahai penguasa bumi! Seandainya Nahuṣa tidak melihat Bhṛgu, niscaya—terhalang oleh tejas (cahaya tapa) Bhṛgu—ia takkan mampu menjatuhkannya dari surga. Tejas pertapaan yang sejati mengekang kesombongan dan kekuatan yang zalim, serta melindungi dharma dengan membuat kuasa yang tidak adil menjadi tak berdaya.

Verse 363

एवमस्त्विति संद्ृष्टा: प्रत्यूचुस्तं नराधिप । कुन्तीनंदन! नरेश्वर! पितामह ब्रह्माका यह कथन सुनकर सब देवता हर्षसे खिल उठे और बोले--'भगवन्‌! ऐसा ही हो”

Bhīṣma berkata—Wahai raja manusia, wahai putra Kuntī, wahai penguasa insan! “Demikianlah hendaknya.” Sambil memandang dengan persetujuan, mereka menjawabnya. Mendengar sabda Sang Grandsire dan Brahmā, para dewa berseri-seri oleh sukacita dan berseru, “Wahai Yang Mulia, jadilah tepat demikian!”

Verse 373

ब्रह्मणा राजशार्दूल यथापूर्व व्यरोचत । राजसिंह! भगवान्‌ ब्रह्माके द्वारा देवरराजके पदपर अभिषिक्त हो शतक्रतु इन्द्र फिर पूर्ववत्‌ शोभा पाने लगे

Bhīṣma berkata—Wahai harimau di antara raja-raja, ia kembali bersinar seperti sediakala. Wahai singa di antara raja-raja, ketika Brahmā Yang Mulia menobatkannya pada kedudukan raja para dewa, Indra—pelaksana seratus yajña—mendapatkan kembali kemegahan lamanya.

Verse 383

सच तैरेव संसिद्धों नहुष: कर्मभि: पुनः । इस प्रकार पूर्वकालमें नहुषके अपराधसे ऐसी घटना घटी कि वे नहुष बार-बार दीपदान आदि पुण्यकर्मोंसे सिद्धिको प्राप्त हुए थे

Bhīṣma berkata—Demikianlah, melalui kebajikan-kebajikan itu juga, Nahuṣa kembali meraih keberhasilan rohani. Pada zaman purba, karena pelanggaran Nahuṣa, peristiwa semacam itu terjadi; namun dengan berulang kali melakukan perbuatan bajik—seperti persembahan lampu—ia berulang kali memperoleh pencapaian yang mujur.

Verse 396

दिव्यं चक्षुरवाप्नोति प्रेत्य दीपस्प दायक: । इसलिये गृहस्थोंको सायंकालमें अवश्य दीपदान करने चाहिये। दीपदान करनेवाला पुरुष परलोकमें दिव्य नेत्र प्राप्त करता है

Bhīṣma berkata—Pemberi persembahan lampu memperoleh penglihatan ilahi setelah wafat. Karena itu para perumah tangga hendaknya pasti mempersembahkan lampu pada waktu senja; sang pemberi lampu meraih penglihatan surgawi di alam seberang.

Frequently Asked Questions

The narrative frames his failure as a compound breach: neglect of established ritual disciplines (dhūpa/dīpa/bali/namaskāra) alongside an abuse of authority toward a sage (striking Agastya), producing a moral and cosmic backlash.

Everyday, rule-bound household observances—performed with respect—are presented as stabilizing forces for prosperity and legitimacy; conversely, arrogance and discontinuity in practice undermine both ritual order and personal standing.

Yes. The chapter explicitly commends evening lamp-giving (dīpa-dāna), stating post-mortem attainment of ‘divine sight’ and associating the lamp’s burning duration with extended merit, alongside worldly benefits such as beauty and wealth.